- भारतीय समाज मूलतः कृषि समाज है, न केवल आबादी का अधिकांश भाग खेती पर निर्भर करता है, बल्कि यहां की संस्कृति, नीति व संस्कार व आम चेतना मुख्यतः कृषि-समाज की हैं। साहित्यकार सामाजिक यथार्थ का ही पुनर्सृजन करता है, इसलिए किसान किसी न किसी रूप में साहित्य में उपस्थित रहा है। यद्यपि आधुनिक काल से पहले साहित्य में आमजन के सुख-दुख, आशा-निराशा और जीवन-संघर्ष को प्रमुखता से अभिव्यक्ति नहीं मिली, लेकिन 'खेती न किसान को भिखारी को न भीख बलि' के वर्णन, अकाल के वर्णन, सामाजिक दुर्दशा के चित्र तथा प्रेम-कथाओं में प्रसंगवश कहीं न कहीं किसान जीवन की ओर संकेत रचनाओं में अवश्य दिखाई पड़ता है।हिन्दी के आधुनिक साहित्य की पृष्ठभूमि 1857 का किसान-विद्रोह है, जिसमें किसानों ने खूब बढ़चढ़कर भाग लिया था। आधुनिक इतिहास साम्राज्यवादी शोषण व लूट के विरूद्ध किसानों के विद्रोहों से भरा पड़ा है। यद्यपि तत्कालीन साहित्य में किसान-विद्रोह की अभिव्यक्ति नहीं मिलती, लेकिन बाद के साहित्य पर तथा सामाजिक राजनीतिक आन्दोलनों पर इसका गहरा प्रभाव देखा जा सकता है। आधुनिक काल में मशीन व औद्योगिक समाज में तब्दीली के साथ समाज में नए वर्गों का उदय भी हुआ और वर्ग-संतुलन भी बदला है, प्राथमिकताएं भी बदली हैं। समाज के मेहनतकश वर्गों के सुख-दुख व जीवन-संघर्ष ने आधुनिक साहित्य में केन्द्रीय स्थान ग्रहण किया है। आधुनिक समाज ने उपन्यास जैसी सशक्त साहित्यिक विधाओं को पैदा किया, जिसने शोषित-वंचित वर्ग की आशाओं-आकांक्षाओं को व्यक्त किया।किसान का जीवन कथा-साहित्य में हमेशा एक मुद्दे की तरह से रहा है। किसान को केन्द्रित करके कितने ही श्रेष्ठ उपन्यासों की रचना हुई है। यद्यपि आधुनिक समय में महाकाव्यों की भी कोई कमी नहीं है, सैकड़ों महत्त्वपूर्ण महाकाव्य लिखे गए हैं, जिनमें अपने समय की चेतना व महत्त्वपूर्ण सवालों को अभिव्यक्ति मिली है। लेकिन यह भी सच है कि इक्का-दुक्का खंडकाव्य को छोड़कर किसान-जीवन पर केन्द्रित महाकाव्य या अनेक खंडकाव्य दिखाई नहीं पड़ते।किसान-केन्द्रित महाकाव्यों-खण्डकाव्यों की ही बात नहीं है, बल्कि सैंकड़ों कविता-संग्रह खंगालने के बाद भी किसान को केन्द्र में रखने वाली दो सौ-चार सौ कविताएं भी न मिल पाना चिन्ताजनक है। कवियों की प्रतिबद्धता में कमी नहीं है, सैंकड़ों कवि हैं जो मेहनतकश जनता के प्रति संवेदनशील हैं, जिनकी प्रतिबद्धता घोषित है, लेकिन किसान जीवन का उनके चित्रों से गायब होना कुछ गम्भीर सवाल छोड़ जाता है। कविता विधा पर सोचने पर मजबूर करता है कि कविता में किसान के न आ पाने के पीछे इस विधा का मिजाज है या फिर कवियों की पृष्ठभूमि। किसान वर्ग को महत्त्वपूर्ण जनता न मानना या उनके प्रति असंवेदना-उपेक्षा।किसान कभी कविता में चर्चा का विषय नहीं बना, इसे इस बात से भी समझा जा सकता है कि किसान को लेकर जो कविताएं रची गईं, वे कभी मुख्य विमर्श का हिस्सा नहीं बनी। हिन्दी के प्रमुख प्रकाशनों ने हिन्दी के मुख्य कवियों की रचनाओं को पाठकों तक पंहुचाने के लिए उनकी 'प्रतिनिधि' कविताओं के संकलन प्रकाशित किये, लेकिन इस संकलनों में किसान को केन्द्रित करके रची गई कविताओं का अकाल है। जिन कवियों ने किसानों को अपनी कविताओं का विषय बनाया, वे कविताएं संकलनकर्ताओं की रूचि कैंची से कतर दी गई। मैथलीशरण गुप्त के 'किसान' खंडकाव्य की आलोचकों ने नाम परिगणन के अलावा कभी प्रमुखता से चर्चा नहीं की। अब इसे उपेक्षा नहीं तो क्या कहें?विता में किसान-जीवन का प्रमुखता से न आ पाने के पीछे समाज परिवर्तन में वर्गों की भूमिका की पहचान सम्बंधी सोच भी रही। किसान की अपेक्षा औद्योगिक-मजदूर को क्रांतिकारी चेतना का वाहक माना गया। क्रांति में औद्योगिक मजदूर वर्ग को नेतृत्वकारी भूमिका में देखा गया, न कि किसान को। इस तरह की सोच आरम्भ से ही सोच-चिन्तन में छाई रही। सुमित्रनन्दन पन्त की कविताओं में किसान और मजदूर के बारे में व्यक्त धारणा इसका खुलासा करती है। 'कृषक' कविता में ''उन्होंने किसान को 'युग-युग का भार वाहक, वज्रमूढ़, हठी, रूढिय़ों का रक्षक, दीर्घ सूत्री, दुराग्रही, सशंक, संकीर्ण, समूह-कृपण, स्वाश्रित, शोषित, क्षुधार्दित, कूप-मण्डूक आदि कहकर उसकी कमजोरियों पर प्रकाश डाला है। इसके विपरीत उन्होंने 'युगान्त' की 'श्रमजीवी' शीर्षक कविता में पन्त ने मजदूरों का अत्यन्त भव्य एवं गौरवपूर्ण चरित्र अंकित किया। उन्होंने मजदूरों को 'कर्दम से पोषित होने पर भी पवित्र, शोषित होने पर भी निर्माता, अशिक्षित होने पर भी शिक्षितों से अधिक शिक्षित, दृढ़ चरित्र, दुख सहिष्णु, अभय-चित्त आदि बताते हुए अन्त में कहा हैः'लोक क्रांति का अग्रदूत, वर वीर, जनादृत,नव्य सभ्यता का उन्नायक, शासक, शासित।चिर पवित्र वह: भय, अन्याय, घृणा से पालित,जीवन का शिल्पी, - पावन भ्रम से प्रक्षालित।'