गोरख पांडे की एक रचना
झकझोर दुनिया हो झकझोर दुनिया
जनता की चले पलटनियां
हिले ले झकझोर दुनिया।
हिले ले पहड़वा
हिले ले नदी तलवा
सगरे में उठे रे हिलोरवा
हिले ले झकझोर दुनिया।
लड़े ले गुलमवा लड़े ले मज़लुमवा
लड़े ले गुलमवा लड़े ले मज़लुमवा
लड़े ले ग़रीबवा-बेकमवा
हिले ले झकझोर दुनिया
लड़े ले किसनवां लड़े ले मजदूरवा
लड़े मिलि खुनवां-पसीनवां
हिले ले झकझोर दुनिया
लड़े ली बहिनियां, लड़े महतरिया
लड़े ली बहिनियां, लड़े महतरिया
लड़े सब दिख के संघतिया
हिले ले झकझोर दुनिया
ढहे जमींदरवा, ढहेला पूंजीपतिया
ढहे लूटमार के कानूनवां
हिले ले झकझोर दुनिया
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