Wednesday, 3 November 2021

दो साल पुरानी पोस्ट... शायरी के कद्रदान दोस्तों के लिए रिपीट टेलीकास्ट....

दो साल पुरानी पोस्ट... शायरी के कद्रदान दोस्तों के लिए रिपीट टेलीकास्ट....
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कई बार हम कोई ऐसा शेर सुनते हैं जो बहुत मशहूर होता है पर हम उसके शायर के नाम से अनजान होते हैं.. यहां तक कि कई शेर ऐसे हैं जिनके शायर उस इकलौते शेर की वजह से मशहूर हुए.. ऐसे शेरों को मिसाली शेर बोला जाता है.. मतलब आम बातचीत में भी मिसाल देने के लिए ये शेर खूब इस्तेमाल किए जाते हैं... कुछ शेर - शायरों के नाम के साथ - मुलाहिजा फरमाइए.....

1) आगाह अपनी मौत से कोई बशर नहीं 
सामान सौ बरस का पल की खबर नहीं 

-----हैरत इलाहाबादी

2) ज़िन्दगी जिंदादिली का नाम है 
मुर्दा दिल ख़ाक जिया करते हैं 

----नासिख लखनवी

3) बड़े गौर से सुन रहा था जमाना
तुम्ही सो गये दास्ताँ कहते कहते

----साक़िब लखनवी 

4) कुछ तो होते हैं मुहब्बत में जुनूं के आसार 
और कुछ लोग भी दीवाना बना देते हैं 

----ज़हीर दहलवी

5) करीब है यारो रोज़े-महशर, छुपेगा कुश्तों का खून क्योंकर 
जो चुप रहेगी ज़ुबाने–खन्जर, लहू पुकारेगा आस्तीं का

रोज़े-महशर = प्रलय का दिन 

----(अमीर मीनाई)

6) कैस जंगल में अकेला है मुझे जाने दो 
खूब गुज़रेगी जो मिल बैठेंगे दीवाने दो 

(कैस = मजनू)

----- मियांदाद सय्याह (मिर्ज़ा ग़ालिब के शागिर्द)

7) हम तालिबे-शोहरत हैं हमें नंग से क्या काम 
बदनाम अगर होंगे तो क्या नाम न होगा

---- नवाब मुहम्मद मुस्तफा खान शेफ़्ता

8) खंजर चले किसी पे तड़पते हैं हम अमीर 
सारे जहां का दर्द हमारे जिगर में है

---- अमीर मीनाई

9) उम्र सारी तो कटी इश्के-बुतां में मोमिन
आख़िरी वक़्त में क्या ख़ाक मुसलमां होंगे 

---- हकीम मोमिन खां मोमिन

10) हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम 
वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता 

----- अकबर इलाहाबादी

11) लोग टूट जाते हैं एक घर के बनाने में, 
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में. 

----- बशीर बद्र

12 ) कौन कहता है कि मौत आई तो मर जाऊँगा, 
मैं तो दरिया हूँ समन्दर में उतर जाऊँगा. 

----- अहमद नदीम क़ासमी

13) ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले,
ख़ुदा बन्दे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है.

---- इकबाल

14) चल साथ कि हसरतें दिल-ए-मरहूम से निकले 
आशिक का जनाज़ा है, ज़रा धूम से निकले 

------ मो.अली फिदवी

15 ) नाज़ुक खयालियाँ मिरी तोड़ें उदू का दिल
मैं वो बला हूँ शीशे से पत्थर को तोड़ दूं 

(उदू = दुश्मन)

---- ज़ौक

16) ये इश्क नहीं आसां, बस इतना समझ लीजै 
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है 

--------------- जिगर मुरादाबादी

17 ) यहां लिबास की कीमत हैं आदमी की नहीं
मुझे गिलास बड़ा दे, शराब कम कर दे

---- बशीर बद्र.

18 ) बर्बाद गुलिस्तां करने को बस एक ही उल्लू काफी था 
हर शाख पे उल्लू बैठें हैं अंजाम ऐ गुलिस्तां क्या होगा

----- रियासत हुसैन रिजवी उर्फ 'शौक बहराइची'

19) हज़ारों ख्वाहिशे ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमां लेकिन फिर भी कम निकले

----------- मिर्ज़ा ग़ालिब.

और...

