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Saturday, 10 April 2021

दंगा - कविता


अ‍भी फिजा में और भी तैरेगी खून की खुशबू

अभी तो चुनाव के दिन करीब आने हैं

अभी जले घरों की आग ले कर, जली लाश की मशाल ले कर

चुनावी जीत की राह रोशन करने के दिन बाकी हैं

तुम डरो, डरपोक बनो, अमन की शांति की बात करो

चुनावी जंग है, हमें मौत के और हरकारे लाने हैं


(बस यूंही)

शाहिद अख्‍तर


दंगा

1.

आओ भाई बेचू आओ

आओ भाई अशरफ आओ

मिल-जुल करके छुरा चलाओ

मालिक रोजगार देता है

पेट काट-काट कर छुरा मँगाओ

फिर मालिक की दुआ मनाओ

अपना-अपना धरम बचाओ

मिलजुल करके छुरा चलाओ

आपस में कटकर मर जाओ

छुरा चलाओ धरम बचाओ

आओ भाई आओ आओ

2.

छुरा भोंककर चिल्लाये ..

हर हर शंकर

छुरा भोंककर चिल्लाये ..

अल्लाहो अकबर

शोर खत्म होने पर

जो कुछ बच रहा

वह था छुरा

और

बहता लोहू

3.

इस बार दंगा बहुत बड़ा था

खूब हुई थी

ख़ून की बारिश

अगले साल अच्छी होगी

फसल

मतदान की

गोरख पाण्डेय

 

रोजी रोटी का

सवाल खड़ा करती है जनता

शासन कुछ देर सिर खुजलाता है

एकाएक साम्प्रदायिक फसाद शुरू हो जाता है

हर हाथ के लिए काम माँगती है जनता

शासन कुछ देर विचार करता है

एकाएक साम्प्रदायिक फसाद शुरू हो जाता है

अपने बुनियादी हक़ों का

हवाला देती है जनता

शासन कुछ झपकी लेता है

एकाएक साम्प्रदायिक फसाद शुरू हो जाता है

साम्प्रदायिक फसाद शुरू होते ही

हरक़त में आ जाती हैं बंदूकें

स्थिति कभी गम्भीर

कभी नियंत्रण में बतलाई जाती है

एक लम्बे अरसे के लिए

स्थगित हो जाती है जनता

और उसकी माँगें

इस सम्पूर्ण प्रक्रिया में शासन

अपनी चरमराती कुर्सी को

ठोंकपीट कर पुन: ठीक

कर लेता है।

नरेन्द्र जैन


दोहे

हाट लगा है धर्म का भक्त जनन को छूट।

जान माल सब हैयहाँ लूट सकै तो लूट॥

राजा पण्डित मौलवी सब मिलि कीन्हीं घात।

जीभ निकाले आ रही महाकाल की रात॥

जूठी हड्डी फेंककर औ' कुत्तों को टेर।

अपने-अपने महल में सोये पड़े कुबेर॥

घर-आँगन मातम मचे धरती पड़े दरार।

ना चहिए ऐसे हमें कलश और मीनार॥

अब्दुल बिस्मिल्लाह

हिन्दू या मुसलमान के अहसासात को मत छेड़िये

अपनी कुरसी के लिए ज़ज्बात को मत छेड़िये

हममें कोई हूण कोई शक कोई मंगोल है

दफ़्न है जो बात अब उस बात को मत छेड़िये

ग़लतियाँ बाबर की थीं जुम्मन का घर फिर क्यों जले

ऐसे नाज़ुक वक्त में हालात को मत छेड़िये

है कहाँ हिटलर हलाकू जार या चंगेज़ खाँ

मिट गये सब कौम की औक़ात को मत छेड़िये

छेड़िये इक जंग मिलजुल कर ग़रीबी के ख़िलाफ

दोस्त मेरे मजहबी नग्मात को मत छेड़िये।

अदम गोंडवी

 

कविता

हम हैं ख़ान के मज़दूर

हम हैं ख़ान के मज़दूर

हमारा इस्तेहसाल इस्तेमार की बुनियाद है!

