मज़दूर वर्ग को किसानों के समक्ष भावी शासक वर्ग के रूप में पेश आना चाहिये न कि एक टूटपूंजिया वर्ग की तरह
14 दिसंबर 2020
[ भाग 1 पढ़ने के लिए : 8 दिसंबर 2020
[ भाग 2 पढ़ने के लिए : 10 दिसंबर 2020
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मजदूर वर्ग को किसानों तथा किसान आंदोलन के समक्ष भावी शासक वर्ग के रूप में पेश आना चाहिए, न कि एक टूटपूंजिया वर्ग की तरह उसके समक्ष अपनी आर्थिक मांगें प्रस्तुत करनी चाहिए। लेकिन दुर्भाग्यवश ज्यादातर ऐसा ही हो रहा है। कुल मिलाकर मजदूर वर्ग की भूमिका को पैरों के बल पर खड़ा करने की कोशिशें हो रही हैं। हम गौर से देखें, तो ऐसा एकमात्र किसान आंदोलन का विरोध करने वालों की तरफ से ही नहीं, समर्थन करने वालों की तरफ से भी हो रहा है, और दोनों कैम्पों में मजदूर वर्ग को भावी शासक के बतौर तथा तमाम शोषित-उत्पीड़ित वर्गों की मुक्ति की लड़ाई में नेतृत्वकारी भूमिका निभाने वाले एक वर्ग के रूप में तिलांजलि दे देने की प्रवृत्ति, अगर सैद्धांतिक तौर पर नहीं तो व्यावहारिक तौर पर अवश्य ही, खासकर मौजूदा किसान आंदोलन के प्रति मजदूर वर्ग की भूमिका के क्रांतिकारी निरूपण के संदर्भ में, दिखाई दे रही है। मजदूर वर्ग को किसानों के उद्धारकर्ता के रूप में नहीं, अपितु इसके विपरीत किसानों को मजदूर वर्ग के संकटमोचक तथा उद्धारक के रूप में जाने-अनजाने पेश किया जा रहा है। मौजूदा किसान आंदोलन के रूप में देश की परिस्थिति में अकस्मात आये नुकीले मोड़ ने परतों के नीचे छुपे इन भटकावों को सतह पर ला दिया है, जहां से मजदूर आंदोलन में किसान वर्ग के प्रति रूख में 'व्याप्त' आम सहमति के बीच की असहमतियों को साफ-साफ देखा जा सकता है। इन प्रवित्तियों में कौन सी प्रवित्ति वास्तव में क्रांतिकारी है और कौन सी नहीं, इसका निर्धारण, हम उम्मीद करते हैं, मौजूदा संदर्भ में जारी किसान आंदोलन की वर्तमान 'राज्य' से होने वाली अगली भिड़ंत, अगर यह होती है, से तो हो जाएगा। अगर ऐसा नहीं भी होता है, तो जैसा कि आम तौर पर हम कहते हैं, इसका निर्धारण भविष्य के हमारे आंदोलनों की जीत और हार से तो हो ही जाएगा। लेकिन इतना तय है कि मजदूर वर्ग के एक गंभीर अगुवा संगठन के रूप में हमारा काम इन असहमतियों पर परदा डालना नहीं, अपितु इन्हें और अधिक स्पष्टता के साथ तथा आवर्धित रूप में रखना है, ताकि किसी शोषित-पीड़ित अंतवर्ती वर्ग के आंदोलन में मजदूर वर्ग की क्रांतिकारी भूमिका के निरूपण को लेकर छाये विभ्रम और व्याप्त असहमतियों पर एक गंभीर बहस की शुरूआत हो सके, खास कर इस प्रश्न के गलत प्रेजेंटेशन को दुरूस्त किया जा सके।
किसान आंदोलन में मजदूर वर्ग की भूमिका को लेकर चले विमर्श में हमने हमेशा यह कहा है कि मजदूर वर्ग आंदोलन की अत्यंत कमजोर स्थिति हमारी क्रांतिकारी इच्छाओं को संकुचित तथा कुंठित करती है। निश्चय ही यह हमारी क्रांतिकारी पहलकदमी की तुच्छ सीमा को भी साफ-साफ रेखांकित करती है, लेकिन वर्तमान किसान आंदोलन के संदर्भ में जिस तरह की असहमतियां, जिसे हम चाहें तो वैचारिक व राजनीतिक दरिद्रता भी कह सकते हैं, हमारे पूरे आंदोलन में चारो तरफ दिखाई दे रही है वह हमारी नजरों में आज से पहले अकल्पनीय था। किसानों और उनके आंदोलन से मजदूर वर्ग की आर्थिक मांगों को उठाने की मांग करना (एक हद के बाद हम इसे चिरौरी करना भी कह सकते हैं) और इसे किसानों की लड़ाई के समर्थन या विरोध का प्रस्थान बिंदु बना देना हमारी समझ में इसका शिखर बिंदु है।
उठने वाले भिन्न-भिन्न स्वर क्या है?
