Wednesday, 9 February 2022

हिजाब

जालिम ने मारा
बहुत गलत किया
पर मजलूम भी तो सिर उठा कर सीधा खडा हुआ था
गलती उसकी भी तो है
मैं न जालिम के साथ हूं
मैं न मजलूम के साथ हूं
मैं हूं थाली का बैंगन
रहता हूं उधर जिधर हो वजन ज्यादा 
हुकूमत के साथ

कुछ 'तार्किक, आधुनिक, सेकुलर' लोग बिना यह गौर किये कि कौन शोषण-जुल्म की व्यवस्था का संचालक है, कौन अपने हिसाब से आम जीवन जीता व्यक्ति, दोनों को समान नजर से देखने के हिमायती हैं। संभव है यह आम व्यक्ति हमारे विचारों मुताबिक आधुनिक तार्किक न होकर पिछड़ा, अंधविश्वासी, अतार्किक हो। हो सकता है कि हम इसे बदलना चाहते हों। पर क्या बदलाव की यह इच्छा हमें फासिस्टों और इस व्यक्ति को 'समान' दृष्टिकोण से देखने के निष्कर्ष पर ले जा सकती है?
कोई स्त्री अंधविश्वास के नाते किसी 'बाबा' के पास जाये, उससे बलात्कार हो तो क्या बलात्कारी के खिलाफ आवाज नहीं उठायेंगे क्योंकि वह अंधविश्वास की वजह से बलात्कार की शिकार हुई?
कोई दलित धार्मिक अंधविश्वास से मुक्त न होने के कारण मंदिर में जाये, वहां जुल्म का शिकार हो तो कहेंगे कि ठीक हुआ, अंधविश्वासी को सही सजा मिली?
मैं भी चाहता हूं कि पर्दा/बुर्का मुक्त समाज हो, पर ये लडकियां इस वक्त संघी गिरोह के डर से हिजाब छोड़ दें तो यह गारंटी तो है न कि संघी गिरोह भी फासिस्ट के बजाय शिष्ट-सदाचारी बन जायेगा, इनके खिलाफ अपनी मुहिम छोड देगा? कुछ वक्त पहले जो सुल्ली डील्स बुल्ली बाई एप बने उनमें जिन मुस्लिम स्त्रियों को निशाना बनाया गया वे तो लगभग सभी उच्च शिक्षित, आधुनिक, बुर्का-हिजाब मुक्त अपने क्षेत्रों की जानी-मानी प्रोफेशनल थीं। फिर? 
ये सब परीक्षण 1930 के दशक में नाजियों के साथ हो चुका है जब परंपरागत नेतृत्व यहूदियों को नाजियों के शुरुआती हमलों के सामने झुकने के लिए, नाजी विरोधी साझा संघर्ष से अलग रहने के लिए, समझाता रहा कि ऐसा करने से वे शांत हो जायेंगे। नतीजा सबको मालूम है।

*मुकेश असीम*

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कर्नाटक में मुस्लिम छात्रा के हिजाब पहनने के खिलाफ हिंदू युवकों द्वारा भगवा गमछे और झंडे लेकर उसे डराने की कोशिश करने की घटना का विरोध करने पर हमारे कुछ दोस्त कह रहे हैं कि आप लोग हिजाब का समर्थन मत कीजिए

हम हिजाब का समर्थन नहीं कर रहे

हम नागरिक की स्वतंत्रता का समर्थन कर रहे हैं

कल्पना कीजिए कल को मुसलमान लड़के भीड़ लगाकर हरे झंडे लेकर हिंदू औरतों के मांग में सिंदूर लगाने का विरोध करें

और सड़क पर जाती हिंदू औरतों से कहें कि अपनी मांग का सिंदूर मिटाओ क्योंकि यह पितृसत्ता की निशानी है औरतों की गुलामी का प्रतीक है

तब क्या आप यह कहेंगे कि यह मुसलमान लड़के ठीक कर रहे हैं और हिंदू औरतों को पितृसत्ता से आजाद कर रहे हैं

नहीं तब आप कहेंगे कि हिंदू औरतों को  पितृसत्ता से आजाद करने का यह सही तरीका नहीं है

हर औरत को मांग में सिंदूर लगाने या ना लगाने के बारे में खुद फैसला करना है

इसी तरह हर महिला को हिजाब पहनने या ना पहनने के बारे में खुद फैसला करने की आजादी है

हम औरतों की इसी आजादी का समर्थन कर रहे हैं

*हिमांशु कुमार*

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हिजाब के बहाने

हिजाब के बहाने ….😌🙃😡

कर्नाटक के शिक्षा संस्थानों में लड़कियों के हिजाब के विरोध में जो मुहिम चलाई जा रही है, वह बेहद शर्मनाक और दुर्भाग्यपूर्ण है। 

कुछ कॉलेजों के यूनिफार्म ड्रेस कोड के विरोध के तहत कुछ मुस्लिम लड़कियों ने हिजाब पहनने का अपना अधिकार नहीं छोड़ा तो कुछ हिन्दू लड़के भगवा ओढ़कर कॉलेज पहुंचने लगे। 

कॉलेजों में 'जय श्रीराम' के नारे भी लगे और  कहीं-कहीं  'अल्लाहु अकबर' का उद्घोष भी हुआ। वहां धार्मिक विभाजन तेजी से बढ़ा है और शिक्षा संस्थान जंग के मैदान में तब्दील होते जा रहे हैं। घटनाक्रम को देखकर साफ लग रहा है कि यह सब धार्मिक आधार पर लोगों के ध्रुवीकरण की सोची-समझी राजनीति के तहत सुनियोजित रूप से किया जा रहा है। 

मैं स्वयं बुर्का या पर्दा प्रथा का समर्थक नहीं हूं लेकिन कोई अगर धर्म के नाम पर या व्यक्तिगत इच्छा से परदे में रहना चाहता है तो उसकी आस्था और इच्छा का सम्मान किया जाना चाहिए। वैसे ज्यादातर मुस्लिम औरतें हिजाब नहीं पहनतीं। 

जो पहनना चाहती हैं उन्हें इसे उतारने के लिए मजबूर करना उनकी आस्था का अपमान भी है और उनके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन भी। विविधताओं से भरे हमारे देश में हज़ारों तरह के पहनावे हैं। कहीं-कहीं तो औरतों के सामने गज-गज भर के घूंघट में रहने की भी मजबूरी है। 

समस्या बस मुस्लिम औरतों के हिजाब से है। यह हिजाब गलत है तो उसके खिलाफ आवाज़ मुस्लिम औरतों के बीच से ही उठनी चाहिए। उठती भी रही है। एक लोकतांत्रिक देश में कोई भगवाधारी डरा-धमकाकर उन्हें हिजाब उतारने का आदेश नहीं दे सकता।

संस्कृतियों, आस्थाओं, वेशभूषा और भाषाओं की असंख्य दृश्य विविधताओं के बीच एकात्मकता का अदृश्य धागा सदा से हमारे देश की खूबसूरती रही है। 

सत्ता के लिए जिस तरह से इस धागे को तोड़ने की निरंतर कोशिशें हो रही है उससे हम सचेत नहीं हुए तो वह दिन दूर नहीं जब देश की बुनियाद ही बिखर जाएगी।

✍🏻:~ Dhruv Gupt Ji Former IPS Officer ✊🏻🌅🙏🏻

Gulzarilal Nanda

A 94-year-old man was thrown out of a rented house by the landlord for not paying the rent. 
The old man had hardly any belongings except an old bed, some aluminum utensils, a plastic bucket and a mug etc. The old man requested the owner to give him some time to pay the rent. 
The neighbors also took pity on the old man, and they convinced the landlord to give him some time to pay the rent. The landlord reluctantly gave him some time to pay the rent.

The old man took his belongings inside.

