Sunday, 10 January 2021

नीरज

प्यार अगर न थामता उम्र भर, उंगली इस बीमार उमर की, हर पीड़ा वेश्या हो जाती हर आंसू बंजारा होता।।।

 प्यार अगर न होता जग में सारा जग बंजारा होता।। 

नीरज जी की इन कालजयी पंक्तियों में जीवन का दर्शन बीज रूप में छिपा है।

Saturday, 9 January 2021

कौन बनाता हिंदुस्तान! भारत के मज़दूर और गरीब किसान!!



'गाँव के गरीबों से ' लेख का एक महत्वपूर्ण अंश
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" अक्सर लोगों को यह कहते सुना जाता है कि जमींदार या व्यापारी लोगों को ' काम देते हैं ' या वे गरीबों को रोज़गार देते हैं। मिसाल के लिए कहा जाता है कि पडोसी कारख़ाना या पड़ोस का कोई फ़ार्म स्थानीय किसानों की 'परवरिश करता है '। लेकिन असल में मज़दूर अपनी मेहनत से ही अपनी परवरिश करते हैं और उन सबको खिलाते हैं , जो खुद काम नहीं करते । लेकिन जमींदार के खेत में , कारख़ाने या रेलवे में काम करने की इजाज़त पाने के लिए मज़दूर को, जो कुछ वह पैदा करता है , सबका सब मुफ़्त में मालिक को सुपुर्द कर देना पड़ता है और उसे केवल नाममात्र की मज़ूरी मिलती है। इस तरह न ज़मींदार और न व्यापारी मज़दूरों को काम देते हैं , बल्कि मज़दूर अपने श्रम के फल का अधिकतर हिस्सा मुफ़्त में देकर सबके भरण-पोषण का भार उठाते हैं ।
आगे चलिए। सभी आधुनिक देशों में जनता की गरीबी इसलिए पैदा होती है कि मज़दूरों के श्रम से जो तरह-तरह की चीजें पैदा की जाती हैं, वे सब बेचने के लिए , मंडी के लिए होती हैं। कारखानेदार और मिस्त्री-कारीगर , ज़मींदार और धनी किसान जो कुछ भी पैदा करवाते हैं , जो पशुपालन करवाते हैं या जिस अनाज की बोआई-कटाई करवाते हैं, वह सब मंडी में बेचने के लिए , बेचकर रुपया प्राप्त करने के लिए होता है। अब रुपया ही हर जगह राज करनेवाली ताक़त बन गया है। मनुष्य की मेहनत से जो भी माल पैदा होता है, सभी को रुपया से बदला जाता है। रुपए से आप जो भी चाहे खरीद सकते हैं । रुपया आदमी को भी खरीद सकता है, अर्थात जिस आदमी के पास कुछ नहीं है, रुपया उसे रूपएवाले आदमी के यहाँ काम करने को मज़बूर कर सकता है। पुराने समय में, भूदास-प्रथा के ज़माने में , भूमि की प्रधानता थी। जिसके पास भूमि थी, वह ताक़त और राज-काज , दोनों का मालिक था । अब रुपए की , पूंजी की प्रधानता हो गई है। रुपए से जितनी चाहो ज़मीन खरीदी जा सकती है। रुपया ना हो तो ज़मीन भी किसी काम की नहीं रहेगी, क्योंकि हल अथवा अन्य औज़ार , घोड़े-बैल खरीदने के लिए रुपयों की ज़रूरत पड़ती है ; कपडे-लत्ते और शहर के बने दूसरे आवश्यक सामान खरीदने के लिए ,यहाँ तक कि टैक्स ( लगान आदि-मेरे शब्द )देने के लिए भी रुपयों की ज़रूरत पड़ती है ।रुपया लेने के लिए लगभग सभी ज़मींदारों ने बैंक के पास ज़मीन रेहन रखी ।रुपया पाने के लिए सरकार धनी आदमियों से और सारी दुनिया के बैंक-मालिकों से क़र्ज़ लेती है और हर वर्ष इन कर्ज़ों पर करोड़ों रुपए सूद देती है ।   
रुपए के वास्ते आज सभी लोगों के बीच भयानक आपसी संघर्ष चल रहा है। हर आदमी कोशिश करता है कि सस्ता ख़रीदे और मंहगा बेचे ।हर आदमी होड़ में दूसरे से आगे निकल जाना चाहता है ।अपने सौदे को जितना हो सके ,उतना ज्यादा बेचना और लाभवाले बाजार या लाभवाले सौदे को दूसरे से छिपाकर रखना चाहता है ।