Wednesday, 5 August 2020

विश्व सर्वहारा के महान शिक्षक , नेता और वैज्ञानिक समाजवाद के प्रवर्तकों में एक, फ्रेडरिक एंगेल्स के व्यक्तित्व के चंद पहलू :

विश्व सर्वहारा के महान शिक्षक , नेता और वैज्ञानिक समाजवाद के प्रवर्तकों में एक, फ्रेडरिक एंगेल्स के व्यक्तित्व के चंद पहलू :
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इतिहास और दर्शन शास्त्र के ज्ञान के अतिरिक्त उन्होंने प्राकृतिक विज्ञानों , सैन्य विज्ञानं और तुलनात्मक भाषाशास्त्र का खोजपूर्ण अध्ययन किया था । मार्क्स की तरह ही वे एक अच्छे भाषाविद् थे ।वह दस भाषाएँ जानते थे और सत्तर वर्ष की आयु में उन्होंने नार्वे की भाषा सीखी ताकि इब्सन की कृतियों का मूल पाठ पढ़ सकें ।उनके व्यक्तित्व और रूप-रंग का वर्णन , लेसनर ने--जो उन्हें अच्छी तरह जानते थे -- इस प्रकार किया है :
" एंगेल्स लंबे और छरहरे बदन के थे । उनकी चाल तेज़ और फुर्तीली थी ।उनके वक्तव्य संक्षिप्त और सटीक हुआ करते थे और उनका आचरण सीधा और सैनिक प्रभाव लिए हुए था । वह अत्यंत वाक्-पटु और हँसमुख प्रकृति के थे ।जो भी उनके संपर्क में आया उसने तुरत महसूस किया कि वह एक असाधारण प्रतिभा वाले व्यक्ति के साथ बात कर रहा है । "
जीवन-पर्यन्त मार्क्स के साथ उनके सम्बन्ध अत्यंत स्नेहपूर्ण और अंतरंग रहे ।..... अपनी चालीस वर्षों की मित्रता  के दौरान , तथा उन सफलताओं और निराशाओं के दौरान , जिनसे वे अनेक बार गुजरे , अनबन की छाया तक उनके बीच नहीं आई । एक मौके को छोड़कर , जो ग़लतफ़हमी का परिणाम था , उनकी मित्रता कभी ढ़ीली नहीं पड़ी ।
1845 में जब मार्क्स को पेरिस से निष्कासित कर दिया जाता है , तो एंगेल्स मार्क्स को लिखते हैं - " मैं नहीं जानता कि यह ( चंदा में जमा की गई रकम ) तुम्हारे ब्रसेल्स में टिकने के लिए पर्याप्त होगी या नहीं ।यह कहने की ज़रूरत नहीं कि अपनी पहली अंग्रेजी कृति ( इंग्लैण्ड में श्रमिक वर्गों की दशा ) से मुझे आंशिक रूप में कुछ मानदेय मिलने की आशा है ।वह राशि अत्यंत प्रसन्नता के साथ तुम्हारे अधिकार में दे दी जाएगी । कमीने लोग कम से कम अपनी दुष्टता द्वारा तुमपर आर्थिक तंगहाली लादने का आनंद तो नहीं उठा पाएंगे ।"
मार्क्स के साथ उनकी मित्रता बेमिसाल थी ।वह सदा मार्क्स की हर तरह से सहायता करने को तैयार रहते थे । 1981 में  मार्क्स की पत्नी जेनी और उनकी पुत्री बीमार पड़ीं ।मार्क्स अपनी पत्नी के साथ जब पेरिस गए ( उनकी पत्नी की अपनी पुत्रियों से यह आखिरी मुलाक़ात थी । , तो एंगेल्स ने उन्हें लिखा कि वह बताएँ कि उन्हें किस चीज़ की आवश्यकता है । जितनी भी रकम की ज़रूरत हो , बताने में वह तनिक भी न हिचकें । 29 जुलाई 1881 को एंगेल्स ने लिखा - " तुम्हारी पत्नी को किसी भी चीज़ से बंचित नहीं रखा जाना चाहिए । वह जो कुछ भी चाहतीं हैं और जो कुछ तुम समझो कि उन्हें आनंद दे सकता है , उन्हें ज़रूर मिलना चाहिए । "
एंगेल्स सदा बहुत विनम्र रहते थे । वे अपने सत्तरवें जन्मदिवस पर बधाइयों के सम्बन्ध में लिखते हैं - " काश ! यह सबकुछ खत्म हो जाता । मैं जन्मदिन मनाने की मनोदशा में तनिक भी नहीं हूँ ... और तमाम बातों के बावजूद , मैं तो केवल मार्क्स की प्रसिद्धि का लाभ उठा रहा हूँ ।"
एंगेल्स के व्यक्तित्व के बारे में चार्टिस्ट नेताओं में से एक और चार्टिस्ट पत्र ' नॉर्दर्न स्टार ' के संपादक जूलियन हार्ने लेसनर के शब्द :
" मैं उनसे परिचित रहा हूँ ।वह मेरे मित्र थे और कई वर्षों तक यदाकदा मुझे पत्र लिखते रहे । 1843 में वह ब्रैडफोर्ड से लीड्स आए और नॉर्दर्न स्टार कार्यालय में मेरे सम्बन्ध में पूछताछ की.....। मैंने प्रायः बालसुलभ चेहरेवाले एक लंबे और भव्य युवक को अपने सामने खड़ा पाया । जर्मनी में शिक्षा के बावजूद उस समय उनकी अंग्रेजी प्रायः त्रुटिहीन थी ।एंगेल्स ने मुझे बताया कि नॉर्दर्न स्टार के वह नियमित पाठक हैं और अत्यंत दिलचस्पी के साथ चार्टिस्ट आंदोलन को देख रहे हैं ।इस तरह 32 वर्ष पहले हमारी मित्रता शुरू हुई । अपने सारे काम और कठिनाइयों के बावजूद , एंगेल्स ने अपने मित्रों को याद रखने , उनको सलाह - और आवश्यकता पड़ने पर सहायता - देने के लिए सदा समय निकाला । उनके अथाह ज्ञान और प्रभाव ने उन्हें कभी घमंडी नहीं बनने दिया । इसके विपरीत , 55 वर्ष के बाद भी वह उतने ही विनम्र और दूसरे के काम के श्रेय को स्वीकार करने में उतने ही तत्पर थे , जितने 22 वर्ष की उम्र में ।वह बेहद मेहमाननवाज़ और चुटकी लेने वाले थे ।उनका मज़ाक संक्रामक रोग की तरह किसी को अछूता नहीं छोड़ता था । वे आतिथ्य सत्कार की आत्मा थे ।अपने अतिथियों को प्रसन्न रखने के लिए - जिसमे उस समय अधिकतर ओवेनवादी , चार्टिस्ट , श्रमिक संघ वाले और सोसलिस्ट थे - वह सदा तत्पर रहते थे ।"
1893 में उन्होंने जर्मनी , स्विट्ज़रलैंड और ऑस्ट्रिया की यात्रा की ।ऐसे आंदोलन के , जो प्रतिदिन शक्तिशाली होता जा रहा था , संस्थापक , नेता और पथ-प्रदर्शक होने के नाते उनका हार्दिक और ज़ोरदार स्वागत होना स्वाभाविक था । इसके बारे में 7 अक्टूबर 1893 को एक पत्र में उन्होंने जो कुछ लिखा उसकी विनम्रता द्रष्टव्य है । वह लिखते हैं - " सचमुच यह लोगों की सहृदयता का सुफल था , परंतु यह मेरे अनुरूप नहीं है । मैं प्रसन्न हूँ कि यह समाप्त हो गया है ।अगली बार मैं लिखित वादा करा लूंगा कि मुझे जनता के सामने परेड कराने की आवश्यकता नहीं ।......... मैं जहां कहीं भी गया , अपने स्वागत की तैयारी के पैमाने को देखकर चकित रह गया और अबतक चकित हूँ ।इस तरह का इंतज़ाम तो संसद सदस्यों के लिए छोड़ देना चाहिए --- किन्तु मेरे लिए यह उपयुक्त नहीं ।"
तो कुछ ऐसे थे विश्व सर्वहारा के महान शिक्षक और प्रिय नेता - फ्रेडरिक एंगेल्स !

( सारे अंश ,जेल्डा के. कोट्स की पुस्तक ' फ्रेडरिक एंगेल्स : जीवन और कृतित्व ' से )

                                -- आदित्य कमल के वाल से ।

Tuesday, 4 August 2020

कार्ल मार्क्स एवं फ्रेडरिक एंगेल्स " कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र " दिसम्बर 1847 से जनवरी 1848 में लिखित

हम निजी सम्पत्ति को खत्म कर देना चाहते हैं , इसे सुनकर आपके रोंगटे खड़े हो जाते हैं। लेकिन आपके मौजूदा समाज में दस में से नौ आदमियों के लिए निजी सम्पत्ति अभी से ही खत्म हो चुकी है ; चन्द लोगों के पास यदि निजी सम्पत्ति है तो उसका एकमात्र कारण यही है कि दस में नौ आदमियों के पास वह नहीं है। इसलिए ,आप हमारे खिलाफ सम्पत्ति की ऐसी व्यवस्था को खत्म कर देने की इच्छा रखने का जुर्म लगाते हैं जिसके अस्तित्व के लिए जरूरी यह है कि समाज के अधिकांश भाग के पास कोई सम्पत्ति न हो ।
       संक्षेप में आपका आरोप यह है कि हम आपकी सम्पत्ति खतम कर देना चाहते हैं। तो यह बिल्कुल ठीक है। हम ठीक यही चीज करना चाहते हैं।
      --  कार्ल मार्क्स एवं फ्रेडरिक एंगेल्स
         " कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र " दिसम्बर 1847 से जनवरी 1848 में लिखित

Monday, 3 August 2020

Marxist Leninist Library

फ्रेडरिक एंगेल्स , " फ्रांस में वर्ग संघर्ष " के 1895 के संस्करण की भूमिका , लंदन , 6 मार्च,1895

