Wednesday, 14 April 2021

समाजवाद: काल्पनिक तथा वैज्ञानिक

दुनिया के मजदूरो, एक हो ।


फ्रेडरिक एंगेल्स


समाजवाद:


काल्पनिक तथा वैज्ञानिक


समकालीन प्रकाशन, पटना

प्रकाशन वर्ष नवंबर 1999


एम के आजाद द्वारा कामगार-ई-लाइब्रेरी के लिए

हिंदी यूनिकोड में रूपांतरित


विषय-सूची


१८९२ के अंग्रेजी संस्करण की विशेष भूमिका ---------    ५



समाजवाद: काल्पनिक तथा वैज्ञानिक -- ३७

१----------------------------------३७


२ --------------------------------- ५४


३ --------–------------------------ ६५


नाम-निर्देशिका -------------------- ९३



१८९२ के अंग्रेजी संस्करण की विशेष भूमिका


यह छोटी-सी पुस्तक मूलतः एक वृहत्तर ग्रंथ का अंग है। १८७५ के क़रीब बर्लिन विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर, डा० ने यकायक और काफ़ी जोर-शोर के साथ एलान किया कि वे समाजवाद यू० ड्यूरिंग के हामी हो गये हैं। उन्होंने जर्मन जनता के सामने एक विस्तृत समाजवादी सिद्धान्त ही नहीं, समाज के पुनर्गठन की एक सम्पूर्ण व्यावहारिक योजना भी रखी। स्वाभावतः उन्होंने अपने पूर्वाधिकारियों को पानी पी पीकर कोसा और सबसे बड़ी बात यह है कि उन्होंने अपना सारा गुस्सा मार्क्स के ऊपर उतारकर उनकी मरम्मत की।


यह लगभग ऐसे समय हुआ जब जर्मन समाजवादी पार्टी की दो शाखायें – आइजेनाख़वादी तथा लासालवादी अभी अभी एक हो गयी थीं,


आइजेनाखवादी और लासालवादी- १६ वीं शताब्दी की सातवी दशाब्दी में और पाठवीं दशाब्दी के प्रारंभ में जर्मन मजदूर आन्दोलन की दो पार्टियां ।


आइजेनाखवादी - मार्क्सवाद के समर्थक इन पर कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स का सैद्धांतिक प्रभाव था। विल्हेल्म लीब्कनेख्त और ऑगस्ट बेबेल के नेतृत्व में उन्होंने १८६६ की आइजेनाख कांग्रेस के अवसर पर जर्मनी की सामाजिक जनवादी मजदूर पार्टी की नींव डाली ।


मजदूर वर्ग के आंदोलन की प्रगति के फलस्वरूप ये दो पार्टियां १८७५ की गोथा कांग्रेस में जर्मनी की एकीकृत समाजवादी मजदूर पार्टी के रूप में विलीन हुई। इसमें लासालवादियों ने अवसरवादी पक्ष का प्रतिनिधित्व किया।


लासालवादी - १८६३ में "आम जर्मन मजदूर संघ" की स्थापना करनेवाले फ० लासाल के अनुयायी। - सं० 




और इस प्रकार उन्होंने अपनी शक्ति बहुत अधिक बढ़ा ली थी। इतना ही नहीं, उन्होंने इस समूची शक्ति को अपने साझे दुश्मन के विरुद्ध लगा देने की क्षमता भी प्राप्त कर ली थी। जर्मनी की समाजवादी पार्टी तेजी से एक शक्ति बनती जा रही थी। लेकिन अगर उसे एक शक्ति बनना था, तो उसकी पहली शतं यह थी कि उन्होंने हाल में जो एकता हासिल की थी वह ख़तरे में पाये। लेकिन डा० ड्यूहरिंग ने खुलेआम अपने इर्दगिर्द एक गुट बनाना शुरू किया। इस गुट में एक भावी पृथक् पार्टी के बीज छिपे हुए थे। इसलिए यह जरूरी हो गया कि हमें जो चुनौती दी गयी थी, हम उसे स्वीकार करें, और हमारी इच्छा हो या न हो, हम यह लड़ाई शुरू करें।


यह काम चाहे बहुत मुश्किल न हो, लेकिन लंबा और पेचीदा जरूर था। जैसा कि सभी जानते हैं, हम जर्मन लोग ठोस गंभीरता के साथ काम करते हैं, इसे आप उम्र चिन्तनशीलता कह लें, या चाहें तो चिन्तनशील उग्रवादिता कह लें। हम में से जब भी कोई किसी ऐसे सिद्धान्त का प्रतिपादन करता है, जो उसकी दृष्टि में नवीन है, तब सबसे पहले वह एक सर्वव्यापी प्रणाली के रूप में उसका विस्तार करना आवश्यक समझता है। उसे यह सिद्ध करना पड़ता है कि तर्कशास्त्र के प्राथमिक सिद्धान्त तथा जगत् सृष्टि के मूल नियम अनन्तकाल से इसी लिए चले आ रहे हैं कि अन्ततः उनकी परिणति इस नये चरम सिद्धान्त में हो। और इस मामले में डा० ड्यूहरिंग जातीय मान से किसी माने में घटकर नहीं थे। एक सम्पूर्ण 'दर्शन प्रणाली' मानसिक, नैतिक, प्राकृतिक तथा ऐतिहासिक; एक सम्पूर्ण राजनीतिक अर्थशास्त्र तथा समाजवाद की प्रणाली और अंत में एक राजनीतिक अर्थशास्त्र का ग्रालोचनात्मक इतिहास' – कुछ नहीं तो, अठपेजी साइज को तीन मोटी मोटी पोथियां, बाहर से, और अंदर से भी भारी-भरकम, मानो सामान्यतः सभी पुराने दार्शनिकों तथा अर्थशास्त्रियों के, और विशेषतः मार्क्स के खिलाफ तर्कों के तीन सेना-दल खड़े कर दिये गये दरअसल" विज्ञान में प्रवर्तित क्रांति ला देने की यह एक कोशिश थी और मुझे इन सब से निबटना था। काल और प्रस्तार की धारणाओं से लेकर द्विधातुवाद तक जड़ और गति की नित्यता से लेकर नैतिक विचारों


की अनित्यता तक ; डारविन के प्राकृतिक चुनाव के सिद्धांत से लेकर भावी समाज में युवकों को शिक्षा तक मुझे हर संभव विषय की विवेचना करनी पड़ी। जैसे भी हो, मेरे प्रतिद्वंदी की व्यवस्थित व्यापकता ने मुझे इस बात का अवसर दिया कि मैं उनके विरुद्ध विभिन्न विषयों पर मार्क्स के और अपने विचारों को पहले से अधिक सम्बद्ध रूप में विकसित कर सकूँ। यही मुख्य कारण था कि मैंने यह काम हाथ में लिया, अन्यथा यह काम बिल्कुल कृतघ्न होता ।


मेरा उत्तर पहले समाजवादी पार्टी के मुखपत, लीपजीग के Voreārtsy नामक समाचारपत्र में एक लेखमाला के रूप में, और बाद में श्री यूजेन ड्यूहरिंग द्वारा विज्ञान में प्रवर्तित क्रांति के नाम से एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ। इस पुस्तक का दूसरा संस्करण जूरिच से १८८६ में प्रकाशित हुआ।


अपने मित्र, आजकल  फ्रांसीसी प्रतिनिधि सभा में लिल के प्रतिनिधि, पाल लाफार्ग के अनुरोध पर, मैंने इस पुस्तक के तीन अध्यायों को एक पंफलेट की शक्ल दी। उन्होंने इस पंफलेट का अनुवाद किया और उसे 'समाजवाद : काल्पनिक तथा वैज्ञानिक' के नाम से १८८० में प्रकाशित किया। इस फ्रांसीसी पाठ से ही पोलिश और स्पेनिश भाषाओं के संस्करण तैयार किये गये। १८८३ में हमारे जर्मन मित्रों ने इस पैफलेट को मूल भाषा में प्रकाशित किया। तब से इस जर्मन पाठ के आधार पर इटालवी, रूसी, डैनिश डच तथा रूमानियन भाषाओं में इसके अनुवाद प्रकाशित हो चुके हैं। इस तरह वर्तमान अंग्रेजी संस्करण को लेकर यह पुस्तिका दस भाषाओं में प्रचलित है। जहां तक मुझे मालूम है और किसी समाजवादी पुस्तक के यहां तक कि १८४८ के हमारे कम्युनिस्ट घोषणापत्र या मार्क्स कृत 'पूंजी' के भी इतने अधिक अनुवाद नहीं हुए है। जर्मनी में इसके चार संस्करण निकल चुके हैं, जिनमें कुल मिलाकर २०,००० प्रतियां छप चुकी है।


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•Vorcūrts ( आगे की ओर ) गोथा एकीकरण कांग्रेस के बाद जर्मन समाजवादी जनवादी पार्टी का मुखप यह १८७६ १८७८ में जीपजीग से प्रकाशित होना था। - सं०



• पुस्तक का परिशिष्ट 'मार्क' इस उद्देश्य से लिखा गया था जर्मन समाजवादी पार्टी के अंदर जर्मनी में विकास का कुछ प्रारंभिक ज्ञान फैलाया जा सके। एक ऐसे समय में जब इस पार्टी द्वारा शहरों के मजदूरों को एकीकृत करने का काम करीब करीब पूरा हो चुका था और अब खेतिहर मजदुरो और किसानों को हाथ में लेना था, यह और भी जरूरी मालूम हो रहा था। इस संस्करण के साथ भी यह परिशिष्ट दे दिया गया है, क्योंकि भू-सम्पत्ति के रूप जो सभी ट्यूटानिक कबीलो  में समान रूप से पाये जाते हैं, और उनके पतन का इतिहास, इंग्लैंड में जर्मनी की अपेक्षा भी कम ज्ञात  है। मैंने इस परिशिष्ट के मूल रूप को अक्षुण्ण रखा है और हाल में मक्सिम कोबलेसकी  ने जो प्रमेय सम्मुख रखा है, उसकी ओर संकेत नहीं किया है। इस प्रमेय के अनुसार, कृषि योग्य भूमि तथा चरागाहों का सदस्यों के बीच बंटवारा होने के पहले उसमें एक विशाल पितृसत्तात्मक कुटुम्ब- समुदाय द्वारा सम्मिलित रूप से खेती होती थी। यह प्रणाली कई पीढ़ियों तक जारी रहती थी ( दक्षिण-स्लाव 'जदुगा' के रूप में भी भी इसका उदाहरण मिलता है)। बाद में जब यह समुदाय इतना बड़ा हो गया कि सम्मिलित प्रबंध के योग्य न रह गया समुदाय की जमीन का बंटवारा किया गया। कोवालेसकी  की बात संभवतः बिल्कुल सही है. लेकिन यह विषय अभी भी sub judice** है।


इस पुस्तक में प्रयुक्त आर्थिक पारिभाषिक शब्द जहां तक वे नये हैं मार्क्स के पूंजी के अंग्रेजी संस्करण में इस्तेमाल किये गये शब्द से मेल खाते हैं। "माल उत्पादन" से हमारा तात्पर्य उस आर्थिक दौर से है, जिसमें वस्तुओं का उत्पादन उत्पादकों के व्यवहार के लिए ही नहीं, विनिमय के हेतु भी होता है, अर्थात् उनका उत्पादन माल के रूप में होता है, उपयोग-मूल्यों के रूप में नहीं। यह दौर जब से विनिमय के

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• मार्क प्राचीन जर्मनी का ग्राम-समुदाय एंगेल्स ने इस शीर्षक 'समाजवाद: काल्पनिक तथा वैज्ञानिक' के पहले जर्मन संस्करण में एक परिशिष्ट जोड़ दिया था, जिसमें उन्होंने जर्मनी के किसानों का काल से इतिहास दिया है। सं०


