नई दिल्ली से प्रकाशित साप्ताहिक अखबार 'मुक्ति संघर्ष' के 30 जनवरी से 5 फरवरी अंक में। *(साथियों, आज 1 फरवरी, इप्टा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष अदाकार ए.के. हंगल की जयंती है।)*
तकरीबन आधी सदी तक हिन्दी फिल्मों में लगातार भले मानुष का किरदार निभाने वाले ए. के. हंगल आज भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके द्वारा की गई 200 से ज्यादा फिल्में, हिंदी रंगमंच, भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) और देश की आज़ादी में अमूल्य योगदान, उनकी याद दिलाता है। अविभाजित भारत के सियालकोट (जो कि अब पाकिस्तान में है) में जन्मे अवतार विनीत कृष्ण हंगल उर्फ ए. के. हंगल की शुरुआती ज़िंदगी, काफी हंगामेदार रही। उनका बचपन और पूरी जवानी संघर्षमय गुज़री। उन्हें बचपन से ही संगीत और नाटक का शौक था। इसके लिए उन्होंने बाक़ायदा उस्ताद खुदाबख़्श से संगीत और महाराज बिशिनदास से तबला बजाने का हुनर सीखा। उनके घर के ही बगल में एक संगीत और नाटक का क्लब 'श्री संगीत मंडल' था। जिसके वे मेंबर बन गए। 1938 या 1939 के दरमियानी साल में उन्होंने अपना पहला नाटक 'जुल्म-ए-कंस' खेला, जो कि उर्दू में था। इस नाटक में उन्होंने 'नारद' की भूमिका निभाई और कुछ गाने भी गाए। आगे चलकर उन्होंने 'हार्मोनिका' क्लब बनाया, जो ज़ल्द ही पूरे कराची शहर में मशहूर हो गया। हंगल प्रत्येक बुधवार को क्लब में संगीत सभाएं आयोजित करते। इन सभाओं में बड़े गुलाम अली, छोटे गुलाम अली जैसे बड़े कलाकार शामिल होते। इसी दौरान उन्होंने अपना पहला नाटक 'प्रायश्चित' लिखा। जो महात्मा गांधी द्वारा छुआछूत के खिलाफ चलाई गई मुहिम से प्रेरित था। नाटक में उन्होंने अभिनय भी किया और यहीं से उनका अभिनय में लगाव बढ़ता चला गया।
ए. के. हंगल स्कूली दिनों से ही नाटक के अलावा क्रांतिकारी कार्यों में भी हिस्सा लेने लगे थे। पेशावर में किस्सा ख़्वानी बाज़ार में अंग्रेजों ने जो नरसंहार किया, वे उस नरसंहार के चश्मदीद गवाह थे। उन्होंने भी इस नरसंहार के प्रतिरोध में अंग्रेजों पर भीड़ से पत्थर बरसाए थे। यही नहीं, क्रांतिकारी भगत सिंह और उनके साथी सुखदेव तथा राजगुरू की शहादत का भी किशोर हंगल के दिलो-दिमाग पर गहरा असर पड़ा। इन क्रांतिकारियों को बचाने के लिए उस वक्त वायसराय को दिये गए, मर्सी पिटीशन पर हस्ताक्षर करने वालों में वे भी शामिल थे। बहरहाल बचपन में घटी इन घटनाओं का हंगल के पूरे जीवन पर बड़ा प्रभाव रहा। अपनी ज़िंदगी के आखिर तक वे बराबर शोषण, अत्याचार और असमानता के खिलाफ लड़ते रहे। उन्हें फिल्मी कलाकार के रूप में जानने वाले ज़्यादातर लोगों को शायद ही यह बात मालूम हो कि ए. के. हंगल ने आज़ादी के पहले से ही कम्युनिस्ट पार्टी और यूनियनों की गतिविधियों में भाग लेना शुरू कर दिया था। इन गतिविधियों का ही नतीजा था कि आज़ादी के बाद उन्हें पाकिस्तान की जेलों में रहना पड़ा। पाकिस्तानी जेलों में दो साल काटने के बाद साल 1949 में वे हमेशा के लिए भारत आ गए। मायानगरी मुंबई को उन्होंने अपनी कर्मस्थली के रूप में चुना और अपने परिवार के जीवनयापन के लिए टेलरिंग शुरू कर दी।