विश्व इतिहास का व्यंग्य ऐसा है कि सब कुछ उलट-पुलट जाता है। हम लोग "क्रांतिकारी" लोग, "उखाड़ फेंकने वाले" लोग - गैरकानूनी तरीकों , उखाड़ फेंकने वाले तरीकों के मुकाबले कानूनी तरीकों से कहीं ज्यादा मजबूत हो रहे हैं । अमन की पार्टियां , जैसा कि वे अपने को कहती हैं , अपने ही द्वारा स्थापित कानूनी परिस्थितियों में घुट मर रही हैं । ओदिलां बारो की आवाज में वे निराशा से चीत्कार करती हैं : -- कानूनियत हमारी मौत है ; जबकि इसी कानूनियत के तहत हमारे पुट्ठे मजबूत होते हैं , हमारे गाल सुर्ख होते हैं और हम अजर , अमर जीवन के मूर्तिमान प्रतीक दिखाई देते हैं। और अगर हम इतने पागल नहीं हैं कि उन्हें ख़ुश करने के लिए , सड़कों पर लड़ने के लिए प्रवृत्त किये जा सकें , तो फिर उनके लिए अंत में एक यही चारा रह जाता है कि खुद ही इस सांघातिक कानूनियत के बंधन को तोड़ अपने को मुक्त करें ।
     इस बीच वे सत्ता उखाड़ फेंकने के खिलाफ नए - नए कानून बना रहे हैं। फिर हर चीज उलट-पुलट जाती है । आज के ये उखाड़ फेंकने के कट्टर विरोधी लोग क्या स्वयं कल के उखाड़ फेंकने वाले नहीं हैं ?   1866 के गृहयुद्ध को क्या हमने भड़काया ? हनोवर के राजा , हेसन के राजा और नस्साऊ के ड्यूक को क्या हमने उनकी पुश्तैनी ,     कानूनी मिल्कियत , उनकी रियासतों से निकालकर इन रियासतों को बलात संयोजित कर लिया ? जर्मन महासंघ तथा तीन-तीन शाही सल्तनतों के ये उखाड़ फेंकने वाले अब उखाड़ फेंकने की शिकायत करते हैं ! ग्राक्ख राजद्रोह की शिकायत करें , यह कौन बर्दाश्त करेगा ? बिस्मार्क की पूजा करने वाले उखाड़ फेंकने की निंदा करें , यह कौन सहन कर सकता है ?                                          फिर भी उन्हें अपने उखाड़ फेंकने विरोधी विधेयक पेश करने दीजिए , उन्हें और भी सख्त बनाने दीजिए , पूरे फौजदारी कानून को रबड़ की तरह खींचने - मरोड़ने दीजिए , इससे उन्हें अपनी बेबसी के सबूत के सिवा और कुछ नहीं हासिल हो सकता । अगर वह सामाजिक-जनवाद पर करारी चोट करना चाहते हैं , तो उन्हें इनके अलावा दूसरी ही तरह की कार्रवाइयां करनी होंगी । इस समय जो सामाजिक-जनवादी उखाड़ फेंकना , कानून का पालन करते हुए बखूबी चल रहा है उससे वे अमन की पार्टियों के उखाड़ फेंकने द्वारा , जो कानून को तोड़े बिना नहीं चल सकता , ही निबट सकते हैं । प्रशियाई नौकरशाह श्री रोस्सलर और प्रशियाई जनरल श्री फॉन बोगुस्लाव्स्की ने , उन्हें जो तरीका सुझाया है , वही एक तरीका है जिससे  मजदूरों को , जो सड़कों पर निकल कर लड़ने से साफ इनकार करते हैं , काबू में लाना  शायद अब भी संभव हो सकता है । यह तरीका है : संविधान का उल्लंघन , अधिनायकत्व ,  निरंकुश शासन की पुनर्स्थापना , 'बादशाह की मर्जी ही सबसे बड़ा कानून है '! इसलिए महानुभावो , हिम्मत से काम लीजिए , यहां अधकचरेपन से काम नहीं चलेगा , यहां जो करना है वह मुकम्मल ढंग से करना पड़ेगा ! लेकिन यह न भूलिएगा  कि सभी लघु राज्यों की तरह और सामान्यतः सभी आधुनिक राज्यों की तरह जर्मन साम्राज्य भी एक संविदा का फल है : पहले तो राजाओं की एक दूसरे के साथ संविदा का और दूसरे राजाओं की जनता के साथ संविदा का फल । यदि इस संविदा को एक पक्ष तोड़ता है तो पूरी संविदा छिन्न-भिन्न हो जाती है; तब जैसा कि बिस्मार्क ने 1866 में इतने खूबसूरत ढंग से हमें दिखाया , दूसरा पक्ष भी उससे बंधा नहीं रह सकता । इसलिए यदि आप जर्मन राज्य के संविधान को तोड़ते हैं , तो सामाजिक-जनवाद आपकी निस्बत जो भी चाहे करने को आजाद होगा और करेगा ‌। लेकिन तब वह क्या करेगा इसके बारे में वह आज आपके सामने बोल पड़ने वाला नहीं है।
-- फ्रेडरिक एंगेल्स ,  " फ्रांस में वर्ग संघर्ष " के 1895 के संस्करण की भूमिका ,          लंदन , 6 मार्च,1895

फ्रेडरिक एंगेल्स , " लुडविग फायरबाख और क्लासकीय जर्मन दर्शन का अंत "

परंतु एक बात में समाज के विकास का इतिहास प्रकृति के विकास के इतिहास से मूलभूत रूप में भिन्न सिद्ध होता है। प्रकृति में - जहां तक हम प्रकृति पर मनुष्य की प्रतिक्रिया की उपेक्षा करते हैं - हमें केवल अंधी , अचेतन , एक दूसरे पर प्रभाव डालती हुई शक्तियां मिलती हैं , जिनकी परस्पर क्रिया के द्वारा सामान्य नियम परिचालित होते हैं। वहां जितने घटना-व्यापार होते हैं - चाहे वे सतह पर दिखाई देने वाली अनगिनत प्रगटत: आकस्मिक घटनाएं हों या वे अंतिम परिणामों में हों , जो इन आकस्मिक घटनाओं में अंतर्निहित नियमबद्धता की पुष्टि करते हैं - उनमें कोई भी चेतन रूप से इच्छित लक्ष्य की पूर्त्ति के रूप में नहीं होता है। इसके विपरीत, समाज के इतिहास में कार्य करने वाले लोग चेतना संपन्न होते हैं ; वे सोच-विचार या आवेग से काम करते हैं , उनके कार्य का एक विशेष लक्ष्य होता है ; कोई भी चीज बगैर सचेतन ध्येय के , बगैर किसी उद्दिष्ट अभिप्राय के नहीं होती । लेकिन यह भेद , ऐतिहासिक छानबीन के लिए - विशेषकर अमुक विशेष युगों तथा घटनाओं की छानबीन के लिए - महत्त्वपूर्ण होते हुए भी इस तथ्य को नहीं बदल सकता कि इतिहास का क्रम आंतरिक सामान्य नियमों के अधीनस्थ है। वास्तव में यहां भी सभी व्यक्तियों के चेतन रूप से इच्छित लक्ष्यों के बावजूद , प्रगटत: सतह पर आकस्मिकता का ही राज दिखाई देता है । जिसकी इच्छा की जाती है वह बिरले ही कभी होता है ; अधिकांशतः अनगिनत इच्छित ध्येय आपस में टकराते हैं और एक दूसरे के मार्ग में बाधक होते हैं ; या ये लक्ष्य स्वयं ऐसे होते हैं , जो आरंभ से ही असाध्य होते हैं अथवा उनकी पूर्त्ति के साधन ही अपर्याप्त होते हैं । इस तरह इतिहास के क्षेत्र में अनगिनत व्यक्तिगत इच्छाओं और व्यक्तिगत क्रियाओं के टकराव द्वारा एक ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है , जो जड़ प्रकृति के क्षेत्र में प्रचलित स्थिति के बिल्कुल समान होती है। कार्यों के लक्ष्य उद्दिष्ट होते हैं , पर इन कार्यों द्वारा वास्तव में जो नतीजे निकलते हैं , वे उद्दिष्ट नहीं होते , अथवा जब वे उद्दिष्ट लक्ष्य के अनुरूप ज्ञात भी होते हैं , तो उनके अंतिम फल अंतत: उद्दिष्ट से बिल्कुल भिन्न होते हैं । ऐतिहासिक घटनाएं भी , इस प्रकार , समग्रत: संयोग के अधीन ज्ञात होती हैं । पर जहां बाहर से सतह पर आकस्मिकता का बोलबाला दिखाई देता है , वहां वस्तुत: सदैव आंतरिक , अप्रगट नियमों का शासन चलता है । सवाल केवल इन नियमों का पता लगाने का है ।
 मनुष्य इस माने में अपना इतिहास स्वयं बनाते हैं (चाहे उसका परिणाम कुछ भी हो) कि प्रत्येक व्यक्ति अपने सचेत , इच्छित लक्ष्य का अनुसरण करता है । और भिन्न दिशाओं में क्रियाशील इन अनेक इच्छाओं तथा बाह्य जगत पर उनके बहुविध प्रभावों का परिणाम ही इतिहास है । अतः सवाल इस बात का है कि ये बहुत-से व्यक्ति चाहते क्या हैं ? इच्छा आवेग या सोच विचार द्वारा निर्धारित होती है। पर आवेग या सोच-विचार निर्धारित करने वाले उत्तोलक बिल्कुल भिन्न प्रकार के होते हैं। अंशत: ये बाह्य पदार्थ हो सकते हैं और अंशत: भावमूलक प्रेरक - महत्त्वाकांक्षा ,     " सत्य और न्याय का आग्रह " , व्यक्तिगत घृणा अथवा महज किसी किस्म की व्यक्तिगत सनक । पर एक ओर हम देख चुके हैं कि इतिहास में क्रियाशील अनेक व्यक्तिगत इच्छाएं अधिकांशतः वांछित से बिल्कुल भिन्न प्राय: उलटे ही परिणाम उपस्थित करती हैं ; अतः,अंतिम परिणाम के सम्बन्ध में उनका प्रेरक हेतु भी गौण महत्त्व का होता है। 
  दूसरी ओर यह प्रश्न उठ खड़ा होता है : इन प्रेरणाओं के पीछे कौन सी उत्प्रेरक शक्तियां खड़ी हैं ? वे ऐतिहासिक कारण क्या हैं जो कार्यरत लोगों के मस्तिष्क में इन प्रेरणाओं        का रूप धारण कर लेते हैं ? 
-- फ्रेडरिक एंगेल्स  ,  " लुडविग फायरबाख और क्लासकीय जर्मन दर्शन का अंत "

