Showing posts with label नरेंद्र. Show all posts
Showing posts with label नरेंद्र. Show all posts

Tuesday, 1 June 2021

लड़ाई - कविता

#हर लड़ाई को 
पूंजी के मालिकों के खिलाफ मोड़िए
वही पर्दे में बैठकर 
साजिश रच रहे हैं
सरकारों को नचा रहे हैं
सरकारें बना रहे हैं
सरकारें गिरा रहे हैं
जमीनें हड़प रहे हैं 
बस्तियां उजाड़ रहे हैं.
बैंकों की पूंजी उड़ा रहे हैं
रंगभेद का जहर फैला रहे हैं
करोना फैला रहे हैं
ये सड़कों पर मजदूर जो
दूर तक मारे फिर रहे हैं
बच्चे बूढ़ों के साथ जो
भूख से बिलबिला रहे हैं
सब पूंजी का करिश्मा है
पूरी दुनिया को 
उसके मालिक नचा रहे हैं
 *नरेंद्र कुमार*

Saturday, 29 May 2021

सर्वहारा वर्ग की संस्कृति और इसकी चुनौतियां ! - नरेंद्र


सभी वर्गों की अलग अलग संस्कृति होती है जो मुख्यतः उनके उत्पादन संबंध से निर्धारित होती हैं । लेकिन उत्पादन संबंध के साथ भौगोलिक व सामाजिक परिवेश , उनका इतिहास , आदतें और परंपराओं से यह बहुत मजबूती से प्रभावित होती है । यह अन्य वर्गों की संस्कृति व विचारों से टकराती है और उनके प्रभाव में भी आती है।खासकर शासन में जो वर्ग रहता है उसकी संस्कृति और उसके द्वारा प्रायोजित तथा आरोपित संस्कृति का सभी वर्गों की तरह इन पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है । इसलिए किसी भी वर्ग की संस्कृति उस वर्ग की निरपेक्ष संस्कृति नहीं होती है ।
 फिर भी आमतौर पर सामंतों की संस्कृति , किसानों की संस्कृति ,पूंजीपतियों और सर्वहारा की संस्कृति में फर्क रहता है । उनकी आदत , उनका टेंपरामेंट , सामाजिक संबंधों में व्यवहार ,खानपान , जीवन पद्धति आदि  में फर्क होता है। इन सबों को तय करने में उनका उत्पादन संबंध महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है ।
सर्वहारा या मजदूर वर्ग की भी कोई शुद्ध संस्कृति नहीं होती है। आमतौर पर हमारे समाज में टुटपुंजिया वर्ग यानी किसान , छोटे दस्तकार ' छोटे व्यापारी के संपत्ति हरण और बदलती जीवन पद्धति तथा परिवेश के कारण , पुराने उत्पादन संबंध में जीवन नहीं चल पाने के कारण ये वर्ग अपनी श्रम शक्ति को बेचने के लिए मजदूर बनते हैं। ऐसे मजदूर अपने पुराने उत्पादन संबंध तथा वर्गीय स्थिति के कारण पुरानी संस्कृति को लंबे समय तक ढोते रहते हैं । हमारी पिछड़ी उत्पादन पद्धति तथा सांस्कृतिक विरासत , पुरानी संस्कृति तथा आदतों को बनाए रखने में मददगार होती है । सामाजिक तथा राजनीतिक क्रांतियां इन पुराने झाड़ झंखाड़ को जलाकर नए उभरते वर्ग के रूप में सर्वहारा वर्ग को , उस की मूल संस्कृति को उभरने का ज्यादा अवसर देती है । लेकिन सर्वहारा की संस्कृति कोई रूढ़ चीज नहीं है । जैसे-जैसे नए उत्पादन संबंध में वह सर्वहारा की जगह उन्नत उत्पादक शक्ति के रूप में अपनी भूमिका अदा करने लगती है , उसकी संस्कृति में ऊंचाई आती जाती है । यह संस्कृति इतिहास में समाजवादी संस्कृति के रूप में स्थापित हुई है। समाजवादी संस्कृति का विकास मुख्यतः सर्वहारा की संस्कृति से ही होती है लेकिन दूसरे मेहनतकश  वर्ग की संस्कृतियाँ भी इसे समृद्ध करती हैं । यह एक तरह से अपने समय और अपने इतिहास के सभी  प्रगतिशील तथा मेहनतकशों की संस्कृति कोआत्मसात कर अपना निर्माण करती है । इसलिए समाजवादी संस्कृति सर्वहारा संस्कृति से भी उन्नत और व्यापक होती है जो समाज को ज्यादा बेहतर जीवन दृष्टि देती है । 
  साम्राज्यवाद तथा पूंजीवाद जिस तरह से समाजवाद के निर्माण में बाधक है और समाजवादी अर्थव्यवस्था को तबाह करने के लिए सक्रिय रहा J उसी तरह साम्राज्यवादी तथा पूंजीवादी संस्कृति ने कदम कदम पर समाजवादी संस्कृति को तबाह करने का अभियान चलाया और उसे सफलता भी मिली , क्योंकि उत्पादन संबंध तथा अर्थव्यवस्था के स्तर पर समाजवाद अभी मजबूत नहीं हुआ था ।आज की तारीख में सर्वहारा संस्कृति तथा समाजवादी संस्कृति के विकास में ये सभी ताकते अवरोध बनकर खड़ी है ।  हम वर्ग संघर्ष तथा वैचारिक व सामाजिक आंदोलनों को आगे बढ़ाकर सर्वहारा की संस्कृति को इनके हमलों से बचा कर उर्जा प्रदान कर सकते हैं । फिर भी जब तक साम्राज्यवाद और पूंजीवाद का बोलबाला है ,इसका गहरा प्रभाव सर्वहारा तथा मेहनतकश वर्ग की संस्कृति पर बना रहेगा I

