Monday, 3 August 2020

फ्रेडरिक एंगेल्स , " फ्रांस में वर्ग संघर्ष " के 1895 के संस्करण की भूमिका , लंदन , 6 मार्च,1895

विश्व इतिहास का व्यंग्य ऐसा है कि सब कुछ उलट-पुलट जाता है। हम लोग "क्रांतिकारी" लोग, "उखाड़ फेंकने वाले" लोग - गैरकानूनी तरीकों , उखाड़ फेंकने वाले तरीकों के मुकाबले कानूनी तरीकों से कहीं ज्यादा मजबूत हो रहे हैं । अमन की पार्टियां , जैसा कि वे अपने को कहती हैं , अपने ही द्वारा स्थापित कानूनी परिस्थितियों में घुट मर रही हैं । ओदिलां बारो की आवाज में वे निराशा से चीत्कार करती हैं : -- कानूनियत हमारी मौत है ; जबकि इसी कानूनियत के तहत हमारे पुट्ठे मजबूत होते हैं , हमारे गाल सुर्ख होते हैं और हम अजर , अमर जीवन के मूर्तिमान प्रतीक दिखाई देते हैं। और अगर हम इतने पागल नहीं हैं कि उन्हें ख़ुश करने के लिए , सड़कों पर लड़ने के लिए प्रवृत्त किये जा सकें , तो फिर उनके लिए अंत में एक यही चारा रह जाता है कि खुद ही इस सांघातिक कानूनियत के बंधन को तोड़ अपने को मुक्त करें ।
     इस बीच वे सत्ता उखाड़ फेंकने के खिलाफ नए - नए कानून बना रहे हैं। फिर हर चीज उलट-पुलट जाती है । आज के ये उखाड़ फेंकने के कट्टर विरोधी लोग क्या स्वयं कल के उखाड़ फेंकने वाले नहीं हैं ?   1866 के गृहयुद्ध को क्या हमने भड़काया ? हनोवर के राजा , हेसन के राजा और नस्साऊ के ड्यूक को क्या हमने उनकी पुश्तैनी ,     कानूनी मिल्कियत , उनकी रियासतों से निकालकर इन रियासतों को बलात संयोजित कर लिया ? जर्मन महासंघ तथा तीन-तीन शाही सल्तनतों के ये उखाड़ फेंकने वाले अब उखाड़ फेंकने की शिकायत करते हैं ! ग्राक्ख राजद्रोह की शिकायत करें , यह कौन बर्दाश्त करेगा ? बिस्मार्क की पूजा करने वाले उखाड़ फेंकने की निंदा करें , यह कौन सहन कर सकता है ?                                          फिर भी उन्हें अपने उखाड़ फेंकने विरोधी विधेयक पेश करने दीजिए , उन्हें और भी सख्त बनाने दीजिए , पूरे फौजदारी कानून को रबड़ की तरह खींचने - मरोड़ने दीजिए , इससे उन्हें अपनी बेबसी के सबूत के सिवा और कुछ नहीं हासिल हो सकता । अगर वह सामाजिक-जनवाद पर करारी चोट करना चाहते हैं , तो उन्हें इनके अलावा दूसरी ही तरह की कार्रवाइयां करनी होंगी । इस समय जो सामाजिक-जनवादी उखाड़ फेंकना , कानून का पालन करते हुए बखूबी चल रहा है उससे वे अमन की पार्टियों के उखाड़ फेंकने द्वारा , जो कानून को तोड़े बिना नहीं चल सकता , ही निबट सकते हैं । प्रशियाई नौकरशाह श्री रोस्सलर और प्रशियाई जनरल श्री फॉन बोगुस्लाव्स्की ने , उन्हें जो तरीका सुझाया है , वही एक तरीका है जिससे  मजदूरों को , जो सड़कों पर निकल कर लड़ने से साफ इनकार करते हैं , काबू में लाना  शायद अब भी संभव हो सकता है । यह तरीका है : संविधान का उल्लंघन , अधिनायकत्व ,  निरंकुश शासन की पुनर्स्थापना , 'बादशाह की मर्जी ही सबसे बड़ा कानून है '! इसलिए महानुभावो , हिम्मत से काम लीजिए , यहां अधकचरेपन से काम नहीं चलेगा , यहां जो करना है वह मुकम्मल ढंग से करना पड़ेगा ! लेकिन यह न भूलिएगा  कि सभी लघु राज्यों की तरह और सामान्यतः सभी आधुनिक राज्यों की तरह जर्मन साम्राज्य भी एक संविदा का फल है : पहले तो राजाओं की एक दूसरे के साथ संविदा का और दूसरे राजाओं की जनता के साथ संविदा का फल । यदि इस संविदा को एक पक्ष तोड़ता है तो पूरी संविदा छिन्न-भिन्न हो जाती है; तब जैसा कि बिस्मार्क ने 1866 में इतने खूबसूरत ढंग से हमें दिखाया , दूसरा पक्ष भी उससे बंधा नहीं रह सकता । इसलिए यदि आप जर्मन राज्य के संविधान को तोड़ते हैं , तो सामाजिक-जनवाद आपकी निस्बत जो भी चाहे करने को आजाद होगा और करेगा ‌। लेकिन तब वह क्या करेगा इसके बारे में वह आज आपके सामने बोल पड़ने वाला नहीं है।
-- फ्रेडरिक एंगेल्स ,  " फ्रांस में वर्ग संघर्ष " के 1895 के संस्करण की भूमिका ,          लंदन , 6 मार्च,1895

फ्रेडरिक एंगेल्स , " लुडविग फायरबाख और क्लासकीय जर्मन दर्शन का अंत "

परंतु एक बात में समाज के विकास का इतिहास प्रकृति के विकास के इतिहास से मूलभूत रूप में भिन्न सिद्ध होता है। प्रकृति में - जहां तक हम प्रकृति पर मनुष्य की प्रतिक्रिया की उपेक्षा करते हैं - हमें केवल अंधी , अचेतन , एक दूसरे पर प्रभाव डालती हुई शक्तियां मिलती हैं , जिनकी परस्पर क्रिया के द्वारा सामान्य नियम परिचालित होते हैं। वहां जितने घटना-व्यापार होते हैं - चाहे वे सतह पर दिखाई देने वाली अनगिनत प्रगटत: आकस्मिक घटनाएं हों या वे अंतिम परिणामों में हों , जो इन आकस्मिक घटनाओं में अंतर्निहित नियमबद्धता की पुष्टि करते हैं - उनमें कोई भी चेतन रूप से इच्छित लक्ष्य की पूर्त्ति के रूप में नहीं होता है। इसके विपरीत, समाज के इतिहास में कार्य करने वाले लोग चेतना संपन्न होते हैं ; वे सोच-विचार या आवेग से काम करते हैं , उनके कार्य का एक विशेष लक्ष्य होता है ; कोई भी चीज बगैर सचेतन ध्येय के , बगैर किसी उद्दिष्ट अभिप्राय के नहीं होती । लेकिन यह भेद , ऐतिहासिक छानबीन के लिए - विशेषकर अमुक विशेष युगों तथा घटनाओं की छानबीन के लिए - महत्त्वपूर्ण होते हुए भी इस तथ्य को नहीं बदल सकता कि इतिहास का क्रम आंतरिक सामान्य नियमों के अधीनस्थ है। वास्तव में यहां भी सभी व्यक्तियों के चेतन रूप से इच्छित लक्ष्यों के बावजूद , प्रगटत: सतह पर आकस्मिकता का ही राज दिखाई देता है । जिसकी इच्छा की जाती है वह बिरले ही कभी होता है ; अधिकांशतः अनगिनत इच्छित ध्येय आपस में टकराते हैं और एक दूसरे के मार्ग में बाधक होते हैं ; या ये लक्ष्य स्वयं ऐसे होते हैं , जो आरंभ से ही असाध्य होते हैं अथवा उनकी पूर्त्ति के साधन ही अपर्याप्त होते हैं । इस तरह इतिहास के क्षेत्र में अनगिनत व्यक्तिगत इच्छाओं और व्यक्तिगत क्रियाओं के टकराव द्वारा एक ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है , जो जड़ प्रकृति के क्षेत्र में प्रचलित स्थिति के बिल्कुल समान होती है। कार्यों के लक्ष्य उद्दिष्ट होते हैं , पर इन कार्यों द्वारा वास्तव में जो नतीजे निकलते हैं , वे उद्दिष्ट नहीं होते , अथवा जब वे उद्दिष्ट लक्ष्य के अनुरूप ज्ञात भी होते हैं , तो उनके अंतिम फल अंतत: उद्दिष्ट से बिल्कुल भिन्न होते हैं । ऐतिहासिक घटनाएं भी , इस प्रकार , समग्रत: संयोग के अधीन ज्ञात होती हैं । पर जहां बाहर से सतह पर आकस्मिकता का बोलबाला दिखाई देता है , वहां वस्तुत: सदैव आंतरिक , अप्रगट नियमों का शासन चलता है । सवाल केवल इन नियमों का पता लगाने का है ।
 मनुष्य इस माने में अपना इतिहास स्वयं बनाते हैं (चाहे उसका परिणाम कुछ भी हो) कि प्रत्येक व्यक्ति अपने सचेत , इच्छित लक्ष्य का अनुसरण करता है । और भिन्न दिशाओं में क्रियाशील इन अनेक इच्छाओं तथा बाह्य जगत पर उनके बहुविध प्रभावों का परिणाम ही इतिहास है । अतः सवाल इस बात का है कि ये बहुत-से व्यक्ति चाहते क्या हैं ? इच्छा आवेग या सोच विचार द्वारा निर्धारित होती है। पर आवेग या सोच-विचार निर्धारित करने वाले उत्तोलक बिल्कुल भिन्न प्रकार के होते हैं। अंशत: ये बाह्य पदार्थ हो सकते हैं और अंशत: भावमूलक प्रेरक - महत्त्वाकांक्षा ,     " सत्य और न्याय का आग्रह " , व्यक्तिगत घृणा अथवा महज किसी किस्म की व्यक्तिगत सनक । पर एक ओर हम देख चुके हैं कि इतिहास में क्रियाशील अनेक व्यक्तिगत इच्छाएं अधिकांशतः वांछित से बिल्कुल भिन्न प्राय: उलटे ही परिणाम उपस्थित करती हैं ; अतः,अंतिम परिणाम के सम्बन्ध में उनका प्रेरक हेतु भी गौण महत्त्व का होता है। 
  दूसरी ओर यह प्रश्न उठ खड़ा होता है : इन प्रेरणाओं के पीछे कौन सी उत्प्रेरक शक्तियां खड़ी हैं ? वे ऐतिहासिक कारण क्या हैं जो कार्यरत लोगों के मस्तिष्क में इन प्रेरणाओं        का रूप धारण कर लेते हैं ? 
-- फ्रेडरिक एंगेल्स  ,  " लुडविग फायरबाख और क्लासकीय जर्मन दर्शन का अंत "

प्रेमचंद (31 जुलाई 1880 – 8 अक्टूबर 1936)




प्रेमचंद (31 जुलाई 1880 – 8 अक्टूबर 1936) हिन्दी और उर्दू के सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यासकार, कहानीकार एवं विचारक थे। उनके जन्मदिन के अवसर पर प्रस्तुत है उनकी रचनाओं से चुने हुए उद्धरण: 


सम्पत्ति विष की गाँठ


जब तक सम्पत्ति मानव-समाज के संगठन का आधार है, संसार में अन्तरराष्ट्रीयता का प्रादुर्भाव नहीं हो सकता। राष्ट्रों-राष्ट्रों की, भाई-भाई की, स्त्री-पुरुष की लड़ाई का कारण यही सम्पत्ति है। संसार में जितना अन्याय और अनाचार है, जितना द्वेष और मालिन्य है, जितनी मूर्खता और अज्ञानता है, उसका मूल रहस्य यही विष की गाँठ है। जब तक सम्पत्ति पर व्यक्तिगत अधिकार रहेगा, तब तक मानव-समाज का उद्धार नहीं हो सकता। मज़दूरों के काम का समय घटाइये, बेकारों को गुज़ारा दीजिये, ज़मींदारों और पूँजीपतियों के अधिकारों को घटाइये, मज़दूरों-किसानों के स्वत्वों को बढ़ाइये, सिक्के का मूल्य घटाइये, इस तरह के चाहे जितने सुधार आप करें, लेकिन यह जीर्ण दीवार इस तरह के टीपटाप से नहीं खड़ी रह सकती। इसे नये सिरे से गिराकर उठाना होगा।—


