Wednesday, 3 November 2021

त्‍योहारों के बारे में कुछ विचार कात्‍यायनी


त्‍योहारों का जन्‍म कृषि-आधारित पुरातन समाजों में फसलों की बुवाई और कटाई के मौसमों पर आधारित था। ये सामूहिक जन-उल्‍लास के संस्‍थाबद्ध रूप थे। जादुई विश्‍वदृष्टिकोण और प्राकृतिक शक्तियों के अभ्‍यर्थना के आदिम काल में इन त्‍योहारों के साथ टोटकों की कुछ सामूहिक क्रियाऍं जुड़ी हुई थीं। फिर संस्‍थाबद्ध धर्मों ने शासकवर्गों के हितों के अनुरूप इन त्‍योहारों का पुन:संस्‍कार और पुनर्गठन किया और इनके साथ तरह-तरह की धार्मिक मिथकीय कथाऍं और अनुष्‍ठान जोड़ दिये गये। इसके बावजूद प्राक् पूँजीवादी समाजों में आम उत्‍पादक जन समुदाय इन त्‍योहारी उत्‍सवों को काफी हद तक अपने ढंग से मनाता रहा। त्‍योहार आम उत्‍पीडि़तों के लिए काफी हद तक सामूहिकता का जश्‍न बने रहे। जिन्‍दगी भर उत्‍पीड़न का बोझ ढोने वाले लोग कम से कम एक दिन कुछ खुश हो लेते थे, कुछ गा-बजा और नाच लेते थे।
लेकिन पूँजी की चुड़ैल ने आम लोगों के जीवन का यह रस भी चूस लिया। जीवन में हर चीज माल में तब्‍दील हो गयी और सबकुछ बाजार के मातहत हो गया। होली-दिवाली-दशहरा---- सभी त्‍योहार समाज में अमीरों के लिए 'स्‍टेटस सिंबल' बनकर रह गये हैं। जिसकी गॉंठ में जितना पैसा, उसका त्‍योहार उतना ही रौशन और रंगीन। आम लोगों के लिए तो त्‍योहार बस भीषण तनाव ही लेकर आते हैं। थोड़े दिये जला लेने और पटाखे फोड़ लेने या थोड़ा अबीर-गुलाल लगा लेने और गुझिया खा लेने की बच्‍चों की चाहत पूरा करने में और थोड़ी बहुत सामाजिक औपचारिकताऍं पूरी करने के दबाव में गरीब मेहनतकशों और निम्‍न मध्‍यवर्ग के लोगों का सारा कसबल निकल जाता है। जो अमीर लोग त्‍योहार जोर-शोर से मनाते हैं, उन्‍हें भी सारी खुशी वास्‍तव में अपनी दौलत की नंगी नुमाइश से ही मिलती है। पूँजीवादी समाज में श्रम-विभाजन से पैदा होने वाले सर्वग्रासी अलगाव (एलियनेशन) ने सामूहिकता की भावना को विघटित करके उत्‍सवों के प्राणरस को ही सोख लिया है। अलगाव के शिकार केवल उत्‍पादक मेहनतकश ही नहीं हैं, बल्कि उससे भी अधिक परजीवी समृद्धशाली तबके हैं। जो पूँजी को लगाम लगाकर सवारी करना चाहते हैं, उल्‍टे पूँजी उन्‍ही की पीठ पर सवार होकर उनकी सवारी करने लगती है। एक सामाजिक प्राणी के रूप में खुशी मनुष्‍य को केवल सामूहिक रूप से मिलती है। सामूहिकता से वंचित दौलतमंद परजीवी एक शा‍पि‍त मनुष्‍य होता है जो केवल अपनी दौलत-हैसियत के प्रदर्शन से खुशी पाने की मिथ्‍याभासी चेतना का शिकार होता है या फिर एक ऐसा '' सभ्‍य पशु'' होता है जो तरह-तरह से खा-पीकर, तरह-तरह से यौन क्षुधा को तुष्‍ट करके और रुग्‍ण फन्‍तासियों में जीकर खुश होने की आदत डाल लेता है।