Tuesday, 25 May 2021

काले दिन और काली रातों से गुजरते हुए ! -नरेंद्र कुमार


अंधेरी काली रात में तारे जगमगाते हैं 
चांद आता है और
रोशनी कर अंधेरे को भगाता है 
 छिपा लेता है चांद तारों को
 गहराती काली रात का अंधेरा इठलाता है
रोशनी चाहने वालों 
अब नहीं देख पाओगे सितारों का नजारा 
उजाले के साथ अंधेरे से
 उज्जवल धवल चमकते दिन 
और चांदनी रात की तरह 
काली रातों को भी प्यार करना सीखो 
जो लोग कालिमा में हीनता का भाव देखते हैं 
जो लोग रंगभेद के सौंदर्यशास्त्र में
 काले रंगों के सौंदर्य को नहीं समझते हैं
 उनके लिए मेरा सौंदर्य काले बादलों से निखरता है 
हमारा सौंदर्य 
फौलादी काले इस्पात से आकार लेता है 
हमारा सौंदर्य 
काली रात और काले बादलों से घिर गए 
कालिमा को विस्तार देता
तूफान के समय के काले दिन में भी
 विस्तार पाता है
काला रंग का अपना एक अर्थ है
शब्दों के आगे खड़ा होकर
यह शब्द का अर्थ बदल देता है 
इसलिए किसी रंग का सौंदर्य
 किसी रंग से नहीं जुड़ा है
 काले रंग का और सभी रंगों का सौंदर्य
 उसके पीछे खड़े संज्ञा से जुड़ा है 
किसी भी देश और समाज का सौंदर्य
 सिर्फ उसके रंगों से तय नहीं होता है
 उस रंग के पीछे खड़े लोगों के 
संघर्ष के इतिहास और संघर्ष के इरादे
 सृजन की उनकी आकांक्षा और 
उनकी गतिशीलता से तय होता है 
काला रंग प्रतिरोध का रंग है 
लेकिन यह अंधेरे का भी प्रतीक है 
काला फौलाद संघर्ष और 
काले ऑक्सीजन के सिलेंडर
जीवन का प्रतीक है
अंधेरी रातों में साजिश रचे जाते हैं
और हत्या के मंसूबों को अंजाम देते वक्त 
रात का अंधेरा
काली रात का प्रतीक
हमें डराता भी है 
मनुष्य के लिए यह भयावह  है
लेकिन उसी काली रात के अंधेरे में
युवा जोड़ियां आलिंगनबद्ध हो
मनुष्य की नई पीढ़ियों के
सृजन के नीव  भी रखते हैं

Sunday, 16 May 2021

कार्ल मार्क्स को याद करते हुए ! कविता

मनुष्य के लिए इतना प्यार कहां से लाए थे कार्ल मार्क्स !

कार्ल मार्क्स को याद करते हुए !

मनुष्य के लिए
इतना प्यार कहां से लाए थे 
कार्ल मार्क्स 
मनुष्य से तो प्यार 
बुद्ध ने भी किया 
टॉल्सटॉय ने भी किया
लेकिन तुम्हारे प्यार में वह क्या था 
जो इन लोगों से तुम्हें अलग करता है
 क्या जीवन के लिए
 सिर्फ प्यार ही काफी है
 यदि ऐसा ही होता
 तो तुम भी बुद्ध होते या फिर
 टॉल्सटाय की तरह  होते
तुम भी अहिंसा की बात करते 
 त्याग की बात करते 
 संसारिक कष्टों से मुक्ति की बात करते
तुमने तो मनुष्य को
 ब्रह्मांड के सबसे ऊंचे मुकाम पर 
पहुंचने की बात की 
तुमने प्रकृति के साथ संघर्ष और 
रागात्मक संबंध बनाने की बात की
 तुमने मनुष्य और प्रकृति के खिलाफ
 षड्यंत्र करने वालों के खिलाफ
 युद्ध की घोषणा की 
तुमने व्यक्ति के ऊपर
 समाज के महत्व को स्थापित किया
 तुमने प्रकृति और मनुष्य के
 द्वंद्व को उद्घाटित किया 
 समाज और प्रकृति की गति को 
समझने का नियम दिया 
तुमने जीवित श्रम शक्ति के मृत्यु के रहस्य
और मृत श्रम शक्ति के जीवन और गति के रहस्य को
दुनिया के सामने लाया
और बताया कि प्रेतात्मा बन गए 
जीवित श्रम शक्ति को
अपने नियंत्रण में लेकर 
जबतक जीवित श्रम शक्ति 
समाज के अधीन न कर दे 
यह मनुष्य को तबाह कर ती रहेगी
इस तबाही को हम रोजझेल रहे हैं 
कार्ल मार्क्स 
और याद कर रहे हैं 
कहां हम कमजोर पड़े 
प्रेत आत्माओं के खिलाफ
हम युद्ध के संचालन में

