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Saturday, 5 June 2021

जाति

आज 6 दिसम्बर  दलितों बुद्धिजिवियों का मुहर्रम है और 14 अप्रैल नीला रंग का रामनवमी होता है ! 

ब्राह्मण के एक छोटे से हिस्से ने  मनुस्मर्ति लिखा जिसका प्रभाव आंशिक रूप से ही  था जिसे अम्बेडकर ने लोकप्रिय बनाया ! दुसरा आधुनिक युग का संविधान जो हमारे लिए मनुस्मृति ही है उसे अम्बेडकर ने संवैधानिक रूप से लागु करवाया ! अम्बेडकर तब संविधान सभा में मुस्करा रहे थे जब उन्हें व्यंग के रूप में आधुनिक युग के मनुस्मृति के रचनाकार की उपाधि से नवाजा जा रहा था ।
 
ब्राह्मणों के मनुस्मृति और अम्बेडकर के द्धारा लिखवाए गए मनुस्मृति दोनों ने हमारे हितों और  अधिकारों की अनदेखी की ! 

दुसरी और ब्राह्मणों के लिखे साहित्य से हमारे जनसमान्य लोग भ्रमित हुए ! लेकिन दलितों के लिखे साहित्य से हम जैसे चेतना संपन्न लोग अपना आत्मविश्वाश खोकर , भ्रमित ही नहीं नफरत और घृणा का भाव लेकर जीने लगे ! 

अब इनसे निकलने और निकालने का समय आ गया है ।



Caste (जाति)

Criticizing the wrong conception concerning the process of history in general and the idealist conception of post-Hegelians in Germany in particular, Marx made the following observations on caste in "The German Ideology":

"When the crude form of the division of labour which is to be found among the Indians, and Egyptians calls forth the caste-system in their state and religion, the historian believes that the caste-system is the power which has produced this crude social form." (Moscow edition 176, p. 63)

This is a question of whether division of labour gave rise to castes or castes gave rise to division of labour. According to Marx, division of labour is primary. The same formed into caste occupations in the subsequent period. While this was the situation, historians assumed castes as primary and they gave rise to division of labour. Hence, Marx criticized such historians.

How could castes emerge in the society in the beginning? If they emerged so, there must be some cause. If there were a cause, such cause would be the fundamental point.


जाति WSP

अपनी पुस्तक 'जाति का सफ़ाया' (Annihilation of Caste) में अम्बेडकर जाति-उन्मूलन का प्रस्ताव रखते हुए, तरकश में दो तीर रखता है। एक आरक्षण और दूसरा अंतर्जातीय विवाह!
आरक्षण, सात दशक फलीभूत होता रहा इसलिए इस पर हमें सैद्धान्तिक चर्चा की जरूरत ही नहीं है, प्रैक्टिस से ही पूरा खुलासा हो रहा है। आरक्षण का लाभ, जैसा अपेक्षित ही था, दो प्रतिशत लोगों ने निगल लिया और शेष 98 प्रतिशत को दमन, शोषण, उत्पीड़न का वही नर्क झेलना पड़ रहा है। व्यापक दलित, दमित, मेहनतकश जनता के लिए आरक्षण बेमानी रहा।
अब आइए अंतर्जातीय विवाह के अम्बेडकरी प्रस्ताव की भी शव-परीक्षा कर ली जाय जो फलीभूत नहीं हुआ। यह दूसरा प्रस्ताव तो जाति-उन्मूलन के मामले में पहले से भी बड़ा प्रहसन है। पहली बात तो यह कि सिद्धांत रूप में भी यह प्रस्ताव एकतरफा है। यानि यदि ब्राह्मण की बेटी, दलित के बेटे से विवाह करे तो यह फलीभूत नहीं होगा चूंकि तब दम्पति के बच्चों को फिर दलित जाति ही नसीब होगी। दूसरे ब्राह्मण और दलितों में लड़के-लड़कियों का अनुपात 50:50 में लिया जाय और वे सब अंतर्जातीय विवाह करें तो भी वापस हम वहीं पहुंच जाएंगे। फिर उतने ही ब्राह्मण और उतने ही दलित हो जाएंगे। अम्बेडकर का फ़ॉर्मूला तभी सफ़ल हो सकता है जब सारे दलित पुरुष आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत ले लें या सामूहिक आत्महत्या कर लें और सारी दलित लड़कियों से ब्राह्मण लड़के शादी कर लें! अम्बेडकर और उसके चेलों को यह साधारण अंकगणित भी समझ नहीं आता!
अम्बेडकर का यह कार्यक्रम दरअसल अपने अंतिम परिमाण में ब्राह्मणों से इस कातर अपील के सिवा कुछ नहीं है कि वे दलित लड़कियों से विवाह करें। अम्बेडकर के इस प्रोग्राम में दलितों के लिए तो कोई आह्वान है ही नहीं। 
दलितों, दमितों के लिए, जातिगत विषमता और समाजिक अन्याय के पूर्ण उन्मूलन के लिए कार्यक्रम सिर्फ़ और सिर्फ़ क्रान्तिकारी मार्क्सवाद के पास है, और वह है- सर्वहारा की सत्ता और समस्त सम्पत्ति का राष्ट्रीयकरण!