** Sub judice- विचाराधीन सं०



लिए उत्पादन शुरू ही हुआ था, तब से लेकर आज तक चल रहा है । उसका पूरा विकास पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली के अंतर्गत ही होता है, अर्थात् उन अवस्थाओं में जब उत्पादन के साधनों का स्वामी पूजीपति, मजदूरी देकर मजदूरों को काम पर रखता है, उन लोगों को, जो अपनी श्रम शक्ति को छोड़कर उत्पादन के सभी साधनों से वंचित हैं, और पैदावार की अपनी लागत से जितना ऊपर बेचता है, वह सब हड़प लेता है। मध्य युग से आज तक औद्योगिक उत्पादन के इतिहास को हम तीन दौरों में बांट सकते हैं: (१) दस्तकारी का दौर जिसमें छोटे कारीगर-मालिक, थोड़े से कारीगर-मजदूरों और शागिदों के साथ काम करते हैं और जहां हर कारीगर पूरी चीज तैयार करता है; ( २ ) मैनुफ़ेक्चर का दौर, जब कहीं ज्यादा मजदूर एक बड़े कारखाने में एकत्र होकर, श्रम विभाजन के सिद्धान्त के आधार पर पूरी वस्तु का उत्पादन करते हैं। हर मजदूर उत्पादन की किसी एक आंशिक क्रिया को ही करता है और किसी वस्तु का उत्पादन तभी पूरा होता है, जब वह एक के बाद एक, सभी के हाथों से गुजरती है; (३) आधुनिक उद्योग का दौर जब उत्पादन शक्ति से चलनेवाली मशीनों से होता है और जहां मजदूर का काम सिर्फ इतना ही रह जाता है कि वह यांत्रिक साधन यानी मशीन के काम की देखभाल रखे और उसे ठीक करता रहे।


मुझे अच्छी तरह मालूम है कि इस पुस्तक की विषय-वस्तु पर ब्रिटिश पाठकों के काफ़ी बड़े भाग को आपत्ति होगी। लेकिन अगर हम अन्य यूरोपियों ने ब्रिटेन के "संभ्रान्त" लोगों के पूर्वाग्रहों का जरा भी खयाल किया होता तो हम और भी गये गुजरे होते। हम जिस सिद्धान्त को ऐतिहासिक भौतिकवाद' कहते हैं, इस पुस्तक में उसी का पक्ष लिया गया है, और अंग्रेजी पाठकों में से अधिकांश को तो 'भौतिकवाद नाम से ही चिढ़ है। 'अज्ञेयवाद'*  को सहन किया जा सकता है, परंतु भौतिकवाद को बिलकुल स्वीकार नहीं किया जा सकता।

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अज्ञेयवाद (ग्रीक agnostosपज्ञेय, अज्ञात) - एक दार्शनिक मत, जो यह कहकर कि हम नहीं जान सकते कि हमारी संवेदनाओं से परे


फिर भी सतहवीं सदी से इंगलैंड सभी प्रकार के आधुनिक भौतिकवाद की जन्मभूमि रहा है।


       " भौतिकवाद इंगलैंड का औरस पुत्र है। ब्रिटिश स्कोलेस्टिक इंस स्कॉट पहले ही पूछ चुके थे, 'क्या जड़ के लिए चिंतन करना संभव है ?"

     "इस चमत्कार को संभव बनाने के लिए, उन्होंने ईश्वर की सर्वशक्तिमत्ता की शरण ली, अर्थात उन्होंने धर्म के माध्यम से भौतिकवाद का उपदेश दिया। इसके अतिरिक्त वह नामवादी थे। नामवाद, भौतिकवाद का पहला रूप था और मुख्यतः वह अंग्रेजी स्कोलॅस्टिकों में प्रचलित रहा है।


       "वास्तव में अंग्रेजी भौतिकवाद के जन्मदाता बेकन थे। उनके अनुसार प्राकृतिक विज्ञान ही सच्चा विज्ञान है और इंद्रियानुभूति पर प्राधारित भौतिक विज्ञान इस प्राकृतिक विज्ञान का सबसे मुख्य अंग है। प्रमाण के लिए वह अक्सर अनाक्सागोरस और उनके hormoiomeriae का, डेमोकाइटस और उनके अणुओं का हवाला देते हैं। उनके अनुसार हमारी इन्द्रियों कभी धोखा नहीं देतीं और सारा ज्ञान उन्हीं से निकला है। समूचा विज्ञान अनुभव पर आधारित है और इन्द्रियों द्वारा प्राप्त दथ्यों को एक तर्कसंगत प्रणाली से जांच करने में निहित है। अनुमान, विश्लेषण तुलना, निरीक्षण प्रयोग तर्कसंगत प्रणाली के यही मुख्य रूप हैं। जड़ में जो गुण अन्तर्निहित हैं, उनमें सबसे पहला गुण है गति । यह केवल यांत्रिक तथा गणित की गति के रूप में ही नहीं, बल्कि

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कुछ है भी या नहीं, भौतिक विश्व के अस्तित्व से इनकार करता है (अंग्रेजी दार्शनिक ह्यूम), या जो भौतिक विश्व को जानने की संभावना से इनकार करता है ( जर्मन दार्शनिक कांट) । - सं०


*नामवाद - ( लैटिन nomen नाम ) मध्ययुगीन दर्शन की एक धारा रहा है जिसके अनुयायी यह मानते थे कि प्रजातीय अवधारणाएं मिलती-जुलती चीजों के नाम भर हैं। सं०


१०


मुख्यतः प्रेरणा, प्राणशक्ति तनाव - अथवा जैकब बेहने की भाषा में कहें तो, qual* के रूप में है।


" भौतिकवाद के पहले सृष्टिकर्ता बेकन के दर्शन में, भौतिकवाद के बहुमुखी विकास के बीज अवरुद्ध ही है। एक ओर तो जड़ के चारों ओर ऐन्द्रिय काव्यात्मक प्रकाश है और वह जैसे अपनी मनोहारी हंसी से मानव की संपूर्ण सत्ता को अपनी ओर खींचता है। दूसरी ओर, सूत्र रूप में प्रतिपादित उनके सिद्धांत में कदम कदम पर असंगतियां उत्पन्न होती हैं। उनके दर्शन में यह प्रसंगतियां धर्म के क्षेत्र से आयी हैं।


"भौतिकवाद का जब और आगे विकास हुआ, वह एकांगी हो गया। जिस आदमी ने बेकन के भौतिकवाद को व्यवस्थित रूप दिया, उसका नाम है हाब्स। इन्द्रियजनित ज्ञान का काव्यात्मक सौरभ नष्ट हो जाता है, और वह गणितशास्त्री के निराकार अनुभव में बदल जाता है। रेखागणित को सर्वश्रेष्ठ विज्ञान घोषित किया जाता है। भौतिकवाद मानवद्रोही बन जाता है। यदि उसे अपने शत्रु मानवद्रोही अशरीरी   अध्यात्मवाद को उसी के घर में पराजित करना है, तो भौतिकवाद को अपने शरीर को ताड़ना देनी होगी और तपस्वी बनना होगा। इस प्रकार वह ऐन्द्रिय से बौद्धिक रूप ग्रहण करता है, परन्तु इसी प्रकार इसका परिणाम चाहे जो भी हो, उसमें वह संगति और व्यवस्था भी आती है, जो बुद्धि की विशेषता है।


"बेकन के काम को आगे बढ़ानेवाले हाब्स इस प्रकार तक करते है: यदि समस्त मानवीय ज्ञान इन्द्रियजनित है, तो हमारी अवधारणायें और हमारे विचार वास्तव जगत का भास मात्र है,  अपने इन्द्रियगम्य

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*Qual दार्शनिक श्लेष है। इसका शाब्दिक अर्थ है यंत्रणा, एक ऐसी पीड़ा, जो किसी  क्रिया को जन्म दे। इसके साथ ही रहस्यवादी बेहमे ने इस जर्मन शब्द में लैटिन शब्द qualitas ( गुण) का कुछ अर्थ डाल दिया है। उनका qual बाहर से पहुंचायी जानेवाली पीड़ा के विपरीत , वह क्रियात्मक तत्व है, जो उनके अधीन किसी वस्तु संबंध व्यक्ति के स्वतःस्फूर्त विकास से उत्पन्न होता है, और फिर उसे बल देता है। (अंग्रेजी संकरण में एंगेल्स का नोट।)


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रूप से विछिन्न आभास। विज्ञान इन आभासों को नाम भर दे सकता है। एक से अधिक आभास के लिए एक ही नाम चल सकता है। नामों के भी नाम हो सकते हैं। यदि एक और हम यह कहें कि सभी विचारों की उत्पत्ति इन्द्रियजगत में ही होती है, और दूसरी ओर यह भी कहें कि शब्द में शब्द से अधिक भी कुछ है, या यह कि जिन सत्ताओं को हम अपने इन्द्रियों द्वारा जानते हैं, और विशिष्ट या व्यक्तिगत रूपों में ही जिनकी स्थिति है, उनके अतिरिक्त ऐसी भी सत्तायें हैं, जिनका अस्तित्व विशिष्ट और व्यक्तिगत न होकर सर्वव्यापी है, तो यह अपने में एक विरोध होगा। जिस तरह अशरीरी शरीर कहना बेमानी है, उसी तरह अशरीरी वस्तु कहना भी। शरीर, सत्ता, वस्तु एक ही वास्तविकता के अलग अलग नाम हैं। चिंतन को चिंतन करनेवाली जड़ से पृथक् करना असंभव है। यह जड़ संसार में जितने परिवर्तन होते रहते हैं, उनका मूलाधार है। 'असीम' शब्द निरर्थक है, अगर उससे यह न समझा जाये कि हमारे मस्तिष्क में जोड़ लगाते जाने की एक अंतहीन प्रक्रिया की सामर्थ्य है। हमारे लिए भौतिक पदार्थ ही बोधगम्य हैं, इसलिए हम ईश्वर के अस्तित्व के बारे में कुछ नहीं जान सकते। मेरा अपना अस्तित्व ही निश्चित है। हर मानवीय आवेश एक यांत्रिक गति है, जिसका आरंभ है या अंत। जो हमारे आवेग के विषय है उन्हीं को हम अच्छा कहते है। मनुष्य भी उन्हीं नियमों के अधीन है, जिनके अधीन प्रकृति है। शक्ति और स्वतंत्रता, दोनों ही एक हैं।


'हाब्स ने बेकन  के दर्शन को व्यवस्थित रूप तो दिया, परन्तु वह बेकन का यह मूलभूत सिद्धांत कि इन्द्रिय-जगत में ही समस्त मानवीय ज्ञान की उत्पत्ति होती है, प्रमाणित नहीं कर सके। उसका प्रमाण लाक ने अपने ग्रंथ 'मानवीय समझ पर निबंध' में दिया।


'हाब्स ने बेकन के भौतिकवाद के सगुणवादी* पूर्वाग्रहों को छिन्न भिन्न कर दिया; इसी प्रकार लाक के संवेदनावाद को अभी भी जिन

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* सगुणवादी- सगुणवाद के धार्मिक दार्शनिक सिद्धांत में विश्व के सृष्टिकर्ता के रूप में एक सगुण बहा की सत्ता को स्वीकार किया गया है। - स.


