Saturday, 8 October 2022

अतिरिक्त मूल्य के सवाल पर सीमा आज़ाद

अतिकिरान्तिकारी (मूर्खवादी) अब कुत्सा प्रचार और गाली-गलौज पर उतर चुके हैं। जाहिर है कि जब तर्क चुक जाता है तो कुत्साप्रचार और झूठ के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता है। पिछले लम्बे समय से इनका इतिहास यह रहा है कि हर बहस में ये पूँछ उठाकर भाग खड़े होते हैं, कोई जवाब न दे पाने की सूरत में ये झूठे मनगढन्त आरोपों की बौछार कर देते हैं और ब्राह्मणवादी, साम्राज्यवाद के साथ गठजोड़ जैसे आरोपों की बौछार करते हैं। हम इनके इन वाहियात आरोपों का जवाब देना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं। हम सिर्फ़ उन बहसों की बात करते हैं, ताकि लोग खुद तर्क के आधार पर फैसला कर लें-

अतिरिक्त मूल्य के सवाल पर...

कार्ल मार्क्स के जन्मदिवस के अवसर पर दस्तक पत्रिका की सम्पादक सीमा आज़ाद ने अपने फ़ेसबुक वॉल पर दस्तक पत्रिका के मई-जून 2018 में प्रकाशित एक लेख साझा किया है। लेख में वैसे तो दार्शनिक स्तर पर और ऐतिहासिक भौतिकवादी दृष्टिकोण से देखने पर कई त्रुटियाँ और अस्पष्टताएँ हैं, लेकिन उन पर फ़िर कभी। फ़िलहाल इस लेख में राजनीतिक अर्थशास्त्र की जो समझदारी प्रस्तुत की गयी है उस पर कुछ बातें!

सीमा आज़ाद अपने लेख में लिखती हैं – "उन्होंने बताया कि पूंजीपति अपना मुनाफा अपने दिमाग या कारोबार में लगाई गयी पूंजी से नहीं कमाता है, बल्कि वह अपना मुनाफा मजदूरों के श्रम की चोरी से ही कमाता है। संक्षेप में इसे ऐसे समझा जा सकता है कि पूंजीवाद के आने के बाद नित नयी विकसित तकनीक वाली मशीनों के रूप में मनुष्य का श्रम पहले ही लग चुका होता है। मशीनें मनुष्य के श्रम का ही विकसित रूप है और कुछ नहीं। यानि यदि मनुष्य पहले यदि 8 घण्टे में 10 जोड़ी जूते बना लेता था, और आठ घण्टे का उस 200 रूपये मिलता था (जो कि हम फिलहाल मान लेते हैं, कि उसके पुनरूत्पादन पर लगने के लिए पर्याप्त हैं। अब नयी विकसित मशीनें, जो कि मजदूरों के श्रम का ही विकसित रूप है, के आ जाने पर वह 10 जोड़ी जूते 4 घण्टे में ही बना लेता है, लेकिन पूंजीपति अब भी उससे 8 घण्टे ही काम ले रहा है, और मजदूरी उतनी ही दे रहा है, या वो एक मजदूरी में दो मजदूर का काम करा रहा है। यानि श्रम के विकसित रूप में मशीनों के इस्तेमाल से एक मजदूर पहले 4 घण्टे में ही खुद को मिलने वाले मूल्य का श्रम कर ले रहा है, उसके आगे के 4 घण्टे जो वह श्रम कर रहा है, वह पूंजीपति द्वारा उसके श्रम की चोरी है और यही उसके मुनाफे का आधार है, न कि पूंजीपति की पूंजी।

दुनिया में हर पूंजी का आधार श्रम ही है और कुछ नहीं। इस रूप में दुनिया की मुख्य पूंजी प्रकृति के बाद श्रम है, एक पर कब्जा कर और दूसरे की चोरी कर पूंजीपति अपना मुनाफा बढ़ाता जाता है। इसे ही 'अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत' कहते हैं।"

