Sunday, 3 January 2021

Marx on how rich farmers gets surplus profit at the the expense of poor peasants


It is true that the peasant, for example, devotes a great deal of labour to his small parcel of land.But this labour in isolated, and deprived of the objective social and material conditions of productivity; it is denuded of them.
the effect of this factor is that the genuinely capitalist farmers are in a position to appropriate a portion of surplus profit; this would disappear, at least as as the present point is concerned, if the capitalist mode of production were as uniformly developed in agriculture as in manufacture........Capital, vol3,

Saturday, 2 January 2021

स्टालिन, लेनिनवाद के मूल सिद्धांत : किसानों का सवाल

स्टालिन, लेनिनवाद के मूल सिद्धांत : किसानों का सवाल-

दूसरे इंटरनेशनल की पार्टियों ने किसानों के सवाल के प्रति जिस उदासीनता और विरोध की जिस भावना का परिचय दिया है, उसका कारण पश्चिम देशों के विकास की विशेषताओं में नहीं है। उसका मुख्य कारण यह है कि ये पार्टियां सर्वहारा अधिनायकत्व में ही यकीन नहीं करतीं। वे क्रांति से भय खाती हैं और राज्यसत्ता पर अधिकार करने के लिए मजदूर वर्ग का नेतृत्व नहीं करना चाहतीं। यह स्वाभाविक है कि जो लोग क्रांति से डरते हैं और सर्वहारा को राजसत्ता की ओर ले जाने की इच्छा नहीं रखते, उनकी सर्वहारा के सहायकों के प्रश्न में भी कोई दिलचस्पी नहीं होगी। उनके लिए इस प्रश्न का कोई महत्व नहीं होता। यहां तक कि किसान समस्या का मजाक उड़ाना भी दूसरे इंटरनेशनल के सूरमाओं द्वारा सभ्यता और 'सच्चे' मार्क्सवाद का लक्षण माना जाता है। सच पूछिए तो इस दृष्टिकोण में मार्क्सवाद के अणुमात्र का भी समावेश नहीं है। सर्वहारा क्रांति के संधि काल में किसानों की महत्वपूर्ण समस्या के प्रति इस प्रकार की उदासीनता सर्वहारा अधिनायकत्व की धारणा का परित्याग कर देने तथा मार्क्सवाद से नाता तोड़ देने के बराबर है।

लाल हमारा रंग



हमें ऐसी कविताओं की जरूरत है
जिनमें खून के रंग की आभा हो
और दुश्मनों के लिए आती हो जिनसे
यमराज के भैंसे की घंटी की आवाज!

कविताएँ
जो आतताइयों के चेहरे पर
सीधा वार करती हों
और उनके गरूर को तोड़ती हों!

कविताएँ
जो लोगों को बताएँ
कि मृत्यु नहीं, जीवन
निराशा नहीं, आशा
सूर्यास्त नहीं, सूर्योदय
प्राचीन नहीं, नवीन
समर्पण नहीं, संघर्ष!

कवि, तुम लोगों को बताओ
कि सपने सच्चाई में बदल सकते हैं
तुम आजादी की बात करो
और धन्नासेठों को सजाने दो
थोथी कलाकृतियों से अपनी बैठकें!

तुम आजादी की बात करो
और महसूस करो लोगों की आँखों में
जनशक्ति की वह ऊष्मा
जो जेल की सलाखों को
सरपत घास की तरह मरोड़ देती है
ग्रेनाइट की दीवारों को ध्वस्त करके
रेत में बदल देती है!

कवि,
इससे पहले कि यह दशक भी
अतीत में गर्क हो जाय
तुम जनता के बीच जाओ और
जन संघर्षों को आगे बढ़ाने में
मदद करो !

-- ए एन सी कुमालो (अफ़्रीकी कवि)

कवि मार्गरेट वाकर (1915-1998) की कविता : अपने लोगों के लिये

अफ्रीकी-अमेरिकी महिला कवि मार्गरेट वाकर (1915-1998) की राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त कविता :

अपने लोगों के लिये
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अपने उन लोगों के लिये
जो गाते हैं हर कहीं अपनी दासता के गीत
निरन्तर : अपने शोकगीत और पारंपरिक गीत
अपने विषाद गीत और उत्सव-गीत,
जो दोहराते आ रहे हैं प्रार्थना के गीत हर रात
किसी अज्ञात ईश्वर के प्रति,
घुटनों पर बैठ कर आर्त्त भाव से
किसी अदृश्य शक्ति के सामने;