१२


बचे-खुचे धार्मिक बंधनों ने जकड़ रखा था, उन्हें कालिंस, डाढवेल, कावर्ड, हार्टले प्रीस्टले ने तोड़ डाला। जो भी हो, भौतिकवादियों के लिए निर्गुणवाद*, धर्म से छुटकारा पाने का एक सरल उपाय भर है।"**


ब्रिटेन में आधुनिक भौतिकवाद की उत्पत्ति के बारे में कार्ल मार्क्स ने इसी तरह लिखा था और उनके पूर्वजों को मार्क्स ने जो सम्मान दिया था, अगर आजकल वह अंग्रेजों के मन को ठीक भाता नहीं, तो यह अफ़सोस की बात है। फिर भी इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि बेकन, हाब्स और लाक ही फ्रांस के उस उज्जवल भौतिकवादी मत के जन्मदाता थे, जिसने बावजूद जल-थल पर उन सारी लड़ाइयों के, जिनमें जर्मनों तथा अंग्रेजों ने फ्रांसीसियों के ऊपर विजय पायी, अठारहवीं शताब्दी को सबसे बढ़कर एक फ्रांसीसी शताब्दी बना दिया- और यह फ्रांस की उस चरम क्रांति के पहले ही, जिसके परिणामों से हम बाहरवाले, इंगलैंड और जर्मनी के लोग अभी भी अभ्यस्त होने का प्रयत्न कर रहे हैं ।


इससे इन्कार नहीं किया जा सकता । इस शताब्दी के मध्य में जो भी शिक्षित विदेशी इंगलैंड में आकर बस गया, उसकी आंख में बुरी तरह खटकती थी वह चीज, जिसे अंग्रेजी संभ्रान्त मध्यवर्ग की धर्मान्धता और मूर्खता ही समझने को उस समय वह मजबूर था। उस समय हम सभी भौतिकवादी थे, या कम से कम, बहुत ज्यादा आजाद ख़याल के लोग थे, और यह बात हमारी कल्पना से भी परे मालूम होती थी कि इंगलैंड के प्रायः सभी शिक्षित लोग तरह तरह की अगसंभव, अलौकिक बातों में विश्वास करें, और बकलैंड तथा मैटेल जैसे भूतत्त्वशास्त्री तक अपने विज्ञान के तथ्यों को इस तरह तोड़-मरोड़ें, कि वे बाइबिल के सृष्टि-खण्ड की कल्पनाओं के बहुत ख़िलाफ़ न जान पड़े। और अगर

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* निर्गुणवाद - एक धार्मिक दार्शनिक प्रवृत्ति जो सगुण ब्रह्म की धारणा को स्वीकार नहीं करती, पर सृष्टि के आदि कारण के रूप में एक अवैयक्तिक सत्ता को स्वीकार करती है। - सं०


** का० मार्क्स तथा फ्रे० एंगेल्स, 'पवित्र परिवार', १८४५ में फ्रांकफुर्त प्रॉन माइन से प्रकाशित (एंगेल्स का नोट । )


१३


आप उस समय ऐसे आदमियों से मिलना चाहते, जो मजहबी मामलों में अपना जेहन इस्तेमाल करने की हिम्मत रखते हों, तो आपको अशिक्षित, 'मैले-कुचेले" लोगों के बीच मजदूरों, खासकर ओवेन के अनुयायी, समाजवादियों के बीच जाना पड़ता ।


लेकिन तब से इंगलैंड "सभ्य" हो चुका है। १८५१ की प्रदर्शिनी ने इंगलैंड की द्वीपीय कूपमंडूकता के अंत की घोषणा की। इंगलैंड ने खान-पान, चाल-ढाल और विचारों में, धीरे धीरे अन्तर्राष्ट्रीय रूप ग्रहण किया - यहां तक कि मुझे यह इच्छा होने लगती है कि कुछ अंग्रेजी तौर तरीके और रिवाज शेष यूरोप में उतना ही फैलते, जितना दूसरे यूरोपीय आचार-विचार यहां फैले है। जो भी हो, जैतून के दढ़िया तेल के फैलने के साथ ( १८५१ से पहले वह अभिजात वर्ग तक ही सीमित था) मजहबी मामलों में यूरोपीय संशयवाद भी हानिकारक रीति से फैल गया; हालात यहां तक पहुंची है कि यद्यपि अभी तक अज्ञेयवाद बिलकुल वैसे ही यहां की "अपनी चीज" नहीं बन पाया है, जैसे इंग्लैंड का चर्च, तो भी, जहां तक उसके सम्मानित होने का प्रश्न है, वह करीब करीब बैप्टिज्म  के स्तर पर पहुंच गया है, और 'सैल्वेशन सेना'* से तो वह यकीनन ऊपर है ही। ऐसी स्थिति में में यह सोचे बिना नहीं रह सकता कि नास्तिकता की इस प्रगति से जो लोग सचमुच दुःखी है और जो उसकी निंदा करते हैं, उन्हें इस बात से सान्त्वना मिलेगी कि यह नये, निराले खयालात कहीं बाहर पैदा नहीं हुए हैं, रोजमर्रा के इस्तेमाल की और  बहुत-सी चीजों की तरह Made in Germany मार्क वाली नहीं है, असंदिग्ध रूप से ठेठ अंग्रेजी है, और यह कि दो सौ साल पहले उनके अंग्रेज जन्मदाता अपने आज के वंशजों से कहीं आगे बढ़ चुके थे।


और सचमुच अज्ञेयवाद, लंकाशायर की अर्थपूर्ण भाषा में निर्लज भौतिकवाद के अतिरिक्त और है क्या ? प्रकृति के विषय में अज्ञेयवादी की धारणा सम्पूर्ण रूप से भौतिकवादी है। समस्त प्राकृतिक जगत नियमों से अनुशासित है, और उसमें बाह्य हस्तक्षेप की बिलकुल गुंजाइश नहीं

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* साल्वेशन सेना'- १८६५ में इंगलैंड में स्थापित किया गया एक धार्मिक परोपकारी संगठन। सं०


१४


है। परन्तु इसमें इतना वह और जोड़ देता है-ज्ञात जगत से परे किसी परब्रह्म की सत्ता है कि नहीं, इसका निश्चय करने का हमारे पास कोई साधन नहीं है। यह बात उस समय तो कही जा सकती थी, जब लपलेस से नेपोलियन ने पूछा कि उस महान् खगोलशास्त्री की Mécanique célestes* संबंधी पुस्तक में सृजनकर्ता का उल्लेख तक क्यों नहीं किया गया और उसने गर्व से उत्तर दिया, "Je n'avais pas besoin de cette hypothése"**। परन्तु आजकल विश्व की हमारी विकासवादी धारणा में, न किसी सृजनकर्ता का स्थान है, न शासक का। इस समूचे विद्यमान जगत से बाहर किसी परब्रह्म की बात करना ही विरोधपूर्ण है, और मुझे तो लगता है कि यह धार्मिक जनता की भावनाओं का व्यर्थ में अपमान भी है।


फिर हमारा अज्ञेयवादी यह भी मानता है कि अपनी इन्द्रियों से हमें जो सूचना मिलती है, हमारा सारा ज्ञान उसी के ऊपर आधारित है। परन्तु वह प्रश्न करता है, हम कैसे जानें कि हमें अपनी इन्द्रियों द्वारा जिन वस्तुओं को उपलब्धि होती है, हमारी इन्द्रियां हमें उनका सही चित्र देती है ? और तब वह हमें बताता है कि जब वह वस्तुओं और उनके गुणों की बात करता है, उसका मतलब वास्तव में इन वस्तुओं और गुणों से नहीं होता- उनके बारे में वह कुछ भी निश्चित रूप से जानने में असमर्थ है- यह वस्तुएँ उसकी इन्द्रियों पर जो प्रभाव डालती है, उसका मतलब केवल उन्हीं से होता है। इस तर्क का केवल तर्क से खंडन करना अवश्य कठिन है। परन्तु तर्क के पहले व्यवहार था। Im An fang war die That*** और जब मानवीय उद्द्भावना-शक्ति ने इस कठिनाई की उद्भावना की, उसके पहले ही मानवीय व्यवहार ने उसे हल कर लिया था। The proof of the pudding is in the eating. हम वस्तुओं में जो गुण देखते हैं, उनके अनुसार जहां हम उनको अपने उपयोग में लाना शुरू करते हैं,


• P. S. Laplace, Traite de mécanique celester ( खगोलीय गांत्रिकी) १-५ खंड। पेरिस, १७६९-१८२५। सं०

**  'मुझे इस प्रमेय की आवश्यकता न थी " - सं०


*** ." प्रारंभ में कार्य का ही अस्तित्व या " - गेटे कृत ट्रेजेडी ' फ़ाउस्ट ' से।- सं०


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हम अपने इन्द्रिय ज्ञान को एक ऐसी कसौटी पर कसते हैं जो झूठी नहीं हो सकती। यदि यह इन्द्रिय-ज्ञान झूठा है, तो उस वस्तु से जो काम लेने की आशा हम करते हैं, वह भी झूठी साबित होती है। और हमारा प्रयत्न निष्फल होता है। परन्तु यदि हम अपने ध्येय को प्राप्त करने में सफल होते हैं, यदि हम देखते हैं कि यह वस्तु, उसके संबंध में हमारी जो धारणा है, उससे मेल खाती है, और हम उससे जो काम लेना चाहते हैं, वह उस काम आती है, तो यह इस बात का पक्का सबूत है कि इस हद तक, उसकी और उसके गुणों की हमारी उपलब्धि बाह्य वास्तविकता के अनुकूल है। और जब भी हम असफलता का सामना करते हैं, हमें साधारणतः अपनी असफलता का कारण समझने में देर नहीं लगती। हम देखते हैं कि जिस उपलब्धि के आधार पर हमने काम किया, वह या तो अधूरी और सतही थी, या अन्य उपलब्धियों के फलों से असंगत रूप से मिली थी और इसी को हम दोषपूर्ण तर्क कहते हैं। जब तक हम अपनी और प्रयुक्त इन्द्रियों को अनुशासित रखने में और उनका उपयोग करने में सावधानी बरतते हैं और अपने व्यवहार को उचित रूप से प्राप्त इन्द्रिय-ज्ञान द्वारा निर्धारित सीमा के भीतर ही रखते हैं, हम देखेंगे कि हमारे प्रयोग के फल से यह सिद्ध हो जाता है कि हमारा इंद्रिय-ज्ञान, इंद्रियों द्वारा उपलब्ध वस्तु की विषयगत प्रकृति के अनुकूल है। एक भी ऐसा उदाहरण नहीं है, जिसमें हम इस परिणाम पर पहुंचे हों कि वैज्ञानिक रूप से नियंत्रित हमारा इंद्रिय-ज्ञान बाह्य जगत के विषय में हमारे मन में ऐसे विचारों को जन्म देता है, जो स्वभावतः वास्तविकता के प्रतिकुल हों, अथवा यह कि बाह्य जगत और उसके विषय में हमारे इंद्रिय-ज्ञान में कोई स्वाभाविक असंगति है।


लेकिन इसपर नव-कांटवादी अज्ञेयवादी आते हैं और कहते हैं - हमें किसी वस्तु के गुणों की सच्ची उपलब्धि हो सकती है, परंतु हम किसी भी ऐन्द्रिय अथवा मानसिक प्रक्रिया से बस्तु-अपने-में को समझ नहीं सकते। यह वस्तु-अपने-में हमारी समझ के बाहर है। हेगेल ने बहुत पहले इसका उत्तर दिया था- अगर आप किसी वस्तु के सभी गुणों को जानते हैं, तो आप स्वयं उस वस्तु को जानते हैं; अगर कोई बात रह जाती है तो यही कि यह वस्तु हम से बाहर है और जब आपने