भारत आने के बाद भी ए. के. हंगल का पार्टी और यूनियनों की राजनीति से लगाव नहीं छूटा। वे बंबई की चालों मे कई साल तक रहे। चाल में रहने वाले किरायेदारों की समस्याओं से जब उनका साबका पड़ा, तो इनसे निपटने के लिए उन्होंने किरायेदारों का एक संघ बनाया। बाद में वे दर्जियों के अधिकारों की लड़ाई में कूद गए। उन्होंने बंबई में 'टेलरिंग वर्कर्स यूनियन' का गठन किया और उनकी लड़ाई लड़ी। जब संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन का आगाज़ हुआ, तो उन्होंने आचार्य अत्रे, कॉमरेड एसएम जोशी, कॉमरेड एसए डांगे, एनजी गोरे जैसे शीर्षस्थ नेताओं के साथ इस आंदोलन में हिस्सेदारी की। वे गोवा मुक्ति आंदोलनकारियों में भी शामिल रहे। बाहर से हमेशा शांत और सहज दिखलाई देने वाले हंगल, अंदर से पूरे आंदोलनकारी थे। जहां भी कहीं कुछ ग़लत होता, वे उसके खिलाफ आवाज़ ज़रूर उठाते। उनका आत्मबल कितना मजबूत था, उसे सिर्फ एक उदाहरण से जाना जा सकता है। अभिनय सम्राट दिलीप कुमार को जब पाकिस्तानी सरकार ने अपने सर्वोच्च सम्मान 'निशान—ए—इम्तियाज़' देने का एलान किया, तो शिवसेना ने इसका पुरजोर विरोध किया। पार्टी के सुप्रीमो बाल ठाकरे ने दिलीप कुमार से कहा कि वे यह सम्मान लेने पाकिस्तान नहीं जाएं। बाल ठाकरे के इस फ़रमान से पूरी फिल्मी दुनिया में सांप सूंघ गया। ऐसे माहौल में अकेले ए. के. हंगल ही थे, जो दिलीप कुमार की हिमायत में खुलकर सामने आए। उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा, ''दिलीप कुमार को यह सम्मान लेने पाकिस्तान ज़रूर जाना चाहिए। इससे भारत और पाकिस्तान के बीच संबंधों में मधुरता आएगी।'' इस बयान के बाद दिलीप कुमार के साथ हंगल भी शिवसेना के निशाने पर आ गए। बाल ठाकरे ने फ़तवा जारी कर दिया कि ए. के. हंगल को फिल्मों में कोई काम न दे। इस फ़तवे का असर यह हुआ कि हंगल को काम मिलना बंद हो गया। फिल्मों में अघोषित पाबंदी का यह सिलसिला कोई दो साल तक चला। फिल्मों में काम मिलना बंद हुआ, तो वे फिर टेलरिंग करने लगे, पर नाइंसाफ़ी के आगे बिलकुल नहीं झुके।
आज़ादी के बाद जब 'भारतीय जन नाट्य' संघ यानी इप्टा लगभग टूट रहा था, तब वे ए. के. हंगल ही थे, जिन्होंने इप्टा को पुनर्जीवन दिया। आर. एम. सिंह और रामाराव जैसे साथियों को साथ लेकर उन्होंने इप्टा को फिर खड़ा किया। ए. के. हंगल ने उन सभी कलाकारों से संपर्क स्थापित किया, जिन्होंने विभिन्न कारणों से इप्टा छोड़ दी थी। उनकी कोशिशें रंग लाईं और इप्टा एक बार फिर पहले की तरह काम करने लगा। देखते-देखते कवि शैलेन्द्र, संगीतकार सलिल चौधरी, केन घोष, बलराज साहनी, रमेश तलवार, सागर सरहदी, एम.एस. सथ्यु, शमा ज़ैदी, राजी सेठी, नितिन सेठी, शशि शर्मा, मोहन शर्मा जैसे प्रतिभाशाली कलाकार इप्टा से जुड़ गए। ए. के. हंगल ने आगे चलकर इप्टा के कई नाटकों में निर्देशन व अभिनय किया। इप्टा में वे इस कदर रम गए कि उन्होंने अपने आप को पूरी तरह से नाटकों में डुबो लिया। 'बाबू', 'इनामदार', 'अफ्रीका जवान परेशान', 'इलेक्शन का टिकिट', 'आज़र का ख़्वाब', 'अतीत की परछाईंया', 'ज़वाबी हमला', 'सूरज', 'मुसाफ़िरों के लिए', 'भगत सिंह', 'आखिरी शमां' आदि चर्चित नाटकों में उन्होंने अभिनय किया।
