Tuesday, 21 February 2023

जाति की आत्मकथा (64) : गड़रिया (संपूर्ण)


मैं यादवों की तरह इतिहास के माथे पर कलंक नहीं हूं। मैं गड़रिया हूं और पूरी शान के साथ कहता हूं कि मैं इस दुनिया को राह दिखाने वाला रहा हूं। मैं ईसा मसीह, पैगंबर मुहम्मद और मक्खलि गोसाल हूं। वह मैं ही हूं जिसने इस पूरी दुनिया को अनेकानेक उपलब्धियां दी। वह मैं ही हूं जिसने रास्ते खोजे और लोगों को जोड़ा। 

हां, वह मैं हूं जिसने यह जाना कि भेड़ों के कितने उपयोग हो सकते हैं। चमारों के विपरीत मैंने यह ज्ञान हासिल किया कि भेड़ों के बालों से ऊन तैयार किया जा सकता है और फिर उसके जरिए ठंड से बचने के लिए कंबल व अन्य कपड़े तैयार किये जा सकते हैं। मैं वह हूं, जो दुनिया का पहला सांस्कृतिक और सामाजिक संदेशवाहक था। 

विस्तार से कहूं तो मैं गड़रिया जाति भारतीय सामाजिक सभ्यता का वह प्रकाश स्तंभ हूं जिसने कृषि व्यवस्था के आविष्कार के पहले मनुष्य को सभ्य होने का पाठ पढ़ाया। इस मामले में मैं अन्य सभी जनजातीय समूहों से आगे रहा। सबसे पहले मैंने ही लोगों को बताया कि जिस जानवर का मांस आसानी से खाया जा सकता है और जो सुपाच्य है, वह भेड़ है। मैंने लोगों को इसके अन्य उपयोगों के बारे में जानकारियां दीं।

मुझे अब भी गौरव होता है अपनी इस उपलब्धि पर कि मैंने पूरी दुनिया को जोड़ा। भेड़ों को चराने के क्रम में मैं दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में गया और जहां गया्, वहां केवल अपनी भेड़ों को लेकर नहीं गया। मैं अपने साथ ज्ञान लेता गया। और साथ ही अन्य जगहों से मिले ज्ञान को मैंने आगे बढ़ाया।

लेकिन ब्राह्मणवाद, जिसने भारतीय समाज को अवैज्ञानिक और जड़ बना रखा है, उसने कभी भी मेरे श्रम को मान्यता नहीं दी। उसने हमेशा मुझे उपेक्षित रखा। जिन बातों के लिए पूरे भारतीय समाज को मेरे प्रति ऋणी होना चाहिए, उसने उन बातों और उपलब्धियों के लिए मुझे तिरस्कृत किया। आज भी समाज में मेरा कोई मान नहीं।

अब इस बात को ऐसे भी समझिए कि यादवों और मेरे बीच में अंतर क्या है। यादव यायावर नहीं रहे। वे कृषक भी थे और मवेशीपालक भी। वे गाय-भैंस चराते थे और इसके लिए उनके पास एक निश्चत भूभाग था। मतलब यह कि वे जिस इलाके में रहते, उसी इलाके तक सीमित रहते थे। मैं यह नहीं कहत कि सभ्यत के विकास में यादवों की भूमिका नहीं रही है, लेकिन उनकी भूमिका मेरी भूमिका के आगे नगण्य रही है। लेकिन फिर भी ब्राह्मणों ने यादवों को प्राथमिकता दी। कृष्ण के रूप में उनके नायकत्व को स्वीकार किया। यहां तक कि उन्हें विष्णु का अवतार बना दिया। यह सब उन्होंने क्यों किया, इसका कारण जो मैं गड़रिया समझता हूं, वह यही है कि यादव कृषक व मवेशीपालक रहे और इस कारण जमीन पर उनका अधिकार रहा। जमीन पर अधिकार होने के कारण ही यादवों ने राजनीतिक हस्तक्षेप किया। लेकिन मैं तो यायावर ही रहा। वैसे भी हम यायावरों के पास जमीन कहां और जब जमीन नहीं है तो राजनीतिक हस्तक्षेप कहां मुमकिन था।

लेकिन इससे मेरी दावेदारी कम नहीं हो जाती। मैं तो जनजातीय समूह का वह हिस्सा रहा हूं, जिसने पूरी प्रकृति को एक समान देखा। मैंने पहाड़ों को अपना माना, मैदानी इलाकों को भी अपनाया और यहां तक नदियों को भी आत्मसात किया। 

खैर, जो बातें अतीत की हैं, उसकी बात क्या करूं। लेकिन मन में कसक तो उठती ही है कि मेरे पूर्वजों ने केवल यायावरी पर फोकस क्यों किया? क्यों उन्होंने ईसा मसीह के गड़रियत्व को स्वीकार नहीं किया, जिसने मानवता से प्रेम किया और पूरी दुनिया क्षमाशील होने का संदेश दिया? 

निश्चित तौर पर यह बात मुझे गौरवान्वित करती है कि इतिहास के एक महत्वपूर्ण हिस्से में मेरा नाम उल्लिखित तो है। मैं तो यह सोचकर भी अपने आपको उत्साहित पाता हूं कि मेरे ही समुदाय के मक्खलि गोसाल हुए, जो बुद्ध के भी गुरू थे। हां, वही आजीवक मक्खलि गोसाल जिन्होंने यह विचार दिया कि इस धरती पर कोई ईश्वर नहीं है। हर घटना का घटित होना महज एक परिघटना है और इसके पीछे लौकिक कारण होते हैं।

दरअसल, यह केवल ईसा, मक्खलि गोसाल या फिर बुद्ध तक सीमित नहीं है। इस कड़ी में इस्लाम के पैगंबर मुहम्मद साहब भी शामिल हैं। वे भी गड़रिया ही थे। भेड़ें चराते थे। उन्हें तो उनके अनुयायी काली कमली वाला भी कहते हैं। यह कोई संयोग नहीं था कि आज पूरे विश्व में जिन तीन धर्मों को सबसे अधिक माना जाता है, उसके प्रवर्तकों में गड़रियापन कॉमन है।