आम जनता के लिए त्‍योहारों की अप्रासंगिकता का एक और ऐतिहासिक कारण है। ज्‍यादातर त्‍योहार कृषि-उत्‍पादन की प्रधानता के युग के त्‍योहार हैं। कारखाना-उत्‍पादन की प्रधानता और कृषि-उत्‍पादन के मशीनीकरण तथा फसलों के बदलते मौसम, पैटर्न और व्‍यवसायीकरण के युग में इन त्‍योहारों के आनन्‍द का मूल स्रोत सूख चुका है। पश्चिमी देशों में 'पुनर्जागरण-प्रबोधन-जनवादी क्रान्ति' की प्रक्रिया में जब पूँजीवाद आया तो उसने सामूहिक नृत्‍य, सामूहिक संगीत (ऑपेरा,बैले, सिम्‍फनी संगीत के कंसर्ट आदि), आधुनिक नाटक आदि के साथ सामूहिक जश्‍न के तमाम रूप विकसित किये तथा कुछ प्राचीन एवं मध्‍ययुगीन त्‍योहारों का भी पुन:संस्‍कार करके उनके धार्मिक अनुष्‍ठान वाले पक्ष को गौण बना दिया और सामूहिक उत्‍सव के पहलू को प्रधान बना दिया। हालॉंकि उन पश्चिमी समाजों में भी बढ़ती पूँजीवादी रुग्‍णताओं ने सामूहिकता के उत्‍सवों की आत्‍मा को मरणासन्‍न बना दिया है। फिर भी उन समाजों के सामाजिक ताने-बाने में इतने जनवादी मूल्‍य रचे-बसे हैं कि स्‍त्री-पुरुष खास मौकों पर फिर भी सड़कों पर निकलकर गा-बजा-नाच लेते हैं, खाते और पीते हैं।
भारत जैसे उत्‍तर-औपनिवेशिक समाज में पूँजीवाद भी जनवादी क्रान्ति के रास्‍ते नहीं, बल्कि एक क्रमिक प्रक्रिया से आया। इन जन्‍मना रुग्‍ण-विकलांग पूँजीवाद ने जनता को सामूहिकता के उत्‍सव को कोई भी नया रूप नहीं दिया ---- न तो सामूहिक जीवन में, न ही कला में। पुराने मध्‍ययुगीन धार्मिक आयोजनों को ही थोड़ा संशोधित-परिष्‍कृत करके अपना लिया गया, जिनका एक धार्मिक पहलू था, दूसरा पूँजीवादी दिखावे और बाजार का पहलू था। त्‍योहारों के इस धार्मिक पहलू का इस्‍तेमाल राष्‍ट्रीय आन्‍दोलन के जमाने में रूढि़वादी और पुनरुत्‍थानवादी राष्‍ट्रवादियों ने किया और आज इनका इस्‍तेमाल मुख्‍यत: धार्मिक कट्टरपंथी फासिस्‍ट कर रहें हैं। त्‍योहारों के पूँजीवादी सामाजिक आचार वाला पहलू नवउदारवाद के दशकों के दौरान हमारे सामाजिक जीवन के पूरे वितान पर छा गया है और रंध्र-रंध्र में घुस गया है।