नये फार्म कानूनों के विरूद्ध किसान आंदोलन के शुरू होते ही कई मजदूर वर्गीय हलकों से यह आवाज आनी शुरू हो गई कि किसान आंदोलन में मजदूर वर्ग की मांग (उदारहण के लिए कृषि में लगू मजदूरों की मजदूरी में वृद्धि की मांग) शामिल नहीं है और इसीलिए इसका समर्थन नहीं किया जा सकता है। कुछ हलकों ने किसान आंदोलन के प्रति हिकारत से भरी बातें भी कहीं। यह प्रश्न बार-बार पूछा और उठाया गया कि अगर मजदूर की मांग इसमें शामिल ही नहीं है, तो मजदूर इसका समर्थन किस आधार पर और क्यों करेंगे या कैसे कर सकते हैं? कुछ ने यह मांग उठाई कि किसान आंदोलन की ओर से या उसके मंच से मजदूर वर्ग की मांगें (जैसे कि लेबर कोड को रद्द करने की मांग) भी उठनी चाहिए, तभी मजदूर-किसान का संयुक्त मोर्चा बन सकता है। वहीं कुछ लोग यह बोल रहे हैं कि वे इसका समर्थन इसलिए कर रहे हैं क्योंकि नये फार्म कानूनों से मजदूर वर्ग के लिए जरूरी खाने की वस्तुएं महंगी हो जाएंगी। इनका कहना है कि मजदूर यह देख रहे हैं कि बाजार में किसान गेहूं किस रेट पर बेच रहे हैं और आंटा दुकानों में किस रेट से बिक रहा है और इस आधार पर मजदूर समझ रहे हैं कि अनाजों के निजी भंडारण पर सीमा खत्म करने से महंगाई काफी बढ़ेगी। लेकिन ऐसे लोग इस पर फंसते दिखते हैं कि एमएसपी से भी तो खाद्य वस्तुओं की महंगाई बढ़ेगी। संपूर्णता में यही कहा जा रहा है कि मजदूर किसान मोर्चा बनना चाहिए, लेकिन यह तभी बनेगा जब किसान नये फार्म कानून का विरोध करने के साथ-साथ मजदूर विरोधी कानूनों, जैसे कि लेबर कोड आदि का भी खुलकर विरोध करें तथा आंदोलन में खेत मजदूरों की मांगों, खासकर मजदूरी वृद्धि की मांग को भी शामिल किया जाएगा।
उपरोक्त बातों से स्वतःस्पष्ट है कि मजदूर वर्ग और उसकी अगुवा ताकतें वैचारिक-राजनैतिक दृष्टि से किस दयनीय स्थिति में जा पहुंचे हैं! जहां मजदूर वर्ग को भावी शासक वर्ग के बतौर पेश आना चाहिए था, वहीं, इसके विपरीत, किसान को ही मजदूर वर्ग के उद्धारकर्ता और संकटमोचक के रूप में पेश किया जा रहा है। यहां मजदूर वर्ग की छवि एक ऐसे वर्ग के बतौर तो कतई नहीं पेश होती है जो बुर्जुआ सत्ता का दावेदार और भावी शासक वर्ग है, और जिसे निकट भविष्य में नहीं तो सुदूर भविष्य में ही सही लेकिन भावी शासक वर्ग की हैसियत से पूंजीवादी खेती के जंजाल में फंसे और आत्महत्या कर रहे किसानों की मुक्ति का सवाल हल करना है। हम पाते हैं कि मजदूर वर्ग के अगुवा स्वयं ही मजदूर वर्ग की अगुवा अवस्थिति का परित्याग करने के लिए तैयार हैं। यही कारण है कि वे किसान आंदोलन की मांगों, उसके अंतर्य तथा बाह्य स्वरूप पर, मजदूर वर्ग की बर्जुआ वर्ग पर भावी जीत की शर्तों और जरूरतों की दृष्टि से विचार ही नहीं कर रहे हैं। इसके विपरीत वे महज आर्थिक विश्लेषण के आधार पर मजदूर वर्ग की 'टूटपूंजिया' मांगों के आधार पर अत्यंत कुंठित दृष्टिकोण के साथ विचार कर रहे हैं और इसीलिए इस बात का रोना लेकर बैठते हैं कि मजदूर वर्ग की मांग इसमें क्यों शामिल नहीं हैं। दरअसल वे किसानों के समक्ष अपने को याचक बना लेते हैं।
