Monday, 19 April 2021

अर्नेस्ट थेलमन्न- कन्हैया


फासिज्म विरोधी संघर्ष के समर्पित जनयोद्धा 




अर्न्स्ट थेलमन्न


A DEDICATED FIGHTER TO ANTI-FASCIST STRUGGLE ERNST THAELMANN






लेखक


कन्हैया


AUTHOR KANHAIYA








प्रकाशक


भारत जर्मन जनवादी गणतंत्र मैत्री संघ बिहार राज्यपरिषद्, पटना


PUBLISHERS


INDO-GDR FRIENDSHIP ASSOCIATION BIHAR STATE COUNCIL, PATNA



फासिस्ट दरिन्दों ने जर्मन जनता के महान सपूत 

अर्न्स्ट थेलमन्न को मार डाला, लेकिन  थेलमन्न की परंपरा का समर्थन करनेवाली 

जर्मन जाति को संतान ने उनकी राजनीतिक परिकल्पना 

को साकार कर दिया। ४० साल पहले अप्रैल १९४६ में जर्मन जनवादी गणतंत्र को धरती पर जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी और सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी के एकीकरण के परिणामस्वरूप जर्मनी की समाजवादी एकता पार्टी का उदय हुआ। जर्मनी की समाजवादी एकता पार्टी के सफल नेतृत्वा जर्मन जनवादी गणतंत्र समाजवादी निर्माण के कार्यों को पूरा करता जा रहा है ।


थेलमन्न ने कहा था : "हिटलर युद्ध का दानव है।" 

वर्तमान जर्मन जनवादी गणतंत्र की धरती पर "युद्ध" का नाम 

लेना अपराध है ।


हम कह सकते हैं :

"जर्मन जनवादी गणतंत्र थेलमन्न द्वारा परिकल्पित

शांति का अजेय दुर्ग है !"



*


दो शब्द


अर्न्स्ट थैलमन्न शताब्दी समारोह के अवसर पर अपने प्रबुद्ध पाठकों के सम्मुख थैलमन्न का संक्षिप्त जीवन वृत्त प्रस्तुत करते हुए मुझे प्रसन्नता हो रही है। सर्वप्रथम अपने छात्र जीवन में यूरोप का इतिहास पढ़ते हुए मुझे थैलमन्न के नाम से परिचित होने का सौभाग्य मिला था। कालांतर में अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन से सम्बन्धित साहित्य के अध्ययन में विशेष रुचि पैदा हो जाने के कारण, मुझे थैलमन्न के कांतिकारी जीवन के अनेक पहलुओं की जानकारी हुई। अन्तर्राष्ट्रीय फासिस्ट विरोधी सम्मेलन (पटना, १९७५) के दौरान मैंने कई फासिस्ट विरोधी गोष्ठियों और सभाओं को सम्बोधित करते हुए थैलमन्न की वीरता और त्याग के उदाहरण प्रस्तुत किये थे। शायद इन्हीं सब कारणों से, थैलमन्न शताब्दी समारोह के अवसर पर, यह सुझाव आया कि मैं थैलमन्न का संक्षिप्त जीवन चरित्र तैयार कर दू |


थेलमन्न की जीवनी प्रकाशित करने की योजना भारत-जर्मन जनवादी गणतंत्र मंत्री संघ की बिहार राज्यपरिषद् की ओर से बहुत पहले ही तैयार कर ली गयी थी और इसके महासचिव फणीश सिंह ने उसकी सूचना भी मुझे यथासमय दे दी थी, लेकिन अपनी व्यस्तताओं और थैलमन्न के जीवन से संबंधित प्रामाणिक तथ्यों की तलाश में चक्कर लगाते रहने के कारण काफी समय गुजर गया, जिससे जीवनी लेखन के काम में यत्किंचित विलम्ब हो गया । योजना थी कि पुस्तक की कुछ प्रतियाँ जर्मनी की समाजवादी एकता पार्टी की ११वीं कांग्रेस के अवसर पर ज० ज० म० की राजधानी बर्लिन में भेज दी जायें; यह एक सुविचारित योजना भी, क्योंकि जर्मनी की समाजवादी एकता पार्टी, कम्युनिस्टों और सोशल डेमोक्रेटों की एकात्मकता के साथ, जिस तरह समाजवादी निर्माण का मार्ग प्रशस्त करती जा रही है, उसकी परिकल्पना थैलमन्न  ने तीसरे दशक के प्रारम्भिक दौर में ही कर ली थी।


अब यह पुस्तक, अपने छोटे आकार में ही सही, प्रकाशित हो रही है। मैंने इसमें जिस सामग्री का उपयोग किया है, वह कई पुस्तकों और दो-चार लघू निबंधों


एवं टिप्पणियों से उधार ली गयी है, इसलिए मैं इनके लेखकों और प्रकाशकों के प्रति आभार व्यक्त करता हूँ। मैं निःसंकोच स्वीकार करता हूँ कि यदि मुझे 'नाका', पब्लिशिंग हाउस, मास्को द्वारा प्रकाशित 'लाइव्स गिवेन फ्रीडम' नामक पुस्तक समय पर नहीं मिलती, तो इस जीवनी के प्रकाशन में बहुत विलम्ब हो जाता। मैंने उक्त पुस्तक की सामग्री का उपयोग इस तरह किया है कि मुझपर 'साहित्यिक चोरी' का इल्जाम लगाया जा सकता है, लेकिन मैंने किसी बुरी नीयत से यह काम नहीं किया बल्कि इस संदर्भ में मेरा तो एकमात्र यह उद्देश्य रहा कि थैलमन्न संबंधी प्रामाणिक तथ्यों का संकलन किया जाये और इस काम में मुझे सबसे अधिक मदद उक्त पुस्तक की सामग्री से मिली; इसलिए उसके लेखक और प्रकाशक के प्रति मैं विशेष रूप से आभारी हूँ।


इस पुस्तक के प्रकाशन का सारा श्रेय, बिहार में भारत-ज० ज० ग० मैंत्री को व्यापक बनाने के लिए प्रयत्नशील, भारत-जर्मन जनवादी गणतंत्र मंत्री संघ की बिहार राज्यपरिषद् के कर्मठ महासचिव फणीश सिंह को है । उनके और लूना प्रिंटिंग प्रेस के स्वत्वाधिकारी रवीन्द्र शर्मा के सहयोग और तत्परता से यह पुस्तक यथासमय प्रकाशित हो रही है। मैं दोनों के प्रति धन्यवाद व्यक्त करता हूँ ।


यदि इस पुस्तक से भारत और जर्मन जनवादी गणतंत्र के पारस्परिक मैत्री संबंधों को विकसित करने तथा नाभिकीय विनाश की आशंका के विरुद्ध और विश्व शांति के पक्ष में जनमत तैयार करने में मदद मिली, तो मैं अपना परिश्रम सफल मानूगा ।


पटना,


७ अप्रैल, १९८६                 कन्हैया


ऐतिहासिक परंपराए


जर्मनी का इतिहास वीरता, त्याग और बलिदान के अनेकों उदाहरणों से भरा पड़ा है। इस देश में एक से बढ़कर एक पराक्रमी, त्यागी और युगप्रवर्तक महापुरुष पैदा हुए, जिनकी प्रेरणा से मानव जाति के विकास का मार्ग प्रशस्त हुआ है। यदि लोग जर्मनी को वैज्ञानिकों, महापंडितों, दार्शनिकों और पुरुषार्थियों का देश कहते हैं, तो इसमें वस्तुत: कोई अतिशयोक्ति नहीं है ।


जर्मनी को विश्व के कुछ अन्य महान राष्ट्रों की ही भांति भीषण अग्नि परीक्षाओं के बीच से गुजरना पड़ा है, उन्हीं अग्नि परीक्षाओं के बीच से जिन तपे तपाये लोकनायकों का आविर्भाव हुआ, उनमें अस्ट येलमन्न का एक प्रमुख स्थान है। यहाँअर्न्स्ट थैलमन्न का संक्षिप्त जीवन-वृत्त प्रस्तुत करने के पहले जर्मन जाति की उन ऐतिहासिक परम्पराओं का जिक्र भर कर देना आवश्यक है, जिनके बिना जातीय उत्थान, विकास और प्रगति की कल्पना भी नहीं की जा सकती है ।


जर्मनी का इतिहास लगभग दो हजार साल पुराना है। बबेर जीवन की पराजय और एक नये जातीय गौरव के उदय के साथ इसके इतिहास की शुरुआत हुई। यहाँ की जनता मानवतावादी और क्रांतिकारी परम्पराओं से इतिहास के प्रारंभिक काल से ही जुड़ी रही। इतिहास ने जर्मन जनता को राष्ट्र और समग्र मानवज ति से प्रेम करना सिखलाया। मनुष्य के प्रति अगाध प्रेम का उदाहरण वह धर्मसुधार आन्दोलन है, जिसका प्रारम्भ जर्मनी की धरती से ही हुआ था। इस धर्मसुधार आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य था कि देश को विखंडित होने से बचाया जाये और सामाजिक तथा आर्थिक पिछड़ेपन को दूर किया जाये। धर्मसुधार आन्दोलन ने सामंतवादी और महाजनी शोषण का तीव्र विरोध किया। धर्म सुधार आन्दोलन के प्रवर्तक मार्टिन लूथर (१४८३-१५४६) ने विचारों की स्वतन्त्रता का समर्थन करते हुए इस बात पर जोर दिया कि अज्ञान के अन्धकार से छुटकारा पाना आवश्यक है। किसानों और गरीब दस्तकारों पर धर्मसुधार आन्दोलन का गहरा



प्रभाव पड़ा और टामस मुनरूर ने उन्हें संगठित कर सामंतों, कठमुल्ले पादरियों और दो के विएकांतिकारी युद्ध शुरू कर दिया (१५२५) ।