रुपए के लिए सर्वत्र होनेवाली इस हाथापाई में छोटे लोग ,छोटे दस्तकार या छोटे किसान ही सबसे ज्यादा घाटा में रहते हैं : होड़ में वे बड़े व्यापारियों या धनी किसानों से सदा पीछे रह जाते हैं। छोटे आदमी के पास कभी कुछ बचा नहीं होता । वह आज की कमाई को आज ही खाकर जीता है। पहला ही संकट , पहली ही दुर्घटना उसे अपनी आखिरी चीज़ तक को गिरवी रखने के लिए या अपने पशु को मिट्टी के मोल बेच देने के लिए लाचार कर देती है। किसी कुलक या साहूकार के हाथ में एक बार पड़ जाने के बाद वह शायद ही अपने को उनके चंगुल से निकाल पाए। बहुधा उसका सत्यानाश हो जाता है। हर साल हज़ारों-लाखों छोटे किसान और दस्तकार अपने झोंपड़ों को छोड़कर , अपनी बाँट की ज़मीन को मुफ़्त में ग्राम-समुदाय के हाथ में सौंप कर ( उस समय रूस में ग्राम-समुदाय की व्यवस्था थी और छोटे किसानों पर इस समुदाय एवम् पदाधिकारियों का नियंत्रण था , छोटे किसान ज़मीन बेचने को पूर्णतः स्वतंत्र नहीं थे - मेरे शब्द ) उज़रती मज़दूर , खेत-बनिहार, बेहुनर मज़दूर ,सर्वहारा बन जाते हैं। लेकिन धन के लिए जो यह संघर्ष होता है, उसमे धनी का धन बढ़ता जाता है ।वे करोड़ों रूबल बैंक में जमा करते जाते हैं ।अपने धन के अलावा बैंक में दूसरे लोगों द्वारा जमा किए गए धन से भी वे मुनाफ़ा कमाते हैं। छोटा आदमी दसियों या सैकड़ों रूबल पर , जिन्हें वह बैंक या बचत बैंक में जमा करता है ,प्रति रूबल तीन या चार कोपेक् सालाना सूद पाएगा ।धनी आदमी इन दसियों रूबल से करोड़ों बनाएगा और करोड़ों से अपना लेन-देन बढ़ाएगा तथा एक-एक रूबल पर दस-बीस कोपेक कमाएगा।
इसीलिए सामाजिक-जनवादी(कम्युनिस्ट) मज़दूर कहते हैं कि जनता की गरीबी को दूर करने का एक ही रास्ता है- मौजूदा व्यवस्था को नीचे से ऊपर तक सारे देश में बदलकर उसके स्थान पर समाजवादी व्यवस्था कायम करना ।दूसरे शब्दों में बड़े जमींदारों से उनके फार्म , कारखानेदारों से उनकी मिलें और कारख़ाने और बैंकपतियों से उनकी पूंजी छीन ली जाएँ, उनकी निजी संपत्ति को ख़त्म कर दिया जाए और उसे देश भर की समस्त श्रमजीवी जनता के हाथों में सौंप दिया जाए ।ऐसा हो जाने पर धनी लोग , जो दूसरों के श्रम पर जीते हैं, मज़दूरों के श्रम का उपयोग नहीं कर पाएँगे , बल्कि उसका उपयोग स्वयं मज़दूर तथा उनके चुने हुए प्रतिनिधि करेंगे ।
ऐसा होने पर साझे श्रम की उपज तथा मशीनों और सभी सुधारों से प्राप्त होने वाला लाभ तमाम श्रमजीवियों , सभी मज़दूरों के हाथों में आएँगे ।धन और भी जल्दी बढ़ना शुरू होगा क्योंकि जब मज़दूर पूंजीपतियों के लिए नहीं बल्कि अपने लिए काम करेंगे, तो वे काम को और अच्छे ढंग से करेंगे ।काम के घंटे कम होंगे। मज़दूरों का खाना , कपड़ा और रहन-सहन बेहतर होगा।उनकी गुजर-बसर का ढंग बिलकुल बदल जाएगा।
लेकिन सारे देश के मौजूदा निज़ाम को बदल देना आसान काम नहीं है ।इसके लिए बहुत ज़्यादा काम करना होगा , दीर्घ काल तक दृढ़ता से संघर्ष करना होगा। तमाम धनी , सभी संपत्तिवान, सारे बुर्जुआ अपनी सारी ताक़त लगाकर अपनी धन-संपत्ति की रक्षा करेंगे ।सरकारी अफसर और फ़ौज सारे धनी वर्ग की रक्षा के लिए खड़ी होगी क्योंकि सरकार खुद धनी वर्ग के हाथ में है ।मज़दूरों को पराई मेहनत पर जीनेवालों से लड़ने के लिए आपस में मिलकर एक होना चाहिए ; उनको खुद एक होना चाहिए और सभी सम्पत्तिहीनों को एक ही मज़दूर वर्ग , एक ही सर्वहारा वर्ग के भीतर एकबद्ध करना चाहिए ।मज़दूर वर्ग के लिए यह लड़ाई कोई आसान काम नहीं होगी , लेकिन अंत में मज़दूरों की विजय होकर रहेगी , क्योंकि बुर्जुआ वर्ग-- वे लोग जो पराई मेहनत पर जीते हैं-- सारी जनता में अल्पसंख्या हैं , जबकि मज़दूर वर्ग गिनती में सबसे ज्यादा है। सम्पत्तिवानों के ख़िलाफ़ मज़दूरों के खड़े होने का अर्थ है , हज़ारों के ख़िलाफ़ करोड़ों का खड़ा होना ।"
 ( व्ला . इ . लेनिन -- ' गाँव के गरीबों से ' )