A journalist passing by stopped and saw the whole scene. He thought it would be useful to publish the matter in his newspaper. 
He even thought up a headline, "Cruel landlord kicks old man out of rented house for money." Then he took some pictures of the old tenant and also took some pictures of the rented house.

The journalist went and told his press owner about the incident. The owner of the press looked at the pictures and was shocked. He asked the journalist, did he know the old man? The journalist said no.

The next day the big news appeared on the front page of the newspaper. The title was "Gulzarilal Nanda, the former Prime Minister of India, leading a miserable life". It was further written in the news that how the former Prime Minister was unable to pay the rent and how he was thrown out of the house. It was commented that nowadays freshers also earn a lot of money. Whereas a person who has been a former Prime Minister twice and has also been a Union Minister for a long time, does not even have a house of his own.

Actually Gulzarilal Nanda got Rs. 500/- per month allowance, .but he had rejected this money saying that he did not fight for the allowance of freedom fighters. Later friends forced him to accept saying that he had no other source of origin. With this money, he used to live by paying his rent.

The next day the then Prime Minister sent ministers and officials with a fleet of vehicles to their homes. The landlord was stunned to see the fleet of so many VIP vehicles. It was then that he came to know that his tenant, Mr. Gulzarilal Nanda was the former Prime Minister of India. The landlord immediately bowed down at the feet of Gulzarilal Nanda for his misbehavior.

Officials and VIPs requested Gulzarilal Nanda to accept government accommodation and other facilities. Mr. Gulzarilal Nanda did not accept his offer by saying that what is the use of such facilities in this old age. Till his last breath, he lived as a simple life, like an ordinary citizen. In 1997, the government honored him with the Bharat Ratna.

Just compare his life with the politicians of the present times.

On the 23rd anniversary of his death.

