Tuesday, 21 February 2023

जाति की आत्मकथा (63) : चमार (चौथा भाग) तीसरी कड़ी के आगे



समय एक-सा नहीं रहता। दुनिया में सब परिवर्तनशील है। मेरा समाज भी बदला है। लेकिन यह तो मैं कह ही सकता हूं कि मेरा यह समाज वह समाज है जिसने प्रतिरोध किया है। फिर चाहे हालात कैसे भी रहे। वैसे तो समग्र रूप से देखा जाय तो मेरी जाति के लिए चमार शब्द का ही उपयोग करते हैं। कहीं-कहीं कुछ और शब्द भी उपयोग में लाए जाने लगे हैं। जैसे कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश और दिल्ली में जाटव तो आंध्र प्रदेश में मडिगा। 

मेरे बारे में कुछ अलग मान्यताएं भी हैं। मसलन, अंग्रेज इतिहासकार कर्नल टाड का मत रहा कि चमार समुदाय के लोग वास्तविक रुप से अफ्रीकी मूल के रहे। लेकिन यह बहुत अधिक तर्कसंगत नहीं है। हालांकि इससे इंकार नहीं कि मेरे पूर्वजों की पृष्ठभूमि जनजातीय रही। लेकिन मेरे पूर्वजों का संबंध किसी और मुल्क से नहीं रहा है। इस तरह का दावा भी कई नृवंशशास्त्रियों ने किया है। उनका भी मत रहा है आदिकाल से ही इस समुदाय के लोगों का भारतीय समाज में अस्तित्व रहा है।

वहीं कई कोशिशें की गयी हैं कि मेरे लोगों को हिंदू धर्म से जोड़ा जाय। इसके लिए अनेकानेक कहानियां भी गढ़ी गईं। डॉ. विजय सोनकर ने अपनी किताब 'हिंदू चर्मकार जाति: एक स्वर्णिम गौरवशाली राजवंशीय का इतिहास' में लिखा है कि चमार वास्तव में चंवर वंश के क्षत्रिय हैं। अपनी पुस्तक में उन्होंने ब्रिटिश इतिहासकार जेम्स टॉड के हवाले से राजस्थान के इतिहास में चंवर वंश के बारे में विस्तार में लिखा है। सोनकर चमार जाति के लोगों को मौलिक रूप से क्षत्रिय मानते हैं और कहते हैं कि विदेशी आक्रांताओं के आने से पहले चमार जाति के लोग भारत में मुस्लिम, सिख या फिर दलित नहीं थे। उनका (कु)तर्क है कि आंतरिक लड़ाई के कारण चमार जाति के लोग क्षत्रिय समुदाय से अलग होते चले गए।

हालांकि केवल डॉ. विजय सोनकर ने ही नहीं, वर्तमान के कई साहित्यकारों और विचारकों ने भी यह कहा है कि वे क्षत्रिय वंश के रहे। लेकिन यह सब केवल कहने की बात है। यदि क्षत्रिय वंश से जुड़ाव होता तो मेरे पूर्वज मरे हुए जानवरों की खाल क्यों छीलते और उससे चमड़ा क्यों बनाते?

खैर यदि बसावट की बात करूं तो मेरे लोग भारत के अलावा पाकिस्तान और नेपाल में रहते हैं। 2001 के जनगणना के अनुसार, उत्तर प्रदेश में चमारों की जनसंख्या लगभग 14 प्रतिशत है और पंजाब में 12 प्रतिशत। इसी तरह राजस्थान में 11 प्रतिशत, हरियाणा में 10 प्रतिशत, मध्य प्रदेश 9.5 प्रतिशत, छत्तीसगढ़ 8 प्रतिशत, हिमाचल प्रदेश में 7 प्रतिशत, दिल्ली में 6.5 प्रतिशत, बिहार में 5 प्रतिशत और उत्तरांचल में 5 प्रतिशत। इसके अलावा जम्मू कश्मीर, झारखंड, पश्चिम बंगाल, गुजरात आदि में भी मेरे लोगों की आबादी ठीक-ठाक ही है।

राजनीति के हिसाब से बात करूं तो आज कोई भी राजनीतिक दल मेरी उपेक्षा करने की स्थिति में नहीं है। वह जमाना चला गया जब मेरे लोग भयवश किसी भी दल को सपोर्ट कर देते थे। आज उनके पास उनकी वैचारिकी है। यह वैचारिकी उन्हें डॉ. आंबेडकर की विचारधारा से प्राप्त हुई है, जिन्होंने अछूतों के लिए वृहत आंदोलन चलाया। हालांकि डॉ. आंबेडकर स्वयं महार जाति के थे। इस महार जाति की पृष्ठभूमि भी करीब-करीब मेरे जैसी ही रही है। केवल नाम का अंतर है। 

वैचारिकी की बात से एक बात याद आयी। मध्य काल में हुए रैदास के नाम का उल्लेख करना आवश्यक है। संत परंपरा के इस महापुरुष ने ब्राह्मणवाद को पहली बार बौद्धिक चुनौती दी थी। उन्होंने जाति व्यवस्था के ऊपर करारा प्रहार किये। यह इस बात का द्योतक था कि भले ही ब्राह्मणों ने मेरे लोगों को उपेक्षित और गुलाम बनाकर रखा, लेकिन मेरे लोगों ने अपने सामाजिक चरित्र संबंधी विशेषताओं के कारण ब्रा्ह्मणों के वर्चस्व को चुनौती दी।
 
भला कौन भूल सकता है 1 जनवरी, 1818 की वह ऐतिहासिक तारीख जब पांच सौ महार सैनिकों ने पेशवाओं की बड़ी फौज को परास्त कर दिया था। वही पेेशवा, जिनके राज में महारों और अन्य अछूतों को नारकीय जीवन जीना पड़ता था। यह उनके अंदर का आक्रोश और उत्कृष्ट युद्ध कौशल ही था कि महारों ने महाराष्ट्र से पेशवाओं का राज हमेशा-हमेशा के लिए खत्म कर दिया।

अंग्रेजों ने मेरे लोगों को अछूत नहीं माना। यही कारण रहा कि उन्होंने महार रेजिमेंट का गठन किया। इस रेजिमेंट का गठन 1 मार्च 1943 को दूसरे विश्व युद्ध के दौरान की गई थी। इस रेजिमेंट को कोहिमा की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए सम्मानित किया गया था। आपको बतात चलूं कि अंग्रेजों ने इस रेजिमेंट का गठन उस समय सबसे शक्तिशाली माने जाने वाली जापानी सेना से मुकाबला लेने के लिए किया था।

लेकिन ये सब वे बातें हैं, जिनके कारण हम केवल अपनी मुंछों पर ताव दे सकते हैं। मेरी जाति भी संक्रमण के दौर से गुजरी है। लोगों में कई तरह के बदलाव आए हैं। 

क्रमश: जारी

- नवल किशोर कुमार



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