Wednesday, 8 June 2022

जाना : दो कविताएँ Kavita Krishnapallavi

जाना : दो कविताएँ

Kavita Krishnapallavi 

(अभी आज सुबह मैंने एक ताज़ा कविता पोस्ट की है:'जाने की क्रिया पर एक पुनर्विचार'!  ठीक इसी से मिलती-जुलती एक कविता मैंने 19 मार्च को लिखी थी -- 'जब भी कोई कहता है -- मैं जा रहा हूँ '! इन कविताओं का मिज़ाज एक लगते हुए भी ज़मीन एकदम अलग-अलग हैं। आज की कविता का संदर्भ आपकी जिंदगी से किसी के जाने के बारे में है, जबकि पहले वाली कविता का संदर्भ किसी राजनीतिक हमसफ़र का साथ छोड़कर पुराने जीवन में वापस लौट जाना है -- घर-गृहस्थी के "सुरक्षित" पारम्परिक घोंसले में! जब समुद्री तूफ़ान चिग्घाड़ते हुए हमला बोलते हैं तो बहुतेरे नाविक अपने साथियों को छोड़कर अपनी नावें तट की ओर मोड़ लेते हैं। सामाजिक क्रान्तियों में भी, कठिन चुनौतियों के दौरों में अक्सर ऐसा देखा जाता है। हमारे एक बुज़ुर्ग कामरेड कहा करते हैं कि क्रान्तिकारी उन पर्वतारोहियों के समान होते हैं जो अपना बेस कैम्प जलाकर आगे बढ़ते हैं। बर्फीले तूफ़ानों में या तो वे सदा के लिए विलुप्त हो जाते हैं, या फिर चोटी तक पहुँचते हैं। जो अपना बेस कैम्प बचाये रखते हैं वे तूफ़ान आने पर साथियों को छोड़कर पीछे लौट जाते हैं। बहरहाल, अब आप इस कविता की तहों में भी उतरिए और जीने के अलग-अलग फ़लसफ़ों के बारे में कुछ चिंतन-मंथन कीजिए!)
**

जब भी कोई कहता है-- 'मैं जा रहा हूँ'
 
(केदारनाथ सिंह की कविता 'जाना' पढ़ते हुए कुछ और बातें)
*
जब भी कोई कहता है-- 'मैं जा रहा हूँ' 

मत कहना --'जाओ !'

यह भी मत कहना -- 'मत जाओ !'

न ही यह कहना कि आज जाने की 

ज़िद ना करो ।

जिसने तरह-तरह के जीवन से लोगों का 

जाना देखा है तरह-तरह से

उसे किसी का किसी भी तरह से  जाना 

ख़ौफ़नाक क्रिया नहीं लगता। 

बस ज्यादा से ज्यादा एक 

अनिवार्य त्रासदी लगता है

या जीवन की एक सामान्य गति !

.

जो तय कर लेता है जाने के बारे में

वह अधिक से अधिक कुछ समय के लिए 

स्थगित कर सकता है अपना फ़ैसला

लेकिन अंततः उसे जाना ही होता है

और अगर वह रुक भी जाता है 

कुछ समय के लिए

तो उसकी उपस्थिति बहुत 

यंत्रणादायी होती है

लगातार यह अहसास कराती हुई कि

आख़िरकार जब एक बार यह विचार 

आ ही गया उसके मन में

तो फिर वह चला क्यों नहीं गया !

.

जो यात्राएँ करते रहते हैं आजीवन 

शहर दर शहर, एक सपने से दूसरे सपने तक,

जो शहरों और दिलों से बार-बार 

निर्वासित किये जाते हैं, 

वे अगर आने या जाने को

दिल पर लेने लगें तो जीवन 

एक दण्ड-द्वीप बनकर रह जायेगा ।

.

अक्सर यह भी होता है कि लोग 

बिना यह जाने ही चले जाते हैं 

कि उन्हें जाना कहाँ है ! 

