महिलाओं के सम्मान और पवित्रता से जुड़ी हिंसा का एक और रूप फ़ीमेल जेनाइटल म्यूटिलेशन अर्थात महिला जननांग विकृति (एफजीएम) या महिला खतना है, जो हर साल लाखों युवा महिलाओं को गंभीर चोट पहुंचाता है। इसमें गैर-चिकित्सीय कारणों से महिलाओं के जननांगों के सभी या कुछ हिस्सों को हटा दिया जाता है। इसे परिवार के सम्मान के नाम पर विवाह तक कौमार्य की सुरक्षा और सामाजिक एकता कायम रखने के नाम पर न्यायसंगत ठहराया जाता है।
हर साल दुनिया भर में लगभग 14 करोड़ महिलाओं और लड़कियों का महिला जननांग विच्छेदन होता है और अफ्रीका में लगभग 30 लाख लड़कियों को इस प्रक्रिया का से गुजरना पड़ता है। 2005 के एक अध्ययन में पाया गया कि मिस्र में 15 से 49 वर्ष की लगभग 90 प्रतिशत महिलाओं का एफजीएम हुआ था। सीरियन नेटवर्क ऑफ ह्यूमन राइट्स में बलात्कार और महिला खतना के 5000 से अधिक मामले दर्ज किए गए हैं। सूडान में 12.1 मिलियन महिलाएं महिला जननांग विकृति की शिकार हैं। सोमालिया में 98 प्रतिशत महिलाएं और लड़कियां एफजीएम से गुजरती हैं। जिबूती में लगभग 93 प्रतिशत महिलाओं को एफजीएम का सामना करना पड़ता है।
यह एक पारंपरिक प्रथा है जो कम से कम 28 अफ्रीकी देशों में बेरोकटोक जारी है। माइनॉरिटी राइट्स ग्रुप इंटरनेशनल के अनुसार, उत्तरी सूडान, इथियोपिया और माली में 90 प्रतिशत और सोमालिया और जिबूती में लगभग 100 प्रतिशत महिलाएँ परंपरागत जननांग छांटने की प्रक्रिया से गुजरती हैं। इन देशों में महिलाओं के जननांगों की सिलाई भी की जाती है, जिसमें योनि के दोनों किनारों को मिला कर किसी तंतु से सिल दिया जाता है या कांटों से जोड़ दिया जाता है, बस एक माचिस की तीली घुसेड़ कर सुई की नोक के आकार का एक छिद्र कूला रहने दिया जाता है। मध्य पूर्व और पाकिस्तान के कुछ हिस्सों में और मलेशिया, भारत और श्रीलंका में महिलाओं के खतने की प्रथा कम है और कुछ ही मुसलमानों में की जाती है।
सिली हुई योनि वाली महिलाओं के लिए, संभोग व्यावहारिक रूप से एक असहनीय बोझ बन जाता है, खासकर शादी की रात में, जिसकी समाप्ति में सप्ताह लग सकते हैं। शुरुआत में पति को अपनी पत्नी की उस सिलाई को उंगलियों या चाकू या परंपरागत तलवार से खोलना पड़ता है। जब तक संभोग के लायक स्थायी छिद्र खुल न जाए, तब तक महिलाओं को पैरों को फैलाकर लेटे रहना पड़ता है। कई महिलाओं के लिए गर्भावस्था इन दर्दनाक और आनंद रहित यौन क्रियाओं से बचने का एक बहाना बन जाती है, जबकि प्रसव स्वयं अपने आप में एक दर्दनाक प्रक्रिया होती है। जब बच्चा बाहर निकलता है तो घाव के ऊतक अक्सर फट जाते हैं। जो महिलाएं अस्पतालों तक पहुंच पाती हैं, उन्हें प्रसव पूर्व और पश्चात दोनों भगछेदन करने पड़ सकते हैं। प्रसव के दूसरे चरण में, कई शिशुओं की मृत्यु हो जाती है या उनके मस्तिष्क को क्षति पहुँचती है, क्योंकि मोटे घाव गर्भाशय ग्रीवा के पर्याप्त फैलाव को रोकते हैं, जिससे बच्चे को बाहर आने में समय लगता है। कई देशों में प्रत्येक गर्भावस्था के बाद योनि की दोबारा सिलाई का भी रिवाज है, ताकि महिलाओं की योनि "कुंवारी लड़की के जैसी तंग" रह सके। हैनी लाइटफुट - क्लेन, जो एक सामाजिक मनोवैज्ञानिक हैं, जिन्होंने सूडान में महिला जननांग विकृति का अध्ययन करने में छह साल बिताए, लिखती हैं कि बिना योनि-सिलाई वाली महिलाओं को डर रहता है कि उनके पति उन्हें छोड़ देंगे। कुछ इसे तरजीह देने का दावा करती हैं। 1989 की अपनी पुस्तक "प्रिजनर्स ऑफ रिचुअल्स" में वह लिखती हैं, "चरम जननांग छेदन के बाद जो कुछ बचता है, वह एक तंग छिद्र होता है, जिसका भरपूर मज़ा लिया जाता है।"
