दहेज एक उपहार है जो दुल्हन को उसके परिवार द्वारा दिया जाता है। यह कई देशों में एक प्राचीन रिवाज है। लेकिन अब दहेज वधू परिवार पर एक बोझ बन गया है और दूल्हे परिवार द्वारा शादी के प्रस्ताव को स्वीकार करने की शर्त के रूप में मांगा जाता है, विशेष रूप से दक्षिण एशियाई देशों जैसे भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश आदि में। दहेज वास्तव में इस्लामी संस्कृति का हिस्सा नहीं है लेकिन अब मुस्लिम परिवारों में भी यह आम हो गया है। मुसलमान जो भारत में और पड़ोसी देशों में रह रहे हैं, इस बुरी प्रथा से प्रभावित हैं, और धीरे-धीरे दहेज को अपने जीवन के अंग के रूप में स्वीकार कर चुके हैं।
भारत और पाकिस्तान में हजारों महिलाएं दहेज हत्या की शिकार होती हैं। मुस्लिम समुदाय के बीच लालच अपने चरम पर पहुँच चुका है तथा अब इसे शरीयत के सिद्धांतों या यहां तक कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड द्वारा पारित मॉडल निकाहनामा की योग्य शर्तों पर भी वरीयता दी जा रही है। दहेज एक तोहफा है जो देने वाले की अपनी मर्ज़ी के अनुसार होना चाहिए, लेकिन इसे अब दूल्हे के पक्ष द्वारा अपना अधिकार समझा जाने लगा है, इस प्रकार मांगे जाने पर यह हिंसा का कारण बन जाता है। यदि दुल्हन अपने दहेज की आर्थिक मांग को पूरा नहीं कर पाती है, तो उसे दूल्हे के परिवार द्वारा यातना, उत्पीड़न और मौत का सामना करना पड़ता है। दहेज हर साल हजारों महिलाओं की हत्या के लिए जिम्मेदार होता है। यूएनएफपीए का अनुमान है कि दुनिया भर में 5000 महिलाओं की हर साल जला कर हत्या कर दी जाती है, और इन हत्याओं को "रसोई दुर्घटनाओं" का रूप दे दिया जाता है, क्योंकि उनके दहेज को अपर्याप्त माना जाता है।
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