Workers' Socialist Party

जाति

भारतीय समाज में सामाजिक विषमता दो रूपों में सदियों से चला आ रहा है। निजी संपत्ति जनित सामाजिक विषमता और श्रम विभाजन जनित जातीय विषमता। इसमें संदेह नहीं कि निजी संपत्ति जनित सामजिक विषमता सदियों से जातीय विषमता का पोषण करती रही है और आज भी कर रही है। आंबेडकर ने अगर संविधान की धारा 15 में दलितों एवं पिछड़े लोगो को नौकरी में आरक्षण देने के लिए राज्य द्वारा positive discrimination करने का प्रावधान किया तो यह भी कुछ हद तक दलितों के एक छोटे से section को आर्थिक लाभ पहुचाने का ही काम करने वाला था। 
लेकिन यह प्रावधान भी निजी संपत्ति जनित सामाजिक विषमता को कोई हानि करने में असमर्थ था। इस लिए उनका दबदबा दलितों के ऊपर अगर जारी रहा तो इसमें  आश्चर्य की बात क्या है? 
आम्बेडकर ने कहा था कि क़ानून की नजर में तो सभी सामान है लेकिन वास्तविक दुनिया में वे असमान है। 

तो फिर वास्तिविक दुनिया में व्याप्त निजी संपत्ति जनित सामजिक विषमता के खिलाफ लड़ने में, निजी पूंजीवादी संपत्ति के खिलाफ लड़ने में आज के आंबेडकरवादियों को परहेज क्यों है?
अम्बेडकरवादी के अनुसार, शत्रु न पूंजीपति है, न जमींदार, शत्रु है ब्राह्मण! अम्बेडकर ने जो कथित हथियार दिया, उसे पिछले 70 सालों में भांजते रहे, परिणाम? फ़ासिस्ट सत्ता! वह भी संविधान को उलटकर नहीं, उसकी सीढियां चढ़कर।

इसमें संदेह नहीं है कि भारत में कम्युनिस्ट आन्दोलन अपने जन्म से ही हर तरह के सामाजिक एवं जातीय उत्पीडन और दमन के साथ साथ सामन्ती और पूंजीवादी शोषण के खिलाफ रहे है और इसीलिय समाजवाद अपना अंतिम लक्ष्य निर्धारित करते रहे है जो निजी सम्पत्ति जनित सामाजिक विषमता को दूर कर हर तरह की सामाजिक विषमता दूर करने की संभावना प्रदान करती है। इसलिए कम्युनिस्ट हमेशा दलित सर्वहारा के साथ उनके हर संघर्षो में साथ खड़े होते रहे है।
दलितों के निम्नपूंजीवादी नेत्रित्व पूँजीवाद को या सामन्तवाद को अपना मुख्य शत्रु नहीं मानते, वे ब्राह्मणवाद को अपना शत्रु मानते रहे  है। इसलिए वे दलित सर्वहारा के पूंजीवादी शोषण के खिलाफ कोम्मुनिष्ट पार्टियों के नेत्रित्व में चल रहे आन्दोलन में अपने दलित सर्वहारा भाइयो का साथ नहीं देते, उलटे उसमे से तो कई दलित पूँजीवाद की वकालत करते है जहाँ दलित सर्वहाराओं का पूंजीवादी शोषण बदस्तूर जारी रहेगा। और इस अर्थ में वे घोर प्रतिक्रियावादी चरित्र का परिचय देते है। लेकिन उनसे यही अपेक्षा की जा सकती है, यह उनके वर्गीय हित के अनुकूल ही है। दलित सर्वहारा को देर सवेर यह बात समझ में आना तय है।

हजारो वर्षो से उत्पीडन और दमन के खिलाफ दलितों का चलने वाला संघर्ष अगर अबतक  पूरी तरह सफल नहीं हो सका है तो इसका एक मात्र कारण पूर्व- पूंजीवादी समाज में उत्पादक शक्तियों का पूर्ण विकसित नहीं होना ही है, जहाँ वर्गों में विभाजित समाज को मिटा पाना संभव नहीं था। 

पूँजीवाद में उत्पादक शक्तियों के विकास ने इतिहास में पहली बार यह संभावाना पैदा की है कि उत्पादन शक्तियों को सामजिक नियंत्रण में ले कर इतना उत्पादन किया जा सके कि सब की जरूरत को आसानी से पूरी की जा सके, वर्ग विहीन समाज की स्थापना की ऒर कदम बढ़ाया जा सके; जहाँ सामाजिक विषमता के प्रमुख भौतिक आधार - निजी संपत्ति जनित सामाजिक विषमता - के आभाव में जातीय उत्पीडन और दमन की घटनाये क्रमशः कम होती जायेगी और फिर हमेशा के लिए विलुप्त हो कर इतिहास के कूड़ेदान में फेक दी जायेगी। 

सोवियत रूस में सर्वहारा वर्ग ने पूरी दुनिया के सामने यह कर के जब दिखा दिया है तो इसमें संदेह की कोई गुञ्जाइस कहाँ बचती है।
सर्वहारा दलित जब इस ऐतिहासिक मिशन को समझ लेता है तो वह दलित नहीं, वर्ग सचेत मजदूर बन जाता है और फिर वह निम्न पूंजीवादी दलित नेत्रित्व से घृणा करने के सिवा कुछ नहीं कर पाता। 

ऐसे ही  वर्ग सचेत मजदूर दलित उत्पीडन और दमन के खिलाफ चलने वाले संघर्ष में, मुक्ति की राह पर उनका सही और निर्णायक नेत्रित्व दे सकते है।

एम के आज़ाद
7.4.2018

जातिविहीन विकल्प है क्या? दलित विद्वान ब्राह्मणों पर आरोप लगाता है कि ब्राह्मण भले प्रगतिशीलता की बात करे, वह भले ही कम्युनिस्ट क्यों न हो, लेकिन वह अपने जाति को नहीं छोड़ता है। सबसे पहले वह हिंदू रहता है, फिर ब्राह्मण होता है तथा बाद में और अंत में, वह प्रगतिशील व कम्युनिस्ट कहलाता है। यह सवाल भारत में सवर्णों पर ही नहीं, सर! अवर्णों पर भी लागू है। हम दलित जब भी सोचते हैं स्वयं को दलित

जातिविहीन विकल्प है क्या?