अब पुराने त्‍योहारों का पुन:संस्‍कार करके उन्‍हें सामूहिकता के ऊर्जस्‍वी-आवेगमय, आनन्‍दोल्‍लास से भरपूर उत्‍सवों में रूपान्‍तरित कर पाना सम्‍भव नहीं रह गया है। मजदूर वर्ग के हरावलों को वर्गसंघर्ष के प्रबल वेगवाही झंझावात का फिर से आवाहन करते हुए सचेतन तौर पर सामूहिकता के जश्‍न के अपने नये-नये रूप ठीक उसी प्रकार ईजाद करने होंगे, जिसप्रकार उन्‍हें सर्वहारावर्गीय सामूहिक वाद्य संगीत, स्‍वर संगीत (केवल लोक‍प्रि‍य ही नहीं बल्कि शास्‍त्रीय भी), थियेटर,सिनेमा आदि के नये-नये रूपों का संधान करना होगा। वर्ग संघर्ष का रूप आज लम्‍बे समय तक जारी रहने वाले अवस्थितिगत युद्ध ('पो‍जीशनल वारफेयर') का हो चुका है। इस 'पोजीशनल वारफेयर' के दौरान शत्रु ने अपनी खंदके खोद रखी हैं और हमें भी अपनी खंदकें खोदनी होंगी और बंकर बनाने होंगे। यानी हमें भी अपनी समांतर संस्‍थाऍं विकसित करनी होगी, सामूहिक सांस्‍कृतिक-सामाजिक आयोजनों, उत्‍सवों के वैकल्‍िपक रूप विकसित करने होंगे। यह प्रक्रिया तृणमूल स्‍तर पर लोकसत्‍ता के वैकल्‍िपक रूपों के भ्रूणों के विकास से अविभाज्‍यत: जुड़ी हुई होगी। सर्वहारा के दूरदर्शी हरावलों को जनसमुदाय की पहलकदमी को संगठित करने के नानाविध प्रयासों के साथ-साथ अक्‍टूबर क्रान्ति दिवस, मई दिवस, भगतसिंह-राजगुरु-सुखदेव जैसे क्रान्तिकारियों के शहादत दिवस आदि-आदि अवसरों पर घिसे-‍ि‍पटे रु‍टीनी आयोजनों से आगे बढ़कर मेले, कार्निवाल, उत्‍सव, त्‍योहार के विविध नये-नये रूप विकसित करने चाहिए। सांस्‍कृतिक टोलियों को प्रचारात्‍मक लोक‍प्रि‍य प्रस्‍तुतियों और कार्यक्रमों के दायरों से बाहर आना होगा और स्‍टेज-कंसर्ट के साथ ही स्‍ट्रीट कंसर्ट के नये-नये रूप, थियेटर के नये-नये प्रयोग आदि विकसित करने होंगे।
संघर्षरत जीवन को भी सर्जनात्‍मकता का उत्‍प्रेरण चाहिए। उत्‍पीडि़त निराश लोगों को और विद्रोह के लिए उठ खड़े हुए लोगों को ---- दोनों के ही जीवन में मनोरंजन का, उत्‍सव का स्‍थान होना चाहिए। क्रान्तिकारी परिवर्तन चन्‍द दिनों का काम नहीं है। यह हू ब हू सामरिक युद्ध जैसा नहीं हो सकता। यह जीवन जैसा होता है। जीने का यह तरीका है। क्रान्ति में लगे लोगों के अपने उत्‍सव और कार्निवाल होने चाहिए और जिन्‍हे क्रान्ति की जरूरत है, उन 'धरती के अभागों' को भी यदि खुशी मनाने के लिए, सर्जनात्‍मक ऊर्जा हासिल करने के लिए, उम्‍मीदों की फिर से खोज के लिए प्रेरित करने के लिए, नये-नये भविष्‍य-स्‍वप्‍न देने के लिए सामूहिकता के नये-नये उत्‍सवों के, कार्निवालों के रूप नहीं विकसित किये जायेंगे, तो वे अतीत की सामूहिकता की पुनर्प्राप्ति की मृगमरीचिका में जीते रहेंगे, धार्मिक मिथ्‍याभासी चेतना को शरण्‍य बनाते रहेंगे और धार्मिक कट्टरपंथी आखेटकों और मुनाफाखोर परभक्षियों के आखेट बनते रहेंगे।

