Monday, 28 February 2022

चमत्कार

👉हजार साल पहले महमूद गजनवी ने दो बातें सिद्ध की - 

1.पहली बात यह कि इस देश के मंदिरों में भगवान नहीं, बेईमान बैठे हैं !
                     और दूसरी
2.इस देश के बड़े-बड़े दुर्गों में राजा नहीं, कायर रहते हैं!

        पर आज भी हम इन बेईमानों में चमत्कार ढूंढ रहे हैं, ये हमारी आस्था नहीं, हमारा अज्ञान है!       

1025 में महमूद गजनवी ने देवसोमनाथ को लूटा,तब इस देश में यही सब हो रहा था, जो 2019 हो रहा है!एक हजार साल बीत गये, पर हम नहीं सुधरे!
आज भी यज्ञ और हवन हो रहे हैं, मन्त्र जाप हो रहे हैं, तंत्र-साधना चल रही है !

बताते हैं कि "महमूद" जब गजनी से चला तो गुप्तचरों ने गुजरात के राजा को बताया कि महमूद "देवसोमनाथ" को लूटने आ रहा है,तो गुजरात के राजा ने अपने राजपुरोहित और सोमनाथ के पुजारियों से सलाह की कि देवसोमनाथ को कैसे बचाया जाय ? तो पंडितों ने कहा - पूरे राज्य से घी, दूध और धन इकट्ठा करो, हम यज्ञ, हवन और मृत्युंजय जाप करेंगे!गजनवी यहाँ तक नहीं पहुंचेगा और रास्ते में ही अँधा हो जायेगा!पूरे राज्य में ऐसा किया गया।

       पर गजनवी अंधा नहीं हुआ और निकट आ गया! गुजरात की सरहदों में आ गया तो गुजरात का कायर राजा लड़ने की बजाय रात में गुजरात छोड़कर भाग गया,और जब गजनवी देवसोमनाथ पहुंचा तो चंद पण्डे, पुजारियों को देखकर हैरान हो गया कि गजनी से सोमनाथ तक मेरे से कोई लड़ने तक नहीं आया और मैं बिना किसी अवरोध के मन्दिर तक पहुँच गया।

पुजारियों को देखकर उसने पूछा कि ये क्या कर रहे हैं तो लोगों ने बताया कि ये हवन, यज्ञ और मारण मन्त्र चल रहे हैं, ये आपको अन्धा करने की विधियाँ चल रही हैं, वही विधियाँ आज भी चल रही हैं, वो हवन, यज्ञ आज भी उसी रूप में जारी हैं।

सोमनाथ मन्दिर में अथाह धन देखकर गजनवी अचम्भित हो गया कि इतना धन कैसे इकट्ठा हुआ तो लोगों ने बताया कि मूर्ति का चमत्कार है जो हवा में लटकी है।

इस चमत्कार को जानने के लिये गजनवी ने मन्दिर का गुम्बद तुड़वाया तो चारों तरफ चुम्बक निकला और चमत्कारी मूर्ति जमीन पर आ गिरी।

बस यही एक चमत्कार है, जो हजार साल पहले से इस देश में काम कर रहा है बाकी बेईमानी के अलावा इस देश में दूसरा कोई भौतिक चमत्कार नहीं है।
।।जय विज्ञान।।

Friday, 25 February 2022

युद्ध कविता

यूक्रेन में फंसे छात्र

ये जो लोग उक्रेन से छात्रों को सुरक्षित लाने के लिए इतने चिंतित हैं, इन्होंने ये भी सोचना चाहिए कि इन छात्रों को उक्रेन चीन रूस जार्जिया न जाने कहां कहां जाना क्यों पडता है? इस देश में ऐसी सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था क्यों नहीं है जो सभी छात्रों को यहीं शिक्षा हासिल हो सके? यहां शिक्षा इतनी महंगी क्यों है कि सिर्फ अमीरों के लिए आरक्षित हो गई है? जिन्हें यहां मौका नहीं मिलता वो इन देशों में जाकर खरीद लेते हैं, पर यहां सबके लिए समान सुलभ सार्वजनिक सार्वत्रिक शिक्षा व्यवस्था का विरोध करते हैं। तब इन्हें टैक्सपेयर का पैसा याद आता है। अब सरकार इन्हें लाने की व्यवस्था करेगी तो किसका पैसा लगेगा रे?
एकमात्र आरक्षण जिसका विरोध करना चाहिए वह यह अमीरों वाला आरक्षण है। पर ये लोग विरोध करते हैं अगर वंचितों उत्पीडितों के लिए थोडी सी भी सुविधा दी जाये। तब इन्हें मेरिट याद आती है, ये उक्रेन वगैरह में कौन सी मेरिट से जाते हैं भाई, पैसे की मेरिट से न? 
खैर, फिर भी हम इनकी तरह अपने साथी इंसानों से नफरत नहीं करते, वो तो इनके प्रिय मोदी शाह टाटा अंबानी अदानी का काम है जो ऐसी तकलीफ में भी तीन गुना भाडा मांगते हैं। हम तो इंसानी हमदर्दी वाले हैं। सरकार करे इन्हें लाने की व्यवस्था, हम नहीं करेंगे विरोध, टैक्सपेयर्स के पैसे के नाम पर।