प्रेमचंद (31 जुलाई 1880 – 8 अक्टूबर 1936)




प्रेमचंद (31 जुलाई 1880 – 8 अक्टूबर 1936) हिन्दी और उर्दू के सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यासकार, कहानीकार एवं विचारक थे। उनके जन्मदिन के अवसर पर प्रस्तुत है उनकी रचनाओं से चुने हुए उद्धरण: 


सम्पत्ति विष की गाँठ


जब तक सम्पत्ति मानव-समाज के संगठन का आधार है, संसार में अन्तरराष्ट्रीयता का प्रादुर्भाव नहीं हो सकता। राष्ट्रों-राष्ट्रों की, भाई-भाई की, स्त्री-पुरुष की लड़ाई का कारण यही सम्पत्ति है। संसार में जितना अन्याय और अनाचार है, जितना द्वेष और मालिन्य है, जितनी मूर्खता और अज्ञानता है, उसका मूल रहस्य यही विष की गाँठ है। जब तक सम्पत्ति पर व्यक्तिगत अधिकार रहेगा, तब तक मानव-समाज का उद्धार नहीं हो सकता। मज़दूरों के काम का समय घटाइये, बेकारों को गुज़ारा दीजिये, ज़मींदारों और पूँजीपतियों के अधिकारों को घटाइये, मज़दूरों-किसानों के स्वत्वों को बढ़ाइये, सिक्के का मूल्य घटाइये, इस तरह के चाहे जितने सुधार आप करें, लेकिन यह जीर्ण दीवार इस तरह के टीपटाप से नहीं खड़ी रह सकती। इसे नये सिरे से गिराकर उठाना होगा।—


— संसार आदिकाल से लक्ष्मी की पूजा करता चला आता है।— लेकिन संसार का जितना अकल्याण लक्ष्मी ने किया है, उतना शैतान ने नहीं किया। यह देवी नहीं डायन है।


-- सम्पत्ति ने मनुष्य को क्रीतदास बना लिया है। उसकी सारी मानसिक आत्मिक और दैहिक शक्ति केवल सम्पत्ति के संचय में बीत जाती है। मरते दम तक भी हमें यही हसरत रहती है कि हाय, इस सम्पत्ति का क्या हाल होगा। हम सम्पत्ति के लिए जीते हैं, उसी के लिए मरते हैं। हम विद्वान बनते हैं सम्पत्ति के लिए, गेरुए वस्त्र धारण करते हैं सम्पत्ति के लिए। घी में आलू मिलाकर हम क्यों बेचते हैं? दूध में पानी क्यों मिलाते हैं? भाँति-भाँति के वैज्ञानिक हिंसा-यन्त्र क्यों बनाते हैं? वेश्याएँ क्यों बनती हैं, और डाके क्यों पड़ते हैं? इसका एकमात्र कारण सम्पत्ति है। जब तक सम्पत्तिहीन समाज का संगठन नहीं होगा, जब तक सम्पत्ति व्यक्तिवाद का अन्त न होगा, संसार को शान्ति न मिलेगी।

✍🏻:- मुंशी प्रेमचंद ('राष्ट्रीयता और अन्तरराष्ट्रीयता' लेख से)


महाजनी सभ्यता

आग लगाकर चाहें कि लपटें न उठें, असम्भव। पैसा अपने साथ ये सारी बुराइयाँ लाता है, जिन्होंने दुनिया को नरक बना दिया है। इस पैसा पूजा को मिटा दीजिये सारी बुराइयाँ अपने आप मिट जाएंगी, जड़ न खोदकर केवल फुंदगी की पत्तियां तोडना तो बेकार है। 


...यह नयी सभ्यता (रूस की समाजवादी व्यवस्था) धनाढ्यता को हेय और लज़्ज़ाजनक तथा घातक विष समझती है। वहां कोई आदमी अमीरी ढंग से रहे तो लोगों की ईर्ष्या का पात्र नहीं होता, बल्कि तुच्छ और हेय समझा जाता है। 

✍🏻:- मुंशी प्रेमचंद



आंदोलन, प्रदर्शन और जुलूस


"लोग कहते हैं आंदोलन, प्रदर्शन और जुलूस निकालने से क्या होता है...? 

इससे यह सिद्ध होता है कि हम जीवित हैं, अटल हैं और मैदान से हटे नहीं हैं। 

हमें अपने हार न मानने वाले स्वाभिमान का प्रमाण देना था। 

हमें यह दिखाना है कि हम गोलियों और अत्याचारों से भयभीत होकर अपने लक्ष्य से हटने वाले नहीं और हम उस व्यवस्था का अंत करके रहेंगे, जिसका आधार स्वार्थीपन और खून पर है। "

✍🏻:- मुंशी प्रेमचंद



क्रांति


"अब क्रांति में ही देश का उद्धार है – ऐसी क्रांति में, जो सर्वव्यापक हो, जीवन के मिथ्या आदर्शों का, झूठे सिद्धांतों का, परिपाटियों का अंत कर दे, जो एक नए युग की प्रवर्तक हो, एक नयी सृष्टि खड़ी कर दे, जो मिट्टी के असंख्य देवताओं को तोड़-फोड़कर चकना-चूर कर दे। जो मनुष्य को धन और धर्म के आधार पर टिकने वाले राज्य के पंजे से मुक्त कर दे।" 

✍🏻प्रेमचंद के "कर्मभूमि" उपन्यास से


 कानून और न्याय


"न्याय और नीति लक्ष्मी के खिलौने हैं, वह जैसे चाहती है नचाती है।" ~ मुंशी प्रेमचंद


"कानून और न्याय उसका है, जिसके पास पैसा है।कानून तो है कि महाजन किसी असामी के साथ कड़ाई न करे, कोई जमींदार किसी कास्तकार के साथ सख्ती न करे; मगर होता क्या है। रोज ही देखते हो। जमींदार मुसक बँधवा के पिटवाता है और महाजन लात और जूते से बात करता है। जो किसान पोढ़ा है, उससे न जमींदार बोलता है, न महाजन। ऐसे आदमियों से हम मिल जाते हैं और उनकी मदद से दूसरे आदमियों की गर्दन दबाते हैं।"

✍🏻:- मुंशी प्रेमचंद के "गोदान" उपन्यास से


"इस तरह जबर-जस्ती करने के लिए जो कानून चाहे, बना लो। यहाँ कोई सरकार का हाथ पकड़ने-वाला तो है नहीं। उसके सलाहकार भी तो सेठ-महाजन ही हैं।"

✍🏻:- मुंशी प्रेमचंद के 'रंगभूमि' उपन्यास से


डेमोक्रेसी


जिसे हम डेमोक्रेसी कहते हैं,वह व्यहवार में बड़े-बड़े व्यापारियों और जमींदारों का रा



प्रेमचंद (31 जुलाई 1880 – 8 अक्टूबर 1936) हिन्दी और उर्दू के सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यासकार, कहानीकार एवं विचारक थे। उनके जन्मदिन के अवसर पर प्रस्तुत है उनकी रचनाओं से चुने हुए उद्धरण: 


सम्पत्ति विष की गाँठ


जब तक सम्पत्ति मानव-समाज के संगठन का आधार है, संसार में अन्तरराष्ट्रीयता का प्रादुर्भाव नहीं हो सकता। राष्ट्रों-राष्ट्रों की, भाई-भाई की, स्त्री-पुरुष की लड़ाई का कारण यही सम्पत्ति है। संसार में जितना अन्याय और अनाचार है, जितना द्वेष और मालिन्य है, जितनी मूर्खता और अज्ञानता है, उसका मूल रहस्य यही विष की गाँठ है। जब तक सम्पत्ति पर व्यक्तिगत अधिकार रहेगा, तब तक मानव-समाज का उद्धार नहीं हो सकता। मज़दूरों के काम का समय घटाइये, बेकारों को गुज़ारा दीजिये, ज़मींदारों और पूँजीपतियों के अधिकारों को घटाइये, मज़दूरों-किसानों के स्वत्वों को बढ़ाइये, सिक्के का मूल्य घटाइये, इस तरह के चाहे जितने सुधार आप करें, लेकिन यह जीर्ण दीवार इस तरह के टीपटाप से नहीं खड़ी रह सकती। इसे नये सिरे से गिराकर उठाना होगा।—


— संसार आदिकाल से लक्ष्मी की पूजा करता चला आता है।— लेकिन संसार का जितना अकल्याण लक्ष्मी ने किया है, उतना शैतान ने नहीं किया। यह देवी नहीं डायन है।


-- सम्पत्ति ने मनुष्य को क्रीतदास बना लिया है। उसकी सारी मानसिक आत्मिक और दैहिक शक्ति केवल सम्पत्ति के संचय में बीत जाती है। मरते दम तक भी हमें यही हसरत रहती है कि हाय, इस सम्पत्ति का क्या हाल होगा। हम सम्पत्ति के लिए जीते हैं, उसी के लिए मरते हैं। हम विद्वान बनते हैं सम्पत्ति के लिए, गेरुए वस्त्र धारण करते हैं सम्पत्ति के लिए। घी में आलू मिलाकर हम क्यों बेचते हैं? दूध में पानी क्यों मिलाते हैं? भाँति-भाँति के वैज्ञानिक हिंसा-यन्त्र क्यों बनाते हैं? वेश्याएँ क्यों बनती हैं, और डाके क्यों पड़ते हैं? इसका एकमात्र कारण सम्पत्ति है। जब तक सम्पत्तिहीन समाज का संगठन नहीं होगा, जब तक सम्पत्ति व्यक्तिवाद का अन्त न होगा, संसार को शान्ति न मिलेगी।