धन



धन वह नहीं
जो अंधी तिजोरियों में क़ैद
छटपटा रहा है
वह भी नहीं
जो बैंक पासबुकों में
इठला रहा है
संपत्ति के दस्तावेज़ों में
काले अक्षरों में दर्ज है
वह तो एक ख़ूबसूरत मर्ज़ है
जिसकी कोई दवा नहीं

धन तो लहलहाता है
खेतों में
हरहराता है नदियों में
उगता है पहाड़ों पर
जंगलों वनों बियाबानों में

धन को उगाता है विष्णु
धन को जगाता है विष्णु
धन को जिलाता है विष्णु
विष्णु
जो आठो पहर धधकता है
गगन में

ख़ुद को जलाकर
सब को जिलाता है
पिलाता है अमृत अहर्निश
धरती के समस्त जीवों को
अमृतस्वरूप विराजता है
सृष्टि के कण कण में

वही सिरजता है धन
सबके लिए
किसान के लिए श्रम
व्यवसायी को उद्यम
गुरु को सत्यनिष्ठा
शासक को धर्म
शिष्य को सत्यान्वेषण
सबके अपने अपने धन

धन को साधना पड़ता है
अपने भीतर के विष्णु को
जगाना पड़ता है
जलाना पड़ता है ख़ुद को
धधकते विष्णु की तरह

धूर्तता से उपजे धन
मात्र अंधकार के कण
डूबोते हैं अमावस के गर्त में
दो दिन बाद ही

आपका सार्थक धन
आपको मिले
भीतर का अंधकार जले
समस्त सृष्टि के प्रति
मन में करुणा पले
यह दीपोत्सव
आप सभी को फले!


*-हूबनाथ*

शुभ दीपावली


अंधेरे ने ख़रीदे
बेशुमार दिये मिट्टी के
ख़रीदे तालाब तेल के
रूइयों के गट्ठर के गट्ठर
सजाए दिये की पाँत पर पाँत

बेतहाशा बरसती
रौशनी के ठीक नीचे
जगमगाए दिये मिट्टी के
हज़ारों वॉट बत्तियों तले
कँपकँपाए  दिये अदने से

पहर भर रात के आँचल में
बेहोश लुढ़के दिये
रोशनी की झालरों तले
अपनी बेचारगी में 
असहाय पड़े 

बिलकुल वैसे ही
जैसे इन्हें गढ़नेवाले 
तेल उगानेवाले
रूई बीनने और धुननेवाले
बेबस हाथ 
अपने घुटने मसलकर
उठने की कोशिश कर रहे 

सुबह होते ही
इन्हें बुहारकर 
महरिन फेंक आएगी 
घूरे पर

दियों के दाग़ धब्बे
धो पोंछ दिए जाएँगे
ख़ूबसूरत चौखट से

और ज़िंदगी खो जाएगी
बिजलियों की चकाचौंध में

किंतु कुछ दिये नहीं उठेंगे
उनमें न तेल बची न बाती
बची है तो सिर्फ़ ज़िद
ग़ुस्से की थरथराती
 अदृश्य लौ

अंधेरे के विरुद्ध नहीं
बिकी रौशनी के ख़िलाफ़
उस मशालची के ख़िलाफ़
जिसने तेल की नहरों में
पानी भर दिए

उस मुंसिफ़ के ख़िलाफ़
जिसका घर बंधक है 
अंधेरों की चौखट


रौशनी से महरूम 
ये अदने से दिये
कभी जले न जलें
इन्हें ग़म नहीं
पर ये भी कम नहीं 
कि निर्लज्ज रौशनी के
क्रूर  साम्राज्य में
ये आज भी बिकाऊ नहीं !


*-हूबनाथ*

दिवाली इन गरीब बच्चों के!

दिवाली इन गरीब बच्चों के!

पटाखो कि दुकान से दूर हाथों मे,..कुछ सिक्के गिनते मैने उसे देखा...

..एक गरीब बच्चे कि आखों मे,..मैने दिवाली को मरते देखा..

.थी चाह उसे भी नए कपडे पहनने की.....

पर उन्ही पूराने कपडो को मैने उसे साफ करते देखा.

..हम करते है सदा अपने ग़मो कि नुमाईश.....

उसे चूप-चाप ग़मो को पीते देखा...

जब मैने कहा, "बच्चे, क्या चहिये तुम्हे"?.

.तो उसे चुप-चाप मुस्कुरा कर "ना" मे सिर हिलाते देखा..

.थी वह उम्र बहुत छोटी अभी...पर उसके अंदर मैने ज़मीर को पलते देखा.

.रात को सारे शहर कि दीपो कि लौ मे...

..मैने उसके हसते, मगर बेबस चेहरें को देखा...

हम तो जीन्दा है अभी शान से यहा...

पर उसे जीते जी शान से मरते देखा...

लोग कहते है, त्योहार होते है जिंदगी मे खूशीयो के लिए,..

तो क्यो मैने उसे मन ही मन मे घूटते और तरस्ते देखा?...