Tuesday, 8 February 2022

क्रिप्टोकरेंसी- शोषण का साम्राज्यवादी हथियार


                
क्रिप्टोकरेंसी एक नकली, डिजिटल और आभासी मुद्रा है।  यह कानूनी रूप से अवैध है। हाल ही में पहली क्रिप्टोकरेंसी, बिटकोइन जो 2009 में उभर कर आयी थी, का मूल्य 66900 डॉलर तक पहुँच गया है, जो इस नकली मुद्रा के अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते कारोबार और लेन-देन की तरफ़ इशारा करता है। यह इस कथन को मजबूती देता है कि "क्रिप्टोकरेंसी में निवेश करना मतलब कम समय में ज्यादा पैसे कमाना है।" इसके परिणामस्वरूप नौजवानों में लालच बढ़ रहा है खासकर भारत में जहाँ वह कुछ कंप्यूटर जानकारी रखते हैं। जिससे क्रिप्टोकरेंसी की मांग और इससे संबंधित लेन-देन में बेतहाशा बढोतरी हुई है। इस पूरी प्रक्रिया में ज्यादातर लोग कभी न ख़त्म होने वाले क़र्ज़ में फंस जाएंगे। खम्मम, तेलांगना के एक निजी अध्यापक का आत्महत्या करने को मजबूर होना क्रिप्टोकरेंसी के जुए का चरम स्तर का एक नमूना है। इसने मुख्यधारा के मीडिया को इस पहलू पर बातचीत करने के लिए मजबूर कर दिया और एक राष्ट्रीय चैनल प्रतिदिन सुझाव देते हुए `स्पॉटलाइट` कार्यक्रम में प्रसारित कर रहा है  कि क्रिप्टोकरेंसी में निवेश कैसे करें।
 जुआ प्रवत्ति के साथ इसके गहरे  संबंध को देखते हुए यह अर्थव्यवस्था के साथ-साथ लोगों के लिए भी हानिकारक है। हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने कहा कि क्रिप्टोकरेंसी को इसकी उच्च अस्थिर कीमतों को देखते हुए प्रतिबंधित किया जाना चाहिए जो इसमें निवेश करने वाले बहुसंख्यकों के जीवन को खतरे में डालता है। इसके विपरीत, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से संबधित स्वेदेशी जागरण मंच, जोकि आर्थिक मुद्दों पर अपनी राय रखता है, उसने क्रिप्टोकरेंसी पर लगे प्रतिबंध का कड़ा विरोध किया, बल्कि उसके अनुसार सरकार को क्रिप्टोकरेंसी को मान्यता देनी चाहिए क्योंकि बहुत से लोगों ने इसमें निवेश किया है। संसद के शीतकालीन सत्र में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा क्रिप्टो करेंसी के लिए विधेयक पेश करने के बयान से सरकार की इस नकली करेंसी को बढ़ावा देने की मंशा जाहिर होती है। सितंबर 2021 में नेशनल काउंसिल ऑफ़ अप्लाइड इकोनामिक रिसर्च द्वारा आयोजित सम्मेलन में प्रमुख अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ ने कहा कि किसी भी देश के लिए क्रिप्टोकरेंसी पर प्रतिबंध लगाना एक गंभीर चुनौती है। इसलिए विभिन्न देशों के आपसी सहयोग से क्रिप्टोकरंसी पर एक अंतरराष्ट्रीय नीति तैयार करना बेहद जरूरी है। यह स्पष्ट रूप से इस तथ्य को दिखाता है कि वैश्विक स्तर पर नकली मुद्रा के तेज़, त्वरित और व्यापक विस्तार के पीछे साम्राज्यवादी ताकतों का फायदा है। इसके अलावा क्रिप्टो बाजार में कदम रखने के लिये कम्पूटर की जानकारी होना एक जरूरी शर्त है। यही फायदा मौजूदा सरकार के 'सभी के लिए डिजिटल साक्षरता' प्राप्त करने के उत्साह के पीछे हो सकता है, जिसमें 'सभी को साक्षरता' का लक्ष्य पीछे छूट गया। 
क्रिप्टोकरेंसी: 
कानूनी रूप से अवैध होने के चलते इसका अस्तित्व सरकार या केन्द्रीय बैंकों से बिलकुल भी जुड़ा हुआ नहीं है। पैसे के लेनदेन को मान्य बनाने के लिए क्रिप्टोकरंसी एक ब्लॉकचेन नामक लेजर तकनीक का इस्तेमाल करती है जिसमें क्रिप्टोग्राफ सूचनाओं को संगठित करने के लिए ब्लॉकचेन रूप का उपयोग करती है। क्योंकि यह बहुत सारे कंप्यूटर में बिखरी हुई है इसलिए सरकारी नियंत्रण के दायरे से बाहर है। इसका दोहरा उपयोग संभव नहीं है इसलिए नकली नहीं बनाया जा सकता। मतलब नकली मुद्रा के लिए नकली मुद्रा बनाना संभव नहीं। वाह ! दाँव खेलने के लिए ढेर सारे वैकल्पिक कोइन (सिक्के) जैसे लाइट कोइन, डौगी कोइन, पीर कोइन, एथेरियम जैसी 6000 मुद्राएं अभी पैदा हुईं और प्रचलन में हैं। 2009 में ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर के रूप में जारी किया गया बिटकॉइन एक अज्ञात व्यक्तिगत समूह सतोशी नाकामोतो द्वारा बनाई गई पहली मुद्रा थी। 2008 के वैश्विक आर्थिक संकट के पैदा होने के पीछे एक तर्क खूब प्रचारित प्रसारित किया गया कि इसकी  मुख्य  वजह  थी  रुपये की आपूर्ति, जिसका नियंत्रण राष्ट्रीय सरकारों के पास है। इसलिए बिटकॉइन का एक अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा के तौर पर पैदा होना समस्या का समाधान है। इस तरह सरकार/केंद्रीय बैंक और रिजर्व बैंक से रुपये का नाता तोड़ने की प्रक्रिया शुरू हुई। अगस्त २०२१ तक 18.8 मिलियन बिटकॉइन प्रचलन में आगये, जिनका बाजार मूल्य 859.9 अरब डॉलर है। बिटकॉइन, जिसे वैकल्पिक वैश्विक मुद्रा के तौर पर लोकप्रिय बनाया गया है, इसे अमेरिकी डॉलर के रूप में व्यक्त किया जाता है, यह एक गंभीर अंतर्विरोध है। 
 कुल 21 मिलियन बिटकॉइन बनाये गए हैं, एक बार जब वे उन्हें खनन के साथ बाहर निकालते हैं, तो उनकी संख्या नहीं बढ़ाई जा सकती। हालाँकि, बहुत सारे वैकल्पिक कोइन्स पहले ही बना लिए गए हैं। अगस्त 2021 तक उनका कुल मूल्य दो ट्रिलियन डॉलर से भी ज्यादा है। जिसमें बिटकॉइन की हिस्सेदारी 40.5 प्रतिशत है।
क्रिप्टोकरेंसी के समर्थन में तर्क- यह क्या संकेत देते हैं?
क्रिप्टोकरेंसी, जोकि एक नकली करेंसी है उसे वास्तविक वैश्विक मुद्रा के तौर पर लोकप्रिय बनाया जा रहा है जिसका उद्देश्य सरकार या केन्द्रीय बैंक के पैसों की आपूर्ति के एकाधिकार को तोडना है। इस प्रकार इसका उद्देश्य पैसों की आपूर्ति को निजी करना है। क्रिप्टोकरेंसी पूरी दुनिया की पहुँच में होगी। इसका मतलब नकली मुद्रा का चरित्र वैश्विक है। यह पैसों की आपूर्ति के निजीकरण और वैश्वीकरण को मजबूत करता है। 
पैसों की आपूर्ति के बढ़ने से महंगाई की समस्या को बिटकॉइन की निश्चित आपूर्ति से पूरा किया जाएगा। लेकिन हज़ारों दूसरे उभरते वैकल्पिक कोइन का क्या?
वास्तव में क्रिप्टोकरेंसी से होने वाला लाभ हास्यास्पद है। कम लागत, आसान स्थानान्तरण और सरकार के दखल न होने को एक कुशलता के रूप में बताया जा रहा है। साथ ही साथ कानूनी मान्यता प्राप्त टेंडर के प्रसार के लिए एक विशाल बैंकिंग नेटवर्क की जरुरत पड़ती है। जोकि काफ़ी महंगा पड़ता है लेकिन क्रिप्टोकरेंसी के हस्तांतरण के लिये ऐसा कुछ जरुरी नहीं।  क्रिप्टोकरेंसी की आपूर्ति बाजार की ताकत द्वारा निर्धारित है जोकि उनके लिये सार्थक है , अपने आरंभ से ही क्रिप्टोकरेंसी का इतिहास लाखों डॉलर की हैकिंग और चोरी को दर्शाता है। जिसका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर हवाला कारोबार और आपराधिक मामलों में हुआ है। हैकिंग और चोरी के चलते क्रिप्टो एक्सचेंज द्वारा अचानक दिवालियेपन की घोषणा से आम लोग जिन्होंने क्रिप्टो सम्पत्ती में निवेश किया उन्हें नुकशान होता है।  दुनिया का सबसे बड़ा बिटकोइन एक्सचें एमटी गोक्स ने 2014 में चोरी के कारण 473 मिलियन डॉलर की कीमत के 8 लाख 50 हज़ार बिटकोइन खोये, जिसके बाद इन्होने दिवालियापन घोषित किया जिसका सबसे बड़ा नुकशान आम लोगों को हुआ। होमेरो जोश गरजा जिसने स्टार्टअप की शुरुआत की थी उसपर धोखाधड़ी करने के कारण 9.1 बिलियन डॉलर का जुर्माना लगा। इसी तरह नवम्बर 2017 में टेथर एक्सचेंज, 2018 में बिटकोइन गोल्ड, जून 2018 में कोरियन एक्सचेंज लाखों डॉलर की क्रिप्टोकरेंसी की चोरी का शिकार हुए। नकली मुद्रा के लिये नकली वेबसाइट आम है।  यह ध्यान देने वाली बात है कि इतने अधिक नुकसानदेह परिणामों के बावजूद अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ और प्रभावशाली देश क्रिप्टोकरेंसी पर रोक लगाने और इसके खिलाफ कार्यवाही करने से कतरा रहे हैं। 
