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Saturday, 5 June 2021

गोली दागो पोस्टर" के कुछ अंश - किसान

इस बेमौसम बारिश में आलोक धन्वा की मशहूर कविता "गोली दागो पोस्टर" के कुछ अंश

जिस ज़मीन पर 
मैं अभी बैठकर लिख रहा हूँ
जिस ज़मीन पर मैं चलता हूँ
जिस ज़मीन को मैं जोतता हूँ
जिस ज़मीन में बीज बोता हूँ और 
जिस ज़मीन से अन्न  मैं
गोदामों तक ढोता हूँ
उस ज़मीन के लिए गोली दागने का अधिकार
मुझे है या उन दोग़ले ज़मींदारों को जो पूरे देश को
सूदख़ोर का कुत्ता बना देना चाहते हैं

यह कविता नहीं है 
यह गोली दागने की समझ है
जो तमाम क़लम चलानेवालों को
तमाम हल चलानेवालों से मिल रही है।

किसान आत्महत्या

मेरा विश्वास है
तुम्हारी तमाम कोशिशों के बाद भी
यह खबर आग की तरह फ़ैलती जाएगी
तमाम शहरी मजदूर भाइयो 
तक।

मौज़-मस्ती में डूबे लोग
सहम जायेगे
गहरी नींद में सोए
अलसाए भी जाग जाएगें
जब यह खबर आग बनकर
उतरेगी जालिम हुक्मरानों की साँसों में।

खेत –खलिहान
कर्ज में डूबे किसान 
मिहनतकसो की ललकार
उत्पीडित जनों की हुंकार
जब गूंज उठे गी संसद के गलियारों तक।

हमने देखा है इन्ही आँखों से
 मुनाफा तो मुनाफा लागत भी डूबते हुए
उम्मीदें, ख्वाहिशें, 
और ... और बहुत कुछ... सब कुछ ...
 बेटियों के रिश्ते .... बहु कि बिदाई ...
किसी की बरसी ... किसी का खतना .... 
किसी का मुंडन... किसी की मंगनी ....
हमने देखा है सबकुछ खत्म होते हुए...
हमने देखा है
विकते हुए अपनी प्यारी गाय..... 
कुर्बानी वाला बकरा ..... 
मुर्गियाँ .... अपनेे गहने ....... 
अपने बहु बेटियों की आबरू ...अपनी पगड़ी.....  
और इस लिए
 आत्महत्या करने के बजाये
घुटने के बल जीने के बजाये 
हमने फैसला किया है 
उठ खड़ा होने का
इस पूंजीवादी शोषण के खिलाफ
हम सभी मजदूर गरीब किसान।

2016
एम के आज़ाद


Tuesday, 1 June 2021

तीन अध्यादेश, किसान

12/09/2020

कॉर्पोरेट गैंग की चहेती फासीवादी भाजपा सरकार ने किसानों को तीन अध्यादेश तोहफे के रूप में दिया है जिसका व्यापक विरोध हो रहा है।
वे तीन अध्यादेश है:
1.फॉर्मर्स प्रोड्यूस ट्रेड एंड कॉमर्स (प्रमोशन एंड फैसिलिटेशन) ऑर्डिनेंस

2. एसेंशियल एक्ट 1955 में बदलाव

3. फॉर्मर्स अग्रीमेंट ऑन प्राइस एश्योरेंस एंड फार्म सर्विस ऑर्डिनेंस

ऐसा भी कहा जा रहा है कि  यह विश्व बुर्जुवा संस्थान WTO के इशारे पर किया जा रहा है, जिसका मकसद है -कृषि उत्पाद के व्यापार को पूरी तरह बाजार के हवाले कर देना और कृषि क्षेत्र में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के माध्यम से कॉर्पोरेट घुसपैठ को सुगम बनाना। 

ऐसा कहा जा रहा है कि यह कदम छोटे किसानों के पूंजीवादी सम्पत्तिहरण की प्रक्रिया को और तेज करेगा।

हमारा यह मानना है कि पूंजीवाद छोटे किसानों को एक ही चीज दे सकता है-  बदहाली भरी जिंदगी और सम्पत्तिहरण।प्रश्न केवल इतना है कि इस पीड़ादायक प्रक्रिया में वक्त कितना लगनेवाला है।




किसानों के खिलाफ मोदी सरकार के तीन अध्यादेश


21/09/2020

कॉर्पोरेट गैंग की चहेती फासीवादी भाजपा सरकार ने  किसानों को तीन अध्यादेश तोहफे के रूप में दिया है जिसका व्यापक विरोध हो रहा है।
वे तीन अध्यादेश है:
1.फॉर्मर्स प्रोड्यूस ट्रेड एंड कॉमर्स (प्रमोशन एंड फैसिलिटेशन) ऑर्डिनेंस

2. एसेंशियल एक्ट 1955 में बदलाव

3. फॉर्मर्स अग्रीमेंट ऑन प्राइस एश्योरेंस एंड फार्म सर्विस ऑर्डिनेंस

 यह विश्व बुर्जुवा संस्थान WTO के इशारे पर किया जा रहा है, जिसका मकसद है -कृषि उत्पाद के व्यापार को पूरी तरह बाजार के हवाले कर देना और कृषि क्षेत्र में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के माध्यम से कॉर्पोरेट घुसपैठ को सुगम बनाना। किसानो को अंदेशा है और वे डरे हुए है कि सरकार खेती में दिए जा रहे न्यूनतम समर्थन मूल्य से हाथ खींचना चाह रही है।

लानत है ऐसे पूंजीवाद और पूंजीवादी कृषि प्रणाली पर जिसके अंदर किसानों का सबसे धनी और मजबूत तबका भी  अपने बल-बुते नही, सरकार के न्यूनतम समर्थन मूल्य के सहारे टीका हुआ था। छोटे और गरीब किसानों की तो बात ही और है, वे पहले से ही बदहाली भरी जिंदगी जीने को विवश है।

इसमें संदेह नही कि खुले  बाजार में  धनी किसानों के लिये कॉर्पोरेट निवेश और नियंत्रण वाले खेती से मुकाबला करना आसान नही होगा। यह कदम किसानों के बीच पूंजीवादी सम्पत्तिहरण की प्रक्रिया को भी और तेज करेगा और कृषि क्षेत्र में कॉर्पोरेट निवेश और नियंत्रण की राह खोलेगा।

पूंजीवाद ने किसानों को, और खास कर छोटे जोत के  किसानों को एक ही चीज दिया है -  बदहाली भरी जिंदगी और सम्पत्तिहरण। 

कृषि सम्बन्धी ये तीन बिल क्या कृषि क्षेत्र के सबसे धनी संस्तर के सामने भी कॉर्पोरेट खेती द्वारा इनके सम्पत्तिहरण का खतरा पैदा कर दिया है?

