पूंजीवादी उत्पादन प्राणाली में आर्थिक संकट या आर्थिक मंदी के बुनियादी कारण क्या है? १९ वी शताब्दी के आरम्भ से और बड़े पैमाने पर मशीन उद्धोग के पदार्पण के साथ पूंजीवादी उत्पादन के विकास का सफ़र आवधिक संकटों से बाधित होने वाला सफ़र रहा है जो आज तक जारी है. सर्वहारा के महान शिक्षक मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन और स्टॅलिन ने अपनी रचनाओं में इस पर विस्तार से प्रकाश डाला है. आइये, हम इस संकट के बुनियादी कारण को स्तालिन के शब्दो में समझते है. स्तालिन ने कहा है:
"संकट का बुनियादी कारण उत्पादन के सामजिक चरित्र और उत्पादन के परिणामो के हस्तगतिकरण के पूंजीवादी स्वरूप के बीच विरोधाभास में निहित है. अधिकतम पूंजीवादी लाभ के लिए उत्पादन के पूंजीवादी क्षमता में भारी वृद्धि और मिहनतकस विशाल जनता, जिनका जीवनस्तर पूँजीवाद हमेशा निम्नतर स्तर पर रखने की कोशिश करता है, के प्रभावी मांग में कमी के बीच विरोधाभास में पूँजीवाद के इस बुनियादी विरोधाभास की अभिव्यक्ति होती है. (स्टालिन, "सी.पी.एस.यु.(बी) के XVIवी कांग्रेस के लिए केंद्रीय समिति के राजनीतिक रिपोर्ट, अंग्रेजी संस्करण, खंड. XII, पेज 250-1.)
स्तालिन ने यहाँ दो बाते कही है .
पहली बात यह है कि संकट का बुनियादी कारण उत्पादन के सामजिक चरित्र और उत्पादन के परिणामो के हस्तगतिकरण के पूंजीवादी स्वरूप के बीच विरोधाभास में निहित है.
दूसरी बात यह है कि यह विरोधाभास किस रूप में अभिव्यक्त होता है. स्तालिन के अनुसार यह अधिकतम पूंजीवादी लाभ के लिए उत्पादन के पूंजीवादी क्षमता में भारी वृद्धि और मिहनतकस विशाल जनता, जिनका जीवनस्तर पूँजीवाद हमेशा निम्नतर स्तर पर रखने की कोशिश करता है, के प्रभावी मांग में कमी के बीच विरोधाभास में पूँजीवाद के इस बुनियादी विरोधाभास की अभिव्यक्ति होती है. यह संकट का बुनियादी कारण नहीं होता है, यह बुनियादी विरोधाभास की सिर्फ एक अभिव्यक्ति होती है. जाहिर है इस अभिव्यक्ति को ही कारण समझना भारी भूल होगी.
आइये हम इन दोनों बातो को विस्तार से समझते है.
सबसे पहले, 'उत्पादन के सामजिक चरित्र' का क्या अर्थ है? क्या सभ्यता के आरम्भ से ही उत्पादन का चरित्र सामजिक था? या श्रम की उत्पादकता के विकास के साथ इसका चरित्र सामूहिक, व्यक्तिगत और फिर समाज के विकास के एक ख़ास मंजिल में, पूंजीवादी उत्पादन प्राणाली की मंजिल में सामजिक होता गया? आइये विस्तार से समझते है.
उत्पादन के सामाजिक चरित्र हस्तगतकरण के निजी पूंजीवादी अंतर्विरोध का अर्थ.
श्रम प्रक्रिया के व्यक्तिगत से सामजिक रूप में रूपांतरण श्रम की उत्पादकता एवं श्रम विभाजन के विकास के साथ और उन उत्पादन के साधनों के प्रतिस्थापन के साथ जुड़ा हुआ है जो उत्पादन को सामूहिक ढंग से करने को आवश्यक बनाते है.
आदिम समाज में उत्पादन का आधार सामूहिक श्रम था लेकिन उत्पादक शक्तियों के विकास के साथ उत्पादन का आधार व्यक्तिगत श्रम होता गया. प्राक-पूंजीवादी व्यवस्था में अपने उत्पादन के साधनों पर कामगार का निजी स्वामित्व छोटे पैमाने के उत्पादन का आधार था और यह सामाजिक उत्पादन के विकास और खुद कामगार के स्वतंत्र व्यक्तित्व के विकास की एक आवश्यक शर्त थी जो वर्गीय समाज की अन्य अवस्थाओं में भी पायी जाती थी. यह व्यक्तिगत किसानी और दस्तकारी आदि के रूप में प्रतिफलित एव विकसित होता रहा और प्राक-पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था के पतन के समय तक उत्पादन के आधार के रूप में व्यक्तिगत श्रम का विस्तार हुआ. मार्क्स कहते है:
"अपने उत्पादन के साधनों पर कामगार का निजी स्वामित्व छोटे उद्योग का आधार होता है, चाहे वह छोटा उद्योग खेती से संबंधित हो या मेन्युफेक्चर से अथवा दोनों से। यह छोटा उद्योग सामाजिक उत्पादन के विकास और खुद कामगार के स्वतंत्र व्यक्तित्व के विकास की एक आवश्यक शर्त होता है। बेशक उत्पादन की यह क्षुद्र प्रणाली दास-प्रथा, कृषिदास-प्रथा और पराधीनता की अन्य अवस्थाओं में भी पायी जाती है। लेकिन वह फलती-फूलती है, अपनी समस्त शक्ति का प्रदर्शन करती है और पर्याप्त एवं प्रामाणिक रूप प्राप्त करती है केवल उसी जगह, जहां कामगार अपने श्रम के साधनों का खुद मालिक होता है और उनसे खुद काम लेता है, यानी जहां किसान उस धरती का मालिक होता है, जिसे वह जोतता है, और दस्तकार उस औजार का स्वामी होता है। जिसका वह सिद्धहस्त ढंग से प्रयोग करता है।
मार्क्स आगे कहते है:
"अपने विकास की एक खास अवस्था में पहुंचने पर यह प्रणाली स्वयं अपने विघटन के भौतिक साधन पैदा कर देती है। बस उसी क्षण से समाज के गर्भ में नयी शक्तियां और नयी भावनाएं जन्म ले लेती हैं। परंतु पुराना सामाजिक संगठन उनको श्रृंखलाओं में जकड़े रहता है और विकसित नहीं होने देता। इस सामाजिक संगठन को नष्ट करना आवश्यक हो जाता है। वह नष्ट कर दिया जाता है। उसका विनाश, उत्पादन के बिखरे हुए व्यक्तिगत साधनों का सामाजिक दृष्टि से संकेंद्रित साधनों में रूपांतरित हो जाना, अर्थात् बहुत से लोगों की छोटी-छोटी संपत्तियों का थोड़े से लोगों की अति विशाल संपत्ति मे बदल जाना अधिकतर जनता की भूमि, जीवन-निर्वाह के साधनों तथा श्रम के साधनों का अपहरण, साधारण जनता का यह भयानक तथा अत्यंत कष्टायक संपत्तिहरण पूंजी के इतिहास की भूमिका मात्र होती है. मार्क्स की पूंजी के प्रथम खंड नागरिक अंक १६ -३१ मई, २०१३ से साभार.
तकनीकी और माल उत्पादन के विकास ने तथा विकसित उत्पादन के साधनों ने श्रम विभाजन को आवश्यक बनाया जो लोगो के संयुक्त श्रम की मांग करता है. कृषि से जुड़े दस्तकारो और शहरी दस्तकारो के स्वतंत्र आर्थिक इकाइयों की जगह तीन चरणों में सरल सहयोग, विनिर्माण और उसके बाद आधुनिक उद्योग (कारखाना) ने जगह ली. इस तरह श्रम एवं उत्पादन का सामाजिकरण विशेषीकरण और सहकारिता के विकास में, बड़े उद्धोगो की स्थापना में तथा आर्थिक गतिविधियों के अंतर्गुन्थन में अभिव्यक्त हुआ. लेकिन यह विकास उत्पादकों के सम्पतिहरण पर आधारित था, अपने श्रम से कमाई हुई निजी संपत्ति की जगह पूंजीवादी निजी संपत्ति ले लेती है जो दूसरो के श्रम के शोषण के आधार पर टिकी होती है. मार्क्स ने कहा है:
प्रत्यक्ष उत्पादकों का संपत्तिहरण निर्मम ध्वंस-लिप्सा से और अत्यंत जघन्य, अत्यंत कुत्सित, क्षुद्रतम, नीचतम तथा अत्यंत गर्हित भावनाओं से अनुप्रेरित होकर किया जाता है। अपने श्रम से कमायी हुई निजी संपत्ति का स्थान, जो मानो पृथक रूप से श्रम करने वाले स्वतंत्र व्यक्ति के अपने श्रम के तत्वों के साथ मिलकर एक हो जाने पर आधारित है, पूंजीवादी निजी संपत्ति ले लेती है, जो कि दूसरे लोगों के नाम मात्र के लिए स्वतंत्र श्रम पर अर्थात् मजदूरी पर आधारित होती है। मार्क्स की पूंजी के प्रथम खंड नागरिक अंक १६ -३१ मई, २०१३ से साभार.