यह संयोग इसलिए नहीं क्योंकि गड़रिया समाज ने मानव सभ्यता के विकास को न केवल गति दी, बल्कि नित नये प्रयोगों के जरिए इस समाज ने कृषि को भी समुन्नत किया। सबसे कारगर रहीं हमारी भेड़ें। भेड़ों ने जिन घासों को खाया, उन घासों को मेरे पूर्वजों ने खुद चखा और फिर इस दुनिया को सब्जियों और साग आदि के बारे में बताया। जिन घासों को भेड़ें नहीं खाती थीं, उन घासों की पड़ताल भी मेरे पूर्वजों ने की तथा उनके औषधीय गुणों की खोज की। चरवाही के क्रम में मेरे पूर्वजों ने पूरी दुनिया की खाक छानी और लोगों को अपनी खोजों के बारे में जानकारी दी। यही वह योगदान है, जिसने कृषि को विस्तार दिया। वह मेरे ही पूर्वज थे, जिन्होंने उन मवेशियों के बारे में पता लगाया जिनका इस्तेमाल कृषि कार्यों के लिए किया जा सकता था। यहां तक कि किन मवेशियों का इस्तेमाल दूध और मांस आदि के लिए किया जा सकता है, इसकी खोज का श्रेय भी मेरे ही पूर्वजों को जाता है। वे मेरे ही पूर्वज रहे जिन्होंने मवेशीपालन की शुरूआत की। इन्हें भारतीय समाज में यादव भी कहा जाता है। इस समाज ने तो अलहदा काम किया। चूंकि इस समाज के लोगों के पास कृषि का अनुभव भी था और गड़रियापन का भी तो इस समाज के लोगों ने कृषि कार्य के साथ ही मवेशीपालन को भी अपने अर्थशास्त्र में जोड़ दिया।

यादव समाज के कारण ही कृषि कार्यों के लिए बैलों और भैंसों का इस्तेमाल किया जाने लगा। जब बैलों और भैंसों का उपयोग नहीं किया जाता था तब कृषि उपकरण हस्तचालित ही होते थे। कुदाल, फावड़ा और गैंता आदि उपकरण के अलावा हल भी तब हस्तचालित ही थे। 

उन दिनों आज की तरह विभिन्न पेशा करनेवालों के बीच जातिगत भेदभाव नहीं था। लोहा कर्म करनेवाले, लकड़ी का कर्म करनेवाले, चमड़े का कर्म करनेवाले, खेती करनेवाले और स्वयं मेरे पूर्वजों के बीच अंतर नहीं था। इस कारण हुआ यह कि इन श्रमिक जातियों ने अपने अद्भूत समन्वय से हल का विकास किया। इसमें इन सभी का योगदान था। लोहा कर्म करनेवालों ने चौड़े और बड़े फल वाले हल बनाए तो लकड़ी का कर्म करनेवालों ने उसे लकड़ी के एक खांचे में संयोजित किया और एक लंबी लकड़ी के साथ उसे जोड़ दिया ताकि उसे दो बैलों अथवा भैंसों के गर्दन के बीच रखा जा सके। साथ ही एक लंबी लकड़ी और जोड़ दी ताकि हल की दिशा नियंत्रित रखी जा सके।

आज भले ही विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने खूब तरक्की कर ली है, लेकिन उन दिनों के बारे में सोचिए जब प्रारंभ में इसकी खोज हुई होगी। तब एक-एक जानकारी कितनी अहम होती होगी। 

खैर, जब अपने महान पुरखों के इतने योगदानों की चर्चा कर चुका हूं तो एक योगदान की चर्चा और कर दूं और मेरा दावा है कि इस देश के ब्राह्मण वर्ग के पास मेरे इस दावे का कोई जवाब नहीं होगा। मैं जिस योगदान की बात कर रहा हूं, वह गणन की प्रक्रिया का आविष्कार है। इस प्रक्रिया के आविष्कार में दो अहम हिेस्से रहे। एक तो यह कि महिलाओं के ऋतुकाल ने इस प्रक्रिया को एक ठोस कारण उपलब्ध कराया। दरअसल एक रजस्वला महिला साल में 13 बार ऋतुकाल में प्रवेश करती है। इस आधार पर समय की गणना की शुरूआत हुई। इससे समय को गिना गया। लेकिन असली गणना जिसे हम कहते हैं, उसकी शुरूआत तो मेरे पूर्वज गड़रियों ने की। दरअसल, उनके पास भेड़ें समूह में होती थीं। अब उनके पास कितनी भेड़ें हैं, यह जानने के लिए उन्होंने गिनना शुरू किया। प्रारंभ में उन्होंने अपने हाथ की अंगुलियाें का उपयोग किया होगा। हाथ की अंगुलियों में निशान बने होते हैं। एक अंगुली में तीन निशान और एक हाथ में कुल 15 और दोनों हाथ मिलाकर 30 निशान। ऐसे ही उन्होंने गिनना जाना होगा और पूरी दुनिया को बताया होगा कि चीजों को गिना कैसे जाता है।

मैं इसी आधार पर कहता हूं कि भारतीय ब्राह्मणों का यह दावा कि आर्यभट ने शून्य का आविष्कार कर गिनने की प्रक्रिया की शुरूआत की, एकदम झूठा है। आर्यभट को दशमलव संख्या पद्धति की खोज का श्रेय दिया जाता है। जबकि उसके पहले मेरे पूर्वजों ने 0 से 9 के अतिरिक्त की गणना कर ली थी और अनेकानेक इकाईयों का निर्माण भी कर लिया था। मसलन, काटे गए धान के पौधों का हिसाब रखने के लिए गाही नामक इकाई। एक गाही में धान के पौधों के पांच बंडल होते हैं। ऐसे ही गंडा नामक इकाई, जिसका आविष्कार यादव समाज की महिलाओं ने पाथे गए गोइठा को गिनने के लिए किया। एक गंडा में चार गोइठा शामिल होता है।

खैर, यह सब इतिहास की बातें हैं, जिन्हें कभी किसी ने लिखा ही नहीं। ब्राह्मणों ने हमारे पूर्वजों के ज्ञान को कभी महत्व नहीं दिया। आज भी इन सवालों पर भारतीय अकादमिक जगत मुंह बाए खड़ा है। और यह सब इसलिए कि ब्राह्मण समाज हमारे ऊपर अपना तथाकथित ज्ञान थोपता रहे, जबकि असल में वह ज्ञान है ही नहीं।