1मार्क्सवादी विचारधारा के प्रभावस्वरूप जो आमजन कविता के केन्द्र में आया उसमें किसान अलग से कोई वर्ग नहीं, बल्कि सर्वहारा के एक हिस्से के रूप में था। इसीलिए तत्कालीन आह्वान गीतों व कविताओं में किसान और मजदूर अलग अलग नहीं, बल्कि साथ-साथ ही मौजूद हैं। प्रगतिवादी-आन्दोलन ने सचेत तौर पर किसानों-श्रमिकों को मुख्य रूप पर कविता में केन्द्रित किया। किसानों की आबादी, महत्त्व व शोषण को देखते हुए कविताएं उतनी मात्र में तो नहीं हैं, जितनी कि अपेक्षित हैं, लेकिन ऐसा नहीं कहा जा सकता कि कविता से किसान गायब है। कम-से-कम साम्राज्यवादी अंग्रेजी शासन के खिलाफ मुक्ति-संग्राम में किसान का शोषण कविताओं में प्रस्तुत हुआ है। आजादी के बाद की कविता मध्यवर्ग की मन:स्थितियां व स्थितियां छाई रही हैं, वहां जरूर किसान उपेक्षित हुआ है। साम्राज्यवाद के खिलाफ जब भी संघर्ष तीव्र हुआ है, तो किसान कविता में उपस्थित हुआ है।साम्राज्यवादी व्यवस्था में किसान को जो लगान देना पड़ता था, वह उसकी फसल से भी अधिक होता था और लगान वसूल करने के लिए अत्याचार व दमन किया जाता था। अंग्रेजी राज की क्रूरता व दमन का सूक्ष्मता व समग्रता से वर्णन करते हुए बालमुकुन्द गुप्त 'सर सैयद अहमद का बुढ़ापा' कविता में किसानों के शोषण की प्रक्रियाओं का वर्णन किया। सारे समाज का पेट भरने वाला किसान ही भूखा है, उसके जानवरों को भी कुछ खाने के लिए नहीं मिलता। जब वे कहते हैं कि 'जिनके बिगड़े सब जग बिगडै़ उनका हमको रोवा है' तो उनकी किसानों के प्रति प्रतिबद्धता प्रकट होती है।जिनके बिगड़े सब जग बिगडै़ उनका हमको रोवा है।जिनके कारण सब सुख पावें जिनका बोया सब जन खावें,हाय हाय उनके बालक नित भूखों के मारे चिल्लावें।हाय जो सब को गेहूं देते वह ज्वार बाजरा खाते हैं,वह भी जब नहिं मिलता तब वृक्षों की छाल चबाते हैं।उपजाते हैं अन्न सदा सहकर जाड़ा गरमी बरसात,ठिन परिश्रम करते हैं बैलों के संग लगे दिन रात।जेठ की दुपहर में वह करते हैं एकत्र अन्न का ढेर, जिसमें हिरन होंय काले चीलें देती हैं अंडा गेर।काल सर्प की सी फुफकारें लुयें भयानक चलती हैं,धरती की सातों परतें जिसमें आवा सी जलती हैं।तभी खुले मैदानों में वह कठिन किसानी करते हैं,नंगे तन बालक नर नारी पित्ता पानी करते हैं।जिस अवसर पर अमीर सारे तहखाने सजवाते हैं,छोटे बड़े लाट साहब शिमले में चैन उड़ाते हैं।उस अवसर में मर खपकर दुखिया अनाज उपजाते हैं,हाय विधाता उसको भी सुख से नहिं खाने पाते हैं।जम के दूत उसे खेतों ही से उठवा ले जाते हैं,यह बेचारे उनके मुंह को तकते ही रह जाते हैं।अहा बेचारे दु:ख के मारे निस दिन पचपच मरें किसान,जब अनाज उत्पन्न होय तब सब उठवाय ले जाय लगान।यह लगान पापी सारा ही अन्न हड़प कर जाता है,भी कभी सब का सब भक्षण कर भी नहीं अघाता है।जिन बेचारों के तन पर कपड़ा छप्पर पर फूंस नहीं,खाने को दो-सेर अन्न नहीं बैलों को तृण तूस नहीं।नग्न शरीरों पर उन बेचारों के कोड़े पड़ते हैं,माल माल कह कर चपरासी भाग की भांति बिगड़ते हैं।सुनी दशा कुछ उनकी बाबा! जो अनाज उपजाते हैं,जिनके श्रम का फल खा खाकर सभी लोग सुख पाते हैं।बालमुकुन्द गुप्त ने किसानों की दुर्दशा का जो वर्णन किया, वह आज भी काला हांडी के किसानों की याद दिला जाता है। गुप्त जी कविता में किसान वृक्षों की छाल चबाकर पेट भरने को विवश हैं, तो आज के किसानों कच्ची गुठलियां खाकर बीमार होने को विवश हैं। साम्राज्यवादी-पूंजीवादी शोषण के कारण एक लाख अस्सी हजार से अधिक किसान आत्महत्याएं कर चुके हैं। यह कोई प्राकृतिक विपदा के कारण नहीं है, बल्कि पूंजीपरस्त सरकारी नीतियों व योजनाओं के कारण हैं।रामधारी सिंह दिनकर ने साम्राज्यवादी शोषण को भारतीय जन की दुर्दशा का मुख्य कारण माना है। उन्होंने शोषण के खिलाफ उठ खड़े होने के लिए जनमानस को उद्वेलित किया। मेहनतकश जनता के दुखों-तकलीफों को व्यक्त करने वाली कविताएं उन्होंने लिखी, जिसमें किसान का जिक्र आया है। 'कस्मै देवाय', 'कविता की पुकार', 'हाहाकार' का नाम विशेष रूप से लिया जा सकता है। विजेन्द्र नारायण सिंह ने कहा कि 'हाहाकार' कविता भारतीय किसानों की बेमिसाल गरीबी का शोकगीत है।2 कभी खलिहान किसानों के लिए खुशहाली की जगह हुआ करती थी। पर उपनिवेशवादी शोषण ने इसे रोने और आंसू बहाने की जगह बना दी। दिन भर और उसी क्रम में साल भर मरने-खपने के बाद भी उन्हें भरपेट खाना और कपड़ा नहीं मिल पाता है। असन और वसन दोनों का अभाव किसानों के जीवन को आंसुओं से तर कर देता है:जेठ हो कि हो पूस, हमारे कृषकों को आराम नहीं है,छुटे बैल के संग, कभी जीवन में ऐसा याम नहीं है।मुख में जीभ, शक्ति भुज में, जीवन में सुख का नाम नहीं है,वसन कहां? सूखी रोटी भी मिलती दोनों शाम नहीं है।विभव-स्वप्न से दूर भूमि पर यह दुखमय संसार कुमारी,खलिहानों में जहां मचा करती है हाहाकार कुमारी।बैलों के बन्धु वर्ष भर, क्या जानें, कैसे जीते हैं?बंधी जीभ, आंखें विषण्ण, गम खा, शायद, आंसू पीते हैं3देख, कलेजा फाड़ कृषक दे रहे हृदय-शोणित की धारेंबनती ही उनपर जाती हैं वैभव की ऊंची दीवारें।धन-पिशाच के कृषक-मेधा में नाच रही पशुता मतवाली,अतिथि मग्न पीते जाते हैं दीनों के शोणित की प्याली।4रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी लेखनी को सर्वहारा को समर्पित करने का संकल्प लिया। किसान पूरे समाज का पेट पालता है, लेकिन शोषण के कारण खुद वह भूखा रहता है। वह दूध पैदा करता है, लेकिन उसके बच्चे दूधा पीने के लिए तरसते हैं।