Narendra Kumar 

Saturday, 24 April 2021

साम्राज्यवाद का युग और लेनिन का समाजवाद - नरेंद्र कुमार


मार्क्स ने पूंजीवादी उत्पादन संबंधों का अध्ययन करके क्रांति तथा वैज्ञानिक समाजवाद की रूपरेखा प्रस्तुत की । लेकिन इस गतिशील इतिहास में पूंजी के विकास का भी एक लंबा इतिहास है । सूदखोरी पूंजी , व्यापारिक पूंजी तथा औद्योगिक पूंजी के रूप में पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को जब वित्त पूंजी अपने नियंत्रण में लेने लगा और विकसित देशों में संकेंद्रित पूंजी पिछड़े देशों में  निवेश होने लगा तो लेनिन ने 'साम्राज्यवाद पूंजीवाद की चरम अवस्था  ' पुस्तक की रचना की । इस पुस्तक में लेनिन ने वित्त पूंजी के अधीन में जा रही पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था की अद्भुत व्याख्या प्रस्तुत की है । लेनिन ने लिखा है कि अब उत्पादन में वह पूंजीपति बाजार और अर्थव्यवस्था का नियंता नहीं रह गया जो अपने व्यापारिक बुद्धि और ज्ञान से किसी नए उत्पाद का उत्पादन करता है और बाजार में लाता है , बल्कि विश्व अर्थव्यवस्था पर उस पूंजीपति का नियंत्रण होता है जो वित्तीय हेरफेर और तोड़ जोड़ का उस्ताद है । बीसवीं सदी के अंतिम दशक तथा 21 वीं सदी में हम देख रहे हैं की पूरी दुनिया तथा भारत में भी ऐसे वर्गों और पूंजीपतियों का तेजी से विकास हुआ है जो वित्तीय हेराफेरी और सट्टेबाजी के द्वारा धन कमा रहे हैं । लेकिन लेनिन स्पष्ट करते हैं कि उत्पादन की प्रक्रिया पूरी तरह से जारी रहती है .लेकिन इस पर नियंत्रण पित्त पूंजी के उस्तादों का रहता है ।पादन के क्षेत्र में ही अतिरिक्त मूल्य तथा मुनाफा का सृजन होता है जिसे वित्त पूंजी के मालिक अपने विभिन्न हथकंडो के द्वारा हड़प लेते हैं।पूंजी के मालिकों के हाथ पूरी दुनिया की का संकेंद्रण हो रहा है । उस धन को  उत्पादन के क्षेत्र में  छोटे से लेकर एकाधिकार पूंजीपतियों के नियंत्रण में चलने वाले उद्योगों में मजदूर पैदा करते हैं लेकिन उस पर अंततः नियंत्रण  होता है विभिन्न वित्तीय हेराफेरी के कारोबार में लगे उस्तादों का ।  यही कारण रहा है कि पिछले दशकों में उत्पादन के क्षेत्र में लगे पूंजीपति भी तेजी से वित्तीय हेराफेरी यानी सट्टेबाजी , बीमा , हेज फंड बैंक आदि में अपनी अकूत पूंजी का निवेश कर रहे हैं ।
पिछड़े देशों में जब वित्त पूंजी का निवेश होता है और छोटे उत्पादकों को यह अपने प्रसार और फैलाव के लिए सहयोगी बनाती है, तब सामाजिक आधार के रूप में ये तमाम छोटे उत्पादक उसके पीछे हो लेते हैं । भारत में भी पिछले दशकों में वित्त तथा एकाधिकार पूंजी के निवेश से जो पूंजीवाद का फैलाव हुआ है,उसने छोटे उत्पादकों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की ।
 कृषि के क्षेत्र में भी पूंजीवाद का विकास हुआ और ग्रामीण क्षेत्रों में धनी किसानों की स्थिति अच्छी हुई । लेकिन इसके बाद वित्त पूंजी तथा एकाधिकार पूंजी जब छोटे उत्पादकों का संपत्तिहरण करने की मुहिम चलाती है , तो ये छोटे उत्पादक अपनी रक्षा के लिए सड़क पर आ जाते हैं । यही वह अवस्था है जब लेनिन और सभी लेनिनवादी संगठन छोटे उत्पादकों को वित्त पूंजी के चरित्र को समझाने का अभियान चलाते हैं । इस अभियान में वित्त पूंजी तथा एकाधिकार पूंजी की लूट और हमले के विरोध में हम छोटे उत्पादकों के साथ खड़े होते हैं लेकिन साथ ही राजनीतिक तौर पर उन्हें यह बार-बार बताते हैं कि अब पूंजीवाद में उनका कोई भविष्य नहीं है । यह ऐसी स्थिति है कि जब सुसंगठित मजदूर वर्ग तथा उसकी पार्टी शासन और सत्ता अपने हाथ पर लेने के लिए तैयार हो जाता है । तब वह छोटे उत्पादकों को शोषक वर्ग के रूप में सुरक्षित रहने की गारंटी न देकर एक विकसित सामाजिक उत्पादन व्यवस्था के हिस्सा के रूप में बेहतर जीवन की गारंटी देता है । लेनिन ने रूस में इसी कार्य की रूपरेखा समाजवादी क्रांति के रूप में प्रस्तुत किया जिसे  किसानों के खेती के सामूहिकरण के द्वारा आगे बढ़ाया।लेकिन अगर मजदूर राज्य सत्ता लेने की स्थिति में ना हो तो क्या हमें वित्त पूंजी के खिलाफ अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं छोटे उत्पादकों के साथ खड़ा नहीं होना चाहिए ?
