Tuesday, 1 June 2021

बुर्जुवा राज्य और तीन कृषि बिल

बुर्जुवा राज्य और तीन कृषि बिल की सहायता से पब्लिक सेक्टर , छोटे किसानों और खुदरा व्यापारियों का बहुत तेजी से सम्पत्तिहरण आज अडानी और अम्बानी जैसे कॉर्पोरेट सेक्टर करने जा रहा है, यह छोटे किसानो और छोटी पूंजी के मालिकों के सर्वहाराकरण का मार्ग प्रसस्त करेगा। 

लेकिन इसका एक दूसरा क्रांतिकारी पहलू भी है। सिर्फ कृषि का उत्पादन ही नही, कृषि उपज का भंडारण और विपणन का चरित्र अधिकाधिक  सामाजिक होगा जो मुनाफे के निजी स्वरूप से और तीब्रता से टकराये गा और आर्थिक और राजनैतिक संकट को और गहरा बनाये गा। इसलिए  इसके बाद सम्पत्तिहरण की बारी इन अडानी अम्बानी जैसे कॉर्पोरेट सेक्टर का होगा और इसे पूरा करेगा सर्वहारा राज्य।


राजनीतिक यूटोपिया और किसान आंदोलन

22/12/2020

किसान आंदोलन का विरोध कुछ फर्जी कम्युनिष्टों द्वारा भी किया जा रहा है। उनका क्या कहना है? संक्षेप में उनके द्वारा किये जा रहे प्रोपेगंडा को नीचे दिया जा रहा है:

देखो गरीब किसान भाई लोग, आपके फसल के लिये हम न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी की मांग को एक  प्रतिक्रियावादी मांग मानते  है। इससे सिर्फ कुलक किसानों को ही फायदा है। आप लोग लोग बाजार में अनाज कितना बेचते ही हो! 

दूसरे, महंगाई बढ़ने का  कारण भी MSP है। बुर्जुवा के प्रतिष्ठित पत्रिका EPW में एक विद्वान लेखक ने एक अति गम्भीर लेख में इसे साबित किया कि MSP से महंगाई बढ़ती है।

इस लिये हम MSP का समर्थन नही कर सकते।   

लेकिन आप चिंता मत करो, आपके  बेटे के लिए  रोजगार गारंटी कानून और बेरोजगारी भत्ता गारंटी कानून लाने के लिये हम सरकार पर दबाव बना रहे है। आप सब हमारे पार्टी को सपोर्ट करो। आपको बहुत फायदा होगा। आपको खेतो में पसीना बहाने की भी जरूरत भी नही पड़ेगी। नौकरी तो सबको मिलेगी नही लेकिन बैठे-बिठाए आपको और आपके बेटे बेटियों को बेरोजगारी भत्ता मिले गा। MSP खत्म हो जाएगा तो महंगाई भी कम रहे गा। फिर आप थोड़े पैसे में ज्यादा अनाज खरीद पाओगे।  फिर आप ऐश करना। विदेशो में लोग ऐसे ही करते है।



      *Thousand Flowers Group*

किसान आंदोलन

किसान जब भी अपने कृषि उपज की कीमत बढाने सम्बन्धी मांग करेंगे, यह मांग पूंजीवाद के दायरे में एक पूंजीवादी जनवादी संघर्ष ही होगा, चाहे नेतृत्व धनी किसानों के हाथ मे हो या गरीब किसानों के हाथ मे। इसीलिये  'बड़े मियां तो बड़े मियां, छोटे मियां शुभां अल्ला' वाली कहावत पूरे किसान समुदाय पर चरितार्थ होती है।

किसानों की मुक्ति समाजवादी संघर्ष में ही हो सकती है, गलाघोंटू पूंजीवादी बाजार की प्रतियोगिता, अति-उत्पादन और कृषि उपज की कीमतों में बेसुमार उतार चढ़ाव से होने वाली बर्बादी से बचने का एक मात्र विकल्प पूंजी की सत्ता के खिलाफ सर्वहारा राज्य की स्थापना  ही हो सकता है। किसान यह बात जितनी जल्दी समझ जाएंगे, अपनी पूर्ण मुक्ति के लिये सही कदम उठा सकेंगे।