जर्मनी के इतिहास की कांतिकारी परम्पराओं ने एक नयी बौद्धिक जागृति पैदा कर दी, जिसका नेतृत्व लेटिंग, पोयटे, शिलर, हर्डर, बीथोवेन जैसे अनेक कांतिकारी मनीषियों ने किया। इन मनीषियों ने अपने क्रांतिकारी विचारों और प्रगतिशील कृतियों के माध्यम से मध्ययुगीन सामंतवादी सरकारों के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए आम जनता को प्रेरित किया। इन प्रगतिशील बुद्धिजीवियों की प्ररथा से जर्मन जनता ने यह समझ लिया कि व्यक्ति के सुख के लिए समाज को स्वत करना आवश्यक है। इस तरह के बौद्धिक जागरण ने पारस्परिक प्रम और समानता के सिद्धान्त को प्रतिष्ठित किया ।


जर्मनी में स्वतन्त्र और प्रगतिशील चिन्तन-धारा का आविर्भाव होने से जर्मन जनता संकीर्ण राष्ट्रीय घेरे में ही नहीं बंधी रही, बल्कि उसने दूसरे देशों की प्रगतिशील और कांतिकारी परम्पराओं को भी अपनाया। फांस की राज्यक्रांति और पेरिस कम्यून की विचारधारा का जर्मनी पर भी काफी प्रभाव पड़ा, लेकिन जर्मन जनता ने व्यक्ति-पूजा को महत्व नहीं दिया बल्कि इसके विपरीत उसने अपनी ऐतिहासिक परम्पराओं और फांस की राज्यक्रांति के अनुभवों को जोड़कर जर्मनी पर नेपोलियन के आक्रमण के समय अपनी देशभक्ति का ज्वलंत उदाहरण उपस्थित किया। इससे हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि जर्मनी की आम जनता सामाजिक विकास के लिए नये राजनीतिक आदर्शों को स्थापित करने की तत्परता दिखला रही थी।


मशीनों के आगमन और कारखानों के उदय से जर्मनी के सामाजिक परि वर्तन की दिशा स्पष्ट हो गयी। मजदूर वर्ग जीवन के सभी क्षेत्रों को प्रभावित करने लगा और मध्यवर्ग करवटें बदलने लगा। उन्नीसवीं शताब्दी के पाँचवें दशक के आते-आते जर्मनी में गुणात्मक परिवर्तन के चिह्न दृष्टिगोचर होने लगे । सर्वत्र राष्ट्रीय एकता, जनतंत्र, स्वतन्त्रता और न्याय के पक्ष में जोरदार आवाज बुलंद की जाने लगी। सामंतवादी व्यवस्था पूरी तरह चरमराने लगी और आ कांति दरवाजे पर दस्तक देने लगी। १८४८-४९ के महान विद्रोह में मजदूर वर्ग ने पूरे उत्साह के साथ अपनी भूमिका का निर्वाह किया। मजदूर वर्ग के आविर्भावि



के साथ ही उसकी अपनी पहली क्रांतिकारी पार्टी कम्युनिस्ट लीग" प्रकट हो गयी, जिसके जन्मदाता कार्ल माक्र्स और फंडरिक एंगेल्स थे। इस पार्टी ने जर्मन जनता को एकता को सुदृढ़ किया और जर्मनी को संगठित और अविभाजित गणतन्त्र घोषित करने का नारा दिया।




१८४८-४९ की क्रांति को पूंजीपतियों ने कुचल दिया, लेकिन इससे मजदूर वर्ग का मनोबल नहीं टूटा । इसके अतिरिक्त, पूजीपति वर्ग और कुलीनतंत्र के आपसी अंत भी फूटने लगे । सत्ता के लिए दोनों के बीच तीखे संघर्ष होने लगे, लेकिन दोनों के आपसी संघर्ष के कारण कहीं मजदूर वर्ग की स्थिति पहले से अधिक मजबूत न हो जाये; इसलिए अंततः दोनों ने गठबन्धन स्थापित कर लिया, जिसके अनुसार कुलीनतंत्र ने पूँजीवादी मार्ग अपना कर शासन में पूजीपतियों के स्थानको सुनिश्चित कर दिया।


लेकिन औद्योगीकरण की प्रक्रिया तेज हो जाने के कारण मजदूर वर्ष का भी विकास होता गया। जर्मनी के मजदूर वर्ग का आजतक का इतिहास बनाता है कि उनने पूजीपतियों और कुलीनतन्त्र के गठबन्धन से कभी समझौता किए बिना अन्तरराष्ट्रीय मजदूर वर्ग की एकता के लिए सब जोरदार किया लेकिन यूजीपति वर्ग और का पूरा प्रवास करता रहा कि मजदूर से बराबर दूर रहे। जर्मनी के प्रतिषियवादी तत्वों ने अपने देश के सभी


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ऋतिकारी तत्त्वों का घोर दमन किया। मजदूरों, किसानों और छात्रों के मौलिक अधिकारों पर कुठाराघात किया गया। प्रेस की स्वतन्त्रता छीन ली गयी ।


पूजीवादी और सामंतवादी शक्तियों के घिनौने सहयोग से "रक्तपात और तलवार" के बल पर साम्राज्यवादी जर्मन राइश (जर्मन राष्ट्रीय सरकार) के अस्तत्व में आने के कारण जर्मनी में अन्धराष्ट्रवाद का धुआंधार प्रचार किया जाने लगा। पूँजीपति और सामंत सबसे अधिक समाजवादी विचारधारा से भयभीत थे। इस विचारधारा का प्रादुर्भाव "कम्युनिस्ट लीग" और १८६९ में आगस्ट बेबेल और विल्हेम लोकनेत के नेतृत्व में सामाजिक जनवादी मजदूर पार्टी" की स्थापना के साथ-साथ हो चुका था।


धीरे-धीरे जर्मनी के सभी हिस्सों में समाजवादी विचारधारा फैलने लगी । इसका प्रमुख कारण था कि जर्मनी में पूजीवाद और सामंतवाद के विचित्र मिश्रण और तालमेल के कारण सैनिक तंत्रात्मक राज्यव्यवस्था स्थापित हो चुकी थी और इस व्यवस्था ने आम नागरिक स्वतन्त्रता का अपहरण कर लिया था, इसलिए मजदूर, किसान, छाय, कर्मचारी आदि सभी समुदायों के लोग नागरिक अधिकारों को बहाल करने तथा जीवन की न्यूनतम सुविधाएँ प्रदान करने की मांग कर रहे थे। उनकी मांगों का पूरे समाज पर अच्छा प्रभाव पड़ा। राइखस्टाग (संसद) में प्रगतिशील सदस्यों की संख्या में वृद्धि होने लगी। इससे साम्राज्यवादी क्षेत्र वस्तार का सपने देखने वाली मैन्यवादी शासन व्यवस्था के कान खड़े हो गये । अब निरंकुश शासन के डंडे के सामने जनादेश का कोई महत्व नहीं रह गया। मजदूरों को पार्टी पर प्रतिबंध लगा दिया गया और बिस्मार्क ने आम जनता पर समाजवाद-विरोधी कानून लाद दिया (१८७८-१८९०) प्रशियन भूस्वामी, संन्यवादी सामंत, निरंकुश पूजीपति आदि सामाजिक व्यवस्था को नियंत्रित करने लगे और जर्मन साम्राज्य बाद ने सिर उठा लिया। फिजा बिल्कुल बदल गयी ।


मदांध जर्मन साम्राज्यवाद ने यूरोप और सम्पूर्ण विश्व को पददलित करने के लिए प्रथम विश्वयुद्ध शुरू कर दिया, जो १९१४ से १९१८ तक चलता रहा। प्रमुख सोशल डेमोक्रेटों ने मजदूर वर्ग की पीठ में छुरा घोंपकर इस विश्वयुद्ध का समर्थन किया, जबकि कार्ल लीब्कनेस्त, रोजा लुक्जेम्बुर्ग और क्लारा जेटकिन के नेतृत्व में नवस्थापित "स्पार्टकस ग्रुप" ने जर्मनी और संपूर्ण विश्व के मजदूर वर्ग



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के हितों का समर्थन करते हुए विश्वयुद्ध का तीव्र विरोध किया। स्पार्टकस ग्रुप जर्मनी के समर्पित वामपंथियों का क्रांतिकारी संगठनका यही ग्रुप कालान्तर में "जर्मन कम्युनिस्ट पार्टी" के रूप में विकसित हुआ (१९१८ ) | इस संगठन ने जर्मनी की भूमि से शुरू होने वाले विश्वयुद्ध के साम्राज्यवादी चरित्र का पर्दाफाश किया और मजदूर वर्ग को सचेत किया कि विश्वयुद्ध के कारण सभी जनवादी अधिकार समाप्त कर दिये जायेंगे, इसलिए साम्राज्यवादी युद्ध की आधारशिला को ही समाप्त कर देना आवश्यक है ।


दुर्भाग्यवश, जर्मनी के सोशल डेमोक्रेट नेता स्पार्टकस ग्रुप के साथ किसी भी शर्त पर काम करने के लिए तैयार नहीं थे। पूँजीवाद के प्रति उनके मोह के कारण अंधराष्ट्रवाद को पनपने का मौका मिला। यदि सोशल डेमोक्रेट सूझबूझ से काम लेते और वामपंथी ताकतों में फूट नहीं पड़ने देते तो जर्मनी को दुर्भाग्य के दिन नहीं देखने पड़ते।


जर्मनी के बहादुर मजदूरों और देशभक्त सैनिकों ने १९१७ की रूसी क्रांति से प्रभावित होकर जर्मनी में जनवाद को स्थापना के लिए सशस्त्र संघर्ष शुरू कर



सैनिक अभियान (फ़ोटो)


दिया। उन्होंने राजतंत्र को अपना बोरिया-विस्तर समेटने के लिए विवश कर दिया। युद्ध में जर्मन साम्राज्यवाद को घुटने टेकने पड़े । 


अंततः पूजीवादी जर्मन गणतंत्र का उदय हुआ। इसका 'संविधान क्रांतिकारी आन्दोलन के केन्द्रों से दूर वाइमर नामक नगर में अपनाया गया, इसलिए