हम उनके साथ अवश्य खड़ा होंगे । पूंजीवादी व्यवस्था के अंतर्विरोध के बीच हमारी लड़ाई हमेशा वित्त पूंजी के खिलाफ खड़ा होने वाले सभी वर्गों के साथ व्यापक एकता की है ।यह व्यापक उभरता संघर्ष हमें समाजवाद की अनिवार्यता को समझाने में सहयोगी बनता है | भारत का वर्तमान किसान आंदोलन ऐसे ही छोटे उत्पादकों का संघर्ष है । वित पूंजी , साम्राज्यवाद व एकाधिकार पूंजी के खिलाफ यह आंदोलन लगातार ज्यादा स्पष्ट के साथ खड़ा होता जा रहा है |यदि मजदूर वर्ग का आंदोलन और संगठन मजबूत होता , तो हमें निर्णायक लड़ाई की तरफ बढ़ सकते थे और इनका बड़ा हिस्सा हमारे साथ आ भी सकता था । लेकिन जब मजदूर वर्ग खुद संगठित नहीं है, मजदूर आंदोलन खुद बिखरा हुआ है तो किसान आंदोलन तथा ऐसे तमाम छोटे उत्पादकों का आंदोलन एक सीमा के बाद समझौते और सुधारों के संतुलन में ठहराव का शिकार हो जाएगा । तब भी यह आंदोलन जनता को बहुत कुछ सिखा रही है और आगे भी सिखाए सिखाएगी ।
साम्राज्यवाद के युग में वित्त पूंजी तथा उसके अधीन काम करने वाले एकाधिकार पूंजीपति का बोलबाला रहता है। आज छोटे पूंजीपति स्वतंत्र भूमिका अदा करने की स्थिति में नहीं है । वित्त पूंजी डब्ल्यूटीओ के माध्यम से और भूमंडलीकरण की नीतियों के तहत पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर अपना नियंत्रण स्थापित कर चुका है । ऐसी स्थिति में बड़े पैमाने पर छोटे उत्पादक (किसान , दस्तकार तथा छोटी पूंजी के मालिक ) संपत्तिहरण के शिकार होंगे और हो रहे हैं । लेनिन इन तमाम वर्गों को सिखाते हैं कि साम्राज्यवाद और वित्त पूंजी आपको अंततः नष्ट कर देगा , इसलिए आप अपने स्वतंत्र अस्तित्व को के बजाय समाजवाद की लड़ाई में शामिल हों । लेनिन इन वर्गों की तबाही को रोकने के लिए समाजवाद में इन्हें सामाजीकरण की प्रक्रिया में शामिल करने का योजना भी प्रस्तुत करते हैं । इसीलिए रूस में क्रांति के बाद भी छोटे उत्पादक किसान और दूसरे साधनों के मालिक वर्ग को सामूहिककरण तथा बड़े उद्योगों के विकास में हमराही बनाया और उनकी उत्पादन क्षमता और ज्ञान को समाजवाद के निर्माण में हिस्सेदार बनाया । लेकिन उनके बीच के जिन लोगों ने समाजवाद का साथ न चल करके पूंजीवाद स्थापित करने की कोशिश की J उनके साथ सर्वहारा वर्ग की तानाशाही वाले राज्य ने दृढ़ता के साथ मुकाबला किया ।
साम्राज्यवाद के युग में, वित्त पूंजी के अंतरराष्ट्रीय संबंधों, आदतों तथा मालिक होने की आकांक्षा और खास करके बड़े पैमाने पर छोटे उत्पादकों की उपस्थिति के कारण समाजवाद के खिलाफ इन सभी संपत्तिशाली वर्गों के संगठित हमले का खतरा हमेशा बना रहता है । इसीलिए पूरे समाजवाद के दौर में सर्वहारा वर्ग के राज्य की तानाशाही अनिवार्य है ।पेरिस कम्यून तथा फ्रांस की क्रांति के अनुभव के आधार पर मार्क्स  ने से इसे मजबूती के साथ स्थापित किया । यूं कहें कि सर्वहारा के राज्य की स्थापना के बगैर मार्क्सवाद मार्क्सवाद नहीं रह जाता है l इसे हटा कर कई लोगों ने मार्क्सवाद को सुधारबाद में बदलने की कोशिश की जिन का विरोध करते हुए लेनिन ने अपनी पुस्तक 'राज्य और क्रांति ' में मजबूती के साथ सर्वहारा वर्ग की तानाशाही को स्थापित किया । सर्वहारा वर्ग की तानाशाही सर्वहारा वर्ग के राज्य की सुरक्षा का आधार है । जो लोग भी सर्वहारा वर्ग की तानाशाही का विरोध जनवाद के नाम पर करते हैं , दरअसल मुट्ठी भर पूंजीवादी तथा मध्य वर्ग की तानाशाही की वकालत करते हैं ।
एक कटु सच्चाई है की सर्वहारा वर्ग का पिछड़ा होना , उसकी पिछड़ी संस्कृति पूंजीवाद के पुनर्स्थापना के खतरे को बनाए रखता है । समाजवाद के निर्माण के लिए मजदूरों के समाजवादी संस्कृति के विकास और तमाम दुनिया के ज्ञान - विज्ञान और वैचारिक विश्लेषण करने की क्षमता को प्राप्त करने के लिए लेनिन सर्वहारा वर्ग का आवाहन करते हैं। समाजवाद पराजित हुआ है तो उसका कारण वित्त पूजी के नेतृत्व में पूंजी का हमला तथा सर्वहारा वर्ग का सांस्कृतिक और चेतना के स्तर पर पिछड़ा होना महत्वपूर्ण पक्ष है |आज के कार्यभार के रूप में सभी लेनिनवादी संगठनों को सर्वहारा वर्ग के अंदर जनवाद और समाजवादी संस्कृति के विकास के लिए विशेष तौर पर काम करना चाहिए , ताकि वे सर्वहारा वर्ग की तानाशाही के अंतर्वस्तु को समझ सके और उसे लागू करते हुए समाजवाद का निर्माण कर सकें ।