किसानों के समूचे फसल की उचित कीमत पर खरीद की गारंटी एक मात्र सर्वहारा राज्य ही कर सकता है, अडानी, अम्बानी खून चूसक कॉर्पोरेट के हाथों की कठपुतली सरकार तो कत्तई  गारंटी नही दे सकती।

किसानों के प्रतिरोध आंदोलन के दमन की वकालत ! फासीवाद के गोद में गिरने के बराबर है।

30/12/2020
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मोदी सरकार ने तीन कृषि बिल, बिजली कानून  में संशोधन और पराली जलाने पर किसानों पर भारी जुर्माना लगाने सम्बन्धी कानून पास किये गए है। क्या ये कृषि बिल/कानून  किसानो के विरोध में है जिसके चलते इसका व्यापक विरोध किसानों के द्वारा किया जा रहा है? किसान साथ मे एमएसपी सम्बंधित कानून बनाने की मांग भी कर रहे है। बुर्जुवा राज्य किसानों के आंदोलन/प्रतिरोध को ध्वस्त करने की हर मुमकिन कोशिश कर रहा है।

कुछ लोगो का कहना है कि यह धनी किसानों/कुलको का आंदोलन है। और उनके द्वारा यह व्यापक प्रचार भी किया जा रहा है।

इस लिये क्या धनी किसानों के प्रतिरोध आंदोलन को कुचल दिया जाना चाहिये? 

उनका कहना है कि समाजवादी क्रांति की मंजिल में लेनिन ने ऐसी ही शिक्षा दी थी। 1919 के नवंबर में लिखे लेनिन के लेख से वे उद्धरित करते है :
Our task in the rural districts is to destroy the landowner and smash the resistance of the exploiter and the kulak profiteer. For this purpose we can safely rely only on the semi-proletarians, the "poor peasants". But the middle peasant is not our enemy. He wavered, is wavering, and will continue to waver. The task of influencing the waverers is not identical with the task of overthrowing the exploiter and defeating the active enemy. The task at the present moment is to come to an agreement with the middle peasant—while not for a moment renouncing the struggle against the kulak and at the same time firmly relying solely on the poor peasant—for a turn in our direction on the part of the middle peasants is now inevitable owing to the causes enumerated above.

This applies also to the handicraftsman, the artisan, and the worker whose conditions are most petty-bourgeois or whose views are most petty-bourgeois, and to many office workers and army officers, and, in particular, to the intellectuals generally.

VI Lenin on
The Valuable Admissions Of Pitirim Sorokin
Written: 20 November, 1918
First Published: 21 November 1918, Pravda No. 252

सर्वहारा राज्य के दौरान कुलको के प्रतिरोध को दबाये जाने की बात समझ मे आती है, लेकिन बुर्जवा राज्य में  कुलको के प्रतिरोध के सन्दर्भ में यह उद्धरण कैसे महत्वपूर्ण है, ये बात तो समझ के बाहर है।

यह पोस्ट Amit Kumar के किसी आर्टिकल के संदर्भ में नही है। यह पोस्ट उन पर भी नही है जो वर्तमान में किसानों के प्रतिरोध आंदोलन पर राज्य सत्ता द्वारा किये जा रहे दमन का समर्थन नही करते, बल्कि विरोध करते है। यहॉं उन्हें कोई सफाई देने की भी जरूरत नही है। 

पोस्ट में आज के किसान आंदोलन और उसका समर्थन कर रहे कुछ वाम गुटों के संदर्भ में 1918 के नवंबर में  लेनिन के लिखे लेख के इस अंश की प्रासंगिकता के बारे में सवाल किया गया है :
Our task in the rural districts is to destroy the landowner and smash the resistance of the exploiter and the kulak profiteer. 