दलित विद्वान ब्राह्मणों पर आरोप लगाता है कि ब्राह्मण भले प्रगतिशीलता की बात करे, वह भले ही कम्युनिस्ट क्यों न हो, लेकिन वह अपने जाति को नहीं छोड़ता है। सबसे पहले वह हिंदू रहता है, फिर ब्राह्मण होता है तथा बाद में और अंत में, वह प्रगतिशील व कम्युनिस्ट कहलाता है। यह सवाल भारत में सवर्णों पर ही नहीं, सर! अवर्णों पर भी लागू है। हम दलित जब भी सोचते हैं स्वयं को दलित मानकर ही सोचते-लिखते व प्रतिक्रिया देते हैं। हमने स्वयं को डी-कास्ट कहाँ किया है? अन्य जातियों के सापेक्ष छोड़िए, दलितों के मध्य भी हमारा स्वयं का कोरी, चमार, धोबी, पासी, मुसहर की समझ और ऐंठ बना हुआ है। हम प्रथम भी दलित होते हैं और अंततः भी दलित ही बने रहते हैं। हम दलितों के अंदर तो प्रगतिशीलता छू भी नहीं जा रही है। हम ब्राह्मणों को रोज गरियाते हैं लेकिन ब्राह्मणवाद से खुद ही नहीं निकलते हैं और न बाबा साहेब डॉ. आम्बेडकर के "जातिप्रथा उन्मूलन" के निमित्त कार्य ही करते हैं। हमारी एक मानसिकता है कि ब्राह्मण अपनी जाति नहीं त्याग रहा है। अरे दलित मित्रों! हमने भी तो अभी तक अपनी जाति नहीं त्यागी। आखिर क्या कारण है? जबकि दलित जाति तो भारत की सबसे निकृष्ट और घिनौनी जाति मानी जाती है जिस पर हम-आप गौरवान्वित होने लगे हैं और चमारों, कोरियों तथा पासियों का गौरवशाली इतिहास लिखने व पढ़ने लगे हैं। फिर, हम-दलितों ने अभी तक कोई ऐसा विकल्प तैयार किया क्या कि कोई व्यक्ति अपनी जाति त्यागने के बाद कहाँ और कैसे रहे, उसकी संस्कृति और जीवन पद्धति क्या होगी? खुद दलित जातियाँ ऐसे किसी विकल्प के तहत उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए क्या किसी ऐसे अर्थात "जातिविहीन-ब्राह्मणवाद विहीन जीवन पद्धति संघ" में रह रही हैं, जहाँ से दलित बड़े फ़क्र के साथ कह सके कि सुनो ब्राह्मणों! देखो ब्राह्मणों! मैंने ब्राह्मणवाद को लात मार दिया है, मैंने जातिवाद छोड़ दिया है, मैंने तुम्हारे द्वारा बनाई जाति-व्यवस्था की अपनी भी जाति छोड़ दी है।
आर डी आनंद
06.05.2018

Sunday, 18 April 2021

जाति प्रश्न पर अम्बेडकर और मार्क्स





      समाज में जब निजी सम्पत्ति नहीं थी तो कोई वर्ग नहीं था अर्थात कोई अमीर-गरीब नहीं था, कोई ऊँच-नीच नहीं था बराबरी थी। ऊँच-नीच, अमीर-गरीब निजी सम्पत्ति के बाद आये। और यह निजी सम्पत्ति उत्पादन के लिए होने वाले श्रम विभाजन और इसके विकास के क्रम में विनिमय की समस्याओं को हल करने के लिए पैदा हुई। दरअसल  सामूहिक सम्पत्ति को बेचने और खरीदने की कठिनाई बढ़ती जा रही थी, जिसे आसान करने के लिए निजी सम्पत्ति आवश्यक हो गयी थी।

    परन्तु निजी सम्पत्ति के आने से एक नयी समस्या आ गयी।अमीरी और गरीबी दरअसल निजी सम्पत्ति सबके पास बराबर रह ही नहीं सकती। हजारों बार निजी सम्पत्ति बराबर-बराबर बाँट कर देख लीजिये, हर बार थोडे़ ही समय बाद लोगों में अमीरी-गरीबी दिखने लगेगी। अतः कोई भी भारी भरकम संविधान लागू करके देख लीजिये, निजी सम्पत्ति के रहते समानता आ ही नहीं सकती। निजी सम्पत्ति के समाज में अनिवार्य रूप से दो परस्पर विरोधी वर्ग होते ही हैं। परस्पर विरोधी इसलिये कि दोनों के हित एक दूसरे के विपरीत होते हैं। इसी वजह से इन विरोधी वर्गों के बीच संघर्ष होता रहता है। इस वर्ग संघर्ष में शोषक वर्ग बहुत सचेतन रूप से अपने दुश्मन वर्ग (शोषित-उत्पीड़ि़त वर्ग) का दमन करने के लिये एक तरफ अपनी राजसत्ता अर्थात जेल, अदालत, सेना, पुलिस, नौकरशाही आदि का निर्माण करता है। वहीं दूसरी तरफ शोषित-पीड़ित वर्ग की शक्ति को क्षीण करने के लिये 'फूट डालो-शासन करो' की नीति के तहत उन्हें आपस में ही लड़ाता है। लड़ाने के लिये जाति, धर्म, पंथ, रंग, लिंग, नस्ल, भाषा, क्षेत्र आदि का इस्तेमाल करता है। जहाँ अमेरिका में जनता से जनता को लड़ाने के लिये मुख्यतः नस्ल का इस्तेमाल किया जाता रहा है, वहीं भारत जैसे पिछडे़ देश में जनता से जनता को लड़ाने के लिये शोषक वर्ग मुख्यतः जाति-व्यवस्था का इस्तेमाल करता रहा है।

