Monday, 30 August 2021

गीतकार शैलेंद्र

_*तू ज़िन्दा है तो ज़िन्दगी की जीत में यकीन कर,*_
_*अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!*_

_*ये ग़म के और चार दिन, सितम के और चार दिन,*_
_*ये दिन भी जाएंगे गुज़र, गुज़र गए हज़ार दिन,*_
_*कभी तो होगी इस चमन पर भी बहार की नज़र!*_
_*अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!*_

_बहुत कम लोगों को यह बात पता है कि इन पंक्तियों के लेखक प्रसिद्ध गीतकार शैलेंद्र का बिहार से खास रिश्ता है। बिहार के आरा जिले के धुसपुर गांव से ताल्लुक रखने वाले शैलेन्द्र का असली नाम शंकरदास केसरीलाल था और वे चमार जाति से थे। उनका जन्म 30 अगस्त, 1921 को रावलपिंडी (जो अब पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में है) में हुआ था।_

_वहां उनके पिता केसरीलाल राव ब्रिटिश मिलिटरी हॉस्पिटल(जो मूरी केंटोनमेंट एरिया में था) में ठेकेदार थे। शैलेन्द्र का अपने गांव से कोई ख़ास जुडाव नहीं रहा क्योंकि वे बचपन से अपने पिता के साथ पहले रावलपिंडी और फिर मथुरा में रहे। उनके गांव में ज्यादातर लोग खेतिहर मजदूर थे।_

_पिता की बीमारी और आर्थिक तंगी के चलते पूरा परिवार रावलपिंडी से मथुरा आ गया, जहां शैलेन्द्र के पिता के बड़े भाई रेलवे में नौकरी करते थे। मथुरा में परिवार की आर्थिक समस्याएं इतनी बढ़ गयीं कि उन्हें और उनके भाईयों को बीड़ी पीने पर मजबूर किया जाता था ताकि उनकी भूख मर जाये। इन सभी आर्थिक परेशानियों के बावजूद, शैलेन्द्र ने मथुरा से इंटर तक की पढ़ाई पूरी की।_

_किसी तरह पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने बम्बई जाने का फैसला किया। यह फैसला तब और कठोर हो गया जब उन्हें हॉकी खेलते हुए देख कर कुछ छात्रों ने उनका मजाक उड़ाते हुए कहा कि 'अब ये चमार लोग भी हॉकी खेलेंगे।'  इससे खिन्न होकर उन्होंने अपनी हॉकी स्टिक तोड़ दी। शैलेन्द्र को यह जातिवादी टिपण्णी गहरे तक चुभी।_

_बम्बई में उन्हें माटुंगा रेलवे के मेकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग में अपरेंटिस के तौर पर काम मिल गया। लेकिन वर्कशॉप के मशीनों के शोर और महानगरी की चकाचौंध के बीच भी उनके अन्दर का कवि मरा नहीं और उन्हें अक्सर कागज-कलम लिए अपने में गुम अकेले बैठे देखा जाता था।_

_दफ्तर का काम खत्म कर शैलेंद्र 'प्रगतिशील लेखक संघ' के कार्यालय में अपना समय बिताते थे, जो पृथ्वीराज कपूर के रॉयल ओपेरा हाउस के ठीक सामने हुआ करता था। हर शाम वहां कवि जुटते थे। यहीं उनका परिचय राजकपूर से हुआ। राजकपूर ने इन्हें अपनी फिल्मों के लिए गीत लिखने का प्रस्ताव दिया था लेकिन शैलेंद्र उन दिनों फिल्मों में गीत लिखने को सही नहीं मानते थे उन्होंने राजकूपर को मना कर दिया था, लेकिन कुछ महीनों बाद आर्थिक तंगी की वजह से वो राजकपूर के पास गये और उनसे पैसे मांगे और कहा कि वो उनके लिये काम करने को तैयार हैं। इसके बाद राजकपूर ने शैलेंद्र से सबसे पहले बरसात फिल्म के लिए दो गीत लिखवाए इनमें एक हमसे मिले तुम सजन बरसात में और पतली कमर है तिरछी नजर है। मुकेश के गाये ये दोनों गाने खूब चले।_

_इसके बाद वे राजकपूर की फिल्मों के लिये गीत लिखने लगे। उनके गीत इस कदर लोकप्रिय हुये कि राजकपूर की चार-सदस्यीय टीम में उन्होंने सदा के लिए अपना स्थान बना लिया। इस टीम में थे शंकर-जयकिशन, हसरत जयपुरी और शैलेन्द्र। इस टीम ने कई फिल्मों आवारा, श्री. 420, तीसरी कसम और संगम में बेहतरीन गीतों की सौगात दी है।_

_उन्होंने कुल मिलाकर करीब 800 गीत लिखे और उनके लिखे ज्यादातर गीत लोकप्रिय हुए। उन्होंने अपने गीतों के माध्यम से समतामूलक भारतीय समाज के निर्माण के अपने सपने और अपनी मानवतावादी विचारधारा को अभिव्यक्त किया और भारत को विदेशों की धरती तक पहुँचाया।_

_उन्होंने दबे-कुचले लोगों की आवाज को बुलंद करने के लिये नारा दिया -"हर जोर-जुल्म की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है।" यह नारा आज भी हर मजदूर के लिए मशाल के समान है।

Sunday, 29 August 2021

Katherine Mayo "Mother India"

👆🏻भारत में आज नारी 18 वर्ष की आयु के बाद ही बालिग़ अर्थात विवाह योग्य मानी जाती है। परंतु मशहूर अमेरिकन इतिहासकार कैथरीन मायो (Katherine Mayo) ने अपनी बहुचर्चित पुस्तक "मदर इंडिया" (जो 1927 में छपी थी) में स्पष्ट लिखा है कि भारत का रूढ़िवादी हिन्दू वर्ग नारी के लिए 12 वर्ष की विवाह/सहवास आयु पर ही अडिग था।

1860 में तो यह आयु 10 वर्ष थी। इसके 30 साल बाद 1891में अंग्रेजी हकुमत ने काफी विरोध के बाद यह आयु 12 वर्ष कर दी। कट्टरपंथी हिन्दुओं ने 34 साल तक इसमें कोई परिवर्तन नहीं होने दिया। इसके बाद 1922 में तब की केंद्रीय विधान सभा में 13 वर्ष का बिल लाया गया। परंतु धर्म के ठेकेदारों के भारी विरोध के कारण वह बिल पास ही नहीं हुआ।

1924 में हरीसिंह गौड़ ने बिल पेश किया। वे सहवास की आयु 14 वर्ष चाहते थे। इस बिल का सबसे ज्यादा विरोध पंडित मदन मोहन मालवीय ने किया, जिसके लिए 'चाँद' पत्रिका ने उनपर लानत भेजी थी। अंत में सलेक्ट कमेटी ने 13 वर्ष पर सहमति दी और इस तरह 34 वर्ष बाद 1925 में 13 वर्ष की सहवास आयु का बिल पास हुआ।

6 से 12 वर्ष की उम्र की बच्ची सेक्स का विरोध नहीं कर सकती थी उस स्थिति में तो और भी नहीं, जब उसके दिमाग में यह ठूस दिया जाता था कि पति ही उसका भगवान और मालिक है। जरा सोचिये! ऐसी बच्चियों के साथ सेक्स करने के बाद उनकी शारीरिक हालत क्या होती थी? इसका रोंगटे खड़े कर देने वाला वर्णन Katherine Mayo ने अपनी किताब "Mother India" में किया है कि किस तरह बच्चियों की जांघ की हड्डियां खिसक जाती थी, मांस लटक जाता था और कुछ तो अपाहिज तक हो जाती थीं।

6 और 7 वर्ष की पत्नियों में कई तो विवाह के तीन दिन बाद ही तड़प तड़प कर मर जाती थीं।


Saturday, 28 August 2021

Afghanistan Cinema


अफगानिस्तान के बारे में इस समय सारी दुनिया में चर्चा हो रही है। वहां तालिबान का कब्जा हो चुका है और सारी दुनिया अफगानिस्तान के भविष्य को लेकर चिंतित हैं। अगस्त के महीने में तालिबान के बढ़ते कदम के बीच अफगानिस्तान के सिनेमा की ओर लोगों का ध्यान तब गया था, जब 13 अगस्त को विश्व फिल्म समुदाय के नाम अफगानिस्तान के फिल्मकारों और संस्कृतिकर्मियों को बचाने और उनकी मदद के लिए अफगान फिल्म ऑर्गनाइज़ेशन की अध्यक्षा सहरा करीमी ने एक खुली चिट्ठी जारी की थी। इसी के बाद ये भी दिलचस्तपी जगी कि आखिर कैसा है अफगानिस्तान का सिनेमा। प्रस्तुत है इसी पर वरिष्ठ पत्रकार , फिल्म समीक्षक और फिल्म फेस्टिवल कंसल्टेंट अजित राय का लेख