➖➖➖➖➖➖➖➖


Monday, 22 February 2021

किसान आंदोलन के संदर्भ में मार्क्सवाद और अंबेडकर वाद का फर्क !


मार्क्सवाद तथा अंबेडकरबाद में एक बड़ा फर्क है । वह है मार्क्सवाद के द्वंदात्मक भौतिकवाद तथा अंबेडकरवाद के भाववाद के बीच।  मार्क्स ने द्वंदात्मक भौतिकवादी दृष्टिकोण से इतिहास को गति देने वाले वर्ग संघर्ष को रेखांकित किया , जबकि भाववाद को अपने दृष्टिकोण का आधार बनाने के कारण समाज के वर्गीय और सामाजिक शक्तियों को नजरअंदाज कर अंबेडकर अतीत में बुध के भाववादी विचारों के माध्यम से वर्तमान के जाति उत्पीड़न का समाधान खोजना शुरू किया। सच्चाई यह है कि बुद्ध भी अपने समय में उत्पादक शक्तियों में सबसे उन्नत  कृषक और व्यापारियों को अपने सामाजिक आंदोलन का आधार बनाया था।
  इस पूरी प्रक्रिया में यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि वर्ग संघर्ष को हाशिए पर डालने के लिए पूरी दुनिया में वित्त पूंजी के माध्यम से चलने वाले विश्वविद्यालय तथा एनजीओ ने वर्ग संघर्ष की जगह पर जाति ,धर्म 'क्षेत्र और पहचान की लड़ाई को आगे बढ़ाया। लेकिन पिछले तीन दशकों में नवउदारवादी नीति के तहत बड़ी पूंजी ने वित्त पूंजी के साथ मिलकर के सभी देशों में जो मेहनतकशों और छोटी पूंजी के मालिकों के ऊपर जो कत्लेआम मचाया है , उसके बाद से वर्ग संघर्ष एक बार फिर से पूरी दुनिया में जीवंत हो चुका है। बड़ी पूंजी के फंडों से चलने वाले विश्व विद्यालय और एनजीओ मार्क्सवाद तथा वर्ग संघर्ष की विचारधारा को आउटडेटेड घोषित कर चुका था । लेकिन पूरी दुनिया में और आज की तारीख में भारत का किसान आंदोलन एक बार फिर से इस बात को स्थापित कर रहा है कि वर्ग संघर्ष  ही इतिहास को गति देने वाली और समाज को बदलने वाली मुख्य शक्ति बनेगी।

नरेंद्र कुमार

किसान आंदोलन को जन आंदोलन के रूप में गांव शहर फैला दो !


वित्त पूंजी तथा भारतीय एकाधिकार पूंजी के संयुक्त हमले के खिलाफ संगठित हों। मोदी सरकार ने कृषि कानून तथा श्रम कानूनों में संशोधन कर मजदूरों और किसानों की कमाई तथा साधन छीन कर बड़े पूंजीपतियों के हवाले करने के लिए अड़ी है। किसान आंदोलन के साथ-साथ मजदूरों का आंदोलन और फिर पूंजी के रखवाली इस व्यवस्था के खिलाफ व्यापक जनांदोलन आज समय की मांग है। डब्ल्यूटीओ, विश्व बैंक तथा वित्त पूंजी के परजीवी मालिकों के खिलाफ विकल्प पेश करने के लिए , एक नई व्यवस्था के निर्माण के लिए , तमाम साधनों के सामाजीकरण और सभी मेहनत करने वालों के लिए बेहतर जीवन सुनिश्चित करने के लिए , रोजगार मुहैया कराने के लिए एकजुट हो ।

नरेंद्र कुमार

Thursday, 18 February 2021

दुपट्टा से बांधी गई मेरी बच्चियों ! -नरेंद्र कुमार

#दुपट्टा से बांधी गई मेरी बच्चियों !
तुम्हारी तकलीफ :
तुम्हारा यह उत्पीड़न 
हमारे लिए
असहनीय !
निशब्द हूँ मैं !
 हम अपनी किस कमजोरी की
 सजा पा रहे हैं !
क्या हम अपनी इस कमजोरी से
 उबर पाएंगे !
सदियों से बांटकर जातियों में
 शोषण और उत्पीड़न को जारी रखने का
 कानून बनाया गया 
कभी मनुस्मृति के रूप में तो 
कभी दुनिया भर के लोकतंत्र के संविधान के रूप में
कभी आधुनिक संविधान लिखने वालों ने भी
 चुनौती नहीं दी 
शोषण उत्पीड़न के उस स्वरूप को 
जिसके पीछे चलता है शासन पूंजी के तंत्र का 
कोई नहीं खड़ा होता है पूंजी के इस तंत्र को
 खुलेआम चुनौती देने के लिए
 और पूंजी का यह तंत्र
 बांटता है हमें कभी धर्म 
कभी क्षेत्र के रूप में 
कभी  राष्ट्र के रूप में 
और सब जगह पूरी दुनिया में 
निर्बाध गति से गतिशील है यह
 लोग पलक पाखरे बिछाए हुए हैं
 इसके आगमन के लिए 
 इसके आलिंगन के लिए
इसे अपने जन जन के रक्त से स्नान कराने के लिए
 यह पवित्र है , दुनिया का सबसे पवित्र वस्तु 
और इसके साथ सामाजिक संबंधों में बंधा
 वह हर वर्ग जिसका रुधिर यह चूसता है
 वह अपवित्र है
सारी दुनिया के लिए तुम भी 
इसी अपवित्र समाज का हिस्सा हो 
मेरी प्यारी बच्चियों !
 और इसीलिए अपने समाज की पवित्रता के लिए 
तुम्हें और हमें जलाना ही होगा
 इस पवित्र वस्तु से जुड़े पूरे
सामाजिक संबंधों को
 हमें जलना ही होगा
 वर्ग संघर्ष की आग में
चल रहे हैं किसान और उनके बच्चे
अपने देश के अंदर और बाहर की सरहदों पर
 हमें जलाना होगा
 स्त्रियों और मेहनतकशों को बांधने वाले
उन तमाम सामाजिक संबंधों को
संस्कृति से लेकर उन दुपट्टो और फंदों को
जिस से बांध दिए जाते हो या लटक जाते हैं
 तुम जैसी बच्चियां , स्त्रियां और कर्ज से दबे किसान
हमें जलना होगा
अपने समय के सबसे ज्वलंत सवालों से !

