लाभकारी मूल्य नहीं, रोजगार और जीवन निर्वाह योग्य समुचित मजदूरी!
बुर्जुआ नेता ही नहीं बहुत से वामपंथी भी किसानों की दरिद्रता, आत्महत्याओं पर हमदर्दी जताते हुए लाभकारी मूल्य की मांग करते पाए जाते हैं| पर खाद्य पदार्थ के दाम बढ़ाने की मांग 85% मेहनतकश जनता के साथ शत्रुता वाली मांग है - सिर्फ शहरी-ग्रामीण मजदूर ही नहीं खुद किसानों का अधिकांश हिस्सा ज्यादातर खाद्य सामग्री खरीदता है! यह मांग कम्युनिस्ट छोड़िये खुद को जनपक्षीय मानने वाले भी कैसे कर सकते हैं जबकि भारत की मेहनतकश जनता पहले ही दुनिया में सबसे ज्यादा कुपोषण और भूख की शिकार है| यह मांग ग्रामीण-शहरी मजदूरों, निम्न मध्यम वर्ग व 85% गरीब, सीमांत किसानों को आपस में लड़ाने वाली मांग है जो मेहनतकश जनता के संघर्षों के दुश्मन ही कर सकते हैं|
पहली बात, लाभकारी मूल्य से 85% दो हेक्टेयर से कम खेती करने वालों को कभी लाभ नहीं मिल सकता क्योंकि कम पूंजी, अधिक श्रम शक्ति के प्रयोग के कारण उनकी लागत ऊँची, उत्पादकता कम है| फिर इतनी कम उपज पर 50% लाभ मिले तब भी वह जीवन निर्वाह योग्य आमदनी से कम ही होगा|
दूसरी बात, किसानों को एक वर्ग मानना पूरी तरह गलत है - आज भी 4 हेक्टेयर या 10 एकड़ से अधिक की खेती लाभप्रद हो जाती है, लाभ की दर जमीन की मात्रा बढ़ने के साथ बढ़ती जाती है| यही वजह है कि देश के काफी हिस्सों में औसतन 60 हजार से 1 लाख रू सालाना प्रति हेक्टेयर जमीन के ठेके की दरें मौजूद हैं| बिना लाभ के यह कैसे मुमकिन है? लाभकारी मूल्य की मांग इस तबके के किसानों की मांग ही है|
तीसरी बात, क्रय क्षमता साम्यता (पर्चेजिंग पावर पेरिटी) पर देखें तो भारत में खाद्य पदार्थों के बाजार मूल्य तुलनात्मक रूप से विकसित पूंजीवादी देशों से कहीं अधिक हैं| उदाहरणार्थ, ब्रिटेन में आम मजदूर एक घंटे के न्यूनतम वेतन में लगभग 10 लीटर दूध खरीद सकता है, जबकि भारत में अधिकांश मजदूर एक घंटे की मजदूरी में एक लीटर भी न खरीद पाएंगे! ऐसी स्थिति में कृषि में उन्नत तकनीक के प्रयोग से उत्पादकता बढाकर खाद्य पदार्थों को सस्ता करना जरुरी है|
चौथे, किसानों की समस्या का समाधान उनमें से अधिकांश के लिए कृषि के बाहर समुचित रोजगार की व्यवस्था में है| कृषि पहले ही राष्ट्रीय उत्पादन का मात्र 12-14% है| इस पर 50% जनता निर्भर है तो दरिद्रता निश्चित है| जरुरत है उद्योगों तथा आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य, आदि सेवाओं के व्यापक विस्तार की जो इस अतिरिक्त आबादी को रोजगार दे सके| सबके लिए आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य का ही कार्यक्रम लिया जाये तो बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा हो सकते हैं| पर निजी मुनाफे पर आधारित पूंजीवादी व्यवस्था यह क्यों करे? इसलिए वे इन्हें लाभकारी मूल्य के हवाई सपने दिखाते हैं| पर वामपंथी ऐसा क्यों करें?
समुचित रोजगार, जीवन निर्वाह योग्य न्यूनतम मजदूरी, महंगाई पर रोक, सार्वजनिक खाद्य वितरण, शिक्षा-स्वास्थ्य की अनिवार्य व्यवस्था, सस्ता आवास ही वह मांगे हैं जो वास्तविक आवश्यकता ही नहीं बल्कि शहरी-ग्रामीण सर्वहारा, छोटे-सीमांत किसानों, निम्न मध्य वर्ग, छोटे काम धंधे करने वाली 85% मेहनतकश जनसंख्या को जनसंघर्ष के एक साझा मोर्चे पर ला सकती हैं| राजनीतिक, जातिवाद-साम्प्रदायिकता विरोध, स्त्री समानता के सवालों को जोड़ते हुए ऐसा साझा मोर्चा ही फासीवादियों के लिए असली चुनौती बन सकता है|
मुकेश असीम
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