सीमा आज़ाद को असल में अतिरिक्त मूल्य के सिद्धान्त की सामान्य जानकारी नहीं है। जिसको सीमा आज़ाद अतिरिक्त मूल्य कह रही हैं, वह असल में सापेक्षिक अतिरिक्त मूल्य है जो कि नयी मशीनरी के लगाने से पैदा होता है। जबकि सीमा आज़ाद के हिसाब से अतिरिक्त मूल्य नयी मशीन लगाने से पैदा होता है। सीमा आज़ाद के इस अनोखे मार्क्सवाद से यह बात निकलती है कि अगर पूँजीपति नयी मशीन न लगाये तो कोई अतिरिक्त मूल्य पैदा ही नहीं होगा। जबकि मार्क्स बताते हैं कि पूँजीवादी उत्पादन का मतलब ही यही होता है कि उसमें अतिरिक्त मूल्य पैदा हो रहा है। मार्क्स ने माल उत्पादन के दो रूपों की चर्चा की है। पहला : साधारण माल उत्पादन, जिसमें उत्पादन का मकसद उपभोग होता है, और दूसरा: विस्तारित माल उत्पादन, जो कि पूँजीवादी उत्पादन है। किसी भी पूँजीवादी उत्पादन में अतिरिक्त मूल्य का उत्पादन अनिवार्यतः होता ही है क्योंकि कोई भी पूँजीपति इसके बग़ैर पूँजी लगायेगा ही नहीं। अतिरिक्त मूल्य नयी या पुरानी मशीन से नहीं पैदा होता बल्कि मज़दूर की श्रमशक्ति के पुनरुत्पादन के लिए आवश्यक श्रमकाल और कुल श्रमकाल के अन्तर से पैदा होता है। नयी मशीन वास्तव में पूँजीवादी होड़ को बताती है, जिसमें पूँजीपति कुल श्रमकाल में से मज़दूर की श्रमशक्ति के पुनरुत्पादन के लिए आवश्यक श्रमकाल के हिस्से को कम कर देता है, जिससे किसी माल के उत्पादन के लिए आवश्यक श्रमकाल, सामाजिक रूप से आवश्यक औसत श्रमकाल से कम हो जाता है और उसे सापेक्ष अतिरिक्त मूल्य प्राप्त होता है।

दूसरे शब्दों में, पूँजीपति नयी मशीनरी लगाकर श्रम की उत्पादकता में वृद्धि कर देता है। इसके परिणामस्वरूप वह अतिरिक्त श्रमकाल जिसमें वह अतिरिक्त मूल्य उत्पादित करता था, वह पहले से बढ़ जाता और पूँजीपति को बढ़ा हुआ अतिरिक्त मूल्य मिलता है, जिसे मार्क्स सापेक्ष अतिरिक्त मूल्य (अतिरिक्त अतिरिक्त मूल्य) कहते हैं। पूँजीवादी होड़ इस अतिरिक्त अतिरिक्त मूल्य को बहुत अवधि तक बने नहीं रहने देता क्योंकि अन्य पूँजीपति भी नयी मशीनरी लगाकर अपने माल के उत्पादन के लिए आवश्यक श्रमकाल को उस पूँजीपति के माल के उत्पादन के लिए आवश्यक श्रमकाल के स्तर पर ले आते हैं, जिससे उस माल के उत्पादन के लिए सामाजिक रूप से आवश्यक श्रमकाल की मात्रा ही कम हो जाती है, जिससे अतिरिक्त अतिरिक्त मूल्य ग़ायब हो जाता है लेकिन अतिरिक्त मूल्य फ़िर भी पूँजीपतियों को मिलता रहता है।

आइये देखते हैं कि मार्क्स ने अतिरिक्त मूल्य के बारे में क्या लिखा है – "यदि मज़दूर को अपना सारा समय अपने तथा अपने बाल बच्चों के जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक साधन पैदा करने में लगाना पड़े, तो दूसरों के वास्ते मुफ्त में काम करने के लिए उसके पास कोई समय नहीं बचेगा। जब तक उसके श्रम में एक खास दर्जे की उत्पादकता नहीं होती, तब तक उसके पास ऐसा कोई फालतू समय नहीं हो सकता : और जब तक उसके पास ऐसा फालतू समय नहीं होता, तब तक वह कोई अतिरिक्त श्रम नहीं कर सकता और इसलिए तब तक न पूँजीपति हो सकते हैं, न गुलामों के मालिक और न सामन्ती प्रभु। कहा जा सकता है कि फालतू समय के अभाव में बड़े मालिकों का कोई भी वर्ग नहीं हो सकता।" (पूँजी खण्ड 1 अध्याय 16)