Friday, 8 January 2021

वर्तमान में मजदूर किसान एकता

तीनो कृषि कानून और चार श्रम सहिंताओं के माध्यम से श्रम कानूनों में बदलाव - सिर्फ और सिर्फ  कॉर्पोरेट हितों का पोषण करने वाले है, मजदुरो और किसानों के हितों के खिलाफ है; इस लिये मजदुरो और किसानों को एक प्लेटफॉर्म पर आकर अपने कॉमन दुश्मन कॉरपोरेट्स और उसकी चहेती मोदी सरकार के खिलाफ तीब्र संघर्ष छेड़ना ही होगा। अलग अलग नही, साथ मिल कर पूंजी की सत्ता के खिलाफ मजबूती से उठ खड़ा होना - उनके सामने सिर्फ और सिर्फ एक यही विकल्प है।

हालांकि एमएसपी सिर्फ 6 % किसानों को ही मिल पाता है, फिर भी इसका विरोध IMF और WTO जैसी साम्राज्यवादी संस्थाएं अपने जरखरीद बुद्धिजीवियों द्वारा लम्बे चौड़े रिपोर्ट के माध्यम से यह प्रचारित करवा रही है कि एमएसपी मजदुरो और गरीब किसानों के हित के खिलाफ है और महगंगाई बढ़ाने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। 

एक किसान भाई ने इस पर टिपण्णी की है कि एक लीटर पानी का बोतल और एक किलो गेहू आज बाजार में 20 रुपया में मिलता है। क्या यह माना जाए कि पानी का बोतल एमएसपी नही मिलने के कारण सस्ता है और एमएसपी मिलने के कारण गेहूं महँगा है। क्या इस तरह की घटिया सोच एवम विचारो का प्रचार प्रसार सिर्फ विचारात्मक गलती है, या कॉर्पोरेट और साम्राज्यवादी हितों की खुल्लमखुल्ला और बेशर्म दलाली है ?

Antonio Gramsci

" We are a fighting organization, and in our ranks we study to grow, to refine individuals' and whole organization's ability to fight, to better understand  the enemy's positions and ours, to better adapt our daily activities to them.Learning and culture are nothing other than theoretical conscience of our immediate and highest aims,and the way we can translate them into action."


