Monday, 22 March 2021

अवतार सिंह पाश की सात कविताएं



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1⃣ सपने
सपने हर किसी को नहीं आते
बेजान बारूद के कणों में
सोयी आग को सपने नहीं आते
बदी के लिए उठी हुई हथेली पर आये
पसीने को सपने नहीं आते
शैल्फ़ों में पड़े इतिहास के ग्रन्थों को
सपने नहीं आते
सपनों के लिए लाजिमी है
सहनशील दिलों का होना
सपनों के लिए नींद की नज़र होनी लाजिमी है
सपने इसीलिए सभी को नहीं आते
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2⃣ सबसे ख़तरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना

श्रम की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती

पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी-लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती
बैठे-सोए पकड़े जाना – बुरा तो है
सहमी-सी चुप में जकड़े जाना बुरा तो है
पर सबसे ख़तरनाक नहीं होता

कपट के शोर में
सही होते हुए भी दब जाना बुरा तो है
किसी जुगनू की लौ में पढ़ने लग जाना – बुरा तो है
भींचकर जबड़े बस वक्‍त काट लेना – बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता

सबसे ख़तरनाक होता है
मुर्दा शान्ति से भर जाना
न होना तड़प का, सब सहन कर जाना,
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना

सबसे ख़तरनाक वह घड़ी होती है
तुम्हारी कलाई पर चलती हुई भी जो
तुम्हारी नज़र के लिए रुकी होती है

सबसे ख़तरनाक वह आँख होती है
जो सबकुछ देखती हुई भी ठण्डी बर्फ होती है
जिसकी नज़र दुनिया को
मुहब्बत से चूमना भूल जाती है
जो चीज़ों से उठती अन्धेपन की
भाप पर मोहित हो जाती है
जो रोज़मर्रा की साधारणतया को पीती हुई
एक लक्ष्यहीन दोहराव के दुष्चक्र में ही गुम जाती है

सबसे ख़तरनाक वह चाँद होता है
जो हर कत्ल-काण्ड के बाद
वीरान हुए आँगनों में चढ़ता है
लेकिन तुम्हारी आँखों में मिर्चों की तरह नहीं लड़ता है

सबसे ख़तरनाक वह गीत होता है
तुम्हारे कान तक पहुंचने के लिए
जो विलाप को लाँघता है
डरे हुए लोगों के दरवाज़े पर जो
गुण्डे की तरह हुँकारता है
सबसे ख़तरनाक वह रात होती है
जो उतरती है जीवित रूह के आकाशों पर
जिसमें सिर्फ उल्लू बोलते गीदड़ हुआते
चिपक जाता सदैवी अँधेरा बन्द दरवाज़ों की चैगाठों पर

सबसे ख़तरनाक वह दिशा होती है
जिसमें आत्मा का सूरज डूब जाये
और उसकी मुर्दा धूप की कोई फांस
तुम्हारे जिस्म के पूरब में चुभ जाये

श्रम की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती

(पाश की पंजाबी में प्रकाशित अन्तिम कविता, जनवरी, 1988)
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3⃣ अपनी असुरक्षा से

यदि देश की सुरक्षा यही होती है
कि बिना ज़मीर होना ज़िन्दगी के लिए शर्त बन जाये
आँख की पुतली में 'हाँ' के सिवाय कोई भी शब्द
अश्लील हो
और मन बदकार पलों के सामने दण्डवत झुका रहे
तो हमें देश की सुरक्षा से ख़तरा है

हम तो देश को समझे थे घर-जैसी पवित्र चीज़
जिसमें उमस नहीं होती
आदमी बरसते मेंह की गूँज की तरह गलियों में बहता है
गेहूँ की बालियों की तरह खेतों में झूमता है
और आसमान की विशालता को अर्थ देता है

हम तो देश को समझे थे आलिंगन-जैसे एक एहसास का नाम
हम तो देश को समझते थे काम-जैसा कोई नशा
हम तो देश को समझे थे क़ुर्बानी-सी वफ़ा
लेकिन 'गर देश
आत्मा की बेगार का कोई कारखाना है
'गर देश उल्लू बनने की प्रयोगशाला है
तो हमें उससे ख़तरा है

'गर देश का अमन ऐसा होता है
कि कर्ज़ के पहाड़ों से फिसलते पत्थरों की तरह
टूटता रहे अस्तित्व हमारा
और तनख़्वाहों के मुँह पर थूकती रहे
कीमतों की बेशर्म हँसी
कि अपने रक्त में नहाना ही तीर्थ का पुण्य हो
तो हमें अमन से ख़तरा है

'गर देश की सुरक्षा ऐसी होती है
कि हर हड़ताल को कुचलकर अमन को रंग चढ़ेगा
कि वीरता बस सरहदों पर मरकर परवान चढ़ेगी
कला का फूल बस राजा की खिड़की में ही खिलेगा
अक़्ल, हुक़्म के कुएँ पर रहट की तरह ही धरती सींचेगी
मेहनत, राजमहलों के दर पर बुहारी ही बनेगी
तो हमें देश की सुरक्षा से ख़तरा है।
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4⃣ दो और दो तीन