 
"काम के दिन को उस बिन्दु के आगे खींच ले जाना जहाँ तक मजदूर केवल अपनी श्रम शक्ति के मूल्य का समतुल्य ही पैदा कर पाता है, और पूँजी का इस अतिरिक्त श्रम पर अधिकार कर लेना यह निरपेक्ष अतिरिक्त मूल्य का उत्पादन है। इस प्रकार का उत्पादन पूँजीवादी व्यवस्था का सामान्य आधार है..." (अध्याय 16, पृ. 559)

 

"काम के दिन को लम्बा करके जो अतिरिक्त मूल्य पैदा किया जाता है, उसे मैंने निरपेक्ष अतिरिक्त मूल्य का नाम दिया है। दूसरी ओर, जो अतिरिक्त मूल्य आवश्यक श्रम-काल के घटा देने और काम के दिन के दो हिस्सों में तदनुरूप परिवर्तन हो जाने के फलस्वरूप पैदा होता है, उसे मैं सापेक्ष अतिरिक्त मूल्य की संज्ञा देता हूँ।" (पूॅंजी, खण्ड 1. पृ. 345)

स्पष्ट है कि सीमा आज़ाद की व्याख्या में सापेक्ष और निरपेक्ष अतिरिक्त मूल्य के भेद को मिटा दिया गया है और उनकी समझ यह है कि नयी विकसित मशीनों के आ जाने पर अतिरिक्त मूल्य पैदा होता है।

 

यदि कार्ल मार्क्स की व्याख्या को सूत्रबद्ध करें तो निम्न समीकरण बनेगा:

स्थिर पूँजी (मशीनरी, कच्चा माल आदि) + परिवर्तनशील पूँजी (मज़दूरी) = उत्पाद + मज़दूरी + अतिरिक्त मूल्य

 

जबकि सीमा आज़ाद के "मार्क्सवाद" को सूत्रबद्ध करें तो –

पहली स्थिति में –

स्थिर पूँजी + परिवर्तनशील पूँजी  = उत्पाद + मज़दूरी

दूसरी स्थिति में जब नयी मशीन आ जाती है, यानि स्थिर पूँजी में वृद्धि हो जाती है तो –

स्थिर पूँजी + स्थिर पूँजी (नयी मशीन) + परिवर्तनशील पूँजी  = उत्पाद + मज़दूरी + अतिरिक्त मूल्य

ज़ाहिर है कि ऊपर के समीकरणों से सीमा आज़ाद के "मार्क्सवाद" को समझा जा सकता है कि जो कि मार्क्स की शिक्षा के एकदम विपरीत है।

सीमा आज़ाद की एक बात बिल्कुल सही है जब वह कार्ल मार्क्स से इस कथन को दुहराती हैं कि "दार्शनिकों ने समाज की व्याख्या की है, लेकिन सवाल इसे बदलने का है"। लेकिन एक मार्क्सवादी के लिए दुनिया को बदलने के लिए कम से कम मार्क्सवाद का ज्ञान ज़रूरी है। मार्क्स ने यूं ही नहीं लिखा था कि "अज्ञान एक राक्षसी शक्ति है और हमें भय है कि यह कई त्रासदियों का कारण बनेगी।" दूसरे मार्क्सवादी विचारधारा की हिफ़ाजत करना एक जमीनी काम है। मार्क्स ने ये भी लिखा था कि "किसी ग़लत विचार का खण्डन न करना बौद्धिक बेईमानी है।"

शेष अगली पोस्ट में ...

Thursday, 6 October 2022

बेग़म अख़्तर के जन्मदिवस पर

बेग़म अख़्तर के जन्मदिवस पर चार साल पुराना यह संक्षिप्त लेख!
◆◆
शास्त्रीयता के सिरों को अतिक्रमित करती यथार्थबोध से उपजी एक आवाज़ बेग़म अख़्तर की!

'मेरा अज़्म इतना बलन्द है के पराए शोलों का डर नहीं'
◆◆

बेग़म अख़्तर पर बारहा लिखने का मन हुआ करता था लेकिन 'और फिर तल्ख़िए एहसास ने दिल तोड़ दिया' जैसा हाल हो गया।कमउमरी में उन्हें सिर्फ़ उनकी मक़बूलियत के कारण सुना था इसलिए ज़हन और ज़िन्दगी पर उनका कोई ख़ास असर नहीं पड़ा।
नाम भर को थोड़ा संगीत सीखा तो है!संगीत मर्मज्ञ नहीं हूं लेकिन बहुत बाद में लगातार और बार बार अख़्तरी को सुनते हुए सबसे पहले उनके बारे में यह मिथ टूटा कि वे मख़मली और जादुई आवाज़ की मल्लिका हैं!न मुझे वे जादुई लगती हैं न मख़मली!मेरे सुनने में वे मुझे लगभग रूखी लगती हैं!!