ऋण-शोधन के लिए दूध-घी बेच-बेच धन जोड़ेंगेबूंद-बूंद बेचेंगे, अपने लिए नहीं कुछ छोड़ेंगेशिशु मचलेंगे, दूध देख, जननी उनको बहलाएगीमैं फाडूंगी हृदय, लाज से आंख नहीं रो पाएगीसूखी रोटी खायेगा जब कृषक खेत में धरकर हलतब दूंगी मैं तृप्ति उसे बनकर लौटे का गंगाजल,उसके तन का दिव्य स्वेदकण बनकर गिरती जाऊंगीऔर खेत में उन्हीं कणों-से मैं मोती उपजाऊंगी।5स्वतंत्रता से पूर्व साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष के दौरान रूस में श्रमिकों का शासन मेहनतकश जनता के संघर्षों को प्रेरणा व दिशा देता था। किसान-आन्दोलनों की पृष्ठभूमि में रूस की समाजवादी-व्यवस्था एक आदर्श की तरह व्याप्त थी। नरेन्द्र शर्मा की 'लाल निशान' कविता इसे व्यक्त करती है।लाल रूस है ढाल साथियों सब मजदूर किसानों की।वहां राज है पंचायत का वहां नहीं है बेकारी।लाल रूस का दुश्मन साथी, दुश्मन सब इनसानों का।दुश्मन है सब मजदूरों का, दुश्मन सभी किसानों का।भगवतीचरण वर्मा ने 'भैंसा गाड़ी' कविता के माध्यम से ग्रामीणों और किसानों के जीवन यथार्थ का वर्णन किया। किसानों के शोषण के चित्र दिखाते हुए अनके शोषण के कारणों की ओर संकेत किया।'उस ओर क्षितिज के कुछ आगे, कुछ पांच कोस की दूरी पर,भू की छाती पर फोड़ों से, हैं उठे हुए कुछ कच्चे घर।मैं कहता हूं खण्डहर उसको पर वे कहते हैं उसे ग्राम।पैदा होना फिर मर जाना, यह है लोगों का एक काम।दिनकर, बालकृष्ण शर्मा नवीन, भगवतीचरण वर्मा, नरेन्द्र शर्मा, रामेश्वर शुक्ल अंचल आदि कवियों की कविताएं शोषित-पीडि़त जनता के प्रति करूणा व सहानुभूति प्रकट करती हैं। साम्राज्यवादी सत्ता के खिलाफ जनता की भारी संख्या में भागीदारी इन्हें मेहनतकश के चित्र देने पर तो मजबूर कर रही थी, लेकिन साम्राज्यवाद के क्रूर व दमनकारी चरित्र को उद्घाटित करने के लिए किसानों की दुर्दशा का चित्रण किया गया है। इसलिए इनकी कविताएं सामन्तवादी शोषण व उसकी कुटिलताओं पर चोट नहीं करती। किसान-दुर्दशा के वास्तविक कारण ओझल हो जाते हैं, किसान यहां या तो बहुत ही आदर्शवादी रूप में 'अन्नदाता' की रोंमाटिक छवि लिये उपस्थित होता है या फिर बिल्कुल दीन-हीन व बेचारा के रूप में। गौर करने की बात है कि स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद इस धारा में किसान की बदहाली के चित्र व स्वर कुछ मंद हो गया, जबकि किसान अभी उतनी घोर दुर्दशा में था। आजादी के बाद के किसान संघर्ष यहां लगभग गायब ही हैं।लल्लन राय ने हिन्दी कविता में किसान आन्दोलनों के प्रभाव को देखने के लिए तत्कालीन कविताओं का जिक्र किया है, जो यहां देना उचित होगा। ''हिन्दुस्तान के बहुसंख्यक शोषित-उत्पीडि़त जीवन में कृषि क्रांति की आवश्यकता से प्रेरित 'किसान सभा' का प्रभाव सन् 1930 से, विशेष रूप से 1936 से 1953 तक काफी गहरा था। फलस्वरूप प्रगतिशील कविता का कृषि क्रांतिमूलक स्वर सबसे तीव्र और व्यापक रहा है। इस काल खण्ड के आरम्भिक दौर में किसान और गांव के जीवन को लेकर अनेक कविताएं लिखी गईं। शील की 'बैल', 'अंगडाई', 'किसान', 'मजदूर की झोंपड़ी';रामविलास शर्मा की 'कुहरे के बादल', 'तूफान के समय', 'बुधई के गांव में लाल झण्डा'; भवानीप्रसाद मिश्र की 'गाय'; रामेश्वर 'करुण' की 'यह दो विपरीत कथाएं'; आरती प्रसाद सिंह की 'बैलगाड़ी'; शंकर शैलेन्द्र की 'तू जिन्दा है', 'उठे कदम'; बालकृष्ण शर्मा नवीन की 'झूठे पत्ते', 'नरक विधान'; जगन्नाथ प्रसाद मिलिन्द की 'किसान का जन्म दिन', 'किसान की चुनौती'; सोहनलाल द्विवेदी की 'किसान', 'गांवों में' आदि कविताएं उस समय की किसान चेतना के नये उभार को स्पष्ट रूप से रेखांकित करती है।''6प्रगतिवादी-आन्दोलन के जन कवि शील, त्रिलोचन, नागार्जुन, शिवमंगल सिंह सुमन, केदारनाथ अग्रवाल सीधे तौर पर जनता के संघर्षों से जुड़े थे। इनका किसानी-जीवन से सीधा संबंध था। मजदूर को क्रांति का अगुवा मानते हुए भी किसान की उपेक्षा नहीं की। इनकी कविताओं में किसान के जीवन के वास्तविक चित्र देखे जा सकते हैं। किसान यहां अपनी जीवन्त दुनिया के साथ मौजूद है। यहां उसके पशु भी हैं, उसका परिवार भी और किसान-आन्दोलन भी, प्रकृति का विकराल रूप भी और मनमोहक रूप भी। इनके रचना-व्यक्तित्व के निर्माण में तत्कालीन कृषक-आन्दोलन हैं।जनकवि शील ने किसानों पर कई कविताएं लिखीं, उनकी दो कविताओं सन् 1934 में लिखी गई 'तक-तक तक-तक बैल' तथा स्वतंत्रता के बाद रचित 'भाई का पत्र' का विशेष तौर पर जिक्र किया जा सकता है, जो अपने समय में बहुत ही लोकप्रिय भी हुई थी। 'तक-तक तक-तक बैल' कविता में हल जोतता किसान अपने साथी बैल से बातें करता है। जीवन संघर्ष में किसान के पशु उसके दोस्त हो जाते हैं। वे एक दूसरे के जीवन का आधार हैं। किसान की पूरी दिनचर्या यहां दिखाई देती है।'भाई का पत्र' किसान जीवन की दुर्दशा को पूरी तरह से प्रस्तुत कर देती है। गांव की तथा विशेषकर किसान की बदतर हालात जो उसके नहीं, बल्कि व्यवस्था के बनाए हुए हैं, वे सब सामने आ जाते हैं। किसान अपनी जमीन की कमाई से उसका लगान भी नहीं भर सकता, उसकी कमाई से वह अपने परिवार का गुजार व बेहतर भविष्य तो क्या बनायेगा? किसानी जीवन के इस भयावह यथार्थ को यह कविता प्रस्तुत करती है।