Wednesday, 10 November 2021

छठ पर्व

वैसे तो पृथ्वी पर मानव तथा अन्य जीव जंतु एवं पेड़ पौधों के जन्म लेने और विकसित होकर आज तक पहुंचने में कितने साल लग गए सही सही तो नहीं कह सकते, लेकिन हजारों या लाख वर्ष भी  समय लगा हो सकता है।
                   मुझे जो बात करनी है वह यह कि मनुष्य जब बानर से नर की अवस्था में आया तो उसका दिमाग अलग तरह से काम करना शुरू किया। प्रकृति से उसका सामना हर हमेशा होता रहता था, इसलिए प्राकृतिक घटनाओं को जानने की जिज्ञासा भी उसके अंदर पैदा होने लगी। ज्ञान के अभाव में अनुमान के आधार पर चीजों की समझ एवं व्याख्या करने लगा ।लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया उसके दिमाग का विकास भी प्रकृति के साथ क्रिया- प्रतिक्रिया करने से  बढ़ता गया। प्राकृतिक चीजों का सही ज्ञान न होने से उसके प्रति डर या उसके द्वारा कोई अपशकुन न हो जाए, तरह-तरह की आराधना एवं देवी देवताओं की कल्पना कर उसकी मूर्तियां बना, उसका पूजन भी शुरू किया। बहुत सारी परंपराएं एवं पूजन प्रथाएं हैं धीरे-धीरे खत्म भी होती गई उसके कारण के विश्लेषण में मैं अभी नहीं जा रहा हूं।
                   मुझे जो बात कहनी है ,वह छठ का त्योहार जो प्रतिवर्ष लाखों लोग बिहार, उत्तर प्रदेश का पूर्वी भाग और झारखंड में विशेष रुप से धूमधाम तथा अति पवित्रता का ध्यान रखते हुए मनाया जाता है। यह पूरे साल में दो बार होती है एक कार्तिक एवं दूसरा चैत मास में। यह शुरू कैसे हुआ इसके इतिहास में  अभी मुझे नहीं जाना है। एक बात तो तय है कि आज भी बहुत से अनपढ़ लोग मानते हैं कि पृथ्वी स्थिर है तथा सूर्य उसकी परिक्रमा करता है। जब  कि वैज्ञानिकों ने सिद्ध कर दिया है कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा वार्षिक और दैनिक गति से करती है तथा सूर्य भी अपनी धुरी पर परिक्रमा करता है।
                 मुझे बातें ज्यादा विस्तार में न जाकर छठ पूजा के महिमा एवं इसके अनुष्ठान के संबंध में करनी है। इसे मानने वालों का कहना है कि इसके करने की प्रक्रिया में कोई गलती हो गई या  अपवित्र हो गया तो बहुत बड़ी अनहोनी, अपशकुन हो सकता है ।आज विज्ञान का युग है और वैज्ञानिक प्रकृति जन्य चीजों को जानना और उसका वैज्ञानिक विश्लेषण करने में भी लगे हुए हैं। ऐसी भी मान्यता है कि छठ व्रत करने से मन में मानी हुई लालसा या मन्नत पूरी हो जाती है।
                लेकिन मैं इससे सहमत नहीं होता। मनुष्य रोज या  या कहें कि अपने जीवन में कुछ न कुछ करते रहता है, इस क्रम में सफलता और असफलता उसे मिलती रहती है। इसके कारण को पता लगाने से हम निष्कर्ष पर पहुंच सकते हैं कि सफलता और असफलता के क्या कारण हैं। यह बात वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो चुकी है कि सूर्य  के अभाव में पृथ्वी पर का जीवन असंभव है। वैज्ञानिक  अब तक की खोज में सफल हुए हैं कि सूर्य का भी अंत होगा और जब सूर्य का अंत होगा तो पृथ्वी का अंत होना भी स्वाभाविक है। लेकिन इसमें लाखों वर्ष से भी अधिक लग सकते हैं ऐसा ही कुछ कथन है।
                  लोगों का विश्वास- अंधविश्वास है  इसलिए प्रतिवर्ष छठ किए जा रहे हैं, सफलता मिली तो छठ मैया की झोली में और असफलता मिली तो अपने कर्म को दोषी मानना और कोसना।