Tuesday, 19 January 2021

किसान आंदोलन और मजदूर वर्ग की भूमिका - नरेंद्र कुमार

आज के किसान आंदोलन में एंगेल्स तथा लेनिन के विचारों के आधार पर मजदूर वर्ग की क्या भूमिका हो ?

कई साथी सिर्फ लेनिन तथा एंगेल्स के उद्धरण पेश कर रहे हैं. उन्हें आज के किसान आंदोलन के संदर्भ में उसका विश्लेषण भी पेश करना चाहिए. इस लेख में 'फ्रांस तथा जर्मनी में किसान का सवाल' लेख से दो उद्धरण पेश किए जा रहे हैं जिसका कई साथी संदर्भ से हट कर अलग - अलग अर्थ निकाल रहे हैं, जबकि एक ही लेख में किसानों के प्रति संपूर्णता में मजदूर वर्ग और उसकी पार्टी के दृष्टिकोण को पेश करने के लिए एंगेल्स ने ये सारी बातें लिखी हैं. 

पहले एंगेल्स के उस पक्ष को उद्धृत कर विचार किया जाए जिसमें वह पूंजीवाद में छोटी खेती के पुराने उत्पादन संबंध को अनिवार्य रूप से समाप्त होने की बात करते हैं. एंगेल्स लिखते हैं-- 

"हमारी पार्टी का यह कर्तव्य है कि किसानों को बारंबार स्पष्टता के साथ जताए कि •पूंजीवाद का बोलबाला रहते हुए उनकी स्थिति पूर्णतया निराशापूर्ण है, कि •उनकी छोटी जोतों को इस रूप में बरकरार रखना एकदम असंभव है, कि •बड़े पैमाने का पूंजीवादी उत्पादन, उनके छोटे उत्पादन की अशक्त, जीर्ण-शीर्ण प्रणाली को उसी तरह कुचल देगा, जिस तरह रेलगाड़ी ठेला गाड़ी को कुचल देती है.

ऐसा करके हम आर्थिक विकास की अनिवार्य प्रवृत्ति के अनुरूप कार्य करेंगे और यह विकास एक न एक दिन छोटे किसानों के मन में हमारी बात को बैठाए  बिना नहीं रह सकता." (पृ.385)

तो क्या यह बात भारत के आंदोलनकारी किसानों को उनके आंदोलन से दूर रहकर मजदूर वर्ग समझा सकता है? 

हम किसान आंदोलन में मजदूर वर्ग के कई संगठनों को बड़ी पूंजी और फासीवादी सरकार के खिलाफ किसानों के संघर्ष का समर्थन तथा उसमें भागेदारी करते पा रहे हैं. ऐसे ही मजदूर संगठन के कार्यकर्ताओं को एक ऐसी पुस्तिका बेचते और बताते पाया कि जिसमें बताया गया है कि 'छोटे किसानों की खेती पूंजीवाद में अनिवार्य रूप से तबाह हो जाएगी.'

मजदूरों का यह संगठन पूरी सक्रियता से दिल्ली के आसपास के किसान आंदोलन में भागीदारी कर रहा है. किसान उनकी बात सुन रहे हैं, लेकिन क्या इस आंदोलन से दूर रहकर या बड़े पूंजीपतियों और फासीवादी सरकार के खिलाफ चल रहे आंदोलन का उपहास करते हुए, उन्हें यह बात समझायी जा सकती है ?

अपने उसी लेख में एंगेल्स आगे लिखते हैं,"

....मझोला किसान जहां छोटी जोत वाले किसानों के बीच रहता है, वहां उसके हित और विचार उनके हित और विचारों से बहुत अधिक भिन्न नहीं होते. वह अपने तजुर्बे से जानता है कि उसके जैसे कितने ही लोग छोटे किसानों की हालत में पहुंच चुके हैं, पर जहां मझोले और बड़े किसानों का प्राधान्य होता है और कृषि के संचालन के लिए आम तौर पर नौकर और नौकरानियों की आवश्यकता होती है, वहां बात बिल्कुल दूसरी ही है. कहने की जरूरत नहीं कि मजदूरों की पार्टी को प्रथमत: उजरती मजदूरों की ओर से, यानी इन नौकरों- नौकरानियों और दिहाड़ीदार मजदूरों की ओर से ही लड़ना है. किसानों से ऐसा कोई वादा करना निर्विवाद रूप से निषिद्ध है, जिसमें मजदूरों की उजरती गुलामी को जारी रखना सम्मिलित हो; परंतु जब तक बड़े और मझोले किसानों का अस्तित्व है, वे उजरती मजदूरों के बिना काम नहीं चला सकते. इसलिए छोटी जोत वाले किसानों को हमारा यह आश्वासन देना कि वह इस रूप में सदा बने रह सकते हैं, जहां मूर्खता की पराकाष्ठा होगी, वहां बड़े और मझोले किसानों को यह आश्वासन देना गद्दारी की सीमा तक पहुंच जाना होगा. (पृ.385-86)

किसानों के अन्य पूंजीवादी प्रवृत्तियों और कमजोरियों पर प्रकाश डालते हुए एंगेल्स लिखते हैं : -

...." हमें आर्थिक दृष्टि से यह पक्का यकीन है कि छोटे किसानों की तरह, बड़े और मझोले किसान भी अवश्य ही पूँजीवादी उत्पादन और सस्ते विदेशी गल्ले की होड़ के शिकार बन जायेंगे. यह इन किसानों की भी बढ़ती हुई ऋणग्रस्तता और सभी जगह दिखाई पड़ रही अवनति से सिद्ध हो जाता है.."(पृ.386)  
   
आज के किसान आंदोलन में भागीदारी कर रहे छोटे, यहां तक की बड़े किसान भी, मजदूर वर्ग की पार्टी या संगठन द्वारा समझाने के पहले ही, यह समझ रहे हैं कि "बड़ी पूंजी के हमले के कारण उनकी खेती उजड़ जाएगी."