मैं प्रमाणित कर सकता हूँ -
कि दो और दो तीन होते हैं।
वर्तमान मिथिहास होता है।
मनुष्य की शक्ल चमचे जैसी होती है।
तुम जानते हो -
कचहरियों, बस-अड्डों और पार्कों में
सौ-सौ के नोट घूमते फिरते हैं।
डायरियाँ लिखते, तस्वीरें खींचते
और रिपोर्टें भरते हैं।
'कानून रक्षा केन्द्र' में
बेटे को माँ पर चढ़ाया जाता है।
खेतों में 'डाकू' मज़दूरी करते हैं।
माँगें माने जाने का ऐलान
बमों से किया जाता है।
अपने लोगों से प्यार का अर्थ
'दुश्मन देश' की एजेण्टी होता है।
और
बड़ी से बड़ी ग़द्दारी का तमग़ा
बड़े से बड़ा रुतबा हो सकता है
तो -
दो और दो तीन भी हो सकते हैं।
वर्तमान मिथिहास हो सकता है।
मनुष्य की शक्ल भी चमचे जैसी हो सकती है।
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5⃣ सच

तुम्हारे मानने या न मानने से
सच को कोई फ़र्क नहीं पड़ता।
इन दुखते अंगों पर सच ने एक उम्र भोगी है।
और हर सच उम्र भोगने के बाद,
युग में बदल जाता है,
और यह युग अब खेतों और मिलों में ही नहीं,
फ़ौजों की कतारों में विचर रहा है।
कल जब यह युग
लाल किले पर बालियों का ताज पहने
समय की सलामी लेगा
तो तुम्हें सच के असली अर्थ समझ आयेंगे।
अब हमारी उपद्रवी जाति को
इस युग की फितरत तो चाहे कह लेना,
लेकिन यह कह छोड़ना,
कि झोंपड़ियों में फैला सच,
कोई चीज़ नहीं।
कितना सच है?
तुम्हारे मानने या न मानने से,
सच को कोई़ फ़र्क नहीं पड़ता।
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6⃣ भारत

भारत -
मेरे आदर का सबसे महान शब्द
जहाँ कहीं भी प्रयुक्त किया जाये
शेष सभी शब्द अर्थहीन हो जाते हैं।
इस शब्द का अभिप्राय
खेतों के उन बेटों से है
जो आज भी पेड़ों की परछाइयों से
वक़्त मापते हैं।
उनकी पेट के बिना, कोई समस्या नहीं
और भूख लगने पर
वे अपने अंग भी चबा सकते हैं।
उनके लिए जि‍न्दगी एक परम्परा है,
और मौत का अर्थ है मुक्ति।
जब भी कोई पूरे भारत की,
'राष्ट्रीय एकता' की बात करता है
तो मेरा दिल करता है -
उसकी टोपी हवा में उछाल दूँ,
उसे बताऊँ
कि भारत के अर्थ
किसी दुष्यन्त से सम्बन्धित नहीं
बल्कि खेतों में दायर हैं
जहाँ अनाज पैदा होता है
जहाँ सेंधें लगती हैं---
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7⃣ बेदख़ली के लिए विनय-पत्र
(इन्दिरा गाँधी की मृत्यु तथा इसके पश्चात सिखों के कत्ले-आम पर एक प्रतिक्रिया)

मैंने उम्र भर उसके खि़ला़फ़ सोचा और लिखा है
अगर उसके शोक में सारा ही देश शामिल है
तो इस देश में से मेरा नाम काट दो

मैं ख़ूब जानता हूँ नीले सागरों तक फैले हुए
इस खेतों, खदानों और भट्ठों के भारत को
वह ठीक इसी का साधारण-सा कोई कोना था
जहाँ पहली बार
जब मज़दूर पर उठा थप्पड़ मरोड़ा गया
किसी के खुरदुरे बेनाम हाथों में
ठीक वही वक़्त था
जब इस कत्ल की साज़ि‍श रची गयी
कोई भी पुलिस नहीं ढूँढ़ सकेगी इस साज़ि‍श की जगह
क्योंकि ट्यूबें केवल राजधानी में जगती हैं
और खेतों, खदानों, भट्ठों का भारत
बहुत अँधेरा है

और ठीक इसी सर्द-अँधेरे में होश सँभालने पर
जीने के साथ-साथ
जब पहली बार इस जि‍न्दगी के बारे में सोचना शुरू किया
मैंने ख़ुद को इसके कत्ल की साज़ि‍श में शामिल पाया
जब भी भयावह शोर के पदचिह्न देख-देख कर
मैंने ढूँढ़ना चाहा टर्रा-र्रा-ते हुए टिड्डे को
शामिल पाया है, अपनी पूरी दुनिया को
मैंने सदा ही उसे कत्ल किया है
हर परिचित व्यक्ति की छाती में से ढूँढ़कर
अगर उसके कातिलों के साथ यूँ ही सड़कों पर निपटना है
तो मेरे हिस्से की सज़ा मुझे भी मिले
मैं नहीं चाहता कि केवल इसलिए बचता रहूँ
कि मेरा पता नहीं है भजन लाल बिश्नोई को -
इसका जो भी नाम है - गुण्डों की सल्तनत का
मैं इसका नागरिक होने पर थूकता हूँ
मैं उस पायलट की
कपटी आँखों में चुभता भारत हूँ
हाँ, मैं भारत हूँ चुभता हुआ उसकी आँखों में
अगर उसका अपना कोई खानदानी भारत है
तो मेरा नाम उसमें भी अभी काट दो

