Saturday, 12 December 2020

कृषि कानून

कृषि कानूनों पर सरकार रोल बैक क्यों नहीं करना चाहती??
तथ्यों व आँकड़ों की मदद से इसकी जड़ तक जाना जरूरी है।

भारत में दो कंपनियां है रिलायंस व अडानी ग्रुप।वैसे तो ये ग्रुप कोयला, तेल, गैस,सोलर प्लांट,बंदरगाह निर्माण,एयरपोर्ट निर्माण आदि बहुत सारे क्षेत्रों में कार्यरत है लेकिन अभी विरोध कृषि कानूनों को लेकर कृषि व उनके उत्पादों के व्यापार पर है इसलिए सिर्फ यहीं का विश्लेषण किया जाना चाहिए।

फाइनेंसियल एक्सप्रेस 2008 की रिपोर्ट के हिसाब से 2005 में अडानी एग्री लोजिस्टिक लिमिटिड (AALL) व एफसीआई के बीच वेयरहाउस निर्माण को लेकर एक करार हुआ जिसके तहत 2007 में पंजाब के मोगा व हरियाणा के कैथल में अडानी ग्रूप द्वारा मॉडर्न साइलो स्टोरेज का निर्माण पूर्ण हो गया।

अडानी ग्रुप ने 5.75 लाख मेट्रिक टन स्टोरेज के वेयरहाउस पंजाब, हरियाणा, तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र
पश्चिमी बंगाल में बनाये व 3 लाख मेट्रिक टन की स्टोरेज क्षमता के साइलो मध्यप्रदेश में बनाये।

मीडिया विजिल की रिपोर्ट के अनुसार AALL ने 2017 में पीपीपी मॉडल के तहत 100 लाख टन स्टोरेज क्षमता के साइलो बनाने की योजना तैयार की लेकिन जमीन अधिग्रहण आदि की दिक्कतों के कारण 31 मई 2019 तक मात्र 6.75 लाख टन की क्षमता के साइलो ही बना सकी।धीमी गति का एक दूसरा कारण यह भी रहा है कि जो स्टोरेज क्षमता विकसित की गई वो भी पूर्ण रूप से भरी नहीं जा सकी।हरियाणा के कैथल में 2.25 लाख टन क्षमता के साइलो बने मगर स्टोरेज के लिए 1.60 लाख टन ही गेहूं उपलब्ध हो सका।

अब तक अडानी ग्रुप विभिन्न राज्यों में 13 से ज्यादा वेयरहाउस/साइलो बना चुका है। 21 फरवरी 2018 को दैनिक जागरण में छपी खबर के मुताबिक अडानी ग्रूप के चेयरमैन गौतम अडानी ने यूपी इन्वेस्टर समिट में उत्तरप्रदेश में 6 लाख टन क्षमता के साइलो निर्माण की घोषणा की थी।1 मार्च 2018 को राजस्थान पत्रिका में छपी खबर के मुताबिक अडानी ग्रुप एग्री लोजिस्टिक पार्क बनाने हेतु यूपी सरकार के साथ किये एमओयू के तहत यमुना प्राधिकरण क्षेत्र की 1400 एकड़  जमीन पर 2500 करोड़ रुपये से फ़ूड पार्क व वेयरहाउस/साइलो बनाने जा रहा है।

अडानी ग्रुप ने एफसीआई के साथ जो शुरुआती करार किये उसके अनुसार एफसीआई द्वारा खरीदे धान को इन साइलों में रखेगा व उसका किराया एफसीआई AALL को देगा और यह गारंटी अगले 30 सालों के लिए दी गई थी।एमएसपी पर खरीद सरकार लगातार घटाती जा रही है ऐसे में सरकार के लिये इन वेयरहाउसों का औचित्य ही ख़त्म होता जा रहा था।

पहले क़ानून के तहत अडानी ग्रुप के इस व्यापार को दिशा देने के लिए मंडियों से बाहर खरीद को कानूनी मान्यता देने के लिये सरकारी मंडी तन्त्र को ख़त्म किया जा रहा है व जमाख़ोरों को टैक्स फ्री ख़रीद की सौग़ात दी जा रही है ।

