Wednesday, 3 November 2021

दो साल पुरानी पोस्ट... शायरी के कद्रदान दोस्तों के लिए रिपीट टेलीकास्ट....

दो साल पुरानी पोस्ट... शायरी के कद्रदान दोस्तों के लिए रिपीट टेलीकास्ट....
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कई बार हम कोई ऐसा शेर सुनते हैं जो बहुत मशहूर होता है पर हम उसके शायर के नाम से अनजान होते हैं.. यहां तक कि कई शेर ऐसे हैं जिनके शायर उस इकलौते शेर की वजह से मशहूर हुए.. ऐसे शेरों को मिसाली शेर बोला जाता है.. मतलब आम बातचीत में भी मिसाल देने के लिए ये शेर खूब इस्तेमाल किए जाते हैं... कुछ शेर - शायरों के नाम के साथ - मुलाहिजा फरमाइए.....

1) आगाह अपनी मौत से कोई बशर नहीं 
सामान सौ बरस का पल की खबर नहीं 

-----हैरत इलाहाबादी

2) ज़िन्दगी जिंदादिली का नाम है 
मुर्दा दिल ख़ाक जिया करते हैं 

----नासिख लखनवी

3) बड़े गौर से सुन रहा था जमाना
तुम्ही सो गये दास्ताँ कहते कहते

----साक़िब लखनवी 

4) कुछ तो होते हैं मुहब्बत में जुनूं के आसार 
और कुछ लोग भी दीवाना बना देते हैं 

----ज़हीर दहलवी

5) करीब है यारो रोज़े-महशर, छुपेगा कुश्तों का खून क्योंकर 
जो चुप रहेगी ज़ुबाने–खन्जर, लहू पुकारेगा आस्तीं का

रोज़े-महशर = प्रलय का दिन 

----(अमीर मीनाई)

6) कैस जंगल में अकेला है मुझे जाने दो 
खूब गुज़रेगी जो मिल बैठेंगे दीवाने दो 

(कैस = मजनू)

----- मियांदाद सय्याह (मिर्ज़ा ग़ालिब के शागिर्द)

7) हम तालिबे-शोहरत हैं हमें नंग से क्या काम 
बदनाम अगर होंगे तो क्या नाम न होगा

---- नवाब मुहम्मद मुस्तफा खान शेफ़्ता

8) खंजर चले किसी पे तड़पते हैं हम अमीर 
सारे जहां का दर्द हमारे जिगर में है

---- अमीर मीनाई

9) उम्र सारी तो कटी इश्के-बुतां में मोमिन
आख़िरी वक़्त में क्या ख़ाक मुसलमां होंगे 

---- हकीम मोमिन खां मोमिन

10) हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम 
वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता 

----- अकबर इलाहाबादी

11) लोग टूट जाते हैं एक घर के बनाने में, 
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में. 

----- बशीर बद्र

12 ) कौन कहता है कि मौत आई तो मर जाऊँगा, 
मैं तो दरिया हूँ समन्दर में उतर जाऊँगा. 

----- अहमद नदीम क़ासमी

13) ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले,
ख़ुदा बन्दे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है.

---- इकबाल

14) चल साथ कि हसरतें दिल-ए-मरहूम से निकले 
आशिक का जनाज़ा है, ज़रा धूम से निकले 

------ मो.अली फिदवी

15 ) नाज़ुक खयालियाँ मिरी तोड़ें उदू का दिल
मैं वो बला हूँ शीशे से पत्थर को तोड़ दूं 

(उदू = दुश्मन)

---- ज़ौक

16) ये इश्क नहीं आसां, बस इतना समझ लीजै 
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है 

--------------- जिगर मुरादाबादी

17 ) यहां लिबास की कीमत हैं आदमी की नहीं
मुझे गिलास बड़ा दे, शराब कम कर दे

---- बशीर बद्र.

18 ) बर्बाद गुलिस्तां करने को बस एक ही उल्लू काफी था 
हर शाख पे उल्लू बैठें हैं अंजाम ऐ गुलिस्तां क्या होगा

----- रियासत हुसैन रिजवी उर्फ 'शौक बहराइची'

19) हज़ारों ख्वाहिशे ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमां लेकिन फिर भी कम निकले

----------- मिर्ज़ा ग़ालिब.

और...

20) कुछ ना कहने से भी छिन जाता हैं ऐजाजे सुखन
जुल्म सहने से भी जालिम की मदद होती हैं..

------ मुजफ्फर वारसी.

इस लिस्ट में आप लोग भी इजाफा कर सकते हैं..

अंत में, शायरी के कद्रदानों के लिए एक सवाल.... क्या कोई बता सकता हैं कि ये शेर किस जनाब का लिखा है...???

सर पर चढ़कर बोल रहे हैं, पौधे जैसे लोग,
पेड़ बने खामोश खड़े हैं, कैसे-कैसे लोग.....

कमैंट्स:

कुछ इस तरह से मुझसे सौदा किया मेरे वक़्त ने..
तुजुर्बे देकर वो मुझ से मेरी नादानियां ले गया...

ये इश्क नहीं आसां, बस इतना समझ लीजै 
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है ! 
शायद जिगर मोरदाबादी का शेर है।

आसमां अपनी बुलंदी पे जो इतराता है
भूल जाता है जमीं से ही नज़र आता है
                    ~~वसीम बरेलवी~~

वो मोत भी क्या सुहानी होगी
वो मोत भी क्या सुहानी होगी 

सुन बेवफा 

जो तेरी याद में आनी होगी ।।।।

तुझे पा लेने में वो बेताब कैफियत कहाँ..
जिंदगी वो है जो तेरी जुस्तजू में कट जाए...!!

ठान लिया था कि अब और शायरी नहीं लिखेंगे,
पर उनका पल्लू गिरा देखा और अल्फ़ाज़ बग़ावत कर बैठे..

परखना मत, परखने में कोई अपना नहीं रहता
किसी भी आईने में देर तक चेहरा नहीं रहता
बडे लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना
जहां दरिया समन्दर में मिले, दरिया नहीं रहता   -बशीर बद्र


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