आओ अबके दिवाली इन गरीब बच्चों के साथ मनाये करके देखे अच्छा लगेगा 
विनीत- दिव्यांशु सिंह परिहार
मो० 8858192246

नज़ीर अकबराबादी की शायरी में दीवाली

नज़ीर अकबराबादी की शायरी में हिन्दुस्तानी रंग तहज़ीब बहुत नुमायां तरीक़े से देखने को मिलती है। 
चिराग़ जलते हैं, और चिराग़ तमसीली तौर पर बुराई के मुक़ाबले जीत का नाम है।
लफ़्ज़ दीवाली संस्कृत के दीपावली से बनी है।
इस के माना होते हैं चराग़ों के क़त्तार के। 
नज़ीर अकबराबादी __ ने दीवाली की कितनी प्यारी तस्वीर खींची है । 
उनके  कुछ अशआर आपके नज़र कर रही हूँ
                          🪔🪔
1_हर एक मकाँ में जला फिर दिया दिवाली का
हर इक तरफ़ को उजाला हुआ दिवाली का
सभी के दिल में समां भा गया दिवाली का
किसी के दिल को मज़ा ख़ुश लगा दिवाली का। 
             ✨✨🪔✨✨
2_दोस्तो क्या-क्या दिवाली में निशात-ओ-ऐश है
सब मुहय्या है जो इस हंगाम के शायान है। 
                फ़िर कहते हैं 
 3_गर्म-जोशी अपनी बा जाम चिराग़ां लुत्फ़ से
क्या ही रोशन कर रही है हर तरफ़ रोग़न की है। 
                🪔🪔🪔🪔🪔
नज़ीर अकबराबादी को जश्न-ए-ज़िंदगी के बड़े शायर कह सकते हैं। उनके शायरी का रिश्ता कल्चर से बहुत मज़बूत था। 
वह आगे कहते हैं 

4_जहां में ये जो दीवाली की सैर होती है
तो ज़र से होती है और ज़र बग़ैर होती है।
              ✨✨🪔✨✨
 5_दिवाली आई है सब दिया दिलाएंगे ए यार
 ख़ुदा के फ़ज़ल से है आसरा दिवाली का।

                                 💖💖🙏🏻🙏🏻

दीवाली पर शायरी

आइये *दीवाली* पर तोहफ़े ठीक से छाँटे, ...... इस बार *मिठाई* नहीं, भरपूर *मिठास* बाँटे 😍

चलो मिलकर इस बार दीवाली ऐसे मनायें,  ....... *दिये* तो जलायें पर, *दिल* ना जलायें✍🏻

नये दिये जलाने से *बेहतर* हैं, ....... जो *दिये* बुझ रहे हैं, उन्हे बचायें🤟🏻

*रोशनी* करने का ढंग बदलना होगा,  ....... *दिया* जलाकर नही  ,,, *दिया बनकर*  जलना होगा☺️

आप सभी को दीवाली की अनन्त शुभकामनायें!

Wednesday, 27 October 2021

टीपू सुल्तान और उनका सपना....