* भजन लाल बिश्नोई - हरियाणा का तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री (नवम्‍बर 1984)

Monday, 15 March 2021

ब्लैक बोल्शेविक

ब्लैक बोल्शेविक' - ब्लैक अमरीकी हैरी हेवुड द्वारा लिखित पुस्तक है। हैरी 1927 में सोवियत संघ अध्ययन के लिए गये थे और 3 वर्ष वहाँ रहे। निम्न उद्धरण नस्लवाद पर सोवियत समाज का उनका अनुभव बताता है। दो संदर्भ में यहाँ दे रहा हूँ। एक, नफरती हमलों से एक समाज कैसे निपटता है। दो, गुहा और अपूर्वानंद जैसे लिबरल लेनिन-स्टालिन और हिटलर को समान बताने का दुष्प्रचार करते हुए सर्वहारा की तानाशाही में व्यक्ति स्वतंत्रता के हनन का हल्ला मचाते हैं उसका भी यह अच्छा उदाहरण है कि मेहनतकश जनता की 'तानाशाही' असल में कैसे काम करती थी और उसमें वो कौन से व्यक्ति थे जिनकी 'व्यक्ति स्वतंत्रता' और 'अभिव्यक्ति की आजादी' का हनन किया जाता था।
During my entire stay in the Soviet Union, I encountered only one incident of racial hostility. It was on a Moscow streetcar. Several of us Black students had boarded the car on our way to spend an evening with our friend MacCloud. It was after rush hour and the car was only about half filled with Russian passengers. As usual, we were the objects of friendly curiosity. At one stop, a drunken Russian staggered aboard. Seeing us, he muttered (but loud enough for the whole car to hear) something about "Black devils in our country."
A group of outraged Russian passengers thereupon seized him and ordered the motorman to stop the car. It was a citizen's arrest, the first I had ever witnessed. "How dare you, you scum, insult people who are the guests of our country!"
What then occurred was an impromptu, on-the-spot meeting, where they debated what to do with the man. I was to see many of
this kind of "meeting" during my stay in Russia.
It was decided to take the culprit to the police station which, the conductor informed them, was a few blocks ahead. Upon arrival there, they hustled the drunk out of the car and insisted that we Blacks, as the injured parties, come along to make the charges.
At first we demurred, saying that the man was obviously drunk and not responsible for his remarks. "No, citizens," said a young man (who had done most of the talking), "drunk or not, we don't allow this sort of thing in our country. You must come with us to the militia (police) station and prefer charges against this man."
The car stopped in front of the station. The poor drunk was hustled off and all the passengers came along. The defendant had sobered up somewhat by this time and began apologizing before we had even entered the building. We got to the commandant of the station.
The drunk swore that he didn't mean what he'd said. "I was drunk and angry about something else. I swear to you citizens that I have no race prejudice against those Black gospoda (gentlemen)."
We actually felt sorry for the poor fellow and we accepted his apology. We didn't want to press the matter.
"No," said the commandant, "we'll keep him overnight. Perhaps this will be a lesson to him."

Mukesh Aseem

Saturday, 13 March 2021

सहजानंद सरस्वती

जहां तिरंगा झंडा राष्ट्रवाद का प्रतीक है, वही लाल झंडा शोषितों और पीड़ितों की अन्तर्राष्ट्रीय एकता और आकांक्षा का प्रतीक है.

इस अंतर्राष्ट्रीयता के युग में, जहां किसान और मजदूर के संघर्ष अंतराष्ट्रीय चरित्र अख्तियार कर चुके है, वहां वे अपन ध्येय अंतर्राष्ट्रीय एकता के बिना हासिल नहीं कर सकते है, अतः इस तरह के प्रतीक (लाल झंडा) अनिवार्य है!