                अब मैं अपनी कुछ बातें विश्लेषणात्मक रूप में कहूंगा ।एक बात जो मैं कहना चाहता हूं कि इस त्योहार में डूबते सूर्य और ऊगते सूर्य की पूजा जो की जाती है ,इस बिंदु पर मुझे कहना है कि सूरज कभी  न तो डूबता है और न उगता है। पृथ्वी अपनी दैनिक गति से अपनी धुरी पर एक बार घूम जाती है इसलिए अभी हमारे यहां सूर्य अगर डूब रहा है तो कहीं रात होगी या दिन या कोई और समय होगा अथवा सूरज उग रहा होगा। इसलिए डूबते सूरज को और उगते सूरज को अर्घ देने की मान्यता आज जब हम सूरज और पृथ्वी के बारे में जान गए हैं तो खंडित हो जाती है। एक बात और देखने को मिल रही है कि इस पर्व का वाहक मध्यवर्ग बहुतायत रूप से है। मजदूर वर्ग भी अल्प संख्या में ही सही लेकिन इस दौड़ में शामिल है।
                 अब इसके  पवित्रता पर भी कुछ अनुभव साझा करना चाहता हूं। आज से 45 वर्ष पहले की पटना शहर की ही बात है। हम पांच छ: साथियों ने तय किया कि छठ के प्रसाद को पहला अर्घ देने के पहले ही खाया जाए। लेकिन वो अर्घ के  पहले ही प्रसाद देगा कौन? क्योंकि उसको भारी अपशकुन या कोई बड़ी हानि हो जाएगी। इसी क्रम में एक साथी के घर छठ हो रहा था, वह तैयार हुआ की दउरा मैं ही घर का ले चलूंगा और  रास्ते में कहीं गली में जगह देखकर ठेकुआ निकाल लेना होगा ।हुआ ऐसा ही, उस साथी के सहयोग से ठेकुआ तो निकल गया। अब हुआ कि इसका  पारन अथार्त  खाया जाए। वह साथी भी जो डगरा लेकर गया था, घाट पर रख कर आया और हम सभी साथी मेरे ही डेरा पर बैठकर प्रेम से उसे सब कोई खाया, यहां तक कि मेरी पत्नी भी बोलते हुए खाई कि जब सब मर ही जाएंगे तो मैं जी कर क्या करूंगी? उसने भी ठेकुआ खाया। हम सभी साथी आज तक सकुशल हैं। उत्थान- पतन गिरना- उठना तो सबके जीवन में इस पूंजीवादी व्यवस्था में लगा हुआ है। लेकिन प्रसाद को पहले ही खाने से कोई अपशकुन नहीं हुआ। हमारे कहने का तात्पर्य है कि इसे के पीछे एक बहुत बड़ा अंधविश्वास चला आ रहा है और लोग लकीर के फकीर बन ढ़ोए जा रहे हैं ।तर्क, विवेक, विज्ञान सम्मत दिमाग लोग विकसित ही नहीं कर रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि शासक वर्ग / पूंजीपति वर्ग को इस से खूब लाभ हो रहा है। मनुष्य अपनी समस्याओं के वास्तविक कारण के तरफ न जाय, तर्क एवं विवेक को सोचने का आधार न बनावे तो इस वर्ग को फायदा ही फायदा है। इसके व्यवस्था की आयु बढ़ते ही रहेगी। इसलिए शासक वर्ग, पूंजीपति वर्ग एवं मध्य वर्ग के साथ ही राज्य भी इसके मनाने और सुचारू रूप से संपन्न हो, भरपूर मदद करता है।धर्म निरपेक्षता की नीति का दूर-दूर तक अवहेलना एवं खुला खेल होता है। मजदूर को खासकर अपनी सोच और समझदारी इसके प्रति विज्ञान सम्मत बनाने की अति आवश्यकता है।
                  मैं इस पर्व के पीछे डर ,भय एवं अंधविश्वास का सिद्धांत जो काम कर रहा है, उसका ही मूल रूप से आलोचनात्मक विश्लेषण कर रहा हूं ।इसकी मान्यता मनुष्य को पूर्ण मानव बनने में बाधक है। इसलिए इसका क्रिटिकल विश्लेषण तो होना ही चाहिए ।यह मेरे अपने विचार हैं मेरा किसी को आहत या किसी के ऊपर अपने विचार थोपने का प्रयास नहीं है।
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Saturday, 6 November 2021

