किसान जब भी अपने कृषि उपज की कीमत बढाने सम्बन्धी मांग करेंगे, यह मांग पूंजीवाद के दायरे में एक पूंजीवादी जनवादी संघर्ष ही होगा, चाहे नेतृत्व धनी किसानों के हाथ मे हो या गरीब किसानों के हाथ मे। इसीलिये 'बड़े मियां तो बड़े मियां, छोटे मियां शुभां अल्ला' वाली कहावत पूरे किसान समुदाय पर चरितार्थ होती है।
किसानों की मुक्ति समाजवादी संघर्ष में ही हो सकती है, गलाघोंटू पूंजीवादी बाजार की प्रतियोगिता, अति-उत्पादन और कृषि उपज की कीमतों में बेसुमार उतार चढ़ाव से होने वाली बर्बादी से बचने का एक मात्र विकल्प पूंजी की सत्ता के खिलाफ सर्वहारा राज्य की स्थापना ही हो सकता है। किसान यह बात जितनी जल्दी समझ जाएंगे, अपनी पूर्ण मुक्ति के लिये सही कदम उठा सकेंगे।
किसानों के समूचे फसल की उचित कीमत पर खरीद की गारंटी एक मात्र सर्वहारा राज्य ही कर सकता है, अडानी, अम्बानी खून चूसक कॉर्पोरेट के हाथों की कठपुतली सरकार तो कत्तई गारंटी नही दे सकती।
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