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Tuesday, 25 May 2021

पूरे सोशल मीडिया पर कंट्रोल की तैयारी - पराग वर्मा

मेन स्ट्रीम मीडिया को खरीद लिया और आई टी सेल गठित किया । बिकाऊ मीडिया और सोशल मीडिया प्रचार द्वारा प्रोपेगैंडा फैलाकर अंंधभक्तों का जनाधार बनाया । इस सबके बावजूद बदहाल भौतिक परिस्थितियों ने लोगों को जागृत किया और सोशल मीडिया पर झूठ और मक्कारी का परदाफाश होने लगा । इसलिए अब अचानक सोशल मीडिया के कंटेंट को नियंत्रित करने की बात आ गई है और नये आई.टी. कानून बनाए जा रहे हैं । 

ये कानून फेसबुक, व्हाट्सएप और ट्विटर जैसे प्लेटफार्म का इंटरमीडियरी स्टेटस हटा देंगे । पहले ये प्लेटफार्म केवल एक इंटरमीडियरी थे और इनको इम्यूनिटी थी जिससे उन पर दर्ज कंटेंट के लिए उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता था । पर अब जब ये इंटरमीडियरी स्टेटस हट जाएगा तो इन कंपनियों को उन सभी पोस्ट को हटाने का कानूनी दबाव बनाया जाएगा जो सरकारी तंत्र के खिलाफ हैं और तेजी से प्रचलित हो रहे हैं । जिन्होंने इस तरह के कंटेंट की शुरुआत की है उन्हें अलग से टारगेट किया जाएगा । सरकार द्वारा किया दुष्प्रचार बकायदा चलता रहेगा । यदि सोशल मीडिया प्लेटफार्म सरकार के दुष्प्रचार को यदाकदा उजागर करता है तो उनके ऊपर आधिकारिक कार्यवाही हो जाएंगी जैसे मेनिपुलेटेड ट्वीट को मेनिपुलेटेड कहने पर ट्विटर के दफ्तर पर कल रेड पड़ गई ।

 50 करोड़ सोशल मीडिया उपभोक्ताओं के इस बाजार को क्या सोशल मीडिया कंपनियां इसलिए गंवा देंगी क्योंकि सरकार कुछ नियंत्रण चाहती है । ज़ाहिर है मुनाफा सर्वोच्च है और कंपनियां ये सभी कानूनों का पालन करने लगेंगी । इसी सोशल मीडिया द्वारा आम लोगों की निजता के उल्लंघन से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता और वह जारी रहेगा । हम-आप क्या खाते हैं, क्या पहनते हैं, कहां जाते हैं, ये सभी इंफार्मेशन डाटा के रूप में और अधिक तादाद में सोशली उपलब्ध होंगी क्योंकि ये तो कार्पोरेट के मुनाफे की प्राथमिक ज़रूरत बन गई है ।

Sunday, 11 April 2021

राष्ट्रीय सुरक्षा कानून’ के तहत दर्ज 80% मुकदमों को अदालतों ने झूठा बताया



राष्ट्रीय सुरक्षा कानून-1980 के इस्तेमाल को लेकर एक रिपोर्ट जारी हुई है। इसमें खुलासा हुआ है कि इस कानून के तहत जनवरी 2018 से दिसम्बर 2020 तक कुल 120 मुकदमे दर्ज किए गए थे। इनमें अधिकतर मामलों को अदालत ने ही झूठा कह दिया है। 

जिसमें से ज्यादातर मुकदमे उत्तर प्रदेश में दर्ज किए गए। 120 मुकदमे जब अदालत में गए तो अदालत ने 120 में से 96  मुकदमों को झूठा करार दिया और पुलिस की मंशा पर भी सवाल खड़े किए। कुल 120 मुकद्दमों में 41 मुकदमे सिर्फ गौ मांस खाने, बेचने या उससे सम्बंधित थे जिनमें से 30 मामलों को झूठा पाया गया और 10 मामलों में अदालत ने जमानत दे दी। रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत तर्ज मामलों में से ज्यादातर मामले अल्पसंख्यक समुदाय, दलित व जनवादी अधिकारों के लिए संघर्ष करने वालों पर दर्ज किए गए। उत्तर प्रदेश का बहुचर्चित डॉ कफील खान मामले में भी इसी कानून के तहत मामला दर्ज किया गया था।

इससे यह अर्थ भी नहीं निकालना चाहिए कि बाकी मामले सच्चे हैं क्यों "न्यायालयों" के अन्यायी चरित्र का पहले ही पर्दाफाश हो चुका है। लेकिन देखने वाली बात यह है कि रासुका के तहत इतनी बड़ी अंधेरगर्दी की गई कि इसके तहत दर्ज मामले पूँजीवादी अदालतों में भी टिक नहीं पाए। 
यह पूरी तरह स्पष्ट हो चुका है कि इस काले कानून का ''देश की सुरक्षा'' से कोई लेना देना नहीं है। देश का मतलब देश की जनता होता है जिसका इस कानून के जरिए दमन किया जाता रहा है। 

1980 में कांग्रेस सरकार ने यह कानून "राष्ट्रीय सुरक्षा" के नाम पर बनाया था। भारत मे काले कानूनों की नींव कांग्रेस ने ही रखी थी तथा वर्तमान में भाजपा सरकार इस प्रक्रिया को तेज़ी से आगे बढ़ा रही है। 