October Revolution

The revolutions in France in 1848 and 1871 came to grief chiefly because the peasant reserves proved to be on the side of the bourgeoisie. The October Revolution was victorious because it was able to deprive the bourgeoisie of its peasant reserves, because it was able to win these reserves to the side of the proletariat, and because in this revolution the proletariat proved to be the only guiding force for the vast masses of the laboring people of town and country. 

सत्यजीत राय की फिल्मों में स्त्रियां _______________________ *सुलोचना*



सत्यजीत रे बांग्ला फ़िल्म निर्देशक थे; पर उससे पहले वे एक लेखक थे| अपने दो नयनों से उन्होंने जो कुछ देखा, उसे कागज़ पर उतारा| उनके भीतर फ़िल्मकार को दुनिया ने उनके लेखकीय चरित्र से अधिक सराहा| फ़िल्म बनाने से पहले उन्होंने विश्व की अनेक भाषाओं की फ़िल्मों को न सिर्फ़ देखा बल्कि उनका गहरा अध्ययन किया| रे के फ़िल्मों की भाषा भले ही बांग्ला हो, पर उनके फ़िल्मों की पटभूमि इतनी सरल पर शक्तिशाली है कि कोई भी आम मनुष्य उस फ़िल्म को अपने जीवन के करीब महसूस कर सकता है| यही कारण रहा कि भारत की क्षेत्रीय भाषा की फ़िल्में होने के बावजूद रे के फ़िल्मों की पहुँच भौगोलिक और भाषाई सीमाओं के बाहर तक है। आज भी यूट्यूब पर मौज़ूद उनकी कई फ़िल्मों के सब टाइटल्स फ्रेंच या अंग्रेजी में मिलते हैं| 

रे की फ़िल्मों की एक गौरतलब बात है उनकी फिल्मों में चित्रित स्त्रियाँ, जो ग्रामीण और शहरी दोनों परिवेश से आती हैं, जिनका अपना एक आस्तित्व तो है पर वे पुरुषों से न तो प्रतिस्पर्धा करती हैं और न ही घृणा। शायद यह भी वज़ह रही कि उन्हें सराहा गया कि उन्होंने समाज में स्त्रियों को ऊँचा करने के लिए पुरुषों को कमतर नहीं आँका| पिता और प्रख्यात कवि सुकुमार राय के अल्प वयस में निधन में बाद रे को उनकी माँ ने पाला| यह पहली वज़ह रही होगी कि उन्होंने पुरुषों से इतर स्त्री आस्तित्व को समझा, वरना नब्बे के दशक से पहले लोग स्त्रियों का पृथक आस्तित्व भी नहीं मानते थे| उसके बाद रे के जीवन में आईं उम्र में उनसे चार से बड़ी उनकी ममेरी बहन, बिजया दास जिनसे वे अत्यधिक प्रभावित हुए और आगे चलकर दोनों ने सामाजिक मापदंडों को किनारे रख विवाह किया| बिजया राय ने विवाह के बाद अपने फ़िल्मी करियर और संगीत प्रेम को विदा कहा और बन गईं रे के फ़िल्मों की सज्जाकार और प्रोप सलाहकार| फ़िल्म "ओपूर संसार" में शर्मीला को उन्होंने ही तैयार किया था| "चारुलता" की माधबी के प्रॉप्स उनके ही दिए हुए थे| इस प्रकार सत्यजित सज्जा के लिए बिजया की अभिरुचि पर भरोसा रखते थे|

सत्यजीत राय का नाम आते ही हिंदी जगत के लोग जिस फ़िल्म का नाम लेते हैं वह है "चारुलता" (१९६४)| रवींद्रनाथ टैगोर की कहानी "नष्ट नीड़" पर आधारित यह फिल्म एक अकेली गृहिणी, चारू (माधवी मुखर्जी द्वारा अभिनीत) की कहानी है,  जो एक अमीर घर की बहू है पर जिसके पति के पास व्यस्तता के कारण समय का अभाव है। ऐसे में अकेलेपन का शिकार हुई स्त्री के समवयसी देवर का आगमन उसकी चाहनाओं और महत्वाकांक्षाओं को कैसे जगाता है। फिल्म चारुलता की दुविधा, शादी में असंतोष की भावनाओं और रिश्तों के भ्रम को कलात्मक तरीके से दर्शाती है।