जंगल बेच ज़मीदारों ने राह संजोई,रह जाती है ईंधन बिन अधपकी रसोईपुरखों की जायदाद करूं क्या सर पर रखकर,रुपया कर्ज़, उधार नहीं जब देता कोईसोचा-समझा खूब बहुत मन को समझाया,बेच रहा हूं नीम द्वार की शीतल छायागयी चैत की फसल बेबसी के घेरे में,निगल गया खलिहान न घर में दाना आयाऐसी हालत में बोलो क्या खर्चें खाएं,ब तक ड्योढ़ा ले लेकर परिवार जिलाएंडपट रहा दुष्काल जिंदगी की चिंता हैजिस धरती में रहें कहां पर पैर जमाएंपिछली बार मरा जो धौला, फिर उठ न सकाचला गया सुरधाम हाय साथी मेहनत कामांग चांग कर बैल, बीज धरती में डाले,पर हो गए अनाथ लगा खेती को झटकाबिन बैलों की काश्त स्वप्न में मोर नचानाबिन सरगम का गीत, भूख में गाल बजाना,तुम तो कवि हो जरा, कल्पना करके देखोछोड़ दिया है यहां जवानी ने इठलानाबिना दया के मरी अभी कंचन की सालीलखपतशाह दाब बैठे हैं लोटा-थालीकुछ लोगों को छोड़ गांव का गांव दुखी हैअबकी अपने गांव न आएगी दीवालीिसकी किसकी कहें गांव के बुरे हाल हैं,खद्दरधारी पंचायत में गोलमाल हैंझूठों के सरताज कसम गांधी की खाते,भूखों मरे किसान मगर नेता निहाल हैंदुख दे रहा सुराज, किसान कराह रहे हैं,उठने को तूफान, अभी कुछ थाह रहे हैंनागार्जुन ने 'दूर दूर से आए मनवाने निज अधिकार' कविता में जमीन के बारे में लिखा। एक तरफ तो जमींदारों के पास हजारों एकड़ भूमि उनके पशुओं के नाम से है और वह बंजर पड़ी हुई है, लेकिन दूसरी तरफ बहुत बड़ी आबादी के पास जमीन ही नहीं है।लाखों एकड़ खेत पड़े हैं, ठप्प है पैदावार,फाजिल धरती का कण-कण करता है हाहाकारकागज पर खेती होती है, कलम हुई हर-फार,छोड़ रहे हैं गांव-गांव खेत मजदूरों के परिवार।जमींदार थे सौ, उनके बच्चे बीस हजार,उपजाऊ खेतों पर उनको दिला दिया अधिकार।बंजर-धरती के भी तो हम हो न सके हकदार,हदबंदी बिल पेश हुआ था, उसका बना अचार।''त्रिलोचन की कविता पर विचार करते हुए मैनेजर पाण्डे ने टिप्पणी की है, वह कविता में किसान की प्रस्तुति की ओर ध्यान आर्कर्षित करती है। ''त्रिलोचन की कविता के बारे में यह कहना काफी नहीं है कि वह किसानों के जीवन-संघर्ष की कविता है। यह भी देखना जरूरी है कि वे किसान-जीवन के यथार्थ को किस दृष्टि से देखते और चित्रित करते हैं। हिन्दी में किसान-जीवन के कवियों की कमी नहीं है। उनमें से अधिकांश कवि मध्यवर्गीय दृष्टि से किसान-जीवन के यथार्थ को देखते हैं। वे कभी समय की मांग और कभी बौद्धिक सहानुभूति के कारण किसान-जीवन की कविता लिखते हैं। ऐसी कविताओं में कहीं कवि तटस्थ दर्शक की तरह होता है तो कहीं किसानों का वकील। इनसे भिन्न मध्यवर्गीय दृष्टि के कवि हैं जो किसान की दयनीयता से द्रवित होकर उनकी व्यथा-कथा कहते हैं या किसान-जीवन की सरलता, सादगी और पवित्रता का गौरव-गान करते हैं। त्रिलोचन ऐसे कवि नहीं हैं। उनकी दृष्टि एक सजग किसान की दृष्टि है जो उस जीवन को जीते, देखते-सुनते और समझते हुए कवि को मिली है, इसलिए उसमें मध्यवर्गीय तटस्थता और भावुकता नहीं है। उसमें किसान जीवन से आत्मीयता और तादात्म्य है, लेकिन उस जीवन में मौजूद रूढिय़ों की आलोचना भी है। उनकी दृष्टि किसान जीवन की समग्रता को देखती है। वह उस जीवन की शक्ति के स्रोतों की खोज करती है तो जड़ता की जड़ों पर प्रहार भी करती है। त्रिलोचन इसी सजग किसान-दृष्टि से प्रकृति, समाज और विश्व को देखते हैं। मानवीय संबंधों और भावों के उनके बोध में भी वही दृष्टि सक्रिय रहती है।''7अकाल केवल किसान की ही नहीं, पूरे भारतीय समाज की दुर्दशा का वर्णन करते हैं। अकाल पर सबसे ज्यादा बुरी हालत किसानों की होती है। उनके पशु भी भूखे मरने लगते हैं। नागार्जुन ने 'अकाल और उसके बाद' कविता में वर्णन किया है:कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास,कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उसके पास।कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त,कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त।दाने आए घर के अन्दर कई दिनों के बादधुआं उठा आंगन से उफपर कई दिनों के बादचमक उठी घर भर की आंखें कई दिनों के बादकौए ने खुजलाई पांखें कई दिनों के बाद!आजादी प्राप्त करने के बाद भी किसान की हालत बहुत नहीं बदली। अंग्रेजी साम्राज्यवादी शासन किसानों के अनाज को खलिहान से उठा ले जाता था, लेकिन आज की शोषक नीतियां फसल पकने से पहले ही खाद-तेल-दवाई-बीज के माधयम से पहले ही लूट लेती हैं। किसान के श्रम का शोषण ही है, जिसके कारण उसकी ऐसी दयनीय हालत है, वरन् वह न तो कामचोरी करता है और न ही फिजूलखर्ची।वैश्वीकरण, उदारीकरण व निजीकरण की नीतियों ने किसान की हालत और अधिक खस्ता कर दी है। वैश्वीकरण की नीतियों के चलते समाज में असमानता की गहरी खाई बनी है, जिसकी सबसे ज्यादा मार समाज के निम्न वर्गों पर पड़ी है। किसानों पर कर्जे की अधिकता के कारण उन्होंने बहुत बड़ी संख्या में आत्महत्याएं की हैं। आधिकारिक तौर पर ही एक लाख पचास हजार से अधिक किसानों की आत्महत्याओं की पुष्टि हुई है। सड़क से लेकर संसद तक में यह चर्चा का विषय रही है। लेकिन इतनी भारी संख्या में हुई आत्महत्याओं के बावजूद भी शासक वर्ग किसान की ओर संवेदनशील नजर नहीं आया। बसंत त्रिपाठी की 'किसानों की आत्महत्या' कविता इस ओर ध्यान आर्कषित करती है।