रिपोर्ट में कहा गया कि इस कानून के तहत कैदियों को रिहाई के आदेश के बावजूद भी उन्हें कई-कई महीनों तक जेलों में रखा गया। राष्ट्रीय सुरक्षा कानून, यूएपीए, अफस्पा जैसे काले कानूनों की लंबी फेहरिस्त है। पंजाब में पकोका, हरियाणा में सम्पति क्षति वसूली कानून, बिहार में बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस कानून आदि विभिन्न राज्यों में अलग-अलग दमनकारी कानून हैं और मोदी सरकार द्वारा इन कानूनों का इस्तेमाल बुद्धिजीवियों और जनवादी अधिकारों के लिए लड़ने वाले लोगों को झूठे मुकदमों में फंसाने के लिए किया जा रहा है। आज देश के इंसाफपसंद, जागरूक लोगों को इन कानूनों के खिलाफ मुखर आवाज उठाने के लिए आगे आना चाहिए।


कुलविंदर रोड़ी

Tuesday, 2 March 2021

नये कृषि कानून - कविता

वे बार बार देना चाहते है विकल्प
नये कृषि कानून के 
रद्द करने की मांग का विकल्प
वे लुभाना चाहते हैं
भटकाना चाहते हैं
आंदोलनकारियों को
जो बखूबी समझ रहे हैं
गुलामी की जंजीर है
यह कृषि कानून
जो बखूबी जान रहे हैं
कारपोरेट के हाथों
उनकी जमीन भी
बेचे जाने का है 
यह कृषि कानून
और यह सब
 बखूबी जान रहे हैं
आंदोलित किसान
मेहनतकशों का हर तबका
और इसलिए
एक अद्भूत भाईचारे की 
तस्वीर के साथ
आंदोलन के साथ लड़ रहे हैं
अपने हक की लड़ाई
पर सोचने वाले  सोचते हैं
हर समय की तरह
डाले जा सकेंगे इसमें भी दरार
तोड़ दिये जा सकते हैं
इसे भी प्रशासनिक दमन से
या बदनाम करके
भर दिये जाऐंगे
 नेतृत्वकारियों को जेल में
और खत्म कर दिये जाऐंगे आंदोलन
पर उनके सोच के विपरित वह खड़ी है
बड़ी शहादत के साथ
कड़कड़ाते ठंड को झेलकर
अब गर्मी की तपन सहने को भी
कमर कसी
उन्हें समझ में अब
आ जाना चाहिए
नहीं है इसका कोई विकल्प
उन्हें याद रखनी चाहिए
इतिहास के पन्ने 
कि
देश के मजदूर किसान
जब उतर जाते हैं सड़क पर
एक कानून ही नहीं
बल्कि बूत रखते हैं बदलने की
शोषणकारी पूरी व्यवस्था को।
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इलिका

Thursday, 21 January 2021

कॉर्पोरेट को पूरी आजादी देता कृषि कानून*


21/01/2021

इन तीन कृषि कानून के आने के बाद कॉर्पोरेट क्लास को पूरी छूट, आजादी मिल गयी है कि वो जिस प्रदेश के किसान से चाहे कृषि उपज खरीद सकते है, जिस कीमत पर जितना चाहे खरीद कर गोदाम भर सकते है क्योंकि अब जमाखोरी से सम्बंधित कानून में आवश्यक संशोधन कर दिया गया है। फिर खरीदी हुई कृषि उपज को बाजार में पूरे देश मे फैले अपने हजारो बड़े-बड़े रिटेल मॉल के माध्यम से जितनी कीमत चाहे वे हमसे वसूल कर सकते है क्योंकि कीमत एक सीमा के अंदर रखने के लिये कानून में कोई प्रावधान नही रखा गया है।
अप्रैल मई में सरसो का न्यूनतम सरकारी मूल्य था 44 रुपए/ किलो और सरसो के तेल का मूल्य था 80 से  90 रुपए लीटर (खुदरा बाजार में)

अभी तो भंडारण की सीमा थी जिसे जून मे खत्म कर दिया गया और सरसो सेठ जी के गोदाम में पहुंच गई!

आज सरसो का रेट है-लगभग 60 से 65/किलो और सरसो का तेल- 160 रुपए/ लीटर !

अर्थात 166 रुपए किलो जिसपर 200 रुपए से अधिक का मूल्य प्रिंट होकर आना शुरू हो गया है! 

यदि किसान आंदोलन तथा अड़ानी अंबानी विरोध न हो रहा होता तो शायद यह प्रिंट रेट पर ही बिकता!!

अभी सरसो की नई फसल आने में तीन महीने बाकी है.

सचमुच, मोदी सरकार के इस दावे में तनिक भी सच्चाई नही है कि यह कानून किसानों के हित  में लाया गया है और इससे किसानों की आमदनी दुगुनी हो जाएगी।  इस कानून ने कॉर्पोरेट घराने को कृषि उपज पर अधिकतम मुनाफा कमाने की पूरी आजादी प्रदान किया है। इसमें किसानों के लिये कुछ भी नही है, किसानों के नाम पर यह  देशी- विदेशी कॉर्पोरेट के पक्ष में बनाया गया कानून  है।

१९५३ में स्टालिन की शव यात्रा पर उमड़ा सैलाब 

*On this day in 1953, a sea of humanity thronged the streets for Stalin's funeral procession.* Joseph Stalin, the Soviet Union's fea...