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इन्द्रियों द्वारा इस बात को भी उपलब्ध कर लिया तो आपने कांट की विख्यात वस्तु- अपने-में के शेषांश को भी ग्रहण कर लिया, और कोई बात बाकी नहीं रही। इसमें इतना और जोड़ दिया जा सकता है कि कांट के समय में प्राकृतिक वस्तुओं का हमारा ज्ञान सचमुच इतना आंशिक और विच्छिन्न था कि उनका यह सन्देह करना स्वाभाविक ही था कि इन वस्तुओं में से हर एक के बारे में हमारा जो सूक्ष्म ज्ञान है, उससे परे, एक रहस्यमय वस्तु-अपने-में का अस्तित्व है। परन्तु विज्ञान की विराट प्रगति के कारण एक के बाद एक, यह अज्ञेय वस्तुएं ज्ञेय हुई है, विश्लेषित हुई हैं, इतना ही नहीं, पुनरुत्पादित भी हुई हैं। जिस वस्तु का हम उत्पादन कर सकते हैं, उसे अज्ञेय हरगिज नहीं समझ सकते। इस शताब्दी के पूर्वार्द्ध के रसायन विज्ञान के लिए कार्बनीय पदार्थ इसी तरह के रहस्यमय पदार्थ थे। अब कार्बनीय प्रक्रियाओं की सहायता के बिना ही एक के बाद एक, इन कार्बनीय पदार्थों को उनके रासायनिक तत्त्वों से तैयार करने लगे हैं। आधुनिक रसायन शास्त्री कहते हैं कि जहां हमने किसी भी पिण्ड की रासायनिक बनावट को जान लिया, हम उसे उसके तत्वों से तैयार कर सकते हैं। हमें अभी उच्चतम कार्बनीय पदार्थों, अर्थात् अल्ब्यूमिनीय पिण्डों की रासायनिक बनावट जानने में बहुत देर है, परन्तु कोई कारण नहीं है कि हम इस ज्ञान को प्राप्त न करें- चाहे इसमें शताब्दियां लग जायें और उससे लैस होकर कृत्रिम अल्ब्युमेन उत्पन्न न करें। जब हम यह कर पायेंगे तब हम साथ ही कार्बनीय जीवन को उत्पन्न कर लेंगे कारण अपने निम्नतम से लेकर उच्चतम रूपों में जीवन अल्ब्यूमिनीय पिण्डों के अस्तित्व का ही साधारण रूप है। 


लेकिन यह औपचारिक प्रतिबन्ध लगा लेते ही, हमारे अज्ञेयवादी की बातचीत और उसका पूरा रवैया ऐसा होता है जैसे वह घोर भौतिकवादी हो, और असलियत में वह है भी वही। वह कह सकता है कि जहां तक हम जानते हैं, जड़ और गति या जैसा आजकल हम कहते हैं, शक्ति, न तो उत्पन्न की जा सकती है और न नष्ट, परन्तु हमारे पास इस बात का प्रमाण नहीं है कि वह किसी भी समय उत्पन्न नहीं की गयी थी। मगर अगर आप उसकी इस स्वीकारोक्ति को किसी


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खास मामले में उसके खिलाफ़ इस्तेमाल करने की कोशिश करें, तो वह आपके दावे को उसी वक्त खारिज करवा देगा। In abstracto* वह चाहे अध्यात्मवाद की संभावना को मान ले, in concreto** वह उसे अपने पास फटकने नहीं देगा। वह आपको बतायेगा कि जहां तक हम जानते है, और जान सकते हैं, विश्व का न तो कोई सृजनकर्ता है और न शासक : जहाँ तक हम जानते हैं, जड़ और शक्ति न तो उत्पन्न की जा सकती है और न विनष्ट; हमारे लिए मन शक्ति का एक प्रकार है, मस्तिष्क की एक क्रिया है; हम इतना ही जानते हैं कि भौतिक जगत शाश्वत नियमों से अनुशासित है, इत्यादि, इत्यादि। इस प्रकार जहां तक वह वैज्ञानिक है, जहां तक वह कुछ जानता है, वह भौतिकवादी है; पर अपने विज्ञान से बाहर उन क्षेत्रों में, जिनके बारे में वह कुछ जानता नहीं, वह अपने अज्ञान को एक रहस्यमय रूप दे देता है, और उसे अज्ञेयवाद के नाम से पुकारता है।


जो भी हो, एक बात साफ़ मालूम होती है। यदि मैं अज्ञेयवादी होता तो भी यह स्पष्ट है कि इस पुस्तक में मैंने इतिहास को जिस धारणा को चित्रित किया है, उसे मैं " ऐतिहासिक अज्ञेयवाद" नहीं कह सकता था। धर्म में विश्वास रखनेवाले लोग मेरे ऊपर हंसते और अज्ञेयवादी गुस्से में आकर मुझसे पूछते कि क्या में उनका मजाक उड़ाने जा रहा हूँ? इसलिए मैं आशा करता हूं कि ब्रिटिश संभ्रांत वर्ग को भी बहुत ज्यादा धक्का नहीं लगेगा, अगर मैं इस धारणा को अंग्रेजी में, और अंग्रेजी के साथ और भी बहुत-सी भाषाओं में, "ऐतिहासिक भौतिकवाद" का नाम दूं। विश्व इतिहास की गति की इस धारणा के अनुसार सभी महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं की महान् प्रेरक शक्ति और उनका अन्तिम कारण समाज के आर्थिक विकास में, उत्पादन तथा विनिमय प्रणाली के परिवर्तनों में, और फलस्वरूप, समाज के विभिन्न वर्गों में विभाजन में और एक दूसरे के खिलाफ़ इन वर्गों के संघर्षों में है। 


मेरे ऊपर इतना अनुग्रह संभवतः और भी शीघ्र किया जाये, अगर

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*   कल्पना में सं० 

** यथार्थ में सं०


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में यह दिखा दूं कि ऐतिहासिक भौतिकवाद ब्रिटिश संभ्रांत वर्ग के लिए भी हितकर सिद्ध हो सकता है। मैंने इस बात का उल्लेख किया है कि आज से चालीस या पचास साल पहले इंगलैंड में आकर बसनेवाले हर शिक्षित विदेशी की दृष्टि में वह चीज बुरी तरह खटकती थी, जिसे अंग्रेजी संभान्त मध्यवर्ग की धर्मान्धता और मूर्खता ही समझने को वह मजबूर था। अब मैं यह सिद्ध करने जा रहा हूं कि उस जमाने का संभ्रान्त अंग्रेज मध्यवर्ग इतना  बुद्धू नहीं था, जितना वह एक होशियार विदेशी को लगता था। उसकी धार्मिक प्रवृत्तियों का कारण समझा जा सकता है।


जब यूरोप मध्ययुग से निकला उसका क्रांतिकारी तत्त्व शहरों का उठता हुआ मध्यवर्ग था। उसने मध्ययुगीन सामन्ती व्यवस्था के अन्दर अपने लिए एक सम्मानित स्थान बना लिया था, परन्तु यह स्थान भी उसकी विकासशील शक्ति के लिए बहुत संकुचित हो गया था। सामंती व्यवस्था के रहते मध्यवर्ग का पूंजीवादी वर्ग का विकास असंभव था, सामंती व्यवस्था का पतन अवश्यंभावी था।


लेकिन सामंतवाद का महान् शक्तिशाली अन्तर्राष्ट्रीय केन्द्र रोमन कैथोलिक चर्च था। उसने बावजूद अन्दरूनी लड़ाइयों के समस्त सामंती पश्चिमी यूरोप को एक विशाल राजनीतिक प्रणाली के अंतर्गत एकजुट कर दिया था, और इस प्रणाली का पार्थक्यवादी यूनानियों से उतना ही विरोध था जितना मुस्लिम देशों से। उसने सामंती व्यवस्था के चारों ओर ईश्वरीय पावित्र्य का प्रभामण्डल फैला रखा था। उसने सामंती नमूने पर पदों की अपनी एक क्रमबद्ध व्यवस्था कायम कर रखी थी, और अंत में, कैथोलिक जगत की पूरी एक-तिहाई भूमि का अधिकारी होने के नाते वह स्वयं सबसे शक्तिशाली सामंती प्रभु था। इसके पहले कि ग़ैरमजहबी सामंतवाद पर हर देश में और हर बात को लेकर आक्रमण किया जा सकता, उसके इस पवित्र केंद्रीय संगठन को नष्ट करना आवश्यक था।


लेकिन, मध्यवर्ग की प्रगति के साथ ही विज्ञान का शक्तिशाली पुनरुत्थान भी हो रहा था। खगोलशास्त्र, यांत्रिकी, भौतिक विज्ञान, शरीर रचना विज्ञान, शरीर-विज्ञान - इन सब का अध्ययन अनुशीलन फिर से प्रारंभ हुआ। औद्योगिक उत्पादन के विकास के लिए पूंजीवादी वर्ग को एक ऐसे विज्ञान की आवश्यकता थी, जो प्राकृतिक वस्तुओं के भौतिक गुणों


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का और प्रकृति की शक्तियों की क्रिया-पद्धतियों का निश्चय करे। उस समय तक विज्ञान और कुछ नहीं, चर्च का विनीत दास था और धर्म द्वारा निर्धारित सीमाओं का उल्लंघन न कर पाया था, और इसलिए वस्तुतः वह विज्ञान था ही नहीं। अब विज्ञान ने चर्च के खिलाफ विद्रोह किया; विज्ञान के बिना पूंजीवादी वर्ग का काम नहीं चल सकता था, इसलिए पूजीवादी वर्ग को इस विद्रोह में सम्मिलित होना पड़ा।


जिन बातों को लेकर उठते हुए मध्यवर्ग का संस्थापित धर्म के साथ टकराना लाज़िमी था, ऊपर उनमें से केवल दो का जिक्र किया गया है, लेकिन यह दिखाने के लिए इतना काफ़ी है कि रोमन चर्च के दावों के ख़िलाफ़ लड़ने में जिस वर्ग को सबसे सीधी दिलचस्पी थी, वह था पूंजीवादी वर्ग और दूसरे, उस जमाने में सामंतवाद के खिलाफ़ हर संघर्ष को मजहबी जामा पहनना पड़ता था और इस संघर्ष को सबसे पहले चर्च के ख़िलाफ़ चलाना पड़ता था। लेकिन अगर विश्वविद्यालयों ने और शहरों के व्यापारियों ने आवाज उठायी तो यह लाजिमी था और हुआ भी ऐसा ही कि आम देहाती जनता में किसानों में उसकी गुंज सुनाई पड़ती, वही किसान, जिन्हें सर्वत्र अपने अस्तित्व तक के लिए अपने लौकिक तथा आध्यात्मिक प्रभुओं से संघर्ष करना पड़ता था।


सामंतवाद के विरुद्ध पूंजीवादी वर्ग के लम्बे संघर्ष की परिणति तीन शानदार निर्णयात्मक लड़ाइयों में हुई।


पहली लड़ाई वह है, जिसे जर्मनी का प्रोटेस्टेंट सुधार आंदोलन  कहते है। लूथर ने चर्च के ख़िलाफ़ लड़ाई की जो आवाज़ उठायी, उसके जवाब में राजनीतिक किस्म के दो विद्रोह हुए - पहला, फ्रांज फ़ान सिकिंगन के नेतृत्व में छोटे सामंतों का विद्रोह (१५२३) और इसके बाद १५२५ का महान् किसान युद्ध। दोनों लड़ाइयां हारी गयीं और इस हार का मुख्य कारण इन विद्रोहों में सबसे ज्यादा दिलचस्पी रखनेवाले दल, शहर के पूंजीवादियों की दुविधा था। इस दुविधा के कारणों की चर्चा हम यहा नहीं कर सकते। उसी समय से इस संघर्ष ने लक्ष्य-भ्रष्ट होकर, स्थानीय राजाओं और केंद्रीय सत्ता के बीच संघर्ष का रूप ले लिया और इसका परिणाम यह हुआ कि जर्मनी अगले दो सौ वर्षों के लिए यूरोप के राजनीतिक दृष्टि से सक्रिय राष्ट्रों में न रहा। लूथर के सुधार आंदोलन ने


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एक नये धर्म को जन्म दिया, एक ऐसे धर्म को, जो निरंकुश राज्यतंत्र के सर्वथा अनुकूल था। उत्तर-पूर्वी जर्मनी के किसानों ने जहां लूथरवाद को ग्रहण किया नहीं, कि वे आजाद किसान से भू-दास ही बन गये।


