विश्व इतिहास का व्यंग्य ऐसा है कि सब कुछ उलट-पुलट जाता है। हम लोग "क्रांतिकारी" लोग, "उखाड़ फेंकने वाले" लोग - गैरकानूनी तरीकों , उखाड़ फेंकने वाले तरीकों के मुकाबले कानूनी तरीकों से कहीं ज्यादा मजबूत हो रहे हैं । अमन की पार्टियां , जैसा कि वे अपने को कहती हैं , अपने ही द्वारा स्थापित कानूनी परिस्थितियों में घुट मर रही हैं । ओदिलां बारो की आवाज में वे निराशा से चीत्कार करती हैं : -- कानूनियत हमारी मौत है ; जबकि इसी कानूनियत के तहत हमारे पुट्ठे मजबूत होते हैं , हमारे गाल सुर्ख होते हैं और हम अजर , अमर जीवन के मूर्तिमान प्रतीक दिखाई देते हैं। और अगर हम इतने पागल नहीं हैं कि उन्हें ख़ुश करने के लिए , सड़कों पर लड़ने के लिए प्रवृत्त किये जा सकें , तो फिर उनके लिए अंत में एक यही चारा रह जाता है कि खुद ही इस सांघातिक कानूनियत के बंधन को तोड़ अपने को मुक्त करें ।
इस बीच वे सत्ता उखाड़ फेंकने के खिलाफ नए - नए कानून बना रहे हैं। फिर हर चीज उलट-पुलट जाती है । आज के ये उखाड़ फेंकने के कट्टर विरोधी लोग क्या स्वयं कल के उखाड़ फेंकने वाले नहीं हैं ? 1866 के गृहयुद्ध को क्या हमने भड़काया ? हनोवर के राजा , हेसन के राजा और नस्साऊ के ड्यूक को क्या हमने उनकी पुश्तैनी , कानूनी मिल्कियत , उनकी रियासतों से निकालकर इन रियासतों को बलात संयोजित कर लिया ? जर्मन महासंघ तथा तीन-तीन शाही सल्तनतों के ये उखाड़ फेंकने वाले अब उखाड़ फेंकने की शिकायत करते हैं ! ग्राक्ख राजद्रोह की शिकायत करें , यह कौन बर्दाश्त करेगा ? बिस्मार्क की पूजा करने वाले उखाड़ फेंकने की निंदा करें , यह कौन सहन कर सकता है ? फिर भी उन्हें अपने उखाड़ फेंकने विरोधी विधेयक पेश करने दीजिए , उन्हें और भी सख्त बनाने दीजिए , पूरे फौजदारी कानून को रबड़ की तरह खींचने - मरोड़ने दीजिए , इससे उन्हें अपनी बेबसी के सबूत के सिवा और कुछ नहीं हासिल हो सकता । अगर वह सामाजिक-जनवाद पर करारी चोट करना चाहते हैं , तो उन्हें इनके अलावा दूसरी ही तरह की कार्रवाइयां करनी होंगी । इस समय जो सामाजिक-जनवादी उखाड़ फेंकना , कानून का पालन करते हुए बखूबी चल रहा है उससे वे अमन की पार्टियों के उखाड़ फेंकने द्वारा , जो कानून को तोड़े बिना नहीं चल सकता , ही निबट सकते हैं । प्रशियाई नौकरशाह श्री रोस्सलर और प्रशियाई जनरल श्री फॉन बोगुस्लाव्स्की ने , उन्हें जो तरीका सुझाया है , वही एक तरीका है जिससे मजदूरों को , जो सड़कों पर निकल कर लड़ने से साफ इनकार करते हैं , काबू में लाना शायद अब भी संभव हो सकता है । यह तरीका है : संविधान का उल्लंघन , अधिनायकत्व , निरंकुश शासन की पुनर्स्थापना , 'बादशाह की मर्जी ही सबसे बड़ा कानून है '! इसलिए महानुभावो , हिम्मत से काम लीजिए , यहां अधकचरेपन से काम नहीं चलेगा , यहां जो करना है वह मुकम्मल ढंग से करना पड़ेगा ! लेकिन यह न भूलिएगा कि सभी लघु राज्यों की तरह और सामान्यतः सभी आधुनिक राज्यों की तरह जर्मन साम्राज्य भी एक संविदा का फल है : पहले तो राजाओं की एक दूसरे के साथ संविदा का और दूसरे राजाओं की जनता के साथ संविदा का फल । यदि इस संविदा को एक पक्ष तोड़ता है तो पूरी संविदा छिन्न-भिन्न हो जाती है; तब जैसा कि बिस्मार्क ने 1866 में इतने खूबसूरत ढंग से हमें दिखाया , दूसरा पक्ष भी उससे बंधा नहीं रह सकता । इसलिए यदि आप जर्मन राज्य के संविधान को तोड़ते हैं , तो सामाजिक-जनवाद आपकी निस्बत जो भी चाहे करने को आजाद होगा और करेगा । लेकिन तब वह क्या करेगा इसके बारे में वह आज आपके सामने बोल पड़ने वाला नहीं है।
-- फ्रेडरिक एंगेल्स , " फ्रांस में वर्ग संघर्ष " के 1895 के संस्करण की भूमिका , लंदन , 6 मार्च,1895
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