अफगानिस्तान के सिनेमा के बारे में दुनिया भर में बहुत कम चर्चा होती है। आश्चर्य है कि भारत में भी इस बारे में कभी कोई खास बातचीत नही सुनी गई है जबकि अफगानिस्तान के साथ भारत के ऐतिहासिक और पौराणिक रिश्ते बहुत गहरे रहे हैं। रवींद्र नाथ टैगोर की कहानी 'काबुलीवाला' पर पहले बंगाली (1957) मे तपन सिन्हा और बाद में हिंदी (1961) में हेमेन गुप्ता सहित कई भारतीय निर्देशकों ने सफल फिल्में बनाई हैं। अफगानिस्तान में हॉलीवुड की 'द काइट रनर' (2007) से लेकर बालीवुड की 'धर्मात्मा' ( फिरोज खान, 1975), 'खुदा गवाह' ( मुकुल आनंद, 1992) 'काबुल एक्सप्रेस' (कबीर खान, 2006 ) और अनेक फिल्में बनती रही है। अफगानिस्तान में बनने वाली भारतीय फिल्में कभी उतनी अच्छी नही बनी जिससे उनकी चर्चा हो सके।

अफगानिस्तान में सिनेमा को लाने का श्रेय वहां के राजा (अमीर) हबीबुल्ला खान ( 1901-1919) को जाता है जिन्होंने सबसे पहले राज दरबार में प्रोजेक्टर से कुछ फिल्में दिखाई थी। प्रोजेक्टर को तब वहां 'जादुई लालटेन' कहा जाता था। लेकिन आम जनता के लिए काबुल के पास पघमान शहर में पहली बार 1923 में एक मूक फिल्म के प्रदर्शन का जिक्र मिलता है।पहली अफगान फिल्म 'लव एंड फ्रेंडशिप' (1946) मानी जाती है। उसके बाद वहां अधिकतर डाक्यूमेंट्री बनती रही जिसे भारत से आई फीचर फिल्मों से पहले दिखाया जाता था। 1990 में गृह युद्ध और 1996 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद यहां सिनेमा बनाना और देखना पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया।

Film: Kandahar (2001)

विश्व सिनेमा में यहां की फिल्मों की चर्चा तब शुरू हुई जब मशहूर फिल्मकार मोहसिन मखमलबाफ की फिल्म 'कंधार' (2001) दुनिया भर के करीब बीस से अधिक फिल्म समारोहों में दिखाई गई। इस फिल्म ने पहली बार एक लगभग भुला दिए गए देश अफगानिस्तान की ओर दुनिया भर का ध्यान खींचा। बाद में उनकी बेटी की फिल्म 'ऐट फाइव इन द आफ्टरनून' (2003) भी दुनिया भर में चर्चित हुई जिसमें एक अफगान लड़की अपने परिवार की मर्जी के खिलाफ स्कूल जाती है और एक दिन अफगानिस्तान का राष्ट्रपति बनने का सपना देखती है। फिल्म का नाम मशहूर स्पेनिश कवि फेदेरिको गार्सिया लोर्का की कविता के शीर्षक से लिया गया है।

इन संदर्भों से आगे सच्चे अर्थों में यदि किसी अफगानी फिल्म ने विश्व सिनेमा में अबतक सबसे महत्वपूर्ण जगह बनाई है, वह है सिद्दिक बर्मक की 'ओसामा' ( 2003)। इस फिल्म को न सिर्फ कान फिल्म समारोह सहित दुनिया भर के कई फिल्म समारोहों में पुरस्कार मिले, वल्कि इसने 39 लाख डालर का कारोबार भी किया। फिर अगले साल आती है अतीक रहीमी की फिल्म 'अर्थ एंड एशेज' ( खाकेस्तार-ओ-खाक, 2004) जिसका वर्ल्ड प्रीमियर 57 वें कान फिल्म समारोह के अन सर्टेन रिगार्ड खंड में हुआ। इसके बाद जिस फिल्म की चर्चा होती है, वह है ईरानी फिल्मकार वाहिद मौसेन की 'गोल चेहरे' ( 2011)।

Film: Osama (2003)

इस समय अमेरिकी और मित्र राष्ट्रों की सेनाओं के चले जाने और तालिबान के कब्जे के कारण अफगानिस्तान लगातार खबरों में बना हुआ है। तालिबान ने अफ़गान फिल्म उद्योग को लगभग तहस नहस कर दिया है। यह देख कर आश्चर्य होता है कि अफगानिस्तान में बनी अधिकतर फिल्में तालिबानी कट्टरपंथी मुस्लिम विचारों के खिलाफ सिनेमाई प्रतिरोध है। सिद्दिक बर्मक की फिल्म 'ओसामा' तालिबानी शासन में एक तेरह साल की लड़की ( मरीना गोलबहारी) की कहानी है जो अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए लड़का बनकर काम करती है और अपना नया नाम रखती है- ओसामा। उसके परिवार में कोई मर्द नही बचा है। वह अपनी मां के साथ एक अस्पताल में काम करती थी जिसे तालिबानियों ने बंद कर दिया और औरतों के घर से बाहर निकल कर काम करने पर रोक लगा दी। जब वे लड़कों को पकड़ कर इस्लामी ट्रेनिंग कैंप भेजने लगे तो एक दिन ओसामा भी पकड़ लिया गया। कैंप में पीरीयड आ जाने से वह पकड़ा गया और तालिबानी उसे ठंडे कुंए में उलटा लटका देते हैं। अंततः एक बूढ़े अय्याश के साथ उसकी जबरदस्ती शादी करा दी जाती है। अंतिम दृश्य में हम देखते हैं कि गर्म पानी से भरे टैंक में बूढ़ा अय्याश नहा रहा है। टैंक के पानी से भाप उठ रहा है और पास में कैद ओसामा डर से थर-थर कांपती हुई सिसक रही है। औरतों और दूसरों के लिए तालिबानी शासन कैसा होगा, इसकी मिसाल इस फिल्म में हम देख सकते हैं।

ईरानी फिल्मकार वाहिद मौसेन की 'गोल चेहरे' ( 2011) एक सच्ची घटना पर आधारित है जिसमें लोगों ने जान पर खेलकर तालिबानियों के हमलें से कई दुर्लभ फिल्मों के प्रिंट बचाए थे। एक उन्मादी सिनेमा प्रेमी अशरफ खान गोल चेहरे नामक एक सिनेमा हॉल चलाते थे जिसे तालिबानियों ने जलाकर नष्ट कर दिया था। वे इस सिनेमा हॉल को दोबारा बसाना चाहते हैं। वे अफगान फिल्म आर्काइव के निदेशक की मदद से बड़ी मुश्किल से ईरान जाकर एक ऐसे आदमी को ले आते हैं जो फिल्में दिखाने के लिए प्रोजेक्टर लगा सकता है। सत्यजीत राय की फिल्म 'शतरंज के खिलाड़ी' के प्रदर्शन से सिनेमा हॉल गोल चेहरे का उद्घाटन होता है। लेकिन जैसे ही फिल्म शुरू होती है, तालिबानी बम से सिनेमा हॉल को उड़ा देते हैं। वे अशरफ खान को मार देते है, फिल्म आर्काइव की सभी फिल्मों को जला देने का फतवा जारी करते हैं। रेड क्रॉस हास्पिटल में काम करने वाली एक विधवा डाक्टर रूखसारा आर्काइव की दुर्लभ फिल्मों को बचाने की योजना बनाती है। तालिबानी दौर के खौफनाक लम्हों में भी रूखसारा हिम्मत नहीं हारती। अमेरिकी फौजों द्वारा तालिबानियों के सफाए के बाद रूखसारा ईरानी सिने जानकार और अफगानी फिल्म आर्काइव के निदेशक की मदद से एक बार फिर गोल चेहरे सिनेमा हॉल का निर्माण करते हैं और सत्यजीत राय की फिल्म 'शतरंज के खिलाड़ी' के प्रदर्शन से ही उसका उद्घाटन करते हैं। यह फिल्म यह भी बताती है कि अफगानिस्तान में भारतीय फिल्मों के प्रति कितनी दीवानगी है।

Film: Khakestar-O-Khak (Earth And Ashes), 2004

अतीक रहीमी की फिल्म 'अर्थ एंड एशेज' ( 2004) जिसका मूल नाम 'खाकेस्तार-ओ-खाक' है, अब्दुल गनी के उम्दा अभिनय के लिए भी देखी जानी चाहिए जिसमें उन्होंने एक बूढ़े का किरदार निभाया है। अमेरिकी फौजों की बमबारी से तबाह हो चुके अफगानिस्तान में एक बूढ़ा दस्तगीर अपने पोते यासिन के साथ सड़क किनारे बैठा किसी लंबी यात्रा के दौरान सुस्ता रहा है। यह धूल धूसरित सड़क कोयले की उस खान तक जाती है जहां दस्तगीर का बेटा काम करता है। बूढ़े दस्तगीर को अपने बेटे के पास पहुंच कर बताना है कि उनका गांव और परिवार बमबारी में नष्ट हो गए हैं। उस बूढ़े दस्तगीर के लिए यह यात्रा मुश्किलों भरी है। वह असह्य अकेलेपन और मिट्टी में मिल चुके अपने सम्मान के बीच फंसा है। इस यात्रा में उसे तरह तरह के लोगों का सामना करना पड़ता है जिसमें एक विक्षिप्त चौकीदार, दार्शनिक दुकानदार, अंतहीन इंतजार करती रहस्यमयी स्त्री और इस बेमतलब युद्ध से तबाह हुए लोग हैं जो कहीं जा रहे हैं। रात होते ही ठंड जानलेवा होने लगती है। बूढ़ा दस्तगीर ठंड से बचने के लिए लकड़ी की उस घोड़ा गाड़ी को ही जलाकर रात गुजारता है और दूसरी सुबह अपने पोते को घोड़े की पीठ पर बिठा पैदल ही चल देता है।