राजनीतिक यूटोपिया और किसान आंदोलन

22/12/2020

किसान आंदोलन का विरोध कुछ फर्जी कम्युनिष्टों द्वारा भी किया जा रहा है। उनका क्या कहना है? संक्षेप में उनके द्वारा किये जा रहे प्रोपेगंडा को नीचे दिया जा रहा है:

देखो गरीब किसान भाई लोग, आपके फसल के लिये हम न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी की मांग को एक  प्रतिक्रियावादी मांग मानते  है। इससे सिर्फ कुलक किसानों को ही फायदा है। आप लोग लोग बाजार में अनाज कितना बेचते ही हो! 

दूसरे, महंगाई बढ़ने का  कारण भी MSP है। बुर्जुवा के प्रतिष्ठित पत्रिका EPW में एक विद्वान लेखक ने एक अति गम्भीर लेख में इसे साबित किया कि MSP से महंगाई बढ़ती है।

इस लिये हम MSP का समर्थन नही कर सकते।   

लेकिन आप चिंता मत करो, आपके  बेटे के लिए  रोजगार गारंटी कानून और बेरोजगारी भत्ता गारंटी कानून लाने के लिये हम सरकार पर दबाव बना रहे है। आप सब हमारे पार्टी को सपोर्ट करो। आपको बहुत फायदा होगा। आपको खेतो में पसीना बहाने की भी जरूरत भी नही पड़ेगी। नौकरी तो सबको मिलेगी नही लेकिन बैठे-बिठाए आपको और आपके बेटे बेटियों को बेरोजगारी भत्ता मिले गा। MSP खत्म हो जाएगा तो महंगाई भी कम रहे गा। फिर आप थोड़े पैसे में ज्यादा अनाज खरीद पाओगे।  फिर आप ऐश करना। विदेशो में लोग ऐसे ही करते है।



      *Thousand Flowers Group*

किसान आंदोलन

किसान जब भी अपने कृषि उपज की कीमत बढाने सम्बन्धी मांग करेंगे, यह मांग पूंजीवाद के दायरे में एक पूंजीवादी जनवादी संघर्ष ही होगा, चाहे नेतृत्व धनी किसानों के हाथ मे हो या गरीब किसानों के हाथ मे। इसीलिये  'बड़े मियां तो बड़े मियां, छोटे मियां शुभां अल्ला' वाली कहावत पूरे किसान समुदाय पर चरितार्थ होती है।

किसानों की मुक्ति समाजवादी संघर्ष में ही हो सकती है, गलाघोंटू पूंजीवादी बाजार की प्रतियोगिता, अति-उत्पादन और कृषि उपज की कीमतों में बेसुमार उतार चढ़ाव से होने वाली बर्बादी से बचने का एक मात्र विकल्प पूंजी की सत्ता के खिलाफ सर्वहारा राज्य की स्थापना  ही हो सकता है। किसान यह बात जितनी जल्दी समझ जाएंगे, अपनी पूर्ण मुक्ति के लिये सही कदम उठा सकेंगे।

किसानों के समूचे फसल की उचित कीमत पर खरीद की गारंटी एक मात्र सर्वहारा राज्य ही कर सकता है, अडानी, अम्बानी खून चूसक कॉर्पोरेट के हाथों की कठपुतली सरकार तो कत्तई  गारंटी नही दे सकती।

Monday, 22 February 2021

किसान आंदोलन के संदर्भ में मार्क्सवाद और अंबेडकर वाद का फर्क !


मार्क्सवाद तथा अंबेडकरबाद में एक बड़ा फर्क है । वह है मार्क्सवाद के द्वंदात्मक भौतिकवाद तथा अंबेडकरवाद के भाववाद के बीच।  मार्क्स ने द्वंदात्मक भौतिकवादी दृष्टिकोण से इतिहास को गति देने वाले वर्ग संघर्ष को रेखांकित किया , जबकि भाववाद को अपने दृष्टिकोण का आधार बनाने के कारण समाज के वर्गीय और सामाजिक शक्तियों को नजरअंदाज कर अंबेडकर अतीत में बुध के भाववादी विचारों के माध्यम से वर्तमान के जाति उत्पीड़न का समाधान खोजना शुरू किया। सच्चाई यह है कि बुद्ध भी अपने समय में उत्पादक शक्तियों में सबसे उन्नत  कृषक और व्यापारियों को अपने सामाजिक आंदोलन का आधार बनाया था।
  इस पूरी प्रक्रिया में यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि वर्ग संघर्ष को हाशिए पर डालने के लिए पूरी दुनिया में वित्त पूंजी के माध्यम से चलने वाले विश्वविद्यालय तथा एनजीओ ने वर्ग संघर्ष की जगह पर जाति ,धर्म 'क्षेत्र और पहचान की लड़ाई को आगे बढ़ाया। लेकिन पिछले तीन दशकों में नवउदारवादी नीति के तहत बड़ी पूंजी ने वित्त पूंजी के साथ मिलकर के सभी देशों में जो मेहनतकशों और छोटी पूंजी के मालिकों के ऊपर जो कत्लेआम मचाया है , उसके बाद से वर्ग संघर्ष एक बार फिर से पूरी दुनिया में जीवंत हो चुका है। बड़ी पूंजी के फंडों से चलने वाले विश्व विद्यालय और एनजीओ मार्क्सवाद तथा वर्ग संघर्ष की विचारधारा को आउटडेटेड घोषित कर चुका था । लेकिन पूरी दुनिया में और आज की तारीख में भारत का किसान आंदोलन एक बार फिर से इस बात को स्थापित कर रहा है कि वर्ग संघर्ष  ही इतिहास को गति देने वाली और समाज को बदलने वाली मुख्य शक्ति बनेगी।

नरेंद्र कुमार

किसान आंदोलन को जन आंदोलन के रूप में गांव शहर फैला दो !


वित्त पूंजी तथा भारतीय एकाधिकार पूंजी के संयुक्त हमले के खिलाफ संगठित हों। मोदी सरकार ने कृषि कानून तथा श्रम कानूनों में संशोधन कर मजदूरों और किसानों की कमाई तथा साधन छीन कर बड़े पूंजीपतियों के हवाले करने के लिए अड़ी है। किसान आंदोलन के साथ-साथ मजदूरों का आंदोलन और फिर पूंजी के रखवाली इस व्यवस्था के खिलाफ व्यापक जनांदोलन आज समय की मांग है। डब्ल्यूटीओ, विश्व बैंक तथा वित्त पूंजी के परजीवी मालिकों के खिलाफ विकल्प पेश करने के लिए , एक नई व्यवस्था के निर्माण के लिए , तमाम साधनों के सामाजीकरण और सभी मेहनत करने वालों के लिए बेहतर जीवन सुनिश्चित करने के लिए , रोजगार मुहैया कराने के लिए एकजुट हो ।

नरेंद्र कुमार

Friday, 5 February 2021

किसान आंदोलन

बहुसंख्यक किसानों के लिये पूंजीवाद फांसी का फंदा साबित हो रहा है, उनकी बदहाली और गरीबी तबतक खत्म नही हो सकती जबतक पूंजी की सत्ता का बोलबाला है। कंपनी राज नही, कंपनी मुक्त राज्य, समाजवादी राज्य ही एक बेहतर आर्थिक परिस्थिति किसानों को दे सकता है जिसमे कृषि उपज की वाजिब कीमत और कॉर्पोरेट लूट से मुक्ति किसानों को मिल पायेगी।