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इसे "वाइमर गणतंत्र" कहा गया। १९१८-१९ में जर्मन कम्युनिस्ट पार्टी का आविर्भाव हुआ, जिसके झंडे के नीचे एकत्र होकर जर्मनी के सपूतों ने जन-क्रांति का नेतृत्व किया। दक्षिणपक्षी सोशल डेमोक्रैट नेताओं के विश्वासघात के कारण नरसंहार का दृश्य उपस्थित हो गया और क्रांति को खून के दरिया में डुबो दिया गया। नवगठित जर्मन कम्युनिस्ट पार्टी के युगांतरकारी नेता कार्ल लिब्नेख्त और लक्जेम्बुर्ग को आततायियों ने मार डाला।


जर्मन कम्युनिस्ट पार्टी की अग्नि-परीक्षा शुरू हो गयी और इतिहास की चुनौतियों का मुकाबला करते हुए जर्मन मजदूर वर्ग के श्रेष्ठ सपूत अर्न्स्ट थैलमन्न ने पार्टी का झण्डा थाम लिया।


प्रारंभिक जीवन


अर्न्स्ट थैलमन्न का जन्म १६ अप्रैल, १८८६ को हेम्बर्ग में हुआ था। उनके पिता का नाम जोहान्न थेल्मन्न था। जोहान्न एक अभावग्रस्त व्यक्ति थे; इसलिए अपने पुत्र अर्न्स्ट थैलमन्न की समुचित शिक्षा-दीक्षा का प्रबन्ध, और भरण-पोषण करना उनके लिए सम्भव नहीं था। बालक थेलमन्न ने परिवार का खस्ता हाल देखकर स्वयं अपने पाँवों पर खड़ा होने का निश्चय कर लिया। जीवन की पाठशाला में उन्होंने बचपन में ही स्वावलंबन का पाठ सीख लिया।


आरंभिक काल में थेलमन्न को आजीविका के लिए दर-दर की खाक छाननी पड़ी। कभी असबाब ढोने का काम किया, तो कभी कोचवानी की, कभी गोदी मजदूर बने, तो कभी जहाजी ।


मनुष्य के लिए बचपन और जवानी के बीच का समय बहुत ही नाजुक और निर्णायक होता है। यदि किसी कारणवश मनुष्य इस समय अनिर्णय की स्थिति में रहता है तो वह प्रायः अपना लक्ष्य निर्धारित नहीं कर पाता। लेकिन अर्न्स्ट थैलमन्न को इस समय तक अपना लक्ष्य निर्धारित करने में कोई कठिनाई नहीं हुई। उन्होंने मात्र १५-१६ साल की उम्र में देश और समाज के प्रति अपना दायित्व निभाने का निश्चय कर लिया। वे इस उम्र में ही रोजाना मजदूर और बेरोजगार आदमी की मानसिक यंत्रणाओं से अवगत हो चुके थे, इसलिए अपने देश की सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था को समझने में उन्हें देर नहीं लगी। उन्होंने उस व्यवस्था को बदलने के लिए अपने को तैयार कर लिया । लेकिन


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उन्होंने यह काम भाववादी ढंग से नहीं बल्कि एक दृढ़ संकल्प और पक्के निश्चय वाले व्यक्ति की भाँति किया। वे अपने देश की एक संघर्षशील पार्टी "जर्मनी की सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी में शामिल हो गये।


अर्न्स्ट थैलमन्न ने शौकिया ढंग से या जवानी की उमंग में आकर सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी की सदस्यता नहीं स्वीकार की बल्कि वे इसके संघर्षशील सदस्यों की पंक्ति से जुड़ गये। पार्टी की सदस्यता ग्रहण करने के दो साल बाद ही अर्थात् १९०४ में वे हेम्बर्ग परिवहन मजदूर यूनियन में शामिल होकर एक जुझारू कार्यकर्ता की भूमिका निभाने लगे ।


उन दिनों जर्मनी के आम मजदूरों की ही भाँति परिवहन मजदूरों को भो रोजी-रोटी के लिए निरन्तर जूझना पड़ता था। अपने पूजीवादी मालिकों के शोषण के विरुद्ध और अपनी जायज मांगों के पक्ष में हेम्बर्ग के मजदूरों का जुझारू संघर्ष चलता रहता था, जिसका युवक अर्न्स्ट थैलमन्न के मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ा और उन्होंने समझ लिया कि संघर्ष ही मजदूर वर्ग की अपनी ताकत है। हेम्बर्ग के मजदूरों के संघर्ष ने उनके व्यक्तित्व को फौलादी सांचे में ढाल दिया । हेम्बर्ग के मजदूरों का अपने समाज पर जबरदस्त प्रभाव था। यही कारण था कि ऑगस्त बेबेल राइखस्टाग में हेम्बर्ग का प्रतिनिधित्व करते थे। ये वही बेबेल थे, जो "जर्मन सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी" के संस्थापक, लब्धप्रतिष्ठ, मार्क्सवादी सिद्धांतकार, ऐतिहासिक भौतिकवाद के प्रवर्तक, महिलाओं के समान अधिकार के प्रबल समर्थक और पक्के निरीश्वरवादी के रूप में सम्पूर्ण जर्मनी में विख्यात थे।


निष्ठावान कार्यकर्त्ता


अर्न्स्ट थैलमन्न एक निष्ठावान कार्यकर्ता थे। उनमें वे सभी गुण विद्यमान थे, जिनके बिना मजदूर वर्ग के उत्थान की कल्पना भी नहीं की जा सकती। अपनी सिद्धान्तप्रियता, वर्ग-निष्ठा, स्पष्टवादिता, सादगी, समर्पण-भावना आदि के कारण उन्होंने लोगों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट कर लिया ।

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१. देखें "ए डिक्शनरी ऑफ फिलॉसोफी', पृष्ठ ४८, संपादक : एम रोजेन्थल और पी. यूडिन, प्रोग्रेस पब्लिशर्स, मास्को, १९६७ ।


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अर्न्स्ट यूनियन की कार्यनीति को लागू करने में सबसे आगे रहते थे। जब भी यूनियन के नौकरशाहों के खिलाफ और परिवहन मजदूरों के पक्ष में कोई बैठक में सभा होती, वे बहुधा उसे सम्बोधित करते थे। उनके विचार बड़े पैने होते थे और वे विचाराधीन विषय पर सूझ-बूझ के साथ अकाट्य तर्क प्रस्तुत करते थे। इससे अपने विरोधियों और दुश्मनों की आँखों में वे एक कट्टर विद्रोही और क्रांतिकारी के रूप में खटकने लगे, लेकिन दूसरी ओर मजदूर उन्हें अपना रहनुमा समझने लगे ।


पार्टी के साथियों और यूनियन ने उनके साहसिक और जुझारू कार्यकलापों का तत्काल मूल्यांकन किया। उन्हें साथियों और सहकर्मियों का अपार समर्थन मिला और वे कई बार परिवहन मजदूरों के सम्मेलनों और महाधिवेशनों के लिए प्रतिनिधि निर्वाचित किए गए। उनकी नेतृत्व क्षमता उत्तरोत्तर विकसित होती गयी। उचित समय पर वे पार्टी का कार्यभार भी संभालने लगे ।


एक ट्रेड यूनियन अधिकारी के रूप में उन्होंने बड़े उत्साह के साथ अपने दायित्वों का निर्वाह किया। वे कई श्रम-विवादों और हड़तालों में पूरी तरह जुड़े रहे। फलस्वरूप मालिकों ने उन्हें बार-बार बर्खास्त किया। लेकिन इससे उनका उत्साह तनिक भी शिथिल नहीं पड़ा।


विचारधारात्मक संघर्ष


अब तक एक तरफ जर्मनी में उद्योग धन्धों के विकास और उसके साथ ही सामंतों और पूंजीपतियों के गठजोड़ तथा दूसरी तरह मजदूर वर्ग में नयी जागृति के कारण विचारधारात्मक संघर्ष तेज होता जा रहा था। थेलमन्न इस संघर्ष के दौर में युद्ध का विरोध, शांति का समर्थन और मजदूर वर्ग की एकता के सिद्धान्त का प्रचार करते रहे। इसके विपरीत, पूंजीपतियों और उसको चाकरी करनेवाले बुद्धिजीवियों ने फासिज्म के सिद्धांत के मंत्रद्रष्टा फीडर जर्मन चांसलर वैथमन्न हालवेग, सम्राट विलियम द्वितीय जैसे प्रतिक्रियावादी दार्शनिकों और राजनेताओं के प्रगति विरोधी विचारों से गहरा सम्बन्ध स्थापित कर लिया।१ नीत्से का विश्व-दष्टिकोण क्रांति की चेतना" के प्रति घृणा  से ओतप्रोत था। उसकी

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१. देखें "ए डिक्शनरी ऑफ फिलॉसोफी", पृष्ठ ३१७, संपादक : रोजेन्थल और पी. यूडिन, प्रोग्रेस पब्लिशर्स, मास्को, १९६७ ।


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मान्यता थी कि दासता "संस्कृति की सुरभि है" और शोषण "सभी जीवधारियों का आधारभूत अंग है। चांसलर बेचमन हालग डंके की चोट पर कहता था, "ईश्वर ने जर्मन जाति को संसार में एक विशेष स्थान प्रदान किया है, इतिहास में हमें कुछ विशेष कार्य करना है।" सम्राट बिलियम द्वितीय ताल ठोककर घोषणा करता था, "परमेश्वर ने हमें संसार को सभ्य बनाने का कार्य सौपा है। इस तरह जर्मनी में "जीवो जीवस्य भोजनम्" के पाशविक सिद्धांत का खुलेआम प्रचार किया जाता था।