लेकिन जहां लूथर असफल रहा वहां कैलविन की विजय हुई। कैलविन का मत उसके युग के सबसे साहसी पूंजीवादियों के उपयुक्त था। उसका नियतिवाद का सिद्धान्त इस वास्तविकता की धार्मिक अभिव्यक्ति था कि होड़ के व्यापारिक जगत में सफलता या असफलता मनुष्य के कर्म या कौशल पर नहीं, बल्कि ऐसी परिस्थितियों पर निर्भर है, जिनपर उसका कोई वश नहीं है। यह सफलता या असफलता उस व्यक्ति पर निर्भर नहीं है, जो इच्छा करता है या दौड़-भाग करता है, बल्कि अज्ञात और अधिक शक्तिशाली आर्थिक शक्तियों की कृपा पर निर्भर है। यह बात आर्थिक क्रांति के युग में और भी सही थी, एक ऐसे युग में जब सभी पुराने व्यापारिक मार्गों और केंद्रों की जगह नये मार्ग और केंद्र कायम हुए थे। जब दुनिया के लिए भारत और अमरीका के मार्ग खुल गये थे, और जब आर्थिक विश्वास के सबसे पवित्र प्रतीक तक - सोना और चांदी के मूल्य- तक लड़खड़ाने और टूटने लगे थे। कैलविन के चर्च का विधान सम्पूर्ण रूप से जनवादी तथा गणतंत्रवादी था; और जहां ईश्वर के राज्य को ही गणतंत्र का रूप दे दिया गया हो, वहां इस लौकिक जगत के राज्य ही राजाओं, बड़े पादरियों और सामंतों के अधिकार में कैसे रह सकते थे? जहां जर्मन लूथरवाद स्वेच्छा से राजाओं का अस्त्र बन गया, कैलविनवाद ने हालैंड में एक गणतंत्र की स्थापना की और इंगलैंड में और विशेषकर स्काटलैंड में सक्रिय गणतंत्रवादी पार्टियों की स्थापना की।


दूसरी महान् पूंजीवादी बगावत ने कैलविनवाद में अपना सिद्धान्त पहले से ही तैयार पाया। यह आंदोलन इंगलैंड में हुआ। शहरों के मध्यवर्ग ने इसका सूत्रपात किया और देहाती इलाकों के स्वतंत्र काश्तकारों ने इसकी लड़ाइयां जीत ली। यह भी एक विचित्र बात है कि इन तीनों महान् पूजीवादी विद्रोहों में किसानों से ही वह फ़ौज तैयार हुई, जिसे यह लड़ाई लड़नी थी और किसान ही वह वर्ग है, जो एक बार विजय मिली नहीं कि उस विजय के आर्थिक परिणामों से शर्तिया चौपट हो जाता है। कामवेल के एक सौ वर्ष बाद, इंगलैंड का यह स्वतंत्र काश्तकार वर्ग करीब करीब


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गायब हो चुका था। जो भी हो, अगर यह स्वतंत्र काश्तकार वर्ग न होता, और शहरों के साधारण जन न होते, तो अकेले पूंजीवादी वर्ग इस लड़ाई को उसके कटु अंत तक न सकता और चार्ल्स प्रथम को सूली पर न चढ़ा सकता। पूंजीवादी वर्ग की उन जीतों को, जिनके लिए परिस्थितियां तैयार हो चुकी थीं, हासिल करने के लिए भी क्रांति को और बहुत काफी आगे ले जाना था - ठीक वैसे ही जैसे १७९३ में फ्रांस में हुआ और १८४८ में जर्मनी में। वास्तव में यह पूंजीवादी समाज के विकास का एक नियम मालूम होता है।


खैर, क्रांतिकारी कार्यों के इस आधिक्य के बाद आवश्यक रूप से उसकी अनिवार्य प्रतिक्रिया भी हुई और अपनी दफ़ा यह प्रतिक्रिया भी जिस बिंदु पर स्थिर हो सकती थी उसपर न ठहरकर उससे आगे बढ़ गयी। इस तरह बहुत बार आगे-पीछे डगमगाने के बाद अंत में गुरुत्व का एक नया केंद्र स्थापित हुआ और इस जगह से फिर एक नया सिलसिला शुरू हुआ। ब्रिटिश इतिहास के उस शानदार युग का, जिसे संभ्रांत लोग 'महान् विद्रोह" के नाम से जानते हैं, और उसके बाद आने वाले संघर्षो का अंत एक ऐसी अपेक्षाकृत तुच्छ घटना से हुआ, जिसे उदारपंथी इतिहासकारों ने " गौरवपूर्ण क्रांति" का नाम दिया है।


यह स्थान जहां से एक नया सिलसिला शुरू हुआ, उठते और भूतपूर्व सामंती जमींदारों के बीच समझोता था। और यद्यपि यह जमींदार आज की तरह अभिजात वर्ग का आदमी ही कहा जाता था, वह बहुत दिनों से ऐसे पथ पर आरुड था, जिसपर चलकर वह बहुत बाद में आनेवाले फ्रांस के लुई फ़िलिप की तरह "राज्य का पहला पूंजीपति" बन गया। इंगलैंड का यह सौभाग्य था कि बड़े बड़े पुराने सामंतों ने 'गुलाबों की लड़ाई' में एक दूसरे को मार डाला था। उनके उत्तराधिकारी यद्यपि अधिकतर पुराने परिवारों के ही वंशधर थे, इन परिवारों से उनका संबंध सीधा नहीं, दूर का ही होता था, इसलिए वे उतने खानदानी न रहकर बिलकुल एक नया ही समूह बन गये थे, जिसके संस्कार और जिसकी प्रवृत्तियां पूंजीवादी अधिक थी और सामंती कम। वे रुपयों की कीमत पूरी तरह समझते थे और उन्होंने फ़ौरन सैकड़ों छोटे किसानों को निकालकर और उनकी जगह भेड़ें रखकर लगान बढ़ाना शुरू कर दिया। हेनरी अष्टम

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ने चर्च की जमीनों को लुटाने के साथ ही, एक साथ बहुत-सी नयी पूँजीवादी किस्म की जमींदारियां कायम की। पूरी सत्रहवीं   शताब्दी में अनगिनत जागीरों को जब्त करने और उन्हें बिलकुल हाल में या थोड़े ही दिन पहले मालामाल हुए लोगों को बख्श देने का जो सिलसिला चलता रहा, उसका भी यही नतीजा हुआ। फलस्वरूप हेनरी सप्तम के समय से ही अंग्रेजी "अभिजात वर्ग" ने प्रौद्योगिक उत्पादन के विकास में बाधा डालना तो दूर, परोक्ष रूप से उसने फायदा उठाने की कोशिश की; और बड़े बड़े जमींदारों का सदा एक ऐसा भाग था, जो आर्थिक कारणों से हो या राजनीतिक कारणों से, महाजनी और प्रौद्योगिक पूँजीवादी वर्ग के नेताओं के साथ सहयोग करने को प्रस्तुत था। इसलिए १६८९ का समझोता बहुत आसानी से सम्पन्न हो गया। 'माल और मंसब' की राजनीतिक लूट खसोट बड़े बड़े सामंती परिवारों के लिए छोड़ दी गयी, बशर्ते कि महाजन, औद्योगिक और व्यापारी मध्यवर्ग के आर्थिक हितों पर यथेष्ट ध्यान दिया जाता रहे। उस जमाने में ये आर्थिक हित इतने शक्तिशाली थे कि वे राष्ट्र की सामान्य नीति को निश्चित कर सकने में समर्थ थे। छोटी-मोटी बातों को लेकर चाहे जो झगड़े हों, लेकिन कुल मिलाकर अभिजात वर्ग का शासक गुट यह अच्छी तरह जानता था कि उसकी अपनी आर्थिक समृद्धि प्रौद्योगिक तथा व्यापारिक मध्यवर्ग की समृद्धि से अनिवार्य रूप से जुड़ी हुई है।


उस जमाने से पूंजीवादी वर्ग इंगलैंड के शासक वर्गों का एक तुच्छ परन्तु माना हुआ भाग हो गया। राष्ट्र की विशाल मेहनतकश जनता को अंकुश में रखने में औरों के साथ उसका भी स्वार्थ था। व्यापारी या कारखानेदार खुद अपने क्लर्को, कर्मचारियों और घरेलू नौकरों के मुकाबले में मालिक की हैसियत रखता था, या जैसा अभी हाल तक कहा जाता था 'उनका 'कुदरती मुखिया' था। उसका स्वार्थ इस बात में था कि वह उनसे ज्यादा से ज्यादा और अच्छा से अच्छा काम ले सके; इसके लिए उन्हें इस बात की शिक्षा देनी थी कि वे कायदे के साथ उसकी बात मानें और उसके कहने में रहें। वह स्वयं धार्मिक था; धर्म के झंडे के नीचे ही उसने राजा और सामंतों से संघर्ष किया था, और उसे यह मालूम करते देर न लगी कि अपने से कुदरती तौर पर कनिष्ठ लोगों के विचारों को प्रभावित करने और ईश्वर ने अपनी मर्जी में आकर उन्हें जिन मालिकों


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के मातहत रखा था, इन कनिष्ठ लोगों को उनकी इच्छा के अधीन रखने का अवसर भी यही धर्म देता था। संक्षेप में, अंग्रेजी पूंजीवादी वर्ग को अब " नीची श्रेणियों" को राष्ट्र की विशाल उत्पादक जनता को दलित रखने के काम में हिस्सा लेना था और इस उद्देश्य की सिद्धि के लिए जो तरीके काम में लाये गये, उनमें एक धर्म का प्रभाव भी था।


एक और बात थी, जिसने पूंजीवादी वर्ग की धार्मिक प्रवृत्तियां को मजबूत करने में मदद दी- यह इंगलैंड में भौतिकवाद का उदय था। इस नये सिद्धान्त ने मध्यवर्ग की पवित्र भावनाओं को धक्का ही नहीं दिया, उसने एक ऐसे दर्शन के रूप में अपने को घोषित किया, जो संसार के विद्वानों और सुसंस्कृत व्यक्तियों के लिए ही उपयुक्त था। और इसके विपरीत धर्म था, जो अशिक्षित जनता के लिए, जिसमें पूंजीवादी वर्ग का भी शुमार था, काफ़ी अच्छा था। हाब्स के साथ वह राजाओं के विशेषाधिकारों पर राजाओं की सर्वशक्तिमत्ता के रक्षक के रूप में मैदान में आया, और उसने निरंकुश राज्यतंत्र का इसके लिए आह्वान किया कि वह इस puer robustus sed malitiosus*, यानी जनता को दबाये रखे। इसी तरह हान्स के अनुवर्ती बोलिंगबोक, शेपट्सबरी इत्यादि के दर्शन में भौतिकवाद का निर्गुणवादी रूप एक अभिजातीय और कुछ चुने हुए लोगों तक सीमित सिद्धान्त ही बना रहा और इसलिए मध्यवर्ग ने उसे घृणा की दृष्टि से देखा- उसके धर्मविरोधी विश्वासों के कारण, और उसके पूंजीवाद विरोधी राजनीतिक संबंधों के कारण भी। इसीलिए, प्रगतिशील मध्यवर्ग का मुख्य भाग अभी भी, अभिजात वर्ग के भौतिकवाद तथा निर्गुणवाद के विरोध में, प्रोटेस्टेंट मतवादी संप्रदाय का अनुगामी बना रहा। इन संप्रदाय के झंडे के नीचे स्टूअर्ट राजवंश के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी गयी, और इन्हीं के आदमियों ने यह लड़ाई लड़ी, धौर आज भी यह इंगलैंड की " महान् उदार पार्टी" की रीढ़ बने हुए हैं।


इस बीच भौतिकवाद इंगलैंड से फ्रांस पहुंचा, जहां वह दार्शनिको के एक दूसरे भौतिकवादी मत कार्टेसियनवाद की एक धारा के साथ घुलमिल कर एक हो गया। फ्रांस में भी वह पहले पहल एक केवल

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*  मोटे तगड़े, मगर शैतान लड़के को सं०