20) कुछ ना कहने से भी छिन जाता हैं ऐजाजे सुखन
जुल्म सहने से भी जालिम की मदद होती हैं..

------ मुजफ्फर वारसी.

इस लिस्ट में आप लोग भी इजाफा कर सकते हैं..

अंत में, शायरी के कद्रदानों के लिए एक सवाल.... क्या कोई बता सकता हैं कि ये शेर किस जनाब का लिखा है...???

सर पर चढ़कर बोल रहे हैं, पौधे जैसे लोग,
पेड़ बने खामोश खड़े हैं, कैसे-कैसे लोग.....

कमैंट्स:

कुछ इस तरह से मुझसे सौदा किया मेरे वक़्त ने..
तुजुर्बे देकर वो मुझ से मेरी नादानियां ले गया...

ये इश्क नहीं आसां, बस इतना समझ लीजै 
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है ! 
शायद जिगर मोरदाबादी का शेर है।

आसमां अपनी बुलंदी पे जो इतराता है
भूल जाता है जमीं से ही नज़र आता है
                    ~~वसीम बरेलवी~~

वो मोत भी क्या सुहानी होगी
वो मोत भी क्या सुहानी होगी 

सुन बेवफा 

जो तेरी याद में आनी होगी ।।।।

तुझे पा लेने में वो बेताब कैफियत कहाँ..
जिंदगी वो है जो तेरी जुस्तजू में कट जाए...!!

ठान लिया था कि अब और शायरी नहीं लिखेंगे,
पर उनका पल्लू गिरा देखा और अल्फ़ाज़ बग़ावत कर बैठे..

परखना मत, परखने में कोई अपना नहीं रहता
किसी भी आईने में देर तक चेहरा नहीं रहता
बडे लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना
जहां दरिया समन्दर में मिले, दरिया नहीं रहता   -बशीर बद्र