जाहिर सी बात है कि एक वर्ग के रूप में छोटी पूंजी के मालिक यानी टुटपुंजिया वर्ग, बड़ी पूंजी के हमले के खिलाफ अपने अस्तित्व के बचाव के लिए लड़ेगा ही. 

कोई भी मजदूर वर्ग की पार्टी, उसे बड़ी पूंजी के सामने आत्मसमर्पण करने की सलाह नहीं दे सकता है! यदि आप उसका उपहास उड़ाएंगे या आप उसे ज्ञान देंगे कि तुम्हारी बर्बादी निश्चित है तो उन किसानों का जवाब होगा कि: 

"बंधु ! बर्बाद होने से तो लड़ते-लड़ते मर जाना अच्छा है!'

इसलिए पूंजीवाद के सामने निष्क्रिय विरोध या आत्मसमर्पण कर देने की सलाह, हम कतई नहीं दे सकते हैं. चुपचाप रह जाने की नीति पर चलते हुए जो साथी सिर्फ उद्धरणों को पेश करते हैं उनसे हमारा सवाल है कि "आप किसानों को क्या कहना चाहते हैं ? क्या उन्हें लड़ाई नहीं लड़नी चाहिए? बड़ी पूंजी तथा फासीवादी शक्तियों के खिलाफ अपने अस्तित्व की लड़ाई के लिए क्या किसानों को चुपचाप से बड़ी पूंजी के इस हमले को सहते हुए बिखर जाना चाहिए ?"

एंगेल्स चुप्पी या निष्क्रयता का विरोध करते हैं. वह पूंजीवाद के द्वारा किसानों की तबाही होने तक इंतजार करने की राजनीति का भी विरोध करते हैं. मजदूर वर्ग की ऐतिहासिक जिम्मेवारी को बताते हुए और किसानों को मजदूर वर्ग के साथ ला खड़ा करने के लिए स्पष्ट दिशा निर्देशन देते हुए एंगेल्स आगे लिखते हैं, 

"सर्वहारा की पांतों में जबरन ढकेले जाने से हम जितने ही अधिक किसानों को बचा सकें, जितने अधिक को किसान रहते हुए ही हम अपनी ओर कर सकें, उतनी ही जल्दी और आसानी से सामाजिक कायापलट संपन्न होगा. इस कायापलट को तब तक टालने से, जब तक कि पूंजीवादी उत्पादन सर्वत्र अपनी चरम परिणति पर ना पहुंच जाए और हर छोटा दस्तकार और हर छोटा किसान, बड़े पैमाने के पूंजीवादी उत्पादन का शिकार न बन जाए, हमारा कोई हित साधन नहीं होगा. इसके लिए किसानों के हितार्थ जो माली कुर्बानी करनी होगी. जिसकी पूर्ति सार्वजनिक कोष से की जाएगी, वह पूंजीवादी अर्थतंत्र के दृष्टिकोण से पैसों की बर्बादी मानी जा सकती है, किंतु वस्तुतः धन का अति उत्तम विनियोग है, क्योंकि उससे आम सामाजिक पुनः संगठन के खर्च में संभवत 10 गुनी बचत होगी. अतः इस अर्थ में किसानों के साथ हम अत्यंत उदारता का व्यवहार करने में समर्थ है."
  
[फ्रांस और जर्मनी में किसानों का सवाल पुस्तिका में एंगेल्स के विचार...खंड 3 भाग 2]

ये उद्धरण एक ही लेख में लगभग एक ही जगह हैं, इसलिए इन दोनों उद्धरण को संपूर्णता में ही समझा जाना चाहिए और वर्तमान आंदोलन से जोड़कर इसकी व्याख्या की जानी चाहिए. 

एंगेल्स  लिखते हैं कि छोटे किसानों की तबाही के लिए इंतजार करने में मजदूर वर्ग का कोई भला नहीं है. 

यही वह महत्त्वपूर्ण पंक्ति है जो हमें इस आंदोलन के समर्थन में खड़ा होते हुए पूंजीवाद के हमले में किसानो की खेती के अनिवार्य तौर पर तबाही की बात मजदूरों द्वारा किसानों को समझाने का निर्देश देता है.
 
भारत के किसान एक दमनकारी फासीवादी राज्य से लड़ रहे हैं!

वे वित्त पूंजी और एकाधिकार पूंजी के बड़े हमले के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं.

इस संघर्ष में साथ देकर ही सामान्य किसानों को समझ में आ सकता है कि "पूंजीवाद के अंतर्गत वे अपनी खेती नहीं बचा सकते हैं."
 
एंगेल्स तथा लेनिन जब इस तरह की बातें कहते हैं तो किसानों के सामने कहीं उन से आगे बढ़कर लड़ने और नेतृत्व देनेवाले संगठित मजदूर वर्ग खड़े होते हैं. 

आज भारत में मजदूर वर्ग और उनके संगठन की भारी कमजोरी यह है कि श्रम कानूनों में लगातार मजदूर विरोधी होने वाले सुधारों और मजदूर वर्ग के छीने जा रहे अधिकारों के बावजूद, पूंजीवाद और उसकी फासीवादी सत्ता के खिलाफ कोई बड़ा प्रतिरोध संघर्ष खड़ा नहीं कर पाए हैं. 

ऐसी स्थिति में हम किसानों को मजदूरों के पीछे आने के लिए राजनीतिक तौर पर आवाहन करने का भौतिक आधार भी तैयार नहीं कर पा रहे हैं. 

