इसके अलावा दुनिया के सभी क्षेत्रों में महिलाओं और लड़कियाँ बलात्कार की शिकार होती हैं। मुस्लिम कट्टरपंथियों के अनुसार, या तो बलात्कार का कोई अस्तित्व ही नहीं है या बलात्कार करने वाली महिलाएँ अपने ऊपर हुए यौन हमले के लिए स्वयं जिम्मेदार होती हैं, इसलिए वे दंड की अधिकारी हैं। सऊदी अरब के एक उपन्यासकार और स्तंभकार बदरिया अल बिशर कहते हैं, "कभी-कभी मर्दों द्वारा परेशान किए जाने के लिए लड़कियों को ही दोषी ठहराया जाता है"। उनके अनुसार, "कोई भी लड़की जो अपनी आंखों या चेहरे को उजागर करती है, या अपने अबाया को असामान्य शैली में पहनती है, या दोपहर का भोजन करने अपने सहकर्मियों के साथ अपने कार्यस्थल के पास की किसी जगह चली जाती है, उसे पुरुषों द्वारा परेशान किए जाने के लिए खुद को दोषी ठहराना चाहिए"।
यही कारण है कि अधिकांश मुस्लिम देशों में बलात्कार को गंभीर अपराध नहीं माना जाता। सीरिया में ह्यूमन राइट्स वॉच की एक रिपोर्ट के अनुसार, सरकारी बल और सशस्त्र मिलिशिया घरेलू छापेमारी के दौरान और हिरासत केंद्रों में महिलाओं का यौन शोषण करते हैं। सऊदी अरब में बलात्कार पीड़ितों पर व्यभिचार का आरोप लगने का खतरा होता है। यमन में बलात्कार से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए कोई भी कानून नहीं है। सोमालिया में 2012 में आंतरिक रूप से विस्थापित लोगों के शिविरों में 1700 महिलाओं का बलात्कार किया गया था। बहरीन दंड संहिता के अनुसार यदि कोई बलात्कारी अपनी पीड़िता से शादी कर लेता है, तो वह सजा से बच सकता है। इस क्षेत्र के अन्य कई देशों की दंड संहिता में भी ऐसे प्रावधान हैं, जो बलात्कारी के अपनी पीड़िता से शादी करने के लिए सहमत होने पर पुलिस और न्यायाधीशों को अधिकृत करते हैं कि वे उसके खिलाफ आरोप खारिज कर दें। पीड़िताएँ अक्सर इस डर से भी बलात्कार की रिपोर्ट नहीं करती हैं कि उन पर व्यभिचार का आरोप लगा दिया जाएगा। 13 साल से भी कम उम्र की जाने कितनी ही लड़कियों को व्यभिचार के लिए पत्थर मार-मार कर मार डाला गया है।
भारत सहित अधिकांश देशों में, पति द्वारा पत्नी के बलात्कार को अपराध नहीं माना जाता, पतियों को हर समय अपनी पत्नियों के शरीर पर पूर्ण अधिकार होता है।
भारत में बलात्कार महिलाओं के खिलाफ चौथा सबसे आम अपराध है। यद्यपि बलात्कार के अधिकांश मामले परिवार और स्वयं महिला के सम्मान के कारण दर्ज ही नहीं किए जाते हैं, और यदि कोई महिला पुलिस के पास जाने और बलात्कार की रिपोर्ट करने का साहस दिखाती है, तो उस पर बेशर्म होने का आरोप लगा दिया जाता है और उससे एक वेश्या की तरह व्यवहार किया जाता है। बलात्कार के ज्यादातर मामलों में खुद महिलाओं पर ठीक से कपड़े न पहनने या दुराचार का आरोप लगा दिया जाता है।
आम धारणा के विपरीत, ज्यादातर बलात्कार अंधेरी गलियों या अपरिचित माहौल में ही नहीं होते, वास्तव में लगभग 60 प्रतिशत घटनाएं पीड़िता के घर या किसी दोस्त या रिश्तेदार के घर में होती हैं। अक्सर पीड़िताएँ अपने बलात्कारियों से परिचित होती हैं।
यहां मैं मुजफ्फरनगर के एक गांव की मुस्लिम महिला इमराना की कहानी का उल्लेख करना चाहूंगी, जिसके साथ उसके ही ससुर ने बलात्कार किया था, और पूरे मामले पर समाज और कट्टरपंथी मौलानाओं द्वारा कैसे प्रतिक्रिया की गई थी। उसने साहस कर के अपने ससुर के खिलाफ आपराधिक शिकायत दर्ज कराई, जिसके लिए उसे और उसके गरीब मजदूर पति को उसके ससुर और उसके पड़ोसियों ने बहिष्कृत कर दिया था, जिन्होंने उस पर झूठी शिकायत दर्ज करने का आरोप लगाया था। तमाम मुश्किलों के बावजूद उसने न्याय के लिए अपना प्रयास जारी रखा। अंत में ससुर को दोषी ठहराया गया। कहानी में मुख्य मोड़ दारुल उलूम देवबंद द्वारा दिया गया "फतवा" था जो कहता था, "बलात्कार को देखते हुए, यह महिला अपने पति के लिए "हराम" हो गई है, अब उसे बलात्कारी ससुर के साथ रहना होगा।"
एक महिला के साथ हुए यौन उत्पीड़न पर हमारे एक कट्टरपंथी इस्लामी नेता का यह नज़रिया था। आइए देखें कि रेप के मुद्दे पर दूसरे नेता क्या कहते हैं।