✍🏻:- मुंशी प्रेमचंद ('राष्ट्रीयता और अन्तरराष्ट्रीयता' लेख से)


महाजनी सभ्यता

आग लगाकर चाहें कि लपटें न उठें, असम्भव। पैसा अपने साथ ये सारी बुराइयाँ लाता है, जिन्होंने दुनिया को नरक बना दिया है। इस पैसा पूजा को मिटा दीजिये सारी बुराइयाँ अपने आप मिट जाएंगी, जड़ न खोदकर केवल फुंदगी की पत्तियां तोडना तो बेकार है। 


...यह नयी सभ्यता (रूस की समाजवादी व्यवस्था) धनाढ्यता को हेय और लज़्ज़ाजनक तथा घातक विष समझती है। वहां कोई आदमी अमीरी ढंग से रहे तो लोगों की ईर्ष्या का पात्र नहीं होता, बल्कि तुच्छ और हेय समझा जाता है। 

✍🏻:- मुंशी प्रेमचंद



आंदोलन, प्रदर्शन और जुलूस


"लोग कहते हैं आंदोलन, प्रदर्शन और जुलूस निकालने से क्या होता है...? 

इससे यह सिद्ध होता है कि हम जीवित हैं, अटल हैं और मैदान से हटे नहीं हैं। 

हमें अपने हार न मानने वाले स्वाभिमान का प्रमाण देना था। 

हमें यह दिखाना है कि हम गोलियों और अत्याचारों से भयभीत होकर अपने लक्ष्य से हटने वाले नहीं और हम उस व्यवस्था का अंत करके रहेंगे, जिसका आधार स्वार्थीपन और खून पर है। "

✍🏻:- मुंशी प्रेमचंद



क्रांति


"अब क्रांति में ही देश का उद्धार है – ऐसी क्रांति में, जो सर्वव्यापक हो, जीवन के मिथ्या आदर्शों का, झूठे सिद्धांतों का, परिपाटियों का अंत कर दे, जो एक नए युग की प्रवर्तक हो, एक नयी सृष्टि खड़ी कर दे, जो मिट्टी के असंख्य देवताओं को तोड़-फोड़कर चकना-चूर कर दे। जो मनुष्य को धन और धर्म के आधार पर टिकने वाले राज्य के पंजे से मुक्त कर दे।" 

✍🏻प्रेमचंद के "कर्मभूमि" उपन्यास से


 कानून और न्याय


"न्याय और नीति लक्ष्मी के खिलौने हैं, वह जैसे चाहती है नचाती है।" ~ मुंशी प्रेमचंद


"कानून और न्याय उसका है, जिसके पास पैसा है।कानून तो है कि महाजन किसी असामी के साथ कड़ाई न करे, कोई जमींदार किसी कास्तकार के साथ सख्ती न करे; मगर होता क्या है। रोज ही देखते हो। जमींदार मुसक बँधवा के पिटवाता है और महाजन लात और जूते से बात करता है। जो किसान पोढ़ा है, उससे न जमींदार बोलता है, न महाजन। ऐसे आदमियों से हम मिल जाते हैं और उनकी मदद से दूसरे आदमियों की गर्दन दबाते हैं।"

✍🏻:- मुंशी प्रेमचंद के "गोदान" उपन्यास से


"इस तरह जबर-जस्ती करने के लिए जो कानून चाहे, बना लो। यहाँ कोई सरकार का हाथ पकड़ने-वाला तो है नहीं। उसके सलाहकार भी तो सेठ-महाजन ही हैं।"

✍🏻:- मुंशी प्रेमचंद के 'रंगभूमि' उपन्यास से


डेमोक्रेसी


जिसे हम डेमोक्रेसी कहते हैं,वह व्यहवार में बड़े-बड़े व्यापारियों और जमींदारों का राज्य है और कुछ नहीं। चुनाव में वही बाजी ले जाता है जिसके पास रुपये हैं। रुपये के जोर से उसके लिए सभी सुविधाएं तैयार हो जाती हैं। बड़े-बड़े पंडित, बड़े-बड़े मौलवी, बड़े-बड़े लिखने और बोलने वाले जो जबान और कलम से पब्लिक को जिस तरफ चाहे फेर दें। सभी सोने के देवता के पैरों पर माथा रगड़ते हैं ।   

✍🏻:- मुंशी प्रेमचंद (गोदान )



साहित्य का उद्देश्य


"जिस साहित्य से हमारी सुरुचि न जागे, आध्यात्मिक और मानसिक तृप्ति न मिले, हममें गति और शक्ति न पैदा हो, हमारा सौंदर्य प्रेम न जागृत हो, जो हममें संकल्प और कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करने की सच्ची दृढ़ता न उत्पन्न करे, वह हमारे लिए बेकार है वह साहित्य कहलाने का अधिकारी नहीं है।" ~ ✍🏻:- मुंशी प्रेमचंद


"हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौंदर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सच्चाइयों का प्रकाश हो - जो हममें गति, संघर्ष और बेचैनी पैदा करे, सुलाए नहीं क्योंकि अब सोना मृत्यु का लक्षण है ।" ✍🏻:- मुंशी प्रेमचंद

 (सभापति, प्रलेस, 1936)


राष्टवाद


राष्ट्रीयता वर्तमान युग का कोढ़ है, उसी तरह जैसे मध्यकालीन युग का कोढ़ साम्प्रदायिकता थी। नतीजा दोनों का एक है। साम्प्रदायिकता अपने घेरे के अन्दर पूर्ण शान्ति और सुख का राज्य स्थापित कर देना चाहती थी, मगर उस घेरे के बाहर जो संसार था, उसको नोचने-खसोटने में उसे जरा भी मानसिक क्लेश न होता था। राष्ट्रीयता भी अपने परिमित क्षेत्र के अन्दर रामराज्य का आयोजन करती है। उस क्षेत्र के बाहर का संसार उसका शत्रु है। सारा संसार ऐसे ही राष्ट्रों या गिरोहों में बॅंटा हुआ है, और सभी एक-दूसरे को हिंसात्मक सन्देह की दृष्टि से देखते हैं और जब तक इसका अन्त न होगा, संसार में शान्ति का होना असम्भव है। जागरूक आत्माएँ संसार में अन्तर्राष्ट्रीयता का प्रचार करना चाहती हैं और कर रही हैं, लेकिन राष्ट्रीयता के बन्धन में जकड़ा हुआ संसार उन्हें ड्रीमर या शेखचिल्ली समझकर उनकी उपेक्षा करता है।' (विविध प्रसंग, 2, अमृतराय, 1980, पृष्ठ 333-34)


पूंजीपति और किसान


"जिधर देखिए उधर पूंजीपतियों की घुड़दौड़ मची हुई है। किसानों की खेती उजड़ जाय, उनकी बला से। कहावत के उस मूर्ख की भाँति जो उसी डाल को काट रहा था, जिस पर वह बैठा था, यह समुदाय भी उसी किसान की गर्दन काट रहा है, जिसका पसीना उसी की सेवा में पानी की तरह बह रहा है।' (वही, पृ. 331)


किसान 


"जब किसान निपट मूर्ख था, तो उसके लिए काले और गोरे पूंजीपति में कोई अन्तर न था। पर, जब धीरे-धीरे उसने राजनैतिक ज्ञान सीखा, राष्ट्र और जाति जैसे शब्दों से उसका परिचय हुआ, तो उसने सेठ पुनपुनवाला के वैष्णव तिलक और हिन्दूधर्म के प्रति असीम श्रद्धा और उनके द्वारा बनाए गए धर्मशालाओं और मन्दिरों को देखकर उन्हें अपना उद्धारक समझा। लेकिन जब पुनपुनवाला की मिलों में उसकी ऊख की खरीद होने लगी, जब उनकी आढ़तों में उसका अनाज या सन तौला जाने लगा, तब उसे अनुभव हुआ कि सेठ जी बाहर से जितने बड़े धर्मात्मा और देशभक्त हैं, भीतर से उतने ही लुटेरे और बन्धुद्रोही भी हैं, और धन और देशप्रेम का यह सारा आडम्बर उन्होंने केवल अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए रच रक्खा है।" (वही, पृ. 33)


शिक्षा का व्यापारिकरण 


"यह किराये की तालीम हमारे कैरेक्टर को तबाह किये डालती है। हमने तालीम को भी एक व्यापार बना लिया है। व्यापार में ज्यादा पूंजी लगाओ ज्यादा नफा होगा। तालीम में भी ज्यादा खर्च करो ज्यादा ऊंचा ओहदा पाओगे।मैं चाहता हूँ ऊंची से ऊंची तालीम सबके लिए मुफ्त हो ताकि गरीब से गरीब आदमी भी ऊंची से ऊंची लियाकत हासिल कर सके और ऊंचे से ऊंचा ओहदा पा सके। यूनिवर्सिटी के दरवाजे मैं सब के लिये खुले रखना चाहता हूँ। सारा खर्च गवर्नमेंट पर पड़ना चाहिये। मुल्क को तालीम की उससे कहीं ज्यादा जरूरत है जितनी फौज की।" ✍🏻:- मुंशी प्रेमचंद



