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Friday, 28 May 2021

मराठी दलित कविता *गांधी जन्म शताब्दी पर* (दया पवार)



 अबे..... भोसड़ी के !
नीचे  बैठ 
 वह शर्मिंदा होकर बैठ गया
 गांधी  जन्म शताब्दी  पर
 धुआं उगलने वाली चिमनी कुछ पल के लिए रुक गई

सभी खातों में सन्नाटा छा गया।
 खड़खड़ाने वाले मशीनी पहिए चाप पर कान धरने लगे
 माथे का पसीना पोंछते हुए 
कामगारों का  हुजूम इकट्ठा हुआ

 वो आ गये ...  वो गये ...
 सभी एड़ियाँ उठा कर गेट की ओर देखने लग

 अखाड़े में
 जैसे पहलवान उतरते हैं, वैसे ही थके थके कदमों के साथ रहनुमा मंच पर चढ़ गए।
 
 " भाईयो.......!
 राष्ट्रपिता कहते थे कि... हरिजन ईश्वर की  संतान  
 उगते सूरज की डिस्क की तरह
 उनका खून भी लाल है........

 तालियों की गड़गड़ाहट के साथ  भाषण समाप्त हुआ।

 राष्ट्रपिता की प्रतिमा का अनावरण हुआ।

 " कांबले  हार ला.....

 सूती लड़ी के हार
 वे दौड़ते हुए आए और कण्ठ माला की तरह गले से चिमट गए

 "कांबले प्रसाद बांट  ..."

 कांबले आगे बढ़ा
अचानक सभा में मराठी अंदाज़ में स्वर गूंजा

 "अबे। भड़वी के....... ! तुमने सारा प्रसाद नापाक कर दिया "

 बिजली का शॉक लगा हो जैसे
सारे हाथ खिंच कर रह गए

 गांधी जी की जय जय कार में
 कामगार अपने अपने  खाते में वापस लौट आए

  चिमनी दोबारा धुवां उगलने लगी
 मशीनी पहिये  खड़खड़ाने  लगे
 शाम हुई

 पल भर में क्षितिज पर अंधेरा  छा गया।

Sunday, 28 March 2021

कौन हैं वे लोग

गुजराती दलित कविता
राजु सोलंकी
अनुवाद: डॉ.जी. के. वणकर

कौन हैं वे लोग

आप चर्चा कर रहे हैं
उस स्टेडियममें बैठे लोगोंने मास्क पहने थे या नहीं
एकदूसरेसे दो गज की दूरी बनायी थी या नहीं
मुझे मालूम है आप ऐसा ही फालतू चर्चा करेंगे
आप कभी भी पूछेंगे नहीं कि
सचमुच वे लोग हैं कौन?
कुम्भमेलेमें करोड़ो हिंदुओंकी विष्टा 
जिन्होंने सर पर ढोयी थी, 
ये वो लोग हैं?
जिनके पाँव प्रधान सेवक ने धोये थे 
क्या ये वही लोग हैं?
दाहोद और गोधरा, राजपीपला और छोटा उदेपुर से 
यहीं अहमदाबादमें 
रास्ते बनाते, मेट्रो के वास्ते गड्ढे खोदनेवाले है ये लोग?
नही,ये वो लोग नहीं हैं
ये तो और ही ग्रहसे आये हैं
कोरोना उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता
उनके शरीरसे पसीना नहीं बहता
उन्हें पेट्रोल या डिझल, सोना या चाँदी
किसीकी महंगाई नहीं अखरती.
यहाँ स्टेडियममें वे उत्सव मना रहै हैं
उनकी सफलता
उनका हर्षोल्लास तो देखो
शेयर बाज़ार की तेज़ी का कैफ है
उनके चेहरों पर.
आपकी चाली के बदबूदार संडास से दूर
आपकी गटरों की गंदगी से परे
कहीं दूर
उनकी अलग दुनिया है.
आपके और उनके बीच सिर्फ नाराबाजीका रिश्ता है
भारत माता की जय 
जय श्री राम
वन्दे मातरम
कान में  कहता हूँ
किसी को बताना मत
ये लोग इक्कीसवीं सदी के अंग्रेज है.
छप्पन के अकालके दौरान खेलते थे अंग्रेज
वही खेल खेल रहे हैं ये अंग्रेज कोरोना काल के.

१९५३ में स्टालिन की शव यात्रा पर उमड़ा सैलाब 

*On this day in 1953, a sea of humanity thronged the streets for Stalin's funeral procession.* Joseph Stalin, the Soviet Union's fea...