सर्वहारा राज्य के दौरान कुलको के प्रतिरोध को दबाये जाने की बात समझ मे आती है, लेकिन बुर्जवा राज्य में  वर्तमान में कुलको के प्रतिरोध के सन्दर्भ में यह उद्धरण कैसे महत्वपूर्ण है, ये बात तो समझ के बाहर है।

लेनिन का जो उद्धरण पेश किया गया है उसका मतलब एक ही है- धनी किसानों/कुलको के प्रतिरोध को ध्वस्त करने (to smash the resistance of the kulak profiteers) का टास्क। हमारा यह मत है कि यह उद्धरण अभी के किसान आंदोलन के संदर्भ में apply नही होता।

पूंजीवादी समाज मे सर्वहारा की पार्टी  धनी किसानों, कुलको के खिलाफ चलने वाले संघर्ष में खेतिहर मजदूरों और गरीब किसानों के साथ खड़ी होती है। लेकिन विशेष परिस्थिति में आज फासीवादी सरकार के द्वारा पास किये गए तीन कृषि बिल, पराली अध्यादेश और बिजली संसोधन नियम के खिलाफ और एमएसपी के लिये कानून की मांग के लिये चलने वाला किसानो के प्रतिरोध आंदोलन पर क्या रुख लिया जाय, यह डिबेट का विषय है। जाहिर है कि आज इस पर दो पक्ष है- एक पक्ष किसानों के प्रतिरोध आंदोलन का समर्थन कर रहा है , दूसरा पक्ष इसे धनी किसानों का आंदोलन कह रहा है। 

हमारा निश्चित मत है कि बहुसंख्यक सीमांत एवम गरीब किसानों की बदहाली एवम गरीबी से मुक्ति का एक मात्र रास्ता पूंजी के शासन के खिलाफ चलने वाले  संघर्ष, समाजवाद के लिये चलने वाले संघर्ष में ही है।

तीन कृषि बिल, नए बिजली कानून, पर्यावरण सम्बंधित अध्यादेश  के खिलाफ और कृषि उपज के लिये न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी के लिये कानून की मांग  के लिये किसानों का फासीवादी मोदी सरकार  के खिलाफ चलने वाला आंदोलन पूंजीवाद के दायरे के अंदर चलने वाला एक पूंजीवादी जनवादी संघर्ष है। और फासीवादी मोदी सरकार के खिलाफ चलने वाले इस किसान प्रतिरोध आंदोलन में हम किसान आंदोलन के साथ है।

Quotes on abuse

As there is deluge of abuses and 'pathos' on social media by social media "revolutionaries'', two important remarks by Lenin: 

"Not to reply to an argument of one's opponent on a question of principle, and to ascribe only 'pathos' to him, means not to argue but to turn to abuse."
 
Lenin, 
"Some Remarks of the 'Reply' by P. Maslov"

"Abuse in politics often covers up the utter lack of ideological content, the helplessness and the impotence, the annoying impotence of the abuser."

Lenin, On Political Significance of Abuse

From 'On the question of Stalin', Mao.


‘बच्चे और बहेलिए’(कवितांश)



वर्णमाला जिससे,
हम कोई शब्द बनाते हैं 
गढ़ते हैं कोई वाक्य 
जैसे 
'दुनिया के मज़दूरो  एक हो!'
वैसे ही जैसे 
हम एक-एक जन जोड़कर 
बनाते हैं कोई जुलूस।
वे एक-एक वर्ण को
निगल जाना चाहते हैं 
एक-एक साथी को 
निगल जाना चाहते हैं 
ताकि हम कोई वाक्य न बना सकें 
कोई जुलूस न बना सकें।

 { १९८२, 'लुटेरों का जश्न' कविता संग्रह से }

ओम प्रकाश रमण

याद रखो ऐ हुक्कामो ! कविता

१९५३ में स्टालिन की शव यात्रा पर उमड़ा सैलाब 

*On this day in 1953, a sea of humanity thronged the streets for Stalin's funeral procession.* Joseph Stalin, the Soviet Union's fea...