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अभिजातीय सिद्धान्त ही बना रहा। परंतु शीघ्र ही उसकी क्रांतिकारी प्रकृति उभरकर सामने आयी। फ्रांसीसी भौतिकवादियों ने अपनी आलोचना धार्मिक विश्वास की बातों तक ही सीमित नहीं रखी, उन्हें जितनी भी वैज्ञानिक परम्परायें या राजनीतिक संस्थायें मिलीं, सबको उन्होंने अपनी आलोचना की लपेट में लिया और अपना यह दावा कि हमारा सिद्धान्त सर्वव्यापी है, सावित करने के लिए उन्होंने सबसे सीधा रास्ता अख्तियार किया और अपने विराट ग्रंथ 'विश्वकोष' में उसे साहस के साथ ज्ञान के हर विषय पर लागू किया। इसी 'विश्वकोष' से उनका नाम विश्वकोषवादी पड़ा। इस प्रकार प्रकाश्य रूप से भौतिकवाद या निर्गुणवाद इन दो में से एक न एक रूप में वह फ्रांस के सभी शिक्षित युवकों का मत बन गया; इस हद तक कि जब फ्रांस की महान् क्रांति भड़की, तब जिस सिद्धान्त का अंग्रेज राजनिष्ठों ने पोषण किया था, उसने फ्रांसीसी गणतंत्रवादियों और आतंकवादियों को एक सैद्धान्तिक पताका दी और 'मनुष्य के अधिकारों के घोषणापत्र' के लिए शब्द प्रस्तुत किये। फ्रांस की महान् क्रांति पूंजीवादी वर्ग की तीसरी बगावत थी; लेकिन यह पहली बग़ावत थी, जिसने अपना मजहबी जामा उतार फेंका था और जो खुल्लमखुल्ला राजनीतिक ढंग से लड़ी गयी। और यह पहली लड़ाई थी, जो तब तक लड़ी गयी, जब तक दो लड़ाकू दलों में से एक, यानी अभिजात वर्ग, खत्म न हो गया और दूसरा यानी पूंजीवादी वर्ग सम्पूर्ण रूप से विजयी न हो गया। इंगलैंड में क्रांति के पूर्व और क्रांति के बाद की संस्थानों का अविच्छिन्न क्रम और बड़े जमींदारों और पूंजीपतियों का समझौता उस बात में प्रकट हुआ कि कानून की नजीरें चलती रही और कानून के सामंती रूपों को धर्म की घोट में अक्षुण्ण रखा गया। फ्रांस में क्रांति का अर्थ था अतीत की परम्परा से सम्पूर्ण विच्छेद। उसने सामंतवाद के अवशेषों तक को निश्चिह्न कर दिया और Code Civil (जाब्ता दीवानी) की शक्ल में प्राचीन रोमन कानून को - और यह रोमन कानून, जिस आर्थिक मंजिल को मार्क्स ने 'माल-उत्पादन' कहा है, उसके कानूनी संबंधों की प्रायः सम्पूर्ण अभिव्यक्ति है आधुनिक पूजीवादी सम्बन्धों के अनुरूप बड़ी होशियारी से एक नया शोधित रूप दिया- इतनी होशियारी से कि आज भी फ्रांस का यह क्रांतिकारीकानून इंगलैंड सहित सभी देशों में मिल्कियत के कानून में


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सुधार के लिए एक नमूने का काम देता है। फिर भी हमें यह भूल नहीं जाना चाहिए कि अंग्रेजी कानून अभी भी पूंजीवादी समाज के आर्थिक संबंधों को एक ऐसी बर्बर सामंती भाषा में व्यक्त करता है, जो व्यक्त वस्तु से उसी तरह मेल खाती है, जैसे अंग्रेजी हिज्जे अंग्रेजी उच्चारण से- किसी फांसीसी ने कहा है कि vous écrivez Londres et vous prononcez Constantinople* तो यह अंग्रेजी क़ानून ही वह कानून है, जिसने प्राचीन जर्मनों तक को व्यक्तिगत स्वतंत्रता, स्थानीय स्वायत्त शासन और अदालत के सिवाय बाकी हर तरह के हस्तक्षेप से निर्भयता और मुक्ति - इन अधिकारों के श्रेष्ठ भाग को सुरक्षित रखा है और उसे अमरीका तथा उपनिवेशों तक पहुंचाया है, जबकि निरंकुश राज्यतंत्र के युग में ये अधिकार शेष यूरोप से विलुप्त हो गये और अभी भी उनका कहीं भी पूरी तरह उद्धार नहीं हो पाया है।


हम फिर अपने ब्रिटिश पूंजीपति की बात लें। फ्रांसीसी क्रांति ने उसे इस बात का बढ़िया मौक़ा दिया कि वह यूरोप के राजतन्त्रों की सहायता से फ्रांस के समुद्री व्यापार को नष्ट कर दे, फ्रांसीसी उपनिवेशों को हथिया ले और फ्रांस के समुद्री प्रतिद्वन्द्वता के आखरी दावों को कुचल दे। उसने फ्रांस की क्रांति से लोहा लिया, इसका एक कारण यह था। दूसरा कारण यह था कि इस क्रांति का तौर-तरीका उसकी फितरत के बिलकुल खिलाफ था। इस क्रांति का "घृणित" आतंकवाद ही नहीं, पूंजीवादी शासन को आखिरी छोर तक ले जाने की कोशिश भी। ब्रिटिश पूंजीवादी अपने अभिजात वर्ग के बिना कर हो क्या सकता था? जो भी तहजीब और कायदा उसे मालूम था, इस अभिजात वर्ग ने ही उसे सिखाया था। उसने उसके लिए नये नये फैशन निकाले थे और उसी ने घर में अमन कायम रखनेवाली सेना और बाहर औपनिवेशिक देशों और नये बाजारों को सर करनेवाली नौसेना के लिए अफसर जुटाये थे। इसमें सन्देह नहीं कि पूंजीवादी वर्ग का एक प्रगतिशील अल्पसंख्यक भाग था, जिसके हितों पर समझौते में उतना ध्यान नहीं दिया गया था और यह भाग, जिसमें अधिकतर मध्यवर्ग के कम धनी लोग थे, क्रांति से सहानुभूति रखता था, लेकिन पार्लियामेंट में उसकी कोई ताकत न थी।

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* आप लिखते हैं "लंदन" और बोलते हैं "कुस्तुनतुनिया" ! - सं०


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इस प्रकार यदि भौतिकवाद फ्रांसीसी क्रांति का दर्शन बन गया, तो धर्मभीरु अंग्रेज पूंजीवादी वर्ग अपने धर्म के साथ और भी मजबूती के साथ चिपक गया। पेरिस के आतंक-राज ने क्या यह सिद्ध नहीं कर दिया था कि जनता की धार्मिक प्रवृत्तियों के नष्ट हो जाने का परिणाम क्या होता है ? जितना ही भौतिकवाद फ्रांस से पड़ोसी देशों में फैलता गया और जितना ही उसे समान सैद्धान्तिक धाराओं से, विशेष रूप से जर्मन दर्शन से, बल मिला और वस्तुतः शेष यूरोप में जितना ही भौतिकवाद तथा स्वतंत्र विचार एक सुसंस्कृत व्यक्ति के आवश्यक गुण बनते गये, उतनी ही मजबूती के साथ ब्रिटिश मध्यवर्ग अपने विविध धार्मिक विश्वासों के साथ चिपकता गया। यह विश्वास एक दूसरे से भिन्न हो सकते हैं, परन्तु वे सब स्पष्ट रूप से धार्मिक, ईसाई विश्वास ही थे।


जहां फ्रांस में क्रांति ने पूंजीवादी वर्ग की राजनीतिक विजय निश्चित कर दी थी, वहीं इंग्लैंड में वाट, आर्कराइट, कार्टराइट और  दूसरों ने प्रौद्योगिक क्रांति का सूत्रपात किया था, जिसने आर्थिक शक्ति के गुरुत्व के केंद्र को पूरी तरह स्थानान्तरित कर दिया। अभिजात जमींदारों की अपेक्षा पूंजीपतियों का धन और वैभव बहुत तेजी से बढ़ा। स्वयं पूंजीवादी वर्ग के अंदर कारखानेदारों ने महाजनी अभिजात वर्ग को, बैंकरों वगैरह को अधिकाधिक पृष्ठभूमि में ढकेल दिया। १६८९ का समझौता, बाबजूद इसके कि उसमें धीरे धीरे पूंजीवादी वर्ग के हित में परिवर्तन हुए थे, अब दोनों पक्षों की सापेक्ष स्थिति के अनुरूप न रहा। इन पक्षों का स्वरूप भी बदल गया था: १८३० का पूंजीवादी वर्ग पिछली शताब्दी के पूंजीवादी वर्ग से बहुत भिन्न था। अभी भी जो राजनीतिक शक्ति अभिजात वर्ग के हाथ में छोड़ दी गयी थी, और जिसका उपयोग से नये प्रौद्योगिक पूंजीवादी वर्ग के दावों का विरोध करने में करते थे, अब उसका नये आर्थिक हितों मे मेल न रह गया। अभिजात वर्ग के साथ एक नया संघर्ष आवश्यक हो गया, और उसका अंत नई आर्थिक शक्ति की विजय में ही हो सकता था। पहले तो १८३० की फ्रांसीसी क्रांति की प्रेरणा से, सारे प्रतिरोध के बावजूद, सुधार कानून को पास किया गया। इस कानून ने पालमेंट में पूंजीवादी वर्ग को एक शक्तिशाली और सम्मानित स्थान प्रदान किया। इसके बाद अनाज


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के क़ानूनों* को मंसूख किया गया और इसने सामंती अभिजात वर्ग पर पूंजीबादी वर्ग का विशेष रूप से उसके सबसे सक्रिय भाग कारखानेदारों का, प्रभुत्व सदा के लिए स्थापित कर दिया। यह पूंजीवादी वर्ग की सबसे बड़ी विजय थी, परन्तु एकमात्र अपने हित में प्राप्त की गयी यह अन्तिम विजय भी थी। बाद में उसने जो जीतें हासिल की, उन्हें उसे एक नयी सामाजिक शक्ति के साथ बांटकर उपभोग करना पड़ा और यह नयी शक्ति पहले तो उसके साथ थी, पर बहुत जल्द उसका प्रतिद्वन्दी बन गयी।


औद्योगिक क्रांति ने बड़े बड़े कारखानेदार-पूंजीपतियों के एक वर्ग को जन्म दिया था, लेकिन उसने एक और वर्ग को बहुत बड़े वर्ग को भी जन्म दिया था - यह वर्ग था कारखानों में काम करनेवाला मजदूर वर्ग। जिस अनुपात में प्रौद्योगिक क्रांति का प्रौद्योगिक उत्पादन की एक शाखा के बाद दूसरी शाखा पर अधिकार होता गया, उसी अनुपात में यह वर्ग भी संख्या में बढ़ता गया और इसी अनुपात में उसने अपनी ताकत भी बढ़ायी। अपनी इस ताकत का सबूत उसने १८२४ में ही दे दिया, जब उसने पार्लियामेंट को ऐसे कानूनों को रद्द करने के लिए मजबूर किया, जिनके अनुसार, मजदूरों को अपना संगठन बनाने की मनाही थी। सुधार-आंदोलन के काल में मजदूरों ने सुधार पार्टी के अंदर एक गरम दल कायम किया। १८३२ के ऐक्ट में उन्हें वोट देने के अधिकार से वंचित रखा गया था, इसलिए उन्होंने अपनी मांगों को जनता के एक अधिकार पत्र (People's Charter) के रूप में रखा और अनाज-क़ानून विरोधी विशाल पूंजीवादी पार्टी के मुकाबले में उन्होंने अपने को एक चार्टिस्ट स्वतंत्र पार्टी के रूप में संगठित किया। यह पार्टी आधुनिक युग में मजदूरों की पहली पार्टी थी। इसके बाद फ़रवरी और मार्च १८४८ की शेष यूरोपीय क्रांतियां

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अनाज के क़ानून- १८१५ में ब्रिटिश पार्लियामेंट द्वारा जमीदारों के हित में स्वीकृत की गयी अनाज की ऊंची दरों से संबंधित कानून। जनसंख्या के गरीब तबके के कंधों पर भारी बोझ बने हुए ये प्रौद्योगिक पूंजीपतियों के लिए भी अलाभकर थे क्योंकि उनके फलस्वरूप श्रम का मूल्य बढ़ गया, घरेलू बाजार में क्रय-शक्ति घट गयी और विदेशी व्यापार के विकास में रुकावट पैदा हुई। १८४६ में ये क़ानून मंसूख किये गये। सं०