साम्प्रदायिकता और संस्कृति


साम्प्रदायिकता सदैव संस्कृति की दुहाई दिया करती है। उसे अपने असली रूप में निकलने में शायद लज्जा आती है, इसलिए वह उस गधे की भाँति जो सिंह की खाल ओढ़कर जंगल में जानवरों पर रोब जमाता फिरता था, संस्कृति का खोल ओढ़कर आती है। हिन्दू अपनी संस्कृति को कयामत तक सुरक्षित रखना चाहता है, मुसलमान अपनी संस्कृति को। दोनों ही अभी तक अपनी-अपनी संस्कृति को अछूती समझ रहे हैं, यह भूल गये हैं कि अब न कहीं हिन्दू संस्कृति है, न मुस्लिम संस्कृति और न कोई अन्य संस्कृति। अब संसार में केवल एक संस्कृति है, और वह है आर्थिक संस्कृति मगर आज भी हिन्दू और मुस्लिम संस्कृति का रोना रोये चले जाते हैं। हालाँकि संस्कृति का धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं। आर्य संस्कृति है, ईरानी संस्कृति है, अरब संस्कृति है। हिन्दू मूर्तिपूजक हैं, तो क्या मुसलमान कब्रपूजक और स्थान पूजक नहीं है। ताजिये को शर्बत और शीरीनी कौन चढ़ाता है, मस्जिद को खुदा का घर कौन समझता है। अगर मुसलमानों में एक सम्प्रदाय ऐसा है, जो बड़े से बड़े पैगम्बरों के सामने सिर झुकाना भी कुफ्र समझता है, तो हिन्दुओं में भी एक ऐसा है जो देवताओं को पत्थर के टुकड़े और नदियों को पानी की धारा और धर्मग्रन्थों को गपोड़े समझता है। यहाँ तो हमें दोनों संस्कृतियों में कोई अन्तर नहीं दिखता।


तो क्या भाषा का अन्तर है? बिल्कुल नहीं। मुसलमान उर्दू को अपनी मिल्ली भाषा कह लें, मगर मद्रासी मुसलमान के लिए उर्दू वैसी ही अपरिचित वस्तु है जैसे मद्रासी हिन्दू के लिए संस्कृत। हिन्दू या मुसलमान जिस प्रान्त में रहते हैं सर्वसाधारण की भाषा बोलते हैं चाहे वह उर्दू हो या हिन्दी, बंग्ला हो या मराठी। बंगाली मुसलमान उसी तरह उर्दू नहीं बोल सकता और न समझ सकता है, जिस तरह बंगाली हिन्दू। दोनों एक ही भाषा बोलते हैं। सीमाप्रान्त का हिन्दू उसी तरह पश्तो बोलता है, जैसे वहाँ का मुसलमान।


फिर क्या पहनावे में अन्तर है? सीमाप्रान्त के हिन्दू और मुसलमान स्त्रियों की तरह कुरता और ओढ़नी पहनते-ओढ़ते हैं। हिन्दू पुरुष भी मुसलमानों की तरह कुलाह और पगड़ी बाँधता है। अक्सर दोनों ही दाढ़ी भी रखते हैं। बंगाल में जाइये, वहाँ हिन्दू और मुसलमान स्त्रियाँ दोनों ही साड़ी पहनती हैं, हिन्दू और मुसलमान पुरुष दोनों कुरता और धोती पहनते है तहमद की प्रथा बहुत हाल में चली है, जब से साम्प्रदायिकता ने ज़ोर पकड़ा है।


खान-पान को लीजिए। अगर मुसलमान मांस खाते हैं तो हिन्दू भी अस्सी फीसदी मांस खाते हैं। ऊँचे दरजे के हिन्दू भी शराब पीते हैं, ऊँचे दरजे के मुसलमान भी। नीचे दरजे के हिन्दू भी शराब पीते है नीचे दरजे के मुसलमान भी। मध्यवर्ग के हिन्दू या तो बहुत कम शराब पीते हैं, या भंग के गोले चढ़ाते हैं जिसका नेता हमारा पण्डा-पुजारी क्लास है। मध्यवर्ग के मुसलमान भी बहुत कम शराब पीते है, हाँ कुछ लोग अफीम की पीनक अवश्य लेते हैं, मगर इस पीनकबाजी में हिन्दू भाई मुसलमानों से पीछे नहीं है। हाँ, मुसलमान गाय की कुर्बानी करते हैं। और उनका मांस खाते हैं लेकिन हिन्दुओं में भी ऐसी जातियाँ मौजूद हैं, जो गाय का मांस खाती हैं यहाँ तक कि मृतक मांस भी नहीं छोड़तीं, हालांकि बधिक और मृतक मांस में विशेष अन्तर नहीं है। संसार में हिन्दू ही एक जाति है, जो गो-मांस को अखाद्य या अपवित्र समझती है। तो क्या इसलिए हिन्दुओं को समस्त विश्व से धर्म-संग्राम छेड़ देना चाहिए?


संगीत और चित्रकला भी संस्कृति का एक अंग है, लेकिन यहाँ भी हम कोई सांस्कृतिक भेद नहीं पाते। वही राग-रागनियाँ दोनों गाते हैं और मुगलकाल की चित्रकला से भी हम परिचित हैं। नाट्य कला पहले मुसलमानों में न रही हो, लेकिन आज इस सींगे में भी हम मुसलमान को उसी तरह पाते हैं जैसे हिन्दुओं को।


फिर हमारी समझ में नहीं आता कि वह कौन सी संस्कृति है, जिसकी रक्षा के लिए साम्प्रदायिकता इतना ज़ोर बाँध रही है। वास्तव में संस्कृति की पुकार केवल ढोंग है, निरा पाखण्ड। शीतल छाया में बैठे विहार करते हैं। यह सीधे-सादे आदमियों को साम्प्रदायिकता की ओर घसीट लाने का केवल एक मन्त्र है और कुछ नहीं। हिन्दू और मुस्लिम संस्कृति के रक्षक वही महानुभाव और वही समुदाय हैं, जिनको अपने ऊपर, अपने देशवासियों के ऊपर और सत्य के ऊपर कोई भरोसा नहीं, इसलिए अनन्त तक एक ऐसी शक्ति की ज़रूरत समझते हैं जो उनके झगड़ों में सरपंच का काम करती रहे।


इन संस्थाओं को जनता को सुख-दुख से कोई मतलब नहीं, उनके पास ऐसा कोई सामाजिक या राजनीतिक कार्यक्रम नहीं है जिसे राष्ट्र के सामने रख सकें। उनका काम केवल एक-दूसरे का विरोध करके सरकार के सामने फरियाद करना है। वे ओहदों और रियायतों के लिए एक-दूसरे से चढ़ा-ऊपरी करके जनता पर शासन करने में शासक के सहायक बनने के सिवा और कुछ नहीं करते।


मुसलमान अगर शासकों का दामन पकड़कर कुछ रियायतें पा गया है तो हिन्दु क्यों न सरकार का दामन पकड़ें और क्यों न मुसलमानों की भाँति सुख़र्रू बन जायें। यही उनकी मनोवृत्ति है। कोई ऐसा काम सोच निकालना जिससे हिन्दू और मुसलमान दोनों एक राष्ट्र का उद्धार कर सकें, उनकी विचार शक्ति से बाहर है। दोनों ही साम्प्रदायिक संस्थाएँ मध्यवर्ग के धनिकों, ज़मींदारों, ओहदेदारों और पदलोलुपों की हैं। उनका कार्यक्षेत्र अपने समुदाय के लिए ऐसे अवसर प्राप्त करना है, जिससे वह जनता पर शासन कर सकें, जनता  पर आर्थिक और व्यावसायिक प्रभुत्व जमा सकें। साधारण जनता के सुख-दुख से उन्हें कोई प्रयोजन नहीं। अगर सरकार की किसी नीति से जनता को कुछ लाभ होने की आशा है और इन समुदायों को कुछ क्षति पहुँचने का भय है, तो वे तुरन्त उसका विरोध करने को तैयार हो जायेंगे। अगर और ज़्यादा गहराई तक जायें तो हमें इन संस्थाओं में अधिकांश ऐसे सज्जन मिलेंगे जिनका कोई न कोई निजी हित लगा हुआ है। और कुछ न सही तो हुक्काम के बंगलों पर उनकी रसोई ही सरल हो जाती है। एक विचित्र बात है कि इन सज्जनों की अफसरों की निगाह में बड़ी इज्जत है, इनकी वे बड़ी ख़ातिर करते हैं।


इसका कारण इसके सिवा और क्या है कि वे समझते हैं,  ऐसों पर ही उनका प्रभुत्व टिका हुआ है। आपस में खूब लड़े जाओ, खूब एक-दूसरे को नुकसान पहुँचाये जाओ। उनके पास फरियाद लिये जाओ, फिर उन्हें किसका नाम है, वे अमर हैं। मजा यह है कि बाजों ने यह पाखण्ड फैलाना भी शुरू कर दिया है कि हिन्दू अपने बूते पर स्वराज प्राप्त कर सकते है। इतिहास से उसके उदाहरण भी दिये  जाते हैं। इस तरह की गलतहमियाँ फैला कर इसके सिवा कि मुसलमानों में और ज़्यादा बदगुमानी फैले और कोई नतीजा नहीं निकल सकता। अगर कोई ज़माना था, तो कोई ऐसा काल भी था, जब हिन्दुओं के ज़माने में मुसलमानों ने अपना साम्राज्य स्थापित किया था, उन ज़मानों को भूल जाइये। वह मुबारक दिन होगा, जब हमारे शालाओं में इतिहास उठा दिया जायेगा। यह ज़माना साम्प्रदायिक अभ्युदय का नहीं है। यह आर्थिक युग है और आज वही नीति सफल होगी जिससे जनता अपनी आर्थिक समस्याओं को हल कर सके जिससे यह अन्धविश्वास, यह धर्म के नाम पर किया गया पाखण्ड, यह नीति के नाम पर ग़रीबों को दुहने की कृपा मिटाई जा सके। जनता को आज संस्कृतियों की रक्षा करने का न अवकाश है न ज़रूरत। 'संस्कृति' अमीरों, पेटभरों का बेफिक्रों का व्यसन है। दरिद्रों के लिए प्राणरक्षा ही सबसे बड़ी समस्या है।


