Saturday, 5 June 2021

जाति

भारतीय समाज में सामाजिक विषमता दो रूपों में सदियों से चला आ रहा है। निजी संपत्ति जनित सामाजिक विषमता और श्रम विभाजन जनित जातीय विषमता। इसमें संदेह नहीं कि निजी संपत्ति जनित सामजिक विषमता सदियों से जातीय विषमता का पोषण करती रही है और आज भी कर रही है। आंबेडकर ने अगर संविधान की धारा 15 में दलितों एवं पिछड़े लोगो को नौकरी में आरक्षण देने के लिए राज्य द्वारा positive discrimination करने का प्रावधान किया तो यह भी कुछ हद तक दलितों के एक छोटे से section को आर्थिक लाभ पहुचाने का ही काम करने वाला था। 
लेकिन यह प्रावधान भी निजी संपत्ति जनित सामाजिक विषमता को कोई हानि करने में असमर्थ था। इस लिए उनका दबदबा दलितों के ऊपर अगर जारी रहा तो इसमें  आश्चर्य की बात क्या है? 
आम्बेडकर ने कहा था कि क़ानून की नजर में तो सभी सामान है लेकिन वास्तविक दुनिया में वे असमान है। 

तो फिर वास्तिविक दुनिया में व्याप्त निजी संपत्ति जनित सामजिक विषमता के खिलाफ लड़ने में, निजी पूंजीवादी संपत्ति के खिलाफ लड़ने में आज के आंबेडकरवादियों को परहेज क्यों है?
अम्बेडकरवादी के अनुसार, शत्रु न पूंजीपति है, न जमींदार, शत्रु है ब्राह्मण! अम्बेडकर ने जो कथित हथियार दिया, उसे पिछले 70 सालों में भांजते रहे, परिणाम? फ़ासिस्ट सत्ता! वह भी संविधान को उलटकर नहीं, उसकी सीढियां चढ़कर।

इसमें संदेह नहीं है कि भारत में कम्युनिस्ट आन्दोलन अपने जन्म से ही हर तरह के सामाजिक एवं जातीय उत्पीडन और दमन के साथ साथ सामन्ती और पूंजीवादी शोषण के खिलाफ रहे है और इसीलिय समाजवाद अपना अंतिम लक्ष्य निर्धारित करते रहे है जो निजी सम्पत्ति जनित सामाजिक विषमता को दूर कर हर तरह की सामाजिक विषमता दूर करने की संभावना प्रदान करती है। इसलिए कम्युनिस्ट हमेशा दलित सर्वहारा के साथ उनके हर संघर्षो में साथ खड़े होते रहे है।
दलितों के निम्नपूंजीवादी नेत्रित्व पूँजीवाद को या सामन्तवाद को अपना मुख्य शत्रु नहीं मानते, वे ब्राह्मणवाद को अपना शत्रु मानते रहे  है। इसलिए वे दलित सर्वहारा के पूंजीवादी शोषण के खिलाफ कोम्मुनिष्ट पार्टियों के नेत्रित्व में चल रहे आन्दोलन में अपने दलित सर्वहारा भाइयो का साथ नहीं देते, उलटे उसमे से तो कई दलित पूँजीवाद की वकालत करते है जहाँ दलित सर्वहाराओं का पूंजीवादी शोषण बदस्तूर जारी रहेगा। और इस अर्थ में वे घोर प्रतिक्रियावादी चरित्र का परिचय देते है। लेकिन उनसे यही अपेक्षा की जा सकती है, यह उनके वर्गीय हित के अनुकूल ही है। दलित सर्वहारा को देर सवेर यह बात समझ में आना तय है।

हजारो वर्षो से उत्पीडन और दमन के खिलाफ दलितों का चलने वाला संघर्ष अगर अबतक  पूरी तरह सफल नहीं हो सका है तो इसका एक मात्र कारण पूर्व- पूंजीवादी समाज में उत्पादक शक्तियों का पूर्ण विकसित नहीं होना ही है, जहाँ वर्गों में विभाजित समाज को मिटा पाना संभव नहीं था। 

पूँजीवाद में उत्पादक शक्तियों के विकास ने इतिहास में पहली बार यह संभावाना पैदा की है कि उत्पादन शक्तियों को सामजिक नियंत्रण में ले कर इतना उत्पादन किया जा सके कि सब की जरूरत को आसानी से पूरी की जा सके, वर्ग विहीन समाज की स्थापना की ऒर कदम बढ़ाया जा सके; जहाँ सामाजिक विषमता के प्रमुख भौतिक आधार - निजी संपत्ति जनित सामाजिक विषमता - के आभाव में जातीय उत्पीडन और दमन की घटनाये क्रमशः कम होती जायेगी और फिर हमेशा के लिए विलुप्त हो कर इतिहास के कूड़ेदान में फेक दी जायेगी। 

सोवियत रूस में सर्वहारा वर्ग ने पूरी दुनिया के सामने यह कर के जब दिखा दिया है तो इसमें संदेह की कोई गुञ्जाइस कहाँ बचती है।
सर्वहारा दलित जब इस ऐतिहासिक मिशन को समझ लेता है तो वह दलित नहीं, वर्ग सचेत मजदूर बन जाता है और फिर वह निम्न पूंजीवादी दलित नेत्रित्व से घृणा करने के सिवा कुछ नहीं कर पाता। 

ऐसे ही  वर्ग सचेत मजदूर दलित उत्पीडन और दमन के खिलाफ चलने वाले संघर्ष में, मुक्ति की राह पर उनका सही और निर्णायक नेत्रित्व दे सकते है।

एम के आज़ाद
7.4.2018

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