जर्मनी के स्तनधारी वर्ग ने जोरदार ढंग से युद्ध की तैयारी शुरू कर दी। सेना में भरती होने के लिए देश के सभी स्वस्थ नागरिकों को विवश किया जाने लगा। सरकार का आदेश मिलते ही हर शख्स को अविलम्ब फोजी भरती केन्द्र में पहुँच जाना पड़ता था। २२ साल की उम्र में थैलमन्न को सैनिक सेवा के लिए बुलाया गया। सेना में प्रवेश करने के बाद उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से अनुभव किया कि पूंजीवादी राज्य की सेना का क्या महत्व है और उसकी सैन्य नीति किस दिशा की ओर अग्रसर होती है। प्रत्यक्ष अनुभवों के कारण सैन्यवाद के प्रति उनके हृदय में और अधिक घृणा  पैदा हो गयी। सैनिक तैयारियों को देखकर उन्होंने समझ लिया कि जर्मनी और यूरोप पर विनाशकारी युद्ध के काले बादल मंडराने लगे हैं। एक सैनिक के रूप में देशभक्ति और विश्वशांति के प्रति अपने दायित्वों का निर्वाह करने के लिए वे बराबर तत्पर रहते थे। यही कारण है कि प्रथम विश्व युद्ध के दौरान सेना की सेवा में संलग्न रहते हुए उन्होंने सैनिकों के बीच शांति का अभियान शुरू किया, जिसके फलस्वरूप अधिकारियों ने उन्हें कई बार दंडित किया।


जिस समय प्रथम विश्वयुद्ध शुरू हुआ,  थैलमन्न जर्मनी के मजदूर वर्ग के प्रतिनिधि के रूप में युद्ध के समर्थन में मतदान करने और पूँजीवादी हितों की रक्षा करने के लिए जर्मनी के सोशल डेमोक्रेटिक नेताओं की अंधराष्ट्रवादी नीति पर तीखा प्रहार किया और यह सिद्ध किया कि सोशल डेमोक्रेटिक नेता जर्मनी के मजदूर वर्ग को नहीं बल्कि पूंजीपति वर्ग की सेवा कर रहे हैं। जर्मनी की सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी की युद्ध-संबंधी नीति पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए

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१. "यूरोप का आधुनिक इतिहास (१७८९ से १९५८ तक), पृष्ठ ५५२-५५३, सत्यकेतु विद्यालंकार, सरस्वती सदन, मसूरी, चतुर्थ संस्करण, जुलाई, १९५९।


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उन्होंने कहा, "सर्वहारा वर्ग संघर्ष के लाल झण्डे के प्रति विश्वासघात किया गया है और उसे धूल में फेंक दिया गया है"। अब वे "जर्मनी की सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी" को अप्रासंगिक मानने लगे ।


१९१७ में रूस में जबरदस्त उथल-पुथल शुरू हो गयी थी। उसी साल गर्मी के मौसम में उन्हें घर जाने का अवसर दिया गया। जर्मनी में भी  क्रांति की गूज प्रतिध्वनित हो रही थी और स्वयं जर्मनी में एक नये क्रांतिकारी चिन्तन का उभार होने लगा था। रूस की फरवरी क्रांति ने जर्मनी के क्रांतिकारियों पर भी गहरा प्रभाव डाल दिया था, जिसके फलस्वरूप "स्वतंत्र सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी" का उदय हुआ।


 इस नयी पार्टी के क्रांतिकारी तैवर से जर्मनी के क्रांतिकारियों में एक नयी आशा का संचार हुआ। थेलमन्न नयी पार्टी में अविलंब शामिल हो गये। अबतक उनके नेतृत्व में हेस्वर्ग की क्रांतिकारी गतिविधियाँ काफी तेज हो गयी थीं। उन्होंने हेम्बर्ग के क्रांतिकारी साथियों के सहयोग से नयी पार्टी के वामपक्षी स्वरूप को उजागर किया।


अक्तूबर क्रांति का प्रभाव


प्रथम साम्राज्यवादी युद्ध के दौर में ही रूस के किसानों के सहयोग से मजदूर वर्ग ने महान लेनिन के नेतृत्व में राजसत्ता को अपने अधिकार में कर लिया । अक्तूबर क्रांति के रूप में प्रसिद्ध इस महान घटना ने संपूर्ण मानव जाति के इतिहास को प्रभावित किया। दरअसल, यह विश्व इतिहास की पहली घटना थी, जिसने यह सिद्ध कर दिया कि मजदूर वर्ग बड़ी खूबी के साथ राजसत्ता का संचालन कर सकता है। अक्तूबर क्रांति ने मानव द्वारा मानव के शोषण की समाप्ति का मार्ग दिखला दिया। इसके साथ ही इसने यह भी साबित कर दिया कि सभी प्रकार के संकटों से छुटकारा पाने के लिए पूंजीवादी मार्ग का परित्याग करना और समाजवादी मार्ग को अपनाना आवश्यक है ।


दूरदर्शी अर्न्स्ट थैलमन्न ने हृदय से महान अक्तूबर समाजवादी क्रांति का स्वागत किया। जर्मनी का मजदूर वर्ग रूस के मजदूर वर्ग की ही भांति अपने देश के भीतरी दुश्मनों के जाल को छिन्न-भिन्न करने और शोषण-विहीन समाज स्थापित





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करने के लिए संगठित होने लगा। जर्मनी के कोने-कोने में कार्ल लिब्नेख्त के शब्द गूजने लगे : "असली दुश्मन देश के भीतर हैं।" साम्राज्यवादी युद्ध के प्रति घृणा और अंधराष्ट्रवाद के प्रति तीव्र विरोध व्यक्त करनेवाले लिब्नेख्त, रोजा लक्जेम्बुर्ग, अर्न्स्ट थैलमन्न, फांज मेहरिंग, क्लारा जेटकिन, विल्हेम पीक आदि वामपक्षी जर्मन नेताओं के क्रांतिकारी विचारों ने जर्मनी के आम मेहनतकश लोगों में एक नया जोश पैदा कर दिया ।


जर्मनी की नवंबर क्रांति


जर्मनी में सर्वत्र विद्रोह की भावना फैलने लगी। जगह-जगह मजदूर दक्षिण पक्षी सोशल डेमोक्रेटिक नेताओं की धज्जियाँ उड़ाने लगे। ३ नवंबर, १९१८ को कियेल के जहाजियों ने विद्रोह कर दिया और जर्मनी में क्रांति शुरू हो जाने के सबूत के रूप में अपने युद्धपोतों पर लाल झण्डे फहरा दिये। ९ नवंबर को जर्मनी के प्राचीन राजवंश का अन्त हो गया। जर्मनी की इस नवंबर क्रांति में अर्न्स्ट थैलमन्न1 ने अपनी प्रमुख भूमिका का निर्वाह किया। उनकी आँखों की नींद गायब हो गयी और वे क्रांति को सफल बनाने के लिए अपने एक एक क्षण का उपयोग करने लगे। उन्होंने सोशल डेमोक्रेटिक नेताओं और ट्रेड यूनियन नेताओं पर लगे प्रतिबंधों की परवाह किये बिना हेम्बर्ग के क्रांतिकारी नेताओं को हथियारबंद कर उनका नेतृत्व किया। वास्तव में, इस नवंबर क्रांति के दौर में अपनी अभूतपूर्व गतिविधियों के कारण, उन्होंने असंख्य लोगों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट कर लिया। सब जगह उनकी निर्भीकता और सिद्धांत निष्ठा की चर्चा होने लगी। हेम्बर्ग के मजदूरों पर तो उन्होंने अपना अमिट प्रभाव डाल दिया। उन्होंने जर्मनी को सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी के दक्षिणपक्षी नेताओं के विरुद्ध तथा विशेष रूप से स्वतंत्र सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी के दकियानूस नेताओं की मजदूर विरोधी नीतियों के विरुद्ध कठोर संघर्ष किया और इस दौर में हेम्बर्ग ने उन्हें एक सच्चे सर्वहारा नेता के रूप में देखा। उनकी लोकप्रियता निरंतर बढ़ती गयी और उन्हें स्वतंत्र सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी के हेम्बर्ग-संगठन के अध्यक्ष पद पर प्रतिष्ठित किया गया ।


इस बीच सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी के दक्षिणपक्षी नेताओं ने कैसर के जनरेलों के साथ साठगांठ करके मजदूर वर्ग की एकता को कमजोर कर दिया । फलस्वरूप, जर्मनी की नवंबर क्रांति सफल नहीं हो सकी। एक नये रूप में वाइमर

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गणतंत्र को पूंजीवादी संसदीय प्रणाली से जुड़कर बड़े घराने के पूंजीपति और सामंत शासन का संचालन करने लगे।


जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी का आविर्भाव


अस्टं थेलमन्न मूलगामी परिवर्तन के पक्षधर थे। इसके लिए वे जर्मनी की सभी जनबादी और वामपक्षी शक्तियों को एक सूत्र में आबद्ध करना चाहते थे। इसी समय, ३० दिसंबर, १९१८ से १ जनवरी, १९१९ तक आयोजित कांग्रेस में जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी का आविर्भाव हुआ, जिसने जर्मन मजदूर वर्ग की मार्क्सवादी-लेनिनवादी पार्टी की बुनियादी भूमिका का निर्वाह किया। अपने क्रांतिकारी विश्व दृष्टिकोण के कारण इस पार्टी को कम्युनिस्ट इंटरनेशनल में सम्मानजनक स्थान प्राप्त करने में देर नहीं लगी।


लेकिन प्रतिक्रियावादी शक्तियों भी अपनी स्थिति मजबूत बनाती जा रही थी। समाजवाद का विरोध करनेवाले और तथाकथित स्वजातीय गरिमा की रक्षा के लिए प्राण न्योछावर करने की वकालत करनेवाले तत्व कुकुरमुत्तों की तरह फैलने लग गये थे। कोर्स नामक एक वार संगठन प्रतिक्रांति का संचालन कर रहा था। इस दल के सदस्य अपने विरोधियों की हत्या करने में भी नहीं हिचकते थे। इसी दल के हत्यारों द्वारा कार्ल लिब्नेख्त और रोजा लुक्जेम्बुर्ग की हत्या की गयी थी। प्रामाणिक आंकड़ों के अनुसार इस मानवद्रोही दल द्वारा दस हजार मजदूर मार डाले गये थे ।