— संसार आदिकाल से लक्ष्मी की पूजा करता चला आता है।— लेकिन संसार का जितना अकल्याण लक्ष्मी ने किया है, उतना शैतान ने नहीं किया। यह देवी नहीं डायन है।


-- सम्पत्ति ने मनुष्य को क्रीतदास बना लिया है। उसकी सारी मानसिक आत्मिक और दैहिक शक्ति केवल सम्पत्ति के संचय में बीत जाती है। मरते दम तक भी हमें यही हसरत रहती है कि हाय, इस सम्पत्ति का क्या हाल होगा। हम सम्पत्ति के लिए जीते हैं, उसी के लिए मरते हैं। हम विद्वान बनते हैं सम्पत्ति के लिए, गेरुए वस्त्र धारण करते हैं सम्पत्ति के लिए। घी में आलू मिलाकर हम क्यों बेचते हैं? दूध में पानी क्यों मिलाते हैं? भाँति-भाँति के वैज्ञानिक हिंसा-यन्त्र क्यों बनाते हैं? वेश्याएँ क्यों बनती हैं, और डाके क्यों पड़ते हैं? इसका एकमात्र कारण सम्पत्ति है। जब तक सम्पत्तिहीन समाज का संगठन नहीं होगा, जब तक सम्पत्ति व्यक्तिवाद का अन्त न होगा, संसार को शान्ति न मिलेगी।

✍🏻:- मुंशी प्रेमचंद ('राष्ट्रीयता और अन्तरराष्ट्रीयता' लेख से)


महाजनी सभ्यता

आग लगाकर चाहें कि लपटें न उठें, असम्भव। पैसा अपने साथ ये सारी बुराइयाँ लाता है, जिन्होंने दुनिया को नरक बना दिया है। इस पैसा पूजा को मिटा दीजिये सारी बुराइयाँ अपने आप मिट जाएंगी, जड़ न खोदकर केवल फुंदगी की पत्तियां तोडना तो बेकार है। 


...यह नयी सभ्यता (रूस की समाजवादी व्यवस्था) धनाढ्यता को हेय और लज़्ज़ाजनक तथा घातक विष समझती है। वहां कोई आदमी अमीरी ढंग से रहे तो लोगों की ईर्ष्या का पात्र नहीं होता, बल्कि तुच्छ और हेय समझा जाता है। 

✍🏻:- मुंशी प्रेमचंद



आंदोलन, प्रदर्शन और जुलूस


"लोग कहते हैं आंदोलन, प्रदर्शन और जुलूस निकालने से क्या होता है...? 

इससे यह सिद्ध होता है कि हम जीवित हैं, अटल हैं और मैदान से हटे नहीं हैं। 

हमें अपने हार न मानने वाले स्वाभिमान का प्रमाण देना था। 

हमें यह दिखाना है कि हम गोलियों और अत्याचारों से भयभीत होकर अपने लक्ष्य से हटने वाले नहीं और हम उस व्यवस्था का अंत करके रहेंगे, जिसका आधार स्वार्थीपन और खून पर है। "

✍🏻:- मुंशी प्रेमचंद



क्रांति


"अब क्रांति में ही देश का उद्धार है – ऐसी क्रांति में, जो सर्वव्यापक हो, जीवन के मिथ्या आदर्शों का, झूठे सिद्धांतों का, परिपाटियों का अंत कर दे, जो एक नए युग की प्रवर्तक हो, एक नयी सृष्टि खड़ी कर दे, जो मिट्टी के असंख्य देवताओं को तोड़-फोड़कर चकना-चूर कर दे। जो मनुष्य को धन और धर्म के आधार पर टिकने वाले राज्य के पंजे से मुक्त कर दे।" 

✍🏻प्रेमचंद के "कर्मभूमि" उपन्यास से


 कानून और न्याय


"न्याय और नीति लक्ष्मी के खिलौने हैं, वह जैसे चाहती है नचाती है।" ~ मुंशी प्रेमचंद


"कानून और न्याय उसका है, जिसके पास पैसा है।कानून तो है कि महाजन किसी असामी के साथ कड़ाई न करे, कोई जमींदार किसी कास्तकार के साथ सख्ती न करे; मगर होता क्या है। रोज ही देखते हो। जमींदार मुसक बँधवा के पिटवाता है और महाजन लात और जूते से बात करता है। जो किसान पोढ़ा है, उससे न जमींदार बोलता है, न महाजन। ऐसे आदमियों से हम मिल जाते हैं और उनकी मदद से दूसरे आदमियों की गर्दन दबाते हैं।"

✍🏻:- मुंशी प्रेमचंद के "गोदान" उपन्यास से


"इस तरह जबर-जस्ती करने के लिए जो कानून चाहे, बना लो। यहाँ कोई सरकार का हाथ पकड़ने-वाला तो है नहीं। उसके सलाहकार भी तो सेठ-महाजन ही हैं।"

✍🏻:- मुंशी प्रेमचंद के 'रंगभूमि' उपन्यास से


डेमोक्रेसी


जिसे हम डेमोक्रेसी कहते हैं,वह व्यहवार में बड़े-बड़े व्यापारियों और जमींदारों का रा



प्रेमचंद (31 जुलाई 1880 – 8 अक्टूबर 1936) हिन्दी और उर्दू के सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यासकार, कहानीकार एवं विचारक थे। उनके जन्मदिन के अवसर पर प्रस्तुत है उनकी रचनाओं से चुने हुए उद्धरण: 


सम्पत्ति विष की गाँठ


जब तक सम्पत्ति मानव-समाज के संगठन का आधार है, संसार में अन्तरराष्ट्रीयता का प्रादुर्भाव नहीं हो सकता। राष्ट्रों-राष्ट्रों की, भाई-भाई की, स्त्री-पुरुष की लड़ाई का कारण यही सम्पत्ति है। संसार में जितना अन्याय और अनाचार है, जितना द्वेष और मालिन्य है, जितनी मूर्खता और अज्ञानता है, उसका मूल रहस्य यही विष की गाँठ है। जब तक सम्पत्ति पर व्यक्तिगत अधिकार रहेगा, तब तक मानव-समाज का उद्धार नहीं हो सकता। मज़दूरों के काम का समय घटाइये, बेकारों को गुज़ारा दीजिये, ज़मींदारों और पूँजीपतियों के अधिकारों को घटाइये, मज़दूरों-किसानों के स्वत्वों को बढ़ाइये, सिक्के का मूल्य घटाइये, इस तरह के चाहे जितने सुधार आप करें, लेकिन यह जीर्ण दीवार इस तरह के टीपटाप से नहीं खड़ी रह सकती। इसे नये सिरे से गिराकर उठाना होगा।—


— संसार आदिकाल से लक्ष्मी की पूजा करता चला आता है।— लेकिन संसार का जितना अकल्याण लक्ष्मी ने किया है, उतना शैतान ने नहीं किया। यह देवी नहीं डायन है।


-- सम्पत्ति ने मनुष्य को क्रीतदास बना लिया है। उसकी सारी मानसिक आत्मिक और दैहिक शक्ति केवल सम्पत्ति के संचय में बीत जाती है। मरते दम तक भी हमें यही हसरत रहती है कि हाय, इस सम्पत्ति का क्या हाल होगा। हम सम्पत्ति के लिए जीते हैं, उसी के लिए मरते हैं। हम विद्वान बनते हैं सम्पत्ति के लिए, गेरुए वस्त्र धारण करते हैं सम्पत्ति के लिए। घी में आलू मिलाकर हम क्यों बेचते हैं? दूध में पानी क्यों मिलाते हैं? भाँति-भाँति के वैज्ञानिक हिंसा-यन्त्र क्यों बनाते हैं? वेश्याएँ क्यों बनती हैं, और डाके क्यों पड़ते हैं? इसका एकमात्र कारण सम्पत्ति है। जब तक सम्पत्तिहीन समाज का संगठन नहीं होगा, जब तक सम्पत्ति व्यक्तिवाद का अन्त न होगा, संसार को शान्ति न मिलेगी।

✍🏻:- मुंशी प्रेमचंद ('राष्ट्रीयता और अन्तरराष्ट्रीयता' लेख से)


महाजनी सभ्यता

आग लगाकर चाहें कि लपटें न उठें, असम्भव। पैसा अपने साथ ये सारी बुराइयाँ लाता है, जिन्होंने दुनिया को नरक बना दिया है। इस पैसा पूजा को मिटा दीजिये सारी बुराइयाँ अपने आप मिट जाएंगी, जड़ न खोदकर केवल फुंदगी की पत्तियां तोडना तो बेकार है। 


...यह नयी सभ्यता (रूस की समाजवादी व्यवस्था) धनाढ्यता को हेय और लज़्ज़ाजनक तथा घातक विष समझती है। वहां कोई आदमी अमीरी ढंग से रहे तो लोगों की ईर्ष्या का पात्र नहीं होता, बल्कि तुच्छ और हेय समझा जाता है। 

✍🏻:- मुंशी प्रेमचंद



आंदोलन, प्रदर्शन और जुलूस


"लोग कहते हैं आंदोलन, प्रदर्शन और जुलूस निकालने से क्या होता है...? 

इससे यह सिद्ध होता है कि हम जीवित हैं, अटल हैं और मैदान से हटे नहीं हैं। 

हमें अपने हार न मानने वाले स्वाभिमान का प्रमाण देना था। 

हमें यह दिखाना है कि हम गोलियों और अत्याचारों से भयभीत होकर अपने लक्ष्य से हटने वाले नहीं और हम उस व्यवस्था का अंत करके रहेंगे, जिसका आधार स्वार्थीपन और खून पर है। "

✍🏻:- मुंशी प्रेमचंद



क्रांति


"अब क्रांति में ही देश का उद्धार है – ऐसी क्रांति में, जो सर्वव्यापक हो, जीवन के मिथ्या आदर्शों का, झूठे सिद्धांतों का, परिपाटियों का अंत कर दे, जो एक नए युग की प्रवर्तक हो, एक नयी सृष्टि खड़ी कर दे, जो मिट्टी के असंख्य देवताओं को तोड़-फोड़कर चकना-चूर कर दे। जो मनुष्य को धन और धर्म के आधार पर टिकने वाले राज्य के पंजे से मुक्त कर दे।" 

✍🏻प्रेमचंद के "कर्मभूमि" उपन्यास से


 कानून और न्याय


"न्याय और नीति लक्ष्मी के खिलौने हैं, वह जैसे चाहती है नचाती है।" ~ मुंशी प्रेमचंद


"कानून और न्याय उसका है, जिसके पास पैसा है।कानून तो है कि महाजन किसी असामी के साथ कड़ाई न करे, कोई जमींदार किसी कास्तकार के साथ सख्ती न करे; मगर होता क्या है। रोज ही देखते हो। जमींदार मुसक बँधवा के पिटवाता है और महाजन लात और जूते से बात करता है। जो किसान पोढ़ा है, उससे न जमींदार बोलता है, न महाजन। ऐसे आदमियों से हम मिल जाते हैं और उनकी मदद से दूसरे आदमियों की गर्दन दबाते हैं।"

✍🏻:- मुंशी प्रेमचंद के "गोदान" उपन्यास से


"इस तरह जबर-जस्ती करने के लिए जो कानून चाहे, बना लो। यहाँ कोई सरकार का हाथ पकड़ने-वाला तो है नहीं। उसके सलाहकार भी तो सेठ-महाजन ही हैं।"

✍🏻:- मुंशी प्रेमचंद के 'रंगभूमि' उपन्यास से


डेमोक्रेसी


जिसे हम डेमोक्रेसी कहते हैं,वह व्यहवार में बड़े-बड़े व्यापारियों और जमींदारों का राज्य है और कुछ नहीं। चुनाव में वही बाजी ले जाता है जिसके पास रुपये हैं। रुपये के जोर से उसके लिए सभी सुविधाएं तैयार हो जाती हैं। बड़े-बड़े पंडित, बड़े-बड़े मौलवी, बड़े-बड़े लिखने और बोलने वाले जो जबान और कलम से पब्लिक को जिस तरफ चाहे फेर दें। सभी सोने के देवता के पैरों पर माथा रगड़ते हैं ।   

✍🏻:- मुंशी प्रेमचंद (गोदान )