विधानसभा चुनावों में बीजेपी की हार पक्की करो

*जनता बनाम संघ-बीजेपी*

*विधानसभा चुनावों में बीजेपी की हार पक्की करो*

*साथ ही मेहनतकश जनता के सवालों पर जन संघर्ष तेज करो* 

साथियों,
कुछ राज्यों में मौजूदा विधानसभा चुनावों का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह जनता बनाम भाजपा चुनाव में बदल गया है। ज्यादातर जगहों पर ये आम लोग ही हैं - मजदूर, किसान, निम्न मध्यम वर्ग के लोग, रेहड़ी-पटरी वाले, छात्र और युवा आदि – जो भाजपा के खिलाफ सबसे प्रबल प्रचारक बन गए हैं। जनता अब धन बल, बाहुबल व मीडिया प्रचार के बल पर होने वाले चुनाव प्रचार में मूक दर्शक मात्र नहीं है। इसके बजाय वह इस बार के चुनावों में सक्रिय खिलाड़ी है, और सफलतापूर्वक सांप्रदायिक और राष्ट्रवादी उन्माद को भड़काने के आरएसएस-बीजेपी के फासीवादी मंसूबों और साजिशों को विफल कर रहे हैं और भाजपा नेताओं, कार्यकर्ताओं और समर्थकों से अपने जीवन व आजीविका की समस्याओं-तकलीफों - मूल्य वृद्धि, बेरोजगारी, किसानों के मुद्दे, महिलाओं के खिलाफ अपराध, शिक्षा और स्वास्थ्य से परे, सरकार कोरोना के दौरान लोगों को बीमारी और भूख - पर स्पष्ट और तीखे प्रश्न पूछ उनसे जवाब मांग रहे हैं। 

यह चुनाव ऐसे वक्त में हो रहा है, जब दैनिक जीवन की आवश्यक वस्तुओं पर महंगाई आसमान छू रही है, बेरोजगारी ऐसी तेजी से बढ़ रही है कि 20 से 30 उम्र की तो लगभग पूरी पीढ़ी ही अब बेरोजगार है, श्रमिकों के सामने छंटनी और गिरती मजदूरी मुंह बाये खड़ी है, किसानों के खेतों को छुट्टे सांड व अन्य पशु नष्ट कर रहे हैं और किसानों व छोटे व्यवसायियों की आय में तेज गिरावट आई है। ऑनलाइन डिजिटल शिक्षा के नाम पर बंद स्कूल, लगभग न के बराबर स्वास्थ्य सेवाएं, महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध और दलितों पर अत्याचार, सरकार द्वारा अपराधियों के बजाय पीड़ितों पर पूरी ताकत दिखाना, जैसे हाथरस में हम सबने देखा, यही बीजेपी सरकारों का मूल चरित्र है।

1 फरवरी को जो आम बजट पेश हुआ, उसने भी साफ दिखा दिया है कि इस सरकार के लिए बेरोजगारी, महंगाई, बढ़ती भुखमरी, शिक्षा-स्वास्थ्य व्यवस्था की सम्पूर्ण बदइंतजामी व उसे महंगा कर आम लोगों की पहुँच से दूर करना, आदि समस्याओं का कोई महत्व नहीं। वह अब उन के समाधान हेतु कोई कदम उठाना तो दूर उनका जिक्र तक नहीं कर रही है। इसके बजाय वह बड़े कॉर्पोरेट पूंजीपति घरानों जैसे अदानी, अंबानी, टाटा, आदि की दौलत व मुनाफे बढ़ाने में पूरी ताकत से जुटी है। यहां तक कि अंबानी की दौलत एक ही साल में दुगनी हो गई। उधर किसान आंदोलन के सामने झुकना तो पड़ा मगर गरूर से भरी मोदी सरकार अब किसानों से इसका बदला लेने पर उतारू है – कृषि बजट व एमएसपी पर फसलों की सरकारी खरीद के लक्ष्य दोनों में पहले के मुकाबले और कटौती कर दी गई है। खाद्य सब्सिडी में बड़ी कटौती बताती है कि गरीब लोगों को कोरोना काल में मिल राशन चुनावों के बाद बंद होने वाला है। शिक्षा-स्वास्थ्य, आदि का तो जिक्र तक नहीं किया गया। 
   
नरेंद्र मोदी द्वारा सांप्रदायिक-राष्ट्रवादी उन्माद फैलाने के लिए फिरोजपुर फ्लाईओवर पर चली गई चाल बुरी तरह विफल रही है, अधिकांश लोग उससे बिल्कुल भी प्रभावित नहीं हुए हैं। इसने बीजेपी को बैकफुट पर ला दिया है, यहां तक ​​कि उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री आदित्यनाथ को वहां से उम्मीदवार बनाकर अयोध्या और मंदिर के मुद्दे पर पूरे चुनावी माहौल को सांप्रदायिक रूप से ध्रुवीकरण करने की रणनीति को छोड़कर गोरखपुर वापस भागना पड़ा है। इसी तरह, विभिन्न राज्यों में कई प्रमुख भाजपा नेताओं और मंत्रियों को अपने ही निर्वाचन क्षेत्रों में लोकप्रिय प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है और कई जगहों पर प्रचार करने से भी रोका जा रहा है।

इसकी एक बड़ी वजह है किसानों के साथ हुआ विश्वासघात - उन्हें लग रहा है कि चुनाव में बीजेपी की जीत मोदी के लिए कृषि कानूनों को वापस लाने का पक्का संकेत होगा। दूसरे, छात्र और युवा भयावह बेरोजगारी और भर्ती प्रक्रिया के मुद्दे पर आरएसएस-भाजपा शासन के 'सबका साथ, सबका विकास' मॉडल की क्रूरता का भी अनुभव कर रहे हैं। जनता के अन्य सभी तबकों को भी ऐसा ही अनुभव हुआ है जब भी उन्होंने अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने की कोशिश की है। यहां तक ​​कि जिन लोगों ने कोरोना के दौरान घुटती सांसों से हांफ रहे अपने रिश्तेदारों-दोस्तों को बचाने के लिए सिर्फ ऑक्सीजन सिलिन्डर का अनुरोध किया, उन्हें भी इस 'मजबूत' सरकार द्वारा नहीं बख्शा गया, चाहे वे किसी भी धर्म, जाति, क्षेत्र और यहां तक ​​कि उनकी अपनी पार्टी के ही क्यों न हों।