फ़िल्म "महानगर" (१९६३) में परिवार के बोझ को साझा करने के लिए एक गृहिणी एक कामकाजी पत्नी में बदल जाती है। फ़िल्म ससुराल और पति के  सांस्कृतिक सदमे सुंदर तरीके से चित्रित करता है| फ़िल्म कामयाबी के साथ मिलने वाली स्वतंत्रता, छुआछूत और संघर्ष की भावना को खूबसूरती से बयाँ करती है। 

१९६० में बनी फ़िल्म "देवी" में १७ वर्षीय दयामयी (शर्मीला टैगोर) को उसके ससुर द्वारा देवी के रूप में प्रचारित किया जाता है। कहानी अंधविश्वास, रहस्यवाद और अंध विश्वास की शिकार महिलाओं के उत्पीड़न की कहानी है। दया, जो बाद में अपने ऊपर लगाए गए इस देवी-रूपी अवतार को तोड़ने में असमर्थ रह जाती है। इस फ़िल्म की ख़ूबसूरती ही यह है कि इसमें फ़िल्मकार ने अपनी तरफ से कोई क्रांति करने की कोशिश नहीं की|

१९८४ में बनी फ़िल्म "घरे-बाईरे" रवींद्रनाथ टैगोर के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित है जिसे स्वदेशी आंदोलन की पृष्ठभूमि में फिल्माया गया है| यह एक स्वदेशी नेता, एक उदारवादी नेता और गृहिणी बिमला (स्वातिलेखा चटर्जी अभिनीत) के बीच का प्रेम त्रिकोण है,  जहाँ स्त्री को उसके घरेलू जीवन के बाहर की दुनिया के अन्वेषण के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।

१९५५ में बनी फिल्म "पथेर पाँचाली" सत्यजीत रे के निर्देशन की पहली फिल्म है और यह विभुतिभूषण बंद्योपाध्याय के बंगाली उपन्यास पर आधारित है। यह अपु और उसकी बड़ी बहन दुर्गा के जीवन के इर्द-गिर्द घूमती है। यह फ़िल्म अपू ट्रिलॉजी (पथेर पाँचाली-१९५५, अपराजितो-१९५६ और अपूर संसार-१९५९) की कड़ी की प्रथम फ़िल्म है| तीनों फ़िल्मों की कहानी पहली कहानी का ही विस्तार है|  कहानी का नायक भले ही अपू हो, पर महिला पात्रों को अत्यंत प्रभावी तरीके से दर्शाया गया है। बड़ी बहन, दुर्गा (उमा दासगुप्ता) को जिज्ञासु, देखभाल करने वाली और प्रकृति के करीब एक आत्मा के रूप में चित्रित किया गया है। माँ,  सर्वजया (करुणा बनर्जी) को पहली दो फिल्मों में एक पूर्ण चरित्र के रूप में देखा जाता है, जो गरीबी से जूझ रहे गाँव के जीवन के दौरान अपनी गरिमा बनाए रखती है और बाद में एक बच्चे के खो जाने से दुखी हो जाती है। पत्नी, अपर्णा (शर्मिला टैगोर), अपूर संसार में अपू के जीवन के लिए सांत्वनात्मक आनंद लाती है और अपने पति के सिगरेट के पैकेट पर एक संदेश लिखती हुई दिखाई देती है, जो उसे कम धूम्रपान करने की याद दिलाती है! ये सभी महिलाएं अपू के जीवन और सीखने को विभिन्न तरीकों से प्रभावित करती हैं।

१९६९ में बनी फ़िल्म "अरण्येर दिन रात्रि" समय से आगे की फ़िल्म थी। तीन दोस्त जो शहर से आते हैं, पलामू आकर आदिवासी जीवन से रू ब रू होते हैं और वहाँ की अलग-अलग वर्ग की महिलाओं के आज़ाद ख्याल और निर्भीकता को देख हैरान होते हैं। फ़िल्म में अलग-अलग वर्ग की अलग-अलग ज़रूरतों को भी बखूबी दर्शाया है|

सत्यजीत की फ़िल्मों में स्त्री वस्तु नहीं है, वह सज्जा की सामान भी नहीं है| वहाँ महिलाओं के अधिकारों को बरकरार रखने की ज़द्दोजहद है और वह इसके लिए उपकरण तलाशता है और तराशता भी है, लेकिन पुरुषों की कीमत पर नहीं।

