जातिविहीन विकल्प है क्या?
दलित विद्वान ब्राह्मणों पर आरोप लगाता है कि ब्राह्मण भले प्रगतिशीलता की बात करे, वह भले ही कम्युनिस्ट क्यों न हो, लेकिन वह अपने जाति को नहीं छोड़ता है। सबसे पहले वह हिंदू रहता है, फिर ब्राह्मण होता है तथा बाद में और अंत में, वह प्रगतिशील व कम्युनिस्ट कहलाता है। यह सवाल भारत में सवर्णों पर ही नहीं, सर! अवर्णों पर भी लागू है। हम दलित जब भी सोचते हैं स्वयं को दलित मानकर ही सोचते-लिखते व प्रतिक्रिया देते हैं। हमने स्वयं को डी-कास्ट कहाँ किया है? अन्य जातियों के सापेक्ष छोड़िए, दलितों के मध्य भी हमारा स्वयं का कोरी, चमार, धोबी, पासी, मुसहर की समझ और ऐंठ बना हुआ है। हम प्रथम भी दलित होते हैं और अंततः भी दलित ही बने रहते हैं। हम दलितों के अंदर तो प्रगतिशीलता छू भी नहीं जा रही है। हम ब्राह्मणों को रोज गरियाते हैं लेकिन ब्राह्मणवाद से खुद ही नहीं निकलते हैं और न बाबा साहेब डॉ. आम्बेडकर के "जातिप्रथा उन्मूलन" के निमित्त कार्य ही करते हैं। हमारी एक मानसिकता है कि ब्राह्मण अपनी जाति नहीं त्याग रहा है। अरे दलित मित्रों! हमने भी तो अभी तक अपनी जाति नहीं त्यागी। आखिर क्या कारण है? जबकि दलित जाति तो भारत की सबसे निकृष्ट और घिनौनी जाति मानी जाती है जिस पर हम-आप गौरवान्वित होने लगे हैं और चमारों, कोरियों तथा पासियों का गौरवशाली इतिहास लिखने व पढ़ने लगे हैं। फिर, हम-दलितों ने अभी तक कोई ऐसा विकल्प तैयार किया क्या कि कोई व्यक्ति अपनी जाति त्यागने के बाद कहाँ और कैसे रहे, उसकी संस्कृति और जीवन पद्धति क्या होगी? खुद दलित जातियाँ ऐसे किसी विकल्प के तहत उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए क्या किसी ऐसे अर्थात "जातिविहीन-ब्राह्मणवाद विहीन जीवन पद्धति संघ" में रह रही हैं, जहाँ से दलित बड़े फ़क्र के साथ कह सके कि सुनो ब्राह्मणों! देखो ब्राह्मणों! मैंने ब्राह्मणवाद को लात मार दिया है, मैंने जातिवाद छोड़ दिया है, मैंने तुम्हारे द्वारा बनाई जाति-व्यवस्था की अपनी भी जाति छोड़ दी है।
आर डी आनंद
06.05.2018
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