एम के आजाद

Thursday, 21 January 2021

लेनिन के 97वें स्मृति दिवस के अवसर पर


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किसान-प्रश्न पर कम्युनिस्ट दृष्टिकोण : कुछ महत्त्वपूर्ण पहलू

  (व्ला.इ. लेनिन के कुछ चुने हुए उद्धरण)

"…वर्ग-चेतन मज़दूर के लाल झण्डे का पहला मतलब है, कि हम अपनी पूरी शक्ति के साथ पूरी आज़ादी और पूरी ज़मीन के लिए किसानों के संघर्ष का समर्थन करते हैं; दूसरे, इसका अर्थ है कि हम यहीं नहीं रुकते बल्कि इससे आगे जाते हैं। हम आज़ादी और ज़मीन के साथ ही समाजवाद के लिए युद्ध छेड़ रहे हैं। समाजवाद के लिए संघर्ष पूँजी के शासन के विरुद्ध संघर्ष है। यह सर्वप्रथम और सबसे मुख्य रूप से उजरती मज़दूर द्वारा चलाया जाता है जो प्रत्यक्षतः और पूर्णतः पूँजीवाद पर निर्भर होता है। जहाँ तक छोटे मालिक किसानों का प्रश्न है, उनमें से कुछ के पास ख़ुद की ही पूँजी है, और प्रायः वे ख़ुद ही मज़दूरों का शोषण करते हैं। इसलिए सभी छोटे मालिक किसान समाजवाद के लिए लड़ने वालों की क़तार में शामिल नहीं होंगे, केवल वही ऐसा करेंगे जो कृतसंकल्प होकर सचेतन तौर पर पूँजी के विरुद्ध मज़दूरों का पक्ष लेंगे, निजी सम्पत्ति के विरुद्ध सार्वजनिक सम्पत्ति का पक्ष लेंगे।"

('किसान समुदाय और सर्वहारा')

*

"पूँजीवाद के अन्तर्गत छोटा मालिक किसान, वह चाहे या न चाहे, इससे अवगत हो या न हो, एक माल-उत्पादक बन जाता है और यही वह परिवर्तन है जो मूलभूत है, क्योंकि केवल यही उसे, बावजूद इसके कि वह भाड़े के श्रम का शोषण नहीं करता, एक निम्न-पूँजीपति बना देता है और उसे सर्वहारा के एक विरोधी के रूप में बदल देता है। वह अपना उत्पादन बेचता है, जबकि सर्वहारा अपनी श्रम-शक्ति। एक वर्ग के रूप में छोटा मालिक किसान केवल कृषि उत्पादों के मूल्य में वृद्धि ही चाह सकता है और यह बड़े भूस्वामियों के साथ लगान में उसकी हिस्सेदारी और शेष समाज के विरुद्ध भूस्वामियों के साथ उसकी पक्षधरता के समान है। माल-उत्पादन के विकास के साथ ही छोटा मालिक किसान अपनी वर्ग-स्थिति के अनुरूप एक निम्न-भूसम्पत्तिवान मालिक बन जाता है।"

('कृषि में पूँजीवाद के विकास के आँकड़े')

*

"… यदि रूस में वर्तमान क्रान्ति की निर्णायक विजय जनता की पूर्ण सम्प्रभुता क़ायम करती है, यानी एक गणराज्य और एक पूर्ण जनवादी राज्य व्यवस्था की स्थापना करती है, तो पार्टी ज़मीन के निजी मालिकाने को ख़त्म कर देगी और सारी ज़मीन सामान्य सम्पत्ति के रूप में पूरी जनता को सौंप देगी।

"इसके अतिरिक्त, सभी परिस्थितियों में रूसी सामाजिक जनवादी पार्टी का उद्देश्य, जनवादी भूमि-सुधारों की चाहे जो भी स्थिति हो, ग्रामीण सर्वहारा के स्वतन्त्र वर्ग संगठन के लिए, उसे समझाने के लिए कि उसका हित किसान पूँजीपति वर्ग के हित से असमाधेय रूप से विरोधी है, उसे छोटे पैमाने के मालिकाने के विरुद्ध चेतावनी देने के लिए जो, जब तक माल-उत्पादन मौजूद रहेगा तब तक जनता की दरिद्रता दूर नहीं कर सकता और अन्त में, समस्त दरिद्रता और समस्त शोषण को समाप्त करने के एकमात्र साधन के रूप में एक पूर्ण समाजवादी क्रान्ति की आवश्यकता पर ज़ोर देने के लिए निरन्तर प्रयास करते रहना है।"

('मज़दूर पार्टी के भूमि कार्यक्रम में संशोधन')

*

"कोई पूछ सकता है: इसका हल क्या है, किसानों की स्थिति कैसे सुधारी जा सकती है? छोटे किसान ख़ुद को मज़दूर वर्ग के आन्दोलन से जोड़कर और समाजवादी व्यवस्था के लिए संघर्ष में एवं ज़मीन तथा उत्पादन के अन्य साधनों (कारख़ानें, मशीनें आदि) को सामाजिक सम्पत्ति के रूप में बदल देने में मज़दूरों की मदद करके ही अपने आप को पूँजी की जकड़ से मुक्त कर सकते हैं। छोटे पैमाने की खेती और छोटी जोतों को पूँजीवाद के चतुर्दिक हमले से बचाकर किसान समुदाय को बचाने का प्रयास सामाजिक विकास की गति को अनुपयोगी रूप से धीमा करना होगा, इसका मतलब पूँजीवाद के अन्तर्गत भी ख़ुशहाली की सम्भावना की भ्रान्ति से किसानों को धोखा देना होगा, इसका मतलब मेहनतकश वर्गों में फ़ूट पैदा करना और बहुमत की क़ीमत पर अल्पमत के लिए एक विशेष सुविधाप्राप्त स्थिति पैदा करना होगा।"

('मज़दूर पार्टी और किसान')

*

"यदि, नरोदवादियों के कल्पनालोक में, हम वास्तविक आर्थिक कारणों को मिथ्या विचारधारा से सावधनीपूर्वक अलग करें, तो उसी क्षण पायेंगे कि सामन्ती जागीरों के टूटने से, चाहे वे बँटवारे से टूटें या राष्ट्रीकरण से या म्युनिसिपलीकरण से, सबसे अधिक लाभान्वित होने वाला वर्ग स्पष्ट तौर पर पूँजीवादी किसान ही है। (राज्य-प्रदत्त) ऋण-अनुदान भी पूँजीवादी किसान को ही सर्वाधिक लाभ पहुँचाने के लिए बाध्य है। (किसान भूमि क्रान्ति) भूस्वामित्व की पूरी व्यवस्था को शुद्ध रूप से इन पूँजीवादी फ़र्मों की प्रगति और समृद्धि की शर्तों के अधीन कर देने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है।"