     कार्ल मार्क्स ने भारत की जाति-व्यवस्था के छिन्न-भिन्न होने का अनुमान बहुत पहले ही लगा लिया था। उनका अनुमान था कि ''भारत की जनता का शोषण करने के लिये ब्रिटिश साम्राज्यवाद जो रेलों, पुलों, सड़कों, बडे़ कारखानों आदि का विकास कर रहा है, उससे भारतीय समाज की जड़ता टूटेगी और वर्ण एवं जाति व्यवस्था छिन्न-भिन्न होगी'' मार्क्स का यह अनुमान सही साबित हुआ। पूँजीवादी साम्राज्यवादी विकास के कारण अधिकांश जातिगत पेशे छिन्न-भिन्न हो गये हैं।

       शोषक वर्ग का जहाँ-जहाँ मुनाफा प्रभावित हो रहा था, वहां-वहां से इसने जातिगत भेद-भाव को निर्ममतापूर्वक उखाड़ फेंका है जैसे-होटल, अस्पताल, स्कूल, रेल, बस, हवाई जहाज, दुकान आदि में जातिगत भेद-भाव को हटा दिया है। दूसरे शब्दों में बाजार में जहाँ उसे मुनाफा कमाना है, वहाँ पर वह जाति नहीं देखता, वह ग्राहक की जेब देखता है मगर वहीं राजनीति में, जातियों का जमकर इस्तेमाल करता है।

       शोषक वर्ग जहाँ एक तरफ सरकारी नौकरियों को खत्म करता जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ सरकारी नौकरियों में आरक्षण का झगड़ा भी बढ़ाता जा रहा है। कमजोर वर्गों को आरक्षण देना बुरा नहीं है मगर आरक्षण के पीछे शोषक वर्ग की जो फूट डालो-शासन करो की नीति है, वह बहुत घिनौनी है। पूँजीपति वर्ग जातिगत भेद-भाव को बनाये रखने के लिये आरक्षण को हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहा है।

        मार्क्स ने यह कहा था कि, *शोषक वर्ग की राजसत्ता उतनी ही मजबूत और टिकाऊ होती है, जितनी कि वो शोषित-उत्पीड़ित वर्ग की उभरती हुई प्रतिभाओं को आत्मसात करने में सक्षम होता है* भारत के संदर्भ में मार्क्स का यह कथन इस रूप में सही साबित हो रहा है कि शोषक वर्ग अपनी आरक्षण नीति के जरिये शोषित उत्पीड़ित वर्ग की उभरती हुई प्रतिभाओं को आत्मसात करके अपनी राजसत्ता को मजबूत करता रहा। 

      सरकारी नौकरियों के लगातार खत्म होने, बेरोजगारों की भारी संख्या के मुकाबले रोजगार बहुत कम होने के कारण अब यह उत्पीड़ित वर्ग की प्रतिभाओं को पर्याप्त रूप में आत्मसात नहीं कर पा रहा है। जिसके कारण उसकी राजसत्ता भी अब कमजोर हो रही है। अतः अपनी राजसत्ता को मजबूत बनाये रखने के लिये शोषक वर्ग समय-समय पर अपना फासीवादी रूप दिखा कर जनता को डराता-धमकाता रहता है। 

        ऐसी परिस्थिति में यदि शोषक वर्ग के विरुद्ध वास्तविक संघर्ष छेड़ना है तो उत्पीड़ित वर्ग का संगठन जरूरी है तथा उत्पीड़ित-शोषित वर्गों को संगठित करने के लिये जातिवाद के विरुद्ध संघर्ष भी जरूरी है। जातिवाद के विरुद्ध संघर्ष को कारगर बनाने के लिये जाति की उत्पत्ति, उसके अस्तित्व एवं विकास तथा लक्ष्य एवं उद्देश्य का भौतिकवादी ज्ञान जरूरी है।

मार्क्सवाद के अनुसार-''जाति व्यवस्था, किसी ब्राह्मण के लिख देने या कह देने मात्र से नहीं बन सकती है।'' उत्पादक श्रम करने वाले वर्ग में जातियों के निर्माण की दो शर्तें जरूरी हैं -
1- लम्बे समय तक पीढ़ी दर पीढ़ी एक ही तरह का औजार चलाते रहना।
2- औजारों में लम्बे समय तक गुणात्मक बदलाव ना होना । 
          उपरोक्त शर्तें पूरी न हों तो करोड़ों ब्राह्मण मिलकर भी एक जाति नहीं बना सकते तथा इन शर्तों के पूरा होने पर एक भी ब्राह्मण न हो तो भी जाति बन सकती है। 
      
      सवाल उठता है कि ब्राह्मणों में जातियां कैसे बनीं जबकि वे कोई औजार नहीं चलाते थे। ब्राह्मणों में जो जातियां हैं उनमें कई ऐसी हैं जिनका आपस में रोटी-बेटी का संबंध है, ये सब वास्तव में अलग-अलग गोत्र हैं जो उपजाति के तौर पर पहचानी जाती हैं। हालांकि ब्राह्मणों में कई ऐसीजातियां हैं कि जिनमें छुआछूत तक की समस्या आज भी बनी हुई है। दर असल प्रारंभिक दौर में जाति व्यवस्था लचीली थी जिससे अलग-अलग जातिगत पेशों से जुड़े लोग भी ब्राह्मण का पेशा अपना लिया करते थे। इसके अलावा  उनकी और उनके यजमानों की आर्थिक हैसियत के आधार पर भी उनमें ऊंच-नीच की भावना बनी हुई है- जैसे राजपुरोहित सबसे ज्यादा सम्मानित रहा है।, क्षेत्रों के आधार पर भी उनमें छोटे-बड़े की भावना है। और भी कारण हो सकते हैं जिनका शोध किया जाना चाहिए। मगर बुनियादी कारण आर्थिक ही है।