● सहजानंद सरस्वती 

Thursday, 11 March 2021

महा शिवरात्रि

लिंग पूजा की क़बीलाई टोटेम को शिव पुराण एवं अन्य धार्मिक ग्रंथों में समाहित कर इसे परंपरा से जोड़ दिया गया,जिसे कालक्रम से पूरे देश के हिन्दू समुदाय के बीच प्रतिष्ठापित और प्रचारित-प्रसारित कर धार्मिक संस्थाओं का अभिन्न अंग बना दिया गया है।विशेष अवसरों पर शिव की पूजा शिवरात्रि और महाशिवरात्रि के रूप में मनाया जाता है। लेकिन, शिव पूजा अधिकतर हिन्दुओं में रोजमर्रा की आस्था अभिव्यक्ति का माध्यम हो गया है।
अन्य राज्यों की बात तो मैं नहीं जानता, पर बिहार में इधर करीब बीस सालों में एक अन्य धार्मिक परंपरा " शिव चर्चा " की भी शुरुआत हो गई है, जो अब शहरों से लेकर गांवों तक प्रचारित-प्रसारित कर दिया गया है। आज की तारीख में यह शिवचर्चा उच्च सवर्ण जातियों की अपेक्षा पिछड़ी जातियों के बीच ज्यादा लोकप्रिय होता जा रहा है। मैंने यह देखा है कि इसके माध्यम से भाजपा की पैठ पिछड़ी और अतिपिछड़ी जातियों के बीच गहरा होता जा रहा है।
भारत और भारतीयों को ऐसे देवताओं, मंदिरों और मूर्तियों के माध्यम से जड़ता की जंजीरों में हजारों साल से बांधा गया है, और यह जकड़न अब और भी बढ़ती जा रही है। इन अवतारों, त्रिदेवों, देवताओं, देवियों को मंदिरों में प्रतिष्ठापित कर भारतीय जनमानस को जड़ता की अंधेरी गुफा में ढकेल दिया गया है, जहां से निकलना उनके लिए संभव नहीं है। पत्थरों की पूजा ने अधिकतर भारतीयों को पत्थर जैसा ही ह्रदयहीन बना दिया है।
अकर्मण्यता, पाखंड, कर्मकांड, मूर्तिपूजा,भाग्यवादी और अंधविश्वास के साथ-साथ ही देवपूजा ने भारतीयों को हर तरह के पापकर्म, कुकर्म, दुष्कर्म, अपराध करने का सामाजिक और धार्मिक अनुज्ञप्ति ( लाइसेंस ) भी मिल जाता है। राम राम जपने और मंदिरों में पूजा करने वाले को लोग सामान्यतया अच्छा मनुष्य भी मान लेते हैं, या यह उनके दुष्कर्मों के औचित्य का साधन बन जाता है। मैंने आजतक कभी भी मंदिरों में पूजा-पाठ, भजन-कीर्तन और रतजगा करने वालों को कभी भी और किसी भी तरह के पापकर्म करने में हिचकिचाते नहीं देखा है। वे बड़े आराम से और निश्चिंत होकर कोई भी पापकर्म हंसते हुए कर लेने में सक्षम होते हैं। मूर्तिपूजा पापकर्म करने का नैतिक भय ही उनके मन से खत्म कर देता है।
पूरा भारतीय समाज ऐसे ही तत्त्वों का मकड़जाल है, जिससे बाहर निकलना बहुत ही कम लोगों के लिए संभव है। यह सोचने वाली बात है कि जो व्यक्ति निर्जीव पत्थरों के आगे शरणागत है, वह अपने से ताकतवर मालिक के आगे कितना नतमस्तक होगा। राजसत्ता के आगे जनसत्ता के समर्पण को सुनिश्चित कराने के लिए ही भारत में धार्मिक कर्मकांडों,पाखंडों, देवी-देवताओं की मूर्तियों और मंदिरों का जाल बिछाया गया है।यह जाल भारत के लोगों के लिए दमघोंटू बन गया है। इसलिए जबतक पूरे भारत में बिछे इस जाल को काटा नहीं जाएगा, भारत न भारतीय कभी भी गुलामी से मुक्त नहीं हो सकते।
Ram Ayodhya Singh