साहित्य का उद्देश्य


"जिस साहित्य से हमारी सुरुचि न जागे, आध्यात्मिक और मानसिक तृप्ति न मिले, हममें गति और शक्ति न पैदा हो, हमारा सौंदर्य प्रेम न जागृत हो, जो हममें संकल्प और कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करने की सच्ची दृढ़ता न उत्पन्न करे, वह हमारे लिए बेकार है वह साहित्य कहलाने का अधिकारी नहीं है।" ~ ✍🏻:- मुंशी प्रेमचंद


"हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौंदर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सच्चाइयों का प्रकाश हो - जो हममें गति, संघर्ष और बेचैनी पैदा करे, सुलाए नहीं क्योंकि अब सोना मृत्यु का लक्षण है ।" ✍🏻:- मुंशी प्रेमचंद

 (सभापति, प्रलेस, 1936)


राष्टवाद


राष्ट्रीयता वर्तमान युग का कोढ़ है, उसी तरह जैसे मध्यकालीन युग का कोढ़ साम्प्रदायिकता थी। नतीजा दोनों का एक है। साम्प्रदायिकता अपने घेरे के अन्दर पूर्ण शान्ति और सुख का राज्य स्थापित कर देना चाहती थी, मगर उस घेरे के बाहर जो संसार था, उसको नोचने-खसोटने में उसे जरा भी मानसिक क्लेश न होता था। राष्ट्रीयता भी अपने परिमित क्षेत्र के अन्दर रामराज्य का आयोजन करती है। उस क्षेत्र के बाहर का संसार उसका शत्रु है। सारा संसार ऐसे ही राष्ट्रों या गिरोहों में बॅंटा हुआ है, और सभी एक-दूसरे को हिंसात्मक सन्देह की दृष्टि से देखते हैं और जब तक इसका अन्त न होगा, संसार में शान्ति का होना असम्भव है। जागरूक आत्माएँ संसार में अन्तर्राष्ट्रीयता का प्रचार करना चाहती हैं और कर रही हैं, लेकिन राष्ट्रीयता के बन्धन में जकड़ा हुआ संसार उन्हें ड्रीमर या शेखचिल्ली समझकर उनकी उपेक्षा करता है।' (विविध प्रसंग, 2, अमृतराय, 1980, पृष्ठ 333-34)


पूंजीपति और किसान


"जिधर देखिए उधर पूंजीपतियों की घुड़दौड़ मची हुई है। किसानों की खेती उजड़ जाय, उनकी बला से। कहावत के उस मूर्ख की भाँति जो उसी डाल को काट रहा था, जिस पर वह बैठा था, यह समुदाय भी उसी किसान की गर्दन काट रहा है, जिसका पसीना उसी की सेवा में पानी की तरह बह रहा है।' (वही, पृ. 331)


किसान 


"जब किसान निपट मूर्ख था, तो उसके लिए काले और गोरे पूंजीपति में कोई अन्तर न था। पर, जब धीरे-धीरे उसने राजनैतिक ज्ञान सीखा, राष्ट्र और जाति जैसे शब्दों से उसका परिचय हुआ, तो उसने सेठ पुनपुनवाला के वैष्णव तिलक और हिन्दूधर्म के प्रति असीम श्रद्धा और उनके द्वारा बनाए गए धर्मशालाओं और मन्दिरों को देखकर उन्हें अपना उद्धारक समझा। लेकिन जब पुनपुनवाला की मिलों में उसकी ऊख की खरीद होने लगी, जब उनकी आढ़तों में उसका अनाज या सन तौला जाने लगा, तब उसे अनुभव हुआ कि सेठ जी बाहर से जितने बड़े धर्मात्मा और देशभक्त हैं, भीतर से उतने ही लुटेरे और बन्धुद्रोही भी हैं, और धन और देशप्रेम का यह सारा आडम्बर उन्होंने केवल अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए रच रक्खा है।" (वही, पृ. 33)


शिक्षा का व्यापारिकरण 


"यह किराये की तालीम हमारे कैरेक्टर को तबाह किये डालती है। हमने तालीम को भी एक व्यापार बना लिया है। व्यापार में ज्यादा पूंजी लगाओ ज्यादा नफा होगा। तालीम में भी ज्यादा खर्च करो ज्यादा ऊंचा ओहदा पाओगे।मैं चाहता हूँ ऊंची से ऊंची तालीम सबके लिए मुफ्त हो ताकि गरीब से गरीब आदमी भी ऊंची से ऊंची लियाकत हासिल कर सके और ऊंचे से ऊंचा ओहदा पा सके। यूनिवर्सिटी के दरवाजे मैं सब के लिये खुले रखना चाहता हूँ। सारा खर्च गवर्नमेंट पर पड़ना चाहिये। मुल्क को तालीम की उससे कहीं ज्यादा जरूरत है जितनी फौज की।" ✍🏻:- मुंशी प्रेमचंद



साम्प्रदायिकता और संस्कृति


साम्प्रदायिकता सदैव संस्कृति की दुहाई दिया करती है। उसे अपने असली रूप में निकलने में शायद लज्जा आती है, इसलिए वह उस गधे की भाँति जो सिंह की खाल ओढ़कर जंगल में जानवरों पर रोब जमाता फिरता था, संस्कृति का खोल ओढ़कर आती है। हिन्दू अपनी संस्कृति को कयामत तक सुरक्षित रखना चाहता है, मुसलमान अपनी संस्कृति को। दोनों ही अभी तक अपनी-अपनी संस्कृति को अछूती समझ रहे हैं, यह भूल गये हैं कि अब न कहीं हिन्दू संस्कृति है, न मुस्लिम संस्कृति और न कोई अन्य संस्कृति। अब संसार में केवल एक संस्कृति है, और वह है आर्थिक संस्कृति मगर आज भी हिन्दू और मुस्लिम संस्कृति का रोना रोये चले जाते हैं। हालाँकि संस्कृति का धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं। आर्य संस्कृति है, ईरानी संस्कृति है, अरब संस्कृति है। हिन्दू मूर्तिपूजक हैं, तो क्या मुसलमान कब्रपूजक और स्थान पूजक नहीं है। ताजिये को शर्बत और शीरीनी कौन चढ़ाता है, मस्जिद को खुदा का घर कौन समझता है। अगर मुसलमानों में एक सम्प्रदाय ऐसा है, जो बड़े से बड़े पैगम्बरों के सामने सिर झुकाना भी कुफ्र समझता है, तो हिन्दुओं में भी एक ऐसा है जो देवताओं को पत्थर के टुकड़े और नदियों को पानी की धारा और धर्मग्रन्थों को गपोड़े समझता है। यहाँ तो हमें दोनों संस्कृतियों में कोई अन्तर नहीं दिखता।


तो क्या भाषा का अन्तर है? बिल्कुल नहीं। मुसलमान उर्दू को अपनी मिल्ली भाषा कह लें, मगर मद्रासी मुसलमान के लिए उर्दू वैसी ही अपरिचित वस्तु है जैसे मद्रासी हिन्दू के लिए संस्कृत। हिन्दू या मुसलमान जिस प्रान्त में रहते हैं सर्वसाधारण की भाषा बोलते हैं चाहे वह उर्दू हो या हिन्दी, बंग्ला हो या मराठी। बंगाली मुसलमान उसी तरह उर्दू नहीं बोल सकता और न समझ सकता है, जिस तरह बंगाली हिन्दू। दोनों एक ही भाषा बोलते हैं। सीमाप्रान्त का हिन्दू उसी तरह पश्तो बोलता है, जैसे वहाँ का मुसलमान।


फिर क्या पहनावे में अन्तर है? सीमाप्रान्त के हिन्दू और मुसलमान स्त्रियों की तरह कुरता और ओढ़नी पहनते-ओढ़ते हैं। हिन्दू पुरुष भी मुसलमानों की तरह कुलाह और पगड़ी बाँधता है। अक्सर दोनों ही दाढ़ी भी रखते हैं। बंगाल में जाइये, वहाँ हिन्दू और मुसलमान स्त्रियाँ दोनों ही साड़ी पहनती हैं, हिन्दू और मुसलमान पुरुष दोनों कुरता और धोती पहनते है तहमद की प्रथा बहुत हाल में चली है, जब से साम्प्रदायिकता ने ज़ोर पकड़ा है।


खान-पान को लीजिए। अगर मुसलमान मांस खाते हैं तो हिन्दू भी अस्सी फीसदी मांस खाते हैं। ऊँचे दरजे के हिन्दू भी शराब पीते हैं, ऊँचे दरजे के मुसलमान भी। नीचे दरजे के हिन्दू भी शराब पीते है नीचे दरजे के मुसलमान भी। मध्यवर्ग के हिन्दू या तो बहुत कम शराब पीते हैं, या भंग के गोले चढ़ाते हैं जिसका नेता हमारा पण्डा-पुजारी क्लास है। मध्यवर्ग के मुसलमान भी बहुत कम शराब पीते है, हाँ कुछ लोग अफीम की पीनक अवश्य लेते हैं, मगर इस पीनकबाजी में हिन्दू भाई मुसलमानों से पीछे नहीं है। हाँ, मुसलमान गाय की कुर्बानी करते हैं। और उनका मांस खाते हैं लेकिन हिन्दुओं में भी ऐसी जातियाँ मौजूद हैं, जो गाय का मांस खाती हैं यहाँ तक कि मृतक मांस भी नहीं छोड़तीं, हालांकि बधिक और मृतक मांस में विशेष अन्तर नहीं है। संसार में हिन्दू ही एक जाति है, जो गो-मांस को अखाद्य या अपवित्र समझती है। तो क्या इसलिए हिन्दुओं को समस्त विश्व से धर्म-संग्राम छेड़ देना चाहिए?


संगीत और चित्रकला भी संस्कृति का एक अंग है, लेकिन यहाँ भी हम कोई सांस्कृतिक भेद नहीं पाते। वही राग-रागनियाँ दोनों गाते हैं और मुगलकाल की चित्रकला से भी हम परिचित हैं। नाट्य कला पहले मुसलमानों में न रही हो, लेकिन आज इस सींगे में भी हम मुसलमान को उसी तरह पाते हैं जैसे हिन्दुओं को।


फिर हमारी समझ में नहीं आता कि वह कौन सी संस्कृति है, जिसकी रक्षा के लिए साम्प्रदायिकता इतना ज़ोर बाँध रही है। वास्तव में संस्कृति की पुकार केवल ढोंग है, निरा पाखण्ड। शीतल छाया में बैठे विहार करते हैं। यह सीधे-सादे आदमियों को साम्प्रदायिकता की ओर घसीट लाने का केवल एक मन्त्र है और कुछ नहीं। हिन्दू और मुस्लिम संस्कृति के रक्षक वही महानुभाव और वही समुदाय हैं, जिनको अपने ऊपर, अपने देशवासियों के ऊपर और सत्य के ऊपर कोई भरोसा नहीं, इसलिए अनन्त तक एक ऐसी शक्ति की ज़रूरत समझते हैं जो उनके झगड़ों में सरपंच का काम करती रहे।


इन संस्थाओं को जनता को सुख-दुख से कोई मतलब नहीं, उनके पास ऐसा कोई सामाजिक या राजनीतिक कार्यक्रम नहीं है जिसे राष्ट्र के सामने रख सकें। उनका काम केवल एक-दूसरे का विरोध करके सरकार के सामने फरियाद करना है। वे ओहदों और रियायतों के लिए एक-दूसरे से चढ़ा-ऊपरी करके जनता पर शासन करने में शासक के सहायक बनने के सिवा और कुछ नहीं करते।