Thursday, 7 January 2021

Essence of Trotskyism J V Stalin

What is the essence of Trotskyism?
J V  Stalin
The essence of Trotskyism is, first of all, denial of the possibility of completely building socialism in the USSR by the efforts of the working class and peasantry of our country. What does this mean? It means that if a victorious world revolution does not come to our aid in the near future, we shall have to surrender to the bourgeoisie and clear the way for a bourgeois-democratic republic. Consequently, we have here the bourgeois denial of the possibility of completely building socialism in our country, disguised by "revolutionary" phrases about the victory of the world revolution.
Is it possible, while holding such views, to rouse the labour enthusiasm of the vast masses of the working class, to rouse them for socialist emulation, for mass shock-brigade work, for a sweeping offensive against the capitalist elements? Obviously not. It would be foolish to think that our working class, which has made three revolutions, will display labour enthusiasm and engage in mass shock-brigade work in order to manure the soil for capitalism. Our working class is displaying labour enthusiasm not for the sake of capitalism, but in order to bury capitalism once and for all and to build socialism in the USSR Take from it its confidence in the possibility of building socialism, and you will completely destroy the basis for emulation, for labour enthusiasm, for shock-brigade work.
Hence the conclusion: in order to rouse labour enthusiasm and emulation among the working class and to organise a sweeping offensive, it was necessary, first of all, to bury the bourgeois theory of Trotskyism that it is impossible to build socialism in our country.
The essence of Trotskyism is, secondly, denial of the possibility of drawing the main mass of the peasantry into the work of socialist construction in the country-side. What does this mean? It means that the working class is incapable of leading the peasantry in the work of transferring the individual peasant farms to collectivist lines, that if the victory of the world revolution does not come to the aid of the working class in the near future, the peasantry will restore the old bourgeois order. Consequently, we have here the bourgeois denial of the capacity or possibility of the proletarian dictatorship to lead the peasantry to socialism, disguised by a mask of "revolutionary" phrases about the victory of the world revolution.
Is it possible, while holding such views, to rouse the peasant masses for the collective-farm movement, to organise a mass collective-farm movement, to organise the elimination of the kulaks as a class? Obviously not.
Hence the conclusion: in order to organise a mass collective-farm movement of the peasantry and to eliminate the kulaks, it was necessary, first of all, to bury the bourgeois theory of Trotskyism that it is impossible to bring the labouring masses of the peasantry to socialism.
The essence of Trotskyism is, lastly, denial of the necessity for iron discipline in the Party, recognition of freedom for factional groupings in the Party, recognition of the need to form a Trotskyist party. According to Trotskyism, the CPSU(B) must be not a single, united militant party, but a collection of groups and factions, each with its own centre, its own discipline, its own press, and so forth. What does this mean? It means proclaiming freedom for political factions in the Party. It means that freedom for political groupings in the Party must be followed by freedom for political parties in the country, i.e., bourgeois democracy. Consequently, we have here recognition of freedom for factional groupings in the Party right up to permitting political parties in the land of the dictatorship of the proletariat, disguised by phrases about "inner-party democracy,', about "improving the regime" in the Party. That freedom for factional squabbling of groups of intellectuals is not inner-party democracy, that the widely-developed self-criticism conducted by the Party and the colossal activity of the mass of the Party membership is real and genuine inner-party democracy—Trotskyism cannot understand.

Wednesday, 6 January 2021

रेड मेडिसिन

लैंगिक समानता का धरातल पर क्या अर्थ होता है और यह किस प्रकार प्राप्त की जा सकती है? सर आर्थर न्यूजहोम व डॉ जॉन एडम किंग्सबरी ये दोनों अमेरिका और ब्रिटेन के डॉक्टर थे जिन्होंने स्तालिन काल में सोवियत संघ की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था का आंखों देखा ब्यौरा अपनी किताब "रेड मेडिसिन" में लिखा था। 
इसी किताब से एक अंश पढिये। और जानिए कि समाजवाद क्या प्रदान करता है।