अनेकों देशों ने क्रिप्टोकरेंसी पर प्रतिबंध लगाया:
एमटी गोक्स की अचानक दिवालियापन की घोषणा की प्रतिक्रिया में यूके, अमरीका और यूरोपियन यूनियन ने क्रिप्टोकरेंसी को नियंत्रित करने के लिये जांच पड़ताल शुरू की है। हालांकि इन्होंने इसे प्रतिबंधित करने का कोई फैसला नहीं लिया। इस दौरान लोगों को आकर्षित करने के लिए जागरूक अभियान, मंच, एक्सचेंज, विज्ञापन आदि बनाये गये, साथ ही क्रिप्टोकरेंसी से सम्बंधित नेटवर्क भी वैश्विक स्तर पर मजबूत हुए हैं। मार्च 2018 में क्रिप्टोकरेंसी ने मरीयम वेबस्टर डिक्शनरी और उसके बाद ऑक्सफ़ोर्ड डिक्शनरी में जगह हासिल की।  यूरोपियन यूनियन की संसद ने क्रिप्टोकरेंसी को परिभाषित किया। इस प्रकार इन सबने इसे स्वीकार करने के लिये एक रास्ता तैयार किया।  
2008 में अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार विजेता पॉल क्रुगमैन ने कहा कि क्रिप्टोकरेंसी ने दुनिया में काले धन को वैध करने के काम को बढ़ाया है और यह एक बुलबुला है जो खत्म नहीं होगा। जबकि अमरीकी शेयर होल्डर वारेन बफेट ने कहा कि क्रिप्टोकरेंसी काले धन को वैध करने का सूचकांक है जिसका अंत बुरा होगा। 2021 में ही केवल सभी सरकारों ने क्रिप्टोकरेंसी के नियंत्रण की जरुरत पर बात करनी शुरू किया।  
भारत समेत 38 देशों की सदरस्यता वाले "वित्तीय कार्रवाही कार्य बल" ने जोर देकर कहा कि हवाला कारोबार पर क्रिप्टोकरेंसी के प्रभाव को देखते हुए इसे नियंत्रित किया जाना चाहिए और साथ ही जून 2020 में `ट्रेवल रूल` में सुधार कर इसके लेन-देन का मानकीकरण तैयार किया। 
सितम्बर 2020 में यूरोपीय आयोग ने "डिजिटल फाइनेंस" पर अपनी रणनीति प्रकाशित की, जबकि `अमेरिकी प्रतिभूति और विनिमय आयोग` ने इसे जांचना आरंभ किया वहीं यूके ने कहा कि क्रिप्टोकरेंसी से संबंधित सभी फार्मों को `वित्तीय आचार प्राधिकरण` में पंजीकरण कराना अनिवार्य होगा।  
जी-10 देशों के समूह के केन्द्रीय बैंक गवर्नर द्वारा निर्देशित बैंकिंग देखरेख की 'बासल कमिटी' ने प्रस्तावित किया कि यदि कोई बैंक क्रिप्टो सम्पत्ति को लेता है तो उसे पहले से ही अनुमानित घाटे के बराबर पैसों को अलग रखना होगा। मई 2021 में चीन ने क्रिप्टोकरेंसी से संबंधित सभी लेन-देन पर रोक दी।  दक्षिण अफ्रीका कई घोटालों का सामना किया जिसमें सबसे महत्वपूर्ण राएस कैगी और अमीर कैगी का गायब होना है जोकि 'अफ़्रीक्रिप्ट एक्सचेंज' के संस्थापक हैं जिनके पास अप्रैल 2021 में 3.8 बिलियन डॉलर के बिटकोइन थे। इसी तरह 'मिरर ट्रेडिंग इंटरनेशनल' जिसके पास 170 मिलियन डॉलर थे वह अचानक खत्म हो गया। इसलिए सरकार 2022 में इसके लेन-देन को लेकर नियम कानून बना रही है। दक्षिण कोरिया ने मार्च 2021 से नये कानून बनाए जिसमें क्रिप्टोकरेंसी से संबंधित सभी फर्म को 'कोरिया फाइनेंस इंटेलिजेंस यूनिट' में पंजीकरण कर सूचना सुरक्षा प्रबंधन प्रणाली से प्रमाणपत्र लेना होगा।  अप्रैल 2021 में टर्की गणराज्य ने क्रिप्टो सम्पत्ति को क्रिप्टोकरेंसी से खरीदने पर रोक लगायी। इसके उलट 2021 में अल सल्वाडोर ने बिटकोइन का कानून रूप स्वीकार किया जबकि अगस्त 2021 में क्यूबा ने इसे अपनाया। 
नवंबर 2021 में क्रिप्टोकरंसी को लेकर देशों के दृष्टिकोण की समीक्षा करने वाली कांग्रेस ने कहा 113 देशों के व्यापारिक संगठन क्रिप्टो करेंसी और क्रिप्टो संपत्ति को लेकर कानून बना रहे हैं जबकि 42 देशों ने क्रिप्टोकरंसी पर रोक लगाई है जिसमें पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगाने वाले देश अल्जीरिया, बांग्लादेश, चीन, नेपाल, इजिप्ट, इराक, मोरक्को और ट्यूनीशिया हैं। 
क्रिप्टो संपत्ति और वैधता:
अमेरिकी इंटरनेशनल रिवेन्यू सर्विस ने 2014 में बिटकॉइन को संपत्ति के रूप में मान्यता दी जिसके बाद उस पर टैक्स लगाया। कानूनी मान्यता के साथ बिटकॉइन को आयकर आयकर रिटर्न भरने चाहिए। बिग वॉल स्ट्रीट ने 17 मार्च 2017 में घोषणा की वह अपने अमीर ग्राहकों को बिटकॉइन के बदले धन उपलब्ध कराएगा। जबकि कॉरपोरेट जगत की सबसे बड़ी कंपनी बी एन वाई मिलन ने 11 फरवरी 2021 से क्रिप्टो करेंसी में सेवाएं उपलब्ध कराने की घोषणा की। अप्रैल 2020-21 से वेनमो डिजिटल वॉलेट सर्विस देने वाली कंपनी ने अपने 60 मिलियन ग्राहको छात्रों और छोटे उद्योगपतियों को क्रिप्टोकरंसी में लेनदेन और जमा करने के लिए एक मंच तैयार किया। पीटर्सबर्ग विश्वविद्यालय के 'लेजर' पीर रिव्यू जर्नल में क्रिप्टो करेंसी से संबंधित लेख प्रकाशित होंगे । यह सभी अमेरिका द्वारा क्रिप्टो करेंसी को मान्यता देने के प्रमाण हैं।     
अमेरिकी रेड क्रॉस , यूनिसेफ और यूएन वर्ल्ड फूड प्रोग्राम ने क्रिप्टो करेंसी में दान लेने की हामी भरी ताकि क्रिप्टो करेंसी और संपत्ति को मजबूती से लागू किया जा सके ।
भारतीय क्रिप्टोकरंसी :
भारत की बहुचर्चित हस्ती अमिताभ बच्चन और उनके लड़के अभिषेक बच्चन ने 2015 में सिंगापुर फार्म मेरिडियन टेक पीटीई से ढाई लाख डॉलर की क्रिप्टोकरंसी में निवेश किया जिसकी 2017 में कीमत 17.5 मिलियन डॉलर है । इस सबने भारतीय युवाओं को क्रिप्टोकरंसी में निवेश को बढ़ावा दिया और उसे लोकप्रिय बनाया जिससे मंदी के दौर में कम समय में आसानी से विलासिता पूर्ण जीवन जिया जा सके। इसी के परिणाम स्वरूप 2017 में पहला भारतीय क्रिप्टोकरंसी एक्सचेंज अस्तित्व में आया,  जिनमें कुछ इस प्रकार हैं -कोइन स्विच कूबर, कॉइन डीसीएक्स, वजीर एक्स, जेड पे  जिसमें अमिताभ बच्चन खुद कॉइन डीसीएक्स के ब्रांड अंबेसडर हैं।
शुरूात में इसे बढ़ावा देने वाले सोच रहे थे कि यह सिर्फ महानगरों तक सीमित रहेगा लेकिन जल्दी ही यह शहर और कस्बों में फैल गया। अभी यह लगभग 4000 शहरों तक फैला हुआ है और इसमें निवेश करने वालों की औसत उम्र 25 साल है। ब्रोकर पोर्टल , ब्रोकर जूसर की अक्टूबर 2021 की रिपोर्ट बताती है भारत दुनिया में क्रिप्टो मार्केट में निवेश करने वाला प्रथम देश (10 करोड़ निवेशक) जबकि अमरीका 2.74 करोड़ निवेशकों के साथ दूसरे स्थान पर है ।
क्रिप्टोकरंसी को लेकर भारत शुरुआत में मजबूत स्थिति में नहीं था । भारतीय रिजर्व बैंक ने 2018 में क्रिप्टोकरंसी पर प्रतिबंध लगाया जिसे 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने हटा दिया । हालांकि प्रतिबंध के दौरान क्रिप्टो करेंसी से संबंधित गतिविधियां बंद नहीं हुई लेकिन खत्म होने पर इसने तेज गति हासिल जरुर की। अधिक व्यस्तता के बावजूद विस्तार नहीं रुका। निवेशक जानते हैं 'यह एक बड़ा जुआ है' वे इस अनुमान के साथ निवेश करते हैं की 'बुद्धिमत्ता और समझदारी से हानि नहीं होगी'। 'जल्दी से अधिक पैसा कमाना एक बड़ी कमजोरी है' यह लालच युवाओं के दिमाग पर मजबूती से असर करता है। इसलिए लोग इस बात को सुनना ही नहीं चाहते कि क्रिप्टोकरंसी एक नकली मुद्रा है। सबसे बड़े स्टॉक ब्रोकर जीरोधा का उपयोग करने वाले 7 मिलियन लोग हैं , जबकि कॉइन स्विच कुबर  क्रिप्टो एक्सचेंज के 11 मिलियन। इसके अलावा, भारत से क्रिप्टो करेंसी में 40 अरब डॉलर से ज्यादा का निवेश है । 