मुसलमान अगर शासकों का दामन पकड़कर कुछ रियायतें पा गया है तो हिन्दु क्यों न सरकार का दामन पकड़ें और क्यों न मुसलमानों की भाँति सुख़र्रू बन जायें। यही उनकी मनोवृत्ति है। कोई ऐसा काम सोच निकालना जिससे हिन्दू और मुसलमान दोनों एक राष्ट्र का उद्धार कर सकें, उनकी विचार शक्ति से बाहर है। दोनों ही साम्प्रदायिक संस्थाएँ मध्यवर्ग के धनिकों, ज़मींदारों, ओहदेदारों और पदलोलुपों की हैं। उनका कार्यक्षेत्र अपने समुदाय के लिए ऐसे अवसर प्राप्त करना है, जिससे वह जनता पर शासन कर सकें, जनता  पर आर्थिक और व्यावसायिक प्रभुत्व जमा सकें। साधारण जनता के सुख-दुख से उन्हें कोई प्रयोजन नहीं। अगर सरकार की किसी नीति से जनता को कुछ लाभ होने की आशा है और इन समुदायों को कुछ क्षति पहुँचने का भय है, तो वे तुरन्त उसका विरोध करने को तैयार हो जायेंगे। अगर और ज़्यादा गहराई तक जायें तो हमें इन संस्थाओं में अधिकांश ऐसे सज्जन मिलेंगे जिनका कोई न कोई निजी हित लगा हुआ है। और कुछ न सही तो हुक्काम के बंगलों पर उनकी रसोई ही सरल हो जाती है। एक विचित्र बात है कि इन सज्जनों की अफसरों की निगाह में बड़ी इज्जत है, इनकी वे बड़ी ख़ातिर करते हैं।


इसका कारण इसके सिवा और क्या है कि वे समझते हैं,  ऐसों पर ही उनका प्रभुत्व टिका हुआ है। आपस में खूब लड़े जाओ, खूब एक-दूसरे को नुकसान पहुँचाये जाओ। उनके पास फरियाद लिये जाओ, फिर उन्हें किसका नाम है, वे अमर हैं। मजा यह है कि बाजों ने यह पाखण्ड फैलाना भी शुरू कर दिया है कि हिन्दू अपने बूते पर स्वराज प्राप्त कर सकते है। इतिहास से उसके उदाहरण भी दिये  जाते हैं। इस तरह की गलतहमियाँ फैला कर इसके सिवा कि मुसलमानों में और ज़्यादा बदगुमानी फैले और कोई नतीजा नहीं निकल सकता। अगर कोई ज़माना था, तो कोई ऐसा काल भी था, जब हिन्दुओं के ज़माने में मुसलमानों ने अपना साम्राज्य स्थापित किया था, उन ज़मानों को भूल जाइये। वह मुबारक दिन होगा, जब हमारे शालाओं में इतिहास उठा दिया जायेगा। यह ज़माना साम्प्रदायिक अभ्युदय का नहीं है। यह आर्थिक युग है और आज वही नीति सफल होगी जिससे जनता अपनी आर्थिक समस्याओं को हल कर सके जिससे यह अन्धविश्वास, यह धर्म के नाम पर किया गया पाखण्ड, यह नीति के नाम पर ग़रीबों को दुहने की कृपा मिटाई जा सके। जनता को आज संस्कृतियों की रक्षा करने का न अवकाश है न ज़रूरत। 'संस्कृति' अमीरों, पेटभरों का बेफिक्रों का व्यसन है। दरिद्रों के लिए प्राणरक्षा ही सबसे बड़ी समस्या है।


उस संस्कृति में था ही क्या, जिसकी वे रक्षा करें। जब जनता मूर्छित थी तब उस पर धर्म और संस्कृति का मोह छाया हुआ था। ज्यों-ज्यों उसकी चेतना जागृत होती जाती है वह देखने लगी है कि यह संस्कृति केवल लुटेरों की संस्कृति थी जो, राजा बनकर, विद्वान बनकर, जगत सेठ बनकर जनता को लूटती थी। उसे आज अपने जीवन की रक्षा की ज़्यादा चिन्ता है, जो संस्कृति की रक्षा से कहीं आवश्यक है। उस पुरान संस्कृति में उसके लिए मोह का कोई कारण नहीं है। और साम्प्रदायिकता उसकी आर्थिक समस्याओं की तरफ से आँखें बन्द किये हुए ऐसे कार्यक्रम पर चल रही है, जिससे उसकी पराधीनता चिरस्थायी बनी रहेगी।✍🏻:- मुंशी प्रेमचंदज्य है और कुछ नहीं। चुनाव में वही बाजी ले जाता है जिसके पास रुपये हैं। रुपये के जोर से उसके लिए सभी सुविधाएं तैयार हो जाती हैं। बड़े-बड़े पंडित, बड़े-बड़े मौलवी, बड़े-बड़े लिखने और बोलने वाले जो जबान और कलम से पब्लिक को जिस तरफ चाहे फेर दें। सभी सोने के देवता के पैरों पर माथा रगड़ते हैं ।   

✍🏻:- मुंशी प्रेमचंद (गोदान )



साहित्य का उद्देश्य


"जिस साहित्य से हमारी सुरुचि न जागे, आध्यात्मिक और मानसिक तृप्ति न मिले, हममें गति और शक्ति न पैदा हो, हमारा सौंदर्य प्रेम न जागृत हो, जो हममें संकल्प और कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करने की सच्ची दृढ़ता न उत्पन्न करे, वह हमारे लिए बेकार है वह साहित्य कहलाने का अधिकारी नहीं है।" ~ ✍🏻:- मुंशी प्रेमचंद


"हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौंदर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सच्चाइयों का प्रकाश हो - जो हममें गति, संघर्ष और बेचैनी पैदा करे, सुलाए नहीं क्योंकि अब सोना मृत्यु का लक्षण है ।" ✍🏻:- मुंशी प्रेमचंद

 (सभापति, प्रलेस, 1936)


राष्टवाद


राष्ट्रीयता वर्तमान युग का कोढ़ है, उसी तरह जैसे मध्यकालीन युग का कोढ़ साम्प्रदायिकता थी। नतीजा दोनों का एक है। साम्प्रदायिकता अपने घेरे के अन्दर पूर्ण शान्ति और सुख का राज्य स्थापित कर देना चाहती थी, मगर उस घेरे के बाहर जो संसार था, उसको नोचने-खसोटने में उसे जरा भी मानसिक क्लेश न होता था। राष्ट्रीयता भी अपने परिमित क्षेत्र के अन्दर रामराज्य का आयोजन करती है। उस क्षेत्र के बाहर का संसार उसका शत्रु है। सारा संसार ऐसे ही राष्ट्रों या गिरोहों में बॅंटा हुआ है, और सभी एक-दूसरे को हिंसात्मक सन्देह की दृष्टि से देखते हैं और जब तक इसका अन्त न होगा, संसार में शान्ति का होना असम्भव है। जागरूक आत्माएँ संसार में अन्तर्राष्ट्रीयता का प्रचार करना चाहती हैं और कर रही हैं, लेकिन राष्ट्रीयता के बन्धन में जकड़ा हुआ संसार उन्हें ड्रीमर या शेखचिल्ली समझकर उनकी उपेक्षा करता है।' (विविध प्रसंग, 2, अमृतराय, 1980, पृष्ठ 333-34)


पूंजीपति और किसान


"जिधर देखिए उधर पूंजीपतियों की घुड़दौड़ मची हुई है। किसानों की खेती उजड़ जाय, उनकी बला से। कहावत के उस मूर्ख की भाँति जो उसी डाल को काट रहा था, जिस पर वह बैठा था, यह समुदाय भी उसी किसान की गर्दन काट रहा है, जिसका पसीना उसी की सेवा में पानी की तरह बह रहा है।' (वही, पृ. 331)


किसान 


"जब किसान निपट मूर्ख था, तो उसके लिए काले और गोरे पूंजीपति में कोई अन्तर न था। पर, जब धीरे-धीरे उसने राजनैतिक ज्ञान सीखा, राष्ट्र और जाति जैसे शब्दों से उसका परिचय हुआ, तो उसने सेठ पुनपुनवाला के वैष्णव तिलक और हिन्दूधर्म के प्रति असीम श्रद्धा और उनके द्वारा बनाए गए धर्मशालाओं और मन्दिरों को देखकर उन्हें अपना उद्धारक समझा। लेकिन जब पुनपुनवाला की मिलों में उसकी ऊख की खरीद होने लगी, जब उनकी आढ़तों में उसका अनाज या सन तौला जाने लगा, तब उसे अनुभव हुआ कि सेठ जी बाहर से जितने बड़े धर्मात्मा और देशभक्त हैं, भीतर से उतने ही लुटेरे और बन्धुद्रोही भी हैं, और धन और देशप्रेम का यह सारा आडम्बर उन्होंने केवल अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए रच रक्खा है।" (वही, पृ. 33)


शिक्षा का व्यापारिकरण 


"यह किराये की तालीम हमारे कैरेक्टर को तबाह किये डालती है। हमने तालीम को भी एक व्यापार बना लिया है। व्यापार में ज्यादा पूंजी लगाओ ज्यादा नफा होगा। तालीम में भी ज्यादा खर्च करो ज्यादा ऊंचा ओहदा पाओगे।मैं चाहता हूँ ऊंची से ऊंची तालीम सबके लिए मुफ्त हो ताकि गरीब से गरीब आदमी भी ऊंची से ऊंची लियाकत हासिल कर सके और ऊंचे से ऊंचा ओहदा पा सके। यूनिवर्सिटी के दरवाजे मैं सब के लिये खुले रखना चाहता हूँ। सारा खर्च गवर्नमेंट पर पड़ना चाहिये। मुल्क को तालीम की उससे कहीं ज्यादा जरूरत है जितनी फौज की।" ✍🏻:- मुंशी प्रेमचंद



साम्प्रदायिकता और संस्कृति


साम्प्रदायिकता सदैव संस्कृति की दुहाई दिया करती है। उसे अपने असली रूप में निकलने में शायद लज्जा आती है, इसलिए वह उस गधे की भाँति जो सिंह की खाल ओढ़कर जंगल में जानवरों पर रोब जमाता फिरता था, संस्कृति का खोल ओढ़कर आती है। हिन्दू अपनी संस्कृति को कयामत तक सुरक्षित रखना चाहता है, मुसलमान अपनी संस्कृति को। दोनों ही अभी तक अपनी-अपनी संस्कृति को अछूती समझ रहे हैं, यह भूल गये हैं कि अब न कहीं हिन्दू संस्कृति है, न मुस्लिम संस्कृति और न कोई अन्य संस्कृति। अब संसार में केवल एक संस्कृति है, और वह है आर्थिक संस्कृति मगर आज भी हिन्दू और मुस्लिम संस्कृति का रोना रोये चले जाते हैं। हालाँकि संस्कृति का धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं। आर्य संस्कृति है, ईरानी संस्कृति है, अरब संस्कृति है। हिन्दू मूर्तिपूजक हैं, तो क्या मुसलमान कब्रपूजक और स्थान पूजक नहीं है। ताजिये को शर्बत और शीरीनी कौन चढ़ाता है, मस्जिद को खुदा का घर कौन समझता है। अगर मुसलमानों में एक सम्प्रदाय ऐसा है, जो बड़े से बड़े पैगम्बरों के सामने सिर झुकाना भी कुफ्र समझता है, तो हिन्दुओं में भी एक ऐसा है जो देवताओं को पत्थर के टुकड़े और नदियों को पानी की धारा और धर्मग्रन्थों को गपोड़े समझता है। यहाँ तो हमें दोनों संस्कृतियों में कोई अन्तर नहीं दिखता।


तो क्या भाषा का अन्तर है? बिल्कुल नहीं। मुसलमान उर्दू को अपनी मिल्ली भाषा कह लें, मगर मद्रासी मुसलमान के लिए उर्दू वैसी ही अपरिचित वस्तु है जैसे मद्रासी हिन्दू के लिए संस्कृत। हिन्दू या मुसलमान जिस प्रान्त में रहते हैं सर्वसाधारण की भाषा बोलते हैं चाहे वह उर्दू हो या हिन्दी, बंग्ला हो या मराठी। बंगाली मुसलमान उसी तरह उर्दू नहीं बोल सकता और न समझ सकता है, जिस तरह बंगाली हिन्दू। दोनों एक ही भाषा बोलते हैं। सीमाप्रान्त का हिन्दू उसी तरह पश्तो बोलता है, जैसे वहाँ का मुसलमान।


फिर क्या पहनावे में अन्तर है? सीमाप्रान्त के हिन्दू और मुसलमान स्त्रियों की तरह कुरता और ओढ़नी पहनते-ओढ़ते हैं। हिन्दू पुरुष भी मुसलमानों की तरह कुलाह और पगड़ी बाँधता है। अक्सर दोनों ही दाढ़ी भी रखते हैं। बंगाल में जाइये, वहाँ हिन्दू और मुसलमान स्त्रियाँ दोनों ही साड़ी पहनती हैं, हिन्दू और मुसलमान पुरुष दोनों कुरता और धोती पहनते है तहमद की प्रथा बहुत हाल में चली है, जब से साम्प्रदायिकता ने ज़ोर पकड़ा है।


खान-पान को लीजिए। अगर मुसलमान मांस खाते हैं तो हिन्दू भी अस्सी फीसदी मांस खाते हैं। ऊँचे दरजे के हिन्दू भी शराब पीते हैं, ऊँचे दरजे के मुसलमान भी। नीचे दरजे के हिन्दू भी शराब पीते है नीचे दरजे के मुसलमान भी। मध्यवर्ग के हिन्दू या तो बहुत कम शराब पीते हैं, या भंग के गोले चढ़ाते हैं जिसका नेता हमारा पण्डा-पुजारी क्लास है। मध्यवर्ग के मुसलमान भी बहुत कम शराब पीते है, हाँ कुछ लोग अफीम की पीनक अवश्य लेते हैं, मगर इस पीनकबाजी में हिन्दू भाई मुसलमानों से पीछे नहीं है। हाँ, मुसलमान गाय की कुर्बानी करते हैं। और उनका मांस खाते हैं लेकिन हिन्दुओं में भी ऐसी जातियाँ मौजूद हैं, जो गाय का मांस खाती हैं यहाँ तक कि मृतक मांस भी नहीं छोड़तीं, हालांकि बधिक और मृतक मांस में विशेष अन्तर नहीं है। संसार में हिन्दू ही एक जाति है, जो गो-मांस को अखाद्य या अपवित्र समझती है। तो क्या इसलिए हिन्दुओं को समस्त विश्व से धर्म-संग्राम छेड़ देना चाहिए?