 

हमारी तज़लील बादशाहों का ताज है

हर दौर में हम, हर ज़माने में हम

ज़िल्लत हो मस्केनात के तीन खाते रहे

जान जोखिम  में डालकर अपनी

तिजोरी गोरों की हर दम भरते रहे

सबह-ए-आज़ादी आयी जब, मुस्कुराये हम

यह सोचकर गोरे आकाओं से मिली है निजात

ज़िन्दगी सुख से होगी बसर अब

लेकिन हम थे बेखबर कि, हमलोग

हैं फक़त ख़ान के मज़दूर

नहीं हक़ हमारा आज़ादी पर है

नहीं हक़ हमारा तरक्क़ी पर है

ख़ून थूकते थे हम हर जश्न में

ख़ून जलाकर सियाही क़बूलते थे हम

खून और सियाही में लिपटे थे हम

ख़ून और सियाही में लिपटे हैं हम!

 

ज़मीन की तहों से लाये हैं हीरे

ज़मीन की तहों से खींचे खनज

घुट घुट के ख़ानों में हँसते रहे

मुस्कुराये तो आँसू टपकते रहे

ज़मीन की सतह पर आता रहा इंक़लाब

ज़मीन तहों में हम मरते रहे, जीते रहे

शुमाल ओ जुनूब के हर मुल्क में हम

ज़मीन में दब दब के खामोश

होते रहे जान बहक़, लाशों पर अपनी कभी

कोई आँसू बहाने वाला नहीं सतह ए ज़मीन पर हम

एक अजनबी हैं फक़त ज़मीन के वासियों के लिये!

हम हैं खान के मज़दूर

हमारा इस्तेहसाल इस्तेमार की बुनियाद है!

मुसाब इक़बाल

इस्तेहसाल हासिल, तज़लील अपमान

शुमाल ओ जुनूब पूरब और पश्चिम




सांप्रदायिक दंगा 



कवि आदम गोंडवी ने पुछा 

गलती बाबर की थी जुम्मन का घर क्यों जले ?

गलती हमेशा शासक वर्ग की होती है 

घर क्यों जुम्मन का या गंगुआ तेली का जलता है ?


एक कवि ने पुछा 

दंगों का कारण क्या है ?

कुछ लॊग कहते है 

इसके पीछे लुच्चे लफंगे है 

अवांछित तत्त्व है .


तो फिर कौन है वे  ?

वे मंदिर खड़ा कर रहे है 

वे  मस्जिद खड़ा कर रहे है 

वे  मंदिर ध्वस्त कर रहे है 

वे मस्जिद ध्वस्त कर रहे है 


लेकिन उनके पीछे कौन है ?

मंदिर तोडना मस्जिद  खड़ा करना 

मस्जिद तोडना मंदिर खड़ा करना 

ये धर्म युद्ध नहीं है सिर्फ 

ये जनयुद्ध तो बिलकुल नहीं है 

पूंजीपतियों का आपसी युद्ध भी नहीं है ये सिर्फ 

मेहनतकसजन के विरुद्ध सयुंक्त युध है उनका 

धर्म उनका खुनी हथियार है 

और सांप्रदायिक दंगा उनके जंग का ऐलान है 

इस लिए धर्म पर उंगली उठाना जुर्म है 

ताकि 

धर्म की डोरी से हमेशा बंधे रहे हम 

और जब चाहे वे हमें अपने युद्ध में खींच ले 

उनकी कब्र खोदने को कभी सोचे भी नहीं 

धार्मिक पाखंडो का हम शिकार होते रहे 

जुम्मन और गंगुआ तेली कभी एक ना हो 

उनकी हार जीत को हम अपना समझते रहे 

हम मजदूर मजदूर नहीं रहे 

हिन्दू रहे , मुस्लिम रहे इसाई  रहे 

और "सेक्युलर" तो हम रहेगे ही


हमारे खिलाफ जब भी वो 

साजिश कर रहे हो एक ही दरी पर बैठ

अफीम के नशे की तरह बेसुध पड़े रहे हम  

और कभी न जान पाए कि

हम बे-मंदिर बे-मस्जिद नहीं 

उनके लूट के कारण बेघर है 

अधनंगे है, भूखे है, वेहाल है 

धर्मो के बीच मेल का पाखंड वे ही करते है 

एक ही थैले के चट्टे -बट्टे 

सभी धर्मो के गणमान्य पूंजीपति.

१९५३ में स्टालिन की शव यात्रा पर उमड़ा सैलाब 

*On this day in 1953, a sea of humanity thronged the streets for Stalin's funeral procession.* Joseph Stalin, the Soviet Union's fea...