वर्तमान की तरफ लौटता हूं तो मुझे बेहद निराश होती है। गड़रिए, जिन्होंने एक समय मानव सभ्यता को अनुपम सौगातें दीं, सभ्यता के विकास के क्रम में पिछड़ते चले गए। और आज तो यादव समाज जो कि उनका ही एक हिस्सा है, वह स्वयं को अलग मानता है और हमारी पांत में शामिल नहीं होना चाहता। यह समाज भी हमें हिकारत भरी निगाह से देखता है। वैसे यह सब ब्राह्मणों का किया धरा है, जिन्होंने इस समाज को अपनी चपेट में ले लिया है, जो पूर्व में श्रम और वैज्ञानिक विचारों से लैस था। आज यह समाज खुद को कृष्ण का वंशज कहता है और गर्व करता है कि भगवद्गीता उसके कृष्ण ने रचा। जबकि वह यह समझना ही नहीं चाहता है कि कृष्ण ने भगवद्गीता में एक भी श्लोक श्रमिक समाज के हित में नहीं कहे। यह तो कोई भी आसानी से समझ सकता है कि कृष्ण अपने ही समाज को ब्राह्मणों का गुलाम बनने के लिए प्रेरित कैसे कर सकता है। बतौर उदाहरण यह देखिए–

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥5.18৷৷

असल में पांचवें अध्याय को ब्राह्मणों ने 'कर्म संन्यास योग' की उपमा दी है, जिसमें कृष्ण अर्जुन को कर्म की अपनी ब्राह्मणवादी परिभाषा का विस्तार करता है और अर्जुन को ज्ञानी पुरुष का मतलब समझाता है। इस क्रम में वह कहता है कि ज्ञानी वे हैं, जो विद्या और विनययुक्त ब्राह्मण में तथा गौ, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल में भी समदर्शी ही होते हैं। अब इस श्लोक में यह तो साफ है कि चांडाल यानी एक जाति जिन्हें पहले अछूत माना गया और अब दलित के रूप में उन्हें संबोधित कहा जाता है। संविधान में इन जातियों को अनुसूचित जाति की श्रेणी में रखा गया है। लेकिन भगवद्गीता नामक इस पंफलेट के उपरोक्त श्लोक में उन्हें गाय, हाथी, कुत्ते के बाद चांडाल के बाद जगह दी गई है।  

भगवद्गीता के छठे अध्याय में तो ब्राह्मणों ने वर्ण व्यवस्था और जातिगत भेदभाव को न्ययोचित ठहराने के लिए गजब का तर्क दिया है। इसका 32वां श्लोक देखा जाना चाहिए। यह कहता है–

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ৷৷6.32৷৷

इस श्लोक में कृष्ण परम योगी की परिभाषा बताता है कि वही योगी परम योगी है जो समाज के विभिन्न तबकों यथा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, म्लेच्छ आदि को अपने शरीर के क्रमश: मस्तक, हाथ, पैर, गुदा (शौच का अंग) के समान मानता है। इसमें ब्राह्मणों ने यह भी कहा है कि जो सुख अथवा दुःख को भी सबमें सम देखता है, वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है। अब मस्तक ब्राह्मण के लिए, हाथ क्षत्रिय के लिए, पैर वैश्य के लिए, गुदा यानी शौच का अंग शूद्रों और म्लेच्छों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है, तो इस पंफलेट में और मनुस्मृति में क्या अंतर है।

जाहिर तौर पर भगवद्गीता न तो यादवों का ग्रंथ और न ही हम गड़रियों का।यह किसी भी श्रमिक समुदाय का ग्रंथ नहीं हो सकता। यह विशुद्ध रूप से ब्राह्मणों का ग्रंथ है, जिसे कृष्ण नामक एक मिथकीय पात्र के मुंह से कहलवाया गया है ताकि शूद्रों को ब्राह्मणवादी फंदे में फंसा कर खा जा सके।

लेकिन अफसोस कि आज भी लोग इस सच को समझ नहीं रहे। लेकिन मैं गड़रिया, अपने पूर्वजों से मिले असीम धैर्य और साहस के बूते कह रहा हूं कि मैं निराश नहीं हूं। हालांकि भारतीय संविधान में मेरे लोगों को ओबीसी में शामिल किया गया है, और कहीं-कहीं नोमेडिक यानी घुमंतू जाति के रूप में मान्यता दी गई है, मैं आश्वस्त हूं कि मेरा यह समाज जड़ता का शिकार नहीं होगा। वह मक्खलि गोसाल, बुद्ध, ईसा और मुहम्मद के रास्ते पर चलता रहेगा।

- नवल किशोर कुमार

जाति की आत्मकथा (63) : चमार (चौथा भाग) तीसरी कड़ी के आगे



समय एक-सा नहीं रहता। दुनिया में सब परिवर्तनशील है। मेरा समाज भी बदला है। लेकिन यह तो मैं कह ही सकता हूं कि मेरा यह समाज वह समाज है जिसने प्रतिरोध किया है। फिर चाहे हालात कैसे भी रहे। वैसे तो समग्र रूप से देखा जाय तो मेरी जाति के लिए चमार शब्द का ही उपयोग करते हैं। कहीं-कहीं कुछ और शब्द भी उपयोग में लाए जाने लगे हैं। जैसे कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश और दिल्ली में जाटव तो आंध्र प्रदेश में मडिगा। 

मेरे बारे में कुछ अलग मान्यताएं भी हैं। मसलन, अंग्रेज इतिहासकार कर्नल टाड का मत रहा कि चमार समुदाय के लोग वास्तविक रुप से अफ्रीकी मूल के रहे। लेकिन यह बहुत अधिक तर्कसंगत नहीं है। हालांकि इससे इंकार नहीं कि मेरे पूर्वजों की पृष्ठभूमि जनजातीय रही। लेकिन मेरे पूर्वजों का संबंध किसी और मुल्क से नहीं रहा है। इस तरह का दावा भी कई नृवंशशास्त्रियों ने किया है। उनका भी मत रहा है आदिकाल से ही इस समुदाय के लोगों का भारतीय समाज में अस्तित्व रहा है।

वहीं कई कोशिशें की गयी हैं कि मेरे लोगों को हिंदू धर्म से जोड़ा जाय। इसके लिए अनेकानेक कहानियां भी गढ़ी गईं। डॉ. विजय सोनकर ने अपनी किताब 'हिंदू चर्मकार जाति: एक स्वर्णिम गौरवशाली राजवंशीय का इतिहास' में लिखा है कि चमार वास्तव में चंवर वंश के क्षत्रिय हैं। अपनी पुस्तक में उन्होंने ब्रिटिश इतिहासकार जेम्स टॉड के हवाले से राजस्थान के इतिहास में चंवर वंश के बारे में विस्तार में लिखा है। सोनकर चमार जाति के लोगों को मौलिक रूप से क्षत्रिय मानते हैं और कहते हैं कि विदेशी आक्रांताओं के आने से पहले चमार जाति के लोग भारत में मुस्लिम, सिख या फिर दलित नहीं थे। उनका (कु)तर्क है कि आंतरिक लड़ाई के कारण चमार जाति के लोग क्षत्रिय समुदाय से अलग होते चले गए।

हालांकि केवल डॉ. विजय सोनकर ने ही नहीं, वर्तमान के कई साहित्यकारों और विचारकों ने भी यह कहा है कि वे क्षत्रिय वंश के रहे। लेकिन यह सब केवल कहने की बात है। यदि क्षत्रिय वंश से जुड़ाव होता तो मेरे पूर्वज मरे हुए जानवरों की खाल क्यों छीलते और उससे चमड़ा क्यों बनाते?