पूँजीवाद के विकास ने श्रम के समाजीकरण को व्यक्तिगत कारखाने से भी परे ले गया और कारखानों और कारखानों के संघों के बीच बीच तेजी से मजबूत और व्यापक संबंधों की स्थापना की. सभी सामाजिक उत्पादन अंत में सामजिक उत्पादन की एक प्रक्रिया में विलय हो गया जिसके सभी घटक श्रम विभाजन द्वारा एक साथ जुड़े हुए है. यह श्रम विभाजन न केवल क्षेत्रीय स्तर पर हुआ बल्कि यह उत्पादन की प्रक्रिया में ही निहित था - श्रम की तकनीकी विभाजन या श्रम के "एक हिस्से की पूर्णता" के एक रूप में विभाजन। श्रम के समाजीकरण के पहले चरण में यह निर्धारित करना अब असंभव हो जाता है कि किसी विशेष कारखाने में उत्पादन के किसी विशेष उत्पाद को किस विशेष श्रमिक ने पैदा किया है क्योकि यह पूरे सामूहिक श्रम का उत्पाद होता है; श्रम के समाजीकरण की प्रगति के साथ यह कहना असंभव होता जाता है कि किस विशेष कारखाने ने एक या दूसरे अंतिम उत्पाद का उत्पादन किया है क्योकि प्रत्येक उत्पाद व्यवस्थित रूप से उत्पादन की प्रक्रिया से जुड़े हुए दसियों या अलग-अलग कारखानों के सैकड़ों उत्पादन प्रक्रियाओं के परिणाम होते है. स्टॅलिन ने कहा है:
"दूसरी ओर, उत्पादन का विस्तार कर के और विशाल मिलों और कारखानों में लाखों श्रमिकों को केंद्रित करके, पूंजीवाद उत्पादन की प्रक्रिया को एक सामाजिक चरित्र का रूप देता है और इस तरह अपनी खुद की नींव को कमजोर करता है, क्योंकि उत्पादन की प्रक्रिया के सामाजिक चरित्र उत्पादन के साधनों का सामाजिक स्वामित्व की मांग करता है; अभी तक उत्पादन के साधन, निजी पूंजीवादी संपत्ति ही रहते है जो उत्पादन की प्रक्रिया के सामाजिक चरित्र के साथ असंगत है" स्तालिन – द्वंदात्मक और ऐतिहासिक भौतिकवाद
रूपांतरण की यह प्रक्रिया व्यक्तिगत श्रम के आधार पर छोटे उत्पादन को बर्बाद करने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली के स्थापना के बाद श्रम का और अधिक समाजीकरण करने का प्रश्न, भूमि तथा और साथ ही निजी संपत्ति का अधिक अपहरण करने का प्रश्न एक नया रूप धारण कर लेता हैं अर्थात खुद अपने लिए काम करने वाला कामगार का सम्पति हरण नहीं, बल्कि बहुत से कामगारों को शोषण करने वाले पूंजीपतियों की निजी संपत्ति का अपहरण (बड़ी पूँजी द्वारा छोटी पूँजी का संपत्तिहरण) और यह पूंजीवादी उत्पादन के अंतर्भूत नियमों के अमल में आने के फलस्वरूप पूंजी के केंद्रीयकरण के द्वारा संपन्न होता है. इस तरह पूंजीवादी उत्पादन और भी ज्यादा केन्द्रीयकृत, उत्पादन का साधन और भी ज्यादा समाजीकृत होता जाता है जब कि उत्पादन के हस्तगतकरण का स्वरुप निजी पूंजीवादी ही बना रहता है. मार्क्स ने पूँजी में इस रूपांतरण की प्रक्रिया का वर्णन करते हुए कहा है :
"रूपांतरण की यह प्रक्रिया जैसे ही पुराने समाज को ऊपर से नीचे तक काफी छिन्न-भिन्न कर देती है, कामगार जैसे ही सर्वहारा बन जाते हैं और उनके श्रम के साधन पूंजी में रूपांतरित हो जाते हैं, पूंजीवादी उत्पादन-प्रणाली खुद जैसे ही अपने पैरों पर खड़ी हो जाती है, वैसे ही श्रम का और अधिक समाजीकरण करने का प्रश्न, भूमि तथा उत्पादन के अन्य साधनों को सामाजिक ढंग से इस्तेमाल किये गये साधनों में और इसलिए सामूहिक साधनों में और भी अधिक रूपांतरित कर देने का प्रश्न और साथ ही निजी संपत्ति का अधिक अपहरण करने का प्रश्न एक नया रूप धारण कर लेते हैं। अब जिसका संपत्तिहरण करना आवश्यक हो जाता है। वह खुद अपने लिए काम करने वाला कामगार नहीं है, बल्कि वह है बहुत से कामगारों को शोषण करने वाला पूंजीपति।
यह संपत्तिहरण स्वयं पूंजीवादी उत्पादन के अंतर्भूत नियमों के अमल में आने के फलस्वरूप पूंजी के केंद्रीयकरण के द्वारा संपन्न होता है। एक पूंजीपति हमेशा बहुत से पूंजीपतियों की हत्या करता है। इस केंद्रीयकरण के साथ-साथ या यूं कहिये कि कुछ पूंजीपतियों द्वारा बहुत से पूंजीपतियों के इस संपत्तिहरण के साथ अधिकाधिक बढ़ते हुये पैमाने पर श्रम प्रक्रिया का सहकारी रूप विकसित होता जाता है। प्राविधिक विकास के लिए सचेतन ढंग से विज्ञान का अधिकाधिक प्रयोग किया जाता है, भूमि को उत्तरोत्तर अधिक सुनियोजित ढंग से जोता-बोया जाता है, श्रम के औजार ऐसे औजारों में बदलते जाते हैं, जिनका केवल सामूहिक ढंग से ही उपयोग किया जा सकता है, उत्पादन के साधनों का संयुक्त, समाजीकृत श्रम के साधनों के रूप में उपयोग करके हर प्रकार के उत्पादन के साधनों का मितव्ययिता के साथ इस्तेमाल किया जाता है, सभी कौमें संसारव्यापी मंडी के जाल में फंस जाती हैं और इसलिए पूंजीवादी शासन का स्वरूप अधिकाधिक अंतर्राष्ट्रीय होता जाता है। रूपांतरण की इस प्रक्रिया से उत्पन्न होने वाली समस्त सुविधाओं पर जो लोग जबर्दस्ती अपना एकाधिकार कायम कर लेते हैं, पूंजी के उन बड़े-बडे़ स्वामियों की संख्या यदि एक ओर, बराबर घटती जाती है, तो दूसरी ओर, गरीबी, अत्याचार, गुलामी, पतन और शोषण में लगातार वृद्धि होती जाती है। लेकिन इसके साथ-साथ मजदूर वर्ग का विद्रोह भी अधिकाधिक तीव्र होता जाता है। यह वर्ग संख्या में बराबर बढ़ता जाता है और स्वयं पूंजीवादी उत्पादन-प्रक्रिया का यंत्र ही उसे अधिकाधिक अनुशासनबद्ध, एकजुट और संगठित करता जाता है। पूंजी का एकाधिकार उत्पादन की उस प्रणाली के लिए एक बंधन बन जाता है, जो इस एकाधिकार के साथ-साथ और उसके अंतर्गत जन्मी है और फूली-फली है। उत्पादन के साधनों का केंद्रीयकरण और श्रम का समाजीकरण अंत में एक ऐसे बिन्दु पर पहुंच जाते हैं, जहां वे अपने पूंजीवादी खोल के भीतर नहीं रह सकते। खोल फाड़ दिया जाता है। पूंजीवादी निजी संपत्ति की मौत की घंटी बज उठती है। संपत्तिहरण करनेवालों का संपत्तिहरण हो जाता है। मार्क्स की पूंजी के प्रथम खंड नागरिक अंक १६ -३१ मई, २०१३ से साभार.
साम्राज्यवादी अवस्था में पूँजीवाद उत्पादन के पूर्णतम सामाजिकरण के द्वार पर आ पंहुचता है, उत्पादन का चर्तित्र सामजिक हो जाता है, पर हस्तगतकरण निजी ही रहता है. लेनिन इस सन्दर्भ में लिखते है:
"होड़(प्रतियोगिता) बदलकर इजारेदारी बन जाती है. परिणामस्वरुप उत्पादन के समाजीकरण की दिशा में बड़ी प्रगति होती है. विशेष रूप से तकनीकी आविष्कारो और सुधारों की प्रक्रिया का समाजीकरण हो जाता है.
यह चीज बिखरे हुए और एक दुसरे से अनजान उन मालिको के बीच पुरानी खुली होड़ से बिलकुल भिन्न है, जो एक अनजानी मंडी के लिए माल तैयार करते थे. सकेन्द्रण अब इस हद तक पहुच गया है कि किसी देश के या, जैसा कि आगे हम देखेगे , बहुत-से देशो के, यहाँ तक सारी दुनिया के कच्चे मालो के सभी स्रोतों का (जैसे लोहे के खनिज भंडारों का) मोटा मोटा तखमीना बनाया जा सकता है. न केवल ऐसे तखमीने बनाए जाते है, बल्कि इन स्रोतों पर बड़े बड़े इजारेदार गठजोड़ अपना कब्ज़ा भी जमा लेते है. मंडी के पैमाने का भी एक मोटा तखमीना बनाया जाता है और गठजोड़ उन्हें आपस में समझौता कर के "बाँट" लेते है. हुनरमंद मजदूरो पर एकाधिकार कर लिया जाता है, अच्छे से अच्छे इंजिनियर रख लिए जाते है,; परिवहन के साधनों पर कब्ज़ा कर लिया जाता है; अमेरिका में रेलों पर और यूरोप तथा अमेरिका में जहाजी कंपनियों पर. अपनी साम्राज्यवादी अवस्था में पूँजीवाद उत्पादन के पूर्णतम सामाजिकरण के द्वार पर आ पहुचता है, वह पूंजीपतियों को मानो उनकी मर्जी के विरुद्ध और अनजाने ही किसी नयी समाज –व्यवस्था में खीच लाता है, जो पूर्ण खुली होड़ से पुरे सामाजिकरण के बीच की संक्रमणकालीन समाज-व्यवस्था होती है.
उत्पादन सामजिक हो जाता है, पर उपभोग (हस्तगतकरण) निजी ही रहता है. उत्पादन के सामाजिक साधन कुछ लोगो की ही निजी संपत्ति बनी रहती है. रस्मी तौर से स्वीकृत खुली होड़ का मान्य ढांचा बना रहता है, और बाकी जनता पर कुछ थोड़े से इजरेदारो का जुआ सौ गुना भारी, अधिक तकलीफदेह और असह्य हो उठता है." (संकलित रचनाएँ खंड – ५, पेज २२७- २२८)'
इस तरह हमने विस्तार से देखा कि शोषण पर आधारित गैर-पूंजीवादी अर्थव्यवस्थाओ में श्रम और उत्पादन का चरित्र सामजिक नहीं, बल्कि व्यक्तिगत, निजी था. जो कुछ भी व्यक्तिगत श्रम के आधार पर उत्पादन होता था, उस उत्पाद पर मालिकाना हक़ भी व्यक्तिगत था याने हस्तगत करण का स्वरुप व्यक्तिगत या निजी था.
लेकिन आज स्थिति वैसी नहीं है. उत्पादन और श्रम का चरित्र तो पहले चरण में सामूहिक और फिर प्रगति के साथ सामजिक होता गया है लेकिन उसके उत्पाद पर मालिकाना हक़ सामजिक नहीं, बल्कि व्यक्तिगत या निजी ही बना हुआ है. पूंजीवादी उत्पादन का यही बुनियादी अंतर्विरोध है जो संकट का बुनियादी कारण है, जिसकी चर्चा स्तालिन ने इस लेख के आरम्भ में ही उद्धृत उद्धरण में किया है.