वरिष्ठ मुस्लिम मौलवी शेख ताज दीन अल हिलाली ने उन पहिलाओं की तुलना मांस से की है, जो पर्दे में नहीं होती हैं। सिडनी की एक मस्जिद में रमजान के एक खुतबे में, उन्होंने कहा कि सामूहिक बलात्कार के आरोप में हाल ही में कई वर्षों के लिए जेल में डाले गए मुस्लिम पुरुषों का एक समूह निर्दोष है। उन्होने कहा, "यदि तुम मांस को निकाल कर बाहर सड़क पर या बगीचे में या पार्क में या पिछवाड़े में बिना ढके खुला रख दो, और बिल्लियाँ आकर उसे खाएँ, तो यह किसकी गलती है, बिल्लियाँ की या खुले मांस की।"
इसी तरह, समाजवादी पार्टी के नेता श्री अबू आसिम आजमी ने दिल्ली सामूहिक बलात्कार मामले पर कहा, "इस्लाम में बलात्कार के लिए फांसी की सजा दी जाती है। लेकिन यहां महिलाओं को कुछ नहीं होता, सिर्फ पुरुषों को होता है। जबकि औरतें भी दोषी हैं...समाधान यही है, कि कोई भी महिला चाहे विवाहित हो या अविवाहित, चाहे अपनी मर्ज़ी से जाए, या बिना मर्जी के, उसे फांसी पर लटका दिया जाना चाहिए।"
इसी तरह, समाजवादी पार्टी के नेता श्री अबू आसिम आजमी ने दिल्ली सामूहिक बलात्कार मामले पर कहा, "बलात्कार "इंडिया" में होते हैं, भारत में नहीं" आगे उन्होंने यहाँ तक कहा कि देश में छोटी स्कर्ट या बदन उघाडू कपड़े पहनना अपराध माना जाना चाहिए। उनके अनुसार महिलाओं के द्वारा पहने जाने वाले कपड़े ही बलात्कार का कारण बनते हैं। उन के ही शब्दों में, "यदि पेट्रोल और आग को एक साथ रखा जाएगा तो वह जलेगा ही। यह सुनिश्चित करने के लिए एक कानून होना चाहिए कि नंगापन अपराध हो। जो महिलाएं कम कपड़े पहनती हैं, उन पर प्रतिबंध लगाना चाहिए।"
बलात्कार हमेशा वासना के कारण नहीं होते। कभी-कभी वे पीड़ित को सबक सिखाने के लिए हथियार के रूप में भी इस्तेमाल होते हैं, जैसा कि कुछ मामलों में देखा गया है, सांप्रदायिक दंगों में बलात्कार का इस्तेमाल शक्ति और आक्रामकता के प्रतीक के रूप में किया जाता है, जहां महिलाओं को मारने से पहले उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया जाता है। भारत के विभाजन के दौरान, लगभग 100,000 महिलाओं के अपहरण और बलात्कार का दावा किया गया था। जम्मू-कश्मीर में बलात्कार और सामूहिक दुष्कर्म के आरोप लगाए जाते हैं। रिपोर्टों से पता चला है कि भारतीय सशस्त्र बलों और इस्लामी आतंकवादी समूहों, दोनों द्वारा बलात्कार किया जाता है। हाल के वर्षों में सांप्रदायिक दंगों के दौरान कई बार बलात्कार हुए हैं। 2002 के गुजरात दंगों के दौरान दंगाइयों द्वारा महिलाओं के साथ बलात्कार किए गए थे। यहां तक कि गुजरात में हिंदू कट्टरपंथी ताकतों द्वारा मुस्लिम महिलाओं के शवों को भी विशेषतः यौन रूप से लक्षित किया गया था। 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों के दौरान बलात्कार और हमले के 13 मामले दर्ज किए गए थे। यह पुरुष प्रधान समाज का कुरूप चेहरा है, जो किसी भी तरह से महिलाओं पर अत्याचार करता है।
यौन गतिविधियों में शामिल युवतियों के स्वास्थ्य को हमेशा खतरा होता है। दुनिया भर में 15 से 19 साल की लगभग 1.4 करोड़ महिलाएं और लड़कियां हर वर्ष बच्चों को जन्म देती हैं। कम आयु में गर्भधारण और बच्चे के जन्म का किशोरी माताओं पर गंभीर परिणाम होता है, जिसमें प्रसूति संबंधी जटिलताएँ, नालव्रण और मृत्यु भी हो सकती है। बाल वधुओं को बच्चे के जन्म के समय मृत्यु का अधिक खतरा होता है। 20-24 वर्ष की आयु की महिलाओं की तुलना में 15 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों के बच्चे को जन्म देते समय मरने की संभावना पांच गुना अधिक होती है। बड़ी उम्र के पुरुषों से संभोग युवा महिलाओं के लिए कई जोखिम पैदा करता है। बड़ी उम्र के पुरुषों से संभोग में शामिल लड़कियों और महिलाओं में कंडोम के उपयोग पर बातचीत करने की क्षमता बहुत कम हो जाती है, जिससे उन्हें एचआईवी संक्रमण के लिए उच्च जोखिम होता है। इस प्रकार 15-24 वर्ष की आयु की युवा महिलाओं में 15-24 आयु वर्ग के युवा पुरुषों की तुलना में एचआईवी से संक्रमित होने की संभावना तीन गुना अधिक होती है।
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