खेती घाटे का व्यापार बनी है और किसान उसे छोड़कर शहर जाने पर विवश हैं। उससे उनके बच्चों व परिवार को तथा उसको जो विस्थापन की पीड़ा झेलनी पड़ती है वह भी कविताओं में अभिव्यक्त हुआ है। बहुत बड़ी आबादी इस परायेपन के संकट को झेल रही है। विशेष आर्थिक क्षेत्र( सेज) विकसित करने और शहरों के विस्तार से किसान जिस तरह विस्थापित हो रहे हैं वह दर्द किसी से छुपा नहीं है। उनके इस विस्थापन को उच्च वर्गों में बड़ा महिमामंडित भी किया जा रहा है। इस तरह की खबरें समाचारों में आम जगह बना लेती हैं कि किसान करोड़पति बन गए हैं और कागज के टुकड़ों के बदले उसकी जमीन छीनी जा रही है। बेशक इस जमीन से उसका परिवार कोई सुविधाएं नहीं जुटा पा रहा है, लेकिन किसान होने का सुख तो उसे मिलता है इसी जमीन के टुकड़े से ही। यह जमीन का टुकड़ा ही उसे पहचान दे रहा है और समाज में सम्मान पा रहा है।किसान का जमीन के प्रति मोह अपने अस्तित्व को बचाने जैसा है। उसके लिए वह झगड़ा करता है। लेकिन वैश्वीकरण के दौर की लूट ने उसको पंगु, असहाय व लाचार बना दिया है। 'बित्ते भर' जमीन के लिए मरने मारने पर उतारू होने वाले किसान को अपनी जमीन को जबरदस्ती बिकते देख काठ मार गया है। मथिलेश श्रीवास्तव की 'बित्ता भर' कविता में किसान की सबसे कीमती वस्तु उसकी जमीन के छिन जाने की व्यथा है। किसान अपने को बेबस महसूस कर रहा है। वह इस जमीन के लिए इस लिए भी नहीं लड़ रहा है कि इसमें उसके लिए विशेष कुछ है नहीं। इस जमीन से उसे अब कथित 'सम्मान' भी नहीं मिलने वाला।उसकी जमीन कीबोली लग रही हैआजवह खड़ा हैउसी जमीन की डरेर परजिसके बित्ते भर इधर या उधर होने केमहज अंदाज परवह लड़ पड़ता हैिसी का सिर फट जाता हैटूट जाती है किसी की बांहई बित्ते की जमीन उसकी ओर सेई बित्ते की जमीन दूसरे की ओर सेडरेर मजबूत करने में गल जाती हैतोड़ दी जाती हैसामूहिक हरवाहीएक का बैल बिक जाता हैदूसरे का बैल पागल हो जाता हैएक की जमीन बिक चुकी हैपहले हीदूसरे की जमीन की बोली है आज8किसान चाहे जमीन कितना ही खदेड़ दिया जाए जमीन से दूर होने की पीड़ा व दर्द उसमें निरन्तर कुलबुलाता है। एकान्त श्रीवास्तव की कविता 'जमीन-2' में जमीन किसान के सपने में आती है।जमीनबिक जाने के बाद भीपिता के सपनों मेंबिछी रही रात भरवह जानना चाहती थीहल के फाल का स्वादचीन्हना चाहती थीधांवरे बैलों के खुरवह चाहती थीपिता के सीने में लहलहायेंपिता की बोयी फसलेंएक अटूट रिश्ते की तरहभी नहीं टूटना चाहती थी जमीन बिक जाने के बाद भी।9एकान्त श्रीवास्तव की कविताओं में गांव व किसान के चित्र आते हैं। ऐसा व्यक्ति जो गांव से दूर आ गया है और गांव उसको कभी सपने में दिखाई देता है तो कभी प्रकृति में। किसान के संघर्ष, उसके जीवन के अन्तर्विरोध, उसके जीवन के विरोधाभास यहां से लगभग गायब हैं। किसानी जीवन की ऐसी स्मृतियों के बिम्ब इनकी कविताओं में होते हैं जेसे कि सपने आ रहे हों। बचपन की स्मृतियों की तरह से वे उस जीवन की रोमांटिक किस्म का लगाव है।किसान जीवन के विभिन्न पक्षों के चित्र कविता में उभरते हैं। किसान जीवन के वास्तविक सुख दुख, आशा-निराशा और संघर्ष भी कविता में है और काल्पनिक विजय उल्लास भी। वह खेती करता नजर आता है। प्रकृति से प्रेम करता नजर आता है। अपने परिवार के लिए खटता नजर आता है। कविता में किसान जीते-जागते हाड-मांस का व्यक्ति भी है और एक धारणा मात्र भी। किसान के विभिन्न स्तर हैं। धनी किसान भी है, मध्यवर्गीय भी और खेतीहर मजदूर भी।संदर्भः1. डा. लल्लन राय, हिन्दी की प्रगतिशील कविता, हरियाणा साहित्य अकादमी, चण्डीगढ़, 1989, पृ.-1082. रामधारी सिंह दिनकर ; विजेन्द्र नारायण सिंह ; साहित्य अकादमी, नई दिल्ली ; 2007, पृ.593. चक्रवा, पृ. 494. कस्मै देवाय, पृ. 195. कविता की पुकार, पृ. 12;चक्रवाल6. लल्लन राय;पृ. 1187. परमानन्द श्रीवास्तव (सं); समकालीन हिन्दी आलोचना; साहित्य अकादमी प्रकाशन, दिल्ली; 1998; पृ.-4538. मिथिलेश श्रीवास्तव; किसी उम्मीद की तरह; आधार प्रकाशन, पंचकूला; 1999, पृ. 599. एकान्त श्रीवास्तव; अन्न हैं मेरे शब्द; पृ.-23)
Sunday, 9 October 2022
कविता में किसान
Saturday, 8 October 2022
अतिरिक्त मूल्य के सवाल पर सीमा आज़ाद
अतिकिरान्तिकारी (मूर्खवादी) अब कुत्सा प्रचार और गाली-गलौज पर उतर चुके हैं। जाहिर है कि जब तर्क चुक जाता है तो कुत्साप्रचार और झूठ के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता है। पिछले लम्बे समय से इनका इतिहास यह रहा है कि हर बहस में ये पूँछ उठाकर भाग खड़े होते हैं, कोई जवाब न दे पाने की सूरत में ये झूठे मनगढन्त आरोपों की बौछार कर देते हैं और ब्राह्मणवादी, साम्राज्यवाद के साथ गठजोड़ जैसे आरोपों की बौछार करते हैं। हम इनके इन वाहियात आरोपों का जवाब देना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं। हम सिर्फ़ उन बहसों की बात करते हैं, ताकि लोग खुद तर्क के आधार पर फैसला कर लें-
अतिरिक्त मूल्य के सवाल पर...
कार्ल मार्क्स के जन्मदिवस के अवसर पर दस्तक पत्रिका की सम्पादक सीमा आज़ाद ने अपने फ़ेसबुक वॉल पर दस्तक पत्रिका के मई-जून 2018 में प्रकाशित एक लेख साझा किया है। लेख में वैसे तो दार्शनिक स्तर पर और ऐतिहासिक भौतिकवादी दृष्टिकोण से देखने पर कई त्रुटियाँ और अस्पष्टताएँ हैं, लेकिन उन पर फ़िर कभी। फ़िलहाल इस लेख में राजनीतिक अर्थशास्त्र की जो समझदारी प्रस्तुत की गयी है उस पर कुछ बातें!
