वैसे तो पृथ्वी पर मानव तथा अन्य जीव जंतु एवं पेड़ पौधों के जन्म लेने और विकसित होकर आज तक पहुंचने में कितने साल लग गए सही सही तो नहीं कह सकते, लेकिन हजारों या लाख वर्ष भी समय लगा हो सकता है।
मुझे जो बात करनी है वह यह कि मनुष्य जब बानर से नर की अवस्था में आया तो उसका दिमाग अलग तरह से काम करना शुरू किया। प्रकृति से उसका सामना हर हमेशा होता रहता था, इसलिए प्राकृतिक घटनाओं को जानने की जिज्ञासा भी उसके अंदर पैदा होने लगी। ज्ञान के अभाव में अनुमान के आधार पर चीजों की समझ एवं व्याख्या करने लगा ।लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया उसके दिमाग का विकास भी प्रकृति के साथ क्रिया- प्रतिक्रिया करने से बढ़ता गया। प्राकृतिक चीजों का सही ज्ञान न होने से उसके प्रति डर या उसके द्वारा कोई अपशकुन न हो जाए, तरह-तरह की आराधना एवं देवी देवताओं की कल्पना कर उसकी मूर्तियां बना, उसका पूजन भी शुरू किया। बहुत सारी परंपराएं एवं पूजन प्रथाएं हैं धीरे-धीरे खत्म भी होती गई उसके कारण के विश्लेषण में मैं अभी नहीं जा रहा हूं।
मुझे जो बात कहनी है ,वह छठ का त्योहार जो प्रतिवर्ष लाखों लोग बिहार, उत्तर प्रदेश का पूर्वी भाग और झारखंड में विशेष रुप से धूमधाम तथा अति पवित्रता का ध्यान रखते हुए मनाया जाता है। यह पूरे साल में दो बार होती है एक कार्तिक एवं दूसरा चैत मास में। यह शुरू कैसे हुआ इसके इतिहास में अभी मुझे नहीं जाना है। एक बात तो तय है कि आज भी बहुत से अनपढ़ लोग मानते हैं कि पृथ्वी स्थिर है तथा सूर्य उसकी परिक्रमा करता है। जब कि वैज्ञानिकों ने सिद्ध कर दिया है कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा वार्षिक और दैनिक गति से करती है तथा सूर्य भी अपनी धुरी पर परिक्रमा करता है।
मुझे बातें ज्यादा विस्तार में न जाकर छठ पूजा के महिमा एवं इसके अनुष्ठान के संबंध में करनी है। इसे मानने वालों का कहना है कि इसके करने की प्रक्रिया में कोई गलती हो गई या अपवित्र हो गया तो बहुत बड़ी अनहोनी, अपशकुन हो सकता है ।आज विज्ञान का युग है और वैज्ञानिक प्रकृति जन्य चीजों को जानना और उसका वैज्ञानिक विश्लेषण करने में भी लगे हुए हैं। ऐसी भी मान्यता है कि छठ व्रत करने से मन में मानी हुई लालसा या मन्नत पूरी हो जाती है।
लेकिन मैं इससे सहमत नहीं होता। मनुष्य रोज या या कहें कि अपने जीवन में कुछ न कुछ करते रहता है, इस क्रम में सफलता और असफलता उसे मिलती रहती है। इसके कारण को पता लगाने से हम निष्कर्ष पर पहुंच सकते हैं कि सफलता और असफलता के क्या कारण हैं। यह बात वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो चुकी है कि सूर्य के अभाव में पृथ्वी पर का जीवन असंभव है। वैज्ञानिक अब तक की खोज में सफल हुए हैं कि सूर्य का भी अंत होगा और जब सूर्य का अंत होगा तो पृथ्वी का अंत होना भी स्वाभाविक है। लेकिन इसमें लाखों वर्ष से भी अधिक लग सकते हैं ऐसा ही कुछ कथन है।
लोगों का विश्वास- अंधविश्वास है इसलिए प्रतिवर्ष छठ किए जा रहे हैं, सफलता मिली तो छठ मैया की झोली में और असफलता मिली तो अपने कर्म को दोषी मानना और कोसना।