कानूनी सुरक्षा की अनुपस्थिति के बावजूद क्रिप्टो करेंसी के उपयोगकर्ता भारत में अंधाधुंध गति से बढ़ रहे हैं।     
हाल ही में ऍफ़ ई एम् ए की जांच में वजीर एक्स ने 2700 करोड़ रुपये की लेनदेन में कानून का उल्लंघन किया। जर्मनी ,यूएसए , यूके , स्वीटजरलैंड और ऑस्ट्रेलिया की शिकायत पर कॉइन  स्विच कुबर ने 80,000 खाते वजीर एक्स ने 14469 खाते बंद कर दिए।
भारत में 2017 को आंतरिक मंत्रालय ने एक हाई लेवल कमेटी को आभासी मुद्रा को समझने और उस पर प्रस्ताव रखने के लिए गठित किया। कमेटी ने 28 फरवरी 2019 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें दो बातें थीं (1) क्रिप्टोकरंसी पर प्रतिबंध के लिए संसद में एक कानून लाया जाए (2) आरबीआई द्वारा लागू की गई डिजिटल करेंसी के लिए एक उच्च स्तरीय कमेटी बनानी चाहिए । 
सुप्रीम कोर्ट के वकील और साइबर लॉ एक्सपर्ट डॉ प्रणव दुग्गल ने कहा कि क्रिप्टोकरंसी लोगों के साथ अर्थव्यवस्था के लिए भी हानिकारक है । आईपीएल 2022, आईसीसी मैच, T20 वर्ल्ड कप क्रिकेट में युवाओं को आकर्षित और भ्रमित करने वाले विज्ञापनों पर भी प्रतिबंध लगना चाहिए । यह सोचने वाली बात है कि नासकॉम ने क्रिप्टोकरंसी पर प्रतिबंध का विरोध किया है । इसके अलावा हमारी वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने मंशा जाहिर की कि संसद में क्रिप्टोकरंसी पर विधेयक पारित किया जाएगा पर प्रतिबंध से संबंधित बिल नहीं लाया जाएगा। विशेषज्ञ आकलन कर रहे हैं कि प्रस्तावित विधेयक क्रिप्टो संपत्तियों कोनिवेश के रूप में  मान्यता देगा और इसलिए, उस पर पूंजीगत लाभ के रूप में टैक्स कर लागू करेगा।
यह सब स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि क्रिप्टो करेंसी त्वरित गति से बढ़ेगी।
क्रिप्टो करेंसी -पर्यावरण पर प्रभाव: 
क्रिप्टो करेंसी की गतिविधियाँ, इसके खनन से संबंधित और काम के सबूत बड़ी मात्रा में बिजली की खपत करते हैं और भारी मात्रा में कार्बन फुटप्रिंट छोड़ते हैं। इस तरह, इसकी पैदाइश महंगी और पर्यावरण के लिए हानिकारक है। इसलिए यह कहना हास्यास्पद है कि इसका निर्माण सस्ता है। अकेले 2017 में बिटकॉइन खनन से 943 मेगावाट बिजली खर्च हुई। बिटकॉइन, एथेरियम, लिटकोइन और मोनेरो की कार्य ब्लॉक श्रृंखलाओं का सबूत बनाने में जनवरी 2016 से जून 2017 के दौरान 3 से 15 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन हुआ । सितंबर 2021 में यह अनुमान लगाया गया कि अकेले बिटकॉइन का वार्षिक इलेक्ट्रॉनिक कचरा उत्सर्जन 30.7 मीट्रिक किलो टन और कार्बन फुटप्रिंट कचरा उत्सर्जन 95.90 मीट्रिक टन है। इसके अलावा, अकेले बिटकॉइन की वार्षिक बिजली खर्च 201.89 Twh है। इस तरह, क्रिप्टोकरेंसी का विस्तार किसी दूसरे काम के लिए बिजली नहीं छोड़ेगा। इसके अलावा, यह पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन जैसे मामले के लिए बहुत ज्यादा खतरनाक है।
निगमीकरण की ओर: क्रिप्टो करेंसी जुआ का दूसरा नाम है। अक्टूबर 2021 में ऑस्ट्रेलिया में एसीएक्स एक्सचेंज अचानक यह कहते हुए ढह गई कि उसने $ 50 मिलियन की क्रिप्टोकरेंसी खो दी है। इसी तरह, एक अन्य एक्सचेंज माईक्रिप्टो वॉलेट-जिसके लेन-देन सैकड़ों-हजारों अमेरिकी डॉलर के हैं, अचानक दिवालिया घोषित हो गया। दूसरी तरफ, यह भी साबित होचुका है कि हवाला, आपराधिक और अवैध गतिविधियों के लिए क्रिप्टो करेंसी सबसे अच्छा वित्तीय साधन है। एकाधिकारी पूँजीवाद की प्रवत्ति में साम्रज्यवादी लूट और शोषण को मजबूत करने की प्रक्रिया स्वाभाविक रूप से दुनिया के अपराधीकरण को मजबूत करती है, यही आज की सच्चाई है। वे एक दूसरे को मजबूत करते हैं। वे साथ रहते हैं। लेकिन, इसके ठीक उल्टा प्रचार करते हैं कि कि यह सब केवल आम लोगों के फायदे के लिए है। भारतीय नौजवान जो इस विकृत दुष्चक्र में फंसे हुए हैं, हमेशा कहते हैं कि क्रिप्टोकरेंसी के जुए में बुद्धिमान लोग कभी नुकसान नहीं उठाएंगे। जब क्रिप्टो विनमय द्वारा दिवालियापन की अचानक घोषणा हो जाय तो इसमें किसी निवेशक की व्यक्तिगत बुद्धिमानी की क्या भूमिका है ?
भारत में प्रमुख ताकतों के लिए क्रिप्टो करेंसी सॉफ्टवेयर में लगे युवाओं के साथ इकठ्ठा हुई पूंजी को स्थानांतरित करने के लिए एक मजबूत उपकरण है । इसलिए, यह निगमीकरण की ओर बढ़ रहा है। क्योंकि, क्रिप्टोकरेंसी के फैलने का मजबूत कॉर्पोरेट शक्तियों द्वारा दिए गए समर्थन से गहरा नाता है। एलोन मस्क, टेस्ला इंक के सीईओ और स्पेस एक्स, ट्विटर के सीईओ, जैक डोर्सी क्रिप्टो करेंसी स्वीकार करते हैं और इसका भरपूर मालिकाना उनके पास था। अल्फाबेट इंक,गूगल की एक सहायक कंपनी के सीईओ सुंदर पिचाई गर्व से कहते हैं कि उनका 11 साल का बेटा इथेरियम माइनिंग कर रहा है। इसी तरह, मार्क जुकरबर्ग, सीईओ फेस बुक के, एप्पल के सीईओ, टिम कुक ने कहा कि वे बिटकॉइन के मालिक हैं। इसके अलावा जेफ रे प्रेस्टन बेजोस, संस्थापक और
अमेज़न के सीईओ  का कहना है कि वह बिटकॉइन्स और एथेरेयम के मालिक हैं। बिल गेट्स का दृढ़ मत है कि कानूनी निविदा के लिए क्रिप्टो करेंसी बेहतर है। इस तरह, सभी वैश्विक कॉर्पोरेट दिग्गज खुले तौर पर क्रिप्टो करेंसी यानी नकली करेंसी को बढ़ावा देते हैं और उसका समर्थन करते हैं।
डॉगी कोइन का इतिहास बड़े रोचक ढंग से बयान करता है कि क्रिप्टो करेंसी को भले ही बना कोई भी ले, पर उसका अस्तित्व, विकास और मूल्य शक्तिशाली कॉर्पोरेट ताकतों द्वारा तय, निर्धारित और निर्देशित किया जाएगा। क्रिप्टो का उपहास उड़ाने के लिए 2013 में बिली मार्कर्स और जैक्सन पामर, दोनों सॉफ्टवेयर इंजीनियरों ने कुत्ते के लोगो के साथ कुत्ते के सिक्के बनाए ,जिन्हें मीम सिक्के कहा जाता है। यह उनके इंटरनेट समूह में प्रचलन में है। देखते ही देखते इसकी कीमत बढ़ने लगी। डॉगी सिक्के के सह-संस्थापक जैक्सन पामर ने समूह छोड़ दिया यह बताते हुए कि क्रिप्टो सिक्का शोषण का साधन है और संस्थापक को अमीर बना देगा। इस बीच, एलोन मस्क ने अपने ट्वीट में डॉगी कॉइन का समर्थन किया। दिलचस्प बात यह है कि उनके हर ट्वीट से डॉगी सिक्के के मूल्य में वृद्धि हुई। इसका बाजार 5 मई, 2021 तक पूंजीकरण मूल्य $85 बिलियन तक पहुँच गया और इसकी वार्षिक वृद्धि 20,000 गुना से अधिक हो गई। मार्क कुबेर ने घोषणा की कि वह अपने लेनदेन में डॉगी सिक्का स्वीकार करेगा इसके परिणामस्वरूप कुत्ते के सिक्के के लेन-देन में अचानक वृद्धि हुई। स्पेस एक्स ने 9 मई, 2021 को घोषित किया कि उसका पहला स्पेस मिशन डॉगी कॉइन के जरिए ही फंड जुटाएगा। इस तरह, मजाक उड़ाने के मकसद से बनाया गया सिक्का शक्तिशाली कॉर्पोरेट ताकतों की घोषणा के कारण महत्वपूर्ण क्रिप्टो करेंसी में से एक बन गया।
निष्कर्ष:
रुपये कि आपूर्ति को सरकार से हटाकर निजी करने की प्रक्रिया में क्रिप्टोकरेंसी पैदा हुई। साम्राज्यवादी शोषणकारी ताकतों के मुनाफे के साथ इसके गहरे नाते के चलते, इसका जल्दी ही वैश्वीकरण हो गया। इस तरह, क्रिप्टो मुद्रा का अस्तित्व, विस्तार और विकास कॉर्पोरेट ताकतों द्वारा निर्देशित ढांचे में होगा। यह आम लोगों को लूटने का एक मजबूत वित्तीय साधन है। साम्राज्यवादी शोषक ताकतें हमेशा शोषण के साधन खोजती हैं। इसलिए शोषणकारी व्यवस्था उखाड़ फेंकना चाहिए जिससे हर तरह के शोषण उपकरण ख़त्म हों। यही मजबूत जनांदोलनों के खड़े होने की शर्त है।
(ये लेख  'क्लास स्ट्रगल' अंग्रेजी पत्रिका, जनवरी-२०२२ से अनुवाद किया है।)