टीपू सुलतान ने अपने सपनों और उन सपनों की व्याख्या करते हुए एक किताब लिखी थी. इसमें कुल 37 सपनों और उसकी व्याख्या का वर्णन है. बाद में इसी किताब पर गिरीश कर्नाड ने एक नाटक भी लिखा-'टीपू सुल्तान का सपना'.
अंग्रेजों को पूरी तरह से भारत से निकाल बाहर करना, और भारत को आत्मनिर्भर बनाना टीपू सुल्तान के सपनों का स्थाई भाव था.
बहुतों के अनुसार टीपू सुलतान का यह सपना 1947 में पूरा हो गया. लेकिन देश में ऐसे लोग भी है, जिनका मानना है कि टीपू सुलतान का वो सपना अभी पूरा नहीं हुआ है. अभी भी भारत नए तरीके से अंग्रेजों (साम्राज्यवादियों) का गुलाम बना हुआ है. भारत को आत्मनिर्भर बनाने का काम अभी बाकी है. ऐसे ही एक नौजवान का नाम है- 'मुस्तफा कमाल' उर्फ़ टीपू सुलतान. 12 अक्टूबर को जब शान्तिनिकेतन [जिला बीरभूमि, बंगाल] से 'टीपू सुलतान' को गिरफ़्तार किया गया और उन पर देशद्रोह और माओवादियों से सम्बन्ध रखने का आरोप लगाया गया तो अचानक से 'टीपू सुलतान का सपना' फिर से जाग गया. 
टीपू सुल्तान के सपनों से आतंकित कर्नाटक की भाजपा सरकार ने टीपू सुलतान को पाठ्यक्रम से बाहर निकाल दिया है और टीपू सुलतान को मुस्लिम कट्टरपंथी और हिन्दुओं का कत्लेआम करने वाला बताकर 'टीपू सुलतान' पर उसी तरह हमला शुरू कर दिया है, जैसे उस वक़्त अंग्रेजों ने टीपू सुल्तान को बदनाम करने और हिन्दू मुस्लिम बंटवारा करने की नीयत से उस पर हमला बोला था. मजेदार बात यह है कि टीपू सुल्तान के खिलाफ उस वक़्त के अंग्रेजों और आज के भाजपा की शब्दावली भी हूबहू एक जैसी है. कर्नाटक में व अन्य जगहों पर एक एक करके टीपू सुल्तान का नाम मिटाया जा रहा है. मानो नाम मिटाने से उनका सपना भी मिट जाएगा.
टीपू सुल्तान के इतिहास में योगदान पर जाने से पहले आइये देखते हैं कि भाजपा के चहेते अबुल कलाम आज़ाद टीपू सुलतान के बारे में क्या कहते हैं- ''नासा में लगी एक पेंटिंग ने मेरा ध्यान आकर्षित किया, क्योंकि पेंटिंग में जो सैनिक रॉकेट दाग रहे थे वे गोरे नहीं थे, बल्कि दक्षिण एशिया के लग रहे थे. तब मुझे पता चला कि यह टीपू सुलतान की सेना है, जो अंग्रेजों के ख़िलाफ़ लड़ रही है. पेंटिंग में जो तथ्य दिखाया गया है, उसे टीपू के देश में ही भुला दिया गया है, लेकिन सात समुंदर पार यहाँ इसका जश्न मनाया जा रहा है.'' [The Wings of Fire]
दरअसल टीपू सुलतान वह पहला व्यक्ति था जिसने रॉकेट-मिसाइल के लिए 'मेटल' का इस्तेमाल किया था. उस वक़्त रॉकेट-मिसाइल के लिए बांस के बम्बू का इस्तेमाल किया जाता था. 'मेटल' के इस्तेमाल से रॉकेट-मिसाइल की रेंज करीब 2 किमी तक हो गयी थी. 1780 में हुए अंग्रेज-मैसूर युद्ध में इसी रॉकेट के कारण अंग्रेजों की बुरी तरह हार हुई थी. कहते है कि बाद में इसी रॉकेट टेक्नोलॉजी को अपनाकर और इसे और विकसित करके अंग्रेजों ने वाटरलू की निर्णायक लड़ाई (1815) में नेपोलियन को हराया था. भारत की अपनी एक महत्वपूर्ण तकनीक अंग्रेजों के हाथ में चली गयी, क्योकि तब पेटेंट क़ानून लागू नहीं था. टीपू सुलतान के मरने के बाद उसके किले से अंग्रेजों को 700 से ज्यादा रॉकेट-मिसाइल मिले.