अपने उन लोगों के लिये
जो देते आ रहे हैं उधार अपनी सामर्थ्य वर्षों से,
बीते वर्षों और हाल के वर्षों और संभावित वर्षों को भी,
धोते इस्तरी करते खाना पकाते झाड़ू-पोंछा करते
सिलाई मरम्मत करते फावड़ा चलाते 
जुताई खुदाई रोपनी छंटाई करते पैबन्द लगाते
बोझा खींचते हुए भी जो न कमा पाते न चैन पाते हैं
न जानते और न ही कुछ समझ पाते हैं;

बचपन में अलबामा की 
मिट्टी और धूल और रेत के अपने जोड़ीदारों के लिये 
आंगन के खेल-कूद बपतिस्मा और धर्मोपदेश और चिकित्सक
और जेल और सैनिक और स्कूल और ममा और खाना
और नाट्यशाला और संगीत समारोह और दूकान और बाल
और मिस चूम्बी एंड कंपनी के लिये;

तनाव और कौतूहल से भरे उन वर्षों के लिये 
जब हम दाखि़ल हुए स्कूल में पढ़ाई के लिये
क्यों के कारणों और उत्तरों और कौन से लोग
और कौन सी जगह और कौन से दिन को 
जानने के लिये, उन कड़वे दिनों को याद करते हुए
जब हमें पहली बार मालूम हुआ कि हम 
अश्वेत और गरीब और तुच्छ और भिन्न हैं 
और कोई भी हमारी परवाह नहीं करता
और किसी को हम पर अचंभा नहीं होता
और कोई भी समझता ही नहीं हमें;

उन लड़कों और लड़कियों के लिये
जो इन सबके बावज़ूद भी पलते रहे बढ़ते रहे
आदमी और औरत बनने के लिये
ताकि हंसें और नाचें और गायें और खेलें और
कर सकें सेवन शराब और धर्म और सफलता का,
कर सकें शादी अपने जोड़ीदारों से और 
पैदा करें बच्चे और मर जायें एक दिन
उपभोग और एनीमिया और लिंचिंग से;

अपने उन लोगों के लिये जो कसमसाते हैं 
भीड़भाड़ में शिकागों की सड़कों पर और 
लेनॉक्स एवेन्यू में और न्यू ओरलीन्स की
परकोटेदार गलियों में, उन गुमशुदा
वंचित बेदख़ल और मगन लोगों के लिये
जिनसे भरे हैं शराबख़ाने और चायख़ाने और
अन्य लोग जो मोहताज़ हैं रोटी और जूतों
और दूध और ज़मीन के टुकड़े और पैसे और 
हर उस चीज़ के लिये जिसे कहा जा सके अपना;

अपने उन लोगों के लिये,
जो बांटते फिरते हैं ख़ुशियां बेपरवाह होकर,
नष्ट कर देते हैं अपना समय क़ाहिली में,
सोते हैं भूखे-प्यासे, बोझा ढोते चिल्लाते हैं,
पीते हैं शराब नाउम्मीदी में,
जो बंधे हुए, जकड़े और उलझे हैं हमारे ही बीच के
उन अदृश्य मनुष्यों की बेड़ियों में
हमारे ही कंधों पर होकर सवार जो
बनते हैं सर्वज्ञानी और हंसते हैं;

अपने उन लोगों के लिये जो
करते हैं गलतियां और टटोलते 
और तड़फड़ाते हैं अंधेरों में
गिरजाघरों और स्कूलों और क्लबों
और समितियों, संस्थाओं और परिषदों
और सभाओं और सम्मेलनों के,
जो हैं दुखी और क्षुब्ध और ठगी के शिकार
और जिन्हें निगल लिया है धनपशुओं
और प्रभुता के भुक्खड़ जोंकों ने,
जिन्हें लूटा जा रहा है
राज्य के हाथों प्रत्यक्ष बल-प्रयोग से
और छला जा रहा है झूठे 
भविष्यवक्ताओं और धार्मिक मतवादियों द्वारा;

अपने उन लोगों के लिये
जो जुटे हैं इकट्ठा हैं प्रयासरत हैं
एक ऐसे बेहतर मार्ग के निर्माण के लिये
जो कि बाहर निकाल सके उन्हें
भ्रमजाल से, पाखंड और ग़लतफ़हमी से,
जो प्रयासरत हैं एक ऐसी दुनिया बनाने के लिये
जो जगह दे सके तमाम लोगों, तमाम शक्लों
तमाम आदमों और ईवों
और उनकी बेहिसाब पीढ़ियों को भी;