मजदूर वर्ग आंदोलन की दयनीयता तो यहां प्रकट होती ही है, लेकिन उससे बढ़कर मजदूर वर्ग को यहां उपहासात्मक स्थिति में ला खड़ा किया जा रहा है, क्योंकि सबसे अव्वल बात तो यही है कि किसानों ने अभी तक औपचारिक रूप से मजदूर वर्ग को इस आंदोलन में शामिल होने और साथ मिलकर कोई मोर्चा बनाने की बात उठाई ही नहीं है, न ही किसानों ने ट्रेड यूनियनों तक को ऐसा कोई औपचारिक न्योता भेजा है। उल्टे, किसान तो कह रहे हैं कि उसके बंद, घेराव और प्रदर्शन के आह्वान में शामिल होने वाले अपने झंडे-डंडे और बैनर पीछे छोड़कर आयें, यानी दूसरे अर्थों में, सभी किसान बन जाएं। दूसरी तरफ हम हैं कि मोर्चा बनाने की बात पर खुद से खुद को ही निमंत्रण ले-दे कर खुद से खुद की अगवानी के लिए सूटबूट पहने तैयार बैठे हैं। हमारा वैचारिक-राजनीतिक व्यवहार स्वयं ही इस पीड़ादायक और हास्यापस्द स्थिति के लिए जिम्मेवार है।
विशुद्ध रूप से किसान और खेती से जुड़ी मांगों पर केंद्रित किसान आंदोलन से हमारे द्वारा झट से इसमें मजदूरों की मांग होने या नहीं होने का सवाल उठा दिया जाता है। किसान भला मजदूरों की मांग क्यों उठाएंगे और सबसे बड़ी बात यह कि इस आधार पर किसान आंदोलन को समर्थन देने या न देने की बात मजदूर वर्ग किस तरह से उठा सकता है? मजदूर वर्ग अन्य वर्गों की मुक्ति के सवाल और उसके आंदोलन की जायज मांगों को उठाता है, तो यह समझ में आने वाली बात है, क्योंकि वह अन्य सभी वर्गो की मुक्ति के पहले स्वयं को मुक्त नहीं कर सकता है, लेकिन ठीक यही बाध्यता हम अन्य अंतवर्ती वर्गों के ऊपर कैसे अरोपित कर सकते हैं? मजदूर वर्ग का सबसे मुख्य काम किसी भी अंतवर्ती वर्ग के आंदोलन को ठीक उसके अपने ही अर्थों में समझने का होता है, न कि किसी अन्य वर्ग और उसकी मांगों के अर्थ में। मजदूर वर्ग की अगुवा ताकत का काम किसी ऐसे आंदोलन की मांगों की पूर्ति की शर्तों की, अथवा हम कह सकते हैं, उसकी जीत या हार की संभावनाओं की मौजूदा 'राज्य' को अलग-थलग करने से लेकर उस पर स्वयं का वर्चस्व स्थापित करने के सदर्भ में विश्लेषण करना होता है, उसको आगे बढ़ाने वाले तमाम अन्य प्रश्नों के मद्देनजर उस पर विचार करना होता है। और सबसे बढ़कर अपने मुख्य काम व लक्ष्य – बुर्जुआ सत्ता पर कब्जे की लड़ाई – को आगे बढ़ाने हेतु अपने सहयोगियों की तलाश करता है। जाहिर है, और हमें यह बात खुलकर स्वीकारना चाहिए कि इसके मूल में अपने सहयोगियों (जिसमें सबसे भरोसेमंद से लेकर सबसे कम भरोसेमंद और अस्थायी सहयोगी शामिल हैं) तथा उनकी पक्षधर शक्तियों को अपने पीछे लामबंद करने का लक्ष्य होता है। एक ऐसा वर्ग जिसका ऐतिहासिक लक्ष्य बुर्जुआ वर्ग को सत्ताच्यूत कर स्वयं को राजनीतिक प्रभुत्व में पहुंचाना और पूरी मानवजाति को शोषण व शासन से