Sunday, 11 April 2021

राष्ट्रीय सुरक्षा कानून’ के तहत दर्ज 80% मुकदमों को अदालतों ने झूठा बताया



राष्ट्रीय सुरक्षा कानून-1980 के इस्तेमाल को लेकर एक रिपोर्ट जारी हुई है। इसमें खुलासा हुआ है कि इस कानून के तहत जनवरी 2018 से दिसम्बर 2020 तक कुल 120 मुकदमे दर्ज किए गए थे। इनमें अधिकतर मामलों को अदालत ने ही झूठा कह दिया है। 

जिसमें से ज्यादातर मुकदमे उत्तर प्रदेश में दर्ज किए गए। 120 मुकदमे जब अदालत में गए तो अदालत ने 120 में से 96  मुकदमों को झूठा करार दिया और पुलिस की मंशा पर भी सवाल खड़े किए। कुल 120 मुकद्दमों में 41 मुकदमे सिर्फ गौ मांस खाने, बेचने या उससे सम्बंधित थे जिनमें से 30 मामलों को झूठा पाया गया और 10 मामलों में अदालत ने जमानत दे दी। रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत तर्ज मामलों में से ज्यादातर मामले अल्पसंख्यक समुदाय, दलित व जनवादी अधिकारों के लिए संघर्ष करने वालों पर दर्ज किए गए। उत्तर प्रदेश का बहुचर्चित डॉ कफील खान मामले में भी इसी कानून के तहत मामला दर्ज किया गया था।

इससे यह अर्थ भी नहीं निकालना चाहिए कि बाकी मामले सच्चे हैं क्यों "न्यायालयों" के अन्यायी चरित्र का पहले ही पर्दाफाश हो चुका है। लेकिन देखने वाली बात यह है कि रासुका के तहत इतनी बड़ी अंधेरगर्दी की गई कि इसके तहत दर्ज मामले पूँजीवादी अदालतों में भी टिक नहीं पाए। 
यह पूरी तरह स्पष्ट हो चुका है कि इस काले कानून का ''देश की सुरक्षा'' से कोई लेना देना नहीं है। देश का मतलब देश की जनता होता है जिसका इस कानून के जरिए दमन किया जाता रहा है। 

1980 में कांग्रेस सरकार ने यह कानून "राष्ट्रीय सुरक्षा" के नाम पर बनाया था। भारत मे काले कानूनों की नींव कांग्रेस ने ही रखी थी तथा वर्तमान में भाजपा सरकार इस प्रक्रिया को तेज़ी से आगे बढ़ा रही है। 

रिपोर्ट में कहा गया कि इस कानून के तहत कैदियों को रिहाई के आदेश के बावजूद भी उन्हें कई-कई महीनों तक जेलों में रखा गया। राष्ट्रीय सुरक्षा कानून, यूएपीए, अफस्पा जैसे काले कानूनों की लंबी फेहरिस्त है। पंजाब में पकोका, हरियाणा में सम्पति क्षति वसूली कानून, बिहार में बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस कानून आदि विभिन्न राज्यों में अलग-अलग दमनकारी कानून हैं और मोदी सरकार द्वारा इन कानूनों का इस्तेमाल बुद्धिजीवियों और जनवादी अधिकारों के लिए लड़ने वाले लोगों को झूठे मुकदमों में फंसाने के लिए किया जा रहा है। आज देश के इंसाफपसंद, जागरूक लोगों को इन कानूनों के खिलाफ मुखर आवाज उठाने के लिए आगे आना चाहिए।


कुलविंदर रोड़ी

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