दूसरे क़ानून के तहत आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन कर असीमित जमाख़ोरी करने को क़ानूनी जामा पहनाया जा रहा है ताकि कितना ही स्टोरेज करें वो कानूनी पाबंदी से परे हो जाएं।

अब आते है दूसरी कंपनी रिलायंस ग्रुप पर।2006 में रिलायंस ग्रुप ने रिलायंस फ्रेश व स्मार्ट स्टोर खोलने शुरू किए व अब तक 621 स्टोर विभिन्न शहरों में खोले जा चुके है।इन स्टोर द्वारा 200 मेट्रिक टन फल व 300 मेट्रिक टन सब्जियां रोज बेची जाती है।

2011 में रिलायंस मार्किट नाम से स्टोर खोलने शुरू किए और अब तक विभिन्न शहरों में 52 स्टोर खोले जा चुके है जहां सब्जी,फल,किराना से लेकर घरेलू जरूरतों का हर सामान उपलब्ध है।इसी तरह रिटेल मार्किट पर एक छत्र राज कायम करने के लिए जिओमार्ट,रिलाइंस ट्रेंड आदि कंपनियों के 682 से ज्यादा स्टोर खोले गए।

इसके बाद किशोर बियानी की कर्ज में फंसी फ्यूचर ग्रुप की रिटेल चैन अर्थात बिग बाजार के 420 से ज्यादा शहरों में चल रहे 1800 से ज्यादा स्टोर का अधिग्रहण रिलायंस ग्रुप ने कर लिया।

अब देश मे रिटेल मार्किट का किंग रिलायंस ग्रुप है।फ़ूड चैन का सबसे बड़ा नेटवर्क रिलायंस ग्रुप के पास है। तीसरे क़ानून (कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग) के द्वारा छोटे बिचौलियों को खत्म करके मुनाफे पर एकमात्र कब्जा रिलायंस ग्रुप को दिया जायेगा।अभी तक फल/सब्जियां मंडियों से ठेले पर आकर बिकती रही है मगर मंडिया खत्म होते ही ठेले/रेहड़ी/दुकानों वाले खत्म जो जाएंगे।फिर रिलायंस फ्रेश की मनमानी शुरू होगी!

कुल मिलाकर देखा जाएं तो इन कानूनों में न किसानों के बारे में सोचा गया है और न करोड़ों छोटे-छोटे दुकानदारों, व्यापारियों व रेहड़ी/ठेले वालों के बारे में।न शहरी मध्यम वर्ग के हित को देखा गया और न सार्वजनिक वितरण प्रणाली के द्वारा खाद्य सुरक्षा कानून के तहत राशन पाने वाले गरीबों का हित देखा गया है।

जब एफसीआई खरीदेगा ही नहीं तो फिर गरीबों को राशन अम्बानी/अडानी तो खरीदकर बांटेंगे नहीं!सरकार अडानी/अम्बानी से खरीदकर बांटने जा रही है तो एफसीआई के माध्यम से सीधे किसानों से खरीदने में क्या दिक्कत है?तय है गरीबों के खाते में डायरेक्ट कैश डालने की बात होगी।मान लो गेहूं की बेस प्राइज के हिसाब से 10 किलो गेहूं प्राप्त करने वाले गरीब के खाते में 20×10=200 रुपये डाल देगी।200 रुपये लेकर गरीब रिलायंस मार्ट में जाकर गेहूँ खरीदेगा जो कि अभी 46रु/किलो बिक रहा है,के हिसाब से 4.3 किलो गेहूँ खरीद पायेगा।मतलब साफ है कि खाद्य सुरक्षा कानून के तहत राशन प्राप्त करने वाले गरीबों के जीवन पर गंभीर खतरा पैदा होगा!