अब मैं अपनी कुछ बातें विश्लेषणात्मक रूप में कहूंगा ।एक बात जो मैं कहना चाहता हूं कि इस त्योहार में डूबते सूर्य और ऊगते सूर्य की पूजा जो की जाती है ,इस बिंदु पर मुझे कहना है कि सूरज कभी न तो डूबता है और न उगता है। पृथ्वी अपनी दैनिक गति से अपनी धुरी पर एक बार घूम जाती है इसलिए अभी हमारे यहां सूर्य अगर डूब रहा है तो कहीं रात होगी या दिन या कोई और समय होगा अथवा सूरज उग रहा होगा। इसलिए डूबते सूरज को और उगते सूरज को अर्घ देने की मान्यता आज जब हम सूरज और पृथ्वी के बारे में जान गए हैं तो खंडित हो जाती है। एक बात और देखने को मिल रही है कि इस पर्व का वाहक मध्यवर्ग बहुतायत रूप से है। मजदूर वर्ग भी अल्प संख्या में ही सही लेकिन इस दौड़ में शामिल है।
अब इसके पवित्रता पर भी कुछ अनुभव साझा करना चाहता हूं। आज से 45 वर्ष पहले की पटना शहर की ही बात है। हम पांच छ: साथियों ने तय किया कि छठ के प्रसाद को पहला अर्घ देने के पहले ही खाया जाए। लेकिन वो अर्घ के पहले ही प्रसाद देगा कौन? क्योंकि उसको भारी अपशकुन या कोई बड़ी हानि हो जाएगी। इसी क्रम में एक साथी के घर छठ हो रहा था, वह तैयार हुआ की दउरा मैं ही घर का ले चलूंगा और रास्ते में कहीं गली में जगह देखकर ठेकुआ निकाल लेना होगा ।हुआ ऐसा ही, उस साथी के सहयोग से ठेकुआ तो निकल गया। अब हुआ कि इसका पारन अथार्त खाया जाए। वह साथी भी जो डगरा लेकर गया था, घाट पर रख कर आया और हम सभी साथी मेरे ही डेरा पर बैठकर प्रेम से उसे सब कोई खाया, यहां तक कि मेरी पत्नी भी बोलते हुए खाई कि जब सब मर ही जाएंगे तो मैं जी कर क्या करूंगी? उसने भी ठेकुआ खाया। हम सभी साथी आज तक सकुशल हैं। उत्थान- पतन गिरना- उठना तो सबके जीवन में इस पूंजीवादी व्यवस्था में लगा हुआ है। लेकिन प्रसाद को पहले ही खाने से कोई अपशकुन नहीं हुआ। हमारे कहने का तात्पर्य है कि इसे के पीछे एक बहुत बड़ा अंधविश्वास चला आ रहा है और लोग लकीर के फकीर बन ढ़ोए जा रहे हैं ।तर्क, विवेक, विज्ञान सम्मत दिमाग लोग विकसित ही नहीं कर रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि शासक वर्ग / पूंजीपति वर्ग को इस से खूब लाभ हो रहा है। मनुष्य अपनी समस्याओं के वास्तविक कारण के तरफ न जाय, तर्क एवं विवेक को सोचने का आधार न बनावे तो इस वर्ग को फायदा ही फायदा है। इसके व्यवस्था की आयु बढ़ते ही रहेगी। इसलिए शासक वर्ग, पूंजीपति वर्ग एवं मध्य वर्ग के साथ ही राज्य भी इसके मनाने और सुचारू रूप से संपन्न हो, भरपूर मदद करता है।धर्म निरपेक्षता की नीति का दूर-दूर तक अवहेलना एवं खुला खेल होता है। मजदूर को खासकर अपनी सोच और समझदारी इसके प्रति विज्ञान सम्मत बनाने की अति आवश्यकता है।
मैं इस पर्व के पीछे डर ,भय एवं अंधविश्वास का सिद्धांत जो काम कर रहा है, उसका ही मूल रूप से आलोचनात्मक विश्लेषण कर रहा हूं ।इसकी मान्यता मनुष्य को पूर्ण मानव बनने में बाधक है। इसलिए इसका क्रिटिकल विश्लेषण तो होना ही चाहिए ।यह मेरे अपने विचार हैं मेरा किसी को आहत या किसी के ऊपर अपने विचार थोपने का प्रयास नहीं है।
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