संगीत और चित्रकला भी संस्कृति का एक अंग है, लेकिन यहाँ भी हम कोई सांस्कृतिक भेद नहीं पाते। वही राग-रागनियाँ दोनों गाते हैं और मुगलकाल की चित्रकला से भी हम परिचित हैं। नाट्य कला पहले मुसलमानों में न रही हो, लेकिन आज इस सींगे में भी हम मुसलमान को उसी तरह पाते हैं जैसे हिन्दुओं को।


फिर हमारी समझ में नहीं आता कि वह कौन सी संस्कृति है, जिसकी रक्षा के लिए साम्प्रदायिकता इतना ज़ोर बाँध रही है। वास्तव में संस्कृति की पुकार केवल ढोंग है, निरा पाखण्ड। शीतल छाया में बैठे विहार करते हैं। यह सीधे-सादे आदमियों को साम्प्रदायिकता की ओर घसीट लाने का केवल एक मन्त्र है और कुछ नहीं। हिन्दू और मुस्लिम संस्कृति के रक्षक वही महानुभाव और वही समुदाय हैं, जिनको अपने ऊपर, अपने देशवासियों के ऊपर और सत्य के ऊपर कोई भरोसा नहीं, इसलिए अनन्त तक एक ऐसी शक्ति की ज़रूरत समझते हैं जो उनके झगड़ों में सरपंच का काम करती रहे।


इन संस्थाओं को जनता को सुख-दुख से कोई मतलब नहीं, उनके पास ऐसा कोई सामाजिक या राजनीतिक कार्यक्रम नहीं है जिसे राष्ट्र के सामने रख सकें। उनका काम केवल एक-दूसरे का विरोध करके सरकार के सामने फरियाद करना है। वे ओहदों और रियायतों के लिए एक-दूसरे से चढ़ा-ऊपरी करके जनता पर शासन करने में शासक के सहायक बनने के सिवा और कुछ नहीं करते।


मुसलमान अगर शासकों का दामन पकड़कर कुछ रियायतें पा गया है तो हिन्दु क्यों न सरकार का दामन पकड़ें और क्यों न मुसलमानों की भाँति सुख़र्रू बन जायें। यही उनकी मनोवृत्ति है। कोई ऐसा काम सोच निकालना जिससे हिन्दू और मुसलमान दोनों एक राष्ट्र का उद्धार कर सकें, उनकी विचार शक्ति से बाहर है। दोनों ही साम्प्रदायिक संस्थाएँ मध्यवर्ग के धनिकों, ज़मींदारों, ओहदेदारों और पदलोलुपों की हैं। उनका कार्यक्षेत्र अपने समुदाय के लिए ऐसे अवसर प्राप्त करना है, जिससे वह जनता पर शासन कर सकें, जनता  पर आर्थिक और व्यावसायिक प्रभुत्व जमा सकें। साधारण जनता के सुख-दुख से उन्हें कोई प्रयोजन नहीं। अगर सरकार की किसी नीति से जनता को कुछ लाभ होने की आशा है और इन समुदायों को कुछ क्षति पहुँचने का भय है, तो वे तुरन्त उसका विरोध करने को तैयार हो जायेंगे। अगर और ज़्यादा गहराई तक जायें तो हमें इन संस्थाओं में अधिकांश ऐसे सज्जन मिलेंगे जिनका कोई न कोई निजी हित लगा हुआ है। और कुछ न सही तो हुक्काम के बंगलों पर उनकी रसोई ही सरल हो जाती है। एक विचित्र बात है कि इन सज्जनों की अफसरों की निगाह में बड़ी इज्जत है, इनकी वे बड़ी ख़ातिर करते हैं।


इसका कारण इसके सिवा और क्या है कि वे समझते हैं,  ऐसों पर ही उनका प्रभुत्व टिका हुआ है। आपस में खूब लड़े जाओ, खूब एक-दूसरे को नुकसान पहुँचाये जाओ। उनके पास फरियाद लिये जाओ, फिर उन्हें किसका नाम है, वे अमर हैं। मजा यह है कि बाजों ने यह पाखण्ड फैलाना भी शुरू कर दिया है कि हिन्दू अपने बूते पर स्वराज प्राप्त कर सकते है। इतिहास से उसके उदाहरण भी दिये  जाते हैं। इस तरह की गलतहमियाँ फैला कर इसके सिवा कि मुसलमानों में और ज़्यादा बदगुमानी फैले और कोई नतीजा नहीं निकल सकता। अगर कोई ज़माना था, तो कोई ऐसा काल भी था, जब हिन्दुओं के ज़माने में मुसलमानों ने अपना साम्राज्य स्थापित किया था, उन ज़मानों को भूल जाइये। वह मुबारक दिन होगा, जब हमारे शालाओं में इतिहास उठा दिया जायेगा। यह ज़माना साम्प्रदायिक अभ्युदय का नहीं है। यह आर्थिक युग है और आज वही नीति सफल होगी जिससे जनता अपनी आर्थिक समस्याओं को हल कर सके जिससे यह अन्धविश्वास, यह धर्म के नाम पर किया गया पाखण्ड, यह नीति के नाम पर ग़रीबों को दुहने की कृपा मिटाई जा सके। जनता को आज संस्कृतियों की रक्षा करने का न अवकाश है न ज़रूरत। 'संस्कृति' अमीरों, पेटभरों का बेफिक्रों का व्यसन है। दरिद्रों के लिए प्राणरक्षा ही सबसे बड़ी समस्या है।


उस संस्कृति में था ही क्या, जिसकी वे रक्षा करें। जब जनता मूर्छित थी तब उस पर धर्म और संस्कृति का मोह छाया हुआ था। ज्यों-ज्यों उसकी चेतना जागृत होती जाती है वह देखने लगी है कि यह संस्कृति केवल लुटेरों की संस्कृति थी जो, राजा बनकर, विद्वान बनकर, जगत सेठ बनकर जनता को लूटती थी। उसे आज अपने जीवन की रक्षा की ज़्यादा चिन्ता है, जो संस्कृति की रक्षा से कहीं आवश्यक है। उस पुरान संस्कृति में उसके लिए मोह का कोई कारण नहीं है। और साम्प्रदायिकता उसकी आर्थिक समस्याओं की तरफ से आँखें बन्द किये हुए ऐसे कार्यक्रम पर चल रही है, जिससे उसकी पराधीनता चिरस्थायी बनी रहेगी।✍🏻:- मुंशी प्रेमचंद


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बाल गंगाधर तिलक की महानता के दीवाने क्यों नहीं थे डॉ. आंबेडकर



By  डॉ मुख्तयार सिंह 

बाल गंगाधर तिलक (23 जुलाई 1856 – 1 अगस्त 1920 ) को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कांग्रेस के गरम दल का प्रमुख नेता माना जाता है. उनको लोकमान्य की उपाधि से नवाजा गया था. स्वराज और स्वाधीनता में अंतर होने के बावजूद, उनका नारा – 'स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है' स्वतंत्रता आंदोलन का लोकप्रिय नारा बना.

तिलक के राजनीतिक विचारों के बारे में काफी कुछ लिखा जा चुका है. इसलिए प्रस्तुत लेख में मेरी कोशिश उनके सामाजिक विचारों को सामने लाने की होगी और ये बताने की होगी कि जिस दौर में महादेव गोविंद रानाडे और गोपाल कृष्ण गोखले से लेकर ज्योतिबा फुले समाज सुधार के लिए काम कर रहे थे, उस समय तिलक किस तरह परंपरावादियों का नेतृत्व कर रहे थे. इस संदर्भ में ये भी देखा जाएगा कि डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने तिलक को लेकर लगातार आलोचनात्मक लेखन क्यों किया है.

इस पूरे विमर्श को कांग्रेस के अंदर दो धड़ों के संघर्ष के रूप में भी देखा जा सकता है. महिलाओं और जाति के प्रश्न पर कांग्रेस में दो धड़े थे- सुधारवादी और रूढ़िवादी. सुधारवादी धारा के चार मुख्य आधार थे – जातिभेद का उन्मूलन, बालिका विवाह का निषेध, विधवा विवाह का समर्थन और महिला शिक्षा. महादेव गोविन्द रानाडे, डब्ल्यू.सी. बनर्जी, विष्णु हरि पंडित, और आगे चलकर जी. जी. अगरकर तथा गोपाल कृष्ण गोखले आदि इस पक्ष में थे. दूसरी ओर, विष्णुशास्त्री चिपलूणकर और तिलक रूढ़िवादी विचार का नेतृत्व कर रहे थे. रुढ़ीवादी खेमे ने आगे चलकर खुद को राष्ट्रवादी खेमे का नाम दे दिया.

 *महिलाओं की शिक्षा और तिलक* 

तिलक ने महिला शिक्षा का पूरी क्षमता के साथ विरोध किया. परिमाला वी. राव ने अपने शोधपत्र में मुख्य रूप से तिलक के अखबार मराठा के हवाले से बताया है कि विष्णुशास्त्री चिपलूणकर और तिलक के नेतृत्व में कांग्रेस के कट्टरवादी धड़े ने 1881 से 1920 के बीच किस तरह बालिका विद्यालयों की स्थापना और हर समुदाय के लिए शिक्षा देने के प्रयासों का विरोध किया. इस धड़े के विरोध के कारण महाराष्ट् में 11 में से 9 नगरपालिकाओं में हर किसी के लिए शिक्षा देने के प्रस्ताव को हार का सामना करना पड़ा. इस धड़े ने राष्ट्रवादी शिक्षा की वकालत की, जिसमें धर्मशास्त्रों का अध्ययन और हुनर सिखाने पर जोर था.
तिलक के नेतृत्व में कट्टरवादी धड़े का तर्क था कि पेशवा के शासन के दौरान महिलाओं की स्थिति बहुत अच्छी थी. तिलक के ये विचार उनके अखबार मराठा के 15 मार्च 1885 के अंक में छपे हैं. महिला शिक्षा के विरोध में तिलक का तर्क था कि महिलाएं कमजोर होती हैं और संतति को आगे बढ़ाना उनका काम है, इसलिए उनको शिक्षित करने से उनको पीड़ा होगी क्योंकि आधुनिक शिक्षा को समझना उनकी शक्ति से बाहर है. उनकी ये बात मराठा अखबार के 31 अगस्त 1884 के अंक में छपी थी.

तिलक का कहना था कि यदि विशेष जरूरत हो, तो महिलाओं को गृह विज्ञान और सफाई कार्य जैसी शिक्षा दी जानी चाहिए. ऐसी महिलाएं ही आगे जाकर निपुण बन सकती है. उसके अनुसार महिलाएं इंग्लिश, गणित, विज्ञान जैसे कठोर विषय पढ़ने के लिए बिलकुल उपयुक्त नहीं है. उसने कहा कि हिन्दू समाज में पुरुष और महिला के कार्य अलग अलग हैं, इसलिए उनको अलग अलग शिक्षा दी जानी चाहिए.