खैर यदि बसावट की बात करूं तो मेरे लोग भारत के अलावा पाकिस्तान और नेपाल में रहते हैं। 2001 के जनगणना के अनुसार, उत्तर प्रदेश में चमारों की जनसंख्या लगभग 14 प्रतिशत है और पंजाब में 12 प्रतिशत। इसी तरह राजस्थान में 11 प्रतिशत, हरियाणा में 10 प्रतिशत, मध्य प्रदेश 9.5 प्रतिशत, छत्तीसगढ़ 8 प्रतिशत, हिमाचल प्रदेश में 7 प्रतिशत, दिल्ली में 6.5 प्रतिशत, बिहार में 5 प्रतिशत और उत्तरांचल में 5 प्रतिशत। इसके अलावा जम्मू कश्मीर, झारखंड, पश्चिम बंगाल, गुजरात आदि में भी मेरे लोगों की आबादी ठीक-ठाक ही है।

राजनीति के हिसाब से बात करूं तो आज कोई भी राजनीतिक दल मेरी उपेक्षा करने की स्थिति में नहीं है। वह जमाना चला गया जब मेरे लोग भयवश किसी भी दल को सपोर्ट कर देते थे। आज उनके पास उनकी वैचारिकी है। यह वैचारिकी उन्हें डॉ. आंबेडकर की विचारधारा से प्राप्त हुई है, जिन्होंने अछूतों के लिए वृहत आंदोलन चलाया। हालांकि डॉ. आंबेडकर स्वयं महार जाति के थे। इस महार जाति की पृष्ठभूमि भी करीब-करीब मेरे जैसी ही रही है। केवल नाम का अंतर है। 

वैचारिकी की बात से एक बात याद आयी। मध्य काल में हुए रैदास के नाम का उल्लेख करना आवश्यक है। संत परंपरा के इस महापुरुष ने ब्राह्मणवाद को पहली बार बौद्धिक चुनौती दी थी। उन्होंने जाति व्यवस्था के ऊपर करारा प्रहार किये। यह इस बात का द्योतक था कि भले ही ब्राह्मणों ने मेरे लोगों को उपेक्षित और गुलाम बनाकर रखा, लेकिन मेरे लोगों ने अपने सामाजिक चरित्र संबंधी विशेषताओं के कारण ब्रा्ह्मणों के वर्चस्व को चुनौती दी।
 
भला कौन भूल सकता है 1 जनवरी, 1818 की वह ऐतिहासिक तारीख जब पांच सौ महार सैनिकों ने पेशवाओं की बड़ी फौज को परास्त कर दिया था। वही पेेशवा, जिनके राज में महारों और अन्य अछूतों को नारकीय जीवन जीना पड़ता था। यह उनके अंदर का आक्रोश और उत्कृष्ट युद्ध कौशल ही था कि महारों ने महाराष्ट्र से पेशवाओं का राज हमेशा-हमेशा के लिए खत्म कर दिया।

अंग्रेजों ने मेरे लोगों को अछूत नहीं माना। यही कारण रहा कि उन्होंने महार रेजिमेंट का गठन किया। इस रेजिमेंट का गठन 1 मार्च 1943 को दूसरे विश्व युद्ध के दौरान की गई थी। इस रेजिमेंट को कोहिमा की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए सम्मानित किया गया था। आपको बतात चलूं कि अंग्रेजों ने इस रेजिमेंट का गठन उस समय सबसे शक्तिशाली माने जाने वाली जापानी सेना से मुकाबला लेने के लिए किया था।

लेकिन ये सब वे बातें हैं, जिनके कारण हम केवल अपनी मुंछों पर ताव दे सकते हैं। मेरी जाति भी संक्रमण के दौर से गुजरी है। लोगों में कई तरह के बदलाव आए हैं। 