Monday, 8 March 2021

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस

आज बिहार निर्माण व असंगठित श्रमिक यूनियन की तरफ से 'अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस' कार्यालय में मनाया गया। इसमें सबसे पहले अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के इतिहास पर चर्चा की गई और यह बताया गया कि इसकी शुरुआत जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी की नेत्री क्लारा जेटकिन ने की थी। इतिहास में पहली बार 'अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस' 19 मार्च, 1911 को जर्मनी में मनाया गया था। इसमें लगभग 10 लाख से अधिक स्त्री-पुरुषों ने भाग लिया था। चुंकि इससे पहले 8 मार्च, 1857, 8 मार्च, 1904, 8 मार्च, 1908, 8 मार्च, 1909 तथा 8 मार्च, 1910 को विभिन्न देशों में अपनी मांगों को लेकर 'महिला दिवस' मनाया जा चुका था, इसलिए 8 मार्च को ही भविष्य में भी 'अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस' मनाने की बात तय हुई थी। 8 मार्च, 1921 को लेनिन ने 'अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस' को सोवियत संघ में 'राजकीय पर्व' के रूप में घोषित किया था। काफी लंबे संघर्ष के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ ने 8 मार्च, 1975 को 8 मार्च की तारीख को 'अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस' के रूप में घोषित किया और उस दिन महिलाओं को अपने जीवन की समस्याओं पर बातचीत करने के लिए छुट्टी देने की घोषणा की। 
    शुरुआती दौर में महिलाओं की मुख्य मांगें काम के घंटे 16 से 10 करने, मताधिकार का अधिकार देने, बाल मजदूरी बंद करने, घटिया शराब की दुकानें बंद करने, वेतन में वृद्धि करने तथा काम के दौरान सुविधा मुहैया कराने की थी। इसके बाद जैसे-जैसे महिलाओं का आंदोलन बढ़ता गया, वैसे-वैसे अलग-अलग देशों में, उस देश की परिस्थिति के अनुसार, महिलाओं की विभिन्न समस्याओं को ध्यान में रखकर, मांगे भी बढ़ती गईं। आज हमारे देश की महिला संगठनों की मुख्य मांगे निम्नलिखित हैं - 
1. महिलाओं के काम के घंटे 8 से 6 किए जाएं। 
2. महंगाई के अनुसार उनकी मजदूरी भी बढ़ाई जाए।
3. बेरोजगार महिला मजदूरों को काम दिया जाए।
4. स्त्रियों के साथ हो रहे बलात्कार तथा छेड़खानी की घटनाओं पर रोक लगाई जाए।
5. महिलाओं को भी पुरुषों के बराबर सारे अधिकार दिए जाएं।
6. पितृसत्तात्मक व्यवस्था खत्म किया जाए और स्त्री-पुरुष बराबरी की भावना को विकसित किया जाए। 
7. दहेज प्रथा, बाल विवाह, भ्रूणहत्या तथा घरेलू उत्पीड़न पर रोक लगाई जाए।
8. मनोविकृति को जन्म देने वाले पोर्न वीडियो तथा फिल्मों पर प्रतिबंध लगाया जाए।
9. स्त्री शिक्षा को बढ़ावा दिया जाए।
10. स्वास्थ्य एवं शिक्षा के निजीकरण पर रोक लगाई जाए।
11. वैश्यावृत्ति पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए तथा उनके लिए सम्मानजनक काम की व्यवस्था की जाए।
12. लड़कियों को अपनी पसंद से शादी-विवाह करने की पूर्ण आजादी दी जाए। इसमें समान धर्म और जाति के मानदंडों को समाप्त किया जाए।
               हम देख सकते हैं कि महिलाओं की ये मांगें इस पूंजीवादी व्यवस्था में पूरी तरह संभव नहीं है। इसके लिए समाजवादी व्यवस्था का होना जरूरी है। इसलिए कामगार महिलाओं को पुरुष मजदूर वर्ग के साथ मिलकर संघर्ष करने की जरूरत है, ताकि अपनी संगठित ताकत की बदौलत इस पूंजीवादी व्यवस्था को खत्म किया जा सके और इससे बेहतर पूंजीवादी व्यवस्था को लाया जा सके। महिलाओं को पूर्ण स्वतंत्रता और समानता एक समाजवादी व्यवस्था में ही मिल सकता है।
       आज की परिचर्चा में इसी तरह की अन्य बातें की गईं। महिलाओं से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर तर्क-वितर्क किया गया और उसके समाधान पर भी विचार किया गया। इस परिचर्चा की अध्यक्षता जयंती जी ने किया। इस परिचर्चा में पिंकी कुमारी, शर्मिला देवी, गुड़िया कुमारी, प्राची इस्क्रा, आनंद प्रवीण, सौरव सुमन, पिंटू कुमार इत्यादि लोगों ने भाग लिया। यह एक छोटी बैठक थी, लेकिन इसमें जीवंत चर्चा की गई। अगले साल इसे और भी बड़े पैमाने पर मनाने का निश्चय किया गया। 

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस जिंदाबाद! 
क्लारा जेटकिन जैसी महिलाएं अमर रहें!!
पूंजीवाद-साम्राज्यवाद मुर्दाबाद!!!
वैज्ञानिक समाजवाद जिंदाबाद!!!!

Sunday, 7 March 2021

अंतरराष्ट्रीय स्त्री(महिला दिवस) (8 मार्च) का संदेश जीना है तो लड़ना होगा, मार्ग मुक्ति का गढ़ना होगा!



8 मार्च अंतरराष्ट्रीय स्त्री दिवस है जिसे विश्व स्तर पर मनाया जाता है। लेकिन इसके इतिहास से बहुत ही कम लोग परिचित हैं। 1908 में अमरीका में स्त्री कपड़ा मज़दूरों द्वारा काम की हालतों में सुधार और काम के घंटे कम करने, बराबर वेतन जैसी माँगों के लिए हड़ताल की गई थी।

चौदह सप्ताह की इस लंबी हड़ताल में 20,000 मज़दूर औरतें शामिल थीं। पुलिस द्वारा किए गए लगातार दमन ने इस ऐतिहासिक हड़ताल को कुचल दिया। इस घटना की याद में ही दूसरी कम्युनिस्ट इंटरनेशनल ने 1910 में 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय स्त्री दिवस मनाए जाने की शुरुआत की। इस तरह इस दिन का इतिहास स्त्रियों की जुझारू विरासत है जिसे आत्मसात करते हुए उन्होंने आज के समय में अपनी ग़ुलामी की ज़ंजीरें तोड़ने के काम को पूरा करना है।