त्‍योहारों के बारे में कुछ विचार कात्‍यायनी


त्‍योहारों का जन्‍म कृषि-आधारित पुरातन समाजों में फसलों की बुवाई और कटाई के मौसमों पर आधारित था। ये सामूहिक जन-उल्‍लास के संस्‍थाबद्ध रूप थे। जादुई विश्‍वदृष्टिकोण और प्राकृतिक शक्तियों के अभ्‍यर्थना के आदिम काल में इन त्‍योहारों के साथ टोटकों की कुछ सामूहिक क्रियाऍं जुड़ी हुई थीं। फिर संस्‍थाबद्ध धर्मों ने शासकवर्गों के हितों के अनुरूप इन त्‍योहारों का पुन:संस्‍कार और पुनर्गठन किया और इनके साथ तरह-तरह की धार्मिक मिथकीय कथाऍं और अनुष्‍ठान जोड़ दिये गये। इसके बावजूद प्राक् पूँजीवादी समाजों में आम उत्‍पादक जन समुदाय इन त्‍योहारी उत्‍सवों को काफी हद तक अपने ढंग से मनाता रहा। त्‍योहार आम उत्‍पीडि़तों के लिए काफी हद तक सामूहिकता का जश्‍न बने रहे। जिन्‍दगी भर उत्‍पीड़न का बोझ ढोने वाले लोग कम से कम एक दिन कुछ खुश हो लेते थे, कुछ गा-बजा और नाच लेते थे।
लेकिन पूँजी की चुड़ैल ने आम लोगों के जीवन का यह रस भी चूस लिया। जीवन में हर चीज माल में तब्‍दील हो गयी और सबकुछ बाजार के मातहत हो गया। होली-दिवाली-दशहरा---- सभी त्‍योहार समाज में अमीरों के लिए 'स्‍टेटस सिंबल' बनकर रह गये हैं। जिसकी गॉंठ में जितना पैसा, उसका त्‍योहार उतना ही रौशन और रंगीन। आम लोगों के लिए तो त्‍योहार बस भीषण तनाव ही लेकर आते हैं। थोड़े दिये जला लेने और पटाखे फोड़ लेने या थोड़ा अबीर-गुलाल लगा लेने और गुझिया खा लेने की बच्‍चों की चाहत पूरा करने में और थोड़ी बहुत सामाजिक औपचारिकताऍं पूरी करने के दबाव में गरीब मेहनतकशों और निम्‍न मध्‍यवर्ग के लोगों का सारा कसबल निकल जाता है। जो अमीर लोग त्‍योहार जोर-शोर से मनाते हैं, उन्‍हें भी सारी खुशी वास्‍तव में अपनी दौलत की नंगी नुमाइश से ही मिलती है। पूँजीवादी समाज में श्रम-विभाजन से पैदा होने वाले सर्वग्रासी अलगाव (एलियनेशन) ने सामूहिकता की भावना को विघटित करके उत्‍सवों के प्राणरस को ही सोख लिया है। अलगाव के शिकार केवल उत्‍पादक मेहनतकश ही नहीं हैं, बल्कि उससे भी अधिक परजीवी समृद्धशाली तबके हैं। जो पूँजी को लगाम लगाकर सवारी करना चाहते हैं, उल्‍टे पूँजी उन्‍ही की पीठ पर सवार होकर उनकी सवारी करने लगती है। एक सामाजिक प्राणी के रूप में खुशी मनुष्‍य को केवल सामूहिक रूप से मिलती है। सामूहिकता से वंचित दौलतमंद परजीवी एक शा‍पि‍त मनुष्‍य होता है जो केवल अपनी दौलत-हैसियत के प्रदर्शन से खुशी पाने की मिथ्‍याभासी चेतना का शिकार होता है या फिर एक ऐसा '' सभ्‍य पशु'' होता है जो तरह-तरह से खा-पीकर, तरह-तरह से यौन क्षुधा को तुष्‍ट करके और रुग्‍ण फन्‍तासियों में जीकर खुश होने की आदत डाल लेता है।
आम जनता के लिए त्‍योहारों की अप्रासंगिकता का एक और ऐतिहासिक कारण है। ज्‍यादातर त्‍योहार कृषि-उत्‍पादन की प्रधानता के युग के त्‍योहार हैं। कारखाना-उत्‍पादन की प्रधानता और कृषि-उत्‍पादन के मशीनीकरण तथा फसलों के बदलते मौसम, पैटर्न और व्‍यवसायीकरण के युग में इन त्‍योहारों के आनन्‍द का मूल स्रोत सूख चुका है। पश्चिमी देशों में 'पुनर्जागरण-प्रबोधन-जनवादी क्रान्ति' की प्रक्रिया में जब पूँजीवाद आया तो उसने सामूहिक नृत्‍य, सामूहिक संगीत (ऑपेरा,बैले, सिम्‍फनी संगीत के कंसर्ट आदि), आधुनिक नाटक आदि के साथ सामूहिक जश्‍न के तमाम रूप विकसित किये तथा कुछ प्राचीन एवं मध्‍ययुगीन त्‍योहारों का भी पुन:संस्‍कार करके उनके धार्मिक अनुष्‍ठान वाले पक्ष को गौण बना दिया और सामूहिक उत्‍सव के पहलू को प्रधान बना दिया। हालॉंकि उन पश्चिमी समाजों में भी बढ़ती पूँजीवादी रुग्‍णताओं ने सामूहिकता के उत्‍सवों की आत्‍मा को मरणासन्‍न बना दिया है। फिर भी उन समाजों के सामाजिक ताने-बाने में इतने जनवादी मूल्‍य रचे-बसे हैं कि स्‍त्री-पुरुष खास मौकों पर फिर भी सड़कों पर निकलकर गा-बजा-नाच लेते हैं, खाते और पीते हैं।