ऐसी विकट स्थिति में थेलमन्न ने हैम्बर्ग के मजदूरों और सैनिकों का नेतृत्व करते हुए क्रांतिकारी परिवर्तन और मजदूर वर्ग की राजसत्ता की स्थापना के लिए अबाध गति से अपना संघर्ष जारी रखा। जर्मनी में कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना के बाद थेलमन्न को विश्वास हो गया था कि यह पार्टी साम्राज्यवाद विरोधी आधार पर जर्मन मजदूर वर्ग को एकताबद्ध करने में सक्षम है। अतः उन्होंने स्वतंत्र सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी के हेम्बर्ग-संगठन के अध्यक्ष की हैसियत से १९१९ और १९२० की पार्टी कांग्रेसों में जोरदार शब्दों में कहा कि पार्टी को कम्युनिस्ट इंटरनेशनल से जोड़ देना और जर्मनी को कम्युनिस्ट पार्टी में इसका विलय कर देना चाहिए। १९२० में स्वतंत्र सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी के अधिकांश बामपक्षी सदस्य

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कम्युनिस्ट बनने के लिए तैयार हो गये, जिसके फलस्वरूप अर्न्स्ट थैलमन्न और स्वतंत्र सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी का संपूर्ण हेम्बर्ग-संगठन कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ गये। ऐतिहासिक एकता महाधिवेशन में वे कम्युनिस्ट पार्टी की केन्द्रीय कमिटी के सदस्य निर्वाचित किये गये।


कम्युनिस्ट पार्टी में उनके और उनके नेतृत्व में स्वतंत्र सोशल डेमोटिक पार्टी के २००००० सदस्यों के आ जाने से हेम्बर्ग जर्मनी का लौहदुर्ग माना जाने लगा। जर्मनी के किसी भी क्षेत्र में कोई राजनीतिक चर्चा होने पर हेम्बर्ग की मिसाल जरूर पेश की जाती। "लाल हेम्बर्ग" या "क्रांतिकारी हेम्बर्ग" का नया मुहावरा क्रांतिकारियों में उत्साह और प्रतिक्रांतिकारियों में दहशत पैदा कर देता था।




थेलमन्न मजदूरों को संबोधित करते हुए


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अन्स्टे थैलमन्न ने अथक प्रयास किया कि कम्युनिस्ट पार्टी एक ऐसी जुझारू पार्टी के रूप में बड़ी हो जाये, जिसकी जड़ें मजदूर वर्ग के बीच गहराई में प्रवेश कर चुकी हों। उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी में प्रवेश करने के बाद सुसंगत रूप से पार्टी सदस्यों के अवसरवादी और वामपक्षी संकीर्णतावादी रुझानों के विरुद्ध निर्मम संघर्ष शुरू कर दिया। उनकी कथनी और करनी में कोई अन्तर नहीं था। जनता से सम्पर्क बनाये रखने के लिए वे सदैव लालायित रहते थे। "जनता से सम्पर्क स्थापित करो"- यही नारा उनके जीवन संघर्ष का संवल था । 


जर्मनी की क्रान्ति-विरोधी शक्तियाँ अर्न्स्ट थैलमन्न के नेतृत्व में कम्युनिस्ट पार्टी की प्रगति और विकास से बहुत घबरा गयी। उन्होंने कम्युनिस्ट समर्थक ट्रेड यूनियन केन्द्रों पर हसले शुरू कर दिये। मजदूरों ने थैलमन्न के कुशल नेतृत्व में हथियार उठाकर प्रतिक्रांतिकारियों का मुकाबला किया।


लेनिन से मुलाकात


इस तरह कम्युनिस्ट पार्टी में आने के बाद उनकी क्रांतिकारी गतिविधियाँ अधिक तेज हो गयीं। १९२१ के ग्रीष्मकाल में उन्हें कॉमिण्टन की तीसरी कांग्रेस में शामिल होने का सुयोग मिला। इसी कांग्रेस में वे महान सोवियत समाजवादी व्यवस्था के संस्थापक लेनिन से मिले । लेनिन के स्पष्ट और पैने विचारों, अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के सम्बन्ध में उनकी गहरी समझ और जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकलापों के विषय में उनकी प्रखर आलोचना से थेलमन्न बहुत ही प्रभावित हुए। सोवियत संघ की राजधानी मास्को में सम्पन्न कॉमिण्टन की तीसरी कांग्रेस से वे दूने उत्साह के साथ स्वदेश लौटे । लेनिन के प्रति उनकी आस्था में पहले से भी अधिक वृद्धि हो गयी । परिणामस्वरूप अपने एक-एक क्षण का उपयोग करते हुए वे पहले से भी अधिक उत्साह के साथ काम करने लगे।


१९२१ के मार्च का सशस्त्र संग्राम जर्मनी को कम्युनिस्ट पार्टी के इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़ था। इस संग्राम के परिणामों की रोशनी में पार्टी के कर्तव्यों के विषय में विचार-विमर्श करने के लिए अगस्त, १९२१ में जेना में जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी की अगली कांग्रेस हुई। थेलमन्न ने अपनी स्वाभाविक


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सादगी, ईमानदारी और आत्मविश्वास के साथ नपे-तुले शब्दों में कांग्रेस को सम्बोधित किया । एक सच्चे कम्युनिस्ट की तरह उन्होंने सशस्त्र संग्राम के दौरान हुई गलतियों का उल्लेख किया और कहा कि लेनिन ने संयुक्त मोरचे की रणनीति के विषय में जो सुझाव दिये हैं, उनके अनुसार सामाजिक जनवादी कार्यकर्ताओं से घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित करना आवश्यक है। प्रतिनिधियों ने उनके सुसंगत तर्को का हार्दिक समर्थन किया।


जर्मनी के राजनीतिक मंच पर एक नये प्रभा-मंडल की सुनहली किरणें फैलने लगी थीं। इस प्रभा-मंडल में अर्न्स्ट थैलमन्न को एक गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त था। उनकी लोकप्रियता और मजदूर वर्ग के बीच उनकी बढ़ती हुई प्रतिष्ठा के कारण प्रतिक्रियावादी तत्त्वों में भय व्याप्त हो गया। हिंसा और आतंक का समर्थन करने वाले तत्व उनकी जान के ग्राहक बन गये। "कौन्सुल" नामक एक गुप्त संगठन से संबद्ध हेम्बर्ग के फासिस्टों ने १७ जून, १९२२ को उनपर जानलेवा हमला बोल दिया। यह हमला पूर्वनियोजित था। उनके फ्लैट में एक बम रख दिया गया। संयोगवश, बम फूटने के समय वे अपने फ्लैट में उपस्थित नहीं थे, इसलिए क्रूर फासिस्टों की यह घातक योजना विफल हो गयी ।


प्रथम महायुद्ध की समाप्ति के बाद जर्मनी के मजदूर वर्ग में एक नयी क्रांतिकारी चेतना का उदय होने से सामाजिक परिवर्तन के लक्षण दृष्टिगोचर होने लगे। प्रतिक्रियावादी ताकतें नहीं चाहती थी कि मजदूर वर्ग की स्थिति मजबूत होने पाये; क्योंकि उनके विचार से इसके परिणामस्वरूप रूस की भांति जर्मनी में भी समाजवादी सत्ता स्थापित हो जाने का खतरा था। इसलिए जर्मनी के भीतरी और बाहरी दुश्मन हर तरह से प्रयत्नशील थे कि जर्मनी में क्रांतिकारी मजदूर वर्ग सिर नहीं उठाने पाये। लेकिन पूंजीवादी शिविर के आपसी द्वंद उभरने लगे । ११ जनवरी, १९२३ को फ्रांस की सेना ने जर्मनी के प्रसिद्ध व्यावसायिक केन्द्र रूर पर कब्जा कर लिया। जर्मनी इस हालत में नहीं था कि वह फ्रांस के हमले का जवाब दे सके । लेकिन जर्मनी के स्वाभिमानी मजदूर चुप नहीं बैठे। उनके प्रतिरोध के फलस्वरूप औद्योगिक पैदावार में ह्रास हो गया, मार्क के मूल्य का पतन हो गया और हड़तालों का तांता लग गया।


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जर्मनी की अन्दरूनी हालत और जर्मनी के प्रति साम्राज्यवादी देशों के स्वार्थपूर्ण रुख को देखकर थेलमन्न संयुक्त मोरचे की नीति के सफल कार्यान्वयन के लिए प्रयत्नशील हो गये। देश की बहुत ही गम्भीर परिस्थिति में उसी साल जनवरी के अन्तिम चरण और फरवरी के प्रारंभिक चरण में लाइपजिंग में जर्मनी की कम्युनिष्ट पार्टी का महाधिवेशन हुआ। संयुक्त मोरचे की रणनीति और जर्मनी में मजदूर वर्ग की सरकार की स्थापना को लेकर अर्न्स्ट थैलमन्न, विल्हेम पीक, क्लारा जेटकिन आदि के नेतृत्व में जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी के क्रांतिकारी पक्ष ने डलर और बाल हाइमर जैसे दक्षिणपक्षी अवसरवादियों पर करारा प्रहार किया। दक्षिणपक्षी अवसरवादी नेताओं ने निचले स्तर से मजदूर वर्ग के संयुक्त मोरचे की रणनीति के कार्यान्वयन और मजदूर वर्ग की सरकार की स्थापना का तीव्र विरोध किया। वे चाहते थे कि संसद में सोशल डेमोकेटिक पार्टी के नेताओं के साथ सिद्धांतहीन समझौता कर लिया जाये। थैलमन्न ने देख लिया कि पार्टी के दक्षिणपक्षी अवसरवादी नेता मजदूर वर्ग को कमजोर करने के लिए तुल गये हैं। इसलिए उन्होंने दृढ़तापूर्वक कहा कि संसदीय वाद-विवादों और समझौते से पूजी पतियों को परास्त नहीं किया जा सकता है और मजदूरों की जीत सुनिश्चित नहीं की जा सकती है--जीत तभी हो सकती है जबकि सर्वहारा वर्ग के क्रांतिकारी संघर्ष को लगातार जारी रखा जाये ।