यह पूरी फिल्म अफगानिस्तान में चल रहे बेमतलब युद्ध से हुए विनाश में मनुष्यता को खोजने की सिनेमाई कोशिश है। अफगानिस्तान पर अमेरिकी बमबारी से क्षतिग्रस्त हुए पुल मकान सड़कों पहाड़ों को सचल लैंड स्केप की तरह फिल्मांकन में प्रयोग किया गया है जिससे फिल्म का अधिकार फ्रेम उत्कृष्ट कला कृति बन जाता है। फिल्म के बूढ़े नायक दस्तगीर की आंखें अतीत के यु हद्धों का बीता हुआ सब कुछ बिना बोले कह देती है जबकि उसके पोते यासीन की आंखों में देश का भविष्य देखा जा सकता है। एक दादा और पोते की आंखों के रूपक का सिनेमाई दृश्यों में रूपांतरण फिल्म की असली ताकत है। इस समय अफगानिस्तान में एक बार फिर तालिबानी शासन के आसार दिखाई दे रहे हैं। उनके पूरे तरह सत्ता में आते ही वहां की कला, साहित्य, सिनेमा और सेक्युलर संस्कृति के खत्म हो जाने का खतरा पैदा हो गया है।



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Friday, 27 August 2021

गेल ओमवेट

गेल ओमवेट भारत के, विशेषकर आधुनिक भारत के बहुजन आंदोलन की एक प्रतिनिधि इतिहासकार थीं। मेरा आधुनिक बहुजन आंदोलन से अर्थ ज्योतिराव फुले ( 11 अप्रैल 1827-28 नवंबर 1890) से लेकर डॉ. आंबेडकर ( 14 अप्रैल 1891-6 दिसंबर 1956) के नेतृत्व में चले बहुजनों ( पिछड़े-दलितों) के मुक्ति के आंदोलन से है, जिसका नेतृत्व शूद्र या अतिशूद्र कही जाने वाली वर्ण-जाति में पैदा हुए नायक कर रहे थे। जो मुख्यत: ब्राह्मणवाद ( भारत में ब्राह्मणवाद ही सामंतवाद है) से मुक्ति का आंदोलन था। जैसे गांवों की तथाकथित उच्च जातियां दक्खिन टोले को हेय या उपेक्षित दृष्टि से देखती हैं, वैसे ही आधुनिक भारत के इतिहाकार आधुनिक बहुजन आंदोलन और उसके नायकों को देखते थे। ऐसा करने वालों में दक्षिणपंथी और उदारपंथी (राष्ट्रवादी) इतिहासकारों के साथ भारतीय वामपंथी इतिहासकार भी शामिल थे।

आधुनिक भारत के सबसे प्रतिष्ठित इतिहासकार सुमित सरकार की सबसे मान्य और चर्चित किताब 'आधुनिक भारत (1885-1947) भी इसमें शामिल है। वामपंथी इतिहासकारों में और अधिक वामपंथी माने जाने वाले अयोध्या सिंह ने तो अपनी किताब 'भारत का मुक्तिसंग्राम' में तो डॉ. आंबेडकर के नेतृत्व में चले दलित आंदोलन को जी भरकर गालियां दी हैं, यहां तक कि डॉ. आंबेडकर पर व्यक्तिगत तौर पर हमला करते हुए, वह सबसे भद्दी गाली दी है, जिसे पढ़कर किसी भी न्याय प्रिय व्यक्ति का खून खौल जाए। जहां सुमित सरकार ने बहुजन आंदोलन की उपेक्षा किया, वहीं अयोध्या सिंह ने उसे गालियां दीं। हां बाद में शेखर बंद्योपाध्याय ने अपनी किताब 'पलासी से विभाजन तक-आधुनिक भारत का इतिहास' में बहुजन आंदोलन को कुछ हद जगह दी, लेकिन यह जगह हाशिए की ही जगह है।

गेल ओमवेट पहली इतिहासकार थीं, जिन्होंने अपने इतिहास के केंद्र में आधुनिक बहुजन आंदोलन को रखा। इतिहास की विडंबना देखिए बहुजन आंदोलन का प्रतिनिधि इतिहाकार कोई भारतीय नहीं हुआ, बल्कि संयुक्त राज्य अमेरिका में पैदा हुई एक महिला हुईं। यह संयोग नहीं है, इसका ठोस कारण है। वह ठोस कारण यह है कि भारत के जितने नामी-गिरामी आधुनिक भारत के इतिहासकार हुए, वे तथाकथित अपरकास्ट और अपर क्लास के थे। उनकी सामाजिक-आर्थिक, विशेषकर सामाजिक पृष्ठभूमि ने उन्हें गांधी या क्रांतिकारियों के नेतृत्व में चल रहे ब्रिटिश सत्ता से मुक्ति के संघर्ष के समानांतर चल रहे, ब्राह्मणवाद (भारतीय सामंतवाद) से मुक्ति के आंदोलन को, क्रांतिकारी या प्रगतिशील आंदोलन मानने ही नहीं दिया, बल्कि उसे ब्रिटिश सत्ता द्वारा पोषित उपनिवेशवाद परस्त आंदोलन ठहरा दिया या उस पर चुप्पी लगा ली।

वे डॉ. आंबेडकर की यह बात समझ ही नहीं पाए कि भारत का तथाकथित अपरकास्ट ब्रिटिश सत्ता का गुलाम है और अंग्रेजों से अपनी आजादी के लिए लड़ रहा है, लेकिन दलित-बहुजन इसी अपरकास्ट के गुलाम हैं यानि गुलामों के गुलाम हैं और ब्रिटिश सत्ता के गुलाम अपरकास्ट अपनी आजादी तो चाहते हैं, लेकिन वे अपने गुलामों ( शूद्र, अतिशूद्र और महिलाओं) को किसी भी सूरत में आजादी नहीं देना चाहते हैं। गेल ओमवेट ने गुलामों के गुलाम समुदाय (बहुजनों) के संघर्षों का इतिहास लिखने का बीड़ा उठाया और उसे हर कीमत चुका कर पूरा किया और इस काम में अपनी पूरी जिंदगी खपा दी। मौत से पहले तक वह यही कार्य कर रही थीं।

उनकी पहली किताब 'कल्चरल रिवोल्ट इन कोलोनियल सोसायटी: द नान ब्राह्मण मूंवमेंट इन वेस्टर्न इंडिया' है। दरअसल उन्होंने इसी विषय पर कैलिफोर्निया स्थित बर्कले विश्वविद्यालय से समाजशास्त्र में पीएच-डी की थी। जो बाद में किताब के रूप में प्रकाशित हुई। एक ओर जहां बंगाल अपरकास्ट-अपर क्लास के नेतृत्व में चले पुनर्जागरण, सुधार आंदोलन या आधुनिकीकरण के आंदोलन का गढ़ था, तो महाराष्ट्र (पश्चिमी भारत) शूद्र-अतिशूद्र कही जानी वाली जातियों के नायक-नायिकाओं के नेतृत्व में चले सुधार, पुनर्जागरण और आधुनिकीकरण का केंद्र था। बंगाल के आंदोलन को डॉ. आंबेडकर ने परिवार सुधार आंदोलन की ठीक ही संज्ञा दी है, जबकि महाराष्ट्र में ज्योतिराव फुले-सावित्रीबाई फुले, शाहू जी महाराज और बाद में डॉ. आंबेडकर के नेतृत्व में चला आंदोलन वर्ण-जाति और पितृसत्ता के खात्मे के खिलाफ एक व्यापक क्रांतिकारी सामाजिक सुधार या पुननर्जागरण का आंदोलन था। गेल ओमवेट ने अपनी पहली किताब (थीसिस) में ज्योतिराव फुले, सावित्रीबाई फुले और बाद में शाहू जी महाराज के नेतृत्व में चले बहुजन आंदोलन और उसके परिणामों एवं प्रभावों का विस्तार से लेखा-जोखा लिया है। यह उनका पहला काम था, जिसमें भावी बहुजन इतिहासकार के बीज छिपे हुए थे, जिस बीज ने बाद में विशाल बरगद का रूप लिया, जिसका नाम गेल ओमवेट था।

बाद में गेल ओमवेट ने भारत को अपना घर बना लिया, महाराष्ट्र के चर्चित एक्टिविस्ट-बुद्धिजीवी भरत पटणकर को अपना जीवन साथी चुना और दोनों ने खुद को एक न्यायपूर्ण भारत के लिए पूरी तरह समर्पित कर दिया। दोनों को यह अच्छी तरह पता था कि उत्पादक और मेहनतकश बहुसंख्यक बहुजनों ( शूद्रों, अतिशूद्रों और महिलाओं, जिसमें बहुजन धार्मिक अल्पसंख्यक भी शामिल हैं) के मुक्ति के बिना एक आधुनिक, समतामूलक, न्यायपूर्ण, बंधुता आधारित भारत का निर्माण नहीं किया जा सकता है, जहां समृद्धि पर सबका समान हक हो। जहां उच्च शिक्षित, प्रखर मेधा और अद्वितीय प्रतिभा के धनी भरत पटणकर ने जमीनी संघर्षों को अपना मुख्य कार्य-क्षेत्र बनाया और अकादमिक दुनिया से खुद को बाहर रखा, वहीं गेल ओमवेट ने बहुजन इतिहास लेखन को अपना मुख्य कार्य-क्षेत्र बनाया। उन्होंने इतनी सारी महत्वपूर्ण किताबें लिखीं, जिसने आधुनिक भारत को देखने-समझने का नजरिया बदल दिया और अपने समकालीन बहुजन आंदोलन को वैचारिक दिशा दी