सरकार अपने मित्रों की व्यापारिक प्रणाली को दिशा देने के लिए नीतियां बना रही है उसी हिसाब से ये 3 कानून लाये गए है! अब ये कानून वापिस ले तो मित्रों का भारी-भरकम निवेश डूब जाएगा।ऐसा करना सरकार के लिए पीड़ादायी है।

सरकारी मित्रों को बिजली पर कब्जा देने के लिए भी अध्यादेश पास किया जा चुका है।
किसान लड़ने लायक भी नहीं रह सके उसके लिए पराली जलाने पर भारी जुर्माने का अध्यादेश भी जारी कर दिया है।दिल्ली में प्रदूषण को लेकर पिछले 3 सालों से किसानों को यूँ ही गालियां नहीं दी जा रही थी! पराली का योगदान मात्र 8% है जबकि बाकी 92% प्रदूषण को कम करने की चर्चा कहीं नहीं होती।

अगर किसान इस आंदोलन से खाली हाथ लौटा तो शहरी मध्यम वर्ग व देश के गरीबों की हालत किसानों से पहले दयनीय अवस्था मे होगी।अगर किसान इन कानूनों को वापिस करवाने या एमएसपी की लिखित गारंटी लेने में कामयाब हुआ तो मित्रों के व्यापार को गहरा झटका लगेगा।

प्रेमाराम सियाग
#किसानआंदोलन
#FarmersProtest
#कृषि


Tuesday, 8 December 2020

थोक और खुदरा व्यापार का पूर्ण राष्ट्रीयकरण


खाद्य पदार्थों सहित सभी आवश्यक वस्तुओं के व्यापार से मंडी व्यवस्था को समाप्त व सभी किस्म के पूँजीपतियों और बिचौलियों (कॉर्पोरेट, आढतिये या गाँव के कुलक) को बाहर कर इसके थोक और खुदरा व्यापार का पूर्ण राष्ट्रीयकरण करो।
सभी आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से सुनिश्चित करो।
ये माँग किस किस को गरीब किसान मजदूर विरोधी और पूँजीपति वर्ग की दलाली लगती है? मेहनतकश जनता के लिए यह माँग हानिकारक कैसे है?

https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=4204298982929884&id=100000494704468 


Mukesh Aseem कुलको की मांग का समर्थन मैं नही कर रहा हूँ। आपको गलतफहमी है। हाँ, भाजपा सरकार के तीन कृषि बिल का विरोध  का समर्थन करता हूँ। और किसानों पर उनके द्वारा विरोध प्रदर्शन पर उनके ऊपर पुलिस दमन की निंदा करता हूँ। आपने जो आगे बढ़ने का प्रस्ताव दिया है, उसमे कुलको का हित भी आगे हो रहा है, जबकि आप ऐसा नही चाहते होंगे। मैं सिर्फ इतना ही कहा है।
 सीमांत और गरीब किसानो को किन मुद्दे पर मजदूर आंदोलन से जोड़ा जाए,  एक गम्भीर प्रश्न है जिस पर मैं बहुत स्पष्ट नही हुं। क्या खेतिहर मजदूर यूनियन और गरीब एवम सीमांत किसानों का एक ही यूनियन बनना चाहिये या अलग अलग। इन सवालो पर क्रांतिकारी साथियो को हो सके तो प्रकाश डालने चाहिये। 

Saturday, 5 December 2020

लेनिन (‘मज़दूर पार्टी और किसान’)

पूँजीवाद के अन्तर्गत छोटा मालिक किसान, वह चाहे या न चाहे, इससे अवगत हो या न हो, एक माल-उत्पादक बन जाता है और यही वह परिवर्तन है जो मूलभूत है, क्योंकि केवल यही उसे, बावजूद इसके कि वह भाड़े के श्रम का शोषण नहीं करता, एक निम्न-पूँजीपति बना देता है और उसे सर्वहारा के एक विरोधी के रूप में बदल देता है। वह अपना उत्पादन बेचता है, जबकि सर्वहारा अपनी श्रम-शक्ति। एक वर्ग के रूप में छोटा मालिक किसान केवल कृषि उत्पादों के मूल्य में वृद्धि ही चाह सकता है और यह बड़े भूस्वामियों के साथ लगान में उसकी हिस्सेदारी और शेष समाज के विरुद्ध भूस्वामियों के साथ उसकी पक्षधरता के समान है। माल-उत्पादन के विकास के साथ ही छोटा मालिक किसान अपनी वर्ग-स्थिति के अनुरूप एक निम्न-भूसम्पत्तिवान मालिक बन जाता है।"
लेनिन
('कृषि में पूँजीवाद के विकास के आँकड़े')
पार्टी के भूमि कार्यक्रम में संशोधन')