     दूसरा गम्भीर सवाल यह है कि "अगर पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक ही तरह का औजार चलाने से जातियों की उत्पत्ति होती है तो सामंती दौर में पेशे तो मुश्किल से 35--40 किस्म के ही थे इतने कम पेशे से हजारों जातियां कैसे बन गयीं?" यह सवाल उत्पत्ति का नहीं उसके विकास का सवाल है। एक लम्बे विकास क्रम में विभिन्न भाषाओं, बोलियों और क्षेत्रों के आधार पर एक ही पेशे से जुड़े लोगों की जातियों के अनेकों नामों से जाना गया जिसे शोषक वर्ग ने फूट डालने की नीयत से अलग-अलग जाति की मान्यता दे दी । इस प्रकार लम्बे समय से जारी सामाजिक,आर्थिक, राजनीतिक हस्तक्षेपों के कारण जातीय विभाजन का मौजूदा स्वरूप हमारे सामने मौजूद हैं।

        *जाति निवारण*-मार्क्सवाद के अनुसार जाति कोई वस्तु नहीं है कि इसे उठाया और फेंक दिया। जाति एक विचार है। इसे हटाने के लिये, इसके स्थान पर कोई दूसरा विचार रखना पडे़गा।

     निवारण का उपाय-मार्क्सवाद के अनुसार जाति की चेतना को हटाने के लिये वर्ग की चेतना स्थापित करनी होगी तथा इसके लिये वर्ग-संघर्ष को तीखा करते हुए शोषक वर्ग की राजसत्ता ढहाकर मेहनतकश वर्ग की राजसत्ता स्थापित करनी होगी तथा समाजवादी अर्थव्यवस्था कायम करके जाति व्यवस्था की बुनियाद अर्थात सामन्ती अर्थव्यवस्था को ढहाना पड़ेगा। इसके बावजूद जातिवाद करने व जातीय पहचान बनाने वालों को दण्डित करने का प्रावधान करना पडे़गा तब कहीं जाति व्यवस्था का उन्मूलन होगा।

          उपरोक्त क्रान्तिकारी काम करने की बजाय यदि आप सोचते हैं कि लोगों को समझा-बुझा कर सुधारवादी तरीके से जातिवाद खत्म कर देंगे तो यह एक और ऐतिहासिक भूल ही होगी, क्योंकि सुधारवादी तरीके से बहुत बडे़-बडे़ महापुरुषों का फार्मूला फेल हो चुका है। बुद्ध ने अपने धारदार तर्कों एवं उपदेशों के माध्यम से वर्ण व्यवस्था को उखाड़ फेंकना चाहा मगर उनके और उनके अनुयायियों के प्रयासों से एक 'बौद्ध धर्म' खड़ा हो गया परन्तु वर्ण-व्यवस्था नहीं टूटी। कबीर ने अपने तीखे तर्कों-उपदेशों के जरिये जाति व्यवस्था पर हमला किया, परिणामस्वरूप एक 'कबीर पंथ' चल पड़ा मगर जाति व्यवस्था नहीं टूट पायी। रैदास ने अपने बेवाक तर्कों से जाति श्रेष्ठता को चुनौती दी, उनके उपदेशोें से कुछ लोग 'रैदसिया चमार' बन गये परन्तु जाति व्यवस्था नहीं टूटी। दक्षिण भारत के बसेश्वरनाथ ने भी जाति-व्यवस्था पर उपदेशात्मक हमला किया परिणामस्वरूप लिंगायत पंथ बन गया मगर जाति व्यवस्था नहीं टूट पायी। इसी तरह सैकड़ों महापुरूषों के सुधारात्मक प्रयास फेल हो गये। 

        मार्क्सवादी रास्ते से इतर डा0 अम्बेडकर ने 'जाति उन्मूलन' का अपना सुधारात्मक प्रयास किया मगर जाति नहीं टूटी। उन्होंने ''भारत में जाति प्रथा" नामक लेख में जातियों की उत्पत्ति के बारे में बताते हुए लिखा है कि, "...मनु के विषय में मैं कठोर लगता हूं परन्तु मुझमें इतनी शक्ति नहीं कि मैं उसका भूत उतार सकूं। वह एक शैतान की तरह जिन्दा है, किन्तु मैं नहीं समझता कि वह सदा जिंदा रह सकेगा। एक बात मैं आप लोगों को बताना चाहता हूं कि मनु ने जाति नहीं बनायी। और न वह ऐसा कर सकता था। जाति व्यवस्था मनु से पूर्व विद्यमान थी, वह तो सिर्फ इसका पोषक था।"
(बाबा साहब डा. अम्बेडकर सम्पूर्ण वांग्मय खण्ड - १ 'भारत में जातिप्रथा' पेज-२९ ) 

         इसी पेज पर आगे लिखते हैं-  "...ब्राह्मण और कई बातों के लिए दोषी हो सकते हैं और मैं नि:संकोच कह सकता हूं कि वे हैं भी किन्तु गैर ब्राह्मण समुदाय पर जाति व्यवस्था थोपना उनके बूते के बाहर की बात थी।" 