('सामाजिक जनवाद का भूमि कार्यक्रम')

कॉर्पोरेट को पूरी आजादी देता कृषि कानून*


21/01/2021

इन तीन कृषि कानून के आने के बाद कॉर्पोरेट क्लास को पूरी छूट, आजादी मिल गयी है कि वो जिस प्रदेश के किसान से चाहे कृषि उपज खरीद सकते है, जिस कीमत पर जितना चाहे खरीद कर गोदाम भर सकते है क्योंकि अब जमाखोरी से सम्बंधित कानून में आवश्यक संशोधन कर दिया गया है। फिर खरीदी हुई कृषि उपज को बाजार में पूरे देश मे फैले अपने हजारो बड़े-बड़े रिटेल मॉल के माध्यम से जितनी कीमत चाहे वे हमसे वसूल कर सकते है क्योंकि कीमत एक सीमा के अंदर रखने के लिये कानून में कोई प्रावधान नही रखा गया है।
अप्रैल मई में सरसो का न्यूनतम सरकारी मूल्य था 44 रुपए/ किलो और सरसो के तेल का मूल्य था 80 से  90 रुपए लीटर (खुदरा बाजार में)

अभी तो भंडारण की सीमा थी जिसे जून मे खत्म कर दिया गया और सरसो सेठ जी के गोदाम में पहुंच गई!

आज सरसो का रेट है-लगभग 60 से 65/किलो और सरसो का तेल- 160 रुपए/ लीटर !

अर्थात 166 रुपए किलो जिसपर 200 रुपए से अधिक का मूल्य प्रिंट होकर आना शुरू हो गया है! 

यदि किसान आंदोलन तथा अड़ानी अंबानी विरोध न हो रहा होता तो शायद यह प्रिंट रेट पर ही बिकता!!

अभी सरसो की नई फसल आने में तीन महीने बाकी है.

सचमुच, मोदी सरकार के इस दावे में तनिक भी सच्चाई नही है कि यह कानून किसानों के हित  में लाया गया है और इससे किसानों की आमदनी दुगुनी हो जाएगी।  इस कानून ने कॉर्पोरेट घराने को कृषि उपज पर अधिकतम मुनाफा कमाने की पूरी आजादी प्रदान किया है। इसमें किसानों के लिये कुछ भी नही है, किसानों के नाम पर यह  देशी- विदेशी कॉर्पोरेट के पक्ष में बनाया गया कानून  है।

Tuesday, 19 January 2021

किसान आंदोलन और मजदूर वर्ग की भूमिका - नरेंद्र कुमार

आज के किसान आंदोलन में एंगेल्स तथा लेनिन के विचारों के आधार पर मजदूर वर्ग की क्या भूमिका हो ?

कई साथी सिर्फ लेनिन तथा एंगेल्स के उद्धरण पेश कर रहे हैं. उन्हें आज के किसान आंदोलन के संदर्भ में उसका विश्लेषण भी पेश करना चाहिए. इस लेख में 'फ्रांस तथा जर्मनी में किसान का सवाल' लेख से दो उद्धरण पेश किए जा रहे हैं जिसका कई साथी संदर्भ से हट कर अलग - अलग अर्थ निकाल रहे हैं, जबकि एक ही लेख में किसानों के प्रति संपूर्णता में मजदूर वर्ग और उसकी पार्टी के दृष्टिकोण को पेश करने के लिए एंगेल्स ने ये सारी बातें लिखी हैं. 

पहले एंगेल्स के उस पक्ष को उद्धृत कर विचार किया जाए जिसमें वह पूंजीवाद में छोटी खेती के पुराने उत्पादन संबंध को अनिवार्य रूप से समाप्त होने की बात करते हैं. एंगेल्स लिखते हैं-- 

"हमारी पार्टी का यह कर्तव्य है कि किसानों को बारंबार स्पष्टता के साथ जताए कि •पूंजीवाद का बोलबाला रहते हुए उनकी स्थिति पूर्णतया निराशापूर्ण है, कि •उनकी छोटी जोतों को इस रूप में बरकरार रखना एकदम असंभव है, कि •बड़े पैमाने का पूंजीवादी उत्पादन, उनके छोटे उत्पादन की अशक्त, जीर्ण-शीर्ण प्रणाली को उसी तरह कुचल देगा, जिस तरह रेलगाड़ी ठेला गाड़ी को कुचल देती है.

ऐसा करके हम आर्थिक विकास की अनिवार्य प्रवृत्ति के अनुरूप कार्य करेंगे और यह विकास एक न एक दिन छोटे किसानों के मन में हमारी बात को बैठाए  बिना नहीं रह सकता." (पृ.385)

तो क्या यह बात भारत के आंदोलनकारी किसानों को उनके आंदोलन से दूर रहकर मजदूर वर्ग समझा सकता है? 

हम किसान आंदोलन में मजदूर वर्ग के कई संगठनों को बड़ी पूंजी और फासीवादी सरकार के खिलाफ किसानों के संघर्ष का समर्थन तथा उसमें भागेदारी करते पा रहे हैं. ऐसे ही मजदूर संगठन के कार्यकर्ताओं को एक ऐसी पुस्तिका बेचते और बताते पाया कि जिसमें बताया गया है कि 'छोटे किसानों की खेती पूंजीवाद में अनिवार्य रूप से तबाह हो जाएगी.'

मजदूरों का यह संगठन पूरी सक्रियता से दिल्ली के आसपास के किसान आंदोलन में भागीदारी कर रहा है. किसान उनकी बात सुन रहे हैं, लेकिन क्या इस आंदोलन से दूर रहकर या बड़े पूंजीपतियों और फासीवादी सरकार के खिलाफ चल रहे आंदोलन का उपहास करते हुए, उन्हें यह बात समझायी जा सकती है ?

अपने उसी लेख में एंगेल्स आगे लिखते हैं,"

....मझोला किसान जहां छोटी जोत वाले किसानों के बीच रहता है, वहां उसके हित और विचार उनके हित और विचारों से बहुत अधिक भिन्न नहीं होते. वह अपने तजुर्बे से जानता है कि उसके जैसे कितने ही लोग छोटे किसानों की हालत में पहुंच चुके हैं, पर जहां मझोले और बड़े किसानों का प्राधान्य होता है और कृषि के संचालन के लिए आम तौर पर नौकर और नौकरानियों की आवश्यकता होती है, वहां बात बिल्कुल दूसरी ही है. कहने की जरूरत नहीं कि मजदूरों की पार्टी को प्रथमत: उजरती मजदूरों की ओर से, यानी इन नौकरों- नौकरानियों और दिहाड़ीदार मजदूरों की ओर से ही लड़ना है. किसानों से ऐसा कोई वादा करना निर्विवाद रूप से निषिद्ध है, जिसमें मजदूरों की उजरती गुलामी को जारी रखना सम्मिलित हो; परंतु जब तक बड़े और मझोले किसानों का अस्तित्व है, वे उजरती मजदूरों के बिना काम नहीं चला सकते. इसलिए छोटी जोत वाले किसानों को हमारा यह आश्वासन देना कि वह इस रूप में सदा बने रह सकते हैं, जहां मूर्खता की पराकाष्ठा होगी, वहां बड़े और मझोले किसानों को यह आश्वासन देना गद्दारी की सीमा तक पहुंच जाना होगा. (पृ.385-86)