स्त्री दर्पण से साभार

Friday, 5 November 2021

मजाज़ लखनवी,

इंकलाबी शायर मजाज़ लखनवी, 
'सरमाएदारी' पर उनकी लाइनें जो आज भी मौजू हैं --

कलेजा फुक रहा है और जबाँ कहने से आरी है।
बताऊँ क्या तुम्हें क्या चीज यह सरमाएदारी है।

यह वह आँधी है जिसके रो में मुफलिस का नशेमन है,
यह वह बिजली है जिसकी जद में हर दहकान का खरमन है।

यह अपने हाथ में तहजीब का फानूस लेती है,
मगर मजदूर के तन से लहू तक चूस लेती है।

यह इंसानी बला खुद खूने इंसानी की गाहक है,
वबा से बढकर मुहलक, मौत से बढ़कर भयानक है।

न देखें हैं बुरे इसने, न परखे हैं भले इसने,
शिकंजों में जकड कर घोंट डाले है गले इसने।

कहीं यह खूँ से फरदे माल व जर तहरीर करती है,
कहीं यह हड्डियाँ चुन कर महल तामीर करती है।

गरीबों का मुकद्दस खून पी-पी कर बहकती है
महल में नाचती है रक्सगाहों में थिरकती है।

जिधर चलती है बर्बादी के सामां साथ चलते हैं,
नहूसत हमसफर होती है साथ चलते हैं।

यह अक्सर टूटकर मासूम इंसानों की राहों में,
खुदा के जमजमें गाती है, छुपकर खनकाहों में।

यह गैरत छीन लेती है, हिम्मत छीन लेती है,
यह इंसानों से इंसानों की फतरत छीन लेती है।

गरजती, गूँजती यह आज भी मैदाँ में आती है,
मगर बदमस्त है हर हर कदम पर लड़खड़ाती है।

मुबारक दोस्तों लबरेज है इस का पैमाना,
उठाओ आँधियाँ कमजोर है बुनियादे काशाना।

-- मजाज़ लखनवी
बजरिये साथी Gajender Rawat

पाखंडवाद

पप्पू मंदिर में पूजा करने गया जब बाहर आया तो एक भिखारी ने उससे भीख माँगी...

पप्पू ने उसको दुत्कार दिया
भिखारी से अपमान सहन नही हुआ...

उसने पप्पू से पूछा - मंदिर क्यों आते हो ?

पप्पू : पूजा करने ?

पूजा किसलिए करते हो ?

पप्पू : अपने घर की सुख समृद्धि के लिए अपने कारोबार और परिवार के लिए समृद्धि माँगता हूँ...

भिखारी : हम क्या यहाँ बैठकर झख मारते हैं ? रोज 10 - 12 घंटे माँगते हैं और जब से पैदा हुए हैं तब से माँग रहे हैं लेकिन आज तक भिखारी ही हैं...

तू क्या समझता है दस पंद्रह मिनट को आकर तू अपनी इच्छा पूरी करवा लेगा ? 

अबे जब हम जन्म से मांग रहे हैं और अब तक भी भिखारी हैं...

जब हमको इन्होने कुछ नही दिया तो तुझको क्या देगा ? 

हमसे दीन हीन और कौन होगा? 

अगर इसको किसी पर दया दिखानी थी तो हम पर दिखानी थी, जब हमको ही कुछ नही दिया तो तुझको क्या देगा..?

जबकि तेरे पास तो कुछ कमी नही है, गाड़ी, बंगले, कार सब कुछ है ।

एक बात समझ ले हम मंदिर के बाहर बैठकर भी भगवान के नाम पर जरुर मांगते हैं लेकिन भगवान से नही इंसान से ही माँगते हैं...

 ..लक्ष्मी पूजा, मूर्ति पूजा और पाखंडो को समझे और इस अन्धविश्वास , पाखंडवाद को ख़त्म करे...।



              

दलित सिनेमा

कितनी विडंबना है कि कैंसर, एड्स, कुपोषण, शराब, तम्बाकू, गुटखा इत्यादि पर असंख्य विज्ञापन बने हैं इस देश में यहां तक कि लिंगभेद, रंगभेद पर कम ही सही मगर बात हुई ही है लेकिन #जातिवाद के खिलाफ कभी किसी की हिम्मत नहीं हुई कि इसपर कोई विज्ञापन बना सकें। हर टीवी चैनल पर जातिवाद के ख़िलाफ़ विज्ञापन होना चाहिए था। साथ ही सभ्य समाज में आचरण, विचार, मानवीय भावनाओं हेतु व्यवहार कैसा होना चाहिए उसका प्रचार भी जरूरी था।