आज हमारे देश में औरतों के हालात दिन-प्रतिदिन बदतर होते जा रहे हैं। यहाँ हर 4.4 मिनट पर घरेलू हिंसा, हर 16 मिनट पर एक बलात्कार की घटना दर्ज होती है। 2019 में बलात्कार के 34,651 और छेड़खानी, शारीरिक शोषण के 4,05,861 मामले सरकारी काग़ज़ों में दर्ज हुए हैं। हर वर्ष 9,000 के करीब औरतों को दहेज के कारण और 1,000 को 'इज़्ज़त के लिए' क़त्ल कर दिया जाता है। 18 वर्ष की उम्र से कम तकरीबन 1500 लड़कियों को तेज़ाबी हमले का सामना करना पड़ता है। हर वर्ष हज़ारों लड़कियों की वेश्यावृति के लिए ख़रीदो-फ़रोख़्त की जाती है। ये दर्ज घटनाओं की संख्या है, असल में इन घटनाओं की संख्या कहीं ज़्यादा है। एक ओर औरतों के विरुद्ध बढ़ रहे जुर्मों की इन घटनाओं ने औरतों की ग़ुलामी वाली हालत की असलीयत बयान की है, दूसरी ओर इन घटनाओं पर विभिन्न राजनीतिक नेताओं, समाज सेवकों, साधू-संतों, धर्म गुरुओं, पत्रकारों, विद्वानों आदि ने इन घटनाओं पर "लड़कों से ग़लती हो जाती है", "औरतों का ग़लत पहरावा ज़िम्मेदार है", "लड़कियाँ रात को बाहर क्यों निकलती हैं", "बलात्कार ही हुआ है, कोई पहाड़ तो नहीं गिरा" जैसे बयान देकर अपनी दिन-प्रतिदिन सड़ रही पितृसत्ता और स्त्री विरोधी मानसिकता का सबूत देते रहते हैं। जिस भाजपा हुकूमत के कुलदीप सेंगर जैसे नेता ख़ुद बलात्कारी हो, उनसे भला औरतों की भलाई की उम्मीद भी कैसे की जा सकती है। यह ऐसे नहीं कि लोग भाजपा द्वारा दिए "बेटी बचाओ" के नारे को आज "बेटी को भाजपा वालों से बचाओ" के रूप में देख रहे हैं।

उपरोक्त वे घटनाएँ हैं, जो जुर्म की क़ानूनी परिभाषा के घेरे में आती हैं। औरतों के साथ परंपराओं के नाम पर हो रहे सैकड़ों ऐसे भेदभाव हैं जिन्हें क़ानून जुर्म नहीं मानता। घरों में लड़कियों के पैदा होने से लेकर पालन-पोषण से ही भेदभाव शुरू हो जाता है। चूल्हे-चौके, सफ़ाई, घर सँभालना, बच्चे पालने की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ औरतों के हिस्से ही थोपी जाती है और उनके इस काम की कोई गिनती नहीं होती। यहाँ तक कि नौकरीपेशा परिवारों में भी मर्द काम से आकर आराम करता है और बराबर काम करके आई औरत को घर के काम करने पड़ते हैं। पढ़ाई, पहरावे, काम और जीवन साथी का चुनाव में बहुत कम औरतों को ही अपनी मर्ज़ी से फ़ैसले लेने का अवसर मिलता है। अभी भी समाज का बहुत बड़ा हिस्सा है, जो लड़कियों के घर से बाहर निकलने, काम करने और रात को घर से बाहर निकलने को शक की नज़रों से ही देखता है। 'औरतों का दिमाग़ चोटी के पीछे होता है', 'औरत पैर की जूती होती है', 'औरत घर की इज़्ज़त होती है' (जो उसके अपनी मर्ज़ी के फ़ैसले लेने से मिट्टी में मिल जाती है!) आदि मध्य-युगीन विचार हमारे समाज की विरासत से चले आ रहे हैं, जो औरत को ग़ुलाम से अधिक कुछ नहीं समझते।

इसके साथ ही आधुनिकता के नाम पर भी औरतों की ग़ुलामी के नए रूप पैदा हो चुके हैं। औरतों का जिस्म, सौंदर्य आज बाज़ार की एक वस्तु बन चुका है, जिसके दम पर फै़शन, मॉडलिंग, पत्र-पत्रिकाओं, गीतों, फि़ल्मों और वस्तुओं की बिक्री के लिए औरतों के जिस्म को विज्ञापन के रूप में इस्तेमाल करने जैसे कारोबार चल रहे हैं। इसके साथ ही औरतों को कॉल-गर्ल, वेश्यावृति तथा गंदी फि़ल्मों के घिनौने और अमानवीय कामों में धकेलकर उनके ज़रिए अरबों की कमाई की जाती है। विश्व के कई देशों में वेश्यावृति और पोर्न फि़ल्मों आदि को क़ानूनी मान्यता मिल चुकी है और अन्य कई देश इसके लिए ज़ोर लगा रहे हैं। मतलब आधुनिकता के नाम पर औरत एक हाड़-मांस का पुतला बनकर रह गई है, जो कि कंधे से शुरू होकर घुटने पर ख़त्म हो जाती है, जिसे विभिन्न तरीक़ों से मुनाफ़े कमाने और हवस पूरी करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इंसानी रिश्ते, संवेदनाओं और भावनाओं का इस बाज़ार के समाज के लिए कोई मतलब ही नहीं है।

मेहनत-मज़दूरी के सिर पर जीने वाली 70 प्रतिशत आबादी की औरतों के हालात सबसे खराब हैं। कारख़ानों, खेतों, दुकानों और घरों आदि में काम करती ये औरतें ना सिर्फ़ सस्ती मज़दूर हैं, बल्कि इनके काम की जगहों पर भी शर्मनाक ग़ुलामी, छेड़छाड़ तथा बलात्कार जैसी घटनाएँ इनका पीछा नहीं छोड़तीं। विश्व-भर में घंटों तक की जाने वाली मेहनत में औरतों का हिस्सा 67 प्रतिशत है, लेकिन आमदनी में उनका हिस्सा 10 प्रतिशत ही है। भारत में आधे से ज़्यादा औरतें कुपोषण और ख़ून की कमी की शिकार हैं। माहवारी, प्रसव, नसबंदी से लेकर आम बीमारियों संबंधी जानकारी और डॉक्टरी सुविधाओं की पहुँच बहुत कम है। ये औरतें मर्द-प्रधान समाज की ग़ुलामी के साथ-साथ आर्थिक ग़ुलामी भी बहुत बुरे रूप में सह रही हैं।