अकारण नहीं है, मान्यवर कांशीराम बार-बार अपने लेखन में गेल ओमवेट की बड़े आदर से चर्चा करते हैं, कांशीराम की इतिहास दृष्टि के निर्माण में सबसे निर्णायक भूमिक गेल ओमवेट की रही है, यह बात केवल कांशीराम के संदर्भ में ही लागू नहीं होती है, अधिकांश बहुजन एक्टिविस्ट और बुद्धिजीवियों ने गेल ओमवेट की किताबों, लेखों को पढ़कर और भाषणों को सुनकर अपनी इतिहास दृष्टि का निर्माण किया है।

गेल ओमवेट ने आधुनिक बहुजन इतिहास के वैशिष्ट को रेखांकित करने के लिए कई महत्वपूर्ण किताबें लिखीं, जिनमें 'दलित और प्रजातांत्रिक क्रांति- उपनिवेशीय भारत में डॉ. आंबेडकर एवं दलित आंदोलन', और 'आंबेडर प्रबुद्ध भारत की ओर' शामिल हैं। जाति के सवाल की जड़ों की तलाश में उन्होंने 'अंडरस्टैंडिंग कास्ट, फ्राम बुद्धा टू आंबेडकर एडं वियांड' और ' भारत में बौद्ध धम्म, ब्राह्मणवाद और जातिवाद को चुनौती' लिखी। बहुजन नायकों-चिंतकों के न्यायपूर्ण, समता एवं बंधुता पर आधारित भारत के स्वप्न को रेखांकित करने के लिए उन्होंने 'सीकिंग बेगमपुरा, द सोशल विजन ऑफ एंटीकास्ट इंटरलेक्टुअल' जैसी किताब लिखी। गेल की अब तक करीब 25 किताबें प्रकाशित हैं और कई सारी किताबों पर वह अभी काम कर रही थीं। वे जहां एक ओर बहुजनों के लिए निरंतर बौद्धिक संपदा सृजित कर रही थीं, वहीं वह बहुजन एवं श्रमिकों के आंदोलनों में सक्रिय हिस्सेदारी भी करती थीं।

बामसेफ और मान्यवर कांशीराम एवं बहुजन एक्टिविस्टों एवं बुद्धिजीवियों से उनका जीवंत नाता था। वे एक ओर वर्ण-जाति से मुक्त भारत के लिए लिखकर और जमीन पर संघर्ष कर रही थीं,  महिला मुक्ति का प्रश्न उनके लिए उतना अहम था। उस मोर्चे पर भी समान रूप में सक्रिय थीं। उन्होंने अपनी जीवन साथी भरत पटणकर के साथ मिलकर श्रमिक मुक्ति दल भी बनाया। वह विस्थापन के शिकार लोगों के लिए निरंतर संघर्ष करती रहीं। उनका लेखन एवं संघर्ष एक न्यायपूर्ण भारत के लिए था। वे वर्ण-जाति एवं पितृसत्ता के खिलाफ लिखने और संघर्ष करने के साथ ही निरंतर मेहनकशों के संघर्षों में भी हिस्सेदारी करती रहीं।

इतिहास को देखने की उनकी पद्धति मार्क्सवादी थी, स्वाभाविक है कि वह वर्ग के सवाल को कभी दरकिनार नहीं कर सकती थीं, न ही किया। उनके लेखन को पढ़ने वाला कोई भी गंभीर पाठक यह सहज पकड़ सकता है कि कैसे वह मार्क्सवादी इतिहास दृष्टि का उपयोग जाति-वर्ग और पितृसत्ता के रिश्ते को समझने और उसका समाधान खोजने के लिए करती थीं। यहां यह स्पष्ट कर दूं कि मार्क्सवादी इतिहास दृष्टि और भारतीय वामपंथियों की इतिहास दृष्टि एक दूसरे का पर्याय नहीं हैं, भारतीय वामपंथी इतिहास दृष्टि अपरकास्ट की वैचारिक छाया एवं मूल्य बोध से आज तक निकल नहीं पाया, वह यांत्रिक तरीके से वर्ण-जाति और पितृसत्ता के प्रश्न पर सोचता रहा और यूरोप का प्रतिबिंब यहां देखता रहा। गेल ओमवेट ने मार्क्सवादी इतिहास दृष्टि का बखूबी भारत को समझने के लिए इस्तेमाल किया और ज्योतिराव फुले, शाहू जी, डॉ. आंबेडकर, रैदास और बुद्ध की क्रांतिकारी परंपरा को भारत की क्रांतिकारी पंरपरा के रूप में रेखांकित किया। ऐसा वे इसलिए कर पाईं, क्योंकि उनकी आंखों में जातिवादी चश्मा नहीं लगा था और न ही पार्टी लाइन पर लिखने की कोई सांगठिन-वैचारिक मजबूरी  थी। गेल भारत को भारत के भीतर से समझने और इसकी क्रांतिकारी-प्रगतिशील धारा रेखांकित करने की आजीवन कोशिश करती रहीं। उनकी किताबें, लेख और भाषण इसके सबूत हैं।

उनका अकादमिक कैरियर भी शानदार था। वह पुणे विश्वविद्यालय में फुले-आंबेडकर चेयर की हेड रहीं, इंस्टीट्यूट ऑफ एशियन स्टडीज, कोपेनेहेगन में प्रोफेसर रहीं, वह इंदिरा गांधी ओपेने यूनिवर्सिटी के डॉ. आंबेडकर चेयर की अध्यक्ष रहीं, वह नेहरू मेमोरियल म्यूजियम (नई दिल्ली) से भी संबद्ध रहीं। उनका जन्म 2 अगस्त 1941 को मिनिआपोलिस (संयुक्त राज्य अमेरिका) में हुआ था। बाद में उन्होंने भारत की नागरिकता ग्रहण कर लिया। वे सेवानिवृत्ति के बाद महाराष्ट्र के सांगली जिले में स्थित कासेगांव में अपने जीवन साथी भरत पटणकर के साथ रह, रही थीं। 25 अगस्त 2021 को 81 वर्ष की आयु में उनका देहांत हो गया।

भारत, विशेषकर भारत के बहुजन समाज ने एक ऐसी  मेधा को खो दिया, जिसके लिए इतिहास लेखन, समाजशास्त्रीय अध्ययन और अध्यापन दुनिया को न्यायपूर्ण और सबके लिए खूबसूरत बनाने का माध्यम था। ऐसी शख्सियत का न रहना वैसे तो पूरी मानव जाति की क्षति है, लेकिन भारत के बहुजनों ने अपना प्रतिनिधि इतिहाकार खो दिया, जिसने बहुजन चिंतन परंपरा, बहुजन वैचारिकी, बहुजन नायकों, बहुजनों के इतिहास और बहुजनों के स्वप्न से पूरी दुनिया को परिचित कराया। ऐसी महान विदुषी गेल ओमवेट को शत्-शत् नमन। हम आपकी किताबों में आप से रूबरू होते रहेंगे और आप से देखने की साफ दृष्टि और जनपक्षधर संवेदना ग्रहण करते रहेंगे और आपकी तथ्य के प्रति, सत्य के प्रति और न्याय के प्रति प्रतिबद्धता को अपने लिए रोशनी की तरह उपयोग करेंगे।

(डॉ. सिद्धार्थ जनचौक के सलाहकार संपादक हैं।)




होगेल के अधिकार सम्बन्धी दर्शन की आलोचना में योगदान- कार्ल मार्क्स


जर्मनी में, धर्म की आलोचना मुख्यतया पूरी हो चुकी है, और धर्म की आलोचना ही समस्त आलोचना का पूर्व-आधार है।


भूल से सम्बन्धित दिव्य भाषण का (oratio pro aris et focise* का) जब तिरस्कार कर दिया जाता है तो उसका अपवित्र लौकिक अस्तित्व भी बे आबरू हो जाता है । मनुष्य स्वर्ग की काल्पनिक वास्तविकता में किसी महामानव की तलाश कर रहा था, लेकिन स्वयं अपने प्रतिविम्ब के अतिरिक्त उसे वहाँ और कुछ नहीं मिला। इसके बाद जहाँ भी अपनी सच्ची असलियत की अब वह तलाश करता है और करेगा वहाँ उसे सिवा स्वयं अपने रूपके, अपनी अमानवी (Unmensch) सूरत के और कुछ नहीं मिलेगा ।


अधार्मिक आलोचना का आधार यह है कि: मनुष्य धर्म बनाता है, धर्म मनुष्य को नहीं बनाता। दूसरे शब्दों में, धर्म ऐसे मानव की आत्मचेतना तथा आत्मानुभूति है जिसने या तो अभी तक अपना अता-पता पाया नहीं है या जो उसे पाकर अपने को फिर खो बैठा है। परन्तु मानव ऐसा कोई हवाई प्राणी नहीं है। जो दुनिया से बाहर कहीं पल्थी मारे बैठा हो । मानव मनुष्य की दुनिया है, राज्य है, समाज है। यह राज्य, यह समाज धर्म को, उल्टी विश्व चेतना को जन्म देता है, क्योंकि वे स्वयं एक उल्टी दुनिया हैं। 

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*. धर्मवेदी तथा अग्नि कुण्ड के समक्ष दिये जाने वाला पवित्र भाषण ।- सम्पादक 