अतः मौजूदा स्थितियों में राज्य विधानसभा चुनावों में फासीवादी भाजपा की चुनावी हार एक स्वागत योग्य और सकारात्मक परिणाम होगी, क्योंकि यह निश्चित रूप से फासीवादी आरएसएस-भाजपा के लिए एक झटका होगा और पूरे देश की जनता में भाजपा विरोधी गुस्से के बढ़ते ज्वार के ताप को और बढ़ा देगा। इसलिए फासीवादी भाजपा की चुनावी हार सुनिश्चित करने के लिए सभी फासीवाद विरोधी ताकतों को अपनी पूरी ताकत लगा जनता से बीजेपी को एक भी वोट न देने की अपील करनी चाहिए।

हम जानते हैं कि सिर्फ भाजपा की चुनावी हार से ही जनजीवन की समस्याएं हल नहीं हो जाएंगी। लेकिन आम लोगों की बढ़ती राजनीतिक चेतना, शक्तिशाली इजारेदार कॉर्पोरेट पूंजी और उनके द्वारा नियंत्रित मीडिया घरानों द्वारा वित्तपोषित आरएसएस-बीजेपी के सांप्रदायिक और कट्टर प्रचार के सामने उनके जीवन की वास्तविक समस्याओं पर जोर, और राजसत्ता व कॉर्पोरेट पूंजी के बीच संबंधों की उनकी बढ़ती जानकारी उन्हें इस एहसास की ओर ले जाएगी कि यह न केवल इस या उस बुर्जुआ पार्टी की सरकार बल्कि वह पूंजीवादी व्यवस्था ही है जो उनके गहन शोषण और अत्यधिक दुख-तकलीफ के लिए जिम्मेदार है। जैसे-जैसे पूंजीवाद का आर्थिक संकट गहराता जा रहा है, इसके भी जल्द से जल्द होने की संभावना है और अभी जनता के विभिन्न तबकों के जो संघर्ष उभर रहे हैं उनका ज्वार बढ़ता ही जाएगा। इन जनसंघर्षों पर नृशंस दमनचक्र चलाने, सभी जनवादी अधिकारों को छीनने और मेहनतकश जनता में आपसी वैमनस्य पैदा करने वाली फासिस्ट बीजेपी सरकार को चुनावी झटका भी इस दिशा में एक बड़ा काम होगा। इसलिए बीजेपी को चुनाव में हराना इस वक्त की बड़ी जरूरत है।  

इससे पहले कि हम समाप्त करें, एक चेतावनी। फासीवादी भाजपा चुनाव में हार और सरकार की बागडोर खोने से बचने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है। वे लोगों की एकता को तोड़ने और अपने लिए आपसी दुश्मनी पैदा करने के लिए हर तरह के जोड़-तोड़ का इस्तेमाल करेंगे। आम लोगों व सभी फासीवाद विरोधी ताकतों के लिए अनिवार्य है कि वे ऐसी किसी भी घटना के लिए सतर्क रहें और चुनावों से पहले और बाद में आरएसएस-भाजपा के जघन्य मंसूबों को विफल करने के लिए लोगों के बीच एकता और एकजुटता बनाए रखने के ऐसे किसी भी प्रयास पर तत्काल इसे विफल करने वाली प्रतिक्रिया दें।

साभार, 
*'यथार्थ' | 'द ट्रुथ' | 'सर्वहारा' | सर्वहारा एकता मंच | इफ्टू (सर्वहारा)*

Thursday, 24 February 2022

यू. पी. विधानसभा चुनाव में हर जाति धर्म के जनसाधारण मेहनतकशों से अपील



80- 20 या 15-85 का नारा लगाने वाले 10% पूंजीवादियों के पक्ष में नहीं, बल्कि 90% गरीब मेहनतकशों के पक्ष में मतदान करे ।

धर्मसम्प्रदायवादियों व छद्म धर्मनिरपेक्षों के पक्ष में नहीं, बल्कि सम्प्रदायवाद-विरोधियों के पक्ष में मतदान करे।

राजनीतिक जातिवाद करने वालों के पक्ष में नहीं, बल्कि राजनीति में जातिवाद का विरोध करने वालों के पक्ष में मतदान करे।

खुला-छिपा जातिगत भेदभाव करने वालों के पक्ष में नहीं, बल्कि जातिगत भेदभाव, ऊँच-नीच का विरोध करने वालों के पक्ष में मतदान करे।

देशी विदेशी पूँजीशाहों का लाभ परिसम्पत्तियां बढ़ाने वाली और 90% जनसाधारण की मंहगाई, बेरोजगारी बढ़ाने वाली निजीकरण, उदारीकरण, विश्वीकरण की नीतियां 
लागू करने  वालों के पक्ष में नहीं, बल्कि उनका लगातार विरोध करने वालों के पक्ष में मतदान करे ।

राजाओं- महाराजाओं के दान खैरात की तरह मुफ्त राशन, मुफ्त बिजली जैसे नारों के पक्ष में नहीं, बल्कि सबको रोजगार देने, मंहगाई कम व खत्म करने, शिक्षा- स्वास्थ्य , रेलवे, सड़क आदि का निजीकरण खत्म करने की दिशा में काम करने वालों के पक्ष में मतदान करे ।

कृषि सुधार, श्रम सुधार, शिक्षा सुधार की नीतियां लागू करने वालों, उनके मौन समर्थकों व ढुलमुल विरोधियों के पक्ष में नहीं, बल्कि उन सुधारों- नीतियों का लगातार विरोध करने वालों के पक्ष में
            मतदान करें

ओमप्रकाश सिंह ।

गोपालपुर विधानसभा, आज़मगढ़ से भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी (RWPI) के उम्मीदवार मित्रसेन को वोट दें!