मार्क्स ने अपनी कालजयी रचना "पूँजी" में दिखया कि पूंजीवादी उत्पादन का विकास अंतरविरोधो से भरा है और उसका विकास इसी अंतरविरोधो के द्वारा होता है. पूँजीवाद अपने अंतरविरोधो का समाधान संकट के द्वारा ही करता है: मार्क्स ने कहा है:
"संकट मौजूदा विरोधाभासों का क्षणिक, हिंसक समाधान से अधिक कभी कुछ नहीं रहा है, हिंसक विस्फोट जो कुछ समय के लिए अशांत संतुलन को पुनः स्थापित करता है. (Capital Vol. 3, chapter 15)
अगर संकट का बुनियादी कारण उत्पादन के सामजिक चरित्र और उत्पादन के परिणामो के हस्तगतिकरण के पूंजीवादी स्वरूप के बीच विरोधाभास में निहित है और अगर हमें इस बार बार आने वाले संकट से निजात पाना है, समाज को आगे बढ़ना है तो इसका समाधान भी बिना इस बुनियादी अंतर्विरोध के समाधान के नहीं हो सकता याने उत्पादन के परिणामो के हस्तगतिकरण के पूंजीवादी स्वरूप को बदल कर सामजिक स्वरुप में बदले बिना नहीं हो सकता. सर्वहारा के महान शिक्षक और कार्ल मार्क्स के सहयोगी फ्रेडरिक एंगेल्स ने बिलकुल ठीक ही कहा है:
"उत्पादन के साधनों का सामजिक हस्तगतकरण न केवल उत्पादन के उपर लगे कृतिम प्रतिबन्ध को अपितु उत्पादक शक्तियों और उत्पादों की सकारात्मक बर्बादी और तबाही को भी मिटा देता है जो आज वर्तमान समय में उत्पादन का एक अनियार्य दुष्परिणाम है और जो संकट के समय अपने चरम पर पहुच जाता है." फे. एंगेल्स – समाजवाद काल्पनिक और वैज्ञानिक
पूंजीवादी उत्पादन के बुनियादी विरोधाभास की अभिव्यक्ति:
स्तालिन ने यहाँ पूँजीवादी उत्पादन के बुनियादी अंतर्विरोध के एक अभिव्यक्ति की चर्चा की है और उनके अनुसार "अधिकतम पूंजीवादी लाभ के लिए उत्पादन के पूंजीवादी क्षमता में भारी वृद्धि और विशाल मिहनतकस जनता, जिनका जीवनस्तर पूँजीवाद हमेशा निम्नतर स्तर पर रखने की कोशिश करता है, के प्रभावी मांग में कमी के बीच विरोधाभास में पूँजीवाद के इस बुनियादी विरोधाभास की अभिव्यक्ति होती है."
स्तालिन यहाँ दो तथ्यों की ओर इशारा करते है,
पहला यह कि अधिकतम पूंजीवादी लाभ के लिए उत्पादन के पूंजीवादी क्षमता में भारी वृद्धि होती है और दूसरा यह कि विशाल मिहनतकस जनता, जिनका जीवनस्तर पूँजीवाद हमेशा निम्नतर स्तर पर रखने की कोशिश करता है, के प्रभावी मांग में कमी आती है. इसका मतलब यह है कि एक तरफ उत्पादन क्षमता में भारी वृद्धि होती है तो दूसरी तरफ पूंजीवादी शोषण के चलते विशाल मिहनतकस जनता की गरीबी बदहाली बढती है और परिणाम स्वरुप उनकी क्रय क्षमता में कमी होती है जिसके चलते प्रभावी मांग में कमी होती है.
दूसरा, स्तालिन यहाँ इस अभिव्यक्ति को संकट का बुनियादी कारण नहीं मानते, इसे सिर्फ बुनियादी अंतर्विरोध की एक अभिव्यक्ति मानते है. संकट के बुनियादी अंतर्विरोध की अभिव्यक्ति सिर्फ इसी रूप में नहीं होती, दुसरे रूपों में भी होती है. महत्वपूर्ण यहाँ यह है कि यह संकट का बुनियादी कारण नहीं होता. आम तौर पर अत्यंत सरलीकृत रूप में इस अंतर्विरोध को विक्रय और क्रय के बीच अंतर्विरोध के रूप में, उसके अलगाव के रूप में भी अभिव्यक्त किया जाता है. मार्क्स ने इस पर टिपणी करते हुए कहा है:
"संकट की सामान्य संभावना पूंजी का ही औपचारिक रूपांतरण(metamorphosis), समय और स्थान में, खरीद और बिक्री का अलगाव है. लेकिन यह संकट का कारण नहीं है। क्योकि यह संकट का सबसे सामान्य रूप के सिवा कुछ भी नहीं है, याने, इसकी सबसे सामान्यीकृत अभिव्यक्ति के रूप में संकट. लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि संकट का अमूर्त रूप संकट का कारण है. अगर कोई पूछता है कि संकट का कारण क्या है, तो यह जानना चाहता है कि क्यों इसका अमूर्त रूप, सम्भावना का रूप, वास्तवकिता में बदल जाता है."
https://www.marxists.org/archive/marx/works/1863/theories-surplus-value/ch17.htm
मार्क्सवादी इस - अधिकतम पूंजीवादी लाभ के लिए उत्पादन के पूंजीवादी क्षमता में हुई भारी वृद्धि और विशाल मिहनतकस जनता, जिनका जीवनस्तर पूँजीवाद हमेशा निम्नतर स्तर पर रखने की कोशिश करता है, के प्रभावी मांग में कमी -अंतर्विरोध के अस्तित्व से इंकार नहीं करते लेकिन इसे संकट का का बुनियादी कारण नहीं मानते. मार्क्स ने इस अंतर्विरोध पर कई जगह टिपणी की है. इन टिपणीयों को फ्रेडरिक एंगेल्स ने सम्पादित करते समय इसे फुटनोट के रूप में रखा था. ये इस लिए शामिल की गयी थी कि "आगे चल कर तफ्शील के साथ विकास किया जा सके". संकट के कारणों की व्याख्या अप्रयाप्त उपभोग के आधार पर करने वाले अक्सर इन उद्धरणों को अपने पक्ष में प्रस्तुत करते रहते है. पाठको की जानकारी के लिए कुछ उदाहरण नीचे दिए जा रहे है:
"पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली में अंतर्विरोध. खरीदारों के रूप में मजदूर मंडी के लिए महत्वपूर्ण है, किन्तु अपना माल –श्रम शक्ति- बेचनेवालो के रूप में उन्हें पूंजीवादी समाज न्यूनतम कीमत तक सीमित रखने की ओर प्रवृत होता है."
"एक और अन्तरविरोधः जिन अवधियों में पूँजीवादी उत्पादन अपनी सभी शक्तियों को लगा देता है, वे अपने आपको अतिउत्पादन के दौरों के रूप में प्रकट करते हैं; क्योंकि उत्पादक शक्तियों को लगाने की सीमा महज़ मूल्य का उत्पादन नहीं है, बल्कि इसका प्रत्यक्षीकरण भी है."[Capital II, ch16, 391]
लेकिन मालों की बिक्री, यानी माल पूँजी का प्रत्यक्षीकरण, और इसके साथ ही अतिरिक्त मूल्य का भी प्रत्यक्षीकरण आम तौर पर समाज की उपभोक्ता आवश्यकताओं द्वारा नहीं, बल्कि एक ऐसे समाज की उपभोक्ता आवश्यकताओं द्वारा बाधित होता है जिसमें व्यापक बहुसंख्या हमेशा ग़रीब होती है और हर हालत में हमेशा ग़रीब ही रहती है।" (मार्क्स, 'पूँजी', खण्ड-2, पृ. 391)
https://www.marxists.org/archive/marx/works/1885-c2/ch16.htm
लेनिन ने इस पर टिपणी करते हुए कहा है:
"यह उद्धरण 'पूँजी' के खंड २ भाग २ की पांडुलिपि में शामिल की गयी टिपणी का था. यह टिपणी इसलिय शामिल की गयी कि "आगे चल कर तफ्शील के साथ विकास किया जा सके" तथा पांडुलिपि के प्रकाशक ने इसे फुटनोट के रूप में रखा था. ऊपर उधृत शब्दों के बाद लेखक आगे कहता है : "पर यह अगले भाग से सम्बंधित है" याने तीसरे भाग से. यह तीसरा भाग क्या है ? यह ठीक वह भाग है, जिसमे समग्र सामजिक उत्पाद के दो भागो के एडम स्मिथ के सिद्धांत की आलोचना तथा "समग्र सामजिक पूँजी के पुनरुत्पादन तथा संचालन का" याने उत्पाद के प्रत्यक्षीकरण का विश्लेषण है."
कुछ लोग मार्क्स के बहुत ही लोकप्रिय एवं प्रसिद्द उद्धरण को अप्रयाप्त उपभोग के सिद्धांत के पक्ष में उधृत करते है :
"सभी वास्तविक संकट के पीछे अंतिम कारण उत्पादक शक्तियों के विकास के लिए पूंजीवादी उत्पादन की सहज प्रवृति के बनिस्पत हमेशा जनता की गरीबी और प्रतिबंधित खपत होती है मानो केवल समाज की निरपेक्ष उपभोग क्षमता उसकी सीमा हो." Marx, Capital, vol.3, p.615
और लेनिन इस पर अपनी प्रतिक्रिया इन शब्दों में देते है:
"ये प्रस्थापनाएं उन अंतरविरोधो के बारे में बात करती है जैसाकि हमने उल्लेख किया है, अर्थात, उत्पादन के अप्रतिबंधित विस्तारित करने की बाध्यता और सीमित उपभोग- इसके अलावा और कुछ नहीं. पूँजी के इन उद्धरणों से यह निष्कर्ष निकलने से ज्यादा मूर्खतापूर्ण और कुछ भी नहीं हो सकता कि मार्क्स ने पूंजीवादी समाज में बेशी मूल्य के प्रत्यक्षीकरण की सम्भावना को स्वीकार नहीं किया, कि उन्होंने अप्रयाप्त उपभोग को संकट का कारण माना, आदि. "रूस में पूँजीवाद का विकास" वी आई. लेनिन.
वास्तव में यह 'अप्रयाप्त उपभोग', मजदूरी में कमी या बहुतयात आबादी की गरीबी के चलते क्रय शक्ति में कमी पूंजीवादी आर्थिक संकट का बुनियादी कारण नहीं, बल्कि संकट के बुनियादी कारण की एक अभिव्यक्ति है. कारण यह है कि मजदूरों के द्वारा उपभोग जनित मांग कुल सामजिक उत्पाद का सिर्फ एक पहलु है, इसलिए मजदूरों का उपभोग बढ़ा कर, क्रय शक्ति में वृद्धि कर के या आम गरीब आबादी के जीवन स्तर में सुधार कर के भी पूंजीवादी संकट से पार नहीं पाया जा सकता जैसा कि कीन्स और कलमघिस्सू बुर्जुआ अर्थशाश्त्री और कुछ सुधारवादी नकली कम्युनिस्ट अक्सर नुश्खे पेश करते रहते है.