मुक्त करने हेतु पल-पल विलुप्त होता सर्वहारा राज्य कायम करना है, और अगर वह अपने इस ऐतिहासिक मिशन के प्रति सचेत है, तो वह इसी दिशा में सोचेगा और अपनी गतिविधियों को निर्देशित करेगा, न कि किसी टूटपूंजिया वर्ग की भांति बुर्जुआ राज्य के अधीन प्रतिदिन संक्रमित और विलुप्त वर्ग के समक्ष गिड़गिड़ाएगा। मौजूदा किसान आंदोलन ने मजदूर आंदोलन में व्याप्त अनेकानेक बुनियादी कमजोरियों को उजागर कर दिया है, जिसका विशद सार संकलन करने का हम सबका दायित्व है। हमें इसे भविष्य में अपने हाथ में लेना ही होगा।
किसानों की समस्त उपज को उचित दाम पर एकमात्र सर्वहारा राज्य ही खरीद सकता है
सवाल है, क्या कोई बुर्जुआ राज्य किसानों की समस्त उपज को 'उचित' दाम पर कभी खरीद सकता है? क्या इतिहास में ऐसा हुआ है कि किसी बुर्जुआ राज्य ने किसानों को उजड़ने देने से रोका है? सरकारों से परे, पूंजीवाद में किसानों की दुर्गति का कोई समाधान है ही नहीं। यूरोप अथवा जापान या अमेरिका जैसे विकसित मुल्कों में खेती में अत्यंत छोटी आबादी लगी है। इन देशों में बहुत पहले ही अधिकांश किसानों को बर्जुआ तथा कारपोरेट वर्ग ने खेती से निकाल बाहर कर दिया था, लेकिन इस छोटी आबादी को भी उजाड़ने की प्रक्रिया जारी है और वे रोज थोड़ा-थोड़ा करके उजड़ रहे हैं। मज़दूर वर्ग अगर आज अपने ऐतिहासिक कर्तव्य की पूति करते हुए बुर्जुआ वर्ग के मुकाबले सत्ता का मौजूदा नहीं तो भविष्य का दावेदार बन कर, यानी भावी शासक वर्ग के रूप में, न कि किसी टूटपूंजिया वर्ग की तरह, बात करे तो उसे संघर्षरत किसानों से क्या कहना चाहिए? यही कि एकमात्र भावी सर्वहारा राज्य ही किसानों के समस्त उत्पादों की 'उचित' दाम पर खरीद कर सकता है। इसलिए वह न सिर्फ कारपोरेट के विरूद्ध उनके आंदोलन का समर्थन करता है, अपितु वह इस बात का आह्वान भी करता है कि देश के सभी वास्तविक किसान स्वयं अपनी इच्छा से आपस में मिलकर सामूहिक फार्म बनायें, जिसे मज़दूर वर्ग के राज्य से मुफ्त ट्रैक्टर और सिंचाई के साधन सहित उन्नत बीज, खाद आदि की भी मुफ्त सहायता दी जाएगी, ताकि वे ज्यादा से ज्यादा उत्पादन के लक्ष्य के साथ सर्वहारा राज्य के साथ पूर्व निर्धारित फसलों और मूल्य पर खेती कर सकें, अर्थात कॉन्ट्रैक्ट खेती कर सकें।
हमें अंदाजा है कि वास्तविक किसान क्या कहेंगे। ज्यादा संभावना इस बात की है कि वे कहंगे कि वे हमारे साथ हैं, क्योंकि वे खुले बाजार में ऊंचे दाम की उत्प्रेरणा का हस्र देख चुके हैं। इसीलिए तो वे कारपोरेट खेती का विरोध कर रहे हैं। हमें उनसे साफ-साफ कहना चाहिए कि वास्तविक किसानों की मुक्ति का खेती से पूरी तरह उजाड़ दिये जाने की नियति से छुटकारा पाने का और कोई तरीका नहीं है। हमें इसी आधार पर किसानों से मोर्चे और उनके आंदोलन के समर्थन की बात करनी चाहिए। वास्तविक किसान न सिर्फ इसके लिए राजी होंगे अपितु वे मज़दूर वर्ग की सत्ता के लिए संघर्ष के साथ खड़े होंगे और साथ मिलकर नया समाज यानी समाजवाद की स्थापना करने में मज़दूर वर्ग के सहायक भी भूमिका निभाएंगे। लेकिन इसके लिए दम साध कर कठिन और कष्टसाध्य प्रचार और शिक्षण-प्रशिक्षण का कार्य करना होगा।
