अपनी पुस्तक 'जाति का सफ़ाया' (Annihilation of Caste) में अम्बेडकर जाति-उन्मूलन का प्रस्ताव रखते हुए, तरकश में दो तीर रखता है। एक आरक्षण और दूसरा अंतर्जातीय विवाह!
आरक्षण, सात दशक फलीभूत होता रहा इसलिए इस पर हमें सैद्धान्तिक चर्चा की जरूरत ही नहीं है, प्रैक्टिस से ही पूरा खुलासा हो रहा है। आरक्षण का लाभ, जैसा अपेक्षित ही था, दो प्रतिशत लोगों ने निगल लिया और शेष 98 प्रतिशत को दमन, शोषण, उत्पीड़न का वही नर्क झेलना पड़ रहा है। व्यापक दलित, दमित, मेहनतकश जनता के लिए आरक्षण बेमानी रहा।
अब आइए अंतर्जातीय विवाह के अम्बेडकरी प्रस्ताव की भी शव-परीक्षा कर ली जाय जो फलीभूत नहीं हुआ। यह दूसरा प्रस्ताव तो जाति-उन्मूलन के मामले में पहले से भी बड़ा प्रहसन है। पहली बात तो यह कि सिद्धांत रूप में भी यह प्रस्ताव एकतरफा है। यानि यदि ब्राह्मण की बेटी, दलित के बेटे से विवाह करे तो यह फलीभूत नहीं होगा चूंकि तब दम्पति के बच्चों को फिर दलित जाति ही नसीब होगी। दूसरे ब्राह्मण और दलितों में लड़के-लड़कियों का अनुपात 50:50 में लिया जाय और वे सब अंतर्जातीय विवाह करें तो भी वापस हम वहीं पहुंच जाएंगे। फिर उतने ही ब्राह्मण और उतने ही दलित हो जाएंगे। अम्बेडकर का फ़ॉर्मूला तभी सफ़ल हो सकता है जब सारे दलित पुरुष आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत ले लें या सामूहिक आत्महत्या कर लें और सारी दलित लड़कियों से ब्राह्मण लड़के शादी कर लें! अम्बेडकर और उसके चेलों को यह साधारण अंकगणित भी समझ नहीं आता!
अम्बेडकर का यह कार्यक्रम दरअसल अपने अंतिम परिमाण में ब्राह्मणों से इस कातर अपील के सिवा कुछ नहीं है कि वे दलित लड़कियों से विवाह करें। अम्बेडकर के इस प्रोग्राम में दलितों के लिए तो कोई आह्वान है ही नहीं।
दलितों, दमितों के लिए, जातिगत विषमता और समाजिक अन्याय के पूर्ण उन्मूलन के लिए कार्यक्रम सिर्फ़ और सिर्फ़ क्रान्तिकारी मार्क्सवाद के पास है, और वह है- सर्वहारा की सत्ता और समस्त सम्पत्ति का राष्ट्रीयकरण!
Workers' Socialist Party
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