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हुईं, जिनमें मजदूरों ने इतना आगे बढ़कर हिस्सा लिया, और कम से कम पेरिस में ऐसी मांगें रखीं, जो पूंजीवादी समाज के दृष्टिकोण से कभी भी स्वीकार नहीं की जा सकती थीं। क्रांतियों के बाद चारों ओर जोरदार प्रतिक्रिया हुई। पहले १० अप्रैल, १८४८ को चार्टिस्टों की हार, फिर उसी साल जून में पेरिस मजदूर विद्रोह का कुचल दिया जाना और फिर इटली, हंगरी, दक्षिण जर्मनी में १८४९ की आफ़ते, और अंत में २ दिसंबर १८५१ को पेरिस पर लुई बोनापार्ट की विजय। कम से कम कुछ वक्त के लिए मजदूर वर्ग के दावों का हौवा दूर कर दिया गया, लेकिन इसके लिए कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी! अगर अंग्रेज पूंजीपति ने आम जनता की धार्मिक भावना को कायम रखने की जरूरत पहले ही समझ ली थी, तो इन सारे अनुभवों के बाद उसने यह जरूरत और भी कितना महसूस की होगी! अपने यूरोपीय भाई-बंदों की हिकारत-भरी हंसी की परवाह न कर वह लगातार साल पर साल, निम्न श्रेणियों की धर्मशिक्षा पर बीसों हजार खर्च करता रहा। अपने देश के धार्मिक उपकरणों से उसे सन्तोष न था, इसलिए उसने एक व्यापार के रूप में धर्म के सबसे बड़े संगठनकर्ता 'भाई जोनाथन'* से अपील की, अमरीका से पुनरुत्थानवाद का आयात किया, मूडी तथा सांकी** जैसे लोगों को बुलाया और अंत में उसने 'सैल्वेशन सेना' की ख़तरनाक मदद को क़बूल किया; ख़तरनाक इसलिए कि यह सेना प्रारंभिक ईसाई धर्म के प्रचार में फिर से जान डालती है, गरीबों को ख़ुदा के बंदे कहकर पुकारती है, पूंजीवाद के विरुद्ध धार्मिक तरीक़ों से संघर्ष करती है और इस प्रकार वह प्रारंभिक ईसाई वर्ग-विरोध के एक तत्त्व का पोषण करती है जो किसी भी दिन उन धनी-मानी लोगों को परेशानी में डाल सकती है, जो आज उसके लिए नकद रुपये देते हैं।

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• संयुक्त राष्ट्र अमरीका को सूचित करने के लिए 'भाई जोनाथन' कहा जाता था। फिर इसके स्थान में 'चाचा सेम' का प्रयोग प्रचलित हुआ। सं०


** पुनरुत्थानवाद - गत शताब्दी का एक धार्मिक आंदोलन, जिसने धर्म के नष्ट होते हुए प्रभाव को फिर से जीवित करने का प्रयत्न किया। अमरीका के दो उपदेशक, मूडी और सांकी इस आदोलन के संगठनकर्त्ता थे।- सं०


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ऐतिहासिक विकास का यह एक नियम मालूम होता है कि पूंजीवादी वर्ग किसी भी यूरोपीय देश में कम से कम स्थायी काल के लिए राजनीतिक सत्ता को उसी प्रकार अकेले अपने अधिकार में नहीं रख सकता जिस प्रकार मध्ययुग में सामंती अभिजात वग ने रखा था। यहां तक कि फ्रांस में भी, जहां सामंतवाद को बिलकुल ख़त्म कर दिया गया, समूचा पूजीवादी वर्ग शासन पर अपना पूरा अधिकार बहुत थोड़े थोड़े समय के लिए ही रख सका । १८३० से १८४८ तक लुई फ़िलिप के शासन में पूंजीवादी वर्ग के एक बहुत छोटे-से भाग ने राज्य पर शासन किया; वोट देने की शर्त इतनी ऊंची रखी गयी थी कि उस वर्ग का अधिकांश भाग इस अधिकार से वंचित था। १८४८ से १८५१ तक, द्वितीय गणतंत्र के काल में, समूचे पूंजीवादी वर्ग ने हुकूमत की जरूर लेकिन महज तीन साल के लिए। उसकी अयोग्यता के कारण द्वितीय साम्राज्य की स्थापना हुई। अब कहीं जाकर तीसरे गणतंत्र के युग में समूचे पूंजीवादी वर्ग ने बीस साल से ज्यादा शासन की बागडोर अपने हाथ में रखी है, पर उनके पतनोन्मुख होने के जोरदार लक्षण अभी से देखने में आ रहे हैं। पूंजीवादी वर्ग का स्थायी शासन अमरीका जैसे देशों में ही संभव हुआ है, जहां सामंतवाद का नाम न था और समाज आरंभ से ही पूंजीवादी आधार पर चला। और फ्रांस और अमरीका तक में पूंजीवादी वर्ग के उत्तराधिकारी मजदूर - अभी से दरवाजा खटखटाने लगे हैं।


इंगलैंड में पूंजीवादी वर्ग का एकाधिपत्य कभी नहीं रहा। १८३२ की विजय के बाद भी बड़ी बड़ी सरकारी नौकरियां एक तरह से अकेले अभिजात वर्ग के अधिकार में ही रहीं। इस बात को धनी मध्यवर्ग ने चुपचाप कैसे सह लिया, यह मेरे लिए एक रहस्य ही बना रहा, और यह रहस्य तब खुला जब बड़े उदारवादी कारखानेदार डब्ल्यू० ए० फ़ास्टर ने एक सार्वजनिक सभा में बोलते हुए, ब्रेडफ़ोर्ड के युवकों से अपील की कि वे संसार में सफलता प्राप्त करने के लिए फ्रांसीसी भाषा सीखें। अपने अनुभव का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि जब मंत्रिमंडल के एक मंत्री की हैसियत से, उन्हें एक ऐसे समाज मे आना जाना पड़ा जहां फ्रांसीसी भाषा कम से कम उतनी ही आवश्यक थी जितनी अंग्रेजी, तब कैसे उन्हे मुह चुराना पड़ा और सब के सामने शर्मिंदा होना पड़ा। दरअसल बात यह


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है कि उस जमाने का मध्यवर्ग सहसा धनी अवश्य हो गया था, लेकिन साधारणत: था वह अशिक्षित हो; और उसके लिए सिवा इसके कोई चारा न था कि वह ऊपर की सरकारी नौकरियों को अभिजात वर्ग के लिए ही छोड़ दे, क्योंकि उसके अंदर व्यापार बुद्धि के साथ द्वीपीय कूपमंडूकता तथा द्वीपीय अहंकार था लेकिन इन नौकरियों के लिए और ही गुणों की आवश्यकता थी।* आज भी अख़बारों में मध्यवर्गीय शिक्षा के बारे में जो कभी खत्म

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*  और व्यापार के मामले में भी राष्ट्रीय-अंधराष्ट्रवादी अहंकार परामर्श नहीं दे सकता। अभी हाल तक एक औसत अंग्रेज कारखानेदार, किसी अंग्रेज के लिए अपनी भाषा छोड़कर दूसरी भाषा बोलना अपमानजनक समझता था, और उसे इस बात पर गर्व ही अधिक होता था कि "ग़रीब"  विदेशी इंगलैंड में आकर बस गये हैं और उन्होंने उसके माल को विदेशों में खपाने की झंझट और परेशानी से उसे बरी कर दिया है। उसने कभी इस बात पर गौर नहीं किया कि इस तरह इन विदेशियों ने अधिकांश रूप से जर्मनों ने ब्रिटेन के विदेशी व्यापार के आयात तथा निर्यात के एक बहुत बड़े हिस्से पर अपना कब्जा जमा लिया और विदेशों के साथ अंग्रेजों का सीधा व्यापार, प्रायः उपनिवेशों, चीन, संयुक्त राष्ट्र अमरीक और दक्षिणी अमरीका तक ही सीमित रह गया। न ही उसने इस बात पर गौर किया कि यह जर्मन दूसरे देशों के जर्मनों के साथ व्यापार करते थे, और उन्होंने धीरे धीरे पूरी दुनिया में व्यापारिक बस्तियों क एक जाल बिछा दिया था। लेकिन जब करीब चालीस साल पहले जर्मन ने पूरी संजीदगी के साथ, निर्यात के लिए उत्पादन प्रारंभ किया, अनाज निर्यात करनेवाले देश से उसे कुछ ही समय में अव्वल दर्जे के एक प्रौद्योगिक देश में बदल देने में यह जाल खुब काम आया। और तब करीब दस साल पहले अंग्रेज कारखानेदार घबराया और उसने अपने राजदूतों और वाणिज्य दूतों से पूछा कि वह अपने ग्राहकों को अब और लगाये क्यों नहीं रख सकता। और उन्होंने एक स्वर से उत्तर दिया (१) तुम अपने ग्राहक की भाषा नहीं सीखते, बल्कि यह आशा करते हो वह तुम्हारी भाषा सीखेगा; (२) तुम अपने ग्राहक की आवश्यकता, आदत और रुचि के अनुकूल होने की कोशिश तक नहीं करते, बल्कि यह करते हो कि वह अपने को तुम्हारे अनुकूल बनायेगा। (एंगेल्स का नोट)


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न होनेवाली बहस चल रही है, उससे यह जाहिर होता है कि अभी भी अंग्रेज मध्यवर्ग अपने को श्रेष्ठतम शिक्षा के योग्य नहीं समझता, और अधिक साधारण शिक्षा की ही अपेक्षा रखता है। इस तरह अनाज के कानूनों के रद्द कर दिये जाने के बाद भी स्वाभाविक तौर पर यह समझा गया कि काबड़ेन, बाइट, फ़ास्टर आदि जिन लोगों ने यह जीत हासिल की थी, वे देश के राजकीय शासन में भाग लेने से वंचित रहें और वे बीस साल तक वंचित रहे भी, जिसके बाद एक नये सुधार कानून ने उनके लिए मंत्रिमण्डल का द्वार खोल दिया। ब्रिटिश पूंजीवादी वर्ग में अपनी सामाजिक हीनता की भावना इतनी गहरी बिंध गयी है कि सभी राजकीय अवसरों पर शोभनीय रूप से राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करने के लिए उन्होंने अपने और राष्ट्र के खर्च पर अकर्मण्य व्यक्तियों की एक सजावटी जाति को कायम कर रखा है, और जब उनमें से कोई इस विशिष्ट तथा विशेषाधिकार सम्पन्न समाज में, जिसका अन्ततः उन्होंने स्वयं ही निर्माण किया है, प्रवेश पाने के योग्य समझा जाता है, वह इसे अपना बड़ा भारी सम्मान समझता है। 


इस तरह हम देखते हैं कि औद्योगिक तथा व्यापारी मध्यवर्ग अभी तक भूस्वामी अभिजात वर्ग को राजनीतिक सत्ता से वंचित करने में पूरी तौर पर सफल न हो पाया था कि एक दूसरा प्रतिद्वंदी,मजदूर वर्ग, मैदान में उतरा। चार्टिस्ट आंदोलन तथा शेष यूरोपीय क्रांतियों के बाद की प्रतिक्रिया और साथ ही १८४८ और १८६६ के व्यापार के अभूतपूर्व विस्तार ने (जिसका कारण आम तौर पर केवल मुक्त बताया जाता है, लेकिन जो इससे कहीं ज्यादा रेल, समुद्री जहाज और साधारणतः परिवहन के साधनों का शक्तिशाली विकास था) मजदूर वर्ग को फिर लिबरल पार्टी के अधीन होने पर विवश किया था, चार्टिस्ट युग से पहले की तरह वह उस पार्टी से का उग्र पक्ष हो गया था। वोट देने के अधिकार का मजदूरों का दावा धीरे धीरे अप्रतिरोध्य बन गया और जहां लिबरल पार्टी के व्हिग नेताओं ने मुह चुराया, वहां डीसरायली ने टोरी को इसके लिए तैयार किया कि वे अनुकूल अवसर से लाभ उठायें और पार्लियामेंट की सीटों के पुनर्वितरण के साथ, नगरों में गृहस्वामियों का मताधिकार लागू करें, और इस तरह उसने दिखा दिया कि वह  व्हिग