DRDO [Defence Research and Development Organisation] के शिवथानु पिल्लई [Sivathanu Pillai] ने तमाम शोध के बाद माना कि रॉकेट-मिसाइल टेक्नोलॉजी की जन्मस्थली टीपू का मैसूर राज्य ही है. उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति अबुल कलाम आज़ाद से मांग की कि सेमीनार व अन्य कार्यक्रमों के माध्यम से इस बात को देश के सामने स्थापित किया जाय.
तत्कालीन माओवादी पार्टी के कर्नाटक राज्य सचिव 'साकेत राजन' ने 1998 और 2004 में क्रमशः दो भागों में 'पीपल्स हिस्ट्री ऑफ़ कर्नाटक' लिखी थी, जिसे आज कई विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है. इस किताब की गौरी लंकेश सहित तमाम बुद्धिजीवियों ने भूरि भूरि तारीफ़ की है.
इस किताब में साकेत राजन ने तथ्यों के साथ साबित किया है कि हैदर अली और टीपू सुलतान विशेषकर टीपू सुलतान ने किस तरह अपने राज्य में  तमाम राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक सुधारों के माध्यम से एक स्वस्थ और ऐतिहासिक रूप से प्रगतिशील पूंजीवाद की नींव रखने का प्रयास किया था, जिसे बाद में अंग्रेज़ उपनिवेशवादियों के साथ मिलकर उच्च जाति की सामंती ताकतों ने कुचल दिया और भारत में अर्ध सामंती-अर्ध औपनिवेशिक उत्पादन संबंधों की नीव पड़ी, जिसकी सड़ांध आज 200 साल बाद भी जीवन के प्रत्येक पहलू में रची बसी है.
टीपू सुलतान ने जब केरल के मालाबार क्षेत्र को अपने राज्य में मिलाया तो उस वक़्त वहां पर निचली जाति की गरीब महिलाओं को अपना स्तन ढकने की आज़ादी नहीं थी. और इसे ढकने के लिए उनसे टैक्स माँगा जाता था, जिसे 'स्तन टैक्स' कहते थे. टीपू सुलतान ने एक ही झटके में इस प्रथा पर प्रतिबन्ध लगा दिया.
टीपू सुलतान भूमि-सुधार करने वाला शायद पहला आधुनिक राजा था. टीपू ने जो जमीन जोतता था, उसे ही जमीन का मालिक बनाया और लगान के लिए सीधे राज्य के साथ उनका रिश्ता कायम कर दिया. जमींदारों (palegars) का प्रभुत्व समाप्त कर दिया गया. गरीबों-दलितों को बड़े पैमाने पर ज़मीन बाटी गयी. उस समय के 'भूमि-रिकॉर्ड' आज भी इसकी गवाही देते है. टीपू सुलतान के समय कुल 40 प्रतिशत ज़मीन सिंचित थी. बंधुवा मजदूरी और किसी भी तरह की गुलामी प्रथा पर उसने पूर्ण पाबन्दी लगा दी.
जमींदारों का प्रभाव ख़त्म होने और केंद्रीकृत राज्य मशीनरी के अस्तित्व में आने के कारण व्यापारिक-पूंजीवाद तेजी से फ़ैलने लगा. अंग्रेजी सामानों पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगा दिया गया. इससे राजस्थान के मारवाड़ी, गुजरात के बनिया और गोवा कर्नाटक की सारस्वत ब्राह्मण जैसी जातियां टीपू सुलतान से नाराज़ हो गयी, क्योंकि यही जातियां अंग्रेजी सामानों के व्यापार में लगीं थी. फलस्वरूप इन्होंने ही अंग्रेजों के साथ मिलकर टीपू सुलतान के खिलाफ षड्यंत्र को अंजाम दिया.
इस सुधार के फलस्वरूप वहां की शूद्र जाति  'बानिजगा' [Banijaga]  व्यापार में आगे बढ़ पाई और अंग्रेजों के ख़िलाफ़ लड़ाई में यह व्यापारी जाति पूरी तरह टीपू सुलतान के साथ खड़ी थी. यदि टीपू सुल्तान नहीं हारता तो यह जाति/वर्ग भावी राष्ट्रीय पूंजीपति वर्ग के रूप में निश्चित तौर पर उभरता.
टीपू सुल्तान के इसी तरह के सुधारों के कारण उच्च प्रतिक्रियावादी जातियां टीपू सुलतान से नाराज़ हो गयी और अंग्रेजों से जा मिली. टीपू सुल्तान के हारने का यह भी एक  कारण बना.