मार्क्स मानते है कि श्रमिको की मांग केवल आवश्यक श्रम के समतुल्य हो सकता है, इसलिए, माल्थस के शब्दों में "किसी वस्तु पर लाभ का अस्तित्व मजदूरों से अलग मांग की पूर्व-कल्पना करता है जिन्होंने इसे पैदा किया है" और इसलिए "मजदूरों की मांग कभी भी अपने आप में एक प्रयाप्त मांग नहीं हो सकता." मांग के कुछ अन्य स्रोत के बिना पूंजीवादी उत्पादन न सिर्फ संकट से ग्रस्त होगा, बल्कि असंभव होगा. मजदूरों के व्यक्तिगत उपभोग जनित मांग के अलावे मांग के अन्य स्रोत में पूंजीपतियों के उत्पादक उपभोग जनित मांग कुल उत्पादित उत्पाद के प्रत्यक्षीकरण में विशेष महत्व होता है. इसलिए प्रत्यक्षीकरण की समस्या को केवल मजदूर वर्ग के सिमित उपभोग तक नहीं रखा जा सकता, बल्कि बढती हुई बेशी मूल्य की मात्रा का लाभकारी निवेश(उत्पादक उपभोग) की संभावना तक ले जाना होगा.
अक्सर "अप्रयाप्त-उपभोग" के सिद्धांत को मार्क्स के विचारों के रूप में पेश किया जाता है. परन्तु जैसा कि मार्क्स ने बहुत पहले ही व्याख्या की है, यह सही नहीं है. हालाकि उत्पादक शक्तियों के व्यापक विकास के बावजूद जनता के लिए निश्चित रूप से उपभोग में कमी अस्तित्व में होती है, और मार्क्सवादी वैज्ञानिक विश्लेषण इस तथ्य से इनकार नहीं करता लेकिन यह पूंजीवादी संकट का बुनियादी कारण नहीं अपितु बुनियादी कारण की एक अभिव्यक्ति होती है. और इस लिए यह कुल उत्पाद के प्रत्यक्षीकरण की समस्या के सिर्फ एक पक्ष को ही रखता है, सिर्फ एकतरफा विश्लेषण प्रस्तुत करता है.
पूँजी के दुसरे खंड में मार्क्स ने खुद पूंजीवादी संकट के कारण के प्रसंग में मजदूरों की गरीबी, बदहाली, क्रय शक्ति में कमी के चलते "अप्रयाप्त -उपभोग" को चक्रीय संकट की व्यख्या करने की हर कोशिश का जोरदार ढंग से खंडन करते हुए उपहास किया है. उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि अकेला मजदूरों की गरीबी, बदहाली, क्रय शक्ति में कमी जनित व्यक्तिगत उपभोग (या इसका आभाव) पूंजीवादी संकट का मूलभूत कारण नहीं है. अगर ऐसा होता तो मिहनतकस जनता की क्रय शक्ति बढ़ा कर इस समस्या का निदान पाया जा सकता था. मार्क्स ने इसका जबाब इन शब्दों में दिया है:
"यह कहना सरासर पुनरुक्ति है कि संकट प्रभावी खपत, या प्रभावी उपभोक्ताओं की कमी की वजह से हैं। पूंजीवादी व्यवस्था प्रभावी खपत के अलावे खपत के किसी भी अन्य दुसरे तरीके को नहीं जानता. वस्तुओं के अविक्रेय होने का केवल एक ही मतलब है कि उनके लिए कोई प्रभावी खरीदार नहीं पाया गया है यानी, उपभोक्ता (क्योकि वस्तुएं अंतिम विश्लेषण में उत्पादक या व्यक्तिगत उपभोग के लिए खरीदे जाते हैं"
मार्क्स आगे कहते है:
"लेकिन अगर इस पुनरुक्ति को कोई एक गंभीर औचित्य की झलक देने का प्रयास यह कहते हुए करता है कि मजदूर वर्ग अपने खुद के उत्पाद का एक बहुत छोटा सा हिस्सा प्राप्त करता है और जैसे ही यह इसका एक बड़ा हिस्सा प्राप्त करेगा और परिणामस्वरुप मजदूरी में वृद्धि होगी, बुराई का निवारण हो जाएगा, तो सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है कि संकट हमेशा ऐसी अवधि में तैयार होता है जिसमे सामान्यतः मजदूरी की वृद्धि होती है और मजदूर वर्ग वास्तव में वार्षिक उत्पाद का एक बड़ा हिस्सा प्राप्त करता है जो उपभोग के लिए होता है. इस गंभीर और 'सरल' (!) सामान्य ज्ञान के इन पैरोकारो की दृष्टि से, इस तरह की अवधि को, उलटे, संकट को दूर करना चाहिए। " Marx, Capital, vol.2, pp.414-15
दुसरे शब्दों में, अर्थव्यवस्था में मंदी आने के ठीक पहले तेजी के चरम पर मजदूरी में बढ़ने की प्रवृति रहती है, जब श्रम की आपूर्ति में कमी पायी जाती है. इस लिए सिर्फ मजदूरों की गरीबी, क्रय शक्ति में कमी के आधार पर प्रभावी मांग में कमी अति-उत्पादन के संकट का वास्तविक कारण नहीं माना जा सकता.
लेनिन अपनी पुस्तक "आर्थिक स्वछंदतावाद का चर्तित्र चित्रण" में संकट के अप्रयाप्त उपभोग के सिद्धांत के पैरोकारो की खबर लेते हुए और संकट के मार्क्सवादी सिद्धांत की व्याख्या प्रस्तुत करते हुए कहते है:
"पूंजीवादी समाज में संचय के तथा उत्पाद के प्रत्यक्षीकरण के विज्ञानं सम्मत विश्लेषण (मार्क्सवादी) ने इस सिद्धांत के आधार को ही उलट दिया और यह भी लक्षित किया कि ठीक संकटों से पहले की अवधियों में मजदूरों का उपभोग बढ़ता है, कि अप्रयाप्त उपभोग (जिसे संकटों का कारण बताया जाता है) अत्यंत विविधतापूर्ण आर्थिक प्रणाली के अंतर्गत विधमान था, जबकि संकट केवल एक प्रणाली –पूंजीवादी प्रणाली – का अभिलाक्षणिक गुण है. यह सिद्धांत (मार्क्सवादी) संकटों का कारण एक और अंतर्विरोध याने उत्पादन के सामजिक स्वरुप (पूँजीवाद द्वारा सामजिकृत) तथा हस्तगतकरण की निजी, व्यक्तिगत पद्धति के बीच अंतर्विरोध बताता है." लेनिन संकलित रचनायं खंड १ पेज ३१७-१८
लेनिन आगे इन दो सिधान्तो - अप्रयाप्त उपभोग का सिद्धांत और मार्क्सवादी सिद्धांत- के बीच गहन अंतर को स्पष्ट करते हुए कहते है.
"पहला सिद्धांत (अप्रयाप्त उपभोग का सिद्धांत) बताता है कि संकटों का कारण उत्पादन तथा मजदूर वर्ग द्वारा उपभोग के बीच अंतर्विरोध है, दूसरा सिद्धांत (मार्क्सवादी) बताता है कि उत्पादन के सामजिक स्वरुप तथा हस्तगतकरण के निजी स्वरुप के बीच अंतर्विरोध है. परिणाम स्वरुप पहला सिद्धांत परिघटना की जड़ को उत्पादन के बाहर देखता है (इसी वजह से, उदहारण के लिए, सिस्मोंदी उपभोग को नजरंदाज करने तथा अपने को केवल उत्पादन में व्यस्त रखने के लिए क्लासकीय अर्थशास्त्रियों पर प्रहार करते है); दूसरा सिद्धांत इसे ठीक उत्पादन की अवस्थाओं में देखता है. संक्षेप में, पहला अप्रयाप्त उपभोग को तथा दूसरा उत्पादन की अराजकता को संकट का कारण बनता है. इस तरह दोनो सिद्धांत संकटों का कारण आर्थिक प्रणाली में अंतर्विरोध को बताते है, वहां वे अंतर्विरोध के स्वरुप बताने में एक दुसरे से सर्वथा भिन्न है. परन्तु सवाल उठता है : क्या दूसरा सिद्धांत उत्पादन तथा उपभोग के बीच विरोध से इनकार करता है? निसंधेह नहीं. वह इस तथ्य को स्वीकार करता है, लेकिन उसे मातहत, उपयुक्त स्थान पर ऐसे तथ्य के रूप में रख देता है, जो पूरे पूंजीवादी उत्पादन के केवल एक क्षेत्र से सम्बंधित है. वह हमे सिखाता है कि यह तथ्य संकटों का कारण नहीं बता सकता, जिन्हें मौजूदा आर्थिक प्रणाली में, दूसरा अधिक गहन, आधारभूत अन्तर्विरोध अर्थात उत्पादन के सामजिक स्वरुप तथा हस्तगतकरण के निजी स्वरुप के बीच अंतर्विरोध जन्म देता है. वहीँ पेज -३१८
कुछ लोग लोग कहते है कि उत्पादन के सामाजिकरण के विकास के साथ उत्पादन प्रक्रिया कई शाखाओ में फ़ैल जाती है और पूंजीपति वर्ग कुल मांग को जान नहीं सकता और इसलिए समाज की वास्तविक क्रय शक्ति के सन्दर्भ में उत्पादन तथा उपभोग के बीच संतुलन की स्थापना में बाधा होती है, याने मालो का प्रत्यक्षीकरण (वस्त्विकरण) की समस्या अतिउत्पादन और संकट का कारण बनता है. लेकिन यह तो सिर्फ संकट की सम्भावना बताना हुआ, यह संकट की अवश्यम्भाविता पर प्रकाश नहीं डालता.
लेनिन इस पर प्रकाश डालते हुए कहते है:
"संकट क्या है? अतिउत्पादन, मालो का अतिउत्पादन, जिनका प्रत्यक्षीकरण नहीं किया जा सकता, जिनके लिए मांग नहीं है. यदि मालो के लिए मांग नहीं है, तो यह बताती है कि जब कारखानेदार ने उन्हें उत्पादित किया, तब उसे मांग का पता नहीं था. अब इस सवाल उठता है: क्या संकटों की सम्भावना की यह शर्त बताना संकटों के सारतत्व की व्याख्या करने के बराबर है? क्या एफ सी ने किसी परिघटना की सम्भावना बताने और उसकी अवश्यम्भाविता पर प्रकाश डालने के बीच अंतर को सचमुच नहीं समझा था? सिस्मोंदी कहते है : संकट संभव है, क्योकि कारखानेदार को मांग का पता नहीं है; वे अवश्यम्भावी है क्योकी पूंजीवादी उत्पादन के अंतर्गत उत्पादन तथा उपभोग के बीच कोई संतुलन नहीं हो सकता (अर्थात उत्पाद का प्रत्यक्षीकरण नहीं हो सकता). एंगेल्स कहते है : संकट संभव है, क्योकि कारखानेदार को मांग का पता नहीं है; वे अवश्यम्भावी है, लेकिन यक़ीनन इसलिए नहीं कि उत्पाद का कतई प्रत्यक्षीकरण नहीं किया जा सकता. यह सच नहीं है: उत्पाद का प्रत्यक्षीकरण किया जा सकता है. संकट अवश्यम्भावी है, क्योंकि उत्पादन के सामजिक स्वरुप का हस्तगतकरण के निजी स्वरुप से टकराव होता है."