गोपालपुर विधानसभा, आज़मगढ़ से भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी (RWPI) के उम्मीदवार मित्रसेन को वोट दें!

चुनाव चिन्ह:-ईंट

भाइयो! साथियो! विधानसभा चुनाव ऐसी स्थिति में हो रहा है जबकि कोरोना महामारी में सरकार की भयंकर बदइन्तज़ामी व आपराधिक लापरवाही, कमरतोड़ मँहगाई, बेरोज़गारी, बहुत कम मज़दूरी, चिकित्सा सुविधा व खाद्य सुरक्षा के अभाव आदि से आम जनता का जीना दूभर हो गया है। खेतों, निर्माण कार्यों और ईंट-भट्ठे आदि में काम करने वाले ग्रामीण मज़दूर, शहरों के औद्योगिक तथा दिहाड़ी मज़दूर, रेहड़ी-खोमचा लगाने वाले, छोटा-मोटा धन्धा करने वाले तथा छोटे-ग़रीब किसान भयानक दुर्दशा के शिकार हैं। बेरोज़गारी की मार से त्रस्त छात्र-नौजवान हताशा-निराशा के शिकार होकर आत्महत्या तक करने को मजबूर हो गये हैं। अल्पसंख्यकों, स्त्रियों, दलितों पर अत्याचार के पुराने सभी रिकॉर्ड टूट चुके हैं और  मेहनतकशों, छात्रों, कर्मचारियों के आन्दोलनों के दमन के लिए प्रदेश में पुलिसराज क़ायम है।

उत्तरप्रदेश में भाजपा के "रामराज्य" के पाँच साल,

मेहनतकश बेहाल, पूँजीपति-नेता-नौकरशाह मालामाल!

पिछले पाँच सालों में जनता के अधिकारों पर डाका डालकर पूँजीपतियों की तिजोरी भरने वाली भाजपा ने उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनाव में "लोक कल्याण" संकल्प पत्र-2022 के नाम से अपना चुनावी घोषणा पत्र या जुमला पत्र जारी किया है। भाजपा के इस जुमला पत्र में ग्रामीण-शहरी मजदूरों, छात्रों, कर्मचारियों, महिलाओं, किसानों सभी के लिए झूठे वायदे और शिक्षा, चिकित्सा, खाद्य सुरक्षा, आवास, बिजली, परिवहन जैसे मुद्दों पर ख़ूब ज़ुबानी जमाख़र्च किया गया है। पिछले चुनाव में भी भाजपा ने ऐसे ही ढेर सारे वायदे किये थे। आइये देखते हैं कि भाजपा ने पाँच साल में उन वायदों पर कितना अमल किया। पिछले चुनाव में भाजपा ने 70 लाख रोज़गार पैदा करने का दम भरा था। लेकिन सीएमआईई की रिपोर्ट के मुताबिक़ मार्च 2017 से नवम्बर 2021 के बीच प्रदेश में बेरोज़गारी दर दोगुनी हो गयी। प्रदेश में लगभग 17 करोड़ लोग बेरोज़गार हैं और पिछले पाँच साल में 16 लाख लोग अपनी नौकरियाँ गवाँ चुके हैं। नयी भर्तियाँ निकाली नहीं जा रही हैं, जो भर्तियाँ निकल भी रही हैं उनमें परीक्षा का पर्चा लीक होना और घूसखोरी एक नियम बन चुका है।

चुनाव से पहले भाजपा ने ग्रामीण मज़दूरों के लिए श्रम क़ानून बनाने का वादा किया था, लेकिन चुनाव के बाद ग्रामीण मजदूरों के लिए श्रम क़ानून बनाना तो दूर, औद्योगिक मज़दूरों के लिए बने श्रम क़ानून को भी प्रदेश में 1 हज़ार दिनों के लिए निरस्त कर दिया। मज़दूरी न देने पर मालिकों को जेल की सज़ा के नियम को भी ख़त्म कर दिया। भाजपा की केन्द्र सरकार ने सारे श्रम क़ानूनों को समाप्त कर मज़दूर विरोधी '4 लेबर कोड' बना दिया। कोरोना महामारी के दौरान मज़दूरों को दवा-इलाज, खाने का प्रबन्ध करने की जगह हजारों किलोमीटर से पैदल निकल पड़ने वाले लाखों मज़दूरों को सड़कों पर मरने के लिए छोड़ दिया। कर्मचारियों के कई भत्ते समाप्त कर दिये। योगी सरकार द्वारा 21 जिलों की बिजली को प्राइवेट हाथों में सौंपने की स्कीम कर्मचारियों के बड़े पैमाने पर विरोध और चुनाव के कारण अमल में लाने से कुछ समय के लिए रोक दिया गया है लेकिन सरकार की मंशा साफ़ है। उत्तर प्रदेश के संविदा कर्मियों, आशा कर्मियों, आँगनबाड़ी, रोज़गार अनुदेशक, रसोइयों, शिक्षामित्रों के मानदेय बढ़ाने या कर्मचारी का दर्ज़ा देने की माँग को कुचल दिया गया। चुनाव के नज़दीक आने पर इनके मानदेय में भाजपा सरकार द्वारा 1000 रुपये की वृद्धि का जो झुनझुना दिया भी गया उसे अभी तक लागू नहीं किया गया।