वे गंवई दुपहरी की गायिका हैं।उनकी गायिकी में सम्मोहक सुकून और आराम नहीं मिलता बल्कि मिलता है एक कठोर यथार्थबोध।कोठे और बैठकी के ख़्याल और ग़ज़ल गायिकी में ही नहीं लुभावनी अदाकारियों वाली ठुमरियों और दादरे तक में वे अपनी आवाज़ से अपने दिल के इर्द-गिर्द जैसे एक किला बनाती हैं।उनकी गायिकी सुनने वाले के दिल मे खिंचती तो है लेकिन उनके दिल तक पहुँचने का रास्ता रोक देती है।
बेग़म अख़्तर के समकाल और उनके आगे तलक भी बैठकी की लुभावनी गायिकी इस तरह यथार्थबोध से टकराती नज़र नहीं आती।आज भी नहीं।
कलात्मक गंभीरता और पवित्रता किशोरी अमोनकर में है।एक साफ़ और गरिमामयी आवाज़!
विविधता के आधार पर दूसरे छोर पर मैं आबिदा परवीन को देखती हूँ!सूफ़ियाने फ़लसफ़े से दुनयावी भरम को तोड़ने की मुक्त आवाज़!
बेग़म अख़्तर की आवाज़ इन दोनों छोरों को अतिक्रमित करती है।जिस ज़मीन पर वे खड़ी थीं वहाँ वे सूफ़ियाना रस्ते से वे पलायन नहीं कर सकती थीं और जिस दुनिया मे वे जी रही थीं वह कला का क्षेत्र होकर भी प्रतिष्ठित नहीं माना जाता था इसलिए सम्भ्रांत पवित्रतावाद भी उनके इर्द-गिर्द नहीं टिकता था।
उन्होंने खड़ी बैठकी तक की भी प्रस्तुतियां दी।खड़ी बैठकी में नृत्य की भंगिमा के साथ सुनने वालों तक घूम घूम कर नाच के साथ गायन पेश किया जाता था।वे न ही सूफ़ी मुक्त हो सकती थीं न ही एलीट शुचितावादी!कठोर जीवन की ज़मीन पर रिश्तेदारों के बच्चियों और शिष्यों के परवरिश की ज़िम्मेदारी भी थी उन पर।इन्हीं स्थितियों के साथ वे ग़ज़ल के रंजक रूप और  शास्त्रीयता शुचितावाद से मुक्त कर किसी और जगह ले जाती हैं।

अपनी माँ मुश्तरी बाई का रूपांतरित जीवन अख़्तरी बाई ने जिया।मां-बेटी में जाने कौन रिश्ता था कि मुश्तरी की मौत के बाद बेग़म अख़्तर दर्द और नशे के इंजेक्शन लेने लगीं।कहा जाता है कि उनके लिए बड़े बड़े आलीशान लोगों के प्रेम-प्रस्ताव आते रहे।वे जीवन को मज़े में देखतीं रहीं और हँसती रहीं , गाती रहीं क्योंकि जानती थीं कि यह प्रेम नहीं है।ये आलीशान लोग उन्हें अपनी कोठियों में एक नगीने की मानिंद सजावटी पत्थर की तरह सजाना चाहते हैं।उन्होंने किसी की दूसरी, तीसरी या चौथी बीवी बनना स्वीकार नहीं किया।बाद में किन्हीं विधुर वकील साहब से उन्होंने शादी की लेकिन अपनी स्वतंत्र तबीयत की वजह से परिवार में वह रह न पायीं।गायिकी की खोज ,दोस्ताने, महफिलें और शराब-सिगरेट की लत ने उन्हें सांसारिक स्थिरता न दी।परिवार में रहकर वे जान गईं कि स्वतंत्र-चेतना की क़ीमत देनी होती है।