एक नयी पृथ्वी का उदय होने दो।
पैदा होने दो एक और दुनिया को।
एक रक्तिम शान्ति को 
अंकित हो जाने दो आसमान पर।
साहस से भरी अगली पीढ़ी को आने दो आगे,
होने दो संवर्द्धन एक ऐसी आज़ादी का 
भरा हो अनुराग जिसमें जन-जन के लिये।
राहत से भरी हुई सुन्दरता को 
और उस शक्ति को जो निर्णयकारी हो
हो जाने दो स्पंदित हमारी आत्माओं में
और ख़ून में हमारे।
आओ कि अब लिखे जायें गीत प्रयाण के,
जिनमें तिरोहित हो जायें शोक के गीत।
अब हो जाना चाहिये उद्भव तत्क्षण
इन्सानों की एक प्रजाति का 
और सम्भाल लेना चाहिये जिम्मा शासन का उसे। 

(अंग्रेज़ी से अनुवाद– राजेश चन्द्र, 26 दिसम्बर, 2018)

भारत में लोकतंत्र बहुत है..!



कुपोषण से यहां,
बच्चे मरते बहुत हैं..!
बिना दवा-दारू के
अकाल मौतें बहुत हैं..!
किसान करते यहां,
आत्महत्या बहुत हैं..!
बेगुनाह लोग यहां,
जेल भरते बहुत हैं..!
लड़कियों के साथ यहां, 
होते बलात्कार बहुत हैं..!
जल-जमीन-जंगल के लिये यहां,
होते जुल्म बहुत हैं..!
सरकार खजाने की लूट बहुत है..!
उसी खजाने में लोक को देने,
षड़यंत्रकारी, अलगाववादी, नक्सलवादी,
देशद्रोही, वामपंथी, टुकड़े-टुकड़े गैंग जैसे
आभूषण भी बहुत हैं..!

अभी अभी हुआ है...
संसद की नई भव्य इमारत का शिलान्यास..!
बनने वाला है आलीशान नया राजपथ..!
अभी-अभी गांधी के चरणों में,
अर्पित किये हैं फूल..!
अभी-अभी बाबा साहेब को पहनाई है माला..!
अभी-अभी दिल्ली के जनपथ पर,
कड़कड़ाती ठंड में खुले आसमान के नीचे,
किसान लड़ रहें हैं जिंदगी की जंग..!
अभी-अभी हुई है उनपर,
लाठी-गोली, पानी की बौछार..!
बरस रही है लोक-तंत्र की अनवरत धार..!

अभी-अभी एक किसान ने
अपनी पकी-पकाई फसल पर,
चला दिया है ट्रैक्टर..!
अभी-अभी कई किसान,
सड़क पर फेंक रहें हैं, 
आलू, टमाटर और प्याज़..!
अचानक सड़क पर बहने लगी है,
दूध की नदी..!
एक भिखारी और कुत्ता साथ-साथ,
पी रहें हैं वो दूध..!
भारत में लोकतंत्र बहुत है..!

अभी-अभी रिकार्ड दीये जलाकर,
गिनीज़ बुक में अपना नाम दर्ज कराया है उन्होंने..!
रात भर जले हुए दीयों से,
बचा हुआ तेल शीशी में भर रही है,
एक छोटी सी बच्ची..!

संसद की पुरानी इमारत,
कोरोना के डर से कांप रही है..!
सांसदों को या सरकार को
कोरोना न हो जाये,
इसलिये शीतकालीन अधिवेशन नहीं होगा..!

चुप! भारत में लोकतंत्र बहुत है..!