दरअसल टीपू सुलतान के समय राज्य ही सबसे बड़े 'पूँजीपति' के रूप में उभर कर सामने आया और टीपू सुलतान के प्रयासों से सिल्क, सूती कपड़ा, लौह, स्टील चीनी आदि का उत्पादन श्रम विभाजन और मजदूर आधारित यानी पूंजीवादी तरीके से हो रहा था. नहर, सड़क आदि का काम बड़े पैमाने पर राज्य ने अपने हाथ में लिया हुआ था और शुद्ध मजदूरी देकर लोगों से काम करवाया गया. कारीगरों और किसानों को अनेक तरह से राज्य ने मदद की.
इसके अलावा हथियार बनाने के भी समृद्ध उद्योग थे. डबल बैरेल पिस्टल टीपू सुलतान के समय की ही देन थी.
इस वक़्त लगभग 21 प्रतिशत जनसँख्या शहरी थी. जो पूंजीवादी नगरीकरण का संकेत है.
टीपू सुलतान ने अपने राज्य में पूर्ण शराब बंदी कर रखी थी. जनता की बेहतरी के प्रति टीपू की प्रतिबद्धता टीपू के इस पत्र में दिखती है जो उसने अपने एक अधिकारी मीर सदक [Mir Sadaq] को 1787 में लिखा था-''पूर्ण शराबबंदी मेरी दिली इच्छा है. यह सिर्फ धर्म का मामला नहीं है. हमे अपनी जनता की आर्थिक खुशहाली और उसकी नैतिक उचाई के बारे में सोचना चाहिए. हमे युवाओं के चरित्र का निर्माण करने की जरूरत है. मुझे  तात्कालिक वित्तीय नुकसान के बारे में पता है. लेकिन हमे आगे देखना है. हमारे राजस्व को हुआ नुक्सान जनता की शारीरिक और नैतिक खुशहाली से बड़ा नहीं है.''
फ्रांसीसी क्रांति का भी टीपू सुल्तान पर काफ़ी असर था. इसके पहले उसने 'रूसो', 'वाल्टेयर' जैसे लोगों को भी पढ़ रखा था.  कहते हैं कि उसने फ्रांसीसी क्रांति की याद में एक पौधा भी लगाया था. साकेत राजन तो अपनी उपरोक्त किताब में यहां तक दावा करते हैं कि उस वक़्त मैसूर राज्य में एक 'जकोबिन क्लब' ('जैकोबिन' फ्रेंच क्रांतिकारियों को बोलते थे) भी हुआ करता था. टीपू सुल्तान भी इस क्लब का सदस्य था. फ्रेंच सरकार को लिखे पत्र में टीपू सुल्तान अपने को टीपू सुल्तान 'सिटीजन' के रूप में दस्तखत करते हैं. 
टीपू सुल्तान आयुर्वेद-यूनानी और एलोपैथी को मिलाकर एक चिकित्सा पद्धति विकसित करने का प्रयास कर रहा था. सर्जरी में भी उसकी रुचि थी. टीपू को हराने के बाद श्रीरंगपट्टनम मे अंग्रेजों को एक अत्याधुनिक (उस समय के हिसाब से) अस्पताल मिला था, जिसे देखकर वो दंग रह गए थे.
टीपू सुल्तान के समकालीनों ने साफ साफ लिखा है कि टीपू सुल्तान सामंती शानो-शौकत से कोसो दूर था और बहुत सादा जीवन गुज़ारता था.
टीपू सुल्तान का यह पहलू उन सब को दिखाई देता है जो इतिहास का सिंहावलोकन करते हैं। लेकिन इतिहास का मुर्गावलोकन करने वालों को सिर्फ यह दिखाई देता है कि टीपू सुल्तान एक मुस्लिम था, इसलिए कट्टर था और इसलिए हिन्दू-विरोधी था.
'पीपुल्स हिस्ट्री ऑफ कर्नाटक' में टीपू पर विस्तार से लिखने के बाद साकेत राजन निष्कर्ष रूप में टीपू सुल्तान पर  महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हैं- 
''वह पहला और दुर्भाग्य से अंतिम व्यक्ति था जिसे उभरते भारतीय बुर्जुवाजी ने प्रस्तुत किया था. यूरोपीय रेनेसां की भावना का वह एक चमकीला उदाहरण था.''
#मनीष आज़ाद

१९५३ में स्टालिन की शव यात्रा पर उमड़ा सैलाब 

*On this day in 1953, a sea of humanity thronged the streets for Stalin's funeral procession.* Joseph Stalin, the Soviet Union's fea...