इसलिए सबसे पहले तो मजदूर वर्ग की जितनी भी ताकत है, उसे संगठित करके मजदूर वर्ग को श्रम कानूनों में हुए सुधारों के खिलाफ मजबूत संघर्ष की तैयारी करनी चाहिए. साथ ही जन विरोधी कृषि कानूनों के खिलाफ संघर्ष को आगे ले जाना चाहिए और किसानों को इस लड़ाई में साथ देने का आवाहन करना चाहिए, न कि हमें किसानों की इस लड़ाई को धनी किसानों की लड़ाई कह कर, चुप रहना चाहिए या मजदूर वर्ग को इससे अलग रहने की सलाह देनी चाहिए. 

वर्तमान में आंदोलनकारी किसान इस बात को - समझ रहे हैं कि वे तबाह होने वाले हैं, इसीलिए वे लड़ रहे हैं. वे भले इतिहास की गति नहीं समझ रहे हों, लेकिन इतिहास ने किसानों पर समाजवाद के निर्माण की जिम्मेदारी भी नहीं दी है. यह जिम्मेवारी मजदूर वर्ग, उसके संगठन और पार्टी को दी है जिनमें कई ऐसे ऐतिहासिक क्षण में या तो चुप हैं या उद्धरण का खेल खेलते रहे हैं और सिर्फ लंबे-लंबे लेख लिखते रहे हैं!

जब छोटे और मझोले किसान बड़े पूंजीपतियों से और राज्य से अपने अस्तित्व के लिए लड़ रहे हों तो ये सारी बातें उन्हें समझाते हुए हमें क्या तटस्थ रहना चाहिए या बड़ी पूंजी के खिलाफ और फासीवादी राज्य के खिलाफ उनके संघर्ष का समर्थन करना चाहिए ? 

एंगेल्स तथा लेनिन अपनी रचनाओं में इस बात पर जोर देते हैं कि समाजवादी यानी मजदूर वर्ग की पार्टी, उनकी छोटी जोत को बचाए रखने की गारंटी नहीं दे सकते हैं. यानी पूंजीवाद के रहते हुए बड़ी पूंजी उनकी छोटी पूंजी को अनिवार्य रूप से निगल जाएगा. इसलिए किसानों को बड़ी पूंजी के खिलाफ संघर्ष करते हुए मजदूरों के साथ तथा मजदूरों के नेतृत्व में आना चाहिए और समाजवाद के लिए संघर्ष में साथ देना चाहिए, ताकि उनके उत्पादों का सही मूल्य मिल सके और तर्कपूर्ण ढंग से मुनाफा के बजाए समाज की आवश्यकओं को केंद्र में रखकर उत्पादन किया जा सके और समाज के लिए उसे उपयोग में लाया जा सके. बदले में किसानों को समाजवादी राज्य उत्पादन के तमाम साधनों तथा उत्पादों को पूरी तरह से खरीदने की गारंटी देगी. 

इस तरह से किसानों को एक बेहतर जीवन दिया जा सकेगा. समाजवादी राज्य ने सोवियत संघ में यही किया था. हमें लेनिन की यह बात याद रखना चाहिए---

"सर्वहारा वर्ग वस्तुतः क्रांतिकारी, वस्तुतः समाजवादी ढंग से काम करने वाला वर्ग, केवल उसी सूरत में होता है, जब वह समस्त मेहनतकशों तथा शोषितों के हरावल के रूप में शोषकों का तख्ता पलटने के लिए संघर्ष में उनके नेता के रूप में सामने आता है और काम करता है. परंतु यह काम वर्ग संघर्ष देहात में पहुंचाए बिना, देहात के मेहनतकश जनसाधारण को शहरी सर्वहारा की कम्युनिस्ट पार्टी के इर्द-गिर्द एकबद्ध किए बिना, सर्वहारा वर्ग द्वारा देहाती मेहनतकशों को शिक्षित-दीक्षित किए बिना पूरा नहीं हो सकता." 
[कृषि प्रश्न पर थिसिसों का आरंभिक मसविदा, लेनिन नई संकलित रचनाएं, भाग- 4"]

भारत के आज की स्थिति में यह स्वीकार करना चाहिए कि लेनिन ने सर्वहारा वर्ग के जिस कार्यभार को रेखांकित किया है, उसे भारत के मजदूर वर्ग और उनके  संगठन   पेश कर में असफल रहे हैं. अन्य शोषित उत्पीड़ित वर्गों के आंदोलन के समय ऐसी पहलकदमी का सर्वथा अभाव रहा है. 

अनिवार्य रूप से हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि मजदूर वर्ग, मजदूर आंदोलन के साथ-साथ किसान आंदोलन को संगठित करने में ऐतिहासिक तौर पर यदि असफल नहीं रही, तो कमजोर अवश्य रही है. मजदूर आंदोलन ट्रेड यूनियन की सीमाओं से आगे नहीं बढ़ पाया. आज तो ट्रेड यूनियन की सीमाओं में लड़े जाने वाले श्रम कानूनों में पूंजी के पक्ष में हो रहे संशोधनों के खिलाफ भी युनियन नहीं लड़ पा रही है. साथ ही किसान सहित अन्य जनवादी आंदोलनों में अपनी भागीदारी करने में काफी पीछे रह रही है. ऐसी स्थिति में हमें मजदूर वर्ग के बीच में काम करने वाले राजनीतिक संगठन के तौर पर अपना आत्मअवलोकन करना चाहिए क्योंकि मजदूरों के मजबूत और राजनीतिक संघर्ष को खड़ा किए बगैर, किसान या दूसरे शोषित उत्पीड़ित समाज, उसके नेतृत्व में या उसके साथ कैसे और क्यों आएंगे ?

●कम्युनिस्ट सेंटर फॉर साइंटिफिक सोशलिज्म
Narendra Kumar

१९५३ में स्टालिन की शव यात्रा पर उमड़ा सैलाब 

*On this day in 1953, a sea of humanity thronged the streets for Stalin's funeral procession.* Joseph Stalin, the Soviet Union's fea...