उस संस्कृति में था ही क्या, जिसकी वे रक्षा करें। जब जनता मूर्छित थी तब उस पर धर्म और संस्कृति का मोह छाया हुआ था। ज्यों-ज्यों उसकी चेतना जागृत होती जाती है वह देखने लगी है कि यह संस्कृति केवल लुटेरों की संस्कृति थी जो, राजा बनकर, विद्वान बनकर, जगत सेठ बनकर जनता को लूटती थी। उसे आज अपने जीवन की रक्षा की ज़्यादा चिन्ता है, जो संस्कृति की रक्षा से कहीं आवश्यक है। उस पुरान संस्कृति में उसके लिए मोह का कोई कारण नहीं है। और साम्प्रदायिकता उसकी आर्थिक समस्याओं की तरफ से आँखें बन्द किये हुए ऐसे कार्यक्रम पर चल रही है, जिससे उसकी पराधीनता चिरस्थायी बनी रहेगी।✍🏻:- मुंशी प्रेमचंदज्य है और कुछ नहीं। चुनाव में वही बाजी ले जाता है जिसके पास रुपये हैं। रुपये के जोर से उसके लिए सभी सुविधाएं तैयार हो जाती हैं। बड़े-बड़े पंडित, बड़े-बड़े मौलवी, बड़े-बड़े लिखने और बोलने वाले जो जबान और कलम से पब्लिक को जिस तरफ चाहे फेर दें। सभी सोने के देवता के पैरों पर माथा रगड़ते हैं ।   

✍🏻:- मुंशी प्रेमचंद (गोदान )



साहित्य का उद्देश्य


"जिस साहित्य से हमारी सुरुचि न जागे, आध्यात्मिक और मानसिक तृप्ति न मिले, हममें गति और शक्ति न पैदा हो, हमारा सौंदर्य प्रेम न जागृत हो, जो हममें संकल्प और कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करने की सच्ची दृढ़ता न उत्पन्न करे, वह हमारे लिए बेकार है वह साहित्य कहलाने का अधिकारी नहीं है।" ~ ✍🏻:- मुंशी प्रेमचंद


"हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौंदर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सच्चाइयों का प्रकाश हो - जो हममें गति, संघर्ष और बेचैनी पैदा करे, सुलाए नहीं क्योंकि अब सोना मृत्यु का लक्षण है ।" ✍🏻:- मुंशी प्रेमचंद

 (सभापति, प्रलेस, 1936)


राष्टवाद


राष्ट्रीयता वर्तमान युग का कोढ़ है, उसी तरह जैसे मध्यकालीन युग का कोढ़ साम्प्रदायिकता थी। नतीजा दोनों का एक है। साम्प्रदायिकता अपने घेरे के अन्दर पूर्ण शान्ति और सुख का राज्य स्थापित कर देना चाहती थी, मगर उस घेरे के बाहर जो संसार था, उसको नोचने-खसोटने में उसे जरा भी मानसिक क्लेश न होता था। राष्ट्रीयता भी अपने परिमित क्षेत्र के अन्दर रामराज्य का आयोजन करती है। उस क्षेत्र के बाहर का संसार उसका शत्रु है। सारा संसार ऐसे ही राष्ट्रों या गिरोहों में बॅंटा हुआ है, और सभी एक-दूसरे को हिंसात्मक सन्देह की दृष्टि से देखते हैं और जब तक इसका अन्त न होगा, संसार में शान्ति का होना असम्भव है। जागरूक आत्माएँ संसार में अन्तर्राष्ट्रीयता का प्रचार करना चाहती हैं और कर रही हैं, लेकिन राष्ट्रीयता के बन्धन में जकड़ा हुआ संसार उन्हें ड्रीमर या शेखचिल्ली समझकर उनकी उपेक्षा करता है।' (विविध प्रसंग, 2, अमृतराय, 1980, पृष्ठ 333-34)


पूंजीपति और किसान


"जिधर देखिए उधर पूंजीपतियों की घुड़दौड़ मची हुई है। किसानों की खेती उजड़ जाय, उनकी बला से। कहावत के उस मूर्ख की भाँति जो उसी डाल को काट रहा था, जिस पर वह बैठा था, यह समुदाय भी उसी किसान की गर्दन काट रहा है, जिसका पसीना उसी की सेवा में पानी की तरह बह रहा है।' (वही, पृ. 331)


किसान 


"जब किसान निपट मूर्ख था, तो उसके लिए काले और गोरे पूंजीपति में कोई अन्तर न था। पर, जब धीरे-धीरे उसने राजनैतिक ज्ञान सीखा, राष्ट्र और जाति जैसे शब्दों से उसका परिचय हुआ, तो उसने सेठ पुनपुनवाला के वैष्णव तिलक और हिन्दूधर्म के प्रति असीम श्रद्धा और उनके द्वारा बनाए गए धर्मशालाओं और मन्दिरों को देखकर उन्हें अपना उद्धारक समझा। लेकिन जब पुनपुनवाला की मिलों में उसकी ऊख की खरीद होने लगी, जब उनकी आढ़तों में उसका अनाज या सन तौला जाने लगा, तब उसे अनुभव हुआ कि सेठ जी बाहर से जितने बड़े धर्मात्मा और देशभक्त हैं, भीतर से उतने ही लुटेरे और बन्धुद्रोही भी हैं, और धन और देशप्रेम का यह सारा आडम्बर उन्होंने केवल अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए रच रक्खा है।" (वही, पृ. 33)


शिक्षा का व्यापारिकरण 


"यह किराये की तालीम हमारे कैरेक्टर को तबाह किये डालती है। हमने तालीम को भी एक व्यापार बना लिया है। व्यापार में ज्यादा पूंजी लगाओ ज्यादा नफा होगा। तालीम में भी ज्यादा खर्च करो ज्यादा ऊंचा ओहदा पाओगे।मैं चाहता हूँ ऊंची से ऊंची तालीम सबके लिए मुफ्त हो ताकि गरीब से गरीब आदमी भी ऊंची से ऊंची लियाकत हासिल कर सके और ऊंचे से ऊंचा ओहदा पा सके। यूनिवर्सिटी के दरवाजे मैं सब के लिये खुले रखना चाहता हूँ। सारा खर्च गवर्नमेंट पर पड़ना चाहिये। मुल्क को तालीम की उससे कहीं ज्यादा जरूरत है जितनी फौज की।" ✍🏻:- मुंशी प्रेमचंद



साम्प्रदायिकता और संस्कृति


साम्प्रदायिकता सदैव संस्कृति की दुहाई दिया करती है। उसे अपने असली रूप में निकलने में शायद लज्जा आती है, इसलिए वह उस गधे की भाँति जो सिंह की खाल ओढ़कर जंगल में जानवरों पर रोब जमाता फिरता था, संस्कृति का खोल ओढ़कर आती है। हिन्दू अपनी संस्कृति को कयामत तक सुरक्षित रखना चाहता है, मुसलमान अपनी संस्कृति को। दोनों ही अभी तक अपनी-अपनी संस्कृति को अछूती समझ रहे हैं, यह भूल गये हैं कि अब न कहीं हिन्दू संस्कृति है, न मुस्लिम संस्कृति और न कोई अन्य संस्कृति। अब संसार में केवल एक संस्कृति है, और वह है आर्थिक संस्कृति मगर आज भी हिन्दू और मुस्लिम संस्कृति का रोना रोये चले जाते हैं। हालाँकि संस्कृति का धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं। आर्य संस्कृति है, ईरानी संस्कृति है, अरब संस्कृति है। हिन्दू मूर्तिपूजक हैं, तो क्या मुसलमान कब्रपूजक और स्थान पूजक नहीं है। ताजिये को शर्बत और शीरीनी कौन चढ़ाता है, मस्जिद को खुदा का घर कौन समझता है। अगर मुसलमानों में एक सम्प्रदाय ऐसा है, जो बड़े से बड़े पैगम्बरों के सामने सिर झुकाना भी कुफ्र समझता है, तो हिन्दुओं में भी एक ऐसा है जो देवताओं को पत्थर के टुकड़े और नदियों को पानी की धारा और धर्मग्रन्थों को गपोड़े समझता है। यहाँ तो हमें दोनों संस्कृतियों में कोई अन्तर नहीं दिखता।


तो क्या भाषा का अन्तर है? बिल्कुल नहीं। मुसलमान उर्दू को अपनी मिल्ली भाषा कह लें, मगर मद्रासी मुसलमान के लिए उर्दू वैसी ही अपरिचित वस्तु है जैसे मद्रासी हिन्दू के लिए संस्कृत। हिन्दू या मुसलमान जिस प्रान्त में रहते हैं सर्वसाधारण की भाषा बोलते हैं चाहे वह उर्दू हो या हिन्दी, बंग्ला हो या मराठी। बंगाली मुसलमान उसी तरह उर्दू नहीं बोल सकता और न समझ सकता है, जिस तरह बंगाली हिन्दू। दोनों एक ही भाषा बोलते हैं। सीमाप्रान्त का हिन्दू उसी तरह पश्तो बोलता है, जैसे वहाँ का मुसलमान।


फिर क्या पहनावे में अन्तर है? सीमाप्रान्त के हिन्दू और मुसलमान स्त्रियों की तरह कुरता और ओढ़नी पहनते-ओढ़ते हैं। हिन्दू पुरुष भी मुसलमानों की तरह कुलाह और पगड़ी बाँधता है। अक्सर दोनों ही दाढ़ी भी रखते हैं। बंगाल में जाइये, वहाँ हिन्दू और मुसलमान स्त्रियाँ दोनों ही साड़ी पहनती हैं, हिन्दू और मुसलमान पुरुष दोनों कुरता और धोती पहनते है तहमद की प्रथा बहुत हाल में चली है, जब से साम्प्रदायिकता ने ज़ोर पकड़ा है।


खान-पान को लीजिए। अगर मुसलमान मांस खाते हैं तो हिन्दू भी अस्सी फीसदी मांस खाते हैं। ऊँचे दरजे के हिन्दू भी शराब पीते हैं, ऊँचे दरजे के मुसलमान भी। नीचे दरजे के हिन्दू भी शराब पीते है नीचे दरजे के मुसलमान भी। मध्यवर्ग के हिन्दू या तो बहुत कम शराब पीते हैं, या भंग के गोले चढ़ाते हैं जिसका नेता हमारा पण्डा-पुजारी क्लास है। मध्यवर्ग के मुसलमान भी बहुत कम शराब पीते है, हाँ कुछ लोग अफीम की पीनक अवश्य लेते हैं, मगर इस पीनकबाजी में हिन्दू भाई मुसलमानों से पीछे नहीं है। हाँ, मुसलमान गाय की कुर्बानी करते हैं। और उनका मांस खाते हैं लेकिन हिन्दुओं में भी ऐसी जातियाँ मौजूद हैं, जो गाय का मांस खाती हैं यहाँ तक कि मृतक मांस भी नहीं छोड़तीं, हालांकि बधिक और मृतक मांस में विशेष अन्तर नहीं है। संसार में हिन्दू ही एक जाति है, जो गो-मांस को अखाद्य या अपवित्र समझती है। तो क्या इसलिए हिन्दुओं को समस्त विश्व से धर्म-संग्राम छेड़ देना चाहिए?


