Friday, 4 February 2022

औरतें करने लगी हैं इन्कार - कविता

नई भाषा नए 
अर्थ खोजने चली मैं.
भटकते - भटकते
ढूंढने लगी आज़ादी के मायने.

कभी कश्मीर तो कभी फ़िलीस्तीन
कभी अपना घर 
तो कभी अपना मन.

अपने ही वतन में बेवतन किए जाते लोग.
ज़िंदगी की राह में 
जगह - जगह लगे बेहूदे बैरिकेड्स!
तलाशी लेती खुरदुरी निगाहें.
नंगी होती आत्माएं.
बोझ सहा नहीं जाता.

एक पत्थर झन्न से जा टकराता है
दुश्मन की तोप से.
नफ़रत को पढ़ सकने में 
नाकाम हैं मूढ़ सत्ताएं.
रोना आता है बेतरह
और गुस्सा उससे कई गुना ज़ियादा.

ख़लाओं में बिखरने लगती हैं 
चिंगारियां.
के औरतें करने लगी हैं इन्कार.
कभी-कभी तो मां बनने से भी.
पोप फतवा सुनाते हैं झट
स्वार्थी औरतें!
मां नहीं बनेंगी तो 
कैसे करेंगी पितृसता की सेवा निर्बाध!
उधर बैंकों ने बनाए हैं नियम नए
आसन्न प्रसवा नहीं रखी जाएंगी नौकरी पर.

बेचैनी करवटें बदलती है सारी रात.
आज़ादी के मायने बदल जाते हैं 
यकायक.
शब्दकोश में दर्ज कर लिया है
आज़ादी का अर्थ
कश्मीर - फिलीस्तीन
जनता और 
बेचैन औरतों की गु़लामी.

फ़ेहरिस्त काफ़ी लंबी है
प्यार- मुहब्बत - नफ़रत
खुशी - ग़म - उदासी
दुःख
सभी की गढ़नी हैं नई परिभाषाएं- व्याख्याएं.
मुक्ति तो बहुत 
बाद में आएगी शायद.

नष्ट होते देख रही हूं
अपनी आंखों के सामने 
भाषा की सुंदरता
और देख पा रही हूं
सड़ांध में डूबते उतराते उनके अर्थ.
सीझ कर 
झरती जा रही है उनकी रही सही ख़ूबसूरती.
क्योंकि अधिक नहीं बचे उनके वाहक..
नाज़िम, फ़ैज़, मुक्तिबोध
कब तलक देते रहेंगे कांधा.

सदियां लगीं इस अन्यायी भाषा के पनपने में
तो नई भाषा, 
बिल्कुल आज़ाद भाषा 
पकने में लगेगा वक्त न जाने कितना.
जवानियां होंगी कुर्बान.

अपनी ज़िम्मेदारियों का अहसास है मुझे
तराशनी है वो ऊबड़ खाबड़ ज़मीन
जिसमें अंकुआएगी बिल्कुल नई 
भाषा की कोमलतम सुन्दरतम कोंपले
पर बेशक इस बार भाषा होगी सच्ची हसीन
मर्दानगी से मुक्त.
आज़ादी की खुशबू से तरबतर
मुक्ति की दिशा में उंगली उठाए...

#अमिता शीरीं
29.1.22

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