गौर किया जाना चाहिए कि यह वही दौर था जब ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले ने 1848 में पहला बालिका विद्यालय खोला था. वहीं, राणाडे के नेतृत्व में कांग्रेस के उदारवादियों ने 1884 में पुणे में लड़कियों का हाई स्कूल खोला. गोखले ने भी तिलक के स्त्री शिक्षा संबंधी विचारों को सही नहीं माना और फर्गुसन कॉलेज में बालिकाओं को पढ़ाए जाने का समर्थन किया.

 *विवाह की आयु और तिलक के विचार* 

उस समय लड़कियों की शादी बहुत छोटी उम्र में कर दी जाती थी, जिससे उन्हें असहनीय यातना से गुजरना पड़ता था. पेशवा राज में ब्राह्मण परिवारों के लिए ये अनिवार्य था कि वे अपनी बच्चियों की शादी 9 साल से कम उम्र में ही कर दें. एक चर्चित मामले में, बच्ची फूलमणि की शादी 11 वर्ष की उम्र में कर दी गयी थी, उसके 35 वर्षीय पति ने उसके साथ जबरदस्ती सेक्स किया, जिससे उसकी मौत हो गयी. ऐसी अनेक घटनाएं थीं जिनमे छोटी बच्चियों के साथ सेक्स करने से वे अपाहिज तक हो गयीं.

समाज सुधारको की ओर से ऐसी मांग थी कि शादी और सहमति से सेक्स की उम्र को बढ़ाया जाए. इसलिए ब्रिटिश सरकार ने एक कानून Age of Consent Act 1891 बनाया जिसके अनुसार 12 वर्ष से कम उम्र की लड़की के साथ, चाहे वह विवाहित है या अविवाहित, सेक्स करना बलात्कार की श्रेणी में आएगा. कांग्रेस के सुधारवादी लोग भी इस बिल के पक्ष में थे, किन्तु तिलक ने इस मामले में ब्रिटिश सरकार के हस्तक्षेप का विरोध किया. उन्होंने कहा – 'हो सकता है कि इस सरकार का ये कानून सही हो और उपयोगी हो, फिर भी हम नहीं चाहते हैं कि सरकार हमारी सामाजिक परंपराओं और जीवन शैली में हस्तक्षेप करे.'

 *गैर-ब्राह्मणों के बारे में तिलक के विचार* 

तिलक वर्ण व्यवस्था में दृढ विश्वास रखते था. इसका मानना था कि ब्राह्मण जाति शुद्ध है तथा जाति व्यवस्था का बने रहना देश और समाज के लाभ में है. इसने कहा था कि जाति का ह्रास होने का अर्थ राष्ट्रीयता का ह्रास होना है. इसका मानना था कि जाति हिन्दू समाज का आधार है और जाति के नष्ट होने का अर्थ हिन्दू समाज का नष्ट होना है.

जब तिलक यह विचार दे रहा थे, उससे पहले महाराष्ट्र में ही ज्योतिबा फुले ने जाति के आधार असमानता का विरोध किया था. जब ज्योतिबा फुले ने अनिवार्य शिक्षा का कार्यक्रम चलाया तो इसका तिलक ने विरोध किया था. तिलक का मानना था कि प्रत्येक बच्चे को इतिहास, भूगोल, गणित पढ़ाये जाने का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि उनके जीवन में इनका इस्तेमाल नहीं है. तिलक का कहना था कि कुनबी जाति के बच्चों को इतिहास, भूगोल या गणित की शिक्षा देने से उनका नुकसान होगा क्योंकि वे अपना जातीय हुनर भूल जाएंगे. उसने कहा कि कुनबी जाति के बच्चों को अपना परम्परागत किसान का पेशा करना चाहिए, और शिक्षा से दूर रहना चाहिए. जिस समय तिलक यह विचार दे रहा था, उसी समय ब्रिटिश सरकार स्कूल खोल रही थी, और उसमें सभी जाति के बच्चों को पढ़ने का अधिकार दे रही थी.

तिलक ने इसे ब्रिटिश सरकार की गंभीर गलती बताया. सार्वजिनक स्कूल में महार और मांग जाति के बच्चों को प्रवेश देने पर तिलक ने ब्रिटिश सरकार को चेतावनी दी कि महार-मांग बच्चों के ब्राह्मणो बच्चों के साथ बैठने से हिन्दू धर्म सुरक्षित नहीं रह पायेगा.

 *तिलक के बारे में डॉ. आंबेडकर* 

तिलक उस समय कांग्रेस पार्टी में कार्य कर रहे थे. कांग्रेस के अंदर ही एक संगठन – सोशल कांफ्रेंस था जो समाज सुधार के लिए कार्य करता था. 1895 में जब कांग्रेस का अधिवेशन चल रहा था, कुछ लोगों ने कहा कि यदि कांग्रेस के अंदर सोशल कांफ्रेंस ने समाज सुधार का कार्य किया तो हम कांग्रेस के पंडाल को जला देंगे. ऐसे लोगों का वैचरिक नेतृत्व तिलक ने किया था. अंत में तय हुआ कि कांग्रेस समाज सुधार के किसी कार्यक्रम से कोई संबंध नहीं रखेगी, चाहे वह कितना भी जरूरी क्यों नहीं हो. इस प्रकार कांग्रेस केवल एक राजनीतिक प्लेटफार्म बन कर गयी, उसने समाज सुधार के कार्यक्रम बिलकुल बंद कर दिए.

इसका जिक्र डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने अपनी किताब कांग्रेस और गांधी ने अछूतों के साथ क्या किया में विस्तार से किया है. अपनी एक और किताब राणाडे, गांधी और जिन्ना में वे लिखते हैं – 'बुद्धिजीवियों का एक समूह कट्टरवादी और अराजनैतिक और दूसरा समूह प्रगतिशील और राजनीति है. पहले समूह का नेतृत्व पहले चिपलूणकर और बाद में तिलक ने किया. इन दोनों ने राणाडे के लिए हर तरह की मुसीबत खड़ी की. इससे न सिर्फ समाज सुधार के कामों को नुकसान हुआ बल्कि अनुभव बताते हैं कि इस वजह से राजनीतिक सुधारों की भी सबसे अधिक हानि हुई.'

तिलक और राणाडे की तुलना करते हुए आंबेडकर ये भी लिखते हैं कि तिलक बेशक जेल में रहे, लेकिन राणाडे की लड़ाई ज्यादा मुश्किल थी. राजनीतिक लड़ाई लड़ने वाले को समाज सिर माथे पर बिठाता है, जबकि समाज सुधार के लिए लड़ने वाला अक्सर अकेला होता है और उसे तमाम तरह के अपमान झेलने पड़ते हैं.

तिलक की स्पष्ट मान्यता थी कि किसान और कारीगर जातियों को राजनीति में नहीं आना चाहिए. 1918 में जब इन जातियों ने राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग उठाई तो तिलक ने शोलापुर की एक सभा में कहा था कि 'तेली-तमोली-कुनबी विधानसभा में जाकर क्या करेंगे'. बाबा साहेब के मुताबिक तिलक के हिसाब से इन जातियों के लोगों का काम कानून का पालन करना है और उन्हें कानून बनाने का अधिकार नहीं होना चाहिए.

कुल मिलाकर देखा जाए तो तिलक के सामाजिक विचारों को वर्तमान भारत में स्वीकार नहीं किया जा सकता है. इसका ये भी मतलब है कि सबसे महान मान लिए व्यक्ति को भी समग्रता में ही देखा जाना चाहिए और उन्हें जरूरी हो तो उन्हें संपूर्णता में स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए.

(लेखक दिल्ली यूनिवर्सिटी में शिक्षक रहे हैं.यह लेखक के निजी विचार हैं.)

Tuesday, 30 June 2020

समाजवाद और धर्म -लेनिन

लेनिन (1905)

समाजवाद और धर्म
हस्ताक्षर : एन. लेनिन
नोवाया झिज्न, अंक 28, 3 दिसंबर, 1905
संग्रहीत रचनाएं, खंड 10, पृष्ठ 83-87

वर्तमान समाज पूर्ण रूप से जनसंख्या की एक अत्यंत नगण्य अल्पसंख्यक द्वारा, भूस्वामियों और पूँजीपतियों द्वारा, मज़दूर वर्ग के व्यापक अवाम के शोषण पर आधारित है। यह एक ग़ुलाम समाज है, क्योंकि "स्वतंत्र" मज़दूर जो जीवन भर पूँजीपजियों के लिए काम करते हैं, जीवन-यापन के केवल ऐसे साधनों के "अधिकारी" हैं जो मुनाफ़ा पैदा करने वाले ग़ुलामों को जीवित रखने के लिए, पूँजीवादी ग़ुलामी को सुरक्षित और क़ायम रखने के लिए बहुत ज़रूरी हैं।

मज़दूरों का आर्थिक उत्पीड़न अनिवार्यतः हर प्रकार के राजनीतिक उत्पीड़न और सामाजिक अपमान को जन्म देता है तथा आम जनता के आत्मिक और नैतिक जीवन को निम्न श्रेणी का और अन्धकारपूर्ण बनाना आवश्यक बना देता है। मज़दूर अपनी आर्थिक मुक्ति के संघर्ष के लिए न्यूनाधिक राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन जब तक पूँजी की सत्ता का उन्मूलन नहीं कर दिया जाता तब तक स्वतंत्रता की कोई भी मात्रा उन्हें दैन्य, बेकारी और उत्पीड़न से मुक्त नहीं कर सकती। धर्म बौद्धिक शोषण का एक रूप है जो हर जगह अवाम पर, जो दूसरों के लिए निरन्तर काम करने, अभाव और एकांतिकता से पहले से ही संत्रस्त रहते हैं, और भी बड़ा बोझ डाल देता है। शोषकों के विरुद्ध संघर्ष में शोषित वर्गों की निष्क्रियता मृत्यु के बाद अधिक सुखद जीवन में उनके विश्वास को अनिवार्य रूप से उसी प्रकार बल पहुँचाती है जिस प्रकार प्रकृति से संघर्ष में असभ्य जातियों की लाचारी देव, दानव, चमत्कार और ऐसी ही अन्य चीजों में विश्वास को जन्म देती है। जो लोग जीवन भर मशक्कत करते और अभावों में जीवन व्यतीत करते हैं, उन्हें धर्म इहलौकिक जीवन में विनम्र होने और धैर्य रखने की तथा परलोक सुख की आशा से सान्त्चना प्राप्त करने की शिक्षा देता है। लेकिन जो लोग दूसरों के श्रम पर जीवित रहते हैं उन्हें धर्म इहजीवन में दयालुता का व्यवहार करने की शिक्षा देता है, इस प्रकार उन्हें शोषक के रूप में अपने संपूर्ण अस्तित्व का औचित्य सिद्ध करने का एक सस्ता नुस्ख़ा बता देता है और स्वर्ग में सुख का टिकट सस्ते दामों दे देता है। धर्म जनता के लिए अफीम है। धर्म एक प्रकार की आत्मिक शराब है जिसमें पूँजी के ग़ुलाम अपनी मानव प्रतिमा को, अपने थोड़े बहुत मानवोचित जीवन की माँग को, डुबा देते हैं।

लेकिन वह ग़ुलाम जो अपनी ग़ुलामी के प्रति सचेत हो चुका है और अपनी मुक्ति के लिए संघर्ष में उठ खड़ा हुआ है, उसकी ग़ुलामी आधी उसी समय समाप्त हो चुकी होती है। आधुनिक वर्ग चेतन मजदूर, जो बड़े पैमाने के कारखाना-उद्योग द्वारा शिक्षित और शहरी जीवन के द्वारा प्रबुद्ध हो जाता है, नफरत के साथ धार्मिक पूर्वाग्रहों को त्याग देता है और स्वर्ग की चिन्ता पादरियों और पूँजीवादी धर्मांधों के लिए छोड़ कर अपने लिए इस धरती पर ही एक बेहतर जीवन प्राप्त करने का प्रयत्न करता है। आज का सर्वहारा समाजवाद का पक्ष ग्रहण करता है जो धर्म के कोहरे के ख़िलाफ संघर्ष में विज्ञान का सहारा लेता है और मज़दूरों को इसी धरती पर बेहतर जीवन के लिए वर्तमान में संघर्ष के लिए एकजुट कर उन्हें मृत्यु के बाद के जीवन के विश्वास से मुक्ति दिलाता है।