प्रदेश में प्राथमिक शिक्षा की स्थिति यह है कि लगभग 1 लाख 59 हज़ार परिषदीय विद्यालयों में से 1 लाख से ज़्यादा बिना प्रधानाध्यापक के चल रहे हैं। प्रदेश के 40,000 से ज़्यादा स्कूलों में बच्चे ज़मीन पर बैठकर पढ़ाई करते हैं। 50 हज़ार से अधिक स्कूलों में क्लासरूम, फ़र्नीचर, शौचालय, पेयजल, बिजली जैसी मूलभूत सुविधाएँ भी नहीं हैं। प्राइवेट स्कूलों की लूट और सरकारी तन्त्र की बदहाल स्थिति देश के मेहनतकशों के बेटे-बेटियों को शिक्षा से दूर ढकेल रही है।

प्रदेश में चिकित्सा की बदहाली का आलम यह है कि औसतन सवा तीन लाख लोगों पर एक सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र है और एक लाख की आबादी पर केवल एक प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र है जबकि मानक के हिसाब से हर एक लाख की आबादी पर एक सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र और हर 30 हज़ार की आबादी पर एक प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र होना चाहिए। ज़्यादातर प्राथमिक, सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र डॉक्टरों और कर्मचारियों के भयंकर अभाव से जूझ रहे हैं। प्रदेश के ज़्यादातर प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र फ़ार्मासिस्टों के भरोसे चल रहे हैं और सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर एमडी डॉक्टर तक नहीं हैं। लोग इलाज कराने के लिये झोलाछाप डॉक्टरों व प्राइवेट अस्पतालों पर निर्भर हैं। प्रदेश में चिकित्सकों के 88 प्रतिशत व नर्सों के लगभग 80 प्रतिशत पद ख़ाली हैं।

मँहगाई की वजह से ग़रीबों-मेहनतकशों का जीना मुहाल है। आज़मगढ़ के देवारा का पूरा इलाक़ा हर बार बाढ़ की चपेट में आ जाता है। लोगों की फ़सल बर्बाद हो जाती है। बच्चे स्कूल नहीं जा पाते। कच्चे घर पानी से गिरने लगते हैं। साँप के काटने से लोगों की मौत हो जाती है। भाजपा के नेता हर चुनाव में इस इलाके के लोगों को बाढ़ से मुक्ति दिलाने का वायदा करते हैं और चुनाव बीतने के बाद भूल जाते हैं।

महिलाओं की सुरक्षा और 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' का नारा देने वाली भाजपा सरकार में सबसे ज़्यादा महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध करने वाले सांसद-विधायक हैं। उन्नाव और हाथरस की बर्बर घटनाएँ सभी को याद होंगी। महिलाओं के ख़िलाफ़ सबसे ज़्यादा अपराध उत्तर प्रदेश में होते हैं। इसी तरह एनसीआरबी द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार दलितों के ख़िलाफ़ अपराध के मामले में भी उत्तर प्रदेश शीर्ष पर है।

भाजपा की राजनीति ही अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाकर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण पर टिकी है। सीएए-एनआरसी की साज़िश के ख़िलाफ़ जब देश भर में इंसाफ़पसन्द नागरिकों ने सड़कों पर उतर कर विरोध किया तो उत्तर प्रदेश सरकार ने भयंकर दमन किया। फ़र्ज़ी मुक़दमें लगाकर लोगों को जेलों में ठूँस दिया। चुनाव आते ही भाजपा फ़िर से हिन्दू-मुस्लिम ध्रुवीकरण करने के लिए मथुरा में मन्दिर का मामला उछाल रही है। भाजपा ने पिछले पाँच साल में जनान्दोलनों का बर्बर दमन किया है। छात्रों के प्रतिरोध को कुचलने के लिए छात्र संघ चुनावों पर रोक लगा दी है। पूरे प्रदेश को पुलिस राज में तब्दील करने वाली भाजपा गुण्डाराज-माफ़ियाराज से मुक्ति दिलाने का ढोंग कर रही है जबकि सबसे ज़्यादा अपराधियों को भाजपा ने ही टिकट दिया है।

वास्तव में भाजपा ने केवल पूँजीपतियों का कल्याण किया है। ऑक्सफ़ैम की रिपोर्ट के अनुसार हालिया वर्ष 2021 में 84 प्रतिशत घरों की आमदनी तेज़ी से घटी है। वहीं भारत के 100 सबसे अमीर परिवारों की आमदनी में बेतहाशा बढ़ोत्तरी हुई है। देश के 98 धन्नासेठों के पास उतना धन इकट्ठा हो गया है जितना देश के 55 करोड़ लोगों के पास भी नहीं है। कोरोना महामारी के दौरान भी सरकार ने पूँजीपतियों की सेवा में कोई कसर नहीं छोड़ी। इसीलिए पूँजीपतियों ने भी भाजपा के चुनाव प्रचार में अपनी तिजोरियाँ खोल दी हैं। वास्तव में मन्दी के शिकार पूँजीपति वर्ग को भाजपा जैसी फ़ासीवादी पार्टी की ही ज़रूरत है। क्योंकि भाजपा व संघ परिवार ही वर्तमान समय में जनता के साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण व दमन के ज़रिये पूँजीपति वर्ग को लूट की गारण्टी देने में सक्षम है।

फ़ासीवादी भाजपा के अलावा सपा, बसपा, कांग्रेस,आप

जैसी पूँजीवादी पार्टियों की सच्चाई जानो!