भारत जैसे उत्‍तर-औपनिवेशिक समाज में पूँजीवाद भी जनवादी क्रान्ति के रास्‍ते नहीं, बल्कि एक क्रमिक प्रक्रिया से आया। इन जन्‍मना रुग्‍ण-विकलांग पूँजीवाद ने जनता को सामूहिकता के उत्‍सव को कोई भी नया रूप नहीं दिया ---- न तो सामूहिक जीवन में, न ही कला में। पुराने मध्‍ययुगीन धार्मिक आयोजनों को ही थोड़ा संशोधित-परिष्‍कृत करके अपना लिया गया, जिनका एक धार्मिक पहलू था, दूसरा पूँजीवादी दिखावे और बाजार का पहलू था। त्‍योहारों के इस धार्मिक पहलू का इस्‍तेमाल राष्‍ट्रीय आन्‍दोलन के जमाने में रूढि़वादी और पुनरुत्‍थानवादी राष्‍ट्रवादियों ने किया और आज इनका इस्‍तेमाल मुख्‍यत: धार्मिक कट्टरपंथी फासिस्‍ट कर रहें हैं। त्‍योहारों के पूँजीवादी सामाजिक आचार वाला पहलू नवउदारवाद के दशकों के दौरान हमारे सामाजिक जीवन के पूरे वितान पर छा गया है और रंध्र-रंध्र में घुस गया है।
अब पुराने त्‍योहारों का पुन:संस्‍कार करके उन्‍हें सामूहिकता के ऊर्जस्‍वी-आवेगमय, आनन्‍दोल्‍लास से भरपूर उत्‍सवों में रूपान्‍तरित कर पाना सम्‍भव नहीं रह गया है। मजदूर वर्ग के हरावलों को वर्गसंघर्ष के प्रबल वेगवाही झंझावात का फिर से आवाहन करते हुए सचेतन तौर पर सामूहिकता के जश्‍न के अपने नये-नये रूप ठीक उसी प्रकार ईजाद करने होंगे, जिसप्रकार उन्‍हें सर्वहारावर्गीय सामूहिक वाद्य संगीत, स्‍वर संगीत (केवल लोक‍प्रि‍य ही नहीं बल्कि शास्‍त्रीय भी), थियेटर,सिनेमा आदि के नये-नये रूपों का संधान करना होगा। वर्ग संघर्ष का रूप आज लम्‍बे समय तक जारी रहने वाले अवस्थितिगत युद्ध ('पो‍जीशनल वारफेयर') का हो चुका है। इस 'पोजीशनल वारफेयर' के दौरान शत्रु ने अपनी खंदके खोद रखी हैं और हमें भी अपनी खंदकें खोदनी होंगी और बंकर बनाने होंगे। यानी हमें भी अपनी समांतर संस्‍थाऍं विकसित करनी होगी, सामूहिक सांस्‍कृतिक-सामाजिक आयोजनों, उत्‍सवों के वैकल्‍िपक रूप विकसित करने होंगे। यह प्रक्रिया तृणमूल स्‍तर पर लोकसत्‍ता के वैकल्‍िपक रूपों के भ्रूणों के विकास से अविभाज्‍यत: जुड़ी हुई होगी। सर्वहारा के दूरदर्शी हरावलों को जनसमुदाय की पहलकदमी को संगठित करने के नानाविध प्रयासों के साथ-साथ अक्‍टूबर क्रान्ति दिवस, मई दिवस, भगतसिंह-राजगुरु-सुखदेव जैसे क्रान्तिकारियों के शहादत दिवस आदि-आदि अवसरों पर घिसे-‍ि‍पटे रु‍टीनी आयोजनों से आगे बढ़कर मेले, कार्निवाल, उत्‍सव, त्‍योहार के विविध नये-नये रूप विकसित करने चाहिए। सांस्‍कृतिक टोलियों को प्रचारात्‍मक लोक‍प्रि‍य प्रस्‍तुतियों और कार्यक्रमों के दायरों से बाहर आना होगा और स्‍टेज-कंसर्ट के साथ ही स्‍ट्रीट कंसर्ट के नये-नये रूप, थियेटर के नये-नये प्रयोग आदि विकसित करने होंगे।
संघर्षरत जीवन को भी सर्जनात्‍मकता का उत्‍प्रेरण चाहिए। उत्‍पीडि़त निराश लोगों को और विद्रोह के लिए उठ खड़े हुए लोगों को ---- दोनों के ही जीवन में मनोरंजन का, उत्‍सव का स्‍थान होना चाहिए। क्रान्तिकारी परिवर्तन चन्‍द दिनों का काम नहीं है। यह हू ब हू सामरिक युद्ध जैसा नहीं हो सकता। यह जीवन जैसा होता है। जीने का यह तरीका है। क्रान्ति में लगे लोगों के अपने उत्‍सव और कार्निवाल होने चाहिए और जिन्‍हे क्रान्ति की जरूरत है, उन 'धरती के अभागों' को भी यदि खुशी मनाने के लिए, सर्जनात्‍मक ऊर्जा हासिल करने के लिए, उम्‍मीदों की फिर से खोज के लिए प्रेरित करने के लिए, नये-नये भविष्‍य-स्‍वप्‍न देने के लिए सामूहिकता के नये-नये उत्‍सवों के, कार्निवालों के रूप नहीं विकसित किये जायेंगे, तो वे अतीत की सामूहिकता की पुनर्प्राप्ति की मृगमरीचिका में जीते रहेंगे, धार्मिक मिथ्‍याभासी चेतना को शरण्‍य बनाते रहेंगे और धार्मिक कट्टरपंथी आखेटकों और मुनाफाखोर परभक्षियों के आखेट बनते रहेंगे।