 धर्म उसी दुनिया का आम सिद्धान्त है, उसका सक्षिप्त विश्व - कोश है, लोकप्रिय रूप मे उसका तर्क-शास्त्र है, उसके आत्मिक सम्मान का गौरव है, उसका श्रद्धोन्माद है, उसकी नैतिक शक्ति है, उसकी पवित्र परिपूर्णता है, सान्त्वना तथा समर्थन का उसका सार्व भौमिक आधार है। वह मानव के मूलभूत सार का काल्पनिक साकार रूप है क्योकि मानव के मूलभूत सार की कोई सच्ची असलियत नही है। इसलिए, धर्म के विरुद्ध संघर्ष अप्रत्यक्ष रूप से उस दूसरी दुनिया के विरुद्ध संघर्ष है धर्म जिसका आत्मिक सौरभ है ।


धार्मिक पीडा साथ ही साथ वास्तविक पीड़ा की भी अभिव्यक्ति तथा वास्तविक पीडा के खिलाफ विरोध प्रदर्शन है। धर्म उत्पीडित प्राणी की आह है, एक हृदय हीन दुनिया का वह हृदय है, उसी तरह जिस तरह कि किसी आत्मा-विहीन स्थिति की वह आत्मा है । वह जनता की अफीम है ।


जनता के मिथ्या सुख के रूप मे धर्म का उन्मूलन करना उसके वास्तविक सुख के लिए आवश्यक है। अपनी दशा के सम्बन्ध में भ्रान्तियो को तिलाजलि दे देने की माँग जनता से उस दशा को तिलां जलि दे देने की मांग है जिसमें भ्रान्तियों की आवश्यकता होती है । इसलिए धर्म की आलोचना, वीज रूप में, दुख की उस घाटी की आलो चना है धर्म जिसका प्रभा मण्डल है ।


आलोचना ने बेड़ियो से उनके काल्पनिक फूलो को इसलिए नही तोड़ लिया है जिससे कि उन बेड़ियो को बिना किसी कपोल-कल्पना अथवा सान्त्वना के मनुष्य पहन सके, बल्कि इसलिए तोड़ दिया है कि वह उन बेड़ियो को ही उतार फेंके और सच्चे जीवित फूल को तोड़ सके। धर्म की आलोचना मनुष्य के भ्रमो को इसलिए तोड देती है जिससे कि एक ऐसे आदमी के रूप मे वह सोच और कार्य कर सके और अपनी परिस्थितियों का निर्माण कर सके जिसके भ्रम दूर हो चुके है और जिसने बोधत्व प्राप्त कर लिया है। धर्म की आलोचना ऐसा इसलिए करती है जिससे कि मनुष्य स्वयं अपनी और इस प्रकार, अपने ही सच्चे सूर्य की परिक्रमा करने लगे। धर्म केवल वह मिथ्या सूर्य है जो मनुष्य के चारो तरफ उस समय तक परिक्रमा करता रहता है जिस समय तक कि वह स्वयं अपने चारो तरफ़ परिक्रमा नहीं करने लगता।


इसलिए, उस संसार के मिट जाने के बाद जो सत्य से परे है, इतिहास का कार्य इस संसार के सत्य की स्थापना करना हो जाता है। मानवी आत्म-परकीयकरण (self alienation) के साधु स्वरूप का निराकरण हो जाने के बाद, दर्शन का, जो इतिहास की सेवा के लिए सदा तत्पर रहता है- तात्कालिक कार्य आत्म-परकीयकरण के अपवित्र स्वरूपों का निरावरण करना हो जाता है। इस भाँति, स्वर्ग की आलोचना पृथ्वी की आलोचना बन जाती है, धर्म की आलोचना अधिकार की आलोचना, और धर्म शास्त्र की आलोचना राजनीति की आलोचना। 


नीचे की व्याख्या का जो कि उक्त कार्य मे एक योगदान है- तात्कालिक सम्बन्ध मूल दर्शन से नहीं, बल्कि उसकी एक प्रतिलिपि से है, राजसत्ता और अधिकार के जर्मन दर्शन से है और इसका एकमात्र कारण यह है कि इसे जर्मनी मे लिखा गया है।


अगर कोई जर्मनी की यथास्थिति से ही आरम्भ करना चाहे, और वह भी उसके एकमात्र उचित ढंग से, अर्थात्, नकारात्मक ढंग से, तब भी उसका नतीजा असंगतपूर्ण ही निकलेगा। हमारे राजनीतिक वर्तमान का निषेध तक आधुनिक राष्ट्रो के ऐतिहासिक कबाड़खाने के अन्दर धूल से ढँक गया है। अगर मै पाउडर लगे जूड़े का निषेध कर दूं तब भी बिना पाउडर का जूडा तो मेरे पास बच ही जायगा। अगर मैं जर्मनी की १८४३ की हालतो का निषेध कर दूं तब भी, समय की फ्रान्सीसी गणना के अनुसार, मै १७८६ तक भी नही पहुँचा माना जाऊँगा-वर्तमान के केन्द्र स्थान तक पहुँचने का तो सवाल ही नहीं उठता।


हाँ, जर्मन इतिहास यह कहकर खुश होता रहता है कि इतिहास के स्वर्ग मे जिस गति से वह गुज़रा है उससे न तो उससे पहले कोई कौम गुज़री थी और न उसके बाद ही गुज़रेगी। हमने आधुनिक राष्ट्रो की पुनर्स्थापनाओ मे तो हिस्सा बँटाया है, लेकिन उनकी क्रान्तियो मे हमने हिस्सा नही लिया| हमारी पुनस्थापना हो गयी थी, क्योकि एक तो दूसरे राष्ट्रो ने क्रान्ति करने का साहस दिखाया था और दूसरे, क्योकि अन्य राष्ट्रो को प्रति क्रान्ति के कष्टों को झेलना पडा था। पहली बार हमारी पुनर्स्थापना इसलिए हो गयी थी कि हमारे शासक डरते थे, और दूसरी बार इसलिए कि हमारे शासको को उसका डर नही था। अपने गडरियो के नेतृत्व मे रहने के कारण हम कभी आजादी के पास नही पहुँचे सिवा एक बार के उस दिन जिस दिन उसे दफनाया जा रहा था !


एक सम्प्रदाय जो आज की नीचता को यह कहकर कानूनी ठहराता है कि कल भी नीचता मौजूद थी, एक सम्प्रदाय जो किसी हटर के समय द्वारा प्रतिष्ठा प्राप्त प्राचीन, ऐतिहासिक होने पर उस इन्टर के प्रहारो के विरुद्ध उठने वाले अर्ध-दास के प्रत्येक क्रंदन  को विद्रोही करार दे देता है, एक सम्प्रदाय जिसे इतिहास केवल अपना पिछाडा ही दिखाता है, उसी तरह जिस तरह कि इजरायल के ख़ुदा ने अपने सेवक मोज़ेज को दिखाया था -अधिकार का यह ऐतिहासिक सम्प्रदाय- २१ जर्मन इतिहास को ज़रूर ढूढ निकालता अगर उसे खुद जर्मन इतिहास ने न खोज निकाला होता! यह शाईलोक है, लेकिन सेवक शाइलोक। यह अपनी गुलामी की, अपनी ऐतिहासिक गुलामी की, अपनी ईसाई धर्मी जर्मन गुलामी की कसमे खाता है कि जनता के हृदय प्रदेश से वह मांस का अपना एक एक पौंड कटवा लेगा।


इसके विपरीत, सरल स्वभाव वाले उत्साही लोग, जन्म से जर्मन सोदाई और विचार से बेदीन लोग आजादी के हमारे इतिहास की तलाश हमारे इतिहास से भी आगे प्राचीन ट्यूटानी जंगलो मे करते है । लेकिन इस इतिहास को अगर केवल जंगलो मे ही पाया जा सकता है तो हमारी आजादी के इतिहास तथा सुअर की आजादी के इतिहास के बीच अन्तर क्या है ? इसके अलावा, यह बात सर्वविदित है कि जंगल के अन्दर जो कुछ आप चिल्लाते है उसी को वह दोहरा देता है। इसलिए बेहतर होगा कि प्राचीन ट्यूटानी जंगलो को शान्ति में ही पड़ा रहने के लिए छोड़ दिया जाय।


जर्मन हालात के विरुद्ध युद्ध! अवश्य छेड़िए! ये हालात इतिहास के स्तर से नीचे है, वे किसी भी प्रकार की आलोचना के अयोग्य हैं। परन्तु फिर भी, उस अपरावी की तरह वे भी आलोचना के पात्र है जो मानवता के स्तर से भीचा होता हुआ भी जल्लाद के लिए एक पात्र होता है। उन हालतो के खिलाफ संघर्ष मे आलोचना करना मस्तिष्क का कोई आक्रोश नहीं है, बल्कि वह आक्रोश का मस्तिष्क है। वह नश्तर की छुरी नहीं है, बल्कि एक अस्त्र है। उसका लक्ष्य उसका शत्रु है, जिसका वह खण्डन नहीं करना चाहता, बल्कि जिसे वह जड़-मूल से मिटा देना चाहता है क्योंकि उस हालत की भावना का खण्डन पहले ही हो चुका है। अपने आप मे ऐसी कोई चीज वह नहीं है जिसके बारे में सोचा जाय, वह ऐसी स्थिति है जो उतनी ही घृणित है जितनी उससे घृणा की जाती है। इस स्थिति के सम्बन्ध में अपने तई और कोई स्पष्टीकरण करने की जरूरत आलोचना को नहीं है, क्योकि इस काम को उसने पहले ही पूरा कर लिया है। वह अब स्वयम् कोई लक्ष्य नही रह गयी है, मात्र एक साधन रह गयी है। उसका मूल रस क्रोध है, उसका मूल कार्य निन्दा करना। 


सवाल यहाँ पर तमाम सामाजिक क्षेत्रों के एक-दूसरे के ऊपर  पड़ने वाले पारस्परिक नीरस दबाव का वर्णन करने का है, एक आम निष्क्रिय बदमिजाजी के, एक ऐसी सीमितावस्था के वर्णन करने का है जो एक सरकारी व्यवस्था के ढाँचे के अन्तर्गत अपनी असलियत को जितना जानती है उतना ही उसके बारे मे भ्रम भी रखती है। हर तरह की मनहूसियत के ऊपर जिन्दा रहनेवाली यह सरकारी व्यवस्था स्वयम् सरकार के रूप में बैठी हुई मनहूसियत के अलावा और कुछ नही है !