किसानों के अन्य पूंजीवादी प्रवृत्तियों और कमजोरियों पर प्रकाश डालते हुए एंगेल्स लिखते हैं : -

...." हमें आर्थिक दृष्टि से यह पक्का यकीन है कि छोटे किसानों की तरह, बड़े और मझोले किसान भी अवश्य ही पूँजीवादी उत्पादन और सस्ते विदेशी गल्ले की होड़ के शिकार बन जायेंगे. यह इन किसानों की भी बढ़ती हुई ऋणग्रस्तता और सभी जगह दिखाई पड़ रही अवनति से सिद्ध हो जाता है.."(पृ.386)  
   
आज के किसान आंदोलन में भागीदारी कर रहे छोटे, यहां तक की बड़े किसान भी, मजदूर वर्ग की पार्टी या संगठन द्वारा समझाने के पहले ही, यह समझ रहे हैं कि "बड़ी पूंजी के हमले के कारण उनकी खेती उजड़ जाएगी."

जाहिर सी बात है कि एक वर्ग के रूप में छोटी पूंजी के मालिक यानी टुटपुंजिया वर्ग, बड़ी पूंजी के हमले के खिलाफ अपने अस्तित्व के बचाव के लिए लड़ेगा ही. 

कोई भी मजदूर वर्ग की पार्टी, उसे बड़ी पूंजी के सामने आत्मसमर्पण करने की सलाह नहीं दे सकता है! यदि आप उसका उपहास उड़ाएंगे या आप उसे ज्ञान देंगे कि तुम्हारी बर्बादी निश्चित है तो उन किसानों का जवाब होगा कि: 

"बंधु ! बर्बाद होने से तो लड़ते-लड़ते मर जाना अच्छा है!'

इसलिए पूंजीवाद के सामने निष्क्रिय विरोध या आत्मसमर्पण कर देने की सलाह, हम कतई नहीं दे सकते हैं. चुपचाप रह जाने की नीति पर चलते हुए जो साथी सिर्फ उद्धरणों को पेश करते हैं उनसे हमारा सवाल है कि "आप किसानों को क्या कहना चाहते हैं ? क्या उन्हें लड़ाई नहीं लड़नी चाहिए? बड़ी पूंजी तथा फासीवादी शक्तियों के खिलाफ अपने अस्तित्व की लड़ाई के लिए क्या किसानों को चुपचाप से बड़ी पूंजी के इस हमले को सहते हुए बिखर जाना चाहिए ?"

एंगेल्स चुप्पी या निष्क्रयता का विरोध करते हैं. वह पूंजीवाद के द्वारा किसानों की तबाही होने तक इंतजार करने की राजनीति का भी विरोध करते हैं. मजदूर वर्ग की ऐतिहासिक जिम्मेवारी को बताते हुए और किसानों को मजदूर वर्ग के साथ ला खड़ा करने के लिए स्पष्ट दिशा निर्देशन देते हुए एंगेल्स आगे लिखते हैं, 

"सर्वहारा की पांतों में जबरन ढकेले जाने से हम जितने ही अधिक किसानों को बचा सकें, जितने अधिक को किसान रहते हुए ही हम अपनी ओर कर सकें, उतनी ही जल्दी और आसानी से सामाजिक कायापलट संपन्न होगा. इस कायापलट को तब तक टालने से, जब तक कि पूंजीवादी उत्पादन सर्वत्र अपनी चरम परिणति पर ना पहुंच जाए और हर छोटा दस्तकार और हर छोटा किसान, बड़े पैमाने के पूंजीवादी उत्पादन का शिकार न बन जाए, हमारा कोई हित साधन नहीं होगा. इसके लिए किसानों के हितार्थ जो माली कुर्बानी करनी होगी. जिसकी पूर्ति सार्वजनिक कोष से की जाएगी, वह पूंजीवादी अर्थतंत्र के दृष्टिकोण से पैसों की बर्बादी मानी जा सकती है, किंतु वस्तुतः धन का अति उत्तम विनियोग है, क्योंकि उससे आम सामाजिक पुनः संगठन के खर्च में संभवत 10 गुनी बचत होगी. अतः इस अर्थ में किसानों के साथ हम अत्यंत उदारता का व्यवहार करने में समर्थ है."
  
[फ्रांस और जर्मनी में किसानों का सवाल पुस्तिका में एंगेल्स के विचार...खंड 3 भाग 2]

ये उद्धरण एक ही लेख में लगभग एक ही जगह हैं, इसलिए इन दोनों उद्धरण को संपूर्णता में ही समझा जाना चाहिए और वर्तमान आंदोलन से जोड़कर इसकी व्याख्या की जानी चाहिए. 

एंगेल्स  लिखते हैं कि छोटे किसानों की तबाही के लिए इंतजार करने में मजदूर वर्ग का कोई भला नहीं है. 

यही वह महत्त्वपूर्ण पंक्ति है जो हमें इस आंदोलन के समर्थन में खड़ा होते हुए पूंजीवाद के हमले में किसानो की खेती के अनिवार्य तौर पर तबाही की बात मजदूरों द्वारा किसानों को समझाने का निर्देश देता है.
 
भारत के किसान एक दमनकारी फासीवादी राज्य से लड़ रहे हैं!

वे वित्त पूंजी और एकाधिकार पूंजी के बड़े हमले के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं.

इस संघर्ष में साथ देकर ही सामान्य किसानों को समझ में आ सकता है कि "पूंजीवाद के अंतर्गत वे अपनी खेती नहीं बचा सकते हैं."
 
एंगेल्स तथा लेनिन जब इस तरह की बातें कहते हैं तो किसानों के सामने कहीं उन से आगे बढ़कर लड़ने और नेतृत्व देनेवाले संगठित मजदूर वर्ग खड़े होते हैं. 

आज भारत में मजदूर वर्ग और उनके संगठन की भारी कमजोरी यह है कि श्रम कानूनों में लगातार मजदूर विरोधी होने वाले सुधारों और मजदूर वर्ग के छीने जा रहे अधिकारों के बावजूद, पूंजीवाद और उसकी फासीवादी सत्ता के खिलाफ कोई बड़ा प्रतिरोध संघर्ष खड़ा नहीं कर पाए हैं. 

ऐसी स्थिति में हम किसानों को मजदूरों के पीछे आने के लिए राजनीतिक तौर पर आवाहन करने का भौतिक आधार भी तैयार नहीं कर पा रहे हैं. 