कहीं कभी पढा था और यूट्यूब पर देखा है कि 13 साल की उम्र में बेग़म अख़्तर के साथ किसी राजा ने ज़बरदस्ती की।रेप अटेम्प्ट किया और उस छोटी उम्र में ही उन्हें उन्हें एक बेटी हुई लेकिन बहुत बाद तक बेग़म उस बच्ची को अपनी बहन बताती रहीं।आधिकारिक रूप से इस घटना की कोई पुष्टि नहीं मिलती।यतीन्द्र मिश्र द्वारा संपादित किताब 'अख़्तरी: सोज़ और साज़ का अफ़साना' में कुछ पुराने गुणीजनों के लेख हैं।वहां भी ऐसा कोई उल्लेख नही है।उनके जीवन पर आधारित दूरदर्शन के कार्यक्रमों और विविध भारती के आर्काइव्स में भी कोई उल्लेख नहीं है। कहना चाहती हूँ कि यदि यह घटना सत्य है तो यतीन्द्र मिश्र  जी के संपादकीय या लेख में या कहीं तो इसका उल्लेख होना चाहिए और यदि यह घटना निर्मूल है तो यूट्यूब और ऐसे दूसरे माध्यमों पर एक आपत्ति नोट भेजी जानी चाहिए।यह यतीन्द्र जी को देखना चाहिए।

जीवन के अनुभवों से  अख़्तरी का जीवन कठोर तरीके से बदल गया।रियाज़ी तो वे थीं लेकिन पारम्परिक- बनावटी रियाज़ उन्होंने कभी नहीं किया।
अर्से बाद किसी फ़नकार ने गायिकी की इतनी सच्ची और कसी हुई परिभाषा दी कि गायिकी के लिए रियाज़ से ज़्यादा ज़रूरी चीज़ 'तासीर' और 'सचाई'।बेग़म अख़्तर कहती हैं-  'इंसान ईमानदार हो तो उसके गाने में तासीर पैदा होती है।गाने पर असर ईमान से पड़ता है।सच बोलने, मेहनत करने, दिल पर बोझ न रखने और दिल मे सफ़ाई रखने से सुर सच्चे लगते हैं और आवाज़ खुलती है।'

अपने सुनने-समझने के आधार पर मेरा यह  मानना है कि बेग़म अख़्तर ख़रज और 'गमक' तो लेती हैं लेकिन 'मीड़' उनकी गायिकी में बेहद कम है और यह मुझे मुग्ध करता है।छोटी-छोटी मीड़ लेती हैं।लम्बी मीड़ लगाना सब पर अच्छा नहीं लगता।उसमे बनावटी होने का ख़तरा रहता है।बेग़म की गायिकी में 'मीड़' उनके गले की ख़राश और ख़लिश है।
ग़ालिब की ज़बाँ में 'ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता'
इस ख़लिश को बरक़रार रखने के लिए दर्द को बेग़म ने लाइलाज किया।गाती हुई वे अद्भुत ढंग से स्वाभाविक होती हैं।दुनियायावी आत्मस्थ!
ग़ालिब को जितनी शिद्दत से बेग़म अख़्तर ने गाया वैसा शायद किसी ने नहीं गाया।

उनके गाए दादरों के बोल एक ओर लुभावने और दूसरी ओर विरही हैं।किसी और गले में ज़रा सी असावधानी से वे सस्ती-लोकप्रियता में तब्दील हो सकती थीं।बेग़म ने ग़ज़लों में ही नहीं.. ठुमरी-दादरे में विरह की पुकार में दर्प और मनोरंजक आस्वादन वाले आकर्षक बंदिशों में अपनी गायिकी के बल पर गंभीरता भरी है।ऐसी गम्भीरता जो एक ख़ास किस्म के कलावाद से अलग है।एक दादरा जिसे सैकड़ो बार सुना है! 
'मोर बलमुआ परदेसिया मोर'
कई-कई बार सुना ..सिर्फ़ 'परदेसिया' और 'मोर' के बीच लगने वाले सुर के लिए। 
सिर्फ़ इसी सुर पर शास्त्रीयता जैसे बिखर जाती है और  ठेठ 'लोक' रूपाकार ले लेता है।

अख़्तरी बाई ने कला के लिए 'उस्तादी' मेहनत नहीं की इसलिए ऊपरी सुर लगाने में उनका गला टूटता था.. आवाज़ ख़राश देती थी लेकिन ऐसे शास्त्रीय दोषों की चिंता उन्होंने नहीं की।छोटी बहरें वे ख़ूब मन से गाती हैं।आज तो 'ख़राश' एक ग्लैमर बन चुका है।सोच-समझकर ख़राश बनाई जाती है लेकिन बेग़म के समय यह बड़ा दुर्गुण था।बाद में इसी ख़राश उन्हें मौलिकता दी।
'दीवाना बनाना है दीवाना बना दे' ग़ज़ल में गले की टूट और ख़राश सुनने बड़े बड़े गुणी आते थे और उनके मुरीद  होते थे।