"कोई पूछ सकता है: इसका हल क्या है, किसानों की स्थिति कैसे सुधारी जा सकती है? छोटे किसान ख़ुद को मज़दूर वर्ग के आन्दोलन से जोड़कर और समाजवादी व्यवस्था के लिए संघर्ष में एवं ज़मीन तथा उत्पादन के अन्य साधनों (कारख़ानें, मशीनें आदि) को सामाजिक सम्पत्ति के रूप में बदल देने में मज़दूरों की मदद करके ही अपने आप को पूँजी की जकड़ से मुक्त कर सकते हैं। छोटे पैमाने की खेती और छोटी जोतों को पूँजीवाद के चतुर्दिक हमले से बचाकर किसान समुदाय को बचाने का प्रयास सामाजिक विकास की गति को अनुपयोगी रूप से धीमा करना होगा, इसका मतलब पूँजीवाद के अन्तर्गत भी ख़ुशहाली की सम्भावना की भ्रान्ति से किसानों को धोखा देना होगा, इसका मतलब मेहनतकश वर्गों में फ़ूट पैदा करना और बहुमत की क़ीमत पर अल्पमत के लिए एक विशेष सुविधाप्राप्त स्थिति पैदा करना होगा।"

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

आरती लिये तू किसे ढूंढता है मूरख,
मन्दिरों, राजप्रासादों में, तहखानों में?
देवता कहीं सड़कों पर गिट्टी तोड़ रहे,
देवता मिलेंगे खेतों में, खलिहानों में।

फावड़े और हल राजदण्ड बनने को हैं,
धूसरता सोने से श्रृंगार सजाती है
दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।                       *(रामधारी सिंह दिनकर)*

Thursday, 3 December 2020

फैज अहमद फैज

"दरबारे वतन में जब इक दिन सब जाने वाले जायेंगे,
कुछ अपनी सजा को पहुंचेंगे, कुछ अपनी जजा ले जायेंगे।

ऐ खाकनशीनों उठ बैठो,वो वक़्त करीब आ पहुंचा है,
जब तख़्त गिराए जायेंगे,जब ताज उछाले जायेंगे।

अब टूट गिरेंगी जंजीरें,अब ज़िन्दानों की ख़ैर नहीं,
जो दरया झूम के उट्ठे हैं, तिनकों से न टाले जायेंगे।

कटते भी चलो,बढ़ते भी चलो बाजू भी बहुत हैं सर भीबहुत,
चलते भी चलो के अब डेरे मंजिल पे ही डाले जायेंगे।

ऐ ज़ुल्म के मातों लब खोलो, चुप रहने वालों चुप कब तक,
कुछ हश्र तो इनसे उट्ठेगा, कुछ दूर तो नाले जायेंगे।"

-फैज अहमद फैज।

(30-11-2020)

Wednesday, 2 December 2020

काले धन की नयी खेप!- नरेंद्र



 धन कभी सफेद नहीं होता है
धन श्रम शक्ति के लाल रक्त और 
रंगहीन पसीने से पैदा किया गया
 साधनों का अंबार है 
जो  बैंक और तिजोरी में पहुंचकर
 पूंजी बन जाता है, 
 पूंजीपतियों के हाथ में जाकर 
मशीन और कारखाना बन जाता है,
 वह फिर से श्रम शक्ति के 
लाल रक्त और रंगहीन पसीने को
 गतिशील करता है.

धन वह है जिसे
मजदूरों  की धमनियों में बहती
धारा की यह रफ्तार
एसेम्बली लाइन और रोबोट के सहारे
रोज रोज प्रति पल
नए साधनों को पैदा कर 
माल के रूप में
बाजार भेजता है.