*प्रो.तोटा ज्योति रानी*
                     *काकतीय यूनिवर्सिटी*

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Sunday, 6 February 2022

गांधी की हत्या के मुख्य षड्यंत्रकार सावरकर का प्रशंसक होना, बाबरी मस्जिद तोड़ कर मंदिर बनाने का स्वागत करना कोई राजनैतिक अज्ञान नहीं है

यह एक ऐसी विचारधारा का समर्थन है जो खुद के धर्म के श्रेष्ठता के सिद्धांत को सही साबित करती है और दूसरे धर्मों को मानने वाले लोगों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाकर रखने की राजनीति का आधार बनती है

यह विचारधारा हिंसा को जन्म देती है और इसका अंत एक धर्म के लोगों द्वारा दूसरे धर्म के लोगों के जनसंहार तक पहुंचती है

अगर आप करोड़ों लोगों के जनसंहार तक पहुंचाने वाली विचारधारा के समर्थक है

तो मुझे आपके सिर और आपके हाथों पर खून दिखाई देता है

जो विचारधारा करोड़ों नौजवानों को जाहिल हिंसक दंगाई बना दें जो पीढ़ियों को तबाह कर दे जो पूरे एक मुल्क को बर्बाद कर दे और उसके भविष्य को नष्ट कर दे

अगर आप उस विचारधारा को मानने वाले हैं तो मेरी नजर में आपका कोई सम्मान नहीं है

Himanshu Kumar

बिटकॉइन और क्रिप्‍टोकरेंसी- आनन्द सिंह

बिटकॉइन और क्रिप्‍टोकरेंसी: संकटग्रस्‍त पूँजीवाद के भीतर लोभ-लालच, सट्टेबाज़ी और अपराध को बढ़ावा देने के नये औजार

हाल के वर्षों में भारत सहित दुनिया के कई हिस्‍सों में खाते-पीते लोगों के बीच बिटकॉइन और अन्‍य क्रिप्टोकरेंसी में निवेश करके पैसे से पैसा बनाने की एक नयी सनक पैदा हुई है। इस सनक को बढ़ावा देने का काम इण्‍टरनेट, सोशल मीडिया और मुख्‍यधारा की मीडिया पर प्रसारित होने वाले विज्ञापनों ने किया है जिनमें  लोगों को बिना मेहनत किये रातों-रात अमीर बन जाने के सब्‍ज़बाग़ दिखाये जाते हैं। इन विज्ञापनों में लोगों को बताया जाता है कि क्रिप्‍टोकरेंसी में निवेश करके वे बैंक और शेयर बाज़ार में किये गये निवेश के मुक़ाबले कई गुना ज्‍़यादा पैसा बना सकते हैं। ऐसे में ताज्‍जुब की बात नहीं है कि हाल के वर्षों में दुनिया के तमाम देशों की ही तरह भारत के खाते-पीते लोगों ने इस देश के मज़दूरों के निर्मम शोषण से जमा की गयी पूँजी को क्रिप्‍टोकरेंसी में जमकर निवेश किया है। इस प्रक्रिया में कुछ लोगों ने ख़ूब पैसे कमाये भी हैं जिसकी वजह से अन्‍य लोगों को यह उम्‍मीद रहती है कि उनके भी वारे-न्‍यारे हो जाएँगे। लेकिन बहुतेरे इस जुए में बर्बाद भी हुए हैं। साथ ही हमेशा की तरह इस निवेश में धोखाधड़ी और घोटाले भी आने शुरू हो गये हैं। पूँजीवाद की उम्र बढ़ाने के लिए समर्पित तमाम आर्थि‍क विशेषज्ञ लम्‍बे समय से क्रिप्‍टोकरेंसी में अनियंत्रित निवेश और सट्टेबाज़ी के ख़तरों को लेकर सरकार को आगाह करते आये हैं। आरबीआई ने 2018 में क्रिप्‍टोकरेंसी पर पाबन्‍दी भी लगायी थी, लेकिन मार्च 2020 में उच्‍चतम न्‍यायालय ने इस पाबन्‍दी को असंवैधानिक करार दिया था जिसके बाद क्रिप्‍टोकरेंसी में निवेश में ज़बर्दस्‍त उछाल देखने में आया। एक अनुमान के मुताबिक़ अब तक 10 करोड़ से भी ज्‍़यादा भारतीयों ने क्रिप्‍टोकरेंसी में 75 हज़ार करोड़ रुपये का निवेश किया है। इस वजह से क्रिप्‍टोकरेंसी का बुलबुला फूलता जा रहा है, लेकिन यह कोई भीषण संकट का रूप ले इससे पहले भारत सरकार क्रिप्‍टोकरेंसी में होने वाले निवेश को प्रतिबन्धित या विनियमित करने के लिए नया क़ानून बनाने जा रही है। 

क्रिप्‍टोकरेंसी है क्‍या और यह काम कैसे करती है?

क्रिप्‍टोकरेंसी एक प्रकार की डिजिटल मुद्रा (करेंसी) है जिसे क्रिप्टोग्राफ़ी की तकनीक के ज़रिये सुरक्षित बनाया जाता है। हम आगे देखेंगे कि आजकल क्रिप्‍टोकरेंसी का इस्‍तेमाल मुद्रा के रूप में कम और सट्टेबाज़ी व निवेश के रूप में ज्‍़यादा हो रहा है और इसे सही मायने में मुद्रा नहीं कहा जा सकता है। बिटकॉइन क्रिप्टोकरेंसी का एक उदाहरण है। इण्टरनेट पर बिटकॉईन के अलावा दुनिया में इस समय 6000 से भी अधिक क्रिप्‍टोकरेंसी उपलब्‍ध हैं, मसलन इथीरियम, लाइटकॉइन, रिपल और मोनेरो आदि। बिटकॉइन की खोज सातोशी नाकामोतो 2008 में एक रहस्यमयी व्यक्ति (या व्‍यक्तियों के एक समूह) ने की थी जिसकी पहचान अब तक उजागर नहीं हुई है। बिटकॉइन व अन्‍य क्रिप्‍टोकरेंसी की विशेषता यह है कि यह दुनिया के किसी भी देश, बैंक या किसी भी संस्था द्वारा विनियमित नहीं होती। इस प्रकार यह एक विकेन्द्रीकृत मुद्रा है जो किसी केन्द्रीय संस्था या बैंक द्वारा नहीं बल्कि ब्लॉकचेन नामक तकनीक की बदौलत कम्प्यूटर नेटवर्क के ज़रिये संचालित होती है।