इसलिए सबसे पहले तो मजदूर वर्ग की जितनी भी ताकत है, उसे संगठित करके मजदूर वर्ग को श्रम कानूनों में हुए सुधारों के खिलाफ मजबूत संघर्ष की तैयारी करनी चाहिए. साथ ही जन विरोधी कृषि कानूनों के खिलाफ संघर्ष को आगे ले जाना चाहिए और किसानों को इस लड़ाई में साथ देने का आवाहन करना चाहिए, न कि हमें किसानों की इस लड़ाई को धनी किसानों की लड़ाई कह कर, चुप रहना चाहिए या मजदूर वर्ग को इससे अलग रहने की सलाह देनी चाहिए. 

वर्तमान में आंदोलनकारी किसान इस बात को - समझ रहे हैं कि वे तबाह होने वाले हैं, इसीलिए वे लड़ रहे हैं. वे भले इतिहास की गति नहीं समझ रहे हों, लेकिन इतिहास ने किसानों पर समाजवाद के निर्माण की जिम्मेदारी भी नहीं दी है. यह जिम्मेवारी मजदूर वर्ग, उसके संगठन और पार्टी को दी है जिनमें कई ऐसे ऐतिहासिक क्षण में या तो चुप हैं या उद्धरण का खेल खेलते रहे हैं और सिर्फ लंबे-लंबे लेख लिखते रहे हैं!

जब छोटे और मझोले किसान बड़े पूंजीपतियों से और राज्य से अपने अस्तित्व के लिए लड़ रहे हों तो ये सारी बातें उन्हें समझाते हुए हमें क्या तटस्थ रहना चाहिए या बड़ी पूंजी के खिलाफ और फासीवादी राज्य के खिलाफ उनके संघर्ष का समर्थन करना चाहिए ? 

एंगेल्स तथा लेनिन अपनी रचनाओं में इस बात पर जोर देते हैं कि समाजवादी यानी मजदूर वर्ग की पार्टी, उनकी छोटी जोत को बचाए रखने की गारंटी नहीं दे सकते हैं. यानी पूंजीवाद के रहते हुए बड़ी पूंजी उनकी छोटी पूंजी को अनिवार्य रूप से निगल जाएगा. इसलिए किसानों को बड़ी पूंजी के खिलाफ संघर्ष करते हुए मजदूरों के साथ तथा मजदूरों के नेतृत्व में आना चाहिए और समाजवाद के लिए संघर्ष में साथ देना चाहिए, ताकि उनके उत्पादों का सही मूल्य मिल सके और तर्कपूर्ण ढंग से मुनाफा के बजाए समाज की आवश्यकओं को केंद्र में रखकर उत्पादन किया जा सके और समाज के लिए उसे उपयोग में लाया जा सके. बदले में किसानों को समाजवादी राज्य उत्पादन के तमाम साधनों तथा उत्पादों को पूरी तरह से खरीदने की गारंटी देगी. 

इस तरह से किसानों को एक बेहतर जीवन दिया जा सकेगा. समाजवादी राज्य ने सोवियत संघ में यही किया था. हमें लेनिन की यह बात याद रखना चाहिए---

"सर्वहारा वर्ग वस्तुतः क्रांतिकारी, वस्तुतः समाजवादी ढंग से काम करने वाला वर्ग, केवल उसी सूरत में होता है, जब वह समस्त मेहनतकशों तथा शोषितों के हरावल के रूप में शोषकों का तख्ता पलटने के लिए संघर्ष में उनके नेता के रूप में सामने आता है और काम करता है. परंतु यह काम वर्ग संघर्ष देहात में पहुंचाए बिना, देहात के मेहनतकश जनसाधारण को शहरी सर्वहारा की कम्युनिस्ट पार्टी के इर्द-गिर्द एकबद्ध किए बिना, सर्वहारा वर्ग द्वारा देहाती मेहनतकशों को शिक्षित-दीक्षित किए बिना पूरा नहीं हो सकता." 
[कृषि प्रश्न पर थिसिसों का आरंभिक मसविदा, लेनिन नई संकलित रचनाएं, भाग- 4"]

भारत के आज की स्थिति में यह स्वीकार करना चाहिए कि लेनिन ने सर्वहारा वर्ग के जिस कार्यभार को रेखांकित किया है, उसे भारत के मजदूर वर्ग और उनके  संगठन   पेश कर में असफल रहे हैं. अन्य शोषित उत्पीड़ित वर्गों के आंदोलन के समय ऐसी पहलकदमी का सर्वथा अभाव रहा है. 

अनिवार्य रूप से हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि मजदूर वर्ग, मजदूर आंदोलन के साथ-साथ किसान आंदोलन को संगठित करने में ऐतिहासिक तौर पर यदि असफल नहीं रही, तो कमजोर अवश्य रही है. मजदूर आंदोलन ट्रेड यूनियन की सीमाओं से आगे नहीं बढ़ पाया. आज तो ट्रेड यूनियन की सीमाओं में लड़े जाने वाले श्रम कानूनों में पूंजी के पक्ष में हो रहे संशोधनों के खिलाफ भी युनियन नहीं लड़ पा रही है. साथ ही किसान सहित अन्य जनवादी आंदोलनों में अपनी भागीदारी करने में काफी पीछे रह रही है. ऐसी स्थिति में हमें मजदूर वर्ग के बीच में काम करने वाले राजनीतिक संगठन के तौर पर अपना आत्मअवलोकन करना चाहिए क्योंकि मजदूरों के मजबूत और राजनीतिक संघर्ष को खड़ा किए बगैर, किसान या दूसरे शोषित उत्पीड़ित समाज, उसके नेतृत्व में या उसके साथ कैसे और क्यों आएंगे ?

●कम्युनिस्ट सेंटर फॉर साइंटिफिक सोशलिज्म
Narendra Kumar

Sunday, 17 January 2021

किसान आंदोलन की मांगें

किसान आंदोलन की मांगें पूंजीवादी मांगे है, पूंजीवाद के चौखटे के भीतर की मांगें है, लेकिन किसानों का गुस्सा और नफरत कॉर्पोरेट घराने और उसकी चहेती फासीवादी मोदी सरकार के खिलाफ बहुत स्पष्टता से उभर कर सामनेआया है। इस अर्थ में इसकी दिशा पूंजीवाद विरोधी है। अगर इस लड़ाई को किसान समाजवाद के लिये लड़ने वाले समाजवादी संघर्ष से जोड़ दे तो लुटेरे कॉर्पोरेट घराने और बुर्जुआ राज्य के अस्तित्व के लिये खतरा उतपन्न हो जायेगा। कम्युनिष्टों के खिलाफ झूठ और घृणा फैलाने के पीछे लुटेरे बुर्जवा वर्ग और उसकी सरकार का यही डर काम कर रहा होता है।