सीमा आज़ाद अपने लेख में लिखती हैं – "उन्होंने बताया कि पूंजीपति अपना मुनाफा अपने दिमाग या कारोबार में लगाई गयी पूंजी से नहीं कमाता है, बल्कि वह अपना मुनाफा मजदूरों के श्रम की चोरी से ही कमाता है। संक्षेप में इसे ऐसे समझा जा सकता है कि पूंजीवाद के आने के बाद नित नयी विकसित तकनीक वाली मशीनों के रूप में मनुष्य का श्रम पहले ही लग चुका होता है। मशीनें मनुष्य के श्रम का ही विकसित रूप है और कुछ नहीं। यानि यदि मनुष्य पहले यदि 8 घण्टे में 10 जोड़ी जूते बना लेता था, और आठ घण्टे का उस 200 रूपये मिलता था (जो कि हम फिलहाल मान लेते हैं, कि उसके पुनरूत्पादन पर लगने के लिए पर्याप्त हैं। अब नयी विकसित मशीनें, जो कि मजदूरों के श्रम का ही विकसित रूप है, के आ जाने पर वह 10 जोड़ी जूते 4 घण्टे में ही बना लेता है, लेकिन पूंजीपति अब भी उससे 8 घण्टे ही काम ले रहा है, और मजदूरी उतनी ही दे रहा है, या वो एक मजदूरी में दो मजदूर का काम करा रहा है। यानि श्रम के विकसित रूप में मशीनों के इस्तेमाल से एक मजदूर पहले 4 घण्टे में ही खुद को मिलने वाले मूल्य का श्रम कर ले रहा है, उसके आगे के 4 घण्टे जो वह श्रम कर रहा है, वह पूंजीपति द्वारा उसके श्रम की चोरी है और यही उसके मुनाफे का आधार है, न कि पूंजीपति की पूंजी।
दुनिया में हर पूंजी का आधार श्रम ही है और कुछ नहीं। इस रूप में दुनिया की मुख्य पूंजी प्रकृति के बाद श्रम है, एक पर कब्जा कर और दूसरे की चोरी कर पूंजीपति अपना मुनाफा बढ़ाता जाता है। इसे ही 'अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत' कहते हैं।"
सीमा आज़ाद को असल में अतिरिक्त मूल्य के सिद्धान्त की सामान्य जानकारी नहीं है। जिसको सीमा आज़ाद अतिरिक्त मूल्य कह रही हैं, वह असल में सापेक्षिक अतिरिक्त मूल्य है जो कि नयी मशीनरी के लगाने से पैदा होता है। जबकि सीमा आज़ाद के हिसाब से अतिरिक्त मूल्य नयी मशीन लगाने से पैदा होता है। सीमा आज़ाद के इस अनोखे मार्क्सवाद से यह बात निकलती है कि अगर पूँजीपति नयी मशीन न लगाये तो कोई अतिरिक्त मूल्य पैदा ही नहीं होगा। जबकि मार्क्स बताते हैं कि पूँजीवादी उत्पादन का मतलब ही यही होता है कि उसमें अतिरिक्त मूल्य पैदा हो रहा है। मार्क्स ने माल उत्पादन के दो रूपों की चर्चा की है। पहला : साधारण माल उत्पादन, जिसमें उत्पादन का मकसद उपभोग होता है, और दूसरा: विस्तारित माल उत्पादन, जो कि पूँजीवादी उत्पादन है। किसी भी पूँजीवादी उत्पादन में अतिरिक्त मूल्य का उत्पादन अनिवार्यतः होता ही है क्योंकि कोई भी पूँजीपति इसके बग़ैर पूँजी लगायेगा ही नहीं। अतिरिक्त मूल्य नयी या पुरानी मशीन से नहीं पैदा होता बल्कि मज़दूर की श्रमशक्ति के पुनरुत्पादन के लिए आवश्यक श्रमकाल और कुल श्रमकाल के अन्तर से पैदा होता है। नयी मशीन वास्तव में पूँजीवादी होड़ को बताती है, जिसमें पूँजीपति कुल श्रमकाल में से मज़दूर की श्रमशक्ति के पुनरुत्पादन के लिए आवश्यक श्रमकाल के हिस्से को कम कर देता है, जिससे किसी माल के उत्पादन के लिए आवश्यक श्रमकाल, सामाजिक रूप से आवश्यक औसत श्रमकाल से कम हो जाता है और उसे सापेक्ष अतिरिक्त मूल्य प्राप्त होता है।
दूसरे शब्दों में, पूँजीपति नयी मशीनरी लगाकर श्रम की उत्पादकता में वृद्धि कर देता है। इसके परिणामस्वरूप वह अतिरिक्त श्रमकाल जिसमें वह अतिरिक्त मूल्य उत्पादित करता था, वह पहले से बढ़ जाता और पूँजीपति को बढ़ा हुआ अतिरिक्त मूल्य मिलता है, जिसे मार्क्स सापेक्ष अतिरिक्त मूल्य (अतिरिक्त अतिरिक्त मूल्य) कहते हैं। पूँजीवादी होड़ इस अतिरिक्त अतिरिक्त मूल्य को बहुत अवधि तक बने नहीं रहने देता क्योंकि अन्य पूँजीपति भी नयी मशीनरी लगाकर अपने माल के उत्पादन के लिए आवश्यक श्रमकाल को उस पूँजीपति के माल के उत्पादन के लिए आवश्यक श्रमकाल के स्तर पर ले आते हैं, जिससे उस माल के उत्पादन के लिए सामाजिक रूप से आवश्यक श्रमकाल की मात्रा ही कम हो जाती है, जिससे अतिरिक्त अतिरिक्त मूल्य ग़ायब हो जाता है लेकिन अतिरिक्त मूल्य फ़िर भी पूँजीपतियों को मिलता रहता है।
आइये देखते हैं कि मार्क्स ने अतिरिक्त मूल्य के बारे में क्या लिखा है – "यदि मज़दूर को अपना सारा समय अपने तथा अपने बाल बच्चों के जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक साधन पैदा करने में लगाना पड़े, तो दूसरों के वास्ते मुफ्त में काम करने के लिए उसके पास कोई समय नहीं बचेगा। जब तक उसके श्रम में एक खास दर्जे की उत्पादकता नहीं होती, तब तक उसके पास ऐसा कोई फालतू समय नहीं हो सकता : और जब तक उसके पास ऐसा फालतू समय नहीं होता, तब तक वह कोई अतिरिक्त श्रम नहीं कर सकता और इसलिए तब तक न पूँजीपति हो सकते हैं, न गुलामों के मालिक और न सामन्ती प्रभु। कहा जा सकता है कि फालतू समय के अभाव में बड़े मालिकों का कोई भी वर्ग नहीं हो सकता।" (पूँजी खण्ड 1 अध्याय 16)
"काम के दिन को उस बिन्दु के आगे खींच ले जाना जहाँ तक मजदूर केवल अपनी श्रम शक्ति के मूल्य का समतुल्य ही पैदा कर पाता है, और पूँजी का इस अतिरिक्त श्रम पर अधिकार कर लेना यह निरपेक्ष अतिरिक्त मूल्य का उत्पादन है। इस प्रकार का उत्पादन पूँजीवादी व्यवस्था का सामान्य आधार है..." (अध्याय 16, पृ. 559)