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नेताओं से कहीं ज्यादा होशियार था। इसके बाद चुनाव-पत्रों के द्वारा चुनाव होना शुरू हुआ (the ballot); और तब १८८४ में गृहस्वामियों का यह मताधिकार काउंटियों में भी लागू किया गया और सीटों का एक नये सिरे से बंटवारा किया गया, जिससे वे कुछ हद तक एक दूसरे के बराबर हो गये। इन कार्रवाइयों से मजदूर वर्ग की निर्वाचन शक्ति बहुत बढ़ गयी, यहां तक कि आज कम से कम १५०-२०० चुनाव क्षेत्रों में अधिकांश मतदाता इस वर्ग के ही हैं। लेकिन पार्लियामेन्ट सरकार परंपरा के प्रति आदर सिखानेवाला बहुत खास स्कूल है; अगर मध्यवर्ग उन लोगों को जिन्हें लार्ड जान मैनर्स ने मजाक में "हमारे पुराने सामंत" कहा था, भय और आदर की दृष्टि से देखता है, तो मेहनतकश जनता " अपने से बड़े" कहे जानेवाले लोगों को, याने मध्यवर्ग को आदर और सम्मान की दृष्टि से देखती है। सचमुच आज से पंद्रह साल पहले अंग्रेज मजदूर एक आदर्श मजदूर था और वह अपने मालिक का इतना खयाल और इतनी इज्जत करता था और अपने हक़ों को मांगने में इतना संकोचशील और विनयशील था, कि उसे देखकर अपने देश के मजदूरों की असाध्य साम्यवादी और क्रांतिकारी प्रवृत्तियों से विक्षुब्ध, Katheder Socialist मत के हमारे जर्मन अर्थशास्त्रियों को बेहद तसल्ली मिलती थी।


परन्तु यह व्यवहार कुशल अंग्रेज मध्यवर्ग जर्मन प्रोफ़ेसरों से ज्यादा दूर तक देखता था। उसने अपनी शक्ति को मजदूर वर्ग के साथ बांटकर उपभोग किया था अवश्य, पर अत्यंत अनिच्छा से। उसने चार्टिस्ट जमाने में यह देख लिया था कि यह puer robustus sed malitiosus यानी जनता, क्या कर सकती है। और तब से उन्हें विवश होकर जनता के अधिकार पत्र के अधिकांश भाग को ब्रिटेन के कानून का अंग बनाना पड़ा था। अगर कभी जनता को नैतिक साधनों से वश में रखना था तो अब, और जनता को प्रभावित करने का सर्वोत्तम नैतिक साधन धर्म ही था, और अब भी है। और इसीलिए हम देखते हैं कि स्कूलों की प्रबंध समितियों में अधिकतर पादरी हैं, और इसीलिए यह पूंजीवादी वर्ग, कर्मकांड से लेकर 'सैल्वेशन सेना' तक, अनेक प्रकार के पुनरुत्थानवाद को प्रश्रय देने के लिए अपने आप पर अधिकाधिक कर लगाता है।


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और अब ब्रिटिश संभ्रान्त वर्ग ने शेष यूरोपीय पूंजीवादी के स्वतंत्र विचार तथा धार्मिक शिथिलता पर विजय पायी। फ्रांस और जर्मनी के मजदूर विद्रोही हो गये थे। उन्हें समाजवाद का रोग बुरी तरह लग गया था और ऊपर उठने के लिए इस्तेमाल किया जानेवाला तरीक़ा क़ानूनी है कि ग़ैरक़ानूनी, इसकी उन्हें खास फ़िक्र न रह गयी थी। यह puer ro bustus दिन-ब-दिन ज्यादा malitiosus होता जा रहा था। फ्रांसीसी और जर्मन पूंजीवादियों के लिए आख़िरी चारा यही रह गया कि वह चुपके से अपने स्वतंत्र विचारों को छोड़ दें- जैसे कोई लड़का बड़ी शान से सिगार पीता हुआ जहाज पर आये, और जब जहाज के हचकोले खाने से मिचली आने लगे, चुपके से जलते हुए सिगार को समुद्र में फेंक दे। जो लोग पहले धर्म का मजाक उड़ाते थे, अब वह एक के बाद एक, अपने बाह्य आचरण में धर्म-परायण बनने लगे, चर्च के बारे में चर्च के जड़ विश्वासों तथा आचार-विचार के बारे में श्रद्धापूर्ण बातें करने लगे और जहां तक अनिवार्य था, उनके अनुकूल आचरण भी करने लगे। फ्रांसीसी पूंजीवादी शुक्रवार को निरामिष आहार करते, और जर्मन पूंजीवादी रविवार को चर्च की बेंचों पर बैठकर लंबे लंबे प्रोटेस्टेंट उपदेश सुनते। भौतिकवाद ने उन्हें मुसीबत में डाल दिया था। "Die Religion muss dem Volk erhalten werden" * समाज को सम्पूर्ण विनाश से बचाने का यह एकमात्र और अन्तिम उपाय था। उनका यह दुर्भाग्य था कि उन्होंने इस बात को तभी समझा, जब उन्होंने धर्म को हमेशा के लिए ख़त्म कर देने के लिए अपनी भरसक सब कुछ कर डाला था। अब अंग्रेज पूंजीवादी की बारी थी कि वह हिकारत से हंसकर कहे, "बेवक़ूफ़ो, तुमने अब समझा है! मैं तुम्हें यह बात आज से दो सौ साल पहले ही बता सकता था ! "


इसके बावजूद मेरा विचार है कि न तो अंग्रेज की धार्मिक जड़ता, और न ही शेष यूरोपीय पूंजीवादी का post festurn** मत परिवर्तन, सर्वहारा वर्ग के उठते हुए ज्वार को रोक सकेगा। परम्परा एक जबर्दस्त बाधक शक्ति है, इतिहास की जड़ शक्ति है, परन्तु केवल निष्क्रिय होने

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• जनता के लिए धर्म को जीवित रखना चाहिए। सं० 

** घटना के पश्चात् । - सं०


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के कारण उसका टूटना अवश्यंभावी है, और इसलिए धर्म स्थायी रूप से पूंजीवादी समाज की ढाल नहीं हो सकता। यदि कानून दर्शन और धर्म के हमारे विचार, किसी समाज में प्रचलित आर्थिक सम्बंधों से ही न्यूनाधिक परोक्ष रूप से उत्पन्न हुए हैं, तो अन्ततः ऐसे विचार, इन संबंधों में संपूर्ण परिवर्तन के प्रभाव से बच नहीं सकते। और यदि हम दिव्य ज्ञान में विश्वास करें, तब तो दूसरी बात है, नहीं तो हमें मानना होगा कि ऐसा कोई धार्मिक विश्वास नहीं है, जो एक टूटते और चरमराते हुए समाज को टेक दे सके।


और दरअसल इंगलैंड में भी मेहनतकश जनता भागे बढ़ने लगी है। इसमें सन्देह नहीं कि वह तरह तरह की परम्पराओं से जकड़ी हुई है। पूंजीवादी परम्परायें जैसे यह पूर्वाग्रह कि इंगलैंड में दो ही पार्टियां संभव हैं- कंजरवेटिव पार्टी और लिबरल पार्टी, और मजदूर वर्ग विशाल लिवरल पार्टी के द्वारा ही अपनी मुक्ति प्राप्त कर सकता है। स्वतंत्र रूप से कार्य करने की पहली हिचकिचाती हुई कोशिशों से मिली हुई मजदूरों की परम्परायें जैसे बहुत सारे पुराने ट्रेड यूनियनों से उन प्रार्थियों को बाहर रखना, जो बाकायदा उम्मीदवार न रह चुके हों, जिसका मतलब है ऐसे हर ट्रेड यूनियन में हड़ताल-तोड़कों का पनपना। लेकिन इस सब के बावजूद, जैसा प्रोफ़ेसर ब्रेंटानो तक को बड़े अफ़सोस के साथ अपने Katheder-Socialist भाइयों से कहना पड़ा है, अंग्रेज मजदूर वर्ग आगे बढ़ रहा है। और इंग्लैंड में जैसे हर चीज बढ़ती है, वह बढ़ता है तो आहिस्ता संभले हुए कदम उठाता हुआ, कभी हिचकिचाता हुआ, तो कभी न्यूनाधिक असफल और प्रयोगमूलक प्रयत्न करता हुआ; कभी यह बढ़ता है, तो समाजवाद के नाम से ही शक खाता हुआ, बहुत सावधानी के साथ जबकि वह समाजवाद के सार को धीरे धीरे आत्मसात करता रहता है। और यह आंदोलन  बढ़ता है और फैलता है, और मजदूरों की एक परत के बाद दूसरी परत पर दखल करता है। इसने अब लंदन के इंस्ट-एड के मनिपुण मजदूरों को झकझोरकर नींद से उठा दिया है, और हम सब जानते है कि बदले में इन नयी शक्तियों ने इस आंदोलन को कितनी प्रेरणा दी है। और अगर इस आंदोलन  की रफ़्तार इतनी नहीं है, जितनी कुछ लोगों में बेसब्री है, तो उन्हें यह भूल नहीं जाना चाहिए कि मजदूर


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वर्ग ने ही अंग्रेजी चरित्र के सर्वश्रेष्ठ गुणों को जीवित रखा है, और इंगलैंड में जब एक कदम उठा लिया जाता है, तो फिर साधारणत: वह क़दम पीछे नहीं हटता। अगर उपरोक्त कारणों से, पुराने चार्टिस्टों के बेटे पूरे खरे नहीं उतरे तो क्या हुया, आसार इसी बात के हैं कि उनके पोते अपने पूर्वजों के योग्य निकलेंगे।


लेकिन यूरोपीय मजदूर वर्ग की विजय इंगलैंड पर ही निर्भर नहीं है। यह कम से कम इंगलैंड, फ्रांस और जर्मनी के सहयोग से ही प्राप्त की जा सकती है। फ्रांस और जर्मनी, दोनों में, मजदूर आंदोलन इंगलैंड से काफी आगे बढ़ा हुआ है। जर्मनी में उसकी सफलता सन्निकट तक है। पिछले पचीस वर्षों में उसने वहां जो प्रगति की है वह सचमुच अभूतपूर्व है। और वह तीव्र से तीव्रतर गति से आगे बढ़ रहा है। यदि जर्मन मध्यवर्ग में राजनीतिक योग्यता, अनुशासन, साहस, शक्ति, लगन आदि गुणों का शोचनीय प्रभाव देखने में आया है, तो जर्मन मजदूर वर्ग ने इन सभी गुणों का प्रचुर प्रमाण दिया है। चार सौ वर्ष पहले, यूरोपीय मध्यवर्ग का पहला विद्रोह जर्मनी से शुरू हुआ; आज जो स्थिति है, उसे देखते हुए, क्या यह बात संभावना के परे है कि जर्मनी ही यूरोपीय सर्वहारा वर्ग की पहली महान विजय की रंगभूमि होगा ?


२० अप्रैल १८९२    फ्रेडरिक एंगेल्स


१८९२ के अंग्रेजी संस्करण के पाठ के अनुसार अनूदित ।


प्रस्तुत भूमिका अपने मूल रूप में एंगेल्स के 'समाजवाद: काल्पनिक तथा वैज्ञानिक' के अंग्रेजी संस्करण के साथ प्रकाशित हुई थी। यह संस्करण १८९२ में लंदन से निकला था। इसी समय यह भूमिका जर्मन भाषा में eNeue Zeits नाम की पत्रिका के १८९२- १८९३ के अंकों में प्रकाशित हुई।



                     आगे जारी.......






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