भावना में बहते हुए भरे मन को एक आंतरिक गाढ़ापन बेग़म को सुनकर मिल सकता है।इस रूप में ऐसी कठोर, निस्संग और निर्लिप्त गायिकी कम हुआ करती है।बेग़म अख़्तर की आवाज़ में  कलावादी सम्मोहन नहीं है जो आपको बेवजह बहा ले जाए।भावना के साथ वह एक निस्संग सम्बल देती है इसलिए बेग़म को सुनते बहुत भावुक नहीं हुआ जा सकता।उनकी आवाज़ भीतर स्थिर करती है।तकलीफ़ देती हुई अपनी आवाज़ से जैसे धूप में खड़ा रखती हैं; फिर बाहर निकाल लाती है, आगे बढ़ा देती है!बहलाती और पुचकारती नहीं है !भटकाती नहीं है।इस अर्थ में एक स्तर पर बेग़म अख्तर की गायिकी वैचारिक गायिकी की ओर जाती है।
कठोर उत्तर भारतीय पितृसत्ता के शिकंजे में कोठी की गायिकी कला को इस दर्ज़े पर पहुँचाना उन्हें भारत के दुर्लभ उस्तादों की श्रेणी में खड़ा करता है।

-Vandana choubey

उनके क़रीबी रहे सलीम किदवई द्वारा खींची एक अच्छी तस्वीर!

Monday, 3 October 2022

आखिर शुद्रो के वो देवता कौन है ?

जब शूद्र जोहड़ का पानी पीते थे तब कोई देवता नहीं आया,
    जब देवदासी के नाम पर शूद्र लड़कियाँ वैश्या बनायी गयी तब कोई देवता नहीं आया,
    जब सेवा के नाम पर शूद्रों से मैला उठवाया गया तब कोई देवता नहीं आया,
    जब पुण्य के नाम पर शूद्रों को शिक्षा और धन रखने से रोका गया तब कोई देवता नहीं आया,
    जब धर्म के नाम पर तुम्हारे स्वस्थ बच्चों की बलि ली गयी तब कोई देवता नहीं आया,
   जब कर्तव्य के नाम पर तुमसे बेगारी कराई गई तब कोई देवता नहीं आया,
    तो दलितों तुम सब कौन से देवता की पूजा करते हो?🤔
सदियों से सोया हुआ तुम्हारा ये देवता कब जाग गया?
     जिनकी परछाईं से भी मंदिर और देवता अपवित्र हो जाते थे उन शूद्रों को पूजा करने का अधिकार किस देवता ने दे दिया?

       आखिर वो देवता कौन है ?
       हम भी तो जानें,


Wednesday, 21 September 2022

त्रॉत्स्कीपंथियों के जवाब में

यह नोट 8 साल पहले त्रॉत्स्कीपंथियों के जवाब में ल‍िखा गया था। आज कव‍िता कृष्णन जैसे सर्वहारा वर्ग के ग़द्दार अपने पतन को जायज़ ठहराने के ल‍िए कॉमरेड स्ताल‍िन पर जो हमले बोल रहे हैं उस सन्दर्भ में यह फिर से प्रासंगिक हो गया है।

https://www.facebook.com/1094162995/posts/pfbid02wKQHZSTaMdaGcH3YFzLJwvGTJzjh5NY2e1hSbCzW2XmpYH6m3swJmod43cvuGiTSl/

Thursday, 15 September 2022

महिला अपनी बेटी को खुन चढ़वा रही हैं हांथ मे लेकर।

यह तस्वीर पाकिस्तान,आफगानिस्तान की नही भारत की है,जहाँ  मंदिर बनाने के लिए सरकार और न्यायालय जिसपर लोगों का भरोसा होता है कि सभी को न्याय देंगे ने भी उतर जाते हैं।
पर अस्पताल के नाम पर कुछ नहीं बोलते हैं।
ये महिला अपनी बेटी को खुन चढ़वा रही हैं हांथ मे लेकर।