निश्चित तौर पर, भाजपा हिटलर-मुसोलिनी की तर्ज़ पर चलने वाली एक फ़ासीवादी पार्टी है जो अवाम के लिए बहुत ही ख़तरनाक है। लेकिन हमें यह बात समझनी होगी कि कांग्रेस, सपा, बसपा, रालोद, आप जैसी पूँजीवादी पार्टियाँ भी जनता का शोषण करने और पूँजीपतियों की तिजोरी भरने के मामले में भाजपा से अलग नहीं हैं। नकली वामपन्थी पार्टियाँ भी इसी पूँजीवादी व्यवस्था की दूसरी सुरक्षा पंक्ति हैं। जनता के हितों का ढोंग रचने वाली ये पार्टियां असल में धनबल-बाहुबल, जातीय-धार्मिक समीकरण के आधार पर ही चुनाव लड़ रही हैं। ये पार्टियाँ वास्तव में देश के ऊपर के उन दस प्रतिशत पूँजीपतियों, बड़े व्यापारियों, धन्नासेठों, ठेकेदारों, भट्ठा मालिकों, प्रॉपर्टी डीलरों, धनी किसानों-कुलकों (ग्रामीण पूँजीपति वर्ग) के हितों की रक्षक हैं जिनका देश की 70 फ़ीसदी से अधिक सम्पत्ति और संसाधनों पर कब्ज़ा है। ये वही वर्ग है जो भाजपा, कांग्रेस, सपा, बसपा, रालोद से लेकर संशोधनवादी वामपन्थी पार्टियों को भी चन्दा देता है। ऐसे में स्वाभाविक है कि ये पार्टियाँ उसी वर्ग की सेवा करेंगी जिनके दम पर ये चुनाव लड़ती हैं और सत्ता हासिल करती हैं। अभी हाल ही में आयी एडीआर (एसोशिएसन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफ़ॉर्म) की रिपोर्ट के अनुसार राष्ट्रीय पार्टियों द्वारा 6988 करोड़ 57 लाख रुपये की कुल घोषित सम्पत्ति में भाजपा का हिस्सा 4847 करोड़ 78 लाख रुपये है जो कि सभी पार्टियों की घोषित सम्पत्ति का तक़रीबन 70 फ़ीसदी है। इसके अलावा बसपा, कांग्रेस, सपा, आम आदमी पार्टी, सीपीएम, तृणमूल कांग्रेस, सीपीआई, एनसीपी, एआईएमआईएम जैसी पार्टियों को भी पूँजीपति वर्ग के चन्दा/फण्ड का एक हिस्सा प्राप्त होता है।

एडीआर के अनुसार पहले चरण के लिये 58 सीटों पर खड़े प्रत्याशियों में से लगभग एक चौथाई यानी 156 प्रत्याशियों पर आपराधिक मामले दर्ज़ हैं, जिनमें 121 पर गम्भीर आपराधिक मामले हैं। करोड़पति प्रत्याशियों की तरह अपराधियों को टिकट देने के मामले में भी भाजपा नम्बर एक पर है। भाजपा के 57 प्रत्याशियों में 29 पर आपराधिक मामले दर्ज़ हैं, जबकि सपा के 28 प्रत्याशियों में से 21, कांग्रेस के 58 में से 21, बसपा के 56 में 19 और आप के 52 में से 8 प्रत्याशियों पर आपराधिक मामले दर्ज़ हैं।

ज़ाहिर है कि भाजपा के अलावा इन पार्टियों में से किसी भी पार्टी के जीत जाने से आम मेहनतकश जनता की ज़िन्दगी में कोई बुनियादी बदलाव नहीं आने वाला है। आपातकाल से लेकर यूएपीए जैसा कुख्यात क़ानून कांग्रेस की ही देन है। लक्ष्मणपुर बाथे, हाशिमपुरा जैसे काण्ड कांग्रेस के समय में ही हुए थे। मन्दिर का ताला खुलवाने के सॉफ्ट केसरिया लाइन से लेकर सिख विरोधी दंगों तक में कांग्रेस की भूमिका सबको याद ही होगी। छात्र-नौजवान, कर्मचारी, मज़दूर जिन आर्थिक उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों की मार झेल रहे हैं, सरकारी विभाग बेचे जा रहे हैं वो कांग्रेस द्वारा ही अमल में लाई गई थीं। सपा, बसपा और नकली वामपन्थी पार्टियाँ कांग्रेस के साथ गठबन्धन में शामिल हो चुकी हैं और कांग्रेस के कुकृत्यों में बराबर की भागीदार रही हैं। ये पार्टियाँ कई राज्यों में स्वतन्त्र रूप से सरकार चला चुकी हैं और चला भी रही हैं, लेकिन जनता के दुःख़-तक़लीफों में कोई कमी नहीं आई। आम आदमी के नाम की माला जपने वाली 'आप' पार्टी का चरित्र इसी से समझा जा सकता है कि 'दिल्ली स्टेट आँगनवाड़ी वर्कर्स एण्ड हेल्पर्स यूनियन' के नेतृत्व में दिल्ली में चलने वाले आँगनवाड़ी कर्मियों के आन्दोलन की वाज़िब माँगों पर विचार करने की जगह चुनाव में व्यस्त है और दमन के नये-नये हथकण्डे अपना रही है। 

मेहनतकशों से बनी, मेहनतकशों के मुद्दे पर लड़ने वाली पार्टी,

भारत की क्रान्तिकारी मजदूर पार्टी (RWPI)!

भाइयो! साथियो! फ़ासीवादी भाजपा और सपा, कांग्रेस, बसपा, आम आदमी पार्टी जैसी पूँजीवादी पार्टियों के ऊपर बताए गए चरित्र से समझा जा सकता है कि ये पार्टियाँ भले ही ग़रीबों-मेहनतकशों के हितों में काम करने का ढिढोरा पीटें लेकिन असल में ये पूँजीपतियों के पैसों से चलती हैं और उन्हीं के हित में काम करती हैं। लोग अपने अनुभव से यह बात समझते हैं लेकिन विकल्प के अभाव में कभी इस तो कभी उस पूँजीवादी पार्टी को अपना वोट देते हैं। लेकिन मेहनतकशों को अब इन नकली विकल्पों में किसी को चुनने की ज़रूरत नहीं है। क्योंकि उनके बीच मेहनतकशों के वास्तविक हितों की नुमाइन्दगी करने वाली पार्टी 'भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी' (RWPI) मौजूद है। आइये देखते हैं कि 'भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी' ये दावा किस आधार पर करती है?

