जालिम ने मारा
बहुत गलत किया
पर मजलूम भी तो सिर उठा कर सीधा खडा हुआ था
गलती उसकी भी तो है
मैं न जालिम के साथ हूं
मैं न मजलूम के साथ हूं
मैं हूं थाली का बैंगन
रहता हूं उधर जिधर हो वजन ज्यादा
हुकूमत के साथ
कुछ 'तार्किक, आधुनिक, सेकुलर' लोग बिना यह गौर किये कि कौन शोषण-जुल्म की व्यवस्था का संचालक है, कौन अपने हिसाब से आम जीवन जीता व्यक्ति, दोनों को समान नजर से देखने के हिमायती हैं। संभव है यह आम व्यक्ति हमारे विचारों मुताबिक आधुनिक तार्किक न होकर पिछड़ा, अंधविश्वासी, अतार्किक हो। हो सकता है कि हम इसे बदलना चाहते हों। पर क्या बदलाव की यह इच्छा हमें फासिस्टों और इस व्यक्ति को 'समान' दृष्टिकोण से देखने के निष्कर्ष पर ले जा सकती है?
कोई स्त्री अंधविश्वास के नाते किसी 'बाबा' के पास जाये, उससे बलात्कार हो तो क्या बलात्कारी के खिलाफ आवाज नहीं उठायेंगे क्योंकि वह अंधविश्वास की वजह से बलात्कार की शिकार हुई?
कोई दलित धार्मिक अंधविश्वास से मुक्त न होने के कारण मंदिर में जाये, वहां जुल्म का शिकार हो तो कहेंगे कि ठीक हुआ, अंधविश्वासी को सही सजा मिली?
मैं भी चाहता हूं कि पर्दा/बुर्का मुक्त समाज हो, पर ये लडकियां इस वक्त संघी गिरोह के डर से हिजाब छोड़ दें तो यह गारंटी तो है न कि संघी गिरोह भी फासिस्ट के बजाय शिष्ट-सदाचारी बन जायेगा, इनके खिलाफ अपनी मुहिम छोड देगा? कुछ वक्त पहले जो सुल्ली डील्स बुल्ली बाई एप बने उनमें जिन मुस्लिम स्त्रियों को निशाना बनाया गया वे तो लगभग सभी उच्च शिक्षित, आधुनिक, बुर्का-हिजाब मुक्त अपने क्षेत्रों की जानी-मानी प्रोफेशनल थीं। फिर?
ये सब परीक्षण 1930 के दशक में नाजियों के साथ हो चुका है जब परंपरागत नेतृत्व यहूदियों को नाजियों के शुरुआती हमलों के सामने झुकने के लिए, नाजी विरोधी साझा संघर्ष से अलग रहने के लिए, समझाता रहा कि ऐसा करने से वे शांत हो जायेंगे। नतीजा सबको मालूम है।
*मुकेश असीम*
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कर्नाटक में मुस्लिम छात्रा के हिजाब पहनने के खिलाफ हिंदू युवकों द्वारा भगवा गमछे और झंडे लेकर उसे डराने की कोशिश करने की घटना का विरोध करने पर हमारे कुछ दोस्त कह रहे हैं कि आप लोग हिजाब का समर्थन मत कीजिए
हम हिजाब का समर्थन नहीं कर रहे
हम नागरिक की स्वतंत्रता का समर्थन कर रहे हैं
कल्पना कीजिए कल को मुसलमान लड़के भीड़ लगाकर हरे झंडे लेकर हिंदू औरतों के मांग में सिंदूर लगाने का विरोध करें
और सड़क पर जाती हिंदू औरतों से कहें कि अपनी मांग का सिंदूर मिटाओ क्योंकि यह पितृसत्ता की निशानी है औरतों की गुलामी का प्रतीक है
तब क्या आप यह कहेंगे कि यह मुसलमान लड़के ठीक कर रहे हैं और हिंदू औरतों को पितृसत्ता से आजाद कर रहे हैं
नहीं तब आप कहेंगे कि हिंदू औरतों को पितृसत्ता से आजाद करने का यह सही तरीका नहीं है
हर औरत को मांग में सिंदूर लगाने या ना लगाने के बारे में खुद फैसला करना है
इसी तरह हर महिला को हिजाब पहनने या ना पहनने के बारे में खुद फैसला करने की आजादी है
हम औरतों की इसी आजादी का समर्थन कर रहे हैं
*हिमांशु कुमार*
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