कैसा दृश्य है! टुच्ची अदावतो, अशान्त अंतःकरणो तथा पाशविक 'सामान्यावस्था के कारण एक-दूसरे की दुश्मन नाना जातियों में समाज अनन्त रूप से बँटता चला जा रहा है, और एक-दूसरे के प्रति उनके सन्दिग्ध तथा अविश्वासी दृष्टिकोण के कारण इन तमाम जातियों के साथ, बिना किसी अपवाद के - यद्यपि भिन्न-भिन्न औपचारिक विधियो से - उनके शासक रियायत में दी गयीं जिन्दगियों की तरह बर्ताव करते है और उनसे इस बात की आशा करते हैं कि अपनी इस स्थिति को स्वयं ईश्वर की कृपा मान कर उन्हे उसका धन्यवाद करना चाहिए कि उन्हें गुलाम बना लिया गया है, उन पर शासन किया जा रहा है, उन पर अधिकार रखा जाता है ! और दूसरी तरफ, स्वयम् शासक लोग है जिनकी महानता उनकी संख्या के उल्टे अनुपात मे है !


इस तरह की आलोचना हाथापाई के रूप में की जाने वाली आलोचना है। इस लड़ाई मे मतलब की चीज यह नहीं है कि विरोधी कुलीन, बराबरी का, दिलचस्प विरोधी है, मतलब की चीज सिर्फ यह है कि उस पर प्रहार किया जाय। मतलब की चीज यह है कि अपने को घोखा देते रहने तथा पस्त अवस्था में पड़े रहने के लिए जर्मनो को मिनट भर का भी समय न दिया जाय। उनके ऊपर जो वास्तविक दबाव डाला जाता है उसमे दबाव की चेतना को जोड़कर उसे और भो भारी बना दिया जाय, उनकी शर्म को उसका प्रचार करके और भी अधिक शर्मनाक बना दिया जाय। साबित कर दिया जाय कि जर्मन समाज का प्रत्येक अंग जर्मन समाज का partie honteuse (शर्मनाक अंश) है, इन पापाणवत् निष्प्राण सम्बन्धियो को उन्ही का गीत सुनाकर नचाया जाये। जनता मे साहस का संचार करने के लिए उसे स्वयम् अपने से डरना सिखलाया जाय। ऐसा करना जर्मन राष्ट्र की एक अत्यावश्यक जरूरत को पूरा करना होगा, और राष्ट्रो की जरूरते स्वयम् उनकी पूर्ति का परम ओचित्य होती है।


जर्मन यथास्थिति की तुच्छ तृप्तावस्था के विरुद्ध यह सच आधुनिक राष्ट्रों के लिये भी महत्वहीन नहीं हो सकता, क्योंकि जर्मनी की यथास्थिति प्राचीन शासन की अप्रच्छन्न पूर्ति है और प्राचीन शासन आधुनिक राज्य की प्रच्छन्नहीनता है। जर्मनी के राजनीतिक वर्तमान के विरुद्ध संघर्ष करना आधुनिक राष्ट्रो के अतीत के विरुद्ध संघर्ष करना है और ये राष्ट्र अतीत की स्मृतियों के बोझ से अब भी बहुत दबे हुए हैं। प्राचीन शासन को, जो उनके साथ-साथ अपनी ट्रेजिडी से गुजर चुका है, व एक जर्मन प्रेत की तरह अपनी कमेडी (स्वाग) दिखाते देखना उनके लिए शिक्षाप्रद है। प्राचीन शासन का इतिहास वास्तव मे तब तक दुखदायी (ट्रैजिक ) था जब तक कि वह दुनिया की पहले से मौजूद सत्ता बना हुआ था, और, दूसरी ओर, स्वतन्त्रता उसके लिए मात्र एक व्यक्तिगत कल्पना थी। संक्षेप में, जब तक अपने न्याय-संगत होने मे यह स्वयं विश्वास करता था और ऐसा करने के लिए मजबूर था तब तक प्राचीन शासन का इतिहास दुखपूर्ण ही था। एक मौजूद विश्व व्यवस्था के रूप में प्राचीन शासन उस विश्व के विरुद्ध जब तक संघर्ष कर रहा था जो अभी पैदा ही हो रहा था, तब तक उसकी भूल एक ऐतिहासिक भूल थी, वैयक्तिक भूल नहीं। यही कारण है कि उसका  अधःपतन दुखदायी था। 


दूसरी तरफ, वर्तमान जर्मन शासन है, जो कि एक काल-दूपण है, आमतौर से मानी हुई स्वयम् सिद्ध बातो का नग्न विरोध है, दुनिया के सामने प्रदर्शित प्राचीन शासन की शून्यता है। उसका निरा ख्याल है कि उसे स्वयम् अपने में आस्था है, और वह माँग करता है कि दुनिया भी ऐसा ही ख्याल करे। उसे स्वयम् अपने मूलतत्व मे अगर आस्था होती, तो उस मूलतत्व को क्या वह एक बाहरी मूलतत्व के आवरण मे छिपाने की कोशिश करता और पाखण्ड तथा सोफीवाद की शरण लेता? आधुनिक प्राचीन शासन उस विश्व व्यवस्था का महज एक माँड़ है जिसके सच्चे नायक मर चुके है। इतिहास अपना काम पूरे तौर से करता है और किसी पुराने रूप ( व्यवस्था को उसकी क़ब्र की ओर ले जाते समय अनेक अव स्थाओ से गुज़रता है। किसी विश्व ऐतिहासिक रूप ( व्यवस्था की अतिम अवस्था उसका स्वांग (कमेडी) होती है। यूनान के देवताओ को, जो एस्कि लस के बन्दी प्रोमीथियस (प्रोमीथियस बाउण्ड) में पहले ही दुखदायी ढंग से घायल होकर मर चुके थे, लूशियन के कथोपकथन मे दुबारा हास्यास्पद ढंग से मरना पड़ा था इतिहास ऐसा रास्ता क्यो अपनाता है? – जिससे कि मानवता अपने अतीत से खुशी-खुशी विदा ले ले। जर्मनी के राज नीतिक अधिकारियों के लिए ऐसे ही सुखमय ऐतिहासिक भवितव्य की पैरवी हम करते है।


इस बीच, ज्योंही स्वय आधुनिक राजनीतिक-सामाजिक वास्तविकता की आलोचना होने लगती है, ज्योही आलोचना वास्तविक मानवीय समस्याओं को पकड़ने की स्थिति में पहुँच जाती है, त्योही वह देखती है कि वह जर्मनी की यथास्थिति से बाहर पहुँच गयी है। ऐसा न होता तो अपने लक्ष्य को वह अपने लक्ष्य के नीचे पकड़ने की कोशिश करती एक उदाहरण लीजिए। आम सम्पदा के ससार के साथ राजनीतिक संसार के साथ उद्योग-धंधे के सम्बन्ध की समस्या आधुनिक काल की प्रमुख समस्याओं में से एक है। इस समस्या ने जर्मनो का ध्यान किस रूप मे अपनी ओर आकर्षित करना शुरू किया है? राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के संरक्षण शुल्कों के रूप मे, प्रतिषेधात्मक व्यवस्था के रूप मे। जर्मनोन्माद मनुष्य से निकल कर भूत (द्रव्य) मे चला गया है। इसीलिए एक दिन सुबह सूती कपडे के हमारे शहन्शाहो और लोहे के नायको ने देखा कि वे अचा नक देशभक्त बन गये हैं ! इसीलिये जर्मनी के लोग इजारेदारी को बाहरी प्रभुसत्ता सौप कर उसकी प्रभुसत्ता को देश के अन्दर स्वीकार कर रहे है । इस तरह, जर्मनी मे लोग अब उस चीज को शुरू करने जा रहे है जिसे फ्रान्स और इंगलैण्ड मे लोग खत्म करने जा रहे है। जिन पुरानी भ्रष्ट परिस्थितियों का ये देश सिद्धान्त रूप मे विरोध कर रहे है और जिन्हे वे उसी तरह से धारण किये हुए है जिस तरह आदमी बेड़ियाँ पहने रहता है, उनका जर्मनी मे एक सुन्दर भविष्य के प्रभात के रूप में अभिनन्दन किया जा रहा है। इस भविष्य की अभी तक इतनी हिम्मत नही हुई है कि वह मक्कारी-भरे सिद्धान्त के क्षेत्र से कठोर व्यवहार के क्षेत्र मे कदम रक्खे । फ्रान्स और इंगलैण्ड मे जहाँ समस्या राजनीतिक अर्थशास्त्र अथवा सम्पदा के ऊपर समाज के शासन की स्थापना करने की है वही जर्मनी मे समस्या राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था अथवा राष्ट्रीयता के ऊपर निजी सम्पत्ति का आधिपत्य कायम करने की है। तब फिर, फ्रान्स और इंगलैण्ड मे समस्या उस इजारेदारी का उन्मूलन करने की है जो अपने चरम परिणामो तक पहुँच गयी है; और जर्मनी में समस्या इजारेदारी को उसके चरम परिणामो तक ले जाने की है। वहां पर समस्या समाधान की है, यहाँ अभी तक वह संघर्ष की है। आधुनिक समस्याओं के जर्मन स्वरूप का यह उपयुक्त उदाहरण हैं, यह इस बात का उदाहरण है कि, एक फूहड रंगरूट की तरह हमारे इतिहास को अब भी किस प्रकार उन चीजो को सीखने के लिए अतिरिक्त कवायद करनी है जो इतिहास मे पुरानी और जीर्ण-शीर्ण हो चुकी है।