सबसे पहला, भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी मज़दूरों, जनसंघर्षों में लगे मज़दूर संगठनकर्ताओं और मज़दूर वर्ग के राजनीतिक संगठनकर्ताओं द्वारा बनी है। मेहनतकशों के संघर्षों में लम्बे समय से ईमानदारी से लगे जुझारू कार्यकर्ताओं को ही RWPI चुनावों में अपना प्रत्याशी बनाती है न कि पूँजीवादी पार्टियों की तरह धनबल-बाहुबल और जाति-धर्म के समीकरण के आधार पर! दूसरा, भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी स्वयं मज़दूर वर्ग और आम मेहनतकश आबादी द्वारा दिये गये आर्थिक सहयोग पर निर्भर है। यह किसी भी देशी-विदेशी कम्पनी, पूँजीपति घराने, सरकार, एनजीओ, फ़ण्डिंग एजेंसी, चुनावी ट्रस्ट या किसी अन्य पूँजीवादी पार्टी से किसी भी प्रकार का चन्दा या फ़ण्ड नहीं लेती। चन्दा या फ़ण्ड को हम आर्थिक नहीं बल्कि राजनीतिक प्रश्न मानते हैं, क्योंकि मेहनतकशों के आर्थिक संसाधनों पर खड़ी पार्टी ही मेहनतकश वर्गों के वर्ग हितों की सही मायने में नुमाइन्दगी कर सकती है। तीसरा, भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी द्वारा उठाए गए मुद्दों के आधार पर अन्य पूँजीवादी पार्टियों से उसके फ़र्क को समझा जा सकता है। भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी न्यूनतम मज़दूरी को 25000 रुपए मासिक करने, सबको रोज़गार, शिक्षा और चिकित्सा में निजीकरण को पूरी तरह ख़त्म कर सबके लिए समान व निःशुल्क बनाने जैसे बुनियादी मुद्दों पर चुनाव लड़ रही है। इन मुद्दों को कोई भी पूँजीवादी पार्टी इसलिए नहीं उठा सकती क्योंकि ये मुद्दे पूँजीपतियों के खिलाफ़ जाते हैं, बहुत से नेता तो ख़ुद मज़दूरों से बहुत कम मज़दूरी पर काम करवाते हैं, निजी स्कूल और अस्पताल चलाते हैं। इसलिए ये पूँजीवादी पार्टियाँ स्कूटी, लैपटॉप, मोबाइल देने और 1000-1200 पेंशन जैसे झुनझुने और रुपए-पैसे बाँटकर लोगों का वोट ले लेना चाहती हैं। चौथा, भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी का शुरू से ही घोषित संकल्प रहा है कि जीते हुये प्रत्याशी केवल एक कुशल मज़दूर जितना ही वेतन लेंगे और बाकी वेतन को विकास निधि में ही डाल देंगे। निर्वाचन क्षेत्र में आने वाली सभी सरकारी योजनाओं को पारदर्शी तरीक़े से लागू करने के लिये उनका सार्वजनिक ऑडिट करायेंगे और समस्त विकास कार्य जनता की चुनी गयी कमेटियों की निगरानी में होगा। पाँचवा, भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी समाजवादी क्रान्ति के ज़रिये मज़दूर सत्ता को स्थापित करने और समाजवादी व्यवस्था के निर्माण को अपना दूरगामी लक्ष्य मानती है। मज़दूर-मेहनतकश जनता को ग़रीबी, भुखमरी, बेघरी, कुपोषण व सामाजिक-आर्थिक असुरक्षा तथा अनिश्चितता से स्थायी तौर पर मुक्ति एक समाजवादी क्रान्ति के ज़रिये ही मिल सकती है। इसी दूरगामी लक्ष्य को पूरा करने के लिए समाज के हर क्षेत्र में मज़दूर वर्ग के स्वतन्त्र राजनीतिक पक्ष की मौजूदगी ज़रूरी है। पूँजीवादी व्यवस्था के भीतर होने वाले चुनावों में भारत की क्रान्तिकारी मजदूर पार्टी इसी वजह से भागीदारी करती है।

'भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी' के प्रत्याशी मित्रसेन पिछले करीब 8 वर्षों से ग़रीबों-महनतकशों के हित में संघर्षरत हैं। देवारा के इलाक़े में वर्तमान समय में 85 लाख रुपए का पुल बन रहा है यह संघर्ष मित्रसेन के नेतृत्व में ही जीता गया। इसी तरह अभी हाल ही में बिजली के ग़लत बिल आने के मुद्दे पर संघर्ष चलाकर करीब 60 गाँवों की बिजली माफ़ करवाया। आरडब्ल्यूपीआई के नेतृत्व में लम्बे समय से इलाके में बाढ़, आगजनी, बीमारी से पीड़ित लोगों की मदद की जा रही है। ख़राब सड़कों की मरम्मत के लिए भी पिछले दिनों आन्दोलन संगठित किया गया। ग़रीब बच्चों के लिए लम्बे समय से पुस्तकालय और निःशुल्क शिक्षा सहायता मण्डल भी चलाया जा रहा है।

गोपालपुर विधानसभा निवासियों से अपील है कि नीचे दिये मुद्दों के आधार पर गोपालपुर विधान सभा से 'भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी' के मित्रसेन के चुनाव चिन्ह 'ईंट' पर मुहर लगाकर विजयी बनायें।