दावानल की तरह फूंफकारता 
यह बाजार तुम्हारा है
बाजार का माल तुम्हारा है
दैत्याकार कारखाने तुम्हारे हैं
मशीन  तुम्हारे हैं
बैंक तुम्हारे हैं
तिजोरी तुम्हारी है
इन सबों में कैद 
सब माल तुम्हारा है.

कैदी हम भी हैं
बाजार से लेकर बैंक तक में
कारखाने से लेकर
अनाज की मंडियों तक में
हम पंक्तियों में खड़ा हैं
अपना माल बेचने के लिए
माल को धन कहो या
श्रम शक्ति
उसका रंग तो लाल है
या वह रंगहीन है
फिर  तुम्हीं कहो 
उसे काला कौन बनाता है?

Tuesday, 1 December 2020

किसानी के सवाल पर...

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  "हर हालत में और जनवादी भू व्यवस्था सुधार की हर परिस्थिति में देहाती सर्वहारा के स्वतंत्र वर्ग संगठन के लिए अडिग रूप से कोशिश करना, उसे समझाना कि उसके और किसान बुर्जुआ वर्ग (धनी-पूँजीवादी किसान) के हितों में अनम्य रूप से विरोध है, उसे चेतावनी देना कि छोटी खेती-बारी की व्यवस्था में उसकी आस्था भ्रममूलक है क्योंकि वह माल-उत्पादन के चलते जनसमूहों की गरीबी कभी दूर नहीं कर सकती और अंततः उसे सारी गरीबी और समस्त शोषण के उन्मूलन के एकमात्र रास्ते के रूप में पूर्ण समाजवादी क्रांति की आवश्यकता बताना पार्टी अपना कार्यभार निर्धारित करती है।"
(1906 में रूसी सामाजिक जनवादी मज़दूर पार्टी की स्टॉकहोम कांग्रेस में बोल्शेविकों द्वारा पार्टी के कार्यक्रम में मंज़ूर करवाया गया बिंदु। नरोदवादियों की जानकारी के लिए- इस समय रूस में 80 फीसदी से ज़्यादा लोग कृषि पर निर्भर थे।)

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  टटपुँजिया लफ़्फ़ाज़ी और नीति का जिसका समाजवादी क्रांतिकारियों के बीच, खास तौर पर "उपयोग" या "श्रम" प्रतिमानों के बारे में, "जमीन के समाजीकरण", आदि के बारे में खोखली बातों का बोलबाला है, मुकाबला करने के लिए सर्वहारा वर्ग की पार्टी को यह स्पष्ट करना होगा कि माल-उत्पादन के तहत छोटी खेती बारी प्रणाली मानव जाति को जनसाधारण की गरीबी और उनके उत्पीड़न से नहीं बचा सकती।
 किसान प्रतिनिधि सोवियतों को तत्काल और अनिवार्यतः विभक्त किए बिना सर्वहारा वर्ग की पार्टी को खेत मजदूरों के प्रतिनिधियों की पृथक सोवियतें और गरीब (अर्धसर्वहारा) किसानों के प्रतिनिधियों की पृथक सोवियतें संगठित करने या कम से कम, किसान प्रतिनिधियों की आम सोवियतों के अंदर पृथक धडों या पार्टियों के रूप में इस वर्गीय स्थिति वाले प्रतिनिधियों की नियमित रूप से पृथक बैठकें करने की आवश्यकता समझानी होगी। अन्यथा सामान्यतया किसानों के बारे में नरोदवादियों के सारे मीठे टटपुँजिया फ़िक़रे खुशहाल किसानों द्वारा, जो केवल पूंजीपतियों की एक किस्म है, सम्पत्तिहीन जनसाधारण के साथ धोखाधड़ी पर पर्दा डालने का काम करेंगे।
(हमारी क्रान्ति में सर्वहारा वर्ग के कार्यभार-लेनिन,10 अप्रैल,1917)

१९५३ में स्टालिन की शव यात्रा पर उमड़ा सैलाब 

*On this day in 1953, a sea of humanity thronged the streets for Stalin's funeral procession.* Joseph Stalin, the Soviet Union's fea...