संगीत और चित्रकला भी संस्कृति का एक अंग है, लेकिन यहाँ भी हम कोई सांस्कृतिक भेद नहीं पाते। वही राग-रागनियाँ दोनों गाते हैं और मुगलकाल की चित्रकला से भी हम परिचित हैं। नाट्य कला पहले मुसलमानों में न रही हो, लेकिन आज इस सींगे में भी हम मुसलमान को उसी तरह पाते हैं जैसे हिन्दुओं को।


फिर हमारी समझ में नहीं आता कि वह कौन सी संस्कृति है, जिसकी रक्षा के लिए साम्प्रदायिकता इतना ज़ोर बाँध रही है। वास्तव में संस्कृति की पुकार केवल ढोंग है, निरा पाखण्ड। शीतल छाया में बैठे विहार करते हैं। यह सीधे-सादे आदमियों को साम्प्रदायिकता की ओर घसीट लाने का केवल एक मन्त्र है और कुछ नहीं। हिन्दू और मुस्लिम संस्कृति के रक्षक वही महानुभाव और वही समुदाय हैं, जिनको अपने ऊपर, अपने देशवासियों के ऊपर और सत्य के ऊपर कोई भरोसा नहीं, इसलिए अनन्त तक एक ऐसी शक्ति की ज़रूरत समझते हैं जो उनके झगड़ों में सरपंच का काम करती रहे।


इन संस्थाओं को जनता को सुख-दुख से कोई मतलब नहीं, उनके पास ऐसा कोई सामाजिक या राजनीतिक कार्यक्रम नहीं है जिसे राष्ट्र के सामने रख सकें। उनका काम केवल एक-दूसरे का विरोध करके सरकार के सामने फरियाद करना है। वे ओहदों और रियायतों के लिए एक-दूसरे से चढ़ा-ऊपरी करके जनता पर शासन करने में शासक के सहायक बनने के सिवा और कुछ नहीं करते।


मुसलमान अगर शासकों का दामन पकड़कर कुछ रियायतें पा गया है तो हिन्दु क्यों न सरकार का दामन पकड़ें और क्यों न मुसलमानों की भाँति सुख़र्रू बन जायें। यही उनकी मनोवृत्ति है। कोई ऐसा काम सोच निकालना जिससे हिन्दू और मुसलमान दोनों एक राष्ट्र का उद्धार कर सकें, उनकी विचार शक्ति से बाहर है। दोनों ही साम्प्रदायिक संस्थाएँ मध्यवर्ग के धनिकों, ज़मींदारों, ओहदेदारों और पदलोलुपों की हैं। उनका कार्यक्षेत्र अपने समुदाय के लिए ऐसे अवसर प्राप्त करना है, जिससे वह जनता पर शासन कर सकें, जनता  पर आर्थिक और व्यावसायिक प्रभुत्व जमा सकें। साधारण जनता के सुख-दुख से उन्हें कोई प्रयोजन नहीं। अगर सरकार की किसी नीति से जनता को कुछ लाभ होने की आशा है और इन समुदायों को कुछ क्षति पहुँचने का भय है, तो वे तुरन्त उसका विरोध करने को तैयार हो जायेंगे। अगर और ज़्यादा गहराई तक जायें तो हमें इन संस्थाओं में अधिकांश ऐसे सज्जन मिलेंगे जिनका कोई न कोई निजी हित लगा हुआ है। और कुछ न सही तो हुक्काम के बंगलों पर उनकी रसोई ही सरल हो जाती है। एक विचित्र बात है कि इन सज्जनों की अफसरों की निगाह में बड़ी इज्जत है, इनकी वे बड़ी ख़ातिर करते हैं।


इसका कारण इसके सिवा और क्या है कि वे समझते हैं,  ऐसों पर ही उनका प्रभुत्व टिका हुआ है। आपस में खूब लड़े जाओ, खूब एक-दूसरे को नुकसान पहुँचाये जाओ। उनके पास फरियाद लिये जाओ, फिर उन्हें किसका नाम है, वे अमर हैं। मजा यह है कि बाजों ने यह पाखण्ड फैलाना भी शुरू कर दिया है कि हिन्दू अपने बूते पर स्वराज प्राप्त कर सकते है। इतिहास से उसके उदाहरण भी दिये  जाते हैं। इस तरह की गलतहमियाँ फैला कर इसके सिवा कि मुसलमानों में और ज़्यादा बदगुमानी फैले और कोई नतीजा नहीं निकल सकता। अगर कोई ज़माना था, तो कोई ऐसा काल भी था, जब हिन्दुओं के ज़माने में मुसलमानों ने अपना साम्राज्य स्थापित किया था, उन ज़मानों को भूल जाइये। वह मुबारक दिन होगा, जब हमारे शालाओं में इतिहास उठा दिया जायेगा। यह ज़माना साम्प्रदायिक अभ्युदय का नहीं है। यह आर्थिक युग है और आज वही नीति सफल होगी जिससे जनता अपनी आर्थिक समस्याओं को हल कर सके जिससे यह अन्धविश्वास, यह धर्म के नाम पर किया गया पाखण्ड, यह नीति के नाम पर ग़रीबों को दुहने की कृपा मिटाई जा सके। जनता को आज संस्कृतियों की रक्षा करने का न अवकाश है न ज़रूरत। 'संस्कृति' अमीरों, पेटभरों का बेफिक्रों का व्यसन है। दरिद्रों के लिए प्राणरक्षा ही सबसे बड़ी समस्या है।


उस संस्कृति में था ही क्या, जिसकी वे रक्षा करें। जब जनता मूर्छित थी तब उस पर धर्म और संस्कृति का मोह छाया हुआ था। ज्यों-ज्यों उसकी चेतना जागृत होती जाती है वह देखने लगी है कि यह संस्कृति केवल लुटेरों की संस्कृति थी जो, राजा बनकर, विद्वान बनकर, जगत सेठ बनकर जनता को लूटती थी। उसे आज अपने जीवन की रक्षा की ज़्यादा चिन्ता है, जो संस्कृति की रक्षा से कहीं आवश्यक है। उस पुरान संस्कृति में उसके लिए मोह का कोई कारण नहीं है। और साम्प्रदायिकता उसकी आर्थिक समस्याओं की तरफ से आँखें बन्द किये हुए ऐसे कार्यक्रम पर चल रही है, जिससे उसकी पराधीनता चिरस्थायी बनी रहेगी।✍🏻:- मुंशी प्रेमचंद


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बाल गंगाधर तिलक की महानता के दीवाने क्यों नहीं थे डॉ. आंबेडकर



By  डॉ मुख्तयार सिंह 

बाल गंगाधर तिलक (23 जुलाई 1856 – 1 अगस्त 1920 ) को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कांग्रेस के गरम दल का प्रमुख नेता माना जाता है. उनको लोकमान्य की उपाधि से नवाजा गया था. स्वराज और स्वाधीनता में अंतर होने के बावजूद, उनका नारा – 'स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है' स्वतंत्रता आंदोलन का लोकप्रिय नारा बना.

तिलक के राजनीतिक विचारों के बारे में काफी कुछ लिखा जा चुका है. इसलिए प्रस्तुत लेख में मेरी कोशिश उनके सामाजिक विचारों को सामने लाने की होगी और ये बताने की होगी कि जिस दौर में महादेव गोविंद रानाडे और गोपाल कृष्ण गोखले से लेकर ज्योतिबा फुले समाज सुधार के लिए काम कर रहे थे, उस समय तिलक किस तरह परंपरावादियों का नेतृत्व कर रहे थे. इस संदर्भ में ये भी देखा जाएगा कि डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने तिलक को लेकर लगातार आलोचनात्मक लेखन क्यों किया है.

इस पूरे विमर्श को कांग्रेस के अंदर दो धड़ों के संघर्ष के रूप में भी देखा जा सकता है. महिलाओं और जाति के प्रश्न पर कांग्रेस में दो धड़े थे- सुधारवादी और रूढ़िवादी. सुधारवादी धारा के चार मुख्य आधार थे – जातिभेद का उन्मूलन, बालिका विवाह का निषेध, विधवा विवाह का समर्थन और महिला शिक्षा. महादेव गोविन्द रानाडे, डब्ल्यू.सी. बनर्जी, विष्णु हरि पंडित, और आगे चलकर जी. जी. अगरकर तथा गोपाल कृष्ण गोखले आदि इस पक्ष में थे. दूसरी ओर, विष्णुशास्त्री चिपलूणकर और तिलक रूढ़िवादी विचार का नेतृत्व कर रहे थे. रुढ़ीवादी खेमे ने आगे चलकर खुद को राष्ट्रवादी खेमे का नाम दे दिया.