एम के आज़ाद

Saturday, 16 January 2021

स्वामीनाथन कमीशन के रिपोर्ट का उद्देश्य और किसान

बहुसंख्यक किसानों को बरगलाने के लिये ही बुर्जुवा राज्य द्वारा विभिन्न तरह की कमिटी बनाये जाते है, उनके रिपोर्ट लागू करने की बाध्यता सरकारों पर नही होती। नवंबर 2014 में गठित  स्वामीनाथन कमीशन के रिपोर्ट का उद्देश्य भी यही था-पूंजी की सत्ता के खिलाफ बहुसंख्यक  किसानों में भड़कती आग को झूठी उम्मीद और आशा से ठंडा एवम शांत करना। पिछले 15 वर्षों से बुर्जवा सरकारें इस स्वामीनाथन कमिटी की रिपोर्ट के माध्यम से ठीक यही काम-बहुसंख्यक किसानों को झूठी आशा से बांधे रखने का काम-किया है, उन्हें पूंजी की सत्ता के खिलाफ विद्रोह करने से रोकने का काम किया है।

किसानों के लिये क्रांति और समाजवाद की जरूरत।

    बहुसंख्यक किसान और पूंजीवाद

बहुसंख्यक किसानों के लिये पूंजीवाद फांसी का फंदा साबित हो रहा है, उनकी बदहाली और गरीबी तबतक खत्म नही हो सकती जबतक पूंजी की सत्ता का बोलबाला है। कंपनी राज नही, कंपनी मुक्त राज्य, समाजवादी राज्य ही एक बेहतर आर्थिक परिस्थिति किसानों को दे सकता है जिसमे कृषि उपज की वाजिब कीमत और कॉर्पोरेट लूट से मुक्ति किसानों को मिल पायेगी।

प्रश्न है, समाजवाद में खेती निजी रहेगी या सामूहिक?

डरने की जरूरत नही है, खेती निजी रहे या सामूहिक बहुसंख्यक के हित में ही होगा और यह उस समय की परिस्थिति पर निर्भर करे गा। अभी हम लोग भारत मे निजी खेती की दुर्दशा देख रहे है, सामूहिक खेती का मॉडल हमने चीन में देखा था और सामाजिक खेती का मॉडल रूस में देखा था। भारत मे खेती का कौन सा रूप शुरू में होगा, यह कहना मुश्किल है। लेकिन कॉर्पोरेट सम्पति पर सामाजिक अधिकार होगा। कॉर्पोरेट सम्पति पर सामाजिक अधिकार की स्थापना समाजवाद की दिशा में पहला और निर्णायक कदम हो सकता है।

क्या किसान और मजदूर वर्ग अपने कॉमन दुश्मन  कॉर्पोरेट वर्ग और फासीवादी मोदी सरकार के खिलाफ एक साथ खड़ा होने की तरफ आज बढ़ सकते है?
एम के आज़ाद

Tuesday, 12 January 2021

किसान आंदोलन क्यों कर रहे हैं

किसान आंदोलन क्यों कर रहे हैं , यह समझने के लिए शिमला जाइए । 
शिमला में सेब के बाग है और किसानो से छोटे छोटे व्यापारी सेब ख़रीदकर देश भर में भेजते थे । व्यापारियों के छोटे छोटे गोदाम थे । अड़ानी की नज़र इस कारोबार पर पड़ी । हिमाचल प्रदेश में भाजपा की सरकार है तो अड़ानी को वहाँ ज़मीन लेने और बाक़ी काग़ज़ी कार्यवाही में कोई दिक़्क़त नहीं आयी । अड़ानी ने वहाँ पर बड़े बड़े गोदाम बनाए जो व्यापारियों के गोदाम से हज़ारों गुना बड़े थे । 

अब अड़ानी ने सेब ख़रीदना शुरू किया , छोटे व्यापारी जो सेब किसानो से 20 रुपय किलो के भाव से ख़रीदते थे, अड़ानी ने वो सेब 22 रुपय किलो ख़रीदा । अगले साल अड़ानी ने रेट बढ़ाकर 23 रुपय किलो कर दिया । अब छोटे व्यापारी वहाँ ख़त्म हो गए , अड़ानी से कम्पीट करना किसी के बस का नहीं था । जब वहाँ अड़ानी का एकाधिकार हो गया तो तो तीसरे साल अड़ानी ने सेब का भाव 6 रुपय किलो कर दिया । 

अब छोटा व्यापारी वहाँ बचा नहीं था , किसान की मजबूरी थी कि वो अड़ानी को 6 रुपय किलो में सेब बेचे । 

टेलिकॉम इंडस्ट्री की मिसाल भी आपके सामने हैं । कांग्रेस की सरकार में 25 से ज़्यादा सर्विस प्रवाइडर थे । JIO ने फ़्री कॉलिंग , फ़्री डेटा देकर सबको समाप्त कर दिया । आज केवल तीन सर्विस प्रवाइडर ही बचे हैं और बाक़ी दो भी अंतिम साँसे गिन रहे हैं । 

कृषि बिल अगर लागू हो गया तो गेन्हु , चावल और दूसरे कृषि उत्पाद का भी यही होगा । पहले दाम बढ़ाकर वो छोटे व्यापारियों को ख़त्म करेंगे और फिर मनमर्ज़ी रेट पर किसान की उपज ख़रीदेंगे । जब उपज केवल अड़ानी जैसे लोगों के पास ही होगी तो मार्केट में इनकी मनॉपली होगी और बेचेंगे भी यह अपने रेट पर । अब सेब की महंगाई तो आप बर्दाश्त कर सकते हो क्यूँकि उसको खाए बिना आपका काम चल सकता है लेकिन रोटी और चावल तो हर आदमी को चाहिए । 

अभी भी वक्त है , जाग जाइए , किसान केवल अपनी नहीं आपकी भी लड़ाई लड़ रहा है ।

— Shishupal Singh

Friday, 8 January 2021

वर्तमान में मजदूर किसान एकता

तीनो कृषि कानून और चार श्रम सहिंताओं के माध्यम से श्रम कानूनों में बदलाव - सिर्फ और सिर्फ  कॉर्पोरेट हितों का पोषण करने वाले है, मजदुरो और किसानों के हितों के खिलाफ है; इस लिये मजदुरो और किसानों को एक प्लेटफॉर्म पर आकर अपने कॉमन दुश्मन कॉरपोरेट्स और उसकी चहेती मोदी सरकार के खिलाफ तीब्र संघर्ष छेड़ना ही होगा। अलग अलग नही, साथ मिल कर पूंजी की सत्ता के खिलाफ मजबूती से उठ खड़ा होना - उनके सामने सिर्फ और सिर्फ एक यही विकल्प है।

हालांकि एमएसपी सिर्फ 6 % किसानों को ही मिल पाता है, फिर भी इसका विरोध IMF और WTO जैसी साम्राज्यवादी संस्थाएं अपने जरखरीद बुद्धिजीवियों द्वारा लम्बे चौड़े रिपोर्ट के माध्यम से यह प्रचारित करवा रही है कि एमएसपी मजदुरो और गरीब किसानों के हित के खिलाफ है और महगंगाई बढ़ाने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। 

एक किसान भाई ने इस पर टिपण्णी की है कि एक लीटर पानी का बोतल और एक किलो गेहू आज बाजार में 20 रुपया में मिलता है। क्या यह माना जाए कि पानी का बोतल एमएसपी नही मिलने के कारण सस्ता है और एमएसपी मिलने के कारण गेहूं महँगा है। क्या इस तरह की घटिया सोच एवम विचारो का प्रचार प्रसार सिर्फ विचारात्मक गलती है, या कॉर्पोरेट और साम्राज्यवादी हितों की खुल्लमखुल्ला और बेशर्म दलाली है ?