वहीँ पेज ३२२
इस तरह, मजदूरों की गरीबी, बदहाली, क्रय शक्ति में कमी या मालो का प्रत्यक्षीकरण (वस्त्विकरण) की समस्या संकट का यह बुनियादी कारण नहीं होता. यह सिद्धांत बेतुका, हास्यास्पद और वैज्ञानिक विश्लेषण से कोसो दूर मार्क्सवाद के बिलकुल विरोध में है. यह संकट का यह बुनियादी कारण नहीं है, बल्कि संकट के बुनियादी कारण की एक अभिव्यक्ति है. स्टॅलिन कहते है:
"उत्पादक शक्तियों के चरित्र और उत्पादन के संबंध के बीच ये असंगत विरोधाभास, खुद को अतिउत्पादन के आवधिक संकट के समय महसूस कराता है जब पूंजीपति खुद अपने द्वारा लाये आबादी के व्यापक हिस्से के बर्बादी के कारण अपने माल के लिय कोई प्रभावी मांग नहीं पा कर उत्पादों को जलाने, निर्मित की गयी वस्तुओ को नष्ट करने, उत्पादन को स्थगित करने और उत्पादक शक्तियों को नष्ट करने के लिए एक ऐसे समय में मजबूर होते है जब लाखो की संख्या में लोग बेरोजगारी और भुखमरी के शिकार इस लिए नहीं हो रहे होते कि बस्तुये प्रयाप्त नहीं है बल्कि इस लिए हो रहे होते है क्योकि वस्तुओं का अतिउत्पादन हो गया है."
इसका मतलब है कि पूंजीवादी उत्पादन सम्बन्ध का समाज के उत्पादक शक्तियों के साथ सामंजस्य ख़त्म हो चूका है और वे अब उसके साथ असंगत विरोधाभास में है.
इसका मतलब है कि पूँजीवाद के गर्भ में क्रान्ति परिपक्व हो चूकी है जिसका मिशन उत्पादन के साधनों के मौजूदा पूंजीवादी स्वामित्व को बदल कर समाजवादी स्वामित्व में बदलना है".
वास्तव में पूँजीवाद का यह बुनियादी विरोधाभास –उत्पादन के सामजिक चरित्र और हस्तगतकरण के व्यक्तिगत निजी स्वरुप का विरोधाभास- न केवल पूंजीवादी आर्थिक संकट के मूल में है बल्कि मार्क्स के वैज्ञानिक समाजवाद का आधार भी है जो उन्हें उन तमाम कल्प्नावादी समाजवादियो से अलग करते है जिसकी विषद व्याख्या से मार्क्सवादी साहित्य भरा पड़ा है.
वैज्ञानिक समाजवाद का भौतिक आधार
२३ अक्टूबर १८८४ को मार्क्स की पुस्तक "दर्शन की दरिद्रता" की अपनी पहली भूमिका में फ्रेडरिक एंगेल्स लिखते है:
"अगर प्रवृत्तियों पर ध्यान न दे तो जहाँ तक आधुनिक समाजवाद, बुर्जुआ राजनीतिक अर्थव्यवस्था से शुरू होता है, लगभग बिना किसी अपवाद के रिकार्डो के मूल्य के सिद्धांत को आधार बनाता है. १८१७ में रिकार्डो ने अपने "प्रिंसिपल्स" के ठीक शुरुआत में ही जिन दो प्रस्थापनाओं की घोषणा की वे है,
किसी भी वस्तु के मूल्य विशुद्ध रूप से और पूरी तरह से इसके उत्पादन के लिए आवश्यक श्रम की मात्रा से निर्धारित होता है, और है कि
पूरे सामाजिक श्रम के उत्पाद तीन वर्गों में विभाजित किया जाता है: जमीन मालिकों (किराया), पूंजीपतियों (लाभ) और श्रमिकों (मजदूरी)
ये दो प्रस्थापनाएं १८२१ से ही समाजवादी निष्कर्षो के लिए उपयोग किया गया था और कुछ हद तक उस सटीकता और संकल्प के साथ यह साहित्य, जिसे लगभग भुला दिया गया था और जिसे मार्क्स ने फिर से खोज निकाला, पूँजी के आने तक नायाब बना रहा."
एंगेल्स आगे कहते है कि रिकार्डो का यह सिद्धांत कि सम्पूर्ण सामजिक उत्पाद पर हक मजदूरों का ही है क्यों कि वे ही उसके एक मात्र असली निर्माता है, अपने निष्कर्षो में सीधे समाजवाद की तरफ ले जाता है. लेकिन मार्क्स की नजर में यह औपचारिक आर्थिक दृष्टि से सही नहीं था क्योकि यह सिर्फ नैतिकता का अर्थशास्त्र के ऊपर लागू करना था. बुर्जुआ अर्थशाश्त्र के नियम के अनुसार, उत्पाद के बड़े हिस्से पर मजदूरों को हक नहीं होता जिन्होंने इसे उत्पादित किया है. और अगर अब हम कहे : यह न्यायसांगत नहीं है, और ऐसा नहीं होना चाहिए, तो इसका तात्कालिक सम्बन्ध अर्थशास्त्र से नहीं है. हम सिर्फ इतना कह रहे होते है कि यह तथ्य हमारी नैतिकता के बोध से टकराता है. इसलिए मार्क्स ने अपने कम्युनिस्ट समाज की मांग इन आधारों पर कभी नही की, इस तथाकथित नैतिकता को वैज्ञानिक समाजवाद का आधार नहीं बनाया.
तो फिर समाजवाद के आगमन के भौतिक आधार, वैज्ञानिक आधार क्या है? लेनिन लिखते है :
".... पूंजीवादी समाज के समाजवादी समाज के रूपांतरण की अनिवार्यता का निष्कर्ष मार्क्स ने पूर्णतः आधुनिक समाज की गत्यात्मकता के आर्थिक नियम से ही निकाला है. मार्क्स के देहावसान के बाद की आधी सदी के दौरान श्रम का समाजीकरण, जो हजारो रूप में अधिकाधिक शीघ्रतापूर्वक आगे बढ़ रहा है तथा जो विशाल उद्धोग, पूंजीपतियों के कार्टेलो, सिंडीकेटो, ट्रस्टों के विकास और साथ ही वित्त पूँजी की मात्रा तथा क्षमता की वृहद् वृद्धि में विशेष रूप से प्रत्यक्ष हुआ- यह है समाजवाद के अनियार्य आगमन का मुख्य भौतिक आधार. इस रूपांतरण की भौतिक तथा नैतिक चालाक शक्ति और भौतिक निष्पादक खुद पूँजीवाद द्वारा पोषित सर्वहारा वर्ग है."
लेनिन आगे कहते है:
"बुर्जुआ वर्ग के विरुद्ध सर्वाहारा वर्ग का संघर्ष, जो विभिन्न, सतत अधिक सार-संपन्न होते रूपों में प्रकट होता है, अनियार्यतः सर्वहारा वर्ग द्वारा राजनैतिक सत्ता पर विजय ("सर्वहारा वर्ग के अधिनायकत्व") की ओर प्रवृत राजनैतिक संघर्ष बन जाता है. यह हो ही नहीं सकता की उत्पादन का सामाजिकरण उत्पादन के साधनॉ के सामजिक परिवर्तन की ओर, "संपत्ति-अपहरण करनेवालो की संपत्ति के अपहरण" की ओर न ले जाए."
ऊपर के विश्लेषण से यह स्पष्ट है कि पूँजीवाद में संकट का बुनियादी कारण उत्पादन के सामजिक चरित्र और उत्पादन के परिणामो के हस्तगतिकरण के पूंजीवादी स्वरूप के बीच विरोधाभास में निहित है. और यही वैज्ञानिक समाजवाद का भौतिक आधार भी है. पूँजीवाद के इस बुनियाद की अभिव्यक्ति कई रूपों में होती है, लेकिन वे बुनियादी कारण नहीं होते. लेकिन कुछ लोग इस बुनियादी अंतर्विरोध के किसी एक अभिव्यक्ति, जैसे मजदूरों की गरीबी, बदहाली के चलते क्रय शक्ति में कमी जनित प्रयाप्त उपभोग या खपत का आभाव, लाभ के दर में ह्रास के नियम की प्रवृति, विक्रय और क्रय में अलगाव या पूर्ति का मांग से अधिक होना, उत्पादन के विभिन्न शाखाओ में संतुलन के आभाव के चलते प्रत्यक्षीकरण की अस्म्भाविता आदि को ही संकट का बुनियाद कारण के रूप में पेश करते है. ऐसा कर के वे न केवल संकट के बुनियादी कारण पर पर्दा डालते है बल्कि संकट के सामाधान का तरह तरह का नुस्खा पेश करते है, जो मजदूर वर्ग के लिए तो कोई काम का नहीं होता, बुर्जुआ वर्ग उसका सहारा ले कर संकट से पार पाने का असफल प्रयास जरुर करता है.
साम्राज्यवाद के युग में यह अंतर्विरोध और भी तीखा होता जाता है. यह मरणासन्न पूंजीवाद है. इस सम्बन्ध में स्टॅलिन द्वारा किये गए इस मरणासन्न पूंजीवादी समाज के अंतर्विरोध की चर्चा की ओर हम पाठको का ध्यान खीचना चाहेगे.
