2013 में, ऑर्गनाइज़ेशन ऑफ इस्लामिक कॉरपोरेशन ने उल्लेख किया कि कई इस्लामी सदस्य राष्ट्र लड़कियों के लिए शिक्षा के अवसरों को प्रतिबंधित करते हैं। यूनिसेफ ने ध्यान दिया कि उन 24 देशों में से, जिनमें महिला प्राथमिक नामांकन दर 60 प्रतिशत से कम थी, 17 इस्लामी देश थे। यूएनडीपी की रिपोर्ट के अनुसार अरब जगत में साक्षरता दर लगभग 55 प्रतिशत थी। अफगानिस्तान में बड़ी संख्या में महिलाएं निरक्षर हैं। एक रूढ़िवादी समाज के रूप में यमन में आमतौर पर लड़कियों को पुरुष शिक्षकों द्वारा शिक्षित किए जाने और मिश्रित यौन शिक्षा पर आपत्ति होती है। जॉर्डन में नामांकन दर उत्कृष्ट, 86 प्रतिशत है, हालांकि कम उम्र में शादी के कारण लड़कियां उच्चतर माध्यमिक कक्षा तक स्कूल छोड़ देती हैं।
भारत में, मुस्लिम महिला सर्वेक्षण की एक रिपोर्ट में पता चला कि करीब 60 प्रतिशत मुस्लिम महिलाओं ने खुद को निरक्षर बताया, जबकि मुस्लिम लड़कियों के स्कूल में नामांकन की दर 40.66 प्रतिशत थी। निरक्षर मुस्लिम महिलाओं का अनुपात शेष भारत की तुलना में उत्तरी ग्रामीण क्षेत्रों में काफी अधिक है। 17 प्रतिशत से भी कम मुस्लिम महिलाओं ने 8 साल की स्कूली शिक्षा पूरी की, 10 प्रतिशत से भी कम ने उच्च माध्यमिक स्कूली शिक्षा पूरी की, जो राष्ट्रीय औसत से कम है। उच्च शिक्षा में मुस्लिम महिलाओं का अनुपात केवल 3.56 प्रतिशत है, जो कि अनुसूचित जातियों की तुलना में भी कम है, जो कि 4.25 प्रतिशत है। अपनी पढ़ाई पूरी करने वाली महिलाओं में से 26 प्रतिशत ने महसूस किया कि पढ़ाई जारी रखने के लिए उन्हें बाधाओं को दूर करना होगा। कुल मिलाकर हिंदू महिलाओं के अनुपात में मुस्लिम महिलाओं को अपनी स्कूली शिक्षा में बाधाओं का सामना अधिक करना पड़ा।
महिलाओं को शिक्षा प्राप्त करने के लिए कई तरह की बाधाओं का सामना करना पड़ता है। माता-पिता अपनी बेटियों को इस डर से भी स्कूल नहीं भेजते हैं, कि कहीं उनका अपहरण और बलात्कार न हो जाए। कभी-कभी माता-पिता कहते हैं कि वे अपनी बेटियों को स्कूल इसलिए नहीं भेजते क्योंकि यह पारंपरिक रूप से गलत है।
उन्हें अपने वैवाहिक जीवन की तैयारी के लिए घर पर ही रहना चाहिए। लड़कियों का पढ़ाई छोडना उनके जल्दी विवाह कर देने की वांछनीयता से भी जुड़ा हुआ है, जो कि बहुत ही कम लगभग 15.6 प्रतिशत है, जबकि ग्रामीण उत्तर भारत में यह और भी कम हो जाता है। कम उम्र में शादी स्कूल छोड़ने का एक महत्वपूर्ण कारण बताया जाता है।
उत्तराधिकार