Monday, 5 September 2022

फुले दम्पति

जिस स्कूली शिक्षा के साथ जोड़कर फुले दम्पति को नाहक ही प्रचारित किया जा रहा है, वह उपक्रम उनका था ही नहीं। यह ब्रिटिश सरकार का उपक्रम था जिसके लिए फुले दम्पति, ब्रिटिश सरकार से पैसा पाते थे, जिसमें बाक़ायदा उनके वेतन, भत्ते भी शामिल थे। 
इसके पीछे, ब्रिटिश सरकार का उद्देश्य, किसी सामाजिक सरोकार से अनुप्रेरित नहीं था बल्कि दलित जातियों के हिस्सों को, ब्रिटिश साम्राज्यवाद के पीछे बांधना था। 
1857 के ग़दर ने दिखा दिया कि उनके ये तमाम उपक्रम विद्रोह को रोक पाने में असफल रहे और उन्होंने इनसे हाथ वापस खींच लिया। यहीं पर फुले दम्पति के इन प्रोजेक्ट का अंत हो जाता है। 
फुले, पेरियार, अम्बेडकर और उसके बाद अम्बेडकरियों की एक पूरी कतार, हमेशा, उत्पीड़क शासकों की गोद में ही बैठी रही। उसने दलितों-उत्पीड़ितों को भ्रमित कर, सत्ता के विरुद्ध विद्रोह से विरत किया और शोषकों के ख़िलाफ़, शोषितों की वर्ग एकता को पलीता लगाया। उन्होंने साम्राज्यवादियों, भूस्वामियों और फिर देशी पूंजीपतियों से गठजोड़ किए रखे, और उनके लूट-शोषण पर परदा डालते हुए, दलित-मेहनतकश जनता का ध्यान, अतीत के मिथकों में भटकाए रखा। न सिर्फ फुले और अम्बेडकर, बल्कि उनके बाद भी जगजीवन राम से लेकर, ढसाल, अठावले, पासवान, मायावती, उदित राज जैसे सैंकड़ों अम्बेडकरियों ने, दलितवाद के नाम पर दोनों हाथ से सत्ता-सुख लूटा है। इन अम्बेडकरियों ने पूंजीवाद, पूंजीपतियों और उनकी सत्ता और शासन की दलाली के सिवा कुछ नहीं किया। ये सभी, क्रान्ति, समाजवाद और सर्वहारा का खुलकर विरोध करते रहे।

Rameshwar Dutta

Saturday, 6 August 2022

(फादर स्टेन की मूल कविता 'प्रिज़न लाइफ -- अ ग्रेट लेवलर' का अनुवाद )



ज़िंदाँनों में सब बराबर हैं
*******************
कैदखानों के अंदर
चंद रोज़मर्रा की 
जरूरियातों के अलावा
हर छोटी से छोटी 
चीज से महरूम
कर दिया जाता है

"तुम" को तरजीह दी जाने लगती है
और
"मैं" पसमंजर में 
चला जाता है
सभी जन 
"हम" की 
खुली फ़िज़ा में 
सांस लेने लगते हैं

ना कुछ मेरा
ना कुछ तेरा 
सब कुछ 
हमारा हो जाता है

जूठन  का एक कौर तक
ज़ाया नही जाता
बल्कि
हवा में तैरते
पंछियों के साथ 
साझा होता है
वे पंख फैलाए आते हैं
और 
अपने पेट की आग
बुझाकर सुदूर गगन में 
उड़ जाते हैं

कैदखाने में
इतने नौजवान चेहरों को 
देखकर दिल अफसुर्दा होता है
मैं  पूछता हूँ
"तुम्हारा कसूर?"
और
वे शब्दों का आडंबर रचाए बिना कहते हैं:
हरेक से
उसकी गुंजाईश
हरेक को 
उसकी जरूरत
के मुताबिक
ही तो समाजवाद है

यूँ समझो कि विवशता ने
इस समानता को गढ़ दिया है

वो मंज़र 
कितना खुशगवार होगा 
जब इंसान 
अपनी खुशी और मर्जी से
बराबरी को गले लगा पाएंगे
उस पल 
हम 
सही मायनों में 
धरती के 
लाल कहलायेंगे

***

१९५३ में स्टालिन की शव यात्रा पर उमड़ा सैलाब 

*On this day in 1953, a sea of humanity thronged the streets for Stalin's funeral procession.* Joseph Stalin, the Soviet Union's fea...