हमें, यानी मज़दूर वर्ग के सच्चे क्रांतिकारी तथा अगुवा ताकतों को यह समझना होगा कि जारी किसान आंदोलन में उठे केंद्रीय मुद्दों का कैसे एक नेतृत्वकारी वर्ग के प्रतिनिधि के रूप में समर्थन दिया जाए। लेकिन इसके विपरीत समर्थन देने का एकमात्र अर्थ जारी किसान आंदोलन के पीछे-पीछे चलना समझ लिया गया है। हमारा आज का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण परंतु कठिन काम मज़दूर वर्ग को इस सशक्त स्थिति में लाना है कि वह सत्ता के हस्तांतरण का प्रबल दावेदार बन कर उभरे और इस हैसियत से संघर्षरत किसानों के सामने यह प्रस्ताव रखे : मेहनतकश किसान भाइयों! आइये, सर्वहारा राज्य के लिए हमारे संघर्ष का साथ दीजिए, हम आपके समस्त उत्पादों की न सिर्फ खरीद करने का वचन देते हैं, अपितु हम आपके सामूहिक फार्म उत्पादन को आधुनिक प्रोद्योगिकी के बल पर इतना अधिक उन्नत बनाएंगे कि वास्तविक अर्थों में कृषि उत्पादों की प्रचुरता कायम हो सके ताकि देश के सभी लोगों सहित स्वयं किसानों को भी पोषणयुक्त आहार मिल सके, काम करने में अक्षम लोगों, बूढ़ों, बच्चों तथा बीमार व रोगग्रस्त लोगों के लिए भी भोजन की कोई कमी न हो, और उससे भी बढ़कर किसानों को भी अपने अन्य तरह की प्रतिभाओं को विकसित करने का अवसर और समय मिले। साथ ही हम सर्वहारा राज्य के माध्यम से, जो पूरी अर्थव्यवस्था तथा उद्योग पर मजदूर वर्ग के आधिपत्य का सुनिश्चित करेगा और जो मुनाफा के बदले सभी उत्पादकों की जीवन स्थिति में सुधार के लक्ष्य को समाने रखकर उत्पादन करेगा, आधुनिकीकृत कृषि कार्य से अवश्यंभावी रूप से मुक्त हुए लोगों को अनिवार्य रूप से उद्योगों में काम देगा, क्योंकि सर्वहारा राज्य बेरोजगारी को पूरी तरह खत्म करते हुए श्रम की गरिमा को स्थापित करेगा और इस अवधारणा को जमीन पर लागू करेगा जिसके अनुसार "जो कमाएगा वह खायेगा, और जो नहीं कमाएगा वह नहीं खायेगा" का सिद्धांत कानून के रूप में संविधान में अंकित होगा। तब पूंजीवाद में महामारी को रूप ले चुकी मांग और खपत की कमी का सदा के लिए अंत हो जाएगा, क्योंकि गरीबी और दरिद्रता का भी पूरी तरह अंत कर दिया जाएगा। इसी के साथ सभी पूंजीवादी देशों में पाई जाने वाली पूंजीवादी अतिउत्पादन की लाइलाज बीमारी, जिसके अंतर्गत सभी मुल्कों में माालों तथा पूंजी की अति प्रचुरता के बावजूद लोगों को आवास, भोजन, कपड़ा तथा इलाज व शिक्षा के अभाव में तिल तिल कर मरना होता है, का भी हमेशा के लिए खात्मा कर दिया जाएगा।