क्रमश: जारी

- नवल किशोर कुमार



Thursday, 2 February 2023

गौरी लंकेश की शहादत और मौजूदा पत्रकारिता


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राज कुमार शाही
सदस्य, प्रगतिशील लेखक संघ, पटना।
  गौरी लंकेश वामपंथी विचारधारा से प्रभावित एक सशक्त पत्रकार के रूप में कन्नड़ साप्ताहिक पत्रिका "गौरी लंकेश" की संपादक थीं। दक्षिणपंथी संगठनों खासकर आरएसएस और अन्य हिंदुत्व संगठनों के खिलाफ लगातार अपनी पत्रिका में उनके करतूतों को लेकर लिख रहीं थीं। साथ ही साथ सक्ता विरोधी एक सशक्त स्वर के रूप में प्रतिष्ठित थी जो हर तरह के शोषण और ज़ुल्म के खिलाफ आवाज बुलंद कर एक मजबूत प्रतिरोध खड़ा कर दिया था।इसकी कीमत इन्हें अपनी जान गंवा कर  चुकानी पड़ी। आज आप देख रहे हैं मौजूदा दौर में पत्रकारिता का क्या मतलब रह गया है? सक्ता संरक्षण में अपनी कलम गिरवी रख कर किस तरह की पत्रकारिता हो रही है? मुख्य धारा की मीडिया जिसे गोदी मीडिया के रूप में जाना जाने लगा है इस दौर में सक्ता से सवाल करना अपने आप में एक क्रांतिकारी कदम है जिसका खामियाजा भुगतना आम बात है। इस संदर्भ में राजेश जोशी की यह पंक्तियां काफी मौजूं लगती है ----
"जो इस पागलपन में शामिल नहीं होंगे
  मारे जाएंगे,
  कठघरे में खड़े कर दिए जाएंगे,जो विरोध में बोलेंगे,
  जो सच-सच बोलेंगे मारे जाएंगे,
  बर्दाश्त नहीं किया जाएगा कि किसी की कमीज हो,
 'उनकी ' कमीज़ से ज्यादा सफेद,
  कमीज़ पर जिनके दाग़ नहीं होंगे मारे जाएंगे "।
      इस महान शख्सियत का जन्म 29 जनवरी 1962 ईस्वी को बंगलौर में लिंगायत परिवार में हुआ था इनके पिताजी पी लंकेश एक बड़े पत्रकार,कवि और कन्नड़ के प्रसिद्ध लेखक थे। इनके तीन संतानें गौरी, कविता एवं इंद्रजीत थी।गौरी लंकेश ने पत्रकारिता की शुरुआत बेंगलुरु के टाइम्स ऑफ इंडिया से शुरू किया इनकी शादी चिदानंद राजघट्टा से हुई शादी के बाद दिल्ली में रहने लगीं।2000 ईस्वी में पिताजी की मृत्यु हो गई उस समय दिल्ली में इनाडु के तेलगु चैनल में कार्यरत थीं। 'संडे मैगजीन' में संवाददाता के रूप में भी काम किया।पिता की मृत्यु के बाद अपने भाई इंद्रजीत के साथ मिलकर 'लंकेश पत्रिका' को संपादित किया इसके साथ ही साथ 'गैरी लंकेश साप्ताहिक पत्रिका' का संपादन किया। विचारधारा को लेकर मतभेद हुए नक्सली गतिविधियों को बढ़ावा देने का आरोप लगा इस बीच भाई इंद्रजीत से मतभेद हुए और अपने विचारों से बिना समझौता किए लगातार दक्षिणपंथी संगठनों एवं आरएसएस के खिलाफ आवाज बुलंद करती रही। अपनी लेखनी से सरकार की नीतियों का विरोध करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी अंततः 5 सितंबर 2017 को राजराजेश्वरी नगर बंगलौर में अपने घर के आगे अज्ञात बंदूकधारियों ने गोली मारकर हत्या कर दी।
इनके पार्थिव शरीर को खत्म कर दिया गया लेकिन इनके विचारों को वैसी शक्तियां खत्म नहीं कर सकते हैं आज मुख्य धारा के समानांतर विभिन्न वैकल्पिक मीडिया सरकार की कारपोरेट नीतियों के खिलाफ बेखौफ होकर अपना काम कर रही है। इसके लिए हर कुर्बानी देने वाले लोग भी आगे बढ़कर इनकी नीतियों का विरोध कर रहे हैं। राजेश जोशी की यह पंक्तियां काफी मौजूं है
"धकेल दिए जाएंगे कला की दुनिया से बाहर,
  जो चारण नहीं,
   जो गुण नहीं गाएंगे,मारे जाएंगे।
  धर्म की ध्वजा उठाएं जो नहीं जाएंगे जुलूस में,
  गोलियां भून डालेगी उन्हें, काफ़िर करार दिए जाएंगे,
  सबसे बड़ा अपराध है इस समय
  निहत्थे और निरपराधी होना,
  जो अपराधी नहीं होंगे,
  मारे जाएंगे "।
इसके बावजूद उम्मीद है कि हम लड़ेंगे और जीतेंगे मजदूर वर्ग अपनी चेतना को विकसित कर आने वाले दिनों में निर्णायक भूमिका में होगा। यहां फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की पंक्तियां काफी हद तक मौजूं है ----
"यूं ही हमेशा उलझती रही है जुल्म से ख़ल्क़,
  न उनकी रस्म नई है,न अपनी रीत नई,
  यूं ही हमेशा खिलायें हैं हमने आग में फूल,
 न उनकी हार नई है,न अपनी जीत नई"।


Sunday, 1 January 2023

नए साल का संकल्प!!



1. नए साल की शुभ कामनाएं


खेतों की मेड़ों पर धूल भरे पाँव को

कुहरे में लिपटे उस छोटे से गाँव को

नए साल की शुभकामनाएं !


जाँते के गीतों को बैलों की चाल को

करघे को कोल्हू को मछुओं के जाल को

नए साल की शुभकामनाएँ !


इस पकती रोटी को बच्चों के शोर को

चौके की गुनगुन को चूल्हे की भोर को

नए साल की शुभकामनाएँ !


वीराने जंगल को तारों को रात को

ठंडी दो बंदूकों में घर की बात को

नए साल की शुभकामनाएँ !


कोट के गुलाब और जूड़े के फूल को

हर नन्ही याद को हर छोटी भूल को

नए साल की शुभकामनाएँ!


उनको जिनने चुन-चुनकर ग्रीटिंग कार्ड लिखे

उनको जो अपने गमले में चुपचाप दिखे

नए साल की शुभकामनाएँ!  

 

 सर्वेश्वर दयाल सक्सेना



2. तुझमें नयापन क्या है ?


ऐ नए साल बता, तुझमें नयापन क्या है

हर तरफ़ ख़ल्क़ ने क्यूँ शोर मचा रक्खा है


रौशनी दिन की वही, तारों भरी रात वही

आज हम को नज़र आती है हर इक बात वही


आसमाँ बदला है, अफ़सोस, ना बदली है ज़मीं

एक हिंदसे का बदलना कोई जिद्दत तो नहीं


अगले बरसों की तरह होंगे क़रीने तेरे

किस को मालूम नहीं बारह महीने तेरे


जनवरी, फ़रवरी और मार्च पड़ेगी सर्दी

और अप्रैल, मई, जून में होगी गर्मी


तेरा मन दहर में कुछ खोएगा, कुछ पाएगा

अपनी मीआद बसर कर के चला जाएगा


तू नया है तो दिखा सुबह नयी, शाम नयी

वरना इन आँखों ने देखे हैं नए साल कई


बे-सबब देते हैं क्यूँ लोग मुबारकबादें

ग़ालिबन भूल गए वक़्त की कड़वी यादें


तेरी आमद से घटी उम्र जहाँ में सब की

'फ़ैज़' ने लिक्खी है यह नज़्म निराले ढब की 


- फ़ैज़ लुधियानवी


ख़ल्क़ = मानवता, हिंदसे = संख्या, जिद्दत = नया-पन, अगले = पिछले/गुज़रे हुए, क़रीने = क्रम, दहर = दुनिया, मीआद = मियाद/अवधि, बे-सबब = बे-वजह, ग़ालिबन = शायद, आमद = आना, ढब = तरीक़ा