शैक्षणिक संस्थानों में पढ़ रही लड़कियों के लिए भी हालत बहुत अलग नहीं हैं। औरतों की बढ़ती चेतना के कारण उन्हें घर से निकल कर पढ़ने का मौक़ा मिल रहा है, लेकिन इसका दूसरा कारण यह भी है कि आज विवाह के नाम पर हो रही सौदेबाज़ी में पढ़ी-लिखी लड़की की हैसियत बढ़ जाती है। शैक्षणिक संस्थानों में पहरावे, घूमने-फिरने, मोबाइल रखने से लेकर होस्टलों की पाबंदियाँ सिर्फ़ लड़कियों पर ही लागू होती हैं। शैक्षणिक संस्थानों में लड़कियों से होने वाली छेड़छाड़, बलात्कार के मामलों में "गुरू" कहे जाने वाले अध्यापक, प्रोफ़ेसर आदि भी पीछे नहीं हैं। यानी मुकाबलतन आज़ाद दिख रहे शैक्षणिक संस्थानों के माहौल में भी ना तो लड़कियाँ आज़ाद हैं और ना ही सुरक्षित।

आज अगर समाज का ये हाल है तो हमें समझना चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय स्त्री दिवस की विरासत का हमारे लिए बहुत अधिक महत्व है। हमें इससे प्रेरणा लेकर सदियों की ग़ुलामी की ज़ंजीरों को तोड़ने की इस लड़ाई को आगे बढ़ाना होगा। ये भी समझना चाहिए कि ना तो औरतों को ये समाज आज़ादी, बराबरी तोहफ़े में देगा और ना ही इसके लिए आसमान से कोई फ़रिश्ता उतरकर आएगा, बल्कि इसके लिए पीड़ित औरतों को ही ख़ुद आगे आना होगा। औरतों की ग़ुलामी के कारण निजी संपत्ति पर टिकी इस मुनाफ़ाखोर सामाजिक व्यवस्था से जुड़े हुए हैं, इसलिए औरतों की मुक्ति की इस लड़ाई को इस सामाजिक व्यवस्था को बदलकर समाजवाद की स्थापना के लिए लड़ रहे वर्गों की लड़ाई से भी अवश्य ही जोड़ा जाना चाहिए। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि औरतों की मुक्ति समाजवाद के आने से अपने आप होगी। समाजवाद का अर्थ संपत्ति की निजी मालिकी की व्यवस्था को ख़त्म करना है, जो औरतों की ग़ुलामी का आधार है, इस निजी मालिकी की जगह समाजवाद सामूहिक मालिकी को देता है जो औरतों के लिए आज़ादी और बराबरी की संभावनाओं को तैयार करता है। ऐसे समाजवाद से वे हालात तैयार होंगे जिनमें औरतें आज़ाद हो सकेंगी, लेकिन हज़ारों वर्षों से वर्गीय समाज क़ायम होने के कारण जनमानस के अंदर गहरी धँसी औरत विरोधी मूल्य-मान्यताओं को ख़त्म करने के लिए शिक्षण-प्रशिक्षण के लंबे अमल की भी ज़रूरत रहेगी।

इस प्रसंग में समाजवादी मुल्क़ों के तजुर्बों पर नज़र डालनी चाहिए। रूस में 1917 की क्रांति के बाद 1956 तक समाजवादी सत्ता क़ायम रही और इसी तरह चीन में 1949 में नई जनवादी क्रांति के बाद 1976 तक समाजवादी सत्ता क़ायम रही। पहले क्रांति की लड़ाई और फिर समाजवाद की स्थापना से इन मुल्क़ों ने औरतों को चूल्हे-चौके की ग़ुलामी से मुक्त करवाकर समाज के सभी क्षेत्रों में बराबरी से घूमने का अवसर दिया। औरतों में अशिक्षा ख़त्म करके उन्हें अध्यापन, विज्ञान, डॉक्टरी, वकालत, रक्षा, उद्योग, खेलों तथा राजनीति आदि सभी क्षेत्रों में हिस्सा लेने का अवसर मिला। समाजवादी सोवियत यूनियन ने औरतों को वोट का अधिकार दिया। मध्य-युगीन और धार्मिक मान्यताओं के कारण औरतों पर लगी पाबंदियाँ ख़त्म की गईं। तलाक़ के क़ानून को आसान बनाकर, बच्चों की सामूहिक देखभाल, बच्चों के पालन-पोषण की ज़िम्मेदारी उठाने तथा रोज़गार की गारंटी ने औरतों की मर्दों पर किसी भी तरह की निर्भरता को ख़त्म करके उन्हें आत्म-निर्भर और आज़ाद बनने का अवसर दिया। वेश्यावृति की जहालत का पूर्ण तौर पर ख़ात्मा करके उन औरतों को सम्मानपूर्ण जि़ंदगी दी गई। विज्ञापनों, फि़ल्मों और गीतों आदि में औरतों के वस्तुकरण को ख़त्म किया गया, यानी उनके जिस्म को बाज़ार में बेचने वाले या वस्तुएँ बेचने का साधन बनाने वाले अमल को पूरी तरह ख़त्म किया गया। औरतों के शारीरिक सौंदर्य की जगह उनके इंसानी गुणों, क्षमताओं को पहल दी गई, जिसके कारण अपने वजूद को जताने के लिए औरतों को फै़शन का सहारा नहीं लेना पड़ता था।

