लड़कियों का शारीरिक और यौन शोषण दुनिया भर में एक गंभीर चिंता का विषय है और इस काम में कई संस्कृतियां शामिल हैं। लेकिन कई इस्लामिक देशों में बाल विवाह एक बहुत ही आम प्रथा है। लड़कियों के अभिभावकों द्वारा विभिन्न व्यक्तिगत लाभों के लिए या विवाह पूर्व यौन संबंधों को रोक कर पारिवारिक सम्मान को बनाए रखने के इरादे से अक्सर वयःसंधि की उम्र से भी काफी कम उम्र में उसकी शादी जबरन बड़ी उम्र के (कभी-कभी 50 या उससे भी अधिक आयु के) लोगों से कर दी जाती है।
इस्लाम लड़कियों की शादी में सहमति के बारे में चाहे जो कुछ भी कहे, लेकिन इस्लाम के कट्टरवादियों इसे अनिवार्य बना दिया है, इसलिए बाल विवाह और जबरन विवाह उनके अनुसार कानूनी हो गया है और अब यह कोई अपराध नहीं माना जाता। इस मामले पर मौलाना अशरफ अली थानवी ने लिखा है, "कोई भी शादी सिर्फ दो शब्दों से की जा सकती है, उदा॰ एक व्यक्ति गवाह की उपस्थिति में कहता है, "मैं अपनी बेटी को तुम्हें शादी में देता हूं"। जिस व्यक्ति को संबोधित किया जाता है वह जवाब देता है, "मैं उसे शादी में स्वीकार करता हूं"। ऐसा करने से विवाह वैध हो जाता है…… यदि कोई लड़का या लड़की अपरिपक्व है, तो वे खुद विकल्प नहीं चुन सकते। ऐसे लड़के या लड़की पर वली (अभिभावक) का पूरा अधिकार है।"
शादी, तलाक और रिश्तों पर इस्लामिक नेता और ईरान के पूर्व राष्ट्रपति आयतुल्ला खुमैनी की धार्मिक शिक्षाओं के अनुसार, "एक आदमी 9 साल से कम उम्र की लड़की से शादी कर सकता है, भले ही लड़की अभी भी स्तनपान कर रही हो। हालांकि किसी पुरुष को 9 वर्ष से कम उम्र की लड़की के साथ संभोग करने से मना किया जाता है, अन्य यौन क्रियाएँ, जैसे कि पूर्व क्रियाएँ, मर्दन, चुंबन और गुदा मैथुन की अनुमति है। अमन ने 9 साल से कम उम्र की लड़की के साथ संबंध बनाकर कोई अपराध नहीं किया है, बल्कि केवल एक उल्लंघन किया है। अगर लड़की स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त नहीं हुई है (ज़रा इस्तेमाल किए गए शब्दों को देखें) तो पुरुष को जीवन भर उसकी देखभाल करनी चाहिए, लेकिन यह लड़की उस आदमी की चार स्थायी पत्नियों में से एक नहीं मानी जाएगी।
2013 में अक्टूबर में अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस के अवसर पर प्रकाशित "स्टोलन लाइव्स, एम्प्टी क्लासरूम: एन ओवरव्यू ऑन गर्ल्स मैरिज इन द इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान" नामक एक रिपोर्ट में, डबल्यूएलयूएमएल के पार्टनर जस्टिस फॉर ईरान (जेएफ़आई) ने लिखा है कि अकेले 2012 में 10 साल से कम उम्र की कम से कम 1500 लड़कियों को शादी के लिए मजबूर किया गया था। 2005 के आंकड़ों के अनुसार बांग्लादेश में 45 प्रतिशत महिलाओं की शादी 15 साल की उम्र तक हो जाती है। जर्मनी में 3000 से अधिक महिलाओं और लड़कियों, जिनमें से अधिकांश मुस्लिम परिवारों से हैं और उनमें से कई नाबालिग हैं, को पिछले एक वर्ष के दौरान जबरन विवाह का सामना करना पड़ा। उत्तरी नाइजीरिया में बाल विवाह की दर दुनिया में सबसे अधिक है। 2003 में इंटरनेशनल सेंटर फॉर रिसर्च ऑन वीमेन ने अनुमान लगाया कि 18 साल से कम उम्र की 5.1 करोड़ से अधिक लड़कियों की शादी हो चुकी है और उन्हें उम्मीद है कि अगले 10 वर्षों में यह आंकड़ा बढ़कर 10 करोड़ से अधिक हो जाएगा। जबकि दुनिया के सभी क्षेत्रों में समाज के सबसे धनी तबकों में जबरन और जल्दी विवाह कम आम होते जा रहे हैं, वे अभी भी अफ्रीका और दक्षिण एशिया में सबसे आम हैं, लेकिन मध्य और पूर्वी यूरोप के कुछ क्षेत्रों और दुनिया के कुछ अन्य हिस्सों में अब भी जारी हैं। । अफगानिस्तान स्वतंत्र मानवाधिकार आयोग का अनुमान है कि अफगानिस्तान में 38 प्रतिशत से अधिक महिलाएं जबरन विवाह की शिकार हुई हैं। यूनिसेफ का कहना है कि 54 फीसदी अफगान लड़कियां कम उम्र में शादी की शिकार हैं।
चूंकि अधिकांश मुस्लिम समाज और परिवारों की प्रकृति पर्दे वाली और अपने खोल में बंद समाज की है, अतः अधिकांश जबरन विवाह पीड़िताएँ अपने परिवारों या समुदायों के खिलाफ बोलने या उनका विरोध करने से बचती हैं, अतः इस प्रकार की शादियों के अनौपचारिक होने के कारण और इन का दस्तावेजीकरण न होने के कारण विश्वसनीय आंकड़े संकलित करना मुश्किल होता है, विश्वसनीय डेटा के लिए एक और बाधा बन जाती है। दक्षिण एशिया में यूनिसेफ का अनुमान है कि 15 से 24 वर्ष की 48% महिलाओं की शादी 18 वर्ष से पहले हो गई थी। पीड़िताओं के पास जन्म प्रमाण पत्र न होने के कारण भी वह साबित नहीं कर सकतीं कि वे बाल विवाह की शिकार हैं।