धन



धन वह नहीं
जो अंधी तिजोरियों में क़ैद
छटपटा रहा है
वह भी नहीं
जो बैंक पासबुकों में
इठला रहा है
संपत्ति के दस्तावेज़ों में
काले अक्षरों में दर्ज है
वह तो एक ख़ूबसूरत मर्ज़ है
जिसकी कोई दवा नहीं

धन तो लहलहाता है
खेतों में
हरहराता है नदियों में
उगता है पहाड़ों पर
जंगलों वनों बियाबानों में

धन को उगाता है विष्णु
धन को जगाता है विष्णु
धन को जिलाता है विष्णु
विष्णु
जो आठो पहर धधकता है
गगन में

ख़ुद को जलाकर
सब को जिलाता है
पिलाता है अमृत अहर्निश
धरती के समस्त जीवों को
अमृतस्वरूप विराजता है
सृष्टि के कण कण में

वही सिरजता है धन
सबके लिए
किसान के लिए श्रम
व्यवसायी को उद्यम
गुरु को सत्यनिष्ठा
शासक को धर्म
शिष्य को सत्यान्वेषण
सबके अपने अपने धन

धन को साधना पड़ता है
अपने भीतर के विष्णु को
जगाना पड़ता है
जलाना पड़ता है ख़ुद को
धधकते विष्णु की तरह

धूर्तता से उपजे धन
मात्र अंधकार के कण
डूबोते हैं अमावस के गर्त में
दो दिन बाद ही

आपका सार्थक धन
आपको मिले
भीतर का अंधकार जले
समस्त सृष्टि के प्रति
मन में करुणा पले
यह दीपोत्सव
आप सभी को फले!


*-हूबनाथ*

शुभ दीपावली


अंधेरे ने ख़रीदे
बेशुमार दिये मिट्टी के
ख़रीदे तालाब तेल के
रूइयों के गट्ठर के गट्ठर
सजाए दिये की पाँत पर पाँत

बेतहाशा बरसती
रौशनी के ठीक नीचे
जगमगाए दिये मिट्टी के
हज़ारों वॉट बत्तियों तले
कँपकँपाए  दिये अदने से

पहर भर रात के आँचल में
बेहोश लुढ़के दिये
रोशनी की झालरों तले
अपनी बेचारगी में 
असहाय पड़े 

बिलकुल वैसे ही
जैसे इन्हें गढ़नेवाले 
तेल उगानेवाले
रूई बीनने और धुननेवाले
बेबस हाथ 
अपने घुटने मसलकर
उठने की कोशिश कर रहे 

सुबह होते ही
इन्हें बुहारकर 
महरिन फेंक आएगी 
घूरे पर

दियों के दाग़ धब्बे
धो पोंछ दिए जाएँगे
ख़ूबसूरत चौखट से

और ज़िंदगी खो जाएगी
बिजलियों की चकाचौंध में

किंतु कुछ दिये नहीं उठेंगे
उनमें न तेल बची न बाती
बची है तो सिर्फ़ ज़िद
ग़ुस्से की थरथराती
 अदृश्य लौ

अंधेरे के विरुद्ध नहीं
बिकी रौशनी के ख़िलाफ़
उस मशालची के ख़िलाफ़
जिसने तेल की नहरों में
पानी भर दिए

उस मुंसिफ़ के ख़िलाफ़
जिसका घर बंधक है 
अंधेरों की चौखट


रौशनी से महरूम 
ये अदने से दिये
कभी जले न जलें
इन्हें ग़म नहीं
पर ये भी कम नहीं 
कि निर्लज्ज रौशनी के
क्रूर  साम्राज्य में
ये आज भी बिकाऊ नहीं !


*-हूबनाथ*

दिवाली इन गरीब बच्चों के!

दिवाली इन गरीब बच्चों के!

पटाखो कि दुकान से दूर हाथों मे,..कुछ सिक्के गिनते मैने उसे देखा...

