वर्णमाला जिससे,
हम कोई शब्द बनाते हैं
गढ़ते हैं कोई वाक्य
जैसे
'दुनिया के मज़दूरो एक हो!'
वैसे ही जैसे
हम एक-एक जन जोड़कर
बनाते हैं कोई जुलूस।
वे एक-एक वर्ण को
निगल जाना चाहते हैं
एक-एक साथी को
निगल जाना चाहते हैं
ताकि हम कोई वाक्य न बना सकें
कोई जुलूस न बना सकें।
{ १९८२, 'लुटेरों का जश्न' कविता संग्रह से }
ओम प्रकाश रमण