 

1. रोज़गार को मौलिक अधिकार बनाने के लिए विधानसभा में संघर्ष करना।

2. हर काम करने योग्य नागरिक के लिये रोज़गार की गारण्टी। काम के घण्टों को क़ानूनी तौर पर अधिकतम 6 घण्टे तथा दैनिक न्यूनतम मज़दूरी रु.800 और मासिक रु.25000 के लिये। रोज़गार न मिलने की सूरत में हर बेरोज़गार को प्रतिमाह रु.10000 बेरोज़गारी भत्ता के लिये।

3. सरकारी विभागों में ख़ाली पदों को अविलम्ब भरवाने के लिये। परीक्षाओं में पारदर्शिता सुनिश्चित करने और निश्चित समय सीमा के भीतर भर्ती प्रक्रिया पूरी कराने के लिये। परीक्षा शुल्क व यात्रा व्यय का ख़र्च सरकार द्वारा वहन करने के लिये।

4. ग्रामीण मज़दूरों की सुरक्षा के लिये श्रम क़ानून बनवाने और उनके क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने हेतु उपयुक्त ढाँचे का निर्माण कराने के लिये।

6. आशा-आँगनबाड़ी-पंचायतमित्र-शिक्षामित्र और अन्य स्कीम वर्कर्स को कर्मचारी का दर्ज़ा दिलाने और पे ग्रेड के अनुसार वेतन देने के लिये। हर प्रकार के नियमित कार्य में ठेका-संविदा समाप्त कराने के लिये।

7. नयी पेंशन स्कीम को रद्द करके पुरानी पेंशन स्कीम को बहाल करने के लिये। सरकारी विभागों के निजीकरण को रद्द करवाने के लिए।

8. नि:शुल्क सार्विक स्वास्थ्य देखरेख की सरकारी गारण्टी के लिये। जिसके तहत चिकित्सा व दवा-इलाज की पूरी ज़िम्मेदारी सरकार की हो।

9. भारत के हरेक नागरिक के लिये प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्चतर शिक्षा के स्तर तक समान एवं निःशुल्क शिक्षा के लिये। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 को वापस लेने हेतु विधानसभा से केन्द्र सरकार को प्रस्ताव भिजवाने के लिये।

10. मेहनतकशों के लिये आवास की व्यवस्था। सभी ख़ाली पड़े निजी अपार्टमेण्टों, फ़्लैटों व मकानों को ज़ब्त कर उन्हें भोगाधिकार के आधार पर मेहनतकशों को आबण्टित कराने के लिये।

11. महँगाई और कालाबाज़ारी पर रोक लगाने के लिये। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत राशनिंग की प्रभावी व्यवस्था के निर्माण और हर इलाक़े में सब्सिडाइज़्ड सरकारी राशन की दुकानें खुलवाने के लिये।

12. शारीरिक व मानसिक रूप से अक्षम व्यक्तियों, अनाथ बच्चों, लाचार वृद्धों की सभी बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने हेतु सामाजिक सुरक्षा क़ानून बनाने और सरकार की ज़िम्मेदारी सुनिश्चित करने के लिये।

13. देवारा जैसे बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों का विस्तृत सर्वे करके पुलों एवं सड़कों और बाढ़ रोकने के लिये बाँधों का निर्माण करवाने के लिये। फ़सल बर्बाद होने पर मुआवजा के लिए। बाढ़ प्रभावित इलाके में अस्पताल और परशुरामपुर में मिनी पीजीआई खुलवाने के लिए।

14. आगजनी की घटना को रोकने के लिए उचित स्थान पर अग्निशमन केन्द्र बनाने के लिए।    

15. परशुरामपुर में अलग तहसील निर्माण के लिए।

 16. विधानसभा क्षेत्र में स्टेडियम, व्यायामशाला, पुस्तकालय-वाचनालय व सांस्कृतिक केन्द्र बनाने के लिए।

17. जाति के आधार पर होने वाले हर भेदभाव को तत्काल दण्डनीय अपराध घोषित कराने और जातिगत उत्पीड़न रोकने के लिये गाँव और मोहल्ला स्तर पर जनता की कमेटियाँ बनाने के लिये।

18. घरेलू हिंसा, उत्पीड़न आदि की शिकार अकेली स्त्रियों के लिये रोज़गार व आवास की व्यवस्था कराने और इसे सुनिश्चित करने के लिये सख़्त क़ानून बनवाने के लिये।

Tuesday, 22 February 2022

निदाफ़ाज़ली साहब के ये शेर गौर तलब हैं


हर बार ये  इल्ज़ाम रह गया..!
हर काम में कोई  काम रह गया..!!
नमाज़ी उठ उठ कर चले गये मस्ज़िदों से..!
दहशतगरों के हाथ में इस्लाम रह गया..!!

खून किसी का भी गिरे यहां 
नस्ल-ए-आदम का खून है आखिर
बच्चे सरहद पार के ही सही 
किसी की छाती का सुकून है आखिर

ख़ून के नापाक ये धब्बे, ख़ुदा से कैसे छिपाओगे ? 
मासूमों के क़ब्र पर चढ़कर, कौन से जन्नत जाओगे ?

दिलेरी का हरगिज़ हरगिज़ ये काम नहीं है
दहशत किसी मज़हब का पैगाम नहीं है ....!
तुम्हारी इबादत, तुम्हारा खुदा, तुम जानो..
हमें पक्का यकीन है ये कतई इस्लाम नहीं है....!!

१९५३ में स्टालिन की शव यात्रा पर उमड़ा सैलाब 

*On this day in 1953, a sea of humanity thronged the streets for Stalin's funeral procession.* Joseph Stalin, the Soviet Union's fea...