मजदूर वर्ग ने अर्न्स्ट थेलमन के क्रांतिकारी विचारों का हृदय से स्वागत


संयुक्त मोरचे के प्रभाव में वृद्धि


जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी की लाइपजिंग कांग्रेस के बाद बड़ी तेज गति से घटनाक्रम का विकास होने लगा। १९२३ के ग्रीष्मकाल के समाप्त होने के साथ-साथ समूचा देश गर्म चूल्हे पर रखे कड़ाह के तेल की तरह खोलने लगा। अब पूजीपतियों के लिए मजदूर वर्ग की उपेक्षा करना कठिन हो गया। मध्य में जनता के दबाव के कारण सेक्सोनी और बुरिनिया में "वामपक्ष" सोशल अक्टूबर के डेमोक्रेटो, कम्युनिस्टों और गैरपार्टी कार्यकर्ताओं को मिलाकर मजदूरों की सरकारें गठित हुई। लेकिन स्थिति का सही मूल्यांकन नहीं किया जा सका। प्रतिक्रियावादी


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शक्तियाँ हर दिशा में घात लगाये बैठी थीं। स्थिति की चुनौतियों का सामना करने के लिए संयुक्त मोरचे की रणनीति के कार्यान्वयन की दिशा में सही ढंग से प्रयास करना आवश्यक था। सोशल डेमोक्रेटिक नेताओं और ट्रेड यूनियन नेताओं ने प्रस्तावित संयुक्त सर्वहारावर्गीय मोरचे के मार्ग में बाधाएँ उपस्थित कर दीं। जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी के दक्षिणपक्षी अवसरवादी नेताओं ने जर्मनी की सर्वहारा क्रांति की दिशा को मोड़ दिया। वे पूजीपतियों की चाकरी करते रहे। इतिहास गवाह है कि उन्होंने सर्वहारा को सशस्त्र संघर्ष के लिए तैयार करने के बदले जनता की संघर्ष चेतना को कुद करने वाली दुर्भाग्यपूर्ण नीति का अनुसरण किया। इतिहास इसके लिए उन्हें कभी क्षमा नहीं करेगा।


इस बीच अर्नस्ट थेलमन्न मजदूर वर्ग के सच्चे क्रांतिकारी नेता की तरह हथेली पर सिर रखकर जनता के हितों की रक्षा करते रहे। उन्होंने सशस्त्र संघर्ष के लिए मजदूरों का आह्वान किया। वे लफ्फाज नेताओं की तरह सिर्फ वक्तव्य देकर या कोई लम्बा-चौड़ा थीसिस प्रस्तुत कर चुप बैठने वाले व्यक्ति नहीं थे। जनता के एक समर्पित और ईमानदार नेता की हैसियत से उन्होंने जर्मनी को कम्युनिस्ट पार्टी के दक्षिणपक्षी अवसरवादी नेताओं के विरुद्ध अपने क्षेत्र में सत्ता पर कब्जा करने का अभियान शुरू कर दिया ।


सशस्त्र संघर्ष का आह्वान


थेलमन्न के सशस्त्र संघर्ष के आह्वान और अभियान के कारण पूँजीपतियों और सामंतवादी नेताओं तथा मुख्य रूप से फासिस्ट तत्त्वों में खलबली मच गयी। उन्हें इस बात को उम्मीद नहीं थी कि उनके अस्तित्व को इस तरह चुनौती दी जायेगी। इसलिए उन्होंने थेलमन्न को अपने रास्ते से हटाने का निश्चय कर लिया। १९२३ के वसंतकाल में हेम्बर्ग के फासिस्टों द्वारा उनकी हत्या का षड्यंत्र पुनः रच लिया गया। लेकिन हर पल सतर्क रहने वाले कम्युनिस्टों को इस षड्यंत्र का पता लग गया। थेलमन्न की सुरक्षा के लिए पहरेदार तैनात कर दिये गये। इस प्रकार कम्युनिस्टों ने अपनी सतर्कता से हत्या के षड्यंत्र को विफल कर दिया और अपने प्रिय नेता को बचा लिया ।



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थेलमन्न के इशारे पर हेम्बर्ग के सैकड़ों मजदूर अपने प्राण न्योछावर करने के लिए तैयार रहते थे। यही कारण है कि सेक्सोनी और बुरिनिया में सर्वहारा की पराजय को हेम्बर्ग के मजदूरों ने चुपचाप स्वीकार नहीं कर लिया। उन्होंने पुलिस और सेना की टुकड़ियों को रोकने के लिए कारखानों के सामने एवं अन्यत्र फौलादी मानव-दीवारें खड़ी कर दीं। हेम्बर्ग के पार्टी संगठन ने पूरी सूझ-बूझ से काम लिया। परिस्थिति और टकराव के लिए आम जनता की तत्परता को देखते हुए हेम्बर्ग पार्टी-शाखा ने क्रांति का लाल झण्डा फहरा दिया। पूरी रणनीति तय कर लो गयी थी । २२ अक्तूबर, १९२३ की रात में कम्युनिस्टों ने कमर कसकर तैयार हो जाने का संदेश प्रचारित कर दिया। इस का व्यापक प्रभाव पड़ा । २३ अक्तूबर को अभूतपूर्व दृश्य उपस्थित हो गया। संघर्ष का बिगुल बजने लगा। पूरे शहर के जवान और बूड़े मजदूर महिलाओं और बच्चों के साथ मोरचों पर तैनात हो गये ।


मजदूर अपने नेता के आह्वान पर अपनी प्यारी पार्टी के आदेश पर प्राण न्योछावर करने के संकल्प के साथ, मोरचों पर एकत्र थे । ६ हजार हथियारबंद पुलिसकर्मी और सेना के जवान मजदूरों द्वारा निर्मित फौलादी मानव-दीवारों पर टूट पड़े। लगातार तीन दिन और तीन रात कठिन संघर्ष चलता रहा। लगातार तीन दिन और तीन रात हेम्बर्ग के धनिक लोग भय से थर-थर काँपते रहे। मजदूर जानते थे कि हमारे पास खोने के लिए अपनी जंजीरों के सिवा दूसरी कोई चीज नहीं है। धनिक चिन्ता में थे कि हमारा तो सबकुछ लुट जायेगा |


हेम्बर्ग के क्रांतिकारी मजदूरों का यह सौभाग्य था कि उन्हें अर्नस्ट थेलमन्न जैसे नीति-कुशल नेता का समुचित निर्देश प्राप्त था। हेम्बर्ग के मजदूरों के इस पूरे विद्रोह के केन्द्र में थेलमन्न एक मशाल की भूमिका अदा करते रहे। पूजीपति वर्ग हैरान था: हाय, एक मामूली "परिवहन-मजदूर" ने उनका घमण्ड चूर-चूर कर दिया !


जो हो, जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी के अवसरवादी नेताओं ने हेम्बर्ग के मजदूरों को फिर धोखा दिया। इन नेताओं ने अपनी विवेकहीनता का परिचय देते हुए मजदूरों को स्वास्त्र संघर्ष का रास्ता छोड़कर आत्मसमर्पण करने का सुझाब दिया, जिससे दुविधाजनक स्थिति पैदा हो गयी ।


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हैम्बर्ग के मजदूर अपने ही बलबूते पर लड़ रहे थे। देश के शेष भाग से उनका सम्पर्क छिन्न-भिन्न कर दिया गया था । २५ अक्तूबर तक यह बिल्कुल स्पष्ट हो गया कि विजय की आशा के साथ संघर्ष को जारी रखना कठिन है। ऐसी स्थिति में, अनावश्यक खून-खराबी और भारी क्षति से बचने के लिए, थेलमन्न ने मजदूरों को संघर्ष बंद करने का आदेश दिया। मजदूरों ने अपने महान नेता के आदेश का अबिलम्ब पालन किया और सही रणकौशल का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए क्रांतिकारी टुकड़ियों के जवान सैनिकों को कटने-मरने से बचा लिया ।


जर्मनी के मजदूर वर्ग के महान नेता


हेम्बर्ग के मजदूरों का यह विद्रोह एक चिरस्मरणीय घटना के रूप में इतिहास के पृष्ठों पर अंकित हो गया। थैलमन्न के कुशल नेतृत्व की सर्वत्र धाक जम गयी। जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी के एक वरिष्ठ नेता हरमान मेटन ने कहा : "जर्मन जनता के लिए इस ऐतिहासिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण काल में परिवहन मजदूर अन्स्टं थेलमन्न ने यह स्पष्ट कर दिया कि वे जर्मनी के मजदूर वर्ग के महान नेता का स्थान ग्रहण कर चुके हैं। "


अस्टं थेलमन्न हर स्थिति का वस्तुगत दृष्टिकोण से मूल्यांकन करने वाली कम्युनिस्ट पार्टी के समर्पित नेता थे, इसलिए वे हेम्बर्ग के मजदूर विद्रोह के बाद दूसरे दलों के नेताओं की तरह धूल झाड़कर अलग नहीं हो गये अथवा अपनी कीर्ति का डंका नहीं पीटने लगे। उन्होंने हेम्बर्ग के घटना-चक्र से यह महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाला कि मजदूर वर्ग की जीत के लिए एक "फौलादी, पूर्णतया संघटित, चट्टान की तरह जुड़ी हुई और सहज अनुशास्ति पार्टी" आवश्यक है। इस निष्कर्ष के बाद उन्होंने स्वभावतः अपनी सारी शक्ति इसी तरह की पार्टी के निर्माण कार्य में लगा दी।


अब पार्टी को हर तरह की जोखिम का सामना करना पड़ता था। इस पर राहु की छाया पड़ चुकी थी। फिर भी इसकी छवि धूमिल नहीं होने पायी। १९२४ मे फ्रैंकफर्ट-एम-मेन में गैरकानूनी हालत में पार्टी की कांग्रेस हुई। इस कांग्रेस ने जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी को एक नये ढंग की सही माक्सवादी-