अक्सर ऐसे लोग कहीं हवा में विलीन हो जाते हैं 

और किसी के पास उनकी कोई तस्वीर

 या याद तक नहीं होती

या फिर लोग उन्हें कुछ ऐसे रूपों में याद करते हैं 

जैसा कि वे हुआ ही नहीं करते थे ।

कई वापस लौटते हैं अतीत की ओर 

और कभी भी 

अपने पुराने ठिकाने पर नहीं पहुँच पाते ।

कई अपनी पुरानी ज़िन्दगी के आसपास के निर्जन में 

जीवन भर भटकते रह जाते हैं और 

कइयों को अपनी पुरानी बस्ती का एक भी इंसान, 

कुत्ता या लैम्पपोस्ट, या यहाँतक कि 

टाउनहॉल का पुराना घण्टाघर भी 

पहचान में नहीं आता ।

कुछ होते हैं जो एक लम्बी यात्रा में

सहयात्रियों का साथ छोड़ 

अपने किसी नये निजी सपने का पीछा करते हैं 

और फिर एक दिन पाते हैं कि वह 

एक विद्रूप प्रहसन है 

उनके ही पुराने जीवन के  सपनों का !

.

जब भी कोई स्त्री या पुरुष कहता है कि

 तुम्हारी बाँहों का घेरा 

मेरे लिए दुनिया की सबसे सुरक्षित और 

सुकूनतलब जगह है,

समझ लो, वह दुनिया का बेहद कमज़ोर प्राणी है जिसे 

मिथ्याभासों में जीने की आदत है

और जल्दी ही वह एक भयंकर हादसे का 

शिकार होने वाला है ।

.

बहुत जल्दी ही बास मारने लगता है 

वह एकांतिक प्यार जो

मुक्ति के सपनों, सृजन और संघर्षों का

 विकल्प बनने का दुस्साहस करता है ।

वह बीहड़ लड़ाइयों,पराजयों,

विफलताओं,

तात्कालिक निरुपायताओं और शिथिलताओं 

और मायूसियों के दौर में 

एक शीतल छाँव का लालच देकर 

एक मायावी जादूगर की तरह लुभाकर पास बुलाता है ।

प्रेमिल बाँहों के शरण्य का लालच हमेशा 

योद्धाओं और खोजी यात्रियों को 

जादूगर के पिंजरे का तोता बना  देता है

जिसकी या तो किसी तंत्र-साधना में बलि दी जाती है

या फिर उसे रोज़ाना एक-एक पंख के बदले 

पेट भरने के लिए थोड़े से दीमक दिये जाते हैं । 

यह सब कुछ इसतरह होता है कि 

जादूगर का कैदी अपने को वास्तव में 

तोता ही महसूस करने लगता है 

एक ऐसा तोता जो अपने सारे पंखों के

 सौदे के पहले ही

उड़ने और आज़ाद होने के बारे में सोचना 

हमेशा के लिए बंद कर चुका होता है ।

**
(19 मार्च'2021)

*** *** ***

जाने की क्रिया पर एक पुनर्विचार

.

जिसने जाने का तय कर लिया है

अंततः वह जायेगा ही

चाहे उससे जाने की ज़िद छोड़ देने की

जितनी भी मिन्नतें कर लो।

बेहतर है कि जाने वाले को 

जाने दिया जाये और यह ध्यान रखा जाये कि

दरवाज़े पर पड़ती किसी अनजान  मुसाफ़िर की 

एक भी दस्तक अनसुनी न रह जाये ।

जाना चाहे जितना भी तकलीफ़देह हो

यह हिन्दी की सबसे ख़ौफनाक क्रिया 

कत्तई नहीं है । 

यह उतनी ही नैसर्गिक क्रिया है

जितना कि आना ।

जब कोई कहीं से जाता है

तो कहीं वह आता है

और कोई अगर कहीं से जाता है

तो कोई  आता भी है।

और सबसे अहम बात यह है कि

जीवन में जुदाई, उदासी, दुखों और

अधूरी, अनकही छूट गयी कथाओं  की कसक का 

जो ज़रूरी, गरिमामय, उदात्त और

काव्यात्मक स्थान है, 

उन्हें तो स्वीकार किया ही जाना चाहिए

बिना किसी कायरता और कातरता के !

(7 जून'2021)


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