"काम के दिन को लम्बा करके जो अतिरिक्त मूल्य पैदा किया जाता है, उसे मैंने निरपेक्ष अतिरिक्त मूल्य का नाम दिया है। दूसरी ओर, जो अतिरिक्त मूल्य आवश्यक श्रम-काल के घटा देने और काम के दिन के दो हिस्सों में तदनुरूप परिवर्तन हो जाने के फलस्वरूप पैदा होता है, उसे मैं सापेक्ष अतिरिक्त मूल्य की संज्ञा देता हूँ।" (पूॅंजी, खण्ड 1. पृ. 345)
स्पष्ट है कि सीमा आज़ाद की व्याख्या में सापेक्ष और निरपेक्ष अतिरिक्त मूल्य के भेद को मिटा दिया गया है और उनकी समझ यह है कि नयी विकसित मशीनों के आ जाने पर अतिरिक्त मूल्य पैदा होता है।
यदि कार्ल मार्क्स की व्याख्या को सूत्रबद्ध करें तो निम्न समीकरण बनेगा:
स्थिर पूँजी (मशीनरी, कच्चा माल आदि) + परिवर्तनशील पूँजी (मज़दूरी) = उत्पाद + मज़दूरी + अतिरिक्त मूल्य
जबकि सीमा आज़ाद के "मार्क्सवाद" को सूत्रबद्ध करें तो –
पहली स्थिति में –
स्थिर पूँजी + परिवर्तनशील पूँजी = उत्पाद + मज़दूरी
दूसरी स्थिति में जब नयी मशीन आ जाती है, यानि स्थिर पूँजी में वृद्धि हो जाती है तो –
स्थिर पूँजी + स्थिर पूँजी (नयी मशीन) + परिवर्तनशील पूँजी = उत्पाद + मज़दूरी + अतिरिक्त मूल्य
ज़ाहिर है कि ऊपर के समीकरणों से सीमा आज़ाद के "मार्क्सवाद" को समझा जा सकता है कि जो कि मार्क्स की शिक्षा के एकदम विपरीत है।
सीमा आज़ाद की एक बात बिल्कुल सही है जब वह कार्ल मार्क्स से इस कथन को दुहराती हैं कि "दार्शनिकों ने समाज की व्याख्या की है, लेकिन सवाल इसे बदलने का है"। लेकिन एक मार्क्सवादी के लिए दुनिया को बदलने के लिए कम से कम मार्क्सवाद का ज्ञान ज़रूरी है। मार्क्स ने यूं ही नहीं लिखा था कि "अज्ञान एक राक्षसी शक्ति है और हमें भय है कि यह कई त्रासदियों का कारण बनेगी।" दूसरे मार्क्सवादी विचारधारा की हिफ़ाजत करना एक जमीनी काम है। मार्क्स ने ये भी लिखा था कि "किसी ग़लत विचार का खण्डन न करना बौद्धिक बेईमानी है।"
शेष अगली पोस्ट में ...
Thursday, 6 October 2022
बेग़म अख़्तर के जन्मदिवस पर
बेग़म अख़्तर के जन्मदिवस पर चार साल पुराना यह संक्षिप्त लेख!
◆◆
शास्त्रीयता के सिरों को अतिक्रमित करती यथार्थबोध से उपजी एक आवाज़ बेग़म अख़्तर की!
'मेरा अज़्म इतना बलन्द है के पराए शोलों का डर नहीं'
◆◆
बेग़म अख़्तर पर बारहा लिखने का मन हुआ करता था लेकिन 'और फिर तल्ख़िए एहसास ने दिल तोड़ दिया' जैसा हाल हो गया।कमउमरी में उन्हें सिर्फ़ उनकी मक़बूलियत के कारण सुना था इसलिए ज़हन और ज़िन्दगी पर उनका कोई ख़ास असर नहीं पड़ा।
नाम भर को थोड़ा संगीत सीखा तो है!संगीत मर्मज्ञ नहीं हूं लेकिन बहुत बाद में लगातार और बार बार अख़्तरी को सुनते हुए सबसे पहले उनके बारे में यह मिथ टूटा कि वे मख़मली और जादुई आवाज़ की मल्लिका हैं!न मुझे वे जादुई लगती हैं न मख़मली!मेरे सुनने में वे मुझे लगभग रूखी लगती हैं!!
वे गंवई दुपहरी की गायिका हैं।उनकी गायिकी में सम्मोहक सुकून और आराम नहीं मिलता बल्कि मिलता है एक कठोर यथार्थबोध।कोठे और बैठकी के ख़्याल और ग़ज़ल गायिकी में ही नहीं लुभावनी अदाकारियों वाली ठुमरियों और दादरे तक में वे अपनी आवाज़ से अपने दिल के इर्द-गिर्द जैसे एक किला बनाती हैं।उनकी गायिकी सुनने वाले के दिल मे खिंचती तो है लेकिन उनके दिल तक पहुँचने का रास्ता रोक देती है।
बेग़म अख़्तर के समकाल और उनके आगे तलक भी बैठकी की लुभावनी गायिकी इस तरह यथार्थबोध से टकराती नज़र नहीं आती।आज भी नहीं।
कलात्मक गंभीरता और पवित्रता किशोरी अमोनकर में है।एक साफ़ और गरिमामयी आवाज़!
विविधता के आधार पर दूसरे छोर पर मैं आबिदा परवीन को देखती हूँ!सूफ़ियाने फ़लसफ़े से दुनयावी भरम को तोड़ने की मुक्त आवाज़!
बेग़म अख़्तर की आवाज़ इन दोनों छोरों को अतिक्रमित करती है।जिस ज़मीन पर वे खड़ी थीं वहाँ वे सूफ़ियाना रस्ते से वे पलायन नहीं कर सकती थीं और जिस दुनिया मे वे जी रही थीं वह कला का क्षेत्र होकर भी प्रतिष्ठित नहीं माना जाता था इसलिए सम्भ्रांत पवित्रतावाद भी उनके इर्द-गिर्द नहीं टिकता था।
उन्होंने खड़ी बैठकी तक की भी प्रस्तुतियां दी।खड़ी बैठकी में नृत्य की भंगिमा के साथ सुनने वालों तक घूम घूम कर नाच के साथ गायन पेश किया जाता था।वे न ही सूफ़ी मुक्त हो सकती थीं न ही एलीट शुचितावादी!कठोर जीवन की ज़मीन पर रिश्तेदारों के बच्चियों और शिष्यों के परवरिश की ज़िम्मेदारी भी थी उन पर।इन्हीं स्थितियों के साथ वे ग़ज़ल के रंजक रूप और शास्त्रीयता शुचितावाद से मुक्त कर किसी और जगह ले जाती हैं।
अपनी माँ मुश्तरी बाई का रूपांतरित जीवन अख़्तरी बाई ने जिया।मां-बेटी में जाने कौन रिश्ता था कि मुश्तरी की मौत के बाद बेग़म अख़्तर दर्द और नशे के इंजेक्शन लेने लगीं।कहा जाता है कि उनके लिए बड़े बड़े आलीशान लोगों के प्रेम-प्रस्ताव आते रहे।वे जीवन को मज़े में देखतीं रहीं और हँसती रहीं , गाती रहीं क्योंकि जानती थीं कि यह प्रेम नहीं है।ये आलीशान लोग उन्हें अपनी कोठियों में एक नगीने की मानिंद सजावटी पत्थर की तरह सजाना चाहते हैं।उन्होंने किसी की दूसरी, तीसरी या चौथी बीवी बनना स्वीकार नहीं किया।बाद में किन्हीं विधुर वकील साहब से उन्होंने शादी की लेकिन अपनी स्वतंत्र तबीयत की वजह से परिवार में वह रह न पायीं।गायिकी की खोज ,दोस्ताने, महफिलें और शराब-सिगरेट की लत ने उन्हें सांसारिक स्थिरता न दी।परिवार में रहकर वे जान गईं कि स्वतंत्र-चेतना की क़ीमत देनी होती है।