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लेनिनवादी पार्टी की शक्ल में खड़ा करने में जबरदस्त भूमिका निभायी। इस कांग्रेस में अवसरवादी नेताओं की धज्जियाँ उड़ा डाली गयीं। थेलमन्न ने अवसरवादी ब्रण्डलर थालहाइमर गुट के विरोध-पक्ष का नेतृत्व किया। उनके प्रहार और अकाट्य तर्कों के सामने अवसरवादी नेता बगलें झांकने लगे। अवसरवादी नेता पराजित हो गये और पार्टी के सभी प्रमुख निकायों में नये-नये लोग शामिल किये गये, जिनमें थेलमन्न का भी एक विशेष स्थान था ।


बण्डलर थालहाइमर गुट की कार्यनीति को अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के नेताओं ने भी गलत ठहराया। कॉमिण्टन की पांचवी काँग्रेस में जर्मनी की राजनीतिक गतिविधियों पर विचार-विमर्श के दौरान ब्रण्डलर और थालहाइमर की घुटनाटेकू नीतियों पर तीखा प्रहार किया गया और इसके साथ ही उम्र "बामपंथी" गुट के इस तर्क को खण्डित कर दिया गया कि "संयुक्त मोरचे का विचार भ्रामक था।" पाँचवीं कांग्रेस ने सर्वसम्मति से अन्स्ट थैलमन्न की लाइन का समर्थन किया। इस तरह कॉमिण्टन की सहायता से जर्मन कम्युनिस्टों को दक्षिणपक्षी और "वामपक्षी" दोनों ही गुटों के भटकावों से अपने को उबारने का सुयोग मिल गया ।


नाजुक दौर


जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी अब एक बहुत ही नाजुक दौर से गुजर रही थी। इस समय उसे एक सबल नेतृत्व की जरूरत थी, जो परिस्थिति के मुताबिक थी। एक सही रणनीति तय करे। पार्टी ने १९२५ में अन्स्ट थैलमन्न को अपना अध्यक्ष चुन लिया और उन्होंने विल्हेल्म पीक, वाल्टर उल्बिख्त, हेकटं और अन्य प्रमुख साथियों के कंधे से कंधा मिलाकर पार्टी के मार्क्सवादी-लेनिनवादी स्वरूप को अधिकाधिक निखारना शुरू कर दिया।


पार्टी को दक्षिणपक्षी और वामपक्षी भटकावों से बचाने के लिए उसके सैद्धांतिक और सांगठनिक आधार को मजबूत करना आवश्यक था। इसलिए थेलमन्न ने सर्वप्रथम अपना ध्यान इन्हीं मुद्दों पर केन्द्रित किया। इस सम्बन्ध में उनकी योजना


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थी कि कार्यकर्ताओं को माक्सवादी-लेनिनवादी सिद्धांतों से लैस किया जाये, ताकि हर स्तर पर पार्टी के कार्यक्रम को लागू करने में मदद मिले। वे प्रत्येक कम्युनिस्ट के लिए बोल्शेविक पार्टी और सोवियत संघ में समाजवादी व्यवस्था के निर्माण के अनुभवों को बहुमूल्य मानते थे; क्योंकि उन अनुभवों को आत्मसात किये बिना मूलगामी सामाजिक परिवर्तन संभव नहीं है। इसलिए उन्होंने मार्क्स, एंगेल्स और लेनिन की रचनाओं के अध्ययन पर जोर दिया और कार्यकर्ताओं को प्रोत्साहित किया कि वे सिद्धांत को तोतारटंत विद्या न मानें बल्कि व्यवहार द्वारा उसकी सार्थकता सिद्ध करें । उनके सुझावों पर जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी की ११ वीं कांग्रेस ने जर्मन भाषा में वी० आई० लेनिन की रचनाएँ प्रकाशित करने का फैसला किया। इससे सिद्ध होता है कि वे पार्टी-शिक्षा को कितना महत्त्वपूर्ण समझते थे ।


अन्स्टं थेलमन्न के सम्बन्ध में एच० मेटनं ने कहा था : "उन्होंने पार्टी को संदिग्धावस्था से अर्थात् दक्षिणपक्षी और बामपक्षी भटकावों की अवस्था से मार्क्स वादी-लेनिनवादी सिद्धांतों के पक्ष में अटल भाव से खड़ी रहने वाली संयुक्त पार्टी के मार्ग की ओर मोड़ दिया "


थेलमन्न के नेतृत्व में मार्क्सवादी-लेनिनवादी सिद्धांतों के आधार पर पुनगंठित पार्टी की क्रांतिकारी रणनीति का ही यह सुफल था कि १९२७ में जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी की ११ वीं कांग्रेस में "उम्र वामपंथियों" की मिट्टी पलीद हो गयी।


क्रांतिकारी शिक्षा नीति


थेलमन्न क्रांतिकारी शिक्षा के पक्ष में थे। वे इस बात पर जोर देते थे कि जर्मन क्रांतिकारियों का एक दस्ता तैयार करना ही शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए, जो अपने वर्ग-शत्रुओं के प्रति गहरी घृणा व्यक्त करे और सर्वहारा की समस्याओं के समाधान के लिए तत्परता दिखाये। लेनिन की शिक्षा का अनुसरण करते हुए वे सामाजिक रूपांतरण के संघर्ष में समर्पित भाव से योगदान करने के लिए पेशेवर क्रांतिकारियों को संगठित करना चाहते थे। उनकी मान्यता थी कि "वही


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व्यक्ति क्रांति का सैनिक हो सकता है, जिसमें प्रबल निष्ठा हो और वह निष्ठा ऐसी होनी चाहिए, जो जीवन और मृत्यु की परीक्षा के समय भी अटल बनी रहे" यदि हम अटलवती हैं और यदि दूसरे लोग हमारे चरित्र पर भरोसा कर सकते हों और यदि हम समझते हों कि हमारी जीत सुनिश्चित है, तभी हम अपनी नियति को बदल सकते हैं, अपने क्रांतिकारी दायित्व का निर्वाह कर सकते हैं और सबको प्रभावित करने वाले महान ऐतिहासिक मिशन को पूरा कर सकते हैं और इसी प्रकार सच्चे समाजवाद की अन्तिम विजय को सुनिश्चित कर सकते हैं। "


क्रांतिकारी सैनिकों के प्रशिक्षण का कार्यक्रम पूरा करने के लिए उन्होंने पार्टी संगठन के ढांचे को दुरुस्त करने का पूरा प्रयास किया। यह बहुत आवश्यक था, क्योंकि जर्मनी का समाज बड़ी तेजी से बदल रहा था। इस बदलाव को समझे बिना पार्टी संगठन में सुधार की परिकल्पना नहीं की जा सकती थी। उन्होंने इस बात पर बहुत बल दिया कि मजदूर वर्ग की पार्टी ऐसी होनी चाहिए, जिससे मजदूर वर्ग के किसी भी सदस्य को पार्टी से सम्पर्क स्थापित करने में कठिनाई न हो । पार्टी में अधिकाधिक जनवादी भावना के विकास के लिए उन्होंने पार्टी की प्राथमिक इकाइयों को मजबूत करने पर बल दिया। पार्टी के पुनर्गठन की इस प्रक्रिया के फलस्वरूप जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी को आम सर्वहारा की पार्टी बनने में देर नहीं लगी। पार्टी को आम मजदूरों का समर्थन और सहयोग मिलने


वाल्टर उलिब्रेख्त ने अन्स्टे थेलमन्न के सूजनात्मक व्यक्तित्व के बारे में कहा, "यह अन्स्ट थेलमन्न का ही ऐतिहासिक योगदान है कि उन्होंने कार्ल लिब्नेख्त और रोजा लुक्जेम्बुर्ग के नेतृत्व में जन्म लेने वाली पार्टी को आम जनता की क्रांतिकारी पार्टी के रूप में बदल दिया।"


पार्टी संगठन के सम्बन्ध में थेलमन्न की इस दूरदर्शिता के परिणामस्वरूप एक प्रमुख बात यह हुई कि पहले जो मजदूर जर्मनी की पूजीवादी और घोर प्रतिक्रियावादी दलों और संगठनों के प्रभाव में थे, वे धीरे-धीरे जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी की ओर आकृष्ट होने लगे ।


अन्स्ट थेलमन्न समझते थे कि प्रत्येक कम्युनिस्ट को ट्रेड यूनियनिस्ट होना चाहिए और वे स्वयं भी एक प्रसिद्ध मजदूर नेता थे। उन्होंने जर्मनी की


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पार्टी मे कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े हुए ट्रेड यूनियन संगठनों को सुदृढ़ करने के लिए उन्हें नये सिरे से गठित किया । इसका मजदूरों पर व्यापक प्रभाव पड़ा। पार्टी से जुड़े ट्रेड यूनियन संगठनों की स्थिति पहले से भी अधिक सुदृढ़ होने लगी । मजदूर इन यूनियनों में अधिक स्वतन्त्रता का अनुभव करते।