..एक गरीब बच्चे कि आखों मे,..मैने दिवाली को मरते देखा..

.थी चाह उसे भी नए कपडे पहनने की.....

पर उन्ही पूराने कपडो को मैने उसे साफ करते देखा.

..हम करते है सदा अपने ग़मो कि नुमाईश.....

उसे चूप-चाप ग़मो को पीते देखा...

जब मैने कहा, "बच्चे, क्या चहिये तुम्हे"?.

.तो उसे चुप-चाप मुस्कुरा कर "ना" मे सिर हिलाते देखा..

.थी वह उम्र बहुत छोटी अभी...पर उसके अंदर मैने ज़मीर को पलते देखा.

.रात को सारे शहर कि दीपो कि लौ मे...

..मैने उसके हसते, मगर बेबस चेहरें को देखा...

हम तो जीन्दा है अभी शान से यहा...

पर उसे जीते जी शान से मरते देखा...

लोग कहते है, त्योहार होते है जिंदगी मे खूशीयो के लिए,..

तो क्यो मैने उसे मन ही मन मे घूटते और तरस्ते देखा?...

आओ अबके दिवाली इन गरीब बच्चों के साथ मनाये करके देखे अच्छा लगेगा 
विनीत- दिव्यांशु सिंह परिहार
मो० 8858192246

नज़ीर अकबराबादी की शायरी में दीवाली

नज़ीर अकबराबादी की शायरी में हिन्दुस्तानी रंग तहज़ीब बहुत नुमायां तरीक़े से देखने को मिलती है। 
चिराग़ जलते हैं, और चिराग़ तमसीली तौर पर बुराई के मुक़ाबले जीत का नाम है।
लफ़्ज़ दीवाली संस्कृत के दीपावली से बनी है।
इस के माना होते हैं चराग़ों के क़त्तार के। 
नज़ीर अकबराबादी __ ने दीवाली की कितनी प्यारी तस्वीर खींची है । 
उनके  कुछ अशआर आपके नज़र कर रही हूँ
                          🪔🪔
1_हर एक मकाँ में जला फिर दिया दिवाली का
हर इक तरफ़ को उजाला हुआ दिवाली का
सभी के दिल में समां भा गया दिवाली का
किसी के दिल को मज़ा ख़ुश लगा दिवाली का। 
             ✨✨🪔✨✨
2_दोस्तो क्या-क्या दिवाली में निशात-ओ-ऐश है
सब मुहय्या है जो इस हंगाम के शायान है। 
                फ़िर कहते हैं 
 3_गर्म-जोशी अपनी बा जाम चिराग़ां लुत्फ़ से
क्या ही रोशन कर रही है हर तरफ़ रोग़न की है। 
                🪔🪔🪔🪔🪔
नज़ीर अकबराबादी को जश्न-ए-ज़िंदगी के बड़े शायर कह सकते हैं। उनके शायरी का रिश्ता कल्चर से बहुत मज़बूत था। 
वह आगे कहते हैं 

4_जहां में ये जो दीवाली की सैर होती है
तो ज़र से होती है और ज़र बग़ैर होती है।
              ✨✨🪔✨✨
 5_दिवाली आई है सब दिया दिलाएंगे ए यार
 ख़ुदा के फ़ज़ल से है आसरा दिवाली का।

                                 💖💖🙏🏻🙏🏻

दीवाली पर शायरी

आइये *दीवाली* पर तोहफ़े ठीक से छाँटे, ...... इस बार *मिठाई* नहीं, भरपूर *मिठास* बाँटे 😍

चलो मिलकर इस बार दीवाली ऐसे मनायें,  ....... *दिये* तो जलायें पर, *दिल* ना जलायें✍🏻

नये दिये जलाने से *बेहतर* हैं, ....... जो *दिये* बुझ रहे हैं, उन्हे बचायें🤟🏻

*रोशनी* करने का ढंग बदलना होगा,  ....... *दिया* जलाकर नही  ,,, *दिया बनकर*  जलना होगा☺️

आप सभी को दीवाली की अनन्त शुभकामनायें!

१९५३ में स्टालिन की शव यात्रा पर उमड़ा सैलाब 

*On this day in 1953, a sea of humanity thronged the streets for Stalin's funeral procession.* Joseph Stalin, the Soviet Union's fea...