स्टालिन ने "सी.पी.एस.यु.(बी) के XV कांग्रेस के लिए केंद्रीय समिति के राजनीतिक रिपोर्ट में उत्पादन क्षमता का विकास और बाजार की सापेक्षिक स्थिरता के बीच के विरोधाभास की चर्चा करते हुए कहते है:
"उत्पादन क्षमता का विकास और बाजार की सापेक्षिक स्थिरता के बीच का यह विरोधाभास इस तथ्य के जड़ में निहित है कि बाजार की समस्या आज पूँजीवाद की मूलभूत समस्या है. सामान्य रूप में बाजार की समस्या की अपवृद्धि, और विशेष रूप से विदेशी बाजारों की समस्या की अपवृद्धि, और ख़ास तौर पर ऐसे में पूंजी के निर्यात के लिए बाजारों की समस्या की अपवृद्धि – ऐसी है पूंजीवाद की वर्तमान स्थिति। वास्तव में, ये यही बताते है कि क्यों अपनी क्षमता से कम काम करना मिलों और कारखानों के लिए एक आम बात होती जा रही है." स्टालिन, "सी.पी.एस.यु.(बी) के XV कांग्रेस के लिए केंद्रीय समिति के राजनीतिक रिपोर्ट, अंग्रेजी संस्करण, खंड. X, पेज 281-2
यहाँ स्टॅलिन बताते है कि उत्पादन क्षमता का विकास और बाजार की सापेक्षिक स्थिरता के बीच का विरोधाभास मिलों और कारखानों को अपनी क्षमता से कम पर काम करने की रूप में अभिव्यक्त होता है. आज साम्राज्यवादी युग के पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली का यह एक प्रमुख अभिलक्षण बनता जा रहा है. क्या यह पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली के अंतर्विरोध को व्यक्त नहीं करता? आज अति-उत्पादन का संकट न केवल कुल सामजिक उत्पाद (उपभोक्ता की वस्तुओं और उत्पादन के साधनो एवं कच्चे मालो) के अति-उत्पादन के रूप में, बाजार में इन मालो के पट जाने के रूप में अभिव्यक्त हो रहा है बल्कि यह उत्पादन के विराट साधनों के एक हिस्से का बेकार निठल्ले पड़े रहने की बाध्यता के रूप में भी, मिलों और कारखानों को अपनी क्षमता से कम पर काम करने की मजबूरी के रूप में भी अधिकाधिक अभिव्यक्त हो रहा है जिस तथ्य को हमारे क्रन्तिकारी साहित्य में शायद बहुत ही कम जगह मिल पायी है और जिसकी ओर और ज्यादा ध्यान देने की जरुरत है, इस अंतर्विरोध का भी एक समग्र लेखा जोखा ले कर एक सम्पूर्ण तस्वीर खीचने की जरुरत है.
हम यहाँ २००५ में श्रीमान अजीज के द्वारा किये गए अध्यन की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहेगे जिन्होंने भारतीय विनिर्माण उद्धोग में १९८० से ले कर १९९८ तक की अवधि का उत्पादन क्षमता के औसत उपयोग का एक चित्र प्रस्तुत करने का प्रयास किया है और जिसके विवरण की चर्चा विशेश्वर गोलदार और वी. एस. रंगनाथन के अपने आधार दस्तावेज़(वोर्किंग पेपर) Import Penetration and Capacity Utilization in Indian Industries में की गयी है . उनके अध्यन के अनुसार १९८०-८५ की तुलना में १९८५-९० की अवधि में उत्पादन क्षमता के औसत उपभोग में वृद्धि दिखाई पड़ती है जबकि १९९२ से १९९८ की अवाधि में उत्पादन क्षमता के इस औसत उपभोग में गिरावट होती है. बाद में इस आधार दस्तावेज़ ने अपने खुद के अध्यन की चर्चा करते हुए कहता है कि १९९५ से २००० तक यह औसत उपभोग में लगातार गिरावट रही पर २००१ में कुछ सुधार आया और २००१ से २००४ तक इस औसत उपभोग में वृद्धि होती रही. http://www.iegindia.org/workpap/wp293.pdf इस तरह अर्थव्यवस्था में उत्पादन क्षमता के औसत उपयोग की दर में वृद्धि और ह्रास उत्पादन क्षेत्र से बाहर बाजार में माल पड़े रहने के अतिउत्पादन के चक्रीय संकट की जगह लेने लगते है. और शायद इसी लिए हमें आज मंदी की वह तस्वीर दिखाई नहीं पड़ती जिसने १९३० के दशक में पुरे पूंजीवादी विश्व को हिला कर रख दिया था. उत्पादन क्षमता के औसत उपयोग की दर में चक्रीय वृद्धि और ह्रास जीडीपी के वास्तविक वृद्धि दर में भी प्रतिविम्बित होता है. हम पाठको की सुविधा के लिए १९५१ से २०१४ तक का डाटा नीचे दे रहे है:
GDP history of India after Independence
Year | India's GDP at Current Prices(in crore rupees) | India's GDP at Current Prices in billion US $(Nominal GDP) | India's GDP at factor cost 2004-2005 prices | Real Growth rate % | |
1950-51 | 10,036 | 2,79,618 | |||
1951-52 | 10,596 | 2,86,147 | 2.3 | ||
1952-53 | 10,449 | 2,94,267 | 2.8 | ||
1953-54 | 11,378 | 3,12,177 | 6.1 | ||
1954-55 | 10,689 | 3,25,431 | 4.2 | ||
1955-56 | 10,861 | 3,33,766 | 2.6 | ||
1956-57 | 12,965 | 3,52,766 | 5.7 | ||
1957-58 | 13,255 | 3,48,500 | -1.2 | ||
1958-59 | 14,827 | 3,74,948 | 7.6 | ||
1959-60 | 15,574 | 3,83,153 | 2.2 | ||
1960-61 | 17,049 | $37.6793 | 4,10,279 | 7.1 | |
1961-62 | 17,992 | $39.9205 | 4,23,011 | 3.1 | |
1962-63 | 19,238 | $42.9009 | 4,31,960 | 2.1 | |
1963-64 | 21,986 | $49.2711 | 4,53,829 | 5.1 | |
1964-65 | 25,686 | $57.4708 | 4,88,247 | 7.6 | |
1965-66 | 26,895 | $60.5993 | 4,70,402 | -3.7 | |
1966-67 | 30,613 | $46.6698 | 4,75,190 | 1 | |
1967-68 | 35,976 | $51.0142 | 5,13,860 | 8.1 | |
1968-69 | 37,938 | $54.0164 | 5,27,270 | 2.6 | |
1969-70 | 41,722 | $59.473 | 5,61,630 | 6.5 | |
1970-71 | 44,382 | $63.5172 | 5,89,787 | 5 | |
1971-72 | 47,221 | 5,95,741 | 1 | ||
1972-73 | 51,943 | 5,93,843 | -0.3 | ||
1973-74 | 63,658 | 6,20,872 | 4.6 | ||
1974-75 | 74,930 | 6,28,079 | 1.2 | ||
1975-76 | 79,582 | 6,84,634 | 9 | ||
1976-77 | 85,545 | 6,93,191 | 1.2 | ||
1977-78 | 97,633 | 7,44,972 | 7.5 | ||
1978-79 | 1,04,930 | 7,85,965 | 5.5 | ||
1979-80 | 1,14,500 | 7,45,083 | -5.2 | ||
1980-81 | 1,36,838 | 7,98,506 | 7.2 | ||
1981-82 | 1,60,214 | 8,43,426 | 5.6 | ||
1982-83 | 1,78,985 | 8,68,092 | 2.9 | ||
1983-84 | 2,09,356 | 9,36,270 | 7.9 | ||
1984-85 | 2,30,526 | 9,73,357 | 4 | ||
1985-86 | 2,62,717 | 10,13,866 | 4.2 | ||
1986-87 | 2,92,924 | 10,57,612 | 4.3 | ||
1987-88 | 3,32,068 | 10,94,993 | 3.5 | ||
1988-89 | 3,96,295 | 12,06,243 | 10.2 | ||
1989-90 | 4,56,540 | 12,80,228 | 6.1 | ||
1990-91 | 5,31,814 | 13,47,889 | 5.3 | ||
1991-92 | 6,13,528 | 13,67,171 | 1.4 | ||
1992-93 | 7,03,723 | 14,40,504 | 5.4 | ||
1993-94 | 8,05,486 | 15,22,344 | 5.7 | ||
1994-95 | 9,55,386 | 16,19,694 | 6.4 | ||
1995-96 | 11,18,586 | 17,37,741 | 7.3 | ||
1996-97 | 13,01,788 | 18,76,319 | 8 | ||
1997-98 | 14,47,613 | 19,57,032 | 4.3 | ||
1998-99 | 16,68,739 | 20,87,828 | 6.7 | ||
1999-2000 | 18,58,205 | 22,54,942 | 8 | ||
2000-2001 | 20,00,743 | 23,48,481 | 4.1 | ||
2001-02 | 21,75,260 | 24,74,962 | 5.4 | ||
2002-03 | 23,43,864 | 25,70,935 | 3.9 | ||
2003 -04 | 26,25,819 | 27,75,749 | 8 | ||
2004-05 | 29,71,464 | 29,71,464 | 7.1 | ||
2005-06 | 33,90,503 | 32,53,073 | 9.5 | ||
2006-07 | 39,53,276 | 35,64,364 | 9.6 | ||
2007-08 | 45,82,086 | 38,96,636 | 9.3 | ||
2008-09 | 53,03,567 | 41,58,676 | 6.7 | ||
2009-10 | 61,08,903 | 45,16,071 | 8.6 | ||
2010-11 | 72,48,860 | 49,18,533 | 8.9 | ||
2011-12 | 83,91,691 | 52,47,530 | 6.7 | ||
2012-13 | 93,88,876 | 54,82,111 | 4.5 | ||
2013-14 | 1,04,72,807 | 57,41,791 | 4.7 |
https://en.wikipedia.org/wiki/Economic_history_of_India
प्रोलेतारियन पथ ने सितम्बर १९९४ के अंक में "The meaning of Dunkal" शीर्षक लेख प्रकाशित हुआ था जिसे साम्राज्यवाद के ऊपर छपे दुसरे लेख के साथ शामिल कर एक छोटी पुस्तिका के रूप में प्रकाशित किया गया था. इस लेख में "डंकल ड्राफ्ट" के सबसे विशिष्ट प्रावधानों की ओर इशारा करते हुए लेखक निष्कर्ष निकालता है कि Dunkal मसौदे की सबसे प्रमुख विशेषता उत्पादन की कटौती के लिए उनके प्रयास के रूप में दिखाई पड़ता है. फिर लेखक कहता है:
"जैसा कि हम जानते है पूंजीवादी दुनिया क्षमता के अप्रयाप्त उपयोग की पुरानी बिमारी से और वस्तुओ के अतिउत्पादन से ग्रस्त है. यह पूँजी और वस्तुओ के अतिउत्पादन के क्लास्सिक पूंजीवादी संकट को दर्शाता है." पेज १५