जरा आंकड़ों पर गौर करें। 2015-16 के सर्वे के अनुसार, किसानों की व्यापक आबादी (छोटे और सीमांत को मिलाकर 86% से भी जयादा) की लैंड होल्डिंग 2 हेक्टेयर या इससे भी कम है। इनमें सीमांत किसानों (शून्य से 1 हेक्टेयर वाले) का हिस्सा 67% से भी ज्यादा है। लैंड होल्डिंग का औसत साइज भी पहले की तुलना में (1.15 से 1.08 हेक्टेयर) घटा है। पूंजीवादी कृषि व्यवस्था के तहत इनका लाभप्रद होना तो छोड़िये, इनका टिका रहना भी असंभव है। कोई भी पूंजीवादी सरकार इन्हें बचाने का उपाय नहीं करेगी किसानों को यह समझ लेना चाहिए। सरकारें चाहें तब भी पूंजीवाद में इन्हें बचाने का कोई उपाय है भी नही। ऐसा कोई नियम या कानून नहीं है जिससे इन गरीब किसानों को बचाया जा सकता है। घाटा, कर्ज, दिवालियापन, और अंतत: खेती से उजड़ना और आत्महत्या ही पूंजीवाद के अंतर्गत इनकी नियति है। इनकी मुक्ति की बात एकमात्र पूंजीवाद के खात्मे और सर्वहारा राज्य की स्थापना में ही निहित है। एकमात्र सर्वहारा राज्य ही वास्तविक किसानों को, जो खेती से जुड़ी कुल आबादी के 86 प्रतिशत से भी अधिक हैं, सामूहिक आधुनिक व कृषि फार्मों में संगठित करते हुए सभी तरह की सहायता व संरक्षण देकर तथा कृषि उत्पादों को पूरी तरह खरीद कर उन्हें गरिमामय सुंदर जीवन दे सकता है, और साथ में देश के सभी लोगों का उन्नत सार्वजनिक वितरण प्रणाली के बल पर पेट भी भर सकता है। पूंजीवाद के अंतर्गत सभी का पेट भरने का दायित्व 'राज्य' पर होता ही नहीं है, इसलिए वह कृषि उत्पादों की पूरी खरीद कर ही नहीं सकती है। पूंजीवाद के अंतर्गत एकमात्र उपाय कृषि उत्पादों की ऊपज, इसके व्यापार तथा खरीद व भंडारण को बड़े पूंजीपतियों यानी कारपोरेट के हवाले करना बच जाता है और मोदी सरकार ठीक यही कर रही है। कारपोरेट कृषि उत्पादों का भंडारण करके देश व विदेश में अपनी मर्जी के अनुसार मुनाफा कमायेगा। लेकिन इसके लिए कारपोरेट चाहता है कि उसके हाथ में पूरे कृषि का नियमन और नियंत्रण हो जो फसलों की खरीद से होकर जमीन तक जाएगा। कांट्रैक्ट फार्मिंग इसका ही अनुगामी कदम था जिसके जरिए बड़े व कुलक किसानों को मुनाफा कमाने का अवसर प्रदान करके आकर्षित किया गया। इसका अग्रगामी कदम निश्चय ही कारपोरेट के हाथों में कृषि को दे देना है जिसके लिए ही मोदी सरकार ने नये फार्म कानून लाए हैं। यह रास्ता किसानों को अंतत: कृषि से उखाड़ फेंकने का रास्ता है। किसानों ने इसका विरोध करके बिल्कुल सही किया है। आज किसानों के पास दो ही विकल्प है : या तो सर्वहारा राज्य के अंतर्गत इसके साथ कांट्रैक्ट खेती अर्थात समाजीकृत सामूहिक कृषि के अंतर्गत भावी सर्वहारा राज्य के साथ मिलकर खेती करें या फिर पूंजीवादी राज्य के अंतर्गत कारपोरेट के साथ कांटैक्ट खेती को स्वीकार करें। जहां पहले के अंतर्गत व्यापक और वास्तविक किसानों की उन्नति का सुंदर भविष्य है, तो दूसरे के अंतर्गत व्यापक किसानों की बर्बादी तथा उनके संपतिहरण का रास्ता है। किसानों को चुनना होगा कि वे स्वयं किस रास्ते पर चलना चाहते हैं। मजदूर वर्ग हर हाल में किसानों की कारपोरेट द्वारा बलात बेदखली के खिलाफ कड़े संघर्ष का हिमायती है और रहेगा, भले ही इन संघर्षों का पूंजीवाद के रहते कोई ऐसा नतीजा निकलने वाला नहीं है जो वास्तविक किसानों के हक में जाएगा।