#सरला माहेश्वरी।

किसानों के सवाल पर एंगेल्स

हमारी पार्टी का यह कर्तव्य है कि किसानों को बारंबार स्पष्टता के साथ जताए कि पूंजीवाद का बोलबाला रहते हुए उनकी स्थिति पूर्णतया निराशापूर्ण है  ,कि उनकी छोटी जोतों को इस रूप में बरकरार रखना एकदम असंभव है ,कि बड़े पैमाने का पूंजीवादी उत्पादन उनके छोटे उत्पादन की अशक्त , जीर्ण-शीर्ण प्रणाली को उसी तरह कुचल देगा, जिस तरह रेलगाड़ी ठेला गाड़ी को कुचल देती है। ऐसा करके हम आर्थिक विकास की अनिवार्य प्रवृत्ति के अनुरूप कार्य करेंगे ।और यह विकास एक न एक दिन छोटे किसानों के मन में हमारी बात को बैठाए  बिना नहीं रह सकता।     (पृ.385)
    ....मझोला किसान जहां छोटी जोत वाले किसानों के बीच रहता है ,वहां उसके हित और विचार उनके हित और विचारों से बहुत अधिक भिन्न नहीं होते ।वह अपने तजुर्बे से जानता है कि उसके जैसे कितने ही लोग छोटे किसानों की हालत में पहुंच चुके हैं ।पर जहां मझोले और बड़े किसानों का प्राधान्य होता है और कृषि के संचालन के लिए आम तौर पर नौकर और नौकरानियों की आवश्यकता होती है, वहां बात बिल्कुल दूसरी ही है ।कहने की जरूरत नहीं कि मजदूरों की पार्टी को प्रथमत: उजरती मजदूरों की ओर से, यानी इन नौकरों- नौकरानियों और दिहाड़ीदार मजदूरों की ओर से ही लड़ना है। किसानों से ऐसा कोई वादा करना निर्विवाद रूप से निषिद्ध है, जिसमें मजदूरों की उजरती गुलामी को जारी रखना सम्मिलित हो। परंतु जब तक बड़े और मझोले किसानों का अस्तित्व है ,वे उजरती मजदूरों के बिना काम नहीं चला सकते ।इसलिए छोटी जोत वाले किसानों को हमारा यह आश्वासन देना कि वह इस रूप में सदा बने रह सकते हैं , जहां मूर्खता की पराकाष्ठा होगी ,वहां बड़े और मझोले किसानों को यह आश्वासन देना गद्दारी की सीमा तक पहुंच जाना होगा।      (पृ.385-86)
       ....  हमें आर्थिक दृष्टि से यह पक्का यकीन है कि छोटे किसानों की तरह बड़े और मझोले किसान भी अवश्य ही पूँजीवादी उत्पादन और सस्ते विदेशी गल्ले की होड़ के शिकार बन जायेंगे। यह इन किसानों की भी बढ़ती हुई ऋणग्रस्तता और सभी जगह दिखाई पड़ रही अवनति से सिद्ध हो जाता है।(पृ.386)     
   उपरोक्त उद्धरण     'फ्रांस और जर्मनी में किसानों का सवाल', एंगेल्स, संकलित रचनाएं ,खण्ड 3,भाग2 से लिया गया है।

Friday, 1 January 2021

पढ़ना-लिखना सीखो ओ मेहनत करने वालो

पढ़ना-लिखना सीखो ओ मेहनत करने वालो
पढ़ना-लिखना सीखो ओ भूख से मरने वालो

क ख ग घ को पहचानो
अलिफ़ को पढ़ना सीखो
अ आ इ ई को हथियार
बनाकर लड़ना सीखो

ओ सड़क बनाने वालो, ओ भवन उठाने वालो
खुद अपनी किस्मत का फैसला अगर तुम्हें करना है
ओ बोझा ढोने वालो ओ रेल चलने वालो
अगर देश की बागडोर को कब्ज़े में करना है

क ख ग घ को पहचानो
अलिफ़ को पढ़ना सीखो
अ आ इ ई को हथियार
बनाकर लड़ना सीखो

पूछो, मजदूरी की खातिर लोग भटकते क्यों हैं?
पढ़ो,तुम्हारी सूखी रोटी गिद्ध लपकते क्यों हैं?
पूछो, माँ-बहनों पर यों बदमाश झपटते क्यों हैं?
पढ़ो,तुम्हारी मेहनत का फल सेठ गटकते क्यों हैं?

पढ़ो, लिखा है दीवारों पर मेहनतकश का नारा
पढ़ो, पोस्टर क्या कहता है, वो भी दोस्त तुम्हारा
पढ़ो, अगर अंधे विश्वासों से पाना छुटकारा
पढ़ो, किताबें कहती हैं – सारा संसार तुम्हारा

पढ़ो, कि हर मेहनतकश को उसका हक दिलवाना है
पढ़ो, अगर इस देश को अपने ढंग से चलवाना है

पढ़ना-लिखना सीखो ओ मेहनत करने वालो
पढ़ना-लिखना सीखो ओ भूख से मरने वालो

०००००
सफ़दर हाशमी

१९५३ में स्टालिन की शव यात्रा पर उमड़ा सैलाब 

*On this day in 1953, a sea of humanity thronged the streets for Stalin's funeral procession.* Joseph Stalin, the Soviet Union's fea...