3. नया साल मुबारक


तारीख

पंचांग में फंसा अंक नहीं

न वक्त घड़ी की सूइयों का

ज़रखरीद गुलाम

इनके वजूद की खातिर

सूरज को जलना पड़ता है

चलना पड़ता है पृथ्वी को

अनंत अनजान पथपर

अनवरत

ऐसे में कोई साल

लेटे लेटे या बैठे बैठे

नया हो जाए

बड़ी ख़ूबसूरत ख़ुशफहमी है

जो खोए हैं

उन्हें ख़ुशफ़हमी मुबारक

जो तैयार हैं

ख़ुद को खोने

और जग को पाने के लिए

उनके साथ मिलकर

चलो बनाते हैं

मनाते नहीं

एक नया कोरा महकता 

इज़्ज़तदार साल

सिर उठाकर

मुट्ठियां तानकर

मुस्कुराते हुए

सिर्फ अपने लिए नहीं

पूरी कायनात के लिए

और निर्मल निश्छल निर्भय मन से

सबसे कहते हैं

यह नया साल मुबारक हो

हम सबको


      -हूबनाथ



4. नया वर्ष 

युवा दिलों के नाम 

ज़िन्दा कौमों के नाम

साहसिक यात्राओं के नाम,

सक्रिय ज्ञान के नाम,

सच्चे प्यार के नाम,

मानवता के भविष्य में 

उत्कट आस्था के नाम!

नया वर्ष

जो रचते हैं जीवन, 

जीवन की बुनियादी शर्तें

उन मेहनतकश

सर्जक हाथों के नाम!

सृजन की नयी

परियोजनाओं के नाम!


नया वर्ष 

सिर्फ़ सपने से होने वाली 

नयी शुरुआत के नाम,

पराजय की राख से 

जनमते संकल्पों के नाम,

अँधेरे समय में 

जीवित ह्रदय की कविता के नाम!

नया वर्ष

नयी यात्रा के लिए उठे 

पहले कदम के नाम,

बीजों और अंकुरों के नाम

कोंपलों और फुनगियों के नाम 

उड़ने को आतुर

शिशु पंखों के नाम,

नयी उड़ानों के नाम!


दिशा छात्र संगठन



5. ये साल भी यारों बीत गया


कुछ खू़न बहा कुछ घर उजड़े

कुछ कटरे जल कर ख़ाक हुए

एक मस्जिद की ईंटों के तले

हर मसला दब कर दफ्न हुआ

जो ख़ाक उड़ी वह ज़ेहनो पर

यूं छायी जैसे कुछ भी नहीं

अब कुछ भी नहीं है करने को

घर बैठो डर कर अबके बरस

या जान गवां दो सड़कों पर

घर बैठ के भी क्या हासिल है

न मीर रहा न ग़ालिब हैं

न प्रेम के ज़िंदा अफ़साने

बेदी भी नहीं मंटो भी नहीं

जो आज की वहशत लिख डाले

चिश्ती भी नहीं, नानक भी नहीं

जो प्यार की वर्षा हो जाए

मंसूर कहां जो ज़हर पिए

गलियों में बहती नफ़रत का

वो भी तो नहीं जो तकली से

अब प्यार के ताने बुन डाले

क्यूं दोष धरो हो पुरखों पर

खु़द मीर हो तुम ग़ालिब भी तुम्हीं

तुम प्रेम का जि़न्दा अफ़साना

बेदी भी तुम्हीं, मंटो भी तुम्हीं

तुम आज की वहशत लिख डालो

चिश्ती की सदा, नानक की नवा

मंसूर तुम्हीं तुम बुल्लेशाह

कह दो के अनलहक़ जि़न्दा है

कह दो के अनहद अब गरजेगा

इस नुक़्ते विच गल मुगदी है

इस नुक़्ते से फूटेगी किरण

और बात यहीं से निकलेगी….

               -गौहर रज़ा



6. सभी को नये वर्ष की शुभकामना


हमारे    वतन  की  नई  ज़िन्दगी  हो

नई जिन्दगी एक मुकम्मल खुशी हो।


न ही हथकड़ी कोई फ़सलों को डाले,

हमारे दिलों की न सौदागरी हो।


ज़ुबानों पे पाबन्दियाँ हों न कोई,

निगाहों में अपनी नई रोशनी हो।


न अश्कों से नम हो किसी का भी दामन,

न ही कोई भी क़ायदा हिटलरी हो।


नए फ़ैसले हों नई कोशिशें हों,

नई मंज़िलों की कशिश भी नई हो।


(गोरख पाण्डेय की कविता का कुछ अंश)


7. नव वर्ष 


"नव वर्ष,

हर्ष नव,

जीवन उत्कर्ष नव !


नव उमंग,

नव तरंग,

जीवन का नव प्रसंग !


नवल चाह,

नवल राह,

जीवन का नव प्रवाह !


गीत नवल,

प्रीत नवल,

जीवन की रीति नवल,

जीवन की नीति नवल,

जीवन की जीत नवल !!"


... हरिवंशराय बच्चन


8. ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं

है अपना ये त्यौहार नहीं

है अपनी ये तो रीत नहीं

है अपना ये व्यवहार नहीं


धरा ठिठुरती है सर्दी से

आकाश में कोहरा गहरा है

बाग़ बाज़ारों की सरहद पर

सर्द हवा का पहरा है


सूना है प्रकृति का आँगन

कुछ रंग नहीं , उमंग नहीं

हर कोई है घर में दुबका हुआ

नव वर्ष का ये कोई ढंग नहीं



चंद मास अभी इंतज़ार करो

निज मन में तनिक विचार करो

नये साल नया कुछ हो तो सही

क्यों नक़ल में सारी अक्ल बही


उल्लास मंद है जन -मन का

आयी है अभी बहार नहीं

ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं

है अपना ये त्यौहार नहीं


ये धुंध कुहासा छंटने दो

रातों का राज्य सिमटने दो

प्रकृति का रूप निखरने दो

फागुन का रंग बिखरने दो


प्रकृति दुल्हन का रूप धार

जब स्नेह – सुधा बरसायेगी

शस्य – श्यामला धरती माता


घर -घर खुशहाली लायेगी

तब चैत्र शुक्ल की प्रथम तिथि

नव वर्ष मनाया जायेगा

आर्यावर्त की पुण्य भूमि पर


जय गान सुनाया जायेगा

युक्ति – प्रमाण से स्वयंसिद्ध

नव वर्ष हमारा हो प्रसिद्ध

आर्यों की कीर्ति सदा -सदा


नव वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा

अनमोल विरासत के धनिकों को

चाहिये कोई उधार नहीं


ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं

है अपना ये त्यौहार नहीं

है अपनी ये तो रीत नहीं

है अपना ये त्यौहार नहीं


रामधारी सिंह "दिनकर"