धर्म को एक व्यक्तिगत मामला घोषित कर दिया जाना चाहिए। समाजवादी अक्सर धर्म के प्रति अपने दृष्टिकोण को इन्हीं शब्दों में व्यक्त करते हैं। लेकिन किसी भी प्रकार की ग़लतफहमी न हो, इसलिए इन शब्दों के अर्थ की बिल्कुल ठीक व्याख्या होनी चाहिए। हम माँग करते हैं कि जहाँ तक राज्य का सम्बन्ध है, धर्म को व्यक्तिगत मामला मानना चाहिए। लेकिन जहाँ तक हमारी पार्टी का सवाल है, हम किसी भी प्रकार धर्म को व्यक्तिगत मामला नहीं मानते। धर्म से राज्य का कोई सम्बन्ध नहीं होना चाहिए और धार्मिक सोसायटियों का सरकार की सत्ता से किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं रहना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को यह पूर्ण स्वतन्त्रता होनी चाहिए कि वह जिसे चाहे उस धर्म को माने, या चाहे तो कोई भी धर्म न माने, अर्थात नास्तिक हो, जो नियमतः हर समाजवादी समाज होता है। नागरिकों में धार्मिक विश्वास के आधार पर भेदभाव करना पूर्णतः असहनीय है। आधिकारिक काग़ज़ात में किसी नागरिक के धर्म का उल्लेख भी, निस्सन्देह, समाप्त कर दिया जाना चाहिए। स्थापित चर्च को न तो कोई सहायता मिलनी चाहिए और न पादरियों को अथवा धार्मिक सोसायटियों को राज्य की ओर से किसी प्रकार की रियायत देनी चाहिए। इन्हें सम-विचार वाले नागरिकों की पूर्ण स्वतन्त्र संस्थाएँ बन जाना चाहिए, ऐसी संस्थाएँ जो राज्य से पूरी तरह स्वतंत्र हों। इन माँगों को पूरा किये जाने से वह शर्मनाक और अभिशप्त अतीत समाप्त हो सकता है जब चर्च राज्य की सामन्ती निर्भरता पर, और रूसी नागरिक स्थापित चर्च की सामन्ती निर्भरता पर जीवित था, जब मध्यकालीन, धर्म-न्यायालयीय क़ानून (जो आज तक हमारी दंडविधि संहिताओं और क़ानूनी किताबों में बने हुए हैं) अस्तित्व में थे और लागू किये जाते थे, जो आस्था अथवा अनास्था के आधार पर मनुष्यों को दण्डित करते, मनुष्य की अन्तरात्मा का हनन किया करते थे, और आरामदेह सरकारी नौकरियों तथा सरकार द्वारा प्राप्त आमदनियों को स्थापित चर्च के इस या उस धर्म विधान से सम्बद्ध किया करते थे। समाजवादी सर्वहारा आधुनिक राज्य और आधुनिक चर्च से जिस चीज़ की माँग करता है, वह है-राज्य से चर्च का पूर्ण पृथक्करण।

रूसी क्रांति को यह माँग राजनीतिक स्वतन्त्रता के एक आवश्यक घटक के रूप में पूरी करनी चाहिए। इस मामले में रूसी क्रान्ति के समक्ष एक विशेष रूप से अनुकूल स्थिति है, क्योंकि पुलिस-शासित सामन्ती एकतन्त्र की घृणित नौकरशाही से पादरियों में भी असन्तोष, अशान्ति और घृणा उत्पन्न हो गयी है। रूसी ऑर्थोडाक्स चर्च के पादरी कितने भी अधम और अज्ञानी क्यों न हों, रूस में पुरानी, मध्यकालीन व्यवस्था के पतन के वज्रपात से वे भी जागृत हो गये हैं, वे भी स्वतन्त्रता की माँग में शामिल हो रहे हैं। नौकरशाही व्यवहार और अफ़सरवाद के, पुलिस के लिए जासूसी करने के ख़िलाफ़- जो "प्रभु के सेवकों" पर लाद दी गयी है - विरोध प्रकट कर रहे हैं। हम समाजवादियों को चाहिए कि इस आन्दोलन को अपना समर्थन दें। हमें पुरोहित वर्ग के ईमानदार सदस्यों की माँगों को उनकी परिपूर्णता तक पहुँचाना चाहिए और स्वतन्त्रता के बारे में उनकी प्रतिज्ञाओं के प्रति उन्हें दृढ़ निश्चयी बनाते हुए यह माँग करनी चाहिए कि वे धर्म और पुलिस के बीच विद्यमान सारे सम्बन्धों को दृढ़तापूर्वक समाप्त कर दें। या तो तुम सच्चे हो, और इस हालत में तुम्हें चर्च और राज्य तथा स्कूल और चर्च के पूर्ण पृथक्करण का, धर्म के पूर्ण रूप से और सर्वथा व्यक्तिगत मामला घोषित किये जाने का पक्ष ग्रहण करना चाहिए। या फिर तुम स्वतन्त्रता के लिए इन सुसंगत माँगों को स्वीकार नहीं करते, और इस हालत में तुम स्पष्टतः अभी तक आरामदेह सरकारी नौकरियों और सरकार से प्राप्त आमदनियों से चिपके हुए हो। इस हालत में तुम स्पष्टतः अपने शस्त्रों की आध्यात्मिक शक्ति में विश्वास नहीं करते, और राज्य की घूस प्राप्त करते रहना चाहते हो। ऐसी हालत में समस्त रूस के वर्ग चेतन मज़दूर तुम्हारे ख़िलाफ़ निर्मम युद्ध की घोषणा करते हैं।

जहाँ तक समाजवादी सर्वहारा की पार्टी का प्रश्न है, धर्म एक व्यक्तिगत मामला नहीं है। हमारी पार्टी मज़दूर वर्ग की मुक्ति के लिए संघर्ष करने वाले अग्रणी योद्धाओं की संस्था है। ऐसी संस्था धार्मिक विश्वासों के रूप में वर्ग चेतना के अभाव, अज्ञान अथवा रूढ़िवाद के प्रति न तो तटस्थ रह सकती है, न उसे रहना चाहिए। हम चर्च के पूर्ण विघटन की मांग करते हैं ताकि धार्मिक कोहरे के ख़िलाफ़ हम शुद्ध सैद्धान्तिक और वैचारिक अस्त्रों से, अपने समाचारपत्रों और भाषणों के साधनों से संघर्ष कर सकें। लेकिन हमने अपनी संस्था, रूसी सामाजिक जनवादी मज़दूर पार्टी की स्थापना ठीक ऐसे ही संघर्ष के लिए, मज़दूरों के हर प्रकार के धार्मिक शोषण के विरुद्ध संघर्ष के लिए की है। और हमारे लिए वैचारिक संघर्ष केवल एक व्यक्तिगत मामला नहीं है, सारी पार्टी का, समस्त सर्वहारा का, मामला है। यदि बात ऐसी ही है, तो हम अपने कार्यक्रम में यह घोषणा क्यों नहीं करते कि हम अनीश्वरवादी हैं? हम अपनी पार्टी में ईसाइयों अथवा ईश्वर में आस्था रखने वाले अन्य धर्मावलम्बियों के शामिल होने पर क्यों नहीं रोक लगा देते?

इस प्रश्न का उत्तर ही उन अति महत्वपूर्ण अन्तरों को स्पष्ट करेगा जो बुर्जुआ डेमोक्रेटों और सोशल डेमोक्रेटों द्वारा धर्म का प्रश्न उठाने के तरीक़ों में विद्यमान हैं।

हमारा कार्यक्रम पूर्णतः वैज्ञानिक, और इसके अतिरिक्त भौतिकवादी विश्व दृष्टिकोण पर आधारित है। इसलिए हमारे कार्यक्रम की व्याख्या में धार्मिक कुहासे के सच्चे ऐतिहासिक और आर्थिक स्रोतों की व्याख्या भी आवश्यक रूप से शामिल है। हमारे प्रचार कार्य में आवश्यक रूप से अनीश्वरवाद का प्रचार भी शामिल होना चाहिए; उपयुक्त वैज्ञानिक साहित्य का प्रकाशन भी, जिस पर एकतन्त्रीय सामन्ती शासन ने अब तक कठोर प्रतिबन्ध लगा रखा था और जिसे प्रकाशित करने पर दण्ड दिया जाता था, अब हमारी पार्टी के कार्य का एक क्षेत्र बन जाना चाहिए। अब हमें सम्भवतः एंगेल्स की उस सलाह का अनुसरण करना होगा जो उन्होंने एक बार जर्मन समाजवादियों को दी थी-अर्थात हमें फ़्रांस के अठारहवीं शताब्दी के प्रबोधकों और अनीश्वरवादियों के साहित्य का अनुवाद करना और उसका व्यापक प्रचार करना चाहिए।

लेकिन हमें किसी भी हालत में धार्मिक प्रश्न को अरूप, आदर्शवादी ढंग से, वर्ग संघर्ष से असम्बद्ध एक "बौद्धिक" प्रश्न के रूप में उठाने की ग़लती का शिकार नहीं बनना चाहिए, जैसा कि बुर्जुआ वर्ग के बीच उग्रवादी जनवादी कभी-कभी किया करते हैं। यह सोचना मूर्खता होगी कि मज़दूर अवाम के सीमाहीन शोषण और संस्कारहीनता पर आधारित समाज में धार्मिक पूर्वाग्रहों को केवल प्रचारात्मक साधनों से ही समाप्त किया जा सकता है। इस बात को भुला देना कि मानव जाति पर लदा धर्म का जुवा समाज के अन्तर्गत आर्थिक जुवे का ही प्रतिबिम्ब और परिणाम है, बुर्जुआ संकीर्णता ही होगी। सर्वहारा यदि पूँजीवाद की काली शक्तियों के विरुद्ध स्वयं अपने संघर्ष से प्रबुद्ध नहीं होगा तो पुस्तिकाओं और शिक्षाओं की कोई भी मात्रा उन्हें प्रबुद्ध नहीं बना सकती। हमारी दृष्टि में, धरती पर स्वर्ग बनाने के लिए उत्पीड़ित वर्ग के इस वास्तविक क्रान्तिकारी संघर्ष में एकता परलोक के स्वर्ग के बारे में सर्वहारा दृष्टिकोण की एकता से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।

यही कारण है कि हम अपने कार्यक्रम में अपनी नास्तिकता को न तो शामिल करते हैं और न हमें करना चाहिए। और यही कारण है कि हम ऐसे सर्वहाराओं को, जिनमें अभी तक पुराने पूर्वाग्रहों के अवशेष विद्यमान हैं, अपनी पार्टी में शामिल होने पर न तो रोक लगाते हैं, न हमें इस पर रोक लगानी चाहिए। हम वैज्ञानिक दृष्टिकोण की शिक्षा सदा देंगे और हमारे लिए विभिन्न "ईसाइयों" की विसंगतियों से संघर्ष चलाना भी जरूरी है। लेकिन इसका जरा भी यह अर्थ नहीं है कि धार्मिक प्रश्न को प्रथम वरीयता दे देनी चाहिये। न ही इसका यह अर्थ है कि हमें उन घटिया मत-मतान्तरों और निरर्थक विचारों के कारण, जो तेजी से महत्वहीन होते जा रहे हैं और स्वयं आर्थिक विकास की धारा में तेजी से कूड़े के ढेर की तरह किनारे लगते जा रहे हैं, वास्तविक क्रान्तिकारी आर्थिक और राजनीतिक संघर्ष की शक्तियों को बँट जाने देना चाहिए।