रंगमंच से उनके अभिनय की लोकप्रियता धीरे-धीरे फिल्मी दुनिया तक पहुंची। साल 1962 में बासु भट्टाचार्य ने अपनी फिल्म 'तीसरी कसम' में उन्हें एक छोटी सी भूमिका दी और इस फिल्म के साथ ही उनका फिल्मी करियर शुरू हो गया। अपने फिल्मी करियर में ए. के. हंगल ने ख़्वाजा अहमद अब्बास, एम. एस. सथ्यु, ऋषिकेश मुखर्जी, राज कपूर, देवानंद, गुलजार, रमेश सिप्पी और के. बालाचन्दर जैसे प्रतिभाशाली और प्रयोगशील निर्देशकों के साथ काम किया। इनकी फिल्मों में उन्होंने कई यादगार किरदार निभाये। 'शोले', 'सु राज', 'शौकीन', 'नमक हराम', 'गुड्डी', 'परिचय', 'आंधी', 'गरम हवा', 'एक चादर मैली सी', 'अभिमान', 'कोरा कागज', 'बाबर्ची', 'नौकरी' और 'माउंटबेटन-अंतिम वायसराय' उनकी उल्लेखनीय फिल्में हैं। स्टार अदाकारों से सज़ी इन फिल्मों में ए. के. हंगल ने अपनी अदाकारी से एक अलग ही छाप छोड़ी। फिल्म 'शोले' में निभाया उनका नेत्रहीन 'रहीम चाचा' का किरदार, तो हिंदी सिनेमा का कालजयी किरदार है। फिल्मी दुनिया में ए. के. हंगल ने एक्टिंग की एक जुदा राह अपनाई। उनका झुकाव यथार्थवादी अभिनय की ओर था। फिल्मों में यथार्थवादी अभिनय के लिए उन्होंने अनवीक्षा तथा विभ्रम पद्धति का सहारा लिया। जो कि आगे चलकर बहुत कामयाब हुई। उनका कहना था कि ''एक अच्छे कलाकार को अभिनय में अपने दिमाग का इस्तेमाल करना आना चाहिए। अंधे व्यक्ति के किरदार में अगर हम आंखों की महत्ता नहीं समझेंगे, तब तक अंधे की साइकोलॉजी को भी नहीं समझ पाएंगे। फिर एक बार यदि किसी किरदार की साइकोलॉजी समझ ली, तो समझो कलाकार के अभिनय में स्वाभाविकता अपने आप आ जाएगी।'' ए. के. हंगल की यह बात फिल्म 'शोले' देखकर आसानी से समझी जा सकती है। इस फिल्म में उनका किरदार न सिर्फ अपनी आंखे ढ़ूंढ़ता है, बल्कि डायलॉग भी ढ़ूढ़ता है। गोया कि एक्टिंग में डबल एक्शन क्या होता है ? ए. के. हंगल ने अपनी अदाकारी से यह हमें बतलाया। ए. के. हंगल की पूरी अभिनय यात्रा को यदि देखें, तो अभिनय में उनका विस्तृत अनुभव साफ दिखलाई देता है। ज़िंदगी की पाठशाला से जो कुछ उन्होंने सीखा, उसका इस्तेमाल अपने नाटकों और फिल्मों में किया। इसलिए उनकी एक्टिंग दूसरे अभिनेताओं की बनिस्बत ज्यादा स्वाभाविक और सहज दिखाई देती है। फिल्मों में काम करने के दौरान भी वे बराबर रंगमंच करते रहे। रंगमंच से जुड़े होने के कारण हंगल के अभिनय में सहजता थी। जिसकी वजह से वे हर किरदार में आसानी से ढल जाया करते थे। वे इप्टा के नाटकों में मुसलसल काम करते रहे। इप्टा के सांगठनिक कार्यों में भी वे बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे। उन्होंने इप्टा में कई सांगठनिक पदों पर काम किया। अपने अंतिम समय में भी वे इप्टा के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। उनके नेतृत्व में मुंबई इप्टा एक महत्वपूर्ण गैर व्यावसायिक रंगमंचीय दल के रूप में उभरा। स्वतंत्रता आंदोलन, रंगमंच और फिल्मों में ए. के. हंगल के विशिष्ट योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें साल 2006 में 'पद्म भूषण' सम्मान से सम्मानित किया।
साभार/जाहिदखान, फेसबुक पर
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