Tuesday, 1 June 2021

‘बच्चे और बहेलिए’(कवितांश)



वर्णमाला जिससे,
हम कोई शब्द बनाते हैं 
गढ़ते हैं कोई वाक्य 
जैसे 
'दुनिया के मज़दूरो  एक हो!'
वैसे ही जैसे 
हम एक-एक जन जोड़कर 
बनाते हैं कोई जुलूस।
वे एक-एक वर्ण को
निगल जाना चाहते हैं 
एक-एक साथी को 
निगल जाना चाहते हैं 
ताकि हम कोई वाक्य न बना सकें 
कोई जुलूस न बना सकें।

 { १९८२, 'लुटेरों का जश्न' कविता संग्रह से }

ओम प्रकाश रमण

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