परंतु एक बात में समाज के विकास का इतिहास प्रकृति के विकास के इतिहास से मूलभूत रूप में भिन्न सिद्ध होता है। प्रकृति में - जहां तक हम प्रकृति पर मनुष्य की प्रतिक्रिया की उपेक्षा करते हैं - हमें केवल अंधी , अचेतन , एक दूसरे पर प्रभाव डालती हुई शक्तियां मिलती हैं , जिनकी परस्पर क्रिया के द्वारा सामान्य नियम परिचालित होते हैं। वहां जितने घटना-व्यापार होते हैं - चाहे वे सतह पर दिखाई देने वाली अनगिनत प्रगटत: आकस्मिक घटनाएं हों या वे अंतिम परिणामों में हों , जो इन आकस्मिक घटनाओं में अंतर्निहित नियमबद्धता की पुष्टि करते हैं - उनमें कोई भी चेतन रूप से इच्छित लक्ष्य की पूर्त्ति के रूप में नहीं होता है। इसके विपरीत, समाज के इतिहास में कार्य करने वाले लोग चेतना संपन्न होते हैं ; वे सोच-विचार या आवेग से काम करते हैं , उनके कार्य का एक विशेष लक्ष्य होता है ; कोई भी चीज बगैर सचेतन ध्येय के , बगैर किसी उद्दिष्ट अभिप्राय के नहीं होती । लेकिन यह भेद , ऐतिहासिक छानबीन के लिए - विशेषकर अमुक विशेष युगों तथा घटनाओं की छानबीन के लिए - महत्त्वपूर्ण होते हुए भी इस तथ्य को नहीं बदल सकता कि इतिहास का क्रम आंतरिक सामान्य नियमों के अधीनस्थ है। वास्तव में यहां भी सभी व्यक्तियों के चेतन रूप से इच्छित लक्ष्यों के बावजूद , प्रगटत: सतह पर आकस्मिकता का ही राज दिखाई देता है । जिसकी इच्छा की जाती है वह बिरले ही कभी होता है ; अधिकांशतः अनगिनत इच्छित ध्येय आपस में टकराते हैं और एक दूसरे के मार्ग में बाधक होते हैं ; या ये लक्ष्य स्वयं ऐसे होते हैं , जो आरंभ से ही असाध्य होते हैं अथवा उनकी पूर्त्ति के साधन ही अपर्याप्त होते हैं । इस तरह इतिहास के क्षेत्र में अनगिनत व्यक्तिगत इच्छाओं और व्यक्तिगत क्रियाओं के टकराव द्वारा एक ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है , जो जड़ प्रकृति के क्षेत्र में प्रचलित स्थिति के बिल्कुल समान होती है। कार्यों के लक्ष्य उद्दिष्ट होते हैं , पर इन कार्यों द्वारा वास्तव में जो नतीजे निकलते हैं , वे उद्दिष्ट नहीं होते , अथवा जब वे उद्दिष्ट लक्ष्य के अनुरूप ज्ञात भी होते हैं , तो उनके अंतिम फल अंतत: उद्दिष्ट से बिल्कुल भिन्न होते हैं । ऐतिहासिक घटनाएं भी , इस प्रकार , समग्रत: संयोग के अधीन ज्ञात होती हैं । पर जहां बाहर से सतह पर आकस्मिकता का बोलबाला दिखाई देता है , वहां वस्तुत: सदैव आंतरिक , अप्रगट नियमों का शासन चलता है । सवाल केवल इन नियमों का पता लगाने का है ।
मनुष्य इस माने में अपना इतिहास स्वयं बनाते हैं (चाहे उसका परिणाम कुछ भी हो) कि प्रत्येक व्यक्ति अपने सचेत , इच्छित लक्ष्य का अनुसरण करता है । और भिन्न दिशाओं में क्रियाशील इन अनेक इच्छाओं तथा बाह्य जगत पर उनके बहुविध प्रभावों का परिणाम ही इतिहास है । अतः सवाल इस बात का है कि ये बहुत-से व्यक्ति चाहते क्या हैं ? इच्छा आवेग या सोच विचार द्वारा निर्धारित होती है। पर आवेग या सोच-विचार निर्धारित करने वाले उत्तोलक बिल्कुल भिन्न प्रकार के होते हैं। अंशत: ये बाह्य पदार्थ हो सकते हैं और अंशत: भावमूलक प्रेरक - महत्त्वाकांक्षा , " सत्य और न्याय का आग्रह " , व्यक्तिगत घृणा अथवा महज किसी किस्म की व्यक्तिगत सनक । पर एक ओर हम देख चुके हैं कि इतिहास में क्रियाशील अनेक व्यक्तिगत इच्छाएं अधिकांशतः वांछित से बिल्कुल भिन्न प्राय: उलटे ही परिणाम उपस्थित करती हैं ; अतः,अंतिम परिणाम के सम्बन्ध में उनका प्रेरक हेतु भी गौण महत्त्व का होता है।
दूसरी ओर यह प्रश्न उठ खड़ा होता है : इन प्रेरणाओं के पीछे कौन सी उत्प्रेरक शक्तियां खड़ी हैं ? वे ऐतिहासिक कारण क्या हैं जो कार्यरत लोगों के मस्तिष्क में इन प्रेरणाओं का रूप धारण कर लेते हैं ?
-- फ्रेडरिक एंगेल्स , " लुडविग फायरबाख और क्लासकीय जर्मन दर्शन का अंत "
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