हाशिये में पड़े समाज अर्थात बहिष्कृत समाज को जगाने, शिक्षित व जाग्रत करने में दक्षिण सिनेमा का बड़ा योगदान रहा है। हिंदी बाहुल्य क्षेत्र चाहे वह सिनेमा हो, साहित्य हो, या मीडिया हो अधिकांश जनजागृति के मामलों में भ्रमित करने वाले तथ्य मिलते हैं बाक़ी गलत परम्परा, मान्यता को पोषित, संरक्षित करने वाला कंटेंट मिलता है। जबतक हमारी मान्यताओं के विपरीत तर्क व उनके तथ्य हमें ज्ञात नहीं होंगे बदलाव कैसे आयेगा?

वर्तमान समय में साहित्य व सिनेमा में काफ़ी बदलाव आया है। भले ही हाशिये के लोगों का प्रतिनिधित्व बेहद नगण्य हो मगर उनकी बातें लगातार हो रही है। इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि दलित,आदिवासी,पिछड़ों ने अपने वेब चैनल, पत्रिकाएं, यूट्यूब चैनल, सोशल मीडिया के टूल्स, अन्य कॉमन प्लेटफार्म पर अपनी उपस्थिति दर्ज करवायी और लोगों तक ऐतिहासिक, वर्तमान परिदृश्य पर अपने विचार प्रेषित किये हैं। 

आर्टिकल 15 से लेकर भीमा कोरेगांव, शरणम गच्छामि, सैराट, 500, दी शुद्र या #जयभीम इत्यादि तक एक बदलाव की आहट ही नहीं उस पक्ष की पीड़ा, मौजूदगी और समस्यायों पर मंथन है। हिंदी सिनेमा या हिंदी साहित्य की कहानी में दलित केवल सेवक, ड्राइवर, गरीब, शोषित के रूप में ही दिखाई पड़ता है कभी मुख्य हीरो की भूमिका में नहीं दिखा और न ही दलित कलाकार कोई हीरो जैसे बड़े चेहरे में नहीं दिखाई दिया। 

अब समय बदल रहा है क्योंकि आप बात करने लगे हैं। बेझिझक बिना किसी की परवाह किये बगैर अपनी बात बोलने लगे हैं। लोग क्या सोचेंगे, लोग क्या बोलेंगे,अंजाम क्या होगा या कौन क्या धारणाएं बनाएगा इसकी चिंता छोड़कर, संवैधानिक दायरे में,सभ्य व शालीनता के साथ अपना पक्ष हर रोज़ रख रहे हैं और गलत बातों का विरोध भी बड़ी मुखरता से कर रहे हैं। यही ताकत है जो आपका ध्यान रहेगा अन्यथा पीड़ित, शोषित,अपमानित और बहिष्कृत ही परिभाषित होंगे। 


Thursday, 4 November 2021

दीप ऐसा

🔥 दीप ऐसा जो सबके घर में रोशनी बिखेरे
🍨 मिष्ठान ऐसा जो कड़वाहट दूर कर सब में मिठास घोले

एक ऐसे समय में
जब त्योहार की खुशियां संपदा का प्रतीक बन जाए
जब बड़ी आबादी खुशियों से महरूम हो
जब महँगाई ने त्योहार की खुशियाँ छीन, दिवाला निकाला हो

तब आइए
ऐसी खुशी का संकल्प लें,
जहाँ दीपक की रोशनी हर कोने-अतरे भी फैले
जग से अंधेरा मिटा सके, हर जहाँ रौशनी बिखेर सके
और हर दिल में कड़वाहट और नफरत की जगह
मिठास घोल सके, सबमें प्यार जगा सके!

ऐसी दीपावली की खुशियां लाने के लिए,
आइए संकल्प लें!

♨️ दीपावली की ढेर सारी शुभकामनाएं

-मुकुल
मज़दूर सहयोग केंद्र
'संघर्षरत मेहनतकश' पत्रिका, 'मेहनतकश' वेबसाइट और 'मेहनतकश' यूट्यूब चैनल के साथ

१९५३ में स्टालिन की शव यात्रा पर उमड़ा सैलाब 

*On this day in 1953, a sea of humanity thronged the streets for Stalin's funeral procession.* Joseph Stalin, the Soviet Union's fea...