          "जाति भेद का उच्छेद" नामक लेख में लिखते हैं कि...'जातियां लोगों ने खुद अपने ऊपर थोप ली।' इसी लेख में डा0 अम्बेडकर के अनुसार जातियों की समस्या का निवारण यह है कि, ''बड़ी जातियों के लोग इसे खुद मिटायें, परन्तु वे ऐसा नहीं करेंगे।" अतः जाति विहीन धर्म अपनाना ही निवारण है।  उनके अनुसार निवारण का उपाय यह है कि  हिन्दू धर्म छोड़ कर बौद्धधर्म अपनाया जाये। डा0 अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपनाया मगर उन्हें जाति से छुटकारा नहीं मिला। आज भी बाबा साहेब अम्बेडकर के अनुयायी हिन्दू धर्म छोड़ कर बौद्धधर्म अपना रहे हैं परन्तु उनकी जाति नहीं छूट पा रही है। यहाँ तक कि सिख, ईसाई, मुसलमान, यहूदी बनने पर भी जातियां नहीं टूट रही है। इन ऐतिहासिक तथ्यों को ध्यान में रख कर, सभी महापुरुषों की असफलताओं से सबक लेकर तथा उनके प्रयास, त्याग और बलिदान का सम्मान करते हुए हमें मार्क्स से भी सबक लेना होगा। *मार्क्स ने कहा था- ''उनके सारे के सारे आन्दोलन महानतम् त्याग और बलिदान के बावजूद भी अपने विरोधी तत्वो में बदल जाते हैं, जिन्हें अपने जनान्दोलन की उत्पत्ति का, उसके अस्तित्व एवं विकास तथा लक्ष्य एवम् उद्देश्य का भौतिकवादी ज्ञान नहीं होता।''* मार्क्स के इस कथन की रोशनी में जातीय आंदोलन से सम्बन्धित ''बहुजन मूवमेन्ट'' को देखा जा सकता है।

      जहाँ डाॅ0 अम्बेडकर ने बताया कि ''मनु कितना भी धूर्त रहा हो परन्तु उसने जातियाँ नहीं बनायी ।,'' वहीं उनके कुछ तथाकथित अनुयायियों ने ब्राह्मणों को जाति-व्यवस्था का निर्माता बताकर 15% सवर्णों के खिलाफ जाति आंदोलन शुरू किया। जाति उन्मूलन की बजाय जाति व्यवस्था का इस्तेमाल करके सत्ता में पहुँचने के लिए ''जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी'' के नारे के आधार पर सभी वंचित जातियों को उनका हक देने का वादा किया परन्तु कई-कई बार सरकार बना कर सत्ता की मलाई काटने के बावजूद भी मायावती जी/मुलायम जी,अखिलेश जी,लालू जी,नीतीश कुमारजी,करुणानिधि, देवगौडा़,चौटाला,आदि ने इस नारे के आधार पर एक भी नीति नहीं बना पाये। इस आंदोलन में गरीब लोगों ने जाति के नाम पर जो त्याग और बलिदान किया उसका फायदा शोषक वर्गों को हुआ। आप देख सकते हैं कि, ज्यों-ज्यों 15 बनाम 85 का मूवमेंट मजबूत हुआ त्यों-त्यों कम्युनिस्ट पार्टियाँ कमजोर होती गयीं और धुर दक्षिणपंथी आर0एस0एस0 (भाजपा) जैसे संगठन मजबूत होते गये।

        अब डाॅ0 अम्बेडकर के तथाकथित अनुयायियों में से अधिकांश लोग जाति उन्मूलन की बजाय हताश होकर जाति व्यवस्था के आगे घुटना टेक चुके हैं। वे मान चुके हैं कि, ये जाति व्यवस्था कभी नहीं टूटेगी। अतः इसे तोड़ने की बजाय इसी जाति-व्यवस्था पर घमण्ड किया जाये। इसी समझ और हताशा के परिणामस्वरूप वे ''दि ग्रेट चमार'' ''डेन्जर चमार'', ''छोरा चमार का'' आदि लिख रहे हैं। शायद उन्हें नहीं मालूम कि जातिवाद की सड़ांध पर गर्व करना अम्बेडकरवाद विरोधी कृत्य है।

       साथियों! जातिवाद अजर-अमर नहीं है। न तो ये सदा रहा है, न सदा रहेगा। अगर कोई चीज सत्य है, तो वो है 'परिवर्तन'। अतः हताश होने की जरूरत नहीं है, और न ही पूंजीवादी नेताओं के भरोसे रह कर बैठने की जरूरत है। उनके भरोसे बैठना कायरता होगी। अतः 'अप्प दीपो भव' के बुद्ध और अम्बेडकर के सूत्र को पकड़कर, स्वस्थ बहस और स्वस्थ तर्क करते हुए मार्क्स के द्वंद्वात्मक भौतिकवाद, ऐतिहासिक भौतिकवाद, राजनीतिक अर्थशास्त्र एवं समाजवाद के सिद्धान्तों को लेकर आगे बढ़ना होगा। किसी वीर पुरूष के भरोसे नहीं बल्कि यह कारनामा खुद करना होगा।
          *न हमसफर न किसी हमनशीं से निकलेगा*।
              *हमारे पाँव का काँटा हमीं से निकलेगा*।।
                   *वतन की रेत हमें ऐडियाँ रगड़ने दे*
                       *हमें यकीन है पानी यहीं से निकलेगा*।।

           *इंकलाब जिन्दाबाद*!