इस्लाम ने पति, माता-पिता और अभिभावकों की संपत्ति और पूंजी में महिलाओं के हिस्से का फैसला किया है, लेकिन दुर्भाग्य से जमीन पर वास्तविकता अक्सर इस्लाम की शिक्षाओं से अलग होती है। यह देखा गया है कि कई मुस्लिम महिलाओं को विरासत में कोई हिस्सा नहीं मिलता है, और कुछ को विरासत में मिले हिस्से को अपने भाइयों को वापस करने के लिए मजबूर भी किया जाता है। भारत में, मुस्लिम महिलाओं के लिए विरासत का कानून अभी भी असमान है और अडिग शर्तों से बना है। भारत में मुस्लिम महिलाओं के लिए उत्तराधिकार का कानून अब भी भेदभाव पूर्ण है, जो कट्टर शर्तों से बना है। भारत में महिलाओं पर लागू होने वाला कानून मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट 1937 के तहत आता है, जिसे कृषि भूमि को छोड़कर सभी संपत्तियों के विभाजन के लिए रिवाज के रूप में माना जाता है। इन अन्यायों पर किसी का ध्यान नहीं जाता और इन पर मुकदमों को अदालत में वर्षों तक खींचा जा सकता है।
महिलाओं को दुनिया भर में शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल, रोजगार और संपत्ति के नियंत्रण में व्यवस्थित भेदभाव का सामना करना पड़ता है। आंकड़े बताते हैं कि महिलाएं दुनिया के 70 फीसदी गरीबों का प्रतिनिधित्व करती हैं। उनके लिए रोजगार और व्यवसाय के अवसर सीमित होते हैं और उन्हें अक्सर खराब कार्य स्थितियों में कम वेतन पर काम करना पड़ता है।
भारत भर में किए गए एक सर्वेक्षण में अधिकांश शिक्षित महिलाओं ने भी अपने शैक्षिक स्तर के बावजूद, महिलाओं के प्रति निर्देशित किसी भी कार्यक्रम से अनजान होने का दावा किया। जानकारी का अभाव एक महत्वपूर्ण कारण है कि महिलाएं अधिकांश कल्याणकारी प्रावधानों का लाभ नहीं उठा पातीं, अधिकांश महिलाओं को महिलाओं के लिए विशेष रूप से मिलने वाले ऋण और अनुदानों के बारे में पता ही नहीं था।
जहां बात महिलाओं की आती है, खासकर मुस्लिम महिलाओं की, तो दुनिया हमेशा उन्हें यह बताने के लिए उत्सुक लगती है कि उन्हें कैसे रहना है, कैसे कपड़े पहनना है और कैसे व्यवहार करना है। मुस्लिम उलेमा और मुस्लिम हुक्मरान कहते हैं कि महिलाओं को सर से पैर तक ढक कर रखना चाहिए, और इस की आवश्यकता को कई अलग-अलग तरीकों से व्याख्यायित करते हैं। उनके अनुसार अगर औरत हिजाब नहीं पहने हैं तो वह नंगी है, उनके अनुसार हिजाब और नंगेपन के बीच और कोई चीज़ नहीं है, शालीन कपड़ों का उनके नजदीक कोई अस्तित्व ही नहीं है। मज़े की बात तो यह है कि खुद मुस्लिम महिलाएं भी पर्दे की हिमायत करती नज़र आती हैं और अक्सर उन्हीं तर्कों का सहारा लेती हैं जिन तर्कों द्वारा धर्म के ठेकेदार पर्दे को उनके लिए अनिवार्य बनाते हैं।
हालाँकि, महिलाएं हमेशा से सभी प्रकार के भेदभावों को सहन करती आई हैं, लेकिन धीरे-धीरे वे एक इंसान के रूप में अपने अधिकारों को समझ रही हैं। हालांकि अभी बहुत लंबा सफर तय करना है। उन्हें शिक्षित होना होगा, और मैं तो कहती हूँ कि हर पुरुष और महिला को कुरान, हदीस और फिकह सीखने की जरूरत है ताकि वे अपने अधिकारों को जान सकें और झूठी मान्यताओं और रीति-रिवाजों की गुलामी से बाहर आ सकें।
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