महामंदी पर लिखे अपनी पुस्तक में श्रम की उत्पादकता बनाम पूँजी की उत्पादकता पर नरेन्द्र कुमार द्वारा व्यक्त विचारो से पूरी तरह सहमत न होते हुए भी हम पाठको का ध्यान पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली की इस जटिल बाजार की समस्या की ओर नरेन्द्र कुमार के ही शब्दों में आकर्षित किये बिना नहीं रह सकते. उन्होंने लिखा है : "७० के ही दशक में ही पूंजीवादी दुनिया ने उत्पादन करने की जो क्षमता प्राप्त कर ली थी, उसका मात्र ६०-७० प्रतिशत ही उत्पादन कर पा रही है. पूंजीवादी दुनिया की समस्या, उत्पादकता को बढ़ाना नहीं अपितु इस बढ़ी हुई उत्पादकता से उत्पादित माल के बाजार का है." पेज २२५
और जयप्रकाश लल्लन ने कई लिहाज से बेहतरीन और पठनीय अपनी पुस्तक "साम्राज्यवाद और ईराकयुद्ध" में मंदी की तस्वीर पेश करते हुए कहते है: "बात ऐसी है कि इजारेदार कंपनिया एक दुसरे की प्रतिद्वंदिता में तथा बाजार से एक-दुसरे को धकेल बाहर करने की अहर्निश कोशिशो व् भविष्य में नए बाजार हड़पने की आशाओं के वातारण में मांग के हिसाब से अधिक उत्पादन करती रहती है और कहना न होगा कि इस क्रम में पूर्व से जारी अतिउत्पादन का समुद्र और गहरा हो जाता है. अमेरिकी ऑटोमोबाइल उद्धोग मांग से बीस (२०) लाख अधिक कार-निर्माण की क्षमता रखता है, मगर प्रतिवर्ष पच्चास हजार कम कारे बनाने की योजना पर चल रहा था क्योकि अतिउत्पादन के चलते उसे बाजार नहीं मिल पा रहा था. दो दशमलव एक (२.१) ट्रिलियन डालर के कर्ज में फंसा टेलीकम्युनिकेशन उद्धोग अपनी क्षमता का का अभी तीन (३) प्रतिशत ही उपयोग करने को बाध्य था." शिकागो ट्रिब्यूनल अखबार के हवाले से लेखक आगे कहता है "आपूर्ति मांग से अधिक है, जब ऐसा होता है, मशीन का चक्का जाम हो जाता है, निर्माण खर्च बढ़ता है, मजदूर हटाये जाने लगते है और निवेश को ठंडे बसते में डाल दिया जाता है" और भी "मालो का आधिक्य इस स्तर पर है कि दशको से ऐसा नहीं देखा गया." पेज ५९ ऐसा लगता है कि पूंजीवादी उत्पादन संबंधो की सीमा के अन्दर ये विराट उत्पादन शक्तिया कैद हो गयी है और उसमे उसका दम घुट रहा है. ये तथ्य न केवल पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली के तीब्रत्तम होते अंतर्विरोध को व्यक्त करते है बल्कि यह भी दर्शाते है कि आज पूंजीपति वर्ग किस हद तक अक्षम और अयोग्य हो गया है, कि इसे शासक वर्ग बने रहने का अब कोई औचित्य नहीं है, कि सामजिक पूँजी और तमाम उत्पादन के साधनों को पूंजीपति वर्ग से छीन कर पुरे समाज के हित में उपयोग करना आज क्यों जरुरी हो गया है और कि गांधी ने अपने जिस चहेते बुर्जुआ को पुरे समाज की तरफ से पूँजी की देखभाल करने वाले "ट्रस्टी" के रूप में अलंकारित किया था, वह सिर्फ अपने निजी हित में, न कि पुरे समाज के हित में इस सड़ी-गली मजदूरों और मिहनतकसो के शोषण के आधार पर टिकी मुनाफा की पूंजीवादी व्यवस्था को बनाए रखने के लिए कौन कौन सा तिकड़म अपना रहा है. ऐसी स्थिति में कोई भी इमानदार बुद्धिजीवी इस पूंजीवादी व्यवस्था के पक्ष में, इसे बचाए रखने के बारे में आज सोच भी कैसे सकता है? कैसे इसके पक्ष में खड़ा होने की हिम्मत भी कर सकता है? अजय कुमार अपनी पुस्तक "पूंजीवादी संकट, मंदी और विनाश – क्यों और कब तक?" में इस पूंजीवादी व्यवस्था को ठीक ही मानवद्रोही करार देते है.
संकट पर चर्चा करते समय पूंजीवादी व्यवस्था का यह मानव द्रोही पक्ष का सजीव चित्रण निश्चित रूप से हमारे दिलो को, मजदूर नवजवानों को झझकोरता है, उद्वेलित करता है और पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ एक राय या जनमत बनाने में मदद देता है. इसलिए ऐसे सजीव चित्र को हमारे वामपंथी साहित्य में उचित ही प्रयाप्त जगह मिलती है, जो जारी रहनी चाहिए. इसे और सजीव बनाने का, तथ्य परक बनाने का प्रयास होना चाहिए. लेकिन क्या इतना काफी है? क्या यहाँ यह बताना जरुरी नहीं है कि इसके पीछे बुनियादी कारण पूंजीवादी उप्तादन के अधिकाधिक सामाजिक चरित्र होने और हस्तगतकरण के व्यक्तिगत निजी स्वरुप के बीच विरोधाभास है? क्या यह बताना जरुरी नहीं है कि पूँजीवाद ने जिस तेजी से उत्पादन के चरित्र को सामजिक बनाया है और बनाता जा रहा है उसका टकराव व्यक्तिगत हस्गतकरण के स्वरुप से और अधिक तीखा होता जा रहा है जो संकट के मूल में है? क्या समाजवाद के भौतिक आधार - पूंजीवादी उत्पादन के अधिकाधिक सामाजिक चरित्र होने और हस्तगतकरण के व्यक्तिगत निजी स्वरुप के बीच विरोधाभास- जो मार्क्सवाद को तमाम कल्प्नावादी समाजवादियो से अलग करता है, को अपने विश्लेष्ण का आधार बनाना जरुरी नहीं है? क्या इस लिए किसी नैतिकता बस नहीं, बल्कि विश्व पूँजीवाद और भारतीय पूंजीवादी समाज के विकास के मार्क्सवादी वैज्ञानिक विशेलेषण के आधार पर बिना किसी संकोच के यह कहना अत्यंत आवश्यक नही है कि यह बुनियादी अंतर्विरोध समाजीकृत उत्पादन साधन और निजी पूंजीवादी हस्तगतकरण का अंतर्विरोध- समाज को अनियार्य रूप से एक समाधान के रूप में समाजवाद पेश कर रहा है? और क्या यह सच नहीं है कि जबतक पूँजीवाद रहेगा तबतक इस तरह के संकट आते रहे गे क्योकि पूँजीवाद अपने अंतरविरोधो को इसी संकट के द्वारा जबरन समायोजित करता है? मार्क्स ने संकट के बारे में इस प्रसंग में ठीक ही कहा है:
"विश्व व्यापार का संकट पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के सभी विरोधाभासों का वास्तविक केन्द्रीयकरण और जबरन समायोजन के रूप में माना जाना चाहिए." (MECW Vol. 32 p. 140)
आज भारत में संकट को ले कर कम्युनिस्ट पार्टियों की क्या स्थिति है? अजय कुमार ने अपनी पुस्तक में जनता के संसदीय बामपंथी मित्र (भाकपा, माकपा आदि) के बारे में ठीक ही लिखा है : "हम पहले से ही देखते आ रहे है कि भारत में मुख्य धारा के 'वाम' आर्थशास्त्री साम्राज्यवाद का विरोध पूँजीवाद से काट कर करते है. वे अच्छी प्रगतिशील और जनपक्षीय नीतियों के द्वारा पूंजीवाद के बेहतर मैनेजमेंट के प्रश्न को ही मुख्य रूप से उठाते है. प्रकारांतर में यह जर्जर मरणासन्न और सड़े हुए पूँजीवाद को सजा-सवार कर जवान दिखाने की पूंजीवादी कयवाद में बदल जाता है."
और नवजनवादी लोगो के बारे में वे लिखते है:
"खंड-खंड में बंटा क्रांतिकारी वामपक्ष(इशारा यहाँ नवजनवादी लोगो की तरफ है) का का अधिकांश अभी भी पुराने राजनीतिक चौखटटे में ही काम कार रहा है. 'भारत में पूँजीवाद के पूर्ण विकास का अभाव' भारत में साम्राज्यवाद के प्रभाव और इसलिए नवजनवादी क्रांति सम्बन्धी ख़ास तरह की पुरानी वैचारिक-राजनैतिक घेरेबंदी' और ऐसी ही अनेक बाते आज भी मजबूती से इनके बीच मौजूद है. इन सबका सही और सम्यक मूल्यांकन करने की आवश्यकता इनके बीच आज भी दिखाई नहीं देती है. आज के सन्दर्भ में, यानी, वर्तमान आर्थिक संकट और मंदी के सन्दर्भ में इनके साहित्य और प्रचार सामग्रियों में यह भारी द्वन्द मौजूद है कि इस संकट की मार्क्सवादी व्याख्या कैसे की जाए. आर्थिक संकट और मंदी, जिसमे भारत स्वयम अपने कारणों से भी फंसा हुआ है, इन्हें एक तरफ खुल कर पूंजीवादी संबंधो को पार करने, पूँजीवाद को उखार फेकने और समाजवादी रूपांतरण के लिए संघर्ष करने की आवश्यकत पर बल देने के लिए बाध्य कर रही है, तो वही दुसरे तरफ पुराने फ्रेमवर्क और राजनैतिक चौखाटे से अतिशय प्रेम इस पर भारी पड़ रहा है."
भारत के कम्युनिस्ट आन्दोलन में जनवादी, नव जनवादी क्रांति के चौखटे से १९७५-७६ से ही जो लोग बाहर निकल कर भारतीय अर्थव्यवस्था में पूँजीवादी सम्बन्ध की प्रधानता देख सके वे पूँजीवाद के इस बुनियादी अंतर्विरोध –उत्पादन के सामजिक चरित्र और हस्तगतकरण के निजी स्वरुप –को अर्थव्यवस्था में उभरते हुए देखे बिना नहीं रह सकते थे. समाजवादी क्रांति का नारा देने वाले लगभग हर संगठन की इस बुनियादी अंतर्विरोध के प्रति सजगता बढ़ी है और उनके साहित्य में इस बुनियादी अंतर्विरोध की ध्वनि कभी स्पष्टता के साथ तो कभी अस्पष्ट रूप से प्रतिविम्बित हुई है. इकमे, बिगुल आदि मोनी गुहा के ज़माने का प्रोलेतारियन पथ और अब कम्युनिस्ट सेण्टर ऑफ़ इंडिया, (कम्युनिस्ट वौइस् और मजदूर पत्रिका) के सुनील सेन, पी.आर. सी.(एम्. एल.) के अजय कुमार, वैज्ञानिक समाजवाद के नरेन्द्र कुमार, और यहाँ तक कि अरुण फरेरा, जो एक लेखक, कलाकार और कार्यकर्ता हैं, और जिन्हें झूठे आरोपों के तहत कई वर्षों तक जेल में रहना पड़ा था, और जो संभवतः नवजनवादी धारा से जुड़े है, भी इसके अपवाद नहीं है.