कहीं कभी पढा था और यूट्यूब पर देखा है कि 13 साल की उम्र में बेग़म अख़्तर के साथ किसी राजा ने ज़बरदस्ती की।रेप अटेम्प्ट किया और उस छोटी उम्र में ही उन्हें उन्हें एक बेटी हुई लेकिन बहुत बाद तक बेग़म उस बच्ची को अपनी बहन बताती रहीं।आधिकारिक रूप से इस घटना की कोई पुष्टि नहीं मिलती।यतीन्द्र मिश्र द्वारा संपादित किताब 'अख़्तरी: सोज़ और साज़ का अफ़साना' में कुछ पुराने गुणीजनों के लेख हैं।वहां भी ऐसा कोई उल्लेख नही है।उनके जीवन पर आधारित दूरदर्शन के कार्यक्रमों और विविध भारती के आर्काइव्स में भी कोई उल्लेख नहीं है। कहना चाहती हूँ कि यदि यह घटना सत्य है तो यतीन्द्र मिश्र जी के संपादकीय या लेख में या कहीं तो इसका उल्लेख होना चाहिए और यदि यह घटना निर्मूल है तो यूट्यूब और ऐसे दूसरे माध्यमों पर एक आपत्ति नोट भेजी जानी चाहिए।यह यतीन्द्र जी को देखना चाहिए।
जीवन के अनुभवों से अख़्तरी का जीवन कठोर तरीके से बदल गया।रियाज़ी तो वे थीं लेकिन पारम्परिक- बनावटी रियाज़ उन्होंने कभी नहीं किया।
अर्से बाद किसी फ़नकार ने गायिकी की इतनी सच्ची और कसी हुई परिभाषा दी कि गायिकी के लिए रियाज़ से ज़्यादा ज़रूरी चीज़ 'तासीर' और 'सचाई'।बेग़म अख़्तर कहती हैं- 'इंसान ईमानदार हो तो उसके गाने में तासीर पैदा होती है।गाने पर असर ईमान से पड़ता है।सच बोलने, मेहनत करने, दिल पर बोझ न रखने और दिल मे सफ़ाई रखने से सुर सच्चे लगते हैं और आवाज़ खुलती है।'
अपने सुनने-समझने के आधार पर मेरा यह मानना है कि बेग़म अख़्तर ख़रज और 'गमक' तो लेती हैं लेकिन 'मीड़' उनकी गायिकी में बेहद कम है और यह मुझे मुग्ध करता है।छोटी-छोटी मीड़ लेती हैं।लम्बी मीड़ लगाना सब पर अच्छा नहीं लगता।उसमे बनावटी होने का ख़तरा रहता है।बेग़म की गायिकी में 'मीड़' उनके गले की ख़राश और ख़लिश है।
ग़ालिब की ज़बाँ में 'ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता'
इस ख़लिश को बरक़रार रखने के लिए दर्द को बेग़म ने लाइलाज किया।गाती हुई वे अद्भुत ढंग से स्वाभाविक होती हैं।दुनियायावी आत्मस्थ!
ग़ालिब को जितनी शिद्दत से बेग़म अख़्तर ने गाया वैसा शायद किसी ने नहीं गाया।
उनके गाए दादरों के बोल एक ओर लुभावने और दूसरी ओर विरही हैं।किसी और गले में ज़रा सी असावधानी से वे सस्ती-लोकप्रियता में तब्दील हो सकती थीं।बेग़म ने ग़ज़लों में ही नहीं.. ठुमरी-दादरे में विरह की पुकार में दर्प और मनोरंजक आस्वादन वाले आकर्षक बंदिशों में अपनी गायिकी के बल पर गंभीरता भरी है।ऐसी गम्भीरता जो एक ख़ास किस्म के कलावाद से अलग है।एक दादरा जिसे सैकड़ो बार सुना है!
'मोर बलमुआ परदेसिया मोर'
कई-कई बार सुना ..सिर्फ़ 'परदेसिया' और 'मोर' के बीच लगने वाले सुर के लिए।
सिर्फ़ इसी सुर पर शास्त्रीयता जैसे बिखर जाती है और ठेठ 'लोक' रूपाकार ले लेता है।
अख़्तरी बाई ने कला के लिए 'उस्तादी' मेहनत नहीं की इसलिए ऊपरी सुर लगाने में उनका गला टूटता था.. आवाज़ ख़राश देती थी लेकिन ऐसे शास्त्रीय दोषों की चिंता उन्होंने नहीं की।छोटी बहरें वे ख़ूब मन से गाती हैं।आज तो 'ख़राश' एक ग्लैमर बन चुका है।सोच-समझकर ख़राश बनाई जाती है लेकिन बेग़म के समय यह बड़ा दुर्गुण था।बाद में इसी ख़राश उन्हें मौलिकता दी।
'दीवाना बनाना है दीवाना बना दे' ग़ज़ल में गले की टूट और ख़राश सुनने बड़े बड़े गुणी आते थे और उनके मुरीद होते थे।
भावना में बहते हुए भरे मन को एक आंतरिक गाढ़ापन बेग़म को सुनकर मिल सकता है।इस रूप में ऐसी कठोर, निस्संग और निर्लिप्त गायिकी कम हुआ करती है।बेग़म अख़्तर की आवाज़ में कलावादी सम्मोहन नहीं है जो आपको बेवजह बहा ले जाए।भावना के साथ वह एक निस्संग सम्बल देती है इसलिए बेग़म को सुनते बहुत भावुक नहीं हुआ जा सकता।उनकी आवाज़ भीतर स्थिर करती है।तकलीफ़ देती हुई अपनी आवाज़ से जैसे धूप में खड़ा रखती हैं; फिर बाहर निकाल लाती है, आगे बढ़ा देती है!बहलाती और पुचकारती नहीं है !भटकाती नहीं है।इस अर्थ में एक स्तर पर बेग़म अख्तर की गायिकी वैचारिक गायिकी की ओर जाती है।
कठोर उत्तर भारतीय पितृसत्ता के शिकंजे में कोठी की गायिकी कला को इस दर्ज़े पर पहुँचाना उन्हें भारत के दुर्लभ उस्तादों की श्रेणी में खड़ा करता है।
-Vandana choubey
उनके क़रीबी रहे सलीम किदवई द्वारा खींची एक अच्छी तस्वीर!
Monday, 3 October 2022
आखिर शुद्रो के वो देवता कौन है ?
जब शूद्र जोहड़ का पानी पीते थे तब कोई देवता नहीं आया,
जब देवदासी के नाम पर शूद्र लड़कियाँ वैश्या बनायी गयी तब कोई देवता नहीं आया,
जब सेवा के नाम पर शूद्रों से मैला उठवाया गया तब कोई देवता नहीं आया,
जब पुण्य के नाम पर शूद्रों को शिक्षा और धन रखने से रोका गया तब कोई देवता नहीं आया,
जब धर्म के नाम पर तुम्हारे स्वस्थ बच्चों की बलि ली गयी तब कोई देवता नहीं आया,
जब कर्तव्य के नाम पर तुमसे बेगारी कराई गई तब कोई देवता नहीं आया,
तो दलितों तुम सब कौन से देवता की पूजा करते हो?🤔
सदियों से सोया हुआ तुम्हारा ये देवता कब जाग गया?
जिनकी परछाईं से भी मंदिर और देवता अपवित्र हो जाते थे उन शूद्रों को पूजा करने का अधिकार किस देवता ने दे दिया?
आखिर वो देवता कौन है ?
हम भी तो जानें,
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