प्रतिक्रियावादी बुर्जुआ वर्ग ने अपने आप को हर जगह धार्मिक झगड़ों को उभाड़ने के दुष्कृत्यों में संलग्न किया है, और वह रूस में भी ऐसा करने जा रहा है-इसमें उसका उद्देश्य आम जनता का ध्यान वास्तविक महत्व की और बुनियादी आर्थिक और राजनीतिक समस्याओं से हटाना है जिन्हें अब समस्त रूस का सर्वहारा वर्ग क्रांतिकारी संघर्ष में एकजुट हो कर व्यावहारिक रूप से हल कर रहा है। सर्वहारा की शक्तियों को बाँटने की यह प्रतिक्रियावादी नीति, जो आज ब्लैक हंड्रेड (राजतंत्र समर्थक गिरोहों) द्वारा किये हत्याकाण्डों में मुख्य रूप से प्रकट हुई है, भविष्य में और परिष्कृत रूप ग्रहण कर सकती हैं। हम इसका विरोध हर हालत में शान्तिपूर्वक, अडिगता और धैर्य के साथ सर्वहारा एकजुटता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण की शिक्षा द्वारा करेंगे - एक ऐसी शिक्षा द्वारा करेंगे जिसमें किसी भी प्रकार के महत्वहीन मतभेदों के लिए कोई स्थान नहीं है। क्रान्तिकारी सर्वहारा, जहाँ तक राज्य का संबंध है, धर्म को वास्तव में एक व्यक्तिगत मामला बनाने में सफल होगा। और इस राजनीतिक प्रणाली में, जिसमें मध्यकालीन सड़न साफ़ हो चुकी होगी, सर्वहारा आर्थिक ग़ुलामी के, जो कि मानव जाति के धार्मिक शोषण का वास्तविक स्रोत है, उन्मूलन के लिए सर्वहारा वर्ग व्यापक और खुला संघर्ष चलायेगा।



लेनिन

Saturday, 20 June 2020


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बलवान समाज वही होता है, जिसकी तरुणाई सबल होती है, जिसमें मृत्यु को वरण करने की क्षमता होती है, जिसमें भविष्य के सपने होते हैं और कुछ कर गुजरने का जज्बा होता है, वही तरुणाई है।
🖌 महादेवी वर्मा
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उन चीज़ों के लिए जान देना सार्थक है जिन चीज़ों के बिना जीना सार्थक नहीं होता। 
🖌 एदुआर्दो गालियानो
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मैं असम्‍पृक्‍त व्‍यक्ति से घृणा करता हूँ। मेरा विश्‍वास है कि ज़ि‍न्‍दा होने का मतलब होता है पक्ष चुनना। जो वास्‍तव में ज़ि‍न्‍दा हैं वे एक नागरिक और एक पक्षधर व्‍यक्ति होने से बच नहीं सकते। असम्‍पृक्‍तता और उदासीनता जीवन नहीं है, बल्कि परजीविता और मनोविकृति है।
🖌 अन्‍तोनियो ग्राम्‍शी
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सूअर से कभी भी कुश्ती मत लड़ो। तुम गंदे हो जाओगे, और इसके अलावा, सूअर यह पसंद करता है।
🖌 जॉर्ज बर्नार्ड शॉ
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तुम प्रेरणा का इंतज़ार नहीं कर सकते। तुम्हें लट्ठ लेकर इसके पीछे भागना होगा।
🖌 जैक लंडन
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"बात यह है कि जो कुछ भी नया है,
हमें उनका पालन-पोषण करना होगा।
उनमें से जो कुछ भी सर्वोत्कृष्ट होगा,
उपयोगी और सुन्दर होगा,
जीवन उन्हें चुन लेगा।"
🖌 व्ला.इ. लेनिन ( 'एक महान शुरुआत' )
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ज़िन्दगी का मामला सिर्फ यह नहीं होता कि आपके पास अच्छे पत्ते हों, कभी-कभी आपको खराब पत्तों से भी अच्छा खेलना होता है।
🖌 जैक लंडन
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केवल अपने क्षणिक गौरव के लिए नहीं, वरन् अपने देश के अनन्‍त गौरव तथा समस्‍त मानवता के कल्‍याण के लिए कार्यरत रहना-इससे अधिक श्रेष्‍ठ और महान कार्य और क्‍या हो सकता है?
🖌 चेर्नीशेव्‍स्‍की (1828-1889)
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अब से बीस साल बाद तुम उन चीज़ों को लेकर अधिक मायूस होगे जो तुमने नहीं किये बनिस्पत उन चीज़ों के, जो तुमने किये। इसलिए, जहाज़ की रस्सियाँ खोल दो। पाल चढ़ाकर सुरक्षित बंदरगाह से दूर निकल जाओ। तिजारती हवाओं को अपने बादबानों में गिरफ़्तार कर लो। खोजी यात्राएँ करो। सपने देखो। अन्वेषण करो।
🖌 मार्क ट्वेन
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यदि हर चीज़ पारदर्शी होती तो विचारधाराएँ होती ही नहीं !
🖌 फ्रेडरिक जेम्सन
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संघर्ष जितना कठिन होता है, जीत उतनी ही शानदार होती है।
🖌 टॉम पेन
(अमेरिकी और फ्रांसीसी क्रांति के दार्शनिक और नेता )
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तब रोने का क्या मतलब जब ऐसी ज़बरदस्त हवा चल रही है कि कुछ भी सुन पाना मुमकिन नहीं |
🖌 बेर्टोल्ट ब्रेष्ट
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अपने को शिक्षित करो क्योंकि हमें तुम्हारी सारी बुद्धिमत्ता की ज़रूरत होगी। स्वयं को उद्वेलित करो क्योंकि हमें तुम्हारे समस्त उत्साह की ज़रूरत होगी। स्वयं को संगठित करो क्योंकि हमें तुम्हारी सारी शक्ति चाहिए होगी।
🖌 अन्तोनियो ग्राम्शी
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जब नायक मंच से चले जाते हैं, तो विदूषक आ जाते हैं।
🖌 हाइनरिख हाइने (उन्नीसवीं सदी के महान जर्मन कवि)
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वीरोचित ढंग से लड़ना बड़ी बात है ... लेकिन कितने ऐसे लोग हैं जो एक दिन के लिए नहीं,एक घंटे के लिए नहीं, बल्कि वर्षों की लम्बी, थकाऊ अवधि के दौरान, हर दिन वीरोचित बने रहेंगे ?
🖌 एलीनोर मार्क्स ( यूरोपीय मज़दूर आन्दोलन की ख्यात नेत्री और कार्ल मार्क्स की पुत्री )
पेरिस कम्यून (1871) के 21 वर्षों बाद उसे याद करते हुए
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अपने दृढ विश्वासों के बावजूद, मैं हमेशा से ऐसा इंसान रहा हूँ, जो नए अनुभव और नए ज्ञान के सामने आने के साथ ही, तथ्यों का सामना करने और ज़िन्दगी की वास्तविकता को स्वीकार करने की कोशिश करता है। मेरा दिमाग़ हमेशा से खुला रहा है जो सच्चाई की बुद्धिमत्ता भरी खोज के हर रूप के साथ कदम मिलाकर चलता है।
🖌 माल्कम एक्स (अमेरिकी अश्वेत क्रांतिकारी, जिनकी आज ही के दिन, 53 वर्षों पहले हत्या कर दी गयी थी)
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वक्त आ गया है कि आप लोग जो 'मानववादी हैं और व्यावहारिक बनना चाहते हैं,' यह समझ लें कि दुनिया में दो किस्म की नफरतें चल रही हैं। एक नफरत है जो कातिलों के दिल में है, जो उनकी आपसी स्पर्धा और भविष्य के डर से पैदा होती है -- कातिलों को कयामत का सामना करना ही है। दूसरी नफरत -- मेहनतकश वर्ग की नफरत -- जिन्दगी की मौजूदा तस्वीर से है और इस अहसास ने, कि शासन करने का अधिकार उनका ही होना चाहिए इस नफरत की लौ को और भी तेज और रोशन कर दिया है। ये दोनों नफरतें गहराई के एक ऐसे बिन्दु पर पहुँच चुकी है कि कोई भी चीज़ या आदमी उनका आपस में समझौता नहीं करवा सकता, और वर्गों के बीच के अवश्यंभावी संघर्ष और मेहनतकशों की जीत के सिवा कोई चीज दुनिया को इस नफरत से मुक्ति नहीं दिला सकती।
🖌 मक्सिम गोर्की ('संस्कृति के निर्माताओं', तुम किसके साथ हो?)
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...हर प्रकार के महान प्रेम की तरह

...हर प्रकार के महान प्रेम की तरह, बच्‍चे के लिए आदमी का प्रेम भी तभी सृजनात्‍मक बनता है और बच्‍चे को सच्‍चा तथा स्‍थाई सुख दे पाता है जबकि प्रेम करने वाले व्‍यक्ति के जीवन की परिधि‍ को वह विशाल बनाता है, उसे वह एक अधिक मूल्‍यवान व्‍यक्ति में परिवर्तित कर देता है, किन्‍तु अपने प्रिय व्‍यक्ति को किसी मूर्ति में नहीं रूपान्‍तरित कर देता। ऐसा प्रेम जिसकी केवल एक ही व्‍यक्ति पर वर्षा की जाती है और जो जीवन का सारा सुख आनन्‍द अकेले उसी एक व्‍यक्ति से प्राप्‍त करता है, अन्‍य सब चीज़ें उसके लिए एक बोझ और यन्‍त्रणा की वस्‍तुएँ बन जाती हैं दोनों ही सम्‍बन्धित व्‍यक्तियों के लिए नरक हो जा सकता है...

उसकी आत्‍मा की रक्षा करने और उसे समृद्ध बनाने के लिए आवश्‍यक है कि उसे उन सब चीज़ों को देखने और सुनने की शिक्षा दी जाये जिन्‍हें देखने और सुनने की क्षमता उसमें आ गयी है, जिससे कि तुम्‍हारे प्रति उसका प्रेम अगाध मित्रता तथा अनन्‍त विश्‍वास का स्‍वरूप ग्रहण कर ले।

🖌 फेलिक्‍स ज़र्जिन्‍स्‍की (जेल से पत्‍नी के नाम पत्र, 2दिसम्‍बर,1913)
(ज़र्जिन्‍स्‍की बोल्‍शेविक पार्टी के एक शीर्ष नेता और लेनिन तथा स्‍तालिन के अनन्‍य सहयोगी थे। ज़ारशाही के जेलों में लम्‍बे समय तक यातना झेली। क्रांति के बाद वे 'चेका' के स्‍थायी अध्‍यक्ष थे, जो क्रांति विरोधी कार्रवाईयों में लिप्‍त प्रतिक्रांतिकारियों को कुचलने के साथ ही क्रांति और गृहयुद्ध के दौरान यतीम हुए बच्‍चों की देखरेख भी करती थी)
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चीखते-चिल्लाते महत्वोन्मादियों, गुंडों, शैतानों और स्वेच्छाचारियों की यह फ़ौज जो फासीवाद के ऊपरी आवरण का निर्माण करती है, उसके पीछे वित्तीय पूंजीवाद के अगुवा बैठे हैं, जो बहुत ही शांत भाव, साफ़ सोच और बुद्धिमानी के साथ इस फ़ौज का संचालन करते हैं और इनका ख़र्चा उठाते हैं। फासीवाद के शोर-शराबे और काल्पनिक विचारधारा की जगह उसके पीछे काम करने वाली यही प्रणाली हमारी चिंता का विषय है। और इसकी विचारधारा को लेकर जो भारी-भरकम बातें कही जा रही हैं उनका महत्व पहली बात, यानी घनघोर संकट की स्थितियों में कमज़ोर होते पूंजीवाद को टिकाये रहने की असली कार्यप्रणाली के संदर्भ में ही है। 
🖌 रजनी पाम दत्त

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Saturday, 13 June 2020

कविता

जारी है-जारी है
अभी लड़ाई जारी है।

यह जो छापा तिलक लगाए और जनेऊंधारी है
यह जो जात पांत पूजक है यह जो भ्रष्टाचारी है
यह जो भूपति कहलाता है जिसकी साहूकारी है
उसे मिटाने और बदलने की करनी तैयारी है।
 
यह जो तिलक मांगता है, लडके की धौंस जमाता है
कम दहेज पाकर लड़की का जीवन नरक बनाता है
पैसे के बल पर यह जो अनमोल ब्याह रचाता है
यह जो अन्यायी है सब कुछ ताकत से हथियाता है
उसे मिटाने और बदलने की करनी तैयारी है।
 
यह जो काला धन फैला है, यह जो चोरबाजारी हैं
सत्ता पाँव चूमती जिसके यह जो सरमाएदारी है
यह जो यम-सा नेता है, मतदाता की लाचारी है
उसे मिटाने और बदलने की करनी तैयारी है।
 
जारी है-जारी है
अभी लड़ाई जारी है।
                                -सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

१९५३ में स्टालिन की शव यात्रा पर उमड़ा सैलाब 

*On this day in 1953, a sea of humanity thronged the streets for Stalin's funeral procession.* Joseph Stalin, the Soviet Union's fea...