जबरन और कम उम्र में विवाह को मानवाधिकारों का उल्लंघन माना जाता है। बाल विवाह में ऐसे तत्व शामिल होते हैं जो यौन दासता की स्थिति के समान होते हैं। बाल विवाह हिंसा का एक रूप है, जो एक लड़की के भविष्य के साथ बलात्कार करता है और उसका बचपन चुरा लेता है और उसे स्कूल छोड़ने और शारीरिक रूप से तैयार न होने पर भी माँ बनने के लिए मजबूर करता है। ह्यूमन राइट्स वॉच के अनुसार कई अविवाहित महिलाएं और लड़कियां आसन्न जबरन विवाह से बचने के लिए अपने घर से भाग जाती हैं। ऐसी महिलाओं को तथाकथित "नैतिक अपराधों", जैसे कि भागने या "ज़िना का प्रयास" करने के आरोप में अक्सर जेल की सज़ा भुगतनी पड़ती है।
एक आरटीआई आवेदक को उपलब्ध कराए गए आंकड़े भारत में महिलाओं की स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। आंकड़ों के अनुसार 2001-2002 के दौरान 18,033 शादियां हुईं, जिनमें से 352 में दुल्हन 13 और 14 साल की लड़कियां थीं, जबकि 918 में 14 से 15 साल की उम्र की लड़कियां थीं। कुल मिला कर 2450 विवाहों में दुहां 15 से 16 वर्ष की आयु की लड़कियां थीं और 7450 विवाहों में लड़कियों की उम्र 16 से 17 वर्ष की थी। उस वर्ष 17-18 वर्ष के आयु वर्ग में अधिकांश विवाह कुल 15,282 हुए थे। इसी तरह का आंकड़ा 2002- 2003 के लिए भी दर्ज किया गया है।
दिलचस्प बात यह है कि 2008 में अधिकांश शादियों में दुल्हन मुस्लिम लड़कियां थीं, जबकि बाल विवाह में शामिल 4955 दुल्हनों में से 4249 मुस्लिम थीं। पीटीआई के अनुसार, गुजरात और आंध्र प्रदेश को एक ही वर्ष में ऐसी 40 प्रतिशत घटनाओं के लिए कारण बाल विवाह में देश में शीर्ष दो स्थानों पर होने का गौरव प्राप्त हुआ है।
हालांकि भारत में लड़कियों के लिए शादी की कानूनी उम्र 18 साल है, लेकिन हैदराबाद में लगभग 2।4 करोड़ बालिका वधुएँ हैं, जहां के दो तिहाई निवासी गरीबी रेखा से नीचे रहते हैं। भारत के अंदर और बाहर दोनों जगह के धनी पुरुष इस तरह की प्रचंड गरीबी का लाभ उठाते हैं और नकद के बदले माता-पिता को अस्थायी विवाह अनुबंध पर हस्ताक्षर करने का लालच देते हैं। वे लड़की से शादी करते हैं, थोड़े समय के लिए हैदराबाद में रहते हैं, जिस दौरान वे उसका बलात्कार और शोषण करते हैं, और फिर अपनी दुल्हन को छोड़ कर शहर से चले जाते हैं। यहाँ लड़कियों का कई बार शादी करने के लिए मजबूर किया जाना आम बात है।
इस नाजुक मामले पर सियासत जारी रहती है और अगर शादी मुस्लिम समुदाय में होती है तो वे दावा करते हैं कि उस पर कार्यवाही करना उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर है। बाल विवाह की प्रथा को अक्सर धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं और परंपराओं के नाम पर सही ठहराने की कोशिश की जाती है।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि लड़कियों की शादी की उम्र तय करने का कोई सीधा फार्मूला नहीं है, जो हर मामले में फिट हो सके। यह टिप्पणी राष्ट्रीय महिला आयोग द्वारा दिल्ली और आंध्र प्रदेश के उच्च न्यायालयों के फैसले के खिलाफ दायर एक याचिका को खारिज करते हुए की गई थी, जिसमें क्रमशः 2006 और 2005 में दो विशिष्ट मामलों में विवाह-पूर्व आयु में हुए एक विवाह जायज़ करार दिया गया था। यह निर्णय दो मूलभूत प्रश्नों को जन्म देता है, जो, अगर भारत अपने सभी नागरिकों के लिए समानता और समान व्यवहार का अधिकार सुनिश्चित करना चाहता है, तो अवश्य ही पूछे जाने चाहिए: कि क्या मुस्लिम लड़कियां इंसान नहीं हैं? या भारत में रहने वाली मुस्लिम लड़कियां भारतीय नहीं हैं? यह विडंबना ही है कि जब भारत ने बाल यौन शोषण से निपटने के प्रयास में सेक्स के लिए सहमति की उम्र 16 साल से बढ़ाकर 18 साल करने का प्रस्ताव रखा, तो उच्च न्यायालय ने यह फैसला सुनाया कि मुस्लिम लड़की को इस तरह के कानूनी संरक्षण की जरूरत नहीं है।
......जारी
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