किसानों को सोचना है, क्या हम पूंजीवाद के रहते कारपोरेट खेती को रोक सकते हैं? नहीं, यह संभव नहीं है। अगर कोई ऐसा ख्वाब देखता भी है तो यह प्रतिक्रियावादी ख्वाब ही है, क्योंकि यह इतिहास को आगे ले जाने के बदले पीछे ले जाने की वकालत पर आधारित है। सवाल है पूंजीवादी कारपोरेट खेती से आगे का रास्ता, इतिहास की अग्र गति के अनुकूल, समाजवादी सामुहिक खेती की ओर जाता है, न कि फिर से सामान्य पूंजीवादी कृषि की ओर। इस बीच एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि क्या किसानों को पहले कारपोरेट के हाथों बलात उजड़ने दिया जाए या उजड़ने के पहले ही हम उनको साथ ला सकते हैं? हमारा मत है कि किसानों के पूरी तरह उजड़ने के पहले ही मजदूर वर्ग को उन्हें यथासंभव अपने साथ ले आने की भरपूर कोशिश करनी चाहिए ताकि पूंजीवादी व्यवस्था को खत्म करने का काम जितनी जल्दी और आसानी से हो पूरा किया जा सके। जाहिर है कि यह काम मजदूर वर्ग की टूटपूंजिया मांगों को आगे करके नहीं किया जा सकता है, अपतिु वास्तविक किसानों के जीवन के अहम प्रश्नों का हल निकालने वाले भावी शासक वर्ग के रूप में अपने को पेश करके तथा सर्वहारा राज्य द्वारा पूरे समाज की समस्याओं का हल करने के लिए उठाये जाने वाले कदमों को पेश करने के आधार पर किया जा सकेगा।
पिछली सदी के अंतिम दो दशक तक की भी बात करें, जब कारपोरेट खेती का इतने बड़े पैमाने पर आगाज नहीं हुआ था, तब भी ये छोटे व सीमांत किसान पूंजीवादी कृषि से अपना गुजर-बसर नहीं कर पा रहे थे। हां, बड़े और धनी किसान उस समय तक पूंजीवादी कृषि से लाभान्वित हो रहे थे। आज न्यूनाधिक छोटी आबादी को छोड़ समस्त किसानों की स्थिति चिंताजनक हो चुकी है। इसलिए यह सोचना तो मूर्खता ही होगी कि इन वास्तविक किसानों की जीवन-दशा पूंजीवाद के अंतर्गत किसी भी तरह बदल सकती है, चाहे मोदी सरकार नये कृषि कानून वापस ही क्यों न ले ले । अव्वल तो यह कि पूंजीवादी कृषि के अब तक हो चुके विकास, यानी कारपोरेट स्टेज तक के विकास, को पलटा नहीं जा सकता है, अर्थात कारपोरेट पक्षीय नीतियों को कोई बुर्जुआ सरकार पीछे नहीं ले जा सकती है जब तक कि स्वयं बुर्जुआ राज्य को ही सवर्हारा और मेहनतकश किसान मिलकर पलट न दें, जिसकी जरूरत को हम इस लेख में लगातार रेखांकित कर रहे हैं। लेकिन अगर हम थोड़ी देर के लिए यह मान भी लें कि मोदी सरकार कारपोरेट खेती से अपने पांव पीछे खींचने के लिए राजी हो जाती है, तो यह स्पष्टत: अस्थाई और अत्यंत मजबूरी में उठाये गये कदम के बतौर ही होगा और जल्द ही सरकार फिर से कारपोरेट को किसी न किसी माध्यम से आगे करेगी ही करेगी, क्योंकि इसके बिना पूंजीवादी व्यवस्था का चलना मुश्किल है। अगर हम कोल्हू के बैल की तरह एक ही खूंटे के चारो ओर लगातार घूमते भी रहें तो भी इसमें कोई फर्क नहीं आने वाला है।