Tuesday, 5 January 2021

किसानों के लिये क्रांति और समाजवाद की जरूरत


बहुसंख्यक किसानों के लिये पूंजीवाद फांसी का फंदा साबित हो रहा है, उनकी बदहाली और गरीबी तबतक खत्म नही हो सकती जबतक पूंजी की सत्ता का बोलबाला है। कंपनी राज नही, कंपनी मुक्त राज्य, समाजवादी राज्य ही एक बेहतर आर्थिक परिस्थिति किसानों को दे सकता है जिसमे कृषि उपज की वाजिब कीमत और कॉर्पोरेट लूट से मुक्ति किसानों को मिल पायेगी।

प्रश्न है, समाजवाद में खेती निजी रहेगी या सामूहिक?

डरने की जरूरत नही है, खेती निजी रहे या सामूहिक बहुसंख्यक के हित में ही होगा और यह उस समय की परिस्थिति पर निर्भर करे गा। अभी हम लोग भारत मे निजी खेती की दुर्दशा देख रहे है, सामूहिक खेती का मॉडल हमने चीन में देखा था और सामाजिक खेती का मॉडल रूस में देखा था। भारत मे खेती का कौन सा रूप शुरू में होगा, यह कहना मुश्किल है। लेकिन कॉर्पोरेट सम्पति पर सामाजिक अधिकार होगा। कॉर्पोरेट सम्पति पर सामाजिक अधिकार की स्थापना समाजवाद की दिशा में पहला और निर्णायक कदम हो सकता है।

Saturday, 2 January 2021

स्टालिन, लेनिनवाद के मूल सिद्धांत : किसानों का सवाल

स्टालिन, लेनिनवाद के मूल सिद्धांत : किसानों का सवाल-

दूसरे इंटरनेशनल की पार्टियों ने किसानों के सवाल के प्रति जिस उदासीनता और विरोध की जिस भावना का परिचय दिया है, उसका कारण पश्चिम देशों के विकास की विशेषताओं में नहीं है। उसका मुख्य कारण यह है कि ये पार्टियां सर्वहारा अधिनायकत्व में ही यकीन नहीं करतीं। वे क्रांति से भय खाती हैं और राज्यसत्ता पर अधिकार करने के लिए मजदूर वर्ग का नेतृत्व नहीं करना चाहतीं। यह स्वाभाविक है कि जो लोग क्रांति से डरते हैं और सर्वहारा को राजसत्ता की ओर ले जाने की इच्छा नहीं रखते, उनकी सर्वहारा के सहायकों के प्रश्न में भी कोई दिलचस्पी नहीं होगी। उनके लिए इस प्रश्न का कोई महत्व नहीं होता। यहां तक कि किसान समस्या का मजाक उड़ाना भी दूसरे इंटरनेशनल के सूरमाओं द्वारा सभ्यता और 'सच्चे' मार्क्सवाद का लक्षण माना जाता है। सच पूछिए तो इस दृष्टिकोण में मार्क्सवाद के अणुमात्र का भी समावेश नहीं है। सर्वहारा क्रांति के संधि काल में किसानों की महत्वपूर्ण समस्या के प्रति इस प्रकार की उदासीनता सर्वहारा अधिनायकत्व की धारणा का परित्याग कर देने तथा मार्क्सवाद से नाता तोड़ देने के बराबर है।

किसानों के सवाल पर एंगेल्स

हमारी पार्टी का यह कर्तव्य है कि किसानों को बारंबार स्पष्टता के साथ जताए कि पूंजीवाद का बोलबाला रहते हुए उनकी स्थिति पूर्णतया निराशापूर्ण है  ,कि उनकी छोटी जोतों को इस रूप में बरकरार रखना एकदम असंभव है ,कि बड़े पैमाने का पूंजीवादी उत्पादन उनके छोटे उत्पादन की अशक्त , जीर्ण-शीर्ण प्रणाली को उसी तरह कुचल देगा, जिस तरह रेलगाड़ी ठेला गाड़ी को कुचल देती है। ऐसा करके हम आर्थिक विकास की अनिवार्य प्रवृत्ति के अनुरूप कार्य करेंगे ।और यह विकास एक न एक दिन छोटे किसानों के मन में हमारी बात को बैठाए  बिना नहीं रह सकता।     (पृ.385)
    ....मझोला किसान जहां छोटी जोत वाले किसानों के बीच रहता है ,वहां उसके हित और विचार उनके हित और विचारों से बहुत अधिक भिन्न नहीं होते ।वह अपने तजुर्बे से जानता है कि उसके जैसे कितने ही लोग छोटे किसानों की हालत में पहुंच चुके हैं ।पर जहां मझोले और बड़े किसानों का प्राधान्य होता है और कृषि के संचालन के लिए आम तौर पर नौकर और नौकरानियों की आवश्यकता होती है, वहां बात बिल्कुल दूसरी ही है ।कहने की जरूरत नहीं कि मजदूरों की पार्टी को प्रथमत: उजरती मजदूरों की ओर से, यानी इन नौकरों- नौकरानियों और दिहाड़ीदार मजदूरों की ओर से ही लड़ना है। किसानों से ऐसा कोई वादा करना निर्विवाद रूप से निषिद्ध है, जिसमें मजदूरों की उजरती गुलामी को जारी रखना सम्मिलित हो। परंतु जब तक बड़े और मझोले किसानों का अस्तित्व है ,वे उजरती मजदूरों के बिना काम नहीं चला सकते ।इसलिए छोटी जोत वाले किसानों को हमारा यह आश्वासन देना कि वह इस रूप में सदा बने रह सकते हैं , जहां मूर्खता की पराकाष्ठा होगी ,वहां बड़े और मझोले किसानों को यह आश्वासन देना गद्दारी की सीमा तक पहुंच जाना होगा।      (पृ.385-86)
       ....  हमें आर्थिक दृष्टि से यह पक्का यकीन है कि छोटे किसानों की तरह बड़े और मझोले किसान भी अवश्य ही पूँजीवादी उत्पादन और सस्ते विदेशी गल्ले की होड़ के शिकार बन जायेंगे। यह इन किसानों की भी बढ़ती हुई ऋणग्रस्तता और सभी जगह दिखाई पड़ रही अवनति से सिद्ध हो जाता है।(पृ.386)     
   उपरोक्त उद्धरण     'फ्रांस और जर्मनी में किसानों का सवाल', एंगेल्स, संकलित रचनाएं ,खण्ड 3,भाग2 से लिया गया है।

१९५३ में स्टालिन की शव यात्रा पर उमड़ा सैलाब 

*On this day in 1953, a sea of humanity thronged the streets for Stalin's funeral procession.* Joseph Stalin, the Soviet Union's fea...