 *महिलाओं की शिक्षा और तिलक* 

तिलक ने महिला शिक्षा का पूरी क्षमता के साथ विरोध किया. परिमाला वी. राव ने अपने शोधपत्र में मुख्य रूप से तिलक के अखबार मराठा के हवाले से बताया है कि विष्णुशास्त्री चिपलूणकर और तिलक के नेतृत्व में कांग्रेस के कट्टरवादी धड़े ने 1881 से 1920 के बीच किस तरह बालिका विद्यालयों की स्थापना और हर समुदाय के लिए शिक्षा देने के प्रयासों का विरोध किया. इस धड़े के विरोध के कारण महाराष्ट् में 11 में से 9 नगरपालिकाओं में हर किसी के लिए शिक्षा देने के प्रस्ताव को हार का सामना करना पड़ा. इस धड़े ने राष्ट्रवादी शिक्षा की वकालत की, जिसमें धर्मशास्त्रों का अध्ययन और हुनर सिखाने पर जोर था.
तिलक के नेतृत्व में कट्टरवादी धड़े का तर्क था कि पेशवा के शासन के दौरान महिलाओं की स्थिति बहुत अच्छी थी. तिलक के ये विचार उनके अखबार मराठा के 15 मार्च 1885 के अंक में छपे हैं. महिला शिक्षा के विरोध में तिलक का तर्क था कि महिलाएं कमजोर होती हैं और संतति को आगे बढ़ाना उनका काम है, इसलिए उनको शिक्षित करने से उनको पीड़ा होगी क्योंकि आधुनिक शिक्षा को समझना उनकी शक्ति से बाहर है. उनकी ये बात मराठा अखबार के 31 अगस्त 1884 के अंक में छपी थी.

तिलक का कहना था कि यदि विशेष जरूरत हो, तो महिलाओं को गृह विज्ञान और सफाई कार्य जैसी शिक्षा दी जानी चाहिए. ऐसी महिलाएं ही आगे जाकर निपुण बन सकती है. उसके अनुसार महिलाएं इंग्लिश, गणित, विज्ञान जैसे कठोर विषय पढ़ने के लिए बिलकुल उपयुक्त नहीं है. उसने कहा कि हिन्दू समाज में पुरुष और महिला के कार्य अलग अलग हैं, इसलिए उनको अलग अलग शिक्षा दी जानी चाहिए.

गौर किया जाना चाहिए कि यह वही दौर था जब ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले ने 1848 में पहला बालिका विद्यालय खोला था. वहीं, राणाडे के नेतृत्व में कांग्रेस के उदारवादियों ने 1884 में पुणे में लड़कियों का हाई स्कूल खोला. गोखले ने भी तिलक के स्त्री शिक्षा संबंधी विचारों को सही नहीं माना और फर्गुसन कॉलेज में बालिकाओं को पढ़ाए जाने का समर्थन किया.

 *विवाह की आयु और तिलक के विचार* 

उस समय लड़कियों की शादी बहुत छोटी उम्र में कर दी जाती थी, जिससे उन्हें असहनीय यातना से गुजरना पड़ता था. पेशवा राज में ब्राह्मण परिवारों के लिए ये अनिवार्य था कि वे अपनी बच्चियों की शादी 9 साल से कम उम्र में ही कर दें. एक चर्चित मामले में, बच्ची फूलमणि की शादी 11 वर्ष की उम्र में कर दी गयी थी, उसके 35 वर्षीय पति ने उसके साथ जबरदस्ती सेक्स किया, जिससे उसकी मौत हो गयी. ऐसी अनेक घटनाएं थीं जिनमे छोटी बच्चियों के साथ सेक्स करने से वे अपाहिज तक हो गयीं.

समाज सुधारको की ओर से ऐसी मांग थी कि शादी और सहमति से सेक्स की उम्र को बढ़ाया जाए. इसलिए ब्रिटिश सरकार ने एक कानून Age of Consent Act 1891 बनाया जिसके अनुसार 12 वर्ष से कम उम्र की लड़की के साथ, चाहे वह विवाहित है या अविवाहित, सेक्स करना बलात्कार की श्रेणी में आएगा. कांग्रेस के सुधारवादी लोग भी इस बिल के पक्ष में थे, किन्तु तिलक ने इस मामले में ब्रिटिश सरकार के हस्तक्षेप का विरोध किया. उन्होंने कहा – 'हो सकता है कि इस सरकार का ये कानून सही हो और उपयोगी हो, फिर भी हम नहीं चाहते हैं कि सरकार हमारी सामाजिक परंपराओं और जीवन शैली में हस्तक्षेप करे.'

 *गैर-ब्राह्मणों के बारे में तिलक के विचार* 

तिलक वर्ण व्यवस्था में दृढ विश्वास रखते था. इसका मानना था कि ब्राह्मण जाति शुद्ध है तथा जाति व्यवस्था का बने रहना देश और समाज के लाभ में है. इसने कहा था कि जाति का ह्रास होने का अर्थ राष्ट्रीयता का ह्रास होना है. इसका मानना था कि जाति हिन्दू समाज का आधार है और जाति के नष्ट होने का अर्थ हिन्दू समाज का नष्ट होना है.

जब तिलक यह विचार दे रहा थे, उससे पहले महाराष्ट्र में ही ज्योतिबा फुले ने जाति के आधार असमानता का विरोध किया था. जब ज्योतिबा फुले ने अनिवार्य शिक्षा का कार्यक्रम चलाया तो इसका तिलक ने विरोध किया था. तिलक का मानना था कि प्रत्येक बच्चे को इतिहास, भूगोल, गणित पढ़ाये जाने का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि उनके जीवन में इनका इस्तेमाल नहीं है. तिलक का कहना था कि कुनबी जाति के बच्चों को इतिहास, भूगोल या गणित की शिक्षा देने से उनका नुकसान होगा क्योंकि वे अपना जातीय हुनर भूल जाएंगे. उसने कहा कि कुनबी जाति के बच्चों को अपना परम्परागत किसान का पेशा करना चाहिए, और शिक्षा से दूर रहना चाहिए. जिस समय तिलक यह विचार दे रहा था, उसी समय ब्रिटिश सरकार स्कूल खोल रही थी, और उसमें सभी जाति के बच्चों को पढ़ने का अधिकार दे रही थी.

तिलक ने इसे ब्रिटिश सरकार की गंभीर गलती बताया. सार्वजिनक स्कूल में महार और मांग जाति के बच्चों को प्रवेश देने पर तिलक ने ब्रिटिश सरकार को चेतावनी दी कि महार-मांग बच्चों के ब्राह्मणो बच्चों के साथ बैठने से हिन्दू धर्म सुरक्षित नहीं रह पायेगा.

 *तिलक के बारे में डॉ. आंबेडकर* 

तिलक उस समय कांग्रेस पार्टी में कार्य कर रहे थे. कांग्रेस के अंदर ही एक संगठन – सोशल कांफ्रेंस था जो समाज सुधार के लिए कार्य करता था. 1895 में जब कांग्रेस का अधिवेशन चल रहा था, कुछ लोगों ने कहा कि यदि कांग्रेस के अंदर सोशल कांफ्रेंस ने समाज सुधार का कार्य किया तो हम कांग्रेस के पंडाल को जला देंगे. ऐसे लोगों का वैचरिक नेतृत्व तिलक ने किया था. अंत में तय हुआ कि कांग्रेस समाज सुधार के किसी कार्यक्रम से कोई संबंध नहीं रखेगी, चाहे वह कितना भी जरूरी क्यों नहीं हो. इस प्रकार कांग्रेस केवल एक राजनीतिक प्लेटफार्म बन कर गयी, उसने समाज सुधार के कार्यक्रम बिलकुल बंद कर दिए.

इसका जिक्र डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने अपनी किताब कांग्रेस और गांधी ने अछूतों के साथ क्या किया में विस्तार से किया है. अपनी एक और किताब राणाडे, गांधी और जिन्ना में वे लिखते हैं – 'बुद्धिजीवियों का एक समूह कट्टरवादी और अराजनैतिक और दूसरा समूह प्रगतिशील और राजनीति है. पहले समूह का नेतृत्व पहले चिपलूणकर और बाद में तिलक ने किया. इन दोनों ने राणाडे के लिए हर तरह की मुसीबत खड़ी की. इससे न सिर्फ समाज सुधार के कामों को नुकसान हुआ बल्कि अनुभव बताते हैं कि इस वजह से राजनीतिक सुधारों की भी सबसे अधिक हानि हुई.'

तिलक और राणाडे की तुलना करते हुए आंबेडकर ये भी लिखते हैं कि तिलक बेशक जेल में रहे, लेकिन राणाडे की लड़ाई ज्यादा मुश्किल थी. राजनीतिक लड़ाई लड़ने वाले को समाज सिर माथे पर बिठाता है, जबकि समाज सुधार के लिए लड़ने वाला अक्सर अकेला होता है और उसे तमाम तरह के अपमान झेलने पड़ते हैं.

तिलक की स्पष्ट मान्यता थी कि किसान और कारीगर जातियों को राजनीति में नहीं आना चाहिए. 1918 में जब इन जातियों ने राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग उठाई तो तिलक ने शोलापुर की एक सभा में कहा था कि 'तेली-तमोली-कुनबी विधानसभा में जाकर क्या करेंगे'. बाबा साहेब के मुताबिक तिलक के हिसाब से इन जातियों के लोगों का काम कानून का पालन करना है और उन्हें कानून बनाने का अधिकार नहीं होना चाहिए.

कुल मिलाकर देखा जाए तो तिलक के सामाजिक विचारों को वर्तमान भारत में स्वीकार नहीं किया जा सकता है. इसका ये भी मतलब है कि सबसे महान मान लिए व्यक्ति को भी समग्रता में ही देखा जाना चाहिए और उन्हें जरूरी हो तो उन्हें संपूर्णता में स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए.

(लेखक दिल्ली यूनिवर्सिटी में शिक्षक रहे हैं.यह लेखक के निजी विचार हैं.)

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