छोटे व सीमांत किसानों को पूंजीवादी कृषि से होने वाली बर्बादी का अहसास आज नहीं, 90 के दशक के पूर्वार्द्ध से ही होने लगा था। उनकी कर्जग्रस्तता, बर्बादी और आत्महत्या का इतिहास पूंजीवादी कृषि की लगभग शुरूआत से ही जुड़ा है और वे पिछले तीन दशक से घाटे ओर कर्ज में डूबकर आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे हैं। कृषि से उनके बाहर निकलने का सिलसिला भी पुराना है। कारपोरेट खेती को बढ़ावा देने वाले फार्म कानूनों से जो मुख्य बात होगी वह यह कि अब इन्हें बलात और इसीलिए एकमुश्त तौर से कृषि से निकाला जाएगा। यह ठीक-ठीक कैसे होगा इसके बारे में हम आगे लिखेंगे, लेकिन फिलहाल यह समझना जरूरी है कि इसके पहले तक कृषि से इनके निष्काषन की प्रक्रिया ज्यादातर एक स्वयंस्फूर्त (spontaneous) प्रक्रिया के रूप में चल रही थी और किसानों के धनी तबके अमूमन इसके शिकार नहीं थे। लेकिन अब यह खतरा इनके सर पर भी मंडरा रहा है।
कारपोरेट खेती की जगह किसान समाजवादी कृषि के तहत सर्वहारा राज्य के साथ कॉन्ट्रैक्ट खेती करके ही वर्तमान दुर्दशा से बाहर निकल सकते हैं। वे अपने आंदोलन को उस ओर मोड़ने में जितनी देर करेंगे, उनकी दुर्गति उतनी तेजी से उनका नाश करती जाएगी। यह किसानों के हाथ में है कि वे मजदूर वर्ग के इस प्रस्ताव को ठुकराते हैं या स्वीकारते हैं। अगर वे अपने बड़े धनी किसान नेताओं जो पूंजीवाद के परिणामों से पूंजीवाद को दूर किये बिना ही लड़ना चाहते हैं, और कारपोरेटपक्षी नीतियों को सरकार पर दवाब बनाकर रद्द कराने का ख्वाब पाले हुए हैं, पर बिना सोचे समझे भरोसा रखते है तथा मजदूर वर्ग द्वारा बताई गई दिशा में अपने संघर्ष को नहीं ले जाते हैं, तो जल्द ही उनका विनाश हो जाएगा। खासकर गरीब किसान जल्द ही आने वाले समय में सर्वहारा की पातों में शामिल होने के लिए बाध्य होंगे। चाहे आज हो या कल, चाहे पूरी तरह उजड़ कर हो या फिर भावी सर्वहारा राज्य के सहयात्री किसान वर्ग के रूप में, लेकिन उनका भविष्य सर्वहारा एवं मजदूर वर्ग के साथ ही जुड़ा हुआ है। पूंजीवाद पर इसकी जीत में ही उनकी जीत है। अगर किसान आंदोलन मजदूर वर्ग के इस प्रस्ताव पर, मजदूरों की मांग के आधार पर नहीं स्वयं उनकी मांगों के अंतिम समाधान पेश करता है, विचार करते हैं या भविष्य में विचार करने की बात स्वीकारते हैं, तभी और एकमात्र तभी हम सच्चे अर्थों में मजदूर-किसान एकता की बात कर सकते हैं, भले ही मजदूर वर्ग कारपोरेट द्वारा किसान वर्ग के द्वारा बलात लूटने की कार्रवाई का तब भी विरोध करता रहेगा। लेकिन जब तक गरीब किसानों का व्यापक हिस्सा बड़े धनी किसानों की बुर्जुआ वर्ग व राज्य की राजनीति का हिस्सा और उनके प्यादे बने रहेंगे, तब तक मजदूर-किसान एकता की बात महज एक नारा ही बनी रहेगी।
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