इसलिए, सम्पूर्ण जर्मन विकास यदि जर्मनी के राजनीतिक विकास से आगे नही गया, तो वर्तमान काल की समस्याओं मे किसी जर्मन निवासी का अधिक से अधिक उतना ही दखल हो सकता है जितना कि किसी रूसी निवासी का है। परन्तु जब कोई अलग-थलग व्यक्ति राष्ट्र की सीमाओ से नही बँधा होता, तब उस एक व्यक्ति की मुक्ति से सम्पूर्ण राष्ट्र की ओर भी कम मुक्ति होती है। यूनान के दार्शनिको मे एक स्काइथिया निवासी २२ भी था। इस बात से यूनानी संस्कृति की ओर एक कदम भी आगे बढ़ने में स्काइथिया के निवासियों को मदद नही मिली थी। 


सौभाग्य से, हम जर्मन स्काइथिया-वासी नहीं है।


प्राचीन कौमे अपने प्रागैतिहास काल से जिस तरह कल्पना ही कल्पना मे, पौराणिक कथाओं के रूप मे गुजरी थी, उसी तरह हम जर्मनों ने अपने आगामी इतिहास को चिन्तन की दुनिया मे, दर्शन के क्षेत्र में तय कर लिया है। उसके ऐतिहासिक समकालीन हुए बिना ही वर्तमान काल के हम दार्शनिक समकालीन है। जर्मन दर्शन जर्मन इतिहास का भाववादी विस्तार है। इसलिए, अपने वास्तविक इतिहास के अधूरे कामों (aeuvres incompletes) के स्थान पर, अगर हम अपने भाववादी इतिहास के बाद के कामों (aeuvres posthumes ) की आलोचना करते है, तो दर्शन, जो हमारी आलोचना है, जिन प्रश्नों से उलझा हुआ है वे भी वही है जिनके बारे में वर्तमान काल कहता है : वही असली प्रश्न है । प्रगतिशील राष्ट्रो मे जिस चीज़ का अर्थ राज्य की आधुनिक परिस्थितियों के साथ व्यावहारिक रूप से सम्बन्ध विच्छेद करना होता है, उसी का अर्थ जर्मनी मे - जहाँ वे परिस्थितियाँ अभी तक अस्तित्व मे ही नहीं आयी है-परिस्थितियों के दार्शनिक प्रतिविम्ब के साथ सर्वप्रथम आलोचनात्मक सम्बन्ध विच्छेद करना होता है।


अधिकार तथा राज्य का जर्मन दर्शन ही जर्मन इतिहास की एक मात्र ऐसी चीज है जो सरकारी तौर से मान्यता प्राप्त आधुनिक वर्तमान के स्तर तक (al pari) पहुंचती है। इसलिए आवश्यक है कि जर्मन राष्ट्र अपने इस स्वप्निल इतिहास का अपनी वर्तमान परिस्थितियो के साथ सम्बन्ध स्थापित करे और न केवल इन मौजूदा परिस्थितियो की, वल्कि, साथ ही साथ उनके हवाई विस्तार की भी आलोचना करे। उसके भविष्य को न तो राज्य तथा अधिकार की उसकी वास्तविक परिस्थितियों के तात्कालिक निषेध तक सीमित किया जा सकता है और न उसके राज्य तथा अधिकार की भाववादी परिस्थितियों को तुरन्त व्यावहारिक रूप देने के काम तक, क्योकि उसकी भाववादी परिस्थितियो मे उसकी वास्तविक परिस्थितियों का तात्कालिक निषेध निहित है, और पड़ोसी राष्ट्रों के चिन्तन मे वह अपनी भाववादी परिस्थितियों की तात्कालिक अभिपूर्ति की अवस्था से एक तरह से आगे निकल गया है। इसलिए, जर्मनी की व्यावहारिक काम में जुटी हुई राजनीतिक पार्टी अगर माँग करती है कि दर्शन का निषेध किया जाए तो ऐसा वह सकारण ही करती है। उसकी गलती इस बात में नहीं है कि वह इस चीज की माँग करती है, बल्कि इस बात मे है कि वह इसी माँग पर रुक जाती है । इस माँग की न तो वह गम्भीरता से अभिपूर्ति करती है और न उसकी अभिपूर्ति कर ही सकती है। उसका विश्वास है कि दर्शन की ओर पीठ फेर कर और उसकी तरफ से मुह मोड़ कर और उसके सम्बन्ध मे कुछ सड़ी पुरानी तथा कोष भरी बातें बुदबुदा कर उक्त निषेध के कार्य को वह पूरा कर रही है ! अपने दृष्टिकोण की सीमितता के कारण जर्मन वास्तविकता की परिधि मे वह दर्शन को शामिल नहीं करती, अथवा वह सोचती है कि जर्मन अमल तथा उसके सहायक सिद्धान्तों के स्तर से दर्शन नीचा है। आप माँग तो इस बात की करते है कि शुरुआत वास्तविक जीवन के बीजों से की जाय, परन्तु आप भूल जाते हैं कि जर्मन राष्ट्र के वास्तविक जीवन का बीज अभी तक सिर्फ उसकी खोपड़ी के अन्दर ही बढता रहा है। एक शब्द मे- दर्शन को एक वास्तविकता बनाये बिना आप उसका उन्मूलन नहीं कर सकते ! 

यही गलती दर्शन से पैदा होनेवाली सैद्धान्तिक पार्टी ने की थी-उसमे केवल उसके कारको का क्रम उल्टा हो गया था। 


वर्तमान सघर्ष में उसने जर्मन संसार के विरुद्ध दर्शन के केवल आलोचनात्मक संघर्ष को ही देखा था उसने इस बात पर विचार नही किया था कि वर्तमान काल तक का दर्शन स्वयम् संसार का एक अंश है और उसी की परिपूर्ति है, यद्यपि वह उसकी भाववादी प्रति पूर्ति है। अपने जोडीदार (प्रतिरूप अनु०) के प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण रखते हुए भी स्वयम् अपने प्रति उसका दृष्टिकोण आलोचनात्मक नही था। दर्शन के पूर्वावयवों (premises) से श्रीगणेश करके या तो दर्शन द्वारा प्रस्तुत किये गये परिणामो पर ही वह रुक गयी, या फिर उसने कही और की मांगो और निष्कर्षो को दर्शन की तात्कालिक मांगो तथा निष्कपों के रूप में पेश कर दिया। वास्तव में, इन मांगों तथा निष्कर्षो को, बशर्ते कि वे सही हो, वर्तमान काल तक के दर्शन का स्वयम् दर्शन का ही निषेध करके ही प्राप्त किया जा सकता है। इस विषय के सम्बन्ध मे और विस्तार से विचार करने के अपने अधिकार को हम सुरक्षित रखते है। उसकी बुनियादी कमजोरी को निम्न शब्दों में व्यक्त किया जा सकता है। उसने सोचा था कि दर्शन को एक वास्तविकता बनाये बिना ही यह उसका उन्मूलन कर सकती है। 


राजसत्ता और अधिकार के जर्मन दर्शन की आलोचना सब से सुसंगत, सबसे समृद्धणाली तथा अन्तिम विकास होगेल के हाथों में हुआ था। इस आलोचना में आधुनिक राज्य तथा उससे सम्बन्धित वास्तविकता का आलोचनात्मक विश्लेषण भी है, और जिस तरह से राजनीति तथा अधिकार के क्षेत्र में जर्मन-चेतना को अब तक कार्यान्वित किया गया है उस पूरे ढंग का दृढता के साथ किया गया निषेध भी। इस चेतना का सबसे प्रतिष्ठित, सबसे अधिक सार्वभौमिक रूप, जिसे विज्ञान के स्तर तक पहुँचा दिया गया है, अधिकार का परिकल्पी (speculative) दर्शन स्वयम् है। यदि यह सही है कि अधिकार का परिकल्पी दर्शन, अर्थात् आधुनिक राज्य के सम्बन्ध में जिसकी वास्तविकता दूसरे लोक की, चाहे वह लोक राइन के उस पार ही हो, वस्तु बनी रहती है। वह हवाई अतिशयोक्तिपूर्ण चिन्तन यदि केवल जर्मनी में ही सम्भव था, तो इसका उल्टा यानी यह भी सही है कि आधुनिक राज्य का जर्मन चिन्तन-बिम्ब, जो वास्तविक आदमी को भी हवाई ( अमूर्त अनु०) बना देता है, केवल इसीलिए सम्भव हो सका है कि आधुनिक राज्य स्वयम् वास्तविक आदमी को हवाई बना देता हैं, अथवा पूरे मनुष्य को मात्र कल्पना लोक मे ही सतोप प्रदान करता है। राजनीति मे जर्मन जिस चीज को सोचते थे दूसरे राष्ट्र उसे अमल मे पूरा कर रहे थे। जर्मनी उनका सैद्धान्तिक अन्तःकरण था। 