Friday, 9 December 2022

Happy Health Day to all

*Happy Health Day to all*
🄷🄰🄿🄿🅈 🄸🄽🅃🄴🅁🄽🄰🅃🄸🄾🄽🄰🄻 
🄷🄴🄰🄻🅃🄷   🄳🄰🅈
Important things to keep in mind:
  1. BP: 120/80
  2. Pulse: 70 - 100
  3. Temperature: 36.8 - 37
  4. Breath: 12-16
  5. Hemoglobin: Male -13.50-18
Female - 11.50 - 16
  6. Cholesterol: 130 - 200
  7. Potassium: 3.50 - 5
  8. Sodium: 135 - 145
  9. Triglycerides: 220
  10. Amount of blood in the body: PCV 30-40%
  11. Sugar level: For children (70-130) adults: 70 - 115
  12. Iron: 8-15 mg
  13. White blood cells WBC: 4000 - 11000
  14. Platelets: 1,50,000 - 4,00,000
15. Red blood cells RBC: 4.50 - 6 million.
  16. Calcium: 8.6 -10.3 mg/dL
  17. Vitamin D3: 20 - 50 ng/ml.
18. Vitamin B12: 200 - 900 pg/ml.
*Special tips for seniors are 40/50/60 years:*
*1- The first suggestion:* drink water all the time even if you are not thirsty or needy, the biggest health problems and most of them are due to lack of water in the body.  At least 2 liters per day.
*2- Second instruction:* do as much work as possible from the body, there should be movement of the body, such as walking, swimming, or any kind of sport.
*3-3rd tip:* Eat less... Let go of the craving to eat too much... Because it never brings good.  Do not deprive yourself, but reduce the quantity.  Use more of protein, carbohydrate-rich foods.
  *4- Fourth instruction:* do not use the vehicle unless it is absolutely necessary.  If you're going anywhere to pick up groceries, meet someone, or do some work, try to walk on your feet.  Climb the stairs instead of using elevators, escalators.
  *5- 5th Instruction* Quit anger, stop worrying, try to ignore things.  Don't indulge yourself in troublesome situations, they spoil all health and take away the glory of the soul.  Talk to positive people and listen to them.
*6- Sixth Instruction* First of all, give up the attachment to money
Connect with the people around you, laugh and talk! Money is made for survival, not life for money.
*7-7th Note* Don't feel sorry for yourself, or about anything you couldn't achieve, or something you couldn't resort to.
  Ignore it and forget it.
*8- Eighth Notice* Money, position, prestige, power, beauty, caste and influence;
All these things increase the ego.  Humility brings people closer with love.
*9- Ninth Tip* If your hair is white, it does not mean the end of life.  This is the beginning of a good life.  Be optimistic, live with memory, travel, enjoy.  Create memories!
*10- 10th Instructions* Meet your little ones with love, empathy, and affection!  Don't say anything sarcastic!  Put a smile on your face!
No matter how big a position you have held in the past, forget it in the present and mingle with it all!

*Happy #आरोग्य Day*

Wednesday, 12 October 2022

बाल गंगाधर तिलक के स्त्रीद्वेषी विचार



"हमें प्रकृति और सामाजिक नीतियों के मुताबिक चलना चाहिए। पीढ़ियों से घर की चारदीवारी महिलाओं के काम का मुख्य केंद्र रहा है। उनके लिए अपना  बेहतर प्रदर्शन करने हेतु यह दायरा पर्याप्त है। एक हिंदू लड़की को निश्चित रूप से एक बेहतरीन बहू के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। हिंदू औरत की सामाजिक उपयोगिता उसकी  सिंपैथी और परंपरागत साहित्य को ग्रहण करने को लेकर है। लड़कियों को हाइजीन, डोमेस्टिक इकोनॉमी, चाइल्ड नर्सिंग, कुकिंग, सिलाई आदि की बेहतरीन जानकारी उपलब्ध कराई जानी चाहिए।"(बाल गंगाधर तिलक, 20 फरवरी 1916, मराठा अखबार)

यह पंक्तियां किसी अनाम व्यक्ति कि नहीं बल्कि भारत में लोकमान्य के रूप में स्वीकार किए जाने वाले बाल गंगाधर तिलक की है। स्त्रीद्वेषी विचारों के बाद भी चितपावन ब्राह्मण होने का लाभ हमेशा से तिलक को मिला है इसलिए वे भारत में लोकमान्य के रूप में स्वीकार किये जाते हैं।
हिंदुत्ववादी फायरब्रांड नेता कहे जाने वाले तिलक ने 1885 में लड़कियों के लिए पहला हाई स्कूल खोले जाने के रमाबाई के प्रयासों का घनघोर विरोध किया था। इस प्रयास में असफल होने पर उन्होंने लड़कियों के 11:00 बजे से 5:00 बजे तक घर के बाहर रहने का भी विरोध किया और उन्हें घर के कामकाज सिखाने के लिए तीव्र अभियान चलाया। इन्होंने लगातार अपने अखबारों के लेखों में लिखा की कोई भी अपनी लड़की को इतने समय तक घर से बाहर नहीं रहने दे ताकि वे स्कूल नहीं जा सके। उनका कहना था कि पढ़-लिखकर लड़कियां रमाबाई की तरह हो जाएंगी जो अपने पति का विरोध करके समाज और संस्कृति को खराब करेंगी। 
तिलक ने लड़कियों की शिक्षा का पाठ्यक्रम बदलकर उन्हें केवल पुराण, धर्म और घरेलू काम जैसे बच्चों की देखभाल, खाना बनाना आदि की शिक्षा प्राप्त करने तक ही सीमित रखने की वकालत की। उनका मानना था कि लड़कियों को शिक्षा देना करदाताओं के धन की बर्बादी है |
महिलाओं के संदर्भ में तिलक के विचार मनु के विचारों से किसी भी रुप में अलग न होकर उसका ही विस्तार और अभिव्यक्ति है। हिंदू धर्म में स्त्री शिक्षा एवं स्वतंत्रता के प्रश्न को सदैव ही नकारा गया है| 

दूसरी ओर शाहूजी महाराज, ज्योतिबा फुले ,सावित्रीबाई फुले, बाबासाहेब अंबेडकर जैसे महान बहुजन नायक स्त्री शिक्षा और उनके अधिकारों की शुरुआत के पक्षधर  थे।


Sunday, 9 October 2022

ए बिलियन कलर स्टोरी': क्या 'नए भारत' में हमने सारी कविताएं खो दी हैं...