"......जहाँ कहीं भी हम गए, हमने इस सामान्य तथ्य की झलकियां देखी कि सोवियत रूस में लैंगिक भेदभाव देखने को नहीं मिलता। ट्रामों में स्त्री कंडक्टर थीं, जंक्शनों पर स्विचिंग का काम तो अक्सर महिलाएं ही करती दिखती थीं। बहुत सी महिलाएं उन कामों में लगी हुई थीं जिनको सामान्यतः मर्दों का काम समझा जाता है, उदाहरणतया, नौकायन और भूमिगत खदानों में काम करना। हम पुरुष डॉक्टरों से ज्यादा महिला डॉक्टरों से मिले। यह तो हम सबको पता ही है कि रूसी महिला सैनिकों ने महान युद्ध के समय अपने अलग पहचान बनाई थी। 
स्थानीय प्राधिकरण की एक मीटिंग में हमने पब्लिक हेल्थ डिपार्टमेंट की प्रमुख अधिकारी और प्रवक्ता के तौर पर महिलाओं को पाया। पुरुषों की तरह औरतें भी उम्र के अठारह साल पूरे होते ही नागरिक का दर्जा पा जाती हैं। औद्योगिक नियमों के अनुसार समान काम के लिए समान वेतन मिलता है, बीमारी बीमा लाभ के लिए महिला और पुरुष में कोई भेदभाव नहीं किया जाता, यद्यपि महिलाओं को मातृत्व के लिए अतिरिक्त लाभ मिलते हैं। महिलाओं ने अपनी पहलकदमी पर सामुदायिक लांड्री, सामुदायिक भोज केंद्र, सामुदायिक नर्सरी जैसे संस्थान खड़े किए हैं, जो उन्हें घर संभालने की जिम्मेदारी से मुक्त करके राजनीतिक और औद्योगिक गतिविधियों में भाग लेने में सहायता करते हैं। महिलाओं की यह राजनीतिक गतिविधि नई नहीं है, महिलाओं ने "नाइलीस्ट" व अन्य क्रांतिकारी गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिकाएं अदा की हैं। इसके अलावा रूस की महिलाएं हमेशा से आदमियों के साथ कठिन श्रम के कामों में लगी रही हैं, लेकिन क्रांति से पहले उनकी जिंदगी का नियंत्रण पूरी तरह से पुरुषों के हाथ में था। अब रूस की महिला पूर्ण रूप से मुक्त हो चुकी है। अब वे पूर्ण राजनीतिक और आर्थिक समानता का आनंद लेती हैं।
लैंगिक भेदभाव तो सोवियत सरकार के सबसे पहले कामों के साथ ही साफ कर दिए गए थे, उद्योगों में मौजूद कुछेक सुरक्षा नियमों को छोड़कर। वैवाहिक सम्बन्धों में पूर्ण समानता लागू है। कोई भी साथी अपनी मर्जी से विवाह को खत्म कर सकता है।
अब पति अपनी पत्नी से अधिक परिवार का भरण पोषणकर्ता नहीं है। विशेष परिस्थितियों को छोड़कर प्रत्येक योग्य पत्नी से अपेक्षा की जाती है कि वह अपनी आजीविका खुद कमाए।...."

Tuesday, 5 January 2021

किसानों के लिये क्रांति और समाजवाद की जरूरत


बहुसंख्यक किसानों के लिये पूंजीवाद फांसी का फंदा साबित हो रहा है, उनकी बदहाली और गरीबी तबतक खत्म नही हो सकती जबतक पूंजी की सत्ता का बोलबाला है। कंपनी राज नही, कंपनी मुक्त राज्य, समाजवादी राज्य ही एक बेहतर आर्थिक परिस्थिति किसानों को दे सकता है जिसमे कृषि उपज की वाजिब कीमत और कॉर्पोरेट लूट से मुक्ति किसानों को मिल पायेगी।

प्रश्न है, समाजवाद में खेती निजी रहेगी या सामूहिक?

डरने की जरूरत नही है, खेती निजी रहे या सामूहिक बहुसंख्यक के हित में ही होगा और यह उस समय की परिस्थिति पर निर्भर करे गा। अभी हम लोग भारत मे निजी खेती की दुर्दशा देख रहे है, सामूहिक खेती का मॉडल हमने चीन में देखा था और सामाजिक खेती का मॉडल रूस में देखा था। भारत मे खेती का कौन सा रूप शुरू में होगा, यह कहना मुश्किल है। लेकिन कॉर्पोरेट सम्पति पर सामाजिक अधिकार होगा। कॉर्पोरेट सम्पति पर सामाजिक अधिकार की स्थापना समाजवाद की दिशा में पहला और निर्णायक कदम हो सकता है।

१९५३ में स्टालिन की शव यात्रा पर उमड़ा सैलाब 

*On this day in 1953, a sea of humanity thronged the streets for Stalin's funeral procession.* Joseph Stalin, the Soviet Union's fea...