लेकिन यह भी सच है कि सर्वहारा क्रांति या समाजवादी क्रांति का नारा देने वाले हमारे ये समाजवादी क्रांतिकारी मित्रो को चुकि राष्टीय जनवादी क्रांति(भाकपा) या जनवादी क्रांति (माकपा) या नवजनवादी क्रांति (सीपीआई –एम् एल के विभिन्न शाखाये) से कार्यक्रम के सवाल पर संघर्ष कर के अपने को मजदूर आन्दोलन में सर्वहारा क्रान्ति या समाजवादी क्रांति के चरण को स्थापित करना था और क्योकि इनके साथ कार्यक्रम के सवाल पर मुख्य मुद्दा सामन्तवाद के अवशेष की मात्रा या पूँजीवाद के भारतीय अर्थव्यवस्था में पैठ की सीमा या उसकी नवऔपनिवेशिक व्याख्या के इर्द गिर्द होती रही इसलिए इनके साहित्य में, विशेष रूप से, भारतीय क्रांति की समस्या, स्वरुप या क्रांति के चरण के निर्धारण करने सम्बंधित इनके साहित्य में, समाजवादी क्रांति के वह भौतिक आधार यानी पूँजीवाद के बुनियादी अंतर्विरोध –पूंजीवादी विकास के साथ साथ उत्पादन के अधिकाधिक सामजिक चरित्र और हस्तगतकरण के निजी स्वरुप के बीच विरोधाभास – को जगह नहीं मिली जिसकी चर्चा हमने इस लेख में ऊपर की है और जिसकी चर्चा क्लासिकल मार्क्सवादी साहित्य में बहुत जोर दे कर की गयी है. उसके बदले इन्होने माना कि आजादी के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था में, विशेष तौर से कृषि में, पूँजीवाद प्रशियाई रास्ते से भूमि सुधार के द्वारा दाखिल हुआ और धीरे धीरे पूंजीवादी सम्बन्ध प्रधान होते चले गए और आज अगर सामंती अवशेष है भी तो वह संस्कृति में है या अर्थव्यवस्था में अगर है भी तो वे बहुत थोड़े है, या प्रधान नहीं है और क्योकि राज्यसत्ता का चरित्र पूंजीवादी है इसलिए क्रांति का चरण जनवादी नहीं बल्कि समाजवादी ही हो सकता है. SUCI (C ) अपनी कार्यनीति और रणनीति को इस आधार पर अलग करते है कि SUCI (C ) १९४७ में ही भारतीय सत्ता में राष्टीय बुर्जुआ के सत्तासीन होने के साथ ही समाजवादी क्रांति का चरण मानता है जबकि उस समय अर्थव्यवस्था में सामंती सम्बन्ध अभी भी प्रबल थे. भारतीय अर्थव्यवस्था में बढ़ते हुए श्रम के सामाजिकरण के, उत्पादन प्रक्रिया के सामजिक चरित्र के विकास के और इसका पूंजीवादी निजी हस्तगतकरण के स्वरुप से बढ़ता हुआ विरोधाभास सम्बन्धी तथ्यों का आभाव आज भी समाजवादी क्रांतिकारी साहित्य, जिसमे SUCI (C ) भी शामिल है, के मुख्य लक्षण है. लेकिन संकट पर इस छोटे से लेख में इन पर विस्तार से चर्चा करना यहाँ संभव नहीं है. संकट से सम्बंधित दुसरे मुद्दे जैसे संकट का मजदूरों पर प्रभाव, एक ओर तो पूंजीपति वर्ग की सरकार इससे निजात पाने के लिए पूंजीपतियों को तरह तरह के बैलआउट पैकेज की घोषणा करता है तो दूसरी ओर मजदूर वर्ग के खिलाफ कानूनी सुधार करता है, सामाजिक कल्याण की राशि में कटौती करता है तो दूसरी ओर पूंजीपतियों के लिए टैक्स में छुट देता है आदि आदि पर समाजवादी क्रन्तिकारी साहित्य में विस्तार से वर्णन मिलता है, और इस लिए हमने यहाँ इस लेख में उसका वर्णन नहीं किया है. हम इस मुद्दे पर और कुछ अन्य मुद्दों पर अपने लेख के दुसरे भाग में चर्चा करने का प्रयास करेगे.
द्वंदात्मक एवं ऐतिहासिक भौतिकवाद में स्तालिन ठीक ही कहते है:
"एक उदहारण जिसमे उत्पादन सम्बन्ध उत्पादक शक्तियों के चरित्र के साथ मेल नहीं खाते, उनसे टकराते है, पूंजीवादी देशो का आर्थिक संकट है, जहाँ उत्पादन के साधनों का निजी पूंजीवादी स्वामित्व उत्पादन प्रक्रिया के, उत्पादक शक्तियों के सामजिक चरित्र से विरोध बहुत स्पष्टता से प्रकट होता है. यह आर्थिक संकट का कारण बनता है, जो उत्पादक शक्तियों के विनाश का करण बनता है. इसके अलावे यह विरोध अपने आप में सामजिक क्रांति का आधार होता है, जिसका उदेश्य अस्तित्वमान उत्पादन सम्बन्ध को नष्ट कर के उत्पादक शक्तियों के चरित्र के अनुरूप नया उत्पादन सम्बन्ध बनाना होता है."
और भी
"उत्पादक शक्तियों के चरित्र और उत्पादन के संबंध के बीच ये असंगत विरोधाभास, खुद को अतिउत्पादन के आवधिक संकट के समय महसूस कराता है जब पूंजीपति खुद अपने द्वारा लाये आबादी के व्यापक हिस्से के बर्बादी के कारण अपने माल के लिए कोई प्रभावी मांग नहीं पा कर उत्पादों को जलाने, निर्मित की गयी वस्तुओ को नष्ट करने, उत्पादन को स्थगित करने और उत्पादक शक्तियों को नष्ट करने के लिए एक ऐसे समय में मजबूर होते है जब लाखो की संख्या में लोग बेरोजगारी और भुखमरी के शिकार इसलिए नहीं हो रहे होते कि बस्तुये प्रयाप्त नहीं है बल्कि इस लिए हो रहे होते है क्योकि वस्तुओं का अतिउत्पादन हो गया है."
इसका मतलब है कि पूंजीवादी उत्पादन सम्बन्ध का समाज के उत्पादक शक्तियों के साथ सामंजस्य ख़त्म हो चूका है और वे अब उसके साथ असंगत विरोधाभास में है.
इसका मतलब है कि पूँजीवाद के गर्भ में क्रान्ति परिपक्व हो चुकी है जिसका मिशन उत्पादन के साधनों के मौजूदा पूंजीवादी स्वामित्व को बदल कर समाजवादी स्वामित्व में बदलना है."
पूंजीवाद के गर्भ में क्रांति परिपक्व हो चुकी है, और हर आर्थिक संकट चीख चीख कर हमें यही कहता है –आर्थिक संकट का समाधान सिर्फ और सिर्फ समाजवाद में, उत्पादन के मौजूदा पूंजीवादी स्वामित्व को समाजवादी स्वामित्व में परिवर्तन में है और जबतक यह नहीं किया जाता, बार बार आने वाले संकट के कहर से बचने का कोई उपाय नहीं है. लेकिन इस समाजवादी समाधान के लिए आत्मगत परिस्थितियों का भी परिपक्व होना जरुरी है. संकट का सबसे ज्यादा असर मजदूर वर्ग पर ही पड़ता है. और यह काम भी मजदूर वर्ग और उसकी क्रन्तिकारी पार्टी ही कर सकती है, सर्वहारा की तानाशाही की स्थापना कर के एक ऐसे समाज के निर्मार्ण की तरफ कदम बढ़ाया जा सकता है जो सर्वप्रथम सोवियत रूस में स्थापित हुआ था और जहाँ एक ऐसी दुनिया बनायीं गयी थी जो संकट ही नहीं, हर तरह की गरीबी, भुखमरी व्यभिचार या यो कहे कि पूंजीवादी जगत के हर बुराई से मुक्त समाज था, जिसे देख कर एक समय पूरी दुनिया मुग्ध थी और साम्यवाद के कट्टर से कट्टर दुश्मन भी उसकी सफलता पर दातो तले अंगुली दबाते थे. हम एंगेल्स के एक बहुत ही प्रेरक और सटीक उद्दहरण से अपनी बात समाप्त करते है :
"लेकिन ये आविष्कार और खोजें, जो नित्य बढ़ती हुई गति से एक दूसरे से आगे बढ़ रही हैं, मानव-श्रम की उत्पादनशीलता, जो दिन-ब-दिन इतनी तेज़ी के साथ बढ़ रही है कि पहले सोचा भी नहीं जा सकता था, अन्त में जाकर एक ऐसा टकराव पैदा करती हैं, जिसके कारण आज की पूँजीवादी अर्थव्यवस्था का विनाश निश्चित है। एक ओर, अकूत धन-सम्पत्ति और मालों की इफ़रात है, जिनको ख़रीदार ख़रीद नहीं पाते; दूसरी ओर, समाज का अधिकांश भाग है, जो सर्वहारा हो गया है, उजरती मज़दूर बन गया है और जो ठीक इसीलिए इन इफ़रात मालों को हस्तगत करने में असमर्थ है। समाज के एक छोटे-से अत्यधिक धनी वर्ग और उजरती मज़दूरों के एक विशाल सम्पत्तिविहीन वर्ग में बँट जाने के परिणामस्वरूप उसका ख़ुद अपनी इफ़रात से गला घुटने लगता है, जबकि समाज के सदस्यों की विशाल बहुसंख्या घोर अभाव से प्रायः अरक्षित है या नितान्त अरक्षित तक है। यह वस्तुस्थिति अधिकाधिक बेतुकी और अधिकाधिक अनावश्यक होती जाती है। इस स्थिति का अन्त अपरिहार्य है। उसका अन्त सम्भव है। एक ऐसी नयी सामाजिक व्यवस्था सम्भव है, जिसमें वर्त्तमान वर्ग-भेद लुप्त हो जायेंगे और जिसमें–शायद एक छोटे-से संक्रमण-काल के बाद, जिसमें कुछ अभाव सहन करना पड़ेगा, लेकिन जो नैतिक दृष्टि से बड़ा मूल्यवान काल होगा–अभी से मौजूद अपार उत्पादक-शक्तियों का योजनाबद्ध रूप से उपयोग तथा विस्तार करके और सभी के लिए काम करना अनिवार्य बनाकर, जीवन-निर्वाह के साधनों को, जीवन के उपभोग के साधनों को तथा मनुष्य की सभी शारीरिक एवं मानसिक शक्तियों के विकास और प्रयोग के साधनों को समाज के सभी सदस्यों के लिए समान मात्र में और अधिकाधिक पूर्ण रूप से सुलभ बना दिया जायेगा।" मार्क्स की पुस्तक "मजदूरी श्रम और पूँजी" पर फ्रेडरिक एंगल्स द्वारा लिखित भूमिका से