                                      
*रजनीश भारती*

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Friday, 4 September 2020

जातिवाद

जातिवाद के बारे में मार्क्सवादी दृष्टिकोण

आज के दलितवादी बुद्धिजीवियों खासकर लेखको का एक हिस्सा दावा कर रहा है कि दलितों के राजनीतिक व बौद्धिक प्रतिनिधि केवल दलित ही हो सकते है क्योकि सदियो से वे ही दलित-पीड़ा झेलते हुए इसे समझ सकते है,अन्य जातियां विशेषकर ऊपरी दोनों तीनो जातियॉ तो दलितों की उत्पीड़क व शोषक रही है । दलित तर्कवादियो को पहले यह बताना चाहिये कि वे ब्राह्मण समुदाय के उन ब्राह्मणों के साथ चुनावी व मंत्रिमण्डलीय एकता व सहयोग क्यों करते रहे ,जिन ब्राह्मणों की वे 1990 से पहले न हिक भर निन्दाये किया करते थे बल्कि बीते से अब तक चली आई अपनी समूची दुर्दशओ का उन्हें एक मात्र दोषी ठहराया करते थे । यह प्रचार करते करते पूरे भारत में ब्राह्मण -विरोधी मंच बना के 1990 से वे चुनाव जीतना शुरू किये थे । यह क्यों ? उनका यह तर्क हो कि चुनावी व संसदीय राजनीति में इस तरह के संयुक्त -मोर्चे बनाने पड़ते है ,वैसे ही दलितों ने ब्राह्मणों के साथ बनाये । कहिये कि सत्ता राजनीति की नीचे से लेकर ऊपर तक की कुर्सियों पर चढ़ने के अवसर आयेगे तो हम अपनी चढ़त -बढ़त की स्वार्थी -राजनीति के अनुसार ब्राह्मणों को भी दलितो का हितैषी कह सकते है। मतलब ? दूसरे निजी स्वार्थियो की तरह जब हमारा निजी  स्वार्थ होगा तब हम इसी स्वार्थपूर्ति  के अनुसार अपना प्रतिनिधि मान सकते है और मौका आते ही इंकार कर सकते है । कई उच्च -जातीय अधिकारी बुद्धिजीवी व लीडरान जब  1990 के बाद से सपा बसपा चढ़त बढ़त शुरू हुई तो इसे भाँप कई एक भीतर से घोर जातिवादी उच्च जातियो के लोग दलितवाद व पिछडवाद के समर्थक बन गए । उन्ही के बौद्धिक प्रतिनिधि बनकर उन्ही के पक्ष में बोलने लग गए। लेकिन दलितवाद के जोशीले दलितवादी बुद्धिजीवी अधिकारी व लीडर इस पर कुछ नही बोले । जबकि उन्हें अपने दम्भी दावे के अनुसार "दलितों के प्रतिनिधि केवल दलित ही हो सकते है" उच्च जातियो के मौकापरस्तो के मुँह पर कहने की हिम्मत करनी  चाहिये थी कि आप उच्च-जातीय है,आप हमारे प्रतिनिधि नही हो सकते। लेकिन ऐसा उन्होंने कभी नही कहा और न ही कह सकते है।क्योकि दलितों व पिछडो  के हिमायती व प्रतिनिधि बने उच्च जातीय लोगो का एक हिस्सा सरकारी अधिकारी नेतागीरी व दीगर पैसे कुर्सी पर विरजमान था वहै । इसीलिए ऐसी स्थितियों से दलितवादी बुद्धिजीवी निजी फायदा उतने की लालच में इनकी आलोचना नही कर पाये ।बिल्कुल वैसे जैसे आज के बहुतेरे दलितवादी व पिछडवादि मध्यम व उच्च मध्यमवर्गीय लोग उच्च जातीय लोगो की तरह सुसभ्य व सुसंस्कृत होने का ढोंगी दिखावा करने हेतु ब्राह्मणों से तरह तरह की पूजा-पाठ करवाने लगे है ,उच्च-जातियो के  रीति रिवाज मानने लगे है ।बेहतर होती आर्थिक स्थिति के कारण दलितों व पिछडो का जीवन स्तर अगर उच्च जातियॉ का जैसा हो जाता है तो यह न तो अचरज लायक है और न ही होना चाहिये ,यह समर्थनीये,स्वागत योग्य है।परन्तु उच्च जातियो के जैसे तरह तरह के धार्मिक व गैर धार्मिक कर्मकांड मनाना यह क्या है? क्या यह सैकड़ो सालो से भीतर छिपी हुई उस लालसा व भूख का द्योतक नही है की मैं भी उन दलितों का जैसा नही ,बल्कि उच्च जातियो का जैसा दिखूं।
  याद रखे मार्क्सवाद  ऐसे सब ढोग,दिखावे काल्पनिक या व्यवहारिक भूख लालसा लालच की जैसी आदतो को बड़ी हिकारत की दृष्टि से देखता है ।वह गरीब कमकरो की ओर सर धनाढय अमीरो के विरूद्ध वर्ग -संघर्ष का एलान करता है।

सन्दर्भ -जी डी सिंह के विभिन्न पुस्तको से ।

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Monday, 31 August 2020

जाति

आज जाति वर्ग में विभाजित हो गया है, अब बिल्कुल homogenous group नही रह गया है इस ओर भी ध्यान देने की जरूरत है। नीचे कुछ विस्तारित करने की कोशिश की गई है:

*सवर्ण(प्रगतिशील विचारो वाले) सर्वहारा* - इनके जीवन की मुख्य समस्या क्या है? हजारो वर्षो से चली आ रही धार्मिक पाखण्ड, कूड़ा कड़कट बचपन से ही इनके दिमागों में ठूसा गया है, उससे मुक्ति कैसे पाया जाए? यह बहुत ही कठिन है, और पूंजीवादी व्यवस्था के रहते हुए इससे पूर्ण मुक्ति पाना लगभग असंभव है। फिर भी मार्क्सवादी दर्शन बहुत हद तक इन्हें मदद कर सकता है।