'ए बिलियन कलर स्टोरी': क्या 'नए भारत' में हमने सारी कविताएं खो दी हैं...

पद्मकुमार नरसिंहमूर्ती की फ़िल्म 'ए बिलियन कलर स्टोरी' 
का प्रमुख पात्र 11 साल का हरी अजीज़ अपनी 'हिन्दू' मां पार्वती से कहता है कि उसे अपने पिता इमरान अजीज़ के लिए डर लगता है, क्योंकि उसके पिता 'मुस्लिम' हैं। पार्वती अपने बेटे से कहती है कि तुम तो जानते हो कि तुम्हारे पापा धर्म को नहीं मानते। इस पर बेटे का जवाब न सिर्फ मां को बल्कि दर्शकों को भी हैरान कर देता है। वह कहता है-'लेकिन ये बात उन्हें नहीं मालूम।' नंदिता दास की फ़िल्म 'मंटो' में भी ऐसा ही एक दृश्य है। मंटो के दोस्त श्याम के ये कहने पर कि तुम तो शराब पीते हो, नमाज़ नहीं पढ़ते, तुम कहां के मुसलमान हुए। इस पर मंटो का जवाब हिला कर रख देता है। मंटो कहते हैं- इतना मुसलमान तो हूँ ही कि दंगे में मारा जा सकूं।
हमने ये कैसा भारत बना डाला, जहाँ एक 11 साल का बेटा अपने बाप के दंगे में मारे जाने की संभावना से भयभीत है। फ़िल्म में बेटे हरी अजीज़ के इसी भय से यह सवाल पैदा हुआ कि क्या हमने अपनी सारी कविताएं खो दी हैं।
हरी अजीज़ के 'मुस्लिम' पिता और 'हिन्दू' मां एक आदर्श वादी दंपति हैं जो एक ऐसी फिल्म बना रहे हैं जिसमे टाइम मशीन से पीछे जाकर प्रेम के माध्यम से भारत-पाकिस्तान विभाजन को रोक दिया गया है। इसमें यह संकेत साफ है कि आज की बहुत सी समस्याओं की जड़ विभाजन में ही हैं। आज के नफ़रत भरे माहौल में ऐसी फिल्म बनाने के रास्ते में आने वाली दुश्वारियां और उनके खुद के जीवन मे इस 'नए असहिष्णु भारत' के कारण आने वाली मुसीबतों को एक 11 साल के बच्चे की नज़र से देखने का प्रयास किया गया है।
फ़िल्म का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा यानी बच्चे हरी अज़ीज़ की हत्या तक फ़िल्म 'ब्लैक एंड व्हाइट' रहती है। चूंकि यहाँ तक फ़िल्म बच्चे की नज़र से है और बच्चे रंगों में अर्थ नही तलाशते। रंगों से (और कपड़ो से) किसी को नही पहचानते। शायद इसीलिए यहां तक फ़िल्म 'ब्लैक एंड व्हाइट' है। और उसके बाद रंगीन हो जाती है। इसकी दूसरी व्याख्या यह भी हो सकती है कि हरी अज़ीज़ की हत्या के कुछ पहले ही हरी अजीज़ के पिता इमरान अजीज़ का आदर्शवाद लगातार हो रही घटनाओं से चकनाचूर हो जाता है। वे फ़िल्म बनाने का प्लान कैंसिल करके 'नार्मल'
जीवन में जाने की योजना बना लेते हैं। 
लेकिन हरी अजीज़ ने मानो अपनी जान देकर अपने पिता के आदर्शवाद को फिर से जगा दिया। इसी आशा को दर्शाने के लिए अंत मे कलर का इस्तेमाल किया गया।
बहुत पहले एक फ्रेंच उपन्यास पढ़ा था- तेराज रॉक। उसका दर्शन ही यह था कि यदि हम नफरत के आधार पर बंटवारा करते हैं तो यह वहीं नहीं रुकता। यह परमाणु चेन रिएक्शन की तरह लगातार अन्य विभाजनों को भी जन्म देता है। फ़िल्म का एक पात्र इसे यूं बयां करता है- 'यहाँ सिर्फ हिन्दू-मुस्लिम की लड़ाई नहीं है, बाकी हर व्यक्ति की हर व्यक्ति से लड़ाई है। गुजराती की मराठी से, मराठी की उत्तर भारत से, शादीशुदा की लिव-इन वालों से आदि आदि। 
'ए बिलियन कलर स्टोरी' फ़िल्म का संदेश साफ है - क्या प्रकृति में मौजूद अनगिनत रंगों को महज चंद धार्मिक रंगों में रिड्यूस किया जा सकता है? बाकी रंगों के लिए क्या इस 'नए भारत' मे कोई जगह होगी? क्या इस 'नए भारत' की बगिया में अब एक ही रंग के फूल होंगे। क्या इस 'नए भारत' में कविताओं के लिए कोई जगह होगी? क्या इस 'नए भारत' मे हरी अजीज़ के पिता इमरान अजीज़ के आदर्शवाद के लिए कोई जगह होगी? क्या इस 'नए भारत' में इंसान के लिए कोई जगह होगी? क्या इस 'नए भारत' में हरी अजीज़ और उसके सपनों के लिए कोई जगह होगी? उसके मासूम सवालों के लिए कोई जगह होगी?
वास्तव में ये सारे सवाल 'नए भारत' के भ्रूण में पल रहे उस बच्चे के सवाल हैं जो गर्भ से बाहर तभी आएगा जब उसे इन सवालों का संतोषजनक जवाब मिलेगा। बच्चे की किलकारी का  आनंद लेना है तो हमें इन सवालों के जवाब जल्द से जल्द तलाशने होंगे।
यह फ़िल्म फिलहाल 'हॉटस्टार' पर मौजूद है।
#मनीष आज़ाद

१९५३ में स्टालिन की शव यात्रा पर उमड़ा सैलाब 

*On this day in 1953, a sea of humanity thronged the streets for Stalin's funeral procession.* Joseph Stalin, the Soviet Union's fea...