आधुनिक अर्थव्यवस्थाओं में मुद्रा का लेनदेन प्राय: बैंकों या अन्य वित्‍तीय संस्‍थाओं के ज़रिये होता है जिसमें बैंक व वित्‍तीय संस्‍थाएँ अपने सभी खाताधारकों के बही-खातों का प्रबन्धन करते हैं। चूँकि ये संस्‍थाएँ सरकार द्वारा विनियमित की जाती हैं इसलिए इनके ज़रिये मुद्रा का लेनदेन करने की इस प्रणाली में लोगों का भरोसा बना रहता है। लेकिन अगर कोई ऐसी तकनीक विकसित हो जो लोगों के बीच होने वाले लेनदेन से सम्‍बन्धित बही-खातों का स्‍वत: ही पारदर्शी ढंग से प्रबन्‍धन करती हो तो इस काम के लिए किसी बैंक या वित्‍तीय संस्‍था की ज़रूरत ही नहीं होगी। ब्‍लॉकचेन ऐसी ही एक तकनीक है जिसके ज़रि‍ये क्रिप्‍टोकरेंसी का लेनदेन भरोसेमन्‍द तरीक़े से किया जा सकता है। इस प्रकार बिना किसी सांस्थानिक हस्तक्षेप के ज़रिये लेनदेन किये जा सकते हैं और इसमें समय व धन दोनों की बचत भी होती है। इस तकनीक में बही-खाते किसी केन्द्रीय संस्था के पास नहीं रहते बल्कि इस नये माध्यम से मुद्रा का लेनदेन करने वाले सभी लोगों के पास डिजिटल रूप में उपलब्ध होते हैं। इस क़ि‍स्म का ऑनलाइन लेनदेन करने वाले सभी लोग इण्टरनेट के माध्यम से एक विशेष प्रकार के कम्प्यूटर नेटवर्क (पियर-टू-पियर या डिस्‍ट्रीब्‍यूटेड नेटवर्क) से जुड़े होते हैं जिसमें डेटा किसी एक सर्वर पर नहीं बल्कि नेटवर्क के सभी कम्‍प्‍यूटरों पर मौजूद होता हैं। इस प्रक्रिया से होने वाले लेनदेन को सुरक्षित बनाने के लिए 'डिजिटल सिग्नेचर' और क्रिप्टोग्राफ़ी की तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे लेनदेनों के सत्यापन की प्रक्रिया 'बिटकॉइन माइनिंग' का अंग है जो जटिल गणितीय समीकरणों को हल करने की कुशलता की माँग करती है। इस कुशलता से लैस विशेषज्ञों को 'बिटकॉइन माइनर्स' कहते हैं। बिटकॉइन नेटवर्क में जब भी कोई लेनदेन होता है तो नेटवर्क में उपस्थित सभी 'माइनर्स' को अधिसूचना भेजी जाती है। जो 'माइनर' लेनदेन का सत्यापन सबसे पहले करता है उसके खाते में ए‍क निश्चित मात्रा में बिटकॉइन चले जाते हैं। इस प्रकार 'माइनर्स' न सिर्फ़ बिटकॉइन का सत्यापन करते हैं, बल्कि वे उनका निर्माण भी करते हैं। बिटकॉइन नेटवर्क में होने वाले कई लेनदेनों को मिलाकर एक ब्लॉक बनता है। ये ब्लॉक एक-दूसरे से जुड़े होते हैं, इसी वजह से इस तकनीक को ब्लॉकचेन कहते हैं। हर ब्लॉक पर अपने पिछले ब्लॉक की पहचान दर्ज होती है और इस प्रकार सभी ब्लॉक एक श्रृंखला में जुड़े होते हैं। ब्लॉकचेन की इस तकनीक को हैक करना इसलिए मुश्किल है क्योंकि हैकर को सिर्फ़ एक ब्लॉक में नहीं बल्कि बिटकॉइन की शुरुआत से लेकर अबतक के सभी ब्लॉकों में छेड़छाड़ करनी होगी जोकि लगभग असम्भव है।  

आज क्रिप्‍टोकरेंसी का इस्‍तेमाल किस रूप में हो रहा है?

क्रिप्‍टोकरेंसी की शुरुआत 2007-8 के वैश्विक वित्‍तीय संकट के बाद हुई थी और इसे भविष्‍य की विश्‍वव्‍यापी मुद्रा के रूप में प्रचारित किया जाता रहा है। अराजकतावादी और 'लिबर्टेरियन' विचारों से प्रभावित कई लोग इसका समर्थन इसलिए करते हैं क्‍योंकि यह किसी सरकार या वित्‍तीय संस्‍था के नियंत्रण में नहीं है। लेकिन एक दशक से भी ज्‍़यादा का समय बीतने के बावजूद आज बिटकॉइन जैसी क्रिप्‍टोकरेंसी का मुद्रा के रूप में बेहद सीमित इस्‍तेमाल ही हो रहा है और ज्‍़यादातर इसका इस्‍तेमाल सट्टेबाज़ी या निवेश के एक माध्‍यम के रूप में हो रहा है। पूँजीवाद के दायरे में क्रिप्‍टोकरेंसी जैसी चीज़ कभी भी अन्‍य मुद्राओं की जगह ले पायेगी यह मुमकिन नहीं लगता। ऐसा इसलिए क्‍योंकि केवल ऐसी ही चीज़ मुद्रा के रूप में काम कर सकती है जो एक ऐसे सार्वभौमिक समतुल्‍य का काम कर सके जिसके सापेक्ष अन्‍य मालों के मूल्‍य (सामाजिक रूप से आवश्‍यक श्रमकाल) को मापा जा सके और जो साथ ही साथ विनिमय के माध्‍यम का भी काम कर सके यानी जिसके ज़रिये चीज़ों को ख़रीदा-बेचा जा सके। ग़ौरतलब है कि बिटकॉइन जैसी क्रिप्‍टोकरेंसी के मूल्‍य का किसी देश में उत्‍पादित वस्‍तुओं और सेवाओं के मूल्‍य से कोई रिश्‍ता नहीं होता है, बल्कि इसका मूल्‍य इसपर हो रही अटकलबाज़ी के आधार पर बहुत ही तेज़ी से कम या ज्‍़यादा होता रहता है। इसके मूल्‍य की यह अस्थिरता अपनेआप में इसे मुद्रा के रूप में स्‍वीकार होने की राह में बहुत बड़ी बाधा है। इसके अलावा क्रिप्‍टोकरेंसी का इस्‍तेमाल करके बाज़ार में आम तौर पर चीज़ों को ख़रीदा या बेचा नहीं जा सकता है। इण्‍टरनेट पर कुछ कम्‍पनियों ने कुछ उत्‍पादों व सेवाओं को बिटकॉइन से ख़रीदा जा सकता है, लेकिन ये बेहद सीमित है। 