 *दलित मध्यम वर्ग*-इनकी प्रमुख समस्या क्या है? इस बात का दुख, मलाल कि इनके पुरखो को आदि काल से, यहां तक कि राम राज्य में भी, ज्ञान पाने  के अधिकार से बंचित रखा गया। कौन सा ज्ञान? जाहिर है धार्मिक पाखण्ड का ज्ञान, वेद, पूराण, महाभारत, गीता , मनुस्मृति का ज्ञान। क्योकि एक विशेष दलित जाति होने के चलते पेशे से सम्बंधित ज्ञान तो वे पिता से विरासत में ही पाते थे और आज किसी भी तरह की शिक्षा पाने का अधिकार सभी को है। आज दलित उस धार्मिक पाखण्ड से भरे ज्ञान और कूड़े कचड़े को अपने दिमाग मे ठूसने के लिये स्वतन्त्र है। सरकार चाहती भी यही है। पूंजीवाद में बुर्जुवा विकास के बढ़े हुये अवसर ने उन्हें मन्दिर, पूजा पाठ आदि में पैसे खर्च  करने के लिये सक्षम भी बनाया है। इस लिये, गंगा चाहे कितनी भी मैली हो, वे भी कुम्भ में डुबकी लगा रहे है, मोदी मोदी चिल्ला रहे है, शम्बूक बध को भूल कर  श्री राम की जय किये जा रहे है। दलितों में मध्यम वर्ग का अच्छा खासा हिस्सा उस पतित ब्राह्मणवादी संस्कृति को फिर से गले लगा रहे है, जिसे फुले, पेरियार और  डॉ आंबेडकर सख्त नफरत करते थे। इनकी संस्कृति, इनके रहन सहन, आचार व्यवहार, उनकी सोच उन दबे कुचले मुफ़लिस *दलित सर्वहाराओं* से बिल्कुल अलग होते जा रहे है जो अभी 1947 में मिले आजादीऔर आरक्षण  के लागू होने के 70 साल से ज्यादा होने के बावजूद भयंकर गरीबी और मुश्किल भरे दिन गुजार रहे है। इनकी मुख्य समस्या क्या है? आर्थिक उन्नति के अवसर मिलने और उसका फायदा उठा कर आर्थिक संपन्नता हासिल करने के बावजूद भी "ब्राह्मणत्व" का गौरव उन्हें आज भी नही मिला, आज भी सवर्णो द्वारा इन दलितों को दलित समझा जाता है और रोटी बेटी का सम्बंध नही बनाया जाता है। इसलिये ये सोचते है-जाति-प्रथा का समाधान आर्थिक विषमता दूर कर के नही हो सकती, आर्थिक विषमता प्रमुख नही है, सामाजिक विषमता प्रमुख है जिसे पहले खत्म करना होगा। डॉ अम्बेडकर भी ऐसा ही सोचते थे।

 *दलित सर्वहारा -* ये सीधे साधे भोले लोग सदियों से शोषण और जातीय उत्पीड़न के शिकार रहे लोग है। पूंजीवादी विकास ने और आरक्षण ने एक बहुत छोटे तबके को ही विकास करने का अवसर दिया है। धार्मिक पाखण्ड का कु-प्रभाव  इनमे सबसे कम है। विरासत में मिले पेशेगत जीविका का साधन अब सहायक नही है, पूंजीवाद में प्रयाप्त पूंजी के बिना ये बेकार है।  इनकी मुख्य समस्या है- बेरोजगारी, इनकी गरीबी। इसका निवारण पूंजीवाद में नही, सिर्फ समाजवाद में है।

Friday, 14 August 2020

जाति

जर्मनों की तमाम मुसीबतों के लिए यहूदी और पूंजीवाद जिम्मेदार हैं!
- एडोल्फ हिटलर

हिंदुओं की तमाम मुसीबतों के लिए मुस्लिम और पूंजीवाद जिम्मेदार हैं!
- गोलवलकर

शूद्रों की तमाम मुसीबतों के लिए ब्राह्मण और पूंजीवाद जिम्मेदार हैं!
- अम्बेडकर

श्वेत, भगवा और नीले फ़ासीवाद के इन तीनों पैरोकारों ने पूंजीवाद के खिलाफ लफ्फाज़ी करते हुए आजीवन उसकी सेवा की। इस दोगले चरित्र पर परदा डालने के लिए, तीनों ने जानबूझकर समाज के उन हिस्सों को चुना जिनके हाथ न ज़मीनें और कारखाने थे, न बंदूकें। उन सभी ने जनता के काल्पनिक शत्रुओं का निर्माण किया और उन्हें वास्तविक शत्रुओं के साथ गड्डमड्ड करते हुए, वास्तविक शत्रुओं का संरक्षण किया। पूंजीवाद के इन तीनों चौकीदारों ने जातियों, सम्प्रदायों को निशाना बनाते हुए, पूंजीवाद को मेहनतकश जनता के निशाने से अलग कर दिया। इन तीनों की साम्प्रदायिक, धर्म-जाति आधारित राजनीति ने, मेहनतकश जनता को भ्रमित करते हुए, पूंजीवाद को जमानत दी और उसे क्रान्तिकारी प्रहार से बच निकलने में मदद दी।

Workers' Socialist Party

१९५३ में स्टालिन की शव यात्रा पर उमड़ा सैलाब 

*On this day in 1953, a sea of humanity thronged the streets for Stalin's funeral procession.* Joseph Stalin, the Soviet Union's fea...