आज औरतों की मुक्ति या नारीवाद के नाम पर, ख़ास तौर पर शैक्षणिक संस्थाओं और बड़े महानगरों में, फै़शनेबल रुझान काफ़ी चल रहा है। नारीवाद की प्रगतिशील परंपराएँ या विश्व-भर की औरतों की मुक्ति के तज़ुर्बों पर पहरा देने की जगह ये औरतों की औज़ादी को खाने-पीने, पहरावे की आज़ादी या ज़िम्मेदारी से रहित नैतिकता पर लाकर खड़ा करता है और मर्दों को ही असली दुश्मन बनाकर पेश करता है। जो सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था के कारण मर्द ऐसे बन जाते हैं या औरतें इस ग़ुलामी में बँध जाती हैं, उसके ख़िलाफ़ ये कुछ नहीं बोलता। ये औरतों की सामूहिक मुक्ति या संगठित सक्रियता की जगह व्यक्तिगत आत्म-विकास या अपने आपको चमकाने पर अधिक ज़ोर देता है। इन औरतों की समस्याओं में घरों, खेतों और कारख़ानों में काम कर रही औरतों की कहीं पर कोई चर्चा नहीं होती, जो कि बहुसंख्या होती हैं। इनके द्वारा सुझाए गए रास्ते इन मज़दूर औरतों के किसी भी काम के नहीं होते। ऐसा नारीवाद प्राथमिक स्तर पर औरतों की ग़ुलामी और भेदभाव के ख़िलाफ़ चेतना तो पैदा करता है, लेकिन इसके ख़िलाफ़ प्रतिरोध का कोई सही रास्ता पेश करने में असमर्थ रहता है। इससे यह मध्यवर्गीय औरतों के एक फै़शनेबल आंदोलन तक सीमित होकर रह जाता है।

इसके उल्ट जब हम स्त्री दिवस के इतिहास की बात करते हैं तो यह ध्यान में रखना चाहिए कि "अंतरराष्ट्रीय स्त्री दिवस" है जो कि ना सिर्फ़ मज़दूर औरतों को केंद्र में रखता है, बल्कि औरतों के सामूहिक और संगठित आंदोलन का संदेश देता है, जो औरतों की ग़ुलामी के लिए ज़िम्मेदार पूँजीवादी व्यवस्था के ख़िलाफ़ संघर्ष का आह्वान करता है। आज अंतरराष्ट्रीय स्त्री दिवस के इन अर्थों और समाजवादी मुल्क़ों के तज़ुर्बों को अपनाकर ही औरतों की मुक्ति का कोई आंदोलन सफल और सार्थक हो सकता है।

मुक्ति संग्राम – बुलेटिन 5 ♦ मार्च 2021 में प्रकाशित

Tuesday, 2 March 2021

नये कृषि कानून - कविता

वे बार बार देना चाहते है विकल्प
नये कृषि कानून के 
रद्द करने की मांग का विकल्प
वे लुभाना चाहते हैं
भटकाना चाहते हैं
आंदोलनकारियों को
जो बखूबी समझ रहे हैं
गुलामी की जंजीर है
यह कृषि कानून
जो बखूबी जान रहे हैं
कारपोरेट के हाथों
उनकी जमीन भी
बेचे जाने का है 
यह कृषि कानून
और यह सब
 बखूबी जान रहे हैं
आंदोलित किसान
मेहनतकशों का हर तबका
और इसलिए
एक अद्भूत भाईचारे की 
तस्वीर के साथ
आंदोलन के साथ लड़ रहे हैं
अपने हक की लड़ाई
पर सोचने वाले  सोचते हैं
हर समय की तरह
डाले जा सकेंगे इसमें भी दरार
तोड़ दिये जा सकते हैं
इसे भी प्रशासनिक दमन से
या बदनाम करके
भर दिये जाऐंगे
 नेतृत्वकारियों को जेल में
और खत्म कर दिये जाऐंगे आंदोलन
पर उनके सोच के विपरित वह खड़ी है
बड़ी शहादत के साथ
कड़कड़ाते ठंड को झेलकर
अब गर्मी की तपन सहने को भी
कमर कसी
उन्हें समझ में अब
आ जाना चाहिए
नहीं है इसका कोई विकल्प
उन्हें याद रखनी चाहिए
इतिहास के पन्ने 
कि
देश के मजदूर किसान
जब उतर जाते हैं सड़क पर
एक कानून ही नहीं
बल्कि बूत रखते हैं बदलने की
शोषणकारी पूरी व्यवस्था को।
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इलिका

१९५३ में स्टालिन की शव यात्रा पर उमड़ा सैलाब 

*On this day in 1953, a sea of humanity thronged the streets for Stalin's funeral procession.* Joseph Stalin, the Soviet Union's fea...