पारम्‍परिक रूप से धातुएँ, ख़ासकर सोना और चाँदी, ऐसे सार्वभौमिक समतुल्‍य और विनिमय के माध्‍यम का काम करती थीं। यह बात सच है कि आधुनिक दौर में काग़ज़ के नोट और प्‍लास्टिक व कुछ इलेक्‍ट्रॉनिक माध्‍यमों ने भी मुद्रा का स्‍थान ग्रहण किया है जिनका स्‍वयं का मूल्‍य किसी सुनिश्चित मात्रा में धातु के मूल्‍य के बराबर हो ऐसा आवश्‍यक नहीं है। लेकिन ग़ौरतलब बात यह है कि ऐसा इसलिए मुमकिन हो पाता है कि देशों की सरकारें इसकी गारण्‍टी देती हैं और सरकारों की यह क्षमता उनकी अर्थव्‍यवस्‍था की स्थिति से निर्धारित होती है। लेकिन बिटकॉइन जैसी क्रिप्‍टोकरेंसी सरकारों के नियंत्रण से मुक्‍त हैं, इसलिए लोगों के बीच मुद्रा के रूप में इनपर भरोसा क़ायम होना बहुत मुश्किल है। इसके अतिरिक्‍त इसकी एक सीमा यह भी है कि इण्‍टरनेट का इस्‍तेमाल न करने वाले दुनिया के अरबों लोगों के लिए इसका कोई मायने नहीं है। 

मुद्रा के रूप में भले ही बिटकॉइन जैसी क्रिप्‍टोकरेंसी भले ही स्‍थापित न हो पायी हो, लेकिन इसके बावजूद दुनिया भर में उनपर निवेश लगातार बढ़ता जा रहा है। उनके मूल्‍य को लेकर लगायी जा रही अटकलों की वजह से दुनियाभर में क्रिप्‍टोकरेंसी पर आधारित सट्टेबाज़ी का विशाल विश्‍वव्‍यापी बाज़ार निर्मित हुआ है। क्रिप्‍टोकरेंसी पर ट्रेडिंग करने में मदद करने वाले ढेरों प्‍लेटफ़ॉर्म विकसित हुए हैं जिन्‍हें क्रिप्‍टो-एक्‍सचेंज कहा जाता है। वास्‍तविक अर्थव्‍यवस्‍था में मुनाफ़े की गिरती दर के संकट की वजह से हुए पूँजी को लाभप्रद निवेश के अवसर कम होते जा रहे हैं जिसका नतीजा यह हो रहा है कि पूँजी अधिक मुनाफ़े की चाहत में सट्टाबाज़ार की ओर रुख़ कर रही है क्‍योंकि वहाँ मुनाफ़ा कमाने के अवसर दिखते हैं। तमाम निवेशकों को क्रिप्‍टोकरेंसी के निवेश में शेयर बाज़ार की सट्टेबाज़ी से भी ज्‍़यादा मुनाफ़ा कमाने की सम्‍भावना दिखती है। यह बात दीगर है कि इसमें जोखिम भी ज्‍़यादा होता है क्‍योंकि भविष्‍य में क्रिप्‍टोकरेंसी के मूल्‍य बढ़ने की अटकल पर आधारित सट्टेबाज़ी से एक बुलबुला फूलता जाता है जिसे देर-सबेर फूटना ही होता है, जिसके बाद कई निवेशक बर्बाद हो जाते हैं। पिछले एक दशक के दौरान कई बार यह बुलबुला फूटता रहा है, लेकिन नये निवेश और नये सिरे से अटकलबाज़ी की वजह से बुलबुला फिर से फूलने लगता है।

इसके अतिरिक्‍त आज के दौर में क्रिप्‍टोकरेंसी का एक अन्‍य उपयोग इण्‍टरनेट की मदद से ग़ैर-क़ानूनी रूप से ड्रग्‍स और हथियारों की ख़रीदफ़रोख्‍़त में किया जा रहा है। ऐसा तथाकथित डार्क वेब के ज़रिये किया जाता है जो इण्‍टरनेट की एक भीतरी परत होती है जिसतक आम इण्‍टरनेट उपयोगकर्ताओं की पहुँच नहीं होती है और जिसके लिए एक विशेष सॉफ़्टवेयर की ज़रूरत होती है। डार्क वेब में बिटकॉइन जैसी क्रिप्‍टोकरेंसी का इस्‍तेमाल ड्रग्‍स और हथियार को गुमनाम रूप में ख़रीदने में भी किया जा रहा है। 

ब्‍लॉकचेन की अचूक तकनीक की वजह से बिटकॉइन व अन्‍य क्रिप्‍टोकरेंसी की माइनिंग की प्रक्रिया में कोई धाँधली होना बहुत मुश्किल है, लेकिन क्रिप्‍टो-एक्‍सचेंज के ज़रिये बिटकॉइन में होने वाले निवेश और सट्टेबाज़ी की प्रकिया में धोखाधड़ी और घोटालों के कई मामले सामने आते रहे हैं। मिसाल के लिए हाल ही में कर्नाटक में बिटकॉइन घोटाला सामने आया जिसमें एक व्‍यक्ति ने अवैध रूप से हज़ारों बिटकॉइन हाथिया लिए थे। 

इस प्रकार हम पाते हैं कि आज के पूँजीवादी दौर में ब्‍लॉकचेन जैसी अचूक तकनीक के आधार पर बनी क्रिप्‍टोकरेंसी का उपयोग सट्टेबाज़ी के ज़रिये बेहिसाब मुनाफ़े के लिए और ड्रग्‍स व अवैध हथियारों की ख़रीद-फ़रोख्‍़त  करने के लिए और धोखाधड़ी करने के लिए किया जा रहा है। पूँजीवाद की चौहद्दी के भीतर क्रिप्‍टोकरेंसी का यही हश्र हो सकता है क्‍योंकि भरोसे में कमी की वजह से वह मुद्रा के रूप में स्‍थापित नहीं हो सकेगी। लेकिन इस बात की सम्‍भावना से इंकार नहीं किया जा सकता है कि समाजवाद की उन्‍नत मंजिलों में मालों के रूप में सामाजिक श्रम के विनिमय का लेखा-जोखा रखने की एक तकनोलॉजी के रूप में ब्‍लॉकचेन जैसी या उससे भी उन्‍नत किसी तकनोलॉजी का इस्‍तेमाल किया जाए, जो कि राष्‍ट्रीय अर्थव्‍यवस्‍था के केन्‍द्रीय संचालन व उसके लेखा-कार्य के संचालन को अधिक आसान और कम श्रमसाध्‍य बनाने के लिए किया जाए।

डीएन झा

डीएन झा: वो इतिहासकार, जिसने तथ्यों-तर्कों के आधार पर इतिहास से जुड़े मिथकों को तोड़ा

https://m.thewirehindi.com/article/remembering-historian-dn-jha/158482/amp


wikipedia- D._N._Jha


https://en-m-wikipedia-org.translate.goog/wiki/D._N._Jha?_x_tr_sl=en&_x_tr_tl=hi&_x_tr_hl=hi&_x_tr_pto=tc,sc


वैदिक काल पर तार्किक और वैज्ञानिक शोध करने वाले इतिहासकार डीएन झा नहीं रहे

https://www.bbc.com/hindi/india-55937025


नहीं रहा इतिहासकारों का इतिहासकार


https://janchowk.com/beech-bahas/historian-professor-dn-jha-is-no-more/


हिन्दू और हिन्दुत्व को बौद्धिक चुनौती देने वाले इतिहासकार प्रो. डी.एन. झा नहीं रहें


https://www.dalitdastak.com/historian-d-n-jha-died/


राम मंदिर-बाबरी मस्जिद पर महत्वपूर्ण खोज करने वाले इतिहासकार डी एन झा


https://mediaswaraj.com/historian-prof-dn-jha-chandra-prakash-jha/


प्राचीन भारत में खाया जाता था गोमांस', बताने वाले इतिहासकार द्विजेंद्र नारायण झा क्यों हैं चर्चा में


https://navbharattimes.indiatimes.com/state/bihar/patna/tribute-historian-dwijendra-narayan-jha-trends-twitter-hindu-know-updates/amp_articleshow/80721306.cms?utm_source=orionnews&utm_medium=referral&utm_campaign=news1








१९५३ में स्टालिन की शव यात्रा पर उमड़ा सैलाब 

*On this day in 1953, a sea of humanity thronged the streets for Stalin's funeral procession.* Joseph Stalin, the Soviet Union's fea...