मिस्र की नारीवादी नवल एल सादिया, जो "द हिडन फेस ऑफ ईव: वीमेन इन द अरब वर्ल्ड" की लेखिका हैं, ने छह साल की उम्र में अपने खतना के भयानक अनुभव के बारे में लिखा है। वह एक डॉक्टर के रूप में अपने काम का भी वर्णन करती है, "वहां मुझे अक्सर उन युवा लड़कियों का इलाज करना पड़ता था जो खतना के बाद अत्यधिक खून बहने के कारण बाह्यरोगी क्लिनिक में आती थीं। उनमें से कई इस अमानवीय और आदिम तरीके से किए गए ऑपरेशन के कारण अपनी जान गंवा देती थीं, जो अपने आप में ही काफी क्रूर था। अन्य तीव्र या पुराने संक्रमण से प्रभावित हो जाती थीं जिससे वे कभी-कभी अपने शेष जीवन भर पीड़ित रहती थीं।
इस परंपरा के लिए विभिन्न, अक्सर विरोधाभासी स्पष्टीकरण दिये जाते हैं। मुख्य रूप से, दिये जाने वाले तर्क प्रचलित पौराणिक कथाओं, जैविक और चिकित्सा तथ्यों से अज्ञानता और धार्मिक रूढ़िवादिता को दर्शाते हैं। यह भी सामने आता है कि अक्सर परिवार रिवाज को इस डर से अपनाते हैं, कि उनकी बेटियों की शादी नहीं होगी। बग़ैर खतना की युवा लड़कियों को बहिष्कृत कर दिया जाता है, उन्हें "नापाक" करार दे दिया जाता है तथा उन्हें वेश्या की उपाधि दे दी जाती है। कई समाजों में बिना खतने की महिलाओं से पैदा हुए बच्चों को हरामी माना जाता है, और बिना घाव वाले जननांगों को वेश्यावृत्ति से जोड़ा जाता है। अक्सर बिना खतने वाली महिलाओं को नाजायज माना जाता है, उन्हें धन, मवेशी या जमीन की विरासत में हिस्सा नहीं दिया जाता है, और न ही उन्हें पर्याप्त मेहेर दिया जाता है। एक सोमालियाई महिला ने अपनी पोती की योनि-सिलाई की इच्छा का बचाव करते हुए कहा, "उससे सब कुछ छिन जाएगा। यदि वह सिलाई नहीं करवाएगी, तो वह वेश्या बन जाएगी।" लड़की के पिता, जो एक पढ़ा-लिखा व्यवसायी था, ने अपनी अनिश्चितता व्यक्त की, "हाँ, मुझे पता है कि यह लड़कियों के स्वास्थ्य के लिए बुरा है। लेकिन मैं नहीं चाहता कि मेरी बेटी बाद में मुझ पर दोष मढ़े कि उसकी शादी नहीं हो सकी।
भारत में, एफ़एमजी का व्यापक रूप से रिवाज दाऊदी बोहरा समुदाय में है, जो शिया मुसलमानों का एक संप्रदाय है, जिसका नेतृत्व सैयदना करता है। इस प्रथा का, जिसे स्थानीय रूप से "खतना" कहा जाता है, कोई चिकित्सीय औचित्य नहीं है, लेकिन पारिवार के सम्मान, पुरुष के यौन सुख में वृद्धि, प्रजनन क्षमता में वृद्धि, सामाजिक स्वीकृति (विशेष रूप से विवाह के लिए) और कौमार्य के संरक्षण के नाम पर सांस्कृतिक औचित्य है। भारत में बोहरा मुस्लिम समुदाय एक सुशिक्षित और समृद्ध समुदाय है। आश्चर्य की बात है कि बोहरा मुसलमानों में से कम से कम 70 प्रतिशत या उससे अधिक लोग इस प्रथा पर सवाल उठाए बिना इसका पालन करते हैं।
यह प्रक्रिया परंपरागत रूप से किसी वृद्ध महिला द्वारा की जाती है, जिसे कोई चिकित्सा प्रशिक्षण प्राप्त नहीं होता। इसमें आमतौर पर किसी एनेस्थेटिक और एंटीसेप्टिक का उपयोग नहीं किया जाता है और यह प्रक्रिया आमतौर पर चाकू, कैंची, कांच के टुकड़े या रेजर ब्लेड जैसे बिना विसंक्रमित किए गए बुनियादी उपकरणों का उपयोग करके की जाती है। योनि को कसने और रक्तस्राव को रोकने के लिए अक्सर घाव पर आयोडीन या जड़ी बूटियों का मिश्रण लगाया जाता है।
यहां तक कि बोहरा समुदाय के एक डॉक्टर ने भी माना कि इसके कारण संक्रमण, सूजन, गंभीर रक्तस्राव, सदमा, टिटनेस के कई मामले सामने आते हैं। कुछ मामलों में खतना ठंडापन के लिए भी उत्तरदायी होता है। हालांकि, इस प्रथा को खत्म करने के लिए कोई व्यवस्थित प्रयास नहीं किया गया है, लेकिन समुदाय के दायरे में काम करने वाले कुछ बोहरा डॉक्टरों ने मामले को मजहबी कर्ताधर्ताओं के सामने उठाने की कोशिश की, लेकिन वे सफल नहीं हुए। 1989 में स्थापित बोहरा विमेंस एक्शन फोरम की एक कार्यकर्ता ने बताया कि महिला खतना की प्रथा घृणित है। जैसा कि आज देखा जा रहा है कि सुधारवादी महिलाओं ने संगठनात्मक रूप से महिला खतना पर सवाल नहीं उठाए हैं, लेकिन व्यक्तिगत रूप से बहुत सारी महिलाएं इसका विरोध कर रही हैं, और यह तय कर चुकी हैं कि उनकी बेटियों के साथ यह न होने पाए।
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