भाग १ शेष अगले भाग २ में

















Wednesday, 25 August 2021

अंतराष्टीय कुत्ता दिवस के अवसर पर



*एक मध्यमवर्गीय कुत्ता-  हरिशंकर परसाई* 

मेरे मित्र की कार बेंगले में घुसी तो उतरते हुए मैंने पूछा, 'इनके यहाँ कुत्ता तो नहीं है?' मित्र ने कहा, 'तुम कुत्ते से बहुत डरते हो। मैंने कहा, 'आदमी की शक्ल में कुत्ते से नहीं डरता। उनसे निपट लेता हूँ। पर सच्चे कुत्ते से बहुत डरता हूँ।"

कुत्तेवाले घर मुझे अच्छे नहीं लगते। वहाँ जाओ तो मेजबान के पहले कुत्ता भौंककर स्वागत करता है। अपने स्नेही से नमस्ते हुई ही नहीं कि कुत्ते ने गाली दे दी क्यों यहाँ आया बे? तेरे बाप का घर है? भाग यहाँ से।

फिर कुत्ते का काटने का डर नहीं लगता चार बार काट ले। डर लगता है उन चौदह बड़े इंजेक्शनों का जो डॉक्टर पेट में घुसेड़ता है। यूँ कुछ आदमी कुत्ते से अधिक जहरीले होते हैं। एक परिचित को कुत्ते ने काट लिया था। मैंने कहा, इन्हें कुछ नहीं होगा। हालचाल उस कुत्ते का पूछो और इंजेक्शन उसे लगाओ।' एक नए परिचित ने मुझे घर पर चाय के लिए बुलाया। मैं उनके बेंगले पर पहुँचा तो फाटक पर तख्ती टॅगी दीखी कुत्ते से

सावधान!' में फौरन लौट गया।

कुछ दिनों बाद वे मिले तो शिकायत की, 'आप उस दिन चाय पीने नहीं आए। मैंने कहा, 'माफ करें में बैंगले तक गया था। वहाँ तख्ती लटकी थी कुत्ते से सावधान। 'मेरा ख्याल था, उस बंगले में आदमी रहते हैं पर नेमप्लेट की टैगी हुई दीखी। यूँ कोई-कोई आदमी कुत्ते से बदतर होता है। मार्क ट्वेन ने लिखा है यदि आप भूखे मरते कुत्ते को रोटी खिला दें, तो वह आपको नहीं काटेगा। कुत्ते में और आदमी में यही मूल अंतर है।

बंगले में हमारे स्नेहीं थे। हमें वहाँ तीन दिन ठहरना था। मेरे मित्र ने घटी बजाई तो जाली के अंदर से वही भी-भी की आवाज आई।

मैं दो कदम पीछे हट गया। हमारे मेजबान आए। कुत्ते को डॉटा टाइगर टाइगर' उनका मतलब - शेर, ये लोग कोई चोर-डाकू नहीं

है तू इतना वफादार मत बन कुत्ता ज़ंजीर से बँधा था। उसने देख भी लिया था कि हमें उसके मालिक खुद भीतर ले जा रहे हैं पर वह भौंके जा रहा था। मैं उससे काफी दूर से लगभग दौड़ता हुआ भीतर गया। मैं समझा, यह उच्चवर्गीय कुत्ता है। लगता ऐसा ही है। मैं उच्चवर्गीय का बड़ा अदब करता हूँ। चाहे वह कुत्ता ही क्यों न हो उस बंगले में मेरी अजब स्थिति थी। मैं हीनभावना से ग्रस्त था इसी अहाते में एक उच्चवर्गीय कुत्ता और इसी में मैं वह मुझे हिकारत की नजर से देखता।

शाम को हम लोग लॉन में बैठे थे। नौकर कुत्ते को अहाते में घुमा रहा था। मैंने देखा, फाटक पर आकर दो सडकिया आवारा कुत्ते

खड़े हो गए। वे सर्वहारा कुत्ते थे। वे इस कुत्ते को बड़े गौर से देखते। फिर यहाँ-वहाँ घूमकर लौट आते और इस कुत्ते को देखते रहते पर

यह बेंगलेवाला उन पर भोंकता था। वे सहम जाते और यहाँ-वहाँ हो जाते पर फिर आकर इस कुते को देखने लगते। मेजबान ने कहा,

'यह हमेशा का सिलसिला है। जब भी यह अपना कुत्ता बाहर आता है, वे दोनों कुत्ते इसे देखते रहते हैं।

मैंने कहा, पर इसे उन पर भौंकना नहीं चाहिए। यह पट्टे और जजीरवाला है। सुविधाभोगी है। वे कुत्ते भुखमरे और आवारा है।

इसकी और उनकी बराबरी नहीं है। फिर यह क्यों चुनौती देता है।"

रात को हम बाहर ही सोए। जंजीर से बंधा कुत्ता भी पास ही अपने तखत पर सो रहा था। अब हुआ यह कि आसपास जब भी वे कुत्ते भौंकते, यह कुत्ता भी भौकता। आखिर यह उनके साथ क्यों भौकता है? यह तो उन पर भौकता है। जब वे मोहल्ले में भौकते हैं तो यह भी उनकी आवाज में आवाज मिलाने लगता है, जैसे उन्हें आश्वासन देता हो कि मैं यहाँ हूँ तुम्हारे साथ हूँ।

मुझे इसके वर्ग पर शक होने लगा है। यह उच्चवर्गीय कुत्ता नहीं है मेरे पड़ोस में ही एक साहब के पास थे दो कुत्ते। उनका रोब ही निराला। मैंने उन्हें कभी भौंकते नहीं सुना। आसपास के कुत्ते भौंकते रहते, पर वे ध्यान नहीं देते थे। लोग निकलते, पर वे झपटते भी नहीं थे। कभी मैंने उनकी एक धीमी गुर्राहट ही सुनी होगी। वे बैठे रहते या घूमते रहते फाटक खुला होता, तो भी वे बाहर नहीं निकलते थे. बड़े रोबीले, अहंकारी और आत्मतुष्ट

यह कुत्ता उन सर्वहारा कुत्तों पर भौंकता भी है और उनकी आवाज में आवाज भी मिलाता है। कहता है मैं तुममें शामिल हूँ।

उच्चवर्गीय झूठा रोब भी और संकट के आभास पर सर्वहारा के साथ भी यह चरित्र है इस कुत्ते का यह मध्यवर्गीय चरित्र है। यह मध्यवर्गीय कुत्ता है। उच्चवर्गीय होने का ढोंग भी करता है और सर्वहारा के साथ मिलकर भौकता भी है। तीसरे दिन रात को हम लौटे तो देखा, कुत्ता त्रस्त पड़ा है। हमारी आहट पर वह भौका नहीं,

थोड़ा-सा मरी आवाज में गुराया। आसपास के आवारा कुत्ते भौंक रहे थे, पर यह उनके साथ भाँका नहीं। निढाल पड़ गया। मैंने मेजबान से कहा, 'आज तुम्हारा कुत्ता बहुत शांत है।

थोड़ा गुराया और फिर

मेजबान ने बताया, 'आज यह बुरी हालत में है. हुआ यह कि नौकर की गफलत के कारण यह फाटक से बाहर निकल गया। वे दोनों कुत्ते तो घात में थे ही दोनों ने इसे घेर लिया। इसे रगेंदा। दोनों इस पर चढ़ बैठे इसे काटा। हालत खराब हो गई नौकर इसे बचाकर लाया। तभी से यह सुस्त पड़ा है और घाव सहला रहा है। डॉक्टर श्रीवास्तव से कल इसे इंजेक्शन दिलाउँगा।"

मैंने कुत्ते की तरफ देखा। दीन भाव से पड़ा था। मैंने अंदाज लगाया। हुआ यों होगा

यह अकड़ से फाटक के बाहर निकला होगा। उन कुत्तों पर भौंका होगा। उन कुत्तों ने कहा होगा अबे, अपना वर्ग नहीं पहचानता ढोंग रचता है। ये पट्टा और जंजीर लगाए है मुफ्त का खाता है लॉन पर टहलता है। हमें उसक दिखाता है। पर रात को जब किसी आसन्न संकट पर हम भौकते हैं, तो तू भी हमारे साथ हो जाता है संकट में हमारे साथ है, मगर यों हम पर भौकेगा। हममें से है तो निकल बाहर छोड़ यह पट्टा और जजीर छोड़ यह आराम घूरे पर पड़ा अन्न खा या चुराकर रोटी खा धूल में लोट। यह फिर भौका होगा। इस पर वे कुत्ते झपटे होंगे। यह कहकर 'अच्छा ढोंगी दगाबाज, अभी तेरे झूठे दर्प का अहंकार नष्ट किए देते हैं।'

इसे रगेदा, पटका, काटा और धूल खिला

कुत्ता चुपचाप पड़ा अपने सही वर्ग के बारे में चिंतन कर रहा है।

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