सुधारवादी मजदूर नेताओं का षड्यंत्र


ट्रेड यूनियनों में कम्युनिस्टों के बढ़ते हुए प्रभाव को देखकर प्रतिक्रियावादी ताकतों में बहुत घबराहट पैदा हो गयी। उनकी घबराहट का एक प्रमुख कारण यह था कि १९२८-२९ के दौर में कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े हुए यूनियनों के नेतृत्व में कई सफल हड़तालों का तांता लग गया था, इसलिए कम्युनिस्टों को मजदूर संगठनों से निकाल बाहर करने के लिए कई तरह के पड्यंत्र रचे गये। सुधारवादी मजदूर नेताओं की आँखों में थेलमन्न काँटों की तरह खटक रहे थे; क्योंकि उन्होंने ही जर्मनी के मजदूरों को मालिकों के विरुद्ध जुझारू संघर्ष के लिए खड़ा कर दिया था। अब तक जर्मनी में फासिस्ट शक्तियाँ सिर उठा चुकी थीं। अतः सुधारवादी मजदूर नेता और फासिस्ट तत्व दोनों ही थेलमन्त्र का पत्ता काटने के लिए तैयार थे। फासिस्ट तत्वों ने उनपर कई बार सांघातिक हमले किये, जिनका जिक्र ऊपर किया जा चुका है। सुधारवादी मजदूर नेताओं ने १९३१ में एक अभियान शुरू कर दिया कि थेलमन्न जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी के अध्यक्ष और प्रांतिकारी ट्रेड यूनियन संगठन के समर्थक है; इसलिए उन्हें परिवहन मजदूर यूनियन से निष्कासित कर देना चाहिए। इसके पीछे सुधारवादी मजदूर नेताओं का एकमात्र उद्देश्य यह था कि मजदूरों को तथाकथित आर्थिक संघर्षों में व्यस्त रखकर उन्हें राजनीतिक संघर्षों से बिल्कुल अलग-थलग रखा जाये; क्योंकि राजनीतिक संघर्षो में मजदूरों के संलग्न हो जाने से पूजीपतियों के पैरों के नीचे की जमीन खिसकने लगेगी। लेकिन दूसरी ओर ठीकलमन्न मार्क्सवादी-लेनिनवादी शिक्षा पद्धति के आधार पर मजदूरों को संगठित कर रहे थे, जिसका मतलब था कि पूँजीपति अपनई कब्र खुद खोदलें और मजदूर शासन का संचालन करें। इसलिए सुधारवादी नेताओं ने देश के मजदूर संगठनों में अपनी एक अलग पहचान स्थापित करने वाले हेम्बर्ग परिवहन मजदूर यूनियन से थेलमन्न के निष्कासन का अभियान शुरू कर दिया जबकि हेम्बर्ग के परिवहन-मजदूर उन्हें अपना रक्षक, सहयोगी और मित्र मानते थे।


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"लाल" मोरचा गठबंधन


थेलमन्न  ने मजदूर विरोधी षड्यंत्रों को विफल करने के लिए कारगर कदम उठाये। १९२४ में उनके प्रयास से मजदूरों का एक क्रांतिकारी मोरचा स्थापित हुआ, जिसे "लाल मोरचा गठबंधन" कहा जाता था। इस मोरचे के सदस्य उन्हें अपना एकछत्र नेता मानते थे और वे इस मोरचे के स्थायी विभागीय अध्यक्ष थे। "लाल मोरचा गठबन्धन" जर्मनी के मजदूर वर्ग का सर्वाधिक लोक प्रिय जनसंगठन था और इसने संयुक्त मजदूरवर्गीय मोरचा स्थापित करने में बहुत बड़ी भूमिका अदा की थी। ऊपर उठी हुई बँधी मुट्ठी "लाल मोरचा गठबंधन" का प्रतीक चिह्न था, जिसका आशय था कि मजदूर अपने दृढ़ संकल्प के साथ मुट्ठियों के प्रहार से प्रतिक्रियावादी तत्त्वों, फासिस्टों, पूजीपतियों और युद्धलोलुपों के मनसूबों को चकनाचूर कर देंगे ।


इस प्रकार थैलमन्न ने जर्मनी के सबसे कठिन दिनों में मजदूर वर्ग के मनोबल को उन्नत करने का अथक प्रयास किया। उन्होंने सभी बाधाओं के बावजूद पार्टी और जन-संगठनों को मजबूत किया। उनके नेतृत्व में हर स्तर पर पार्टी का संख्यात्मक और गुणात्मक विकास हुआ। १९२७ में "लाल मोरचा गठबन्धन" के सदस्यों की संख्या १००००० हो गयी । इस मोरचे के अतिरिक्त पार्टी का एक दूसरा जुझारू जन-संगठन था तरुण कम्युनिस्ट लीग । १००००० नौजवान तरुण कम्युनिस्ट लीग के सदस्य थे। इसी तरह लाल महिला संगठन और अन्तरराष्ट्रीय श्रम सुरक्षा संगठन भी सक्रिय थे। ये सभी संगठन सच्चे अर्थ में जन-संगठन थे। इनमें ऐसे सभी गैरकम्युनिस्ट शामिल हो सकते थे, जो प्रतिक्रियावादियों और फासिस्टों की हिंसात्मक कार्रवाइयों के विरोधी, सर्वहारा की विजय के पक्षधर और विश्वशांति के समर्थक थे।


पार्टी और जन-संगठनों के प्रति थेलमन्न के क्रांतिकारी रुख और उनके सुमधुर व्यवहार से उनके सभी मित्र और सहयोगी संतुष्ट रहते थे। उनके मन में किसी के भी प्रति दुर्भाव नहीं था, लेकिन वर्ग निष्ठा उनमें कूट-कूट कर भरी थी और हर कीमत पर वे अपने सिद्धांत की रक्षा करने के लिए तत्पर रहते थे। उनके साथी, मित्र और सहयोगी तथा आम मजदूर बड़े प्यार और आदर के साथ उन्हें


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"टेड्डी" कहते थे । इस नाम में एक अद्भुत आकर्षण था- यह नाम मजदूर आन्दोलन का दीप-स्तंभ था।


लेकिन मजदूर वर्ग के शत्रु "टेड्डी" नाम सुनते ही गुस्से में अपने बाल नोंचने लगते थे। वे चाहते थे कि "लाल मोरचा गठबन्धन" और इसके "लाल सिपहसालार" का दमन किया जाये। उन्होंने "लाल मोरचा गठबंधन पर पाबंदी लगाने के लिए सरकार पर दबाव डालना शुरू कर दिया। दुर्भाग्यवश, सोशल डेमोकेट नेता मोरचे के क्रांतिकारी महत्व को नहीं समझ सके और सोशल डेमोक्रेट मुह,लर की सरकार ने १९२९ में इसपर पाबंदी लगा दी। लेकिन आम मजदूर मोरचे के पक्ष में थे; इसलिए सरकार द्वारा इसपर लगायी गयी पाबंदी के बाद भी अवैध रूप से यह मोरचा दीर्घकाल तक काम करता रहा। जब हिटलर ने सत्ता हथिया ली, तब इसके अनेक सदस्यों ने फासिज्म का डटकर मुकाबला किया और मजदूरों के हितों की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्योछावर किये। सौभाग्यवश, आज भो ऐसे अनेक लोग जीवित हैं, जिन्होंने मोरचे की रक्षा के लिए थेलमन्न के कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष किया था। ऐसे ही एक सौभाग्यशाली व्यक्ति की चर्चा स्वीडेन के लेखक अविद रुण्डबर्ग ने अपनी पुस्तक "एक जर्मन मजदूर" के संस्मरण में की है, जिसका नाम फिल्ज बाइक है। यह व्यक्ति १९७९(1927 स.) में बर्लिन (जज़ग) में रहता था। १९२८ में फिल्ज बढ़ई का काम करता था । उसी साल वह लाल मोरचे में शामिल हो गया और अगले साल जर्मनी की कम्यु निस्ट पार्टी से जुड़ गया। उसने नाजी गुण्डों के हमलों से थेलमन्न, पीक और उल्विस्त की हिफाजत की थी। जर्मनी के आतंकपूर्ण दिनों में उसे कई वर्षों तक भूख और दरिद्रता का सामना करना पड़ा था। फासिस्टों ने उसके भाई को मार डाला था। फिल्ज ने भी लाखों बर्लिनवासियों की भाँति जनवरी १९३३ के फासिस्ट विरोधी जुलूस में भाग लिया था।"


मेहनत-मशक्कत करने वाले लोगों के जन-संगठनों में कम्युनिस्ट पार्टी के उत्साहवर्द्धक कार्य-कलापों के कारण जर्मनी के मजदूरों और कम्युनिस्ट पार्टी की

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१. जर्मन जनवादी गणतन्त्र की ३० वी जयन्ती के अवसर पर अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित पुस्तक "इंशन्स" पृष्ठ ३४-३५, पैनोरमा, ज. ज. ग. ।


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शक्ति में पहले से भी अधिक वृद्धि हुई। पार्टी के सदस्यों की संख्या १९३३ में ३००००० हो गयी- इसका मतलब है कि १९२८ के मुकाबले में पार्टी के सदस्यों की संख्या प्रायः दुगुनी हो गयी । मजदूरों, मध्यश्रेणी के लोगों नौजवानों महिलाओं के बीच पार्टी की प्रतिष्ठा में इस प्रकार निरन्तर वृद्धि होने का कारण यह था कि थेलमन्न के नेतृत्व में कम्युनिस्ट पार्टी ने फासिज्म के भयावह संकट के विरुद्ध मिल-जुलकर लड़ने के लिए कम्युनिस्टों और सोशल डेमोकटों की संयुक्त कार्रवाई तथा मजदूर वर्ग की एकता को मजबूत करने की दिशा में अथक प्रयास किया ।


थेलमन्न ने संयुक्त मोरचे के सम्बन्ध में बहुत ही स्पष्ट और लोचदार नीति अपनायी। उन्होंने साफ-साफ कहा कि लकीर का फकीर बनने से या लकीर पीटते रहने से संयुक्त मोरचे के निर्माण का सपना पूरा नहीं होगा बल्कि इसके लिए घिसी-पिटी बातों को भूलकर सही परिप्रेक्ष्य को देखते हुए, समानता के सिद्धान्त के आधार पर कम्युनिस्टों और सोशल डेमोकटों को काम करना होगा । संयुक्त मोरचे की पक्की आधारशिला खड़ी करने के लिए आवश्यकता इस बात की नहीं है कि पूर्वकाल में एक-दूसरे को विभाजित करने वाली बातों के लिए आपस में छींटाकशी की जाये बल्कि एक दूसरे को जोड़नेवाले जो समान तत्त्व मौजूद हैं, उनपर विशेष रूप से जोर दिया जाये ।


संयुक्त मोरचे के सम्बन्ध में थेलमन्न की सही नीतियों के कारण कम्युनिस्ट पार्टी की ओर सोशल डेमोक्रेटो का झुकाव बढ़ गया और अनेकानेक सोशल डेमोक्रेट अपनी पार्टी और सुधारवादी मजदूर संगठनों से अलग हो गये । इतना ही नहीं, कई सोशल डेमोक्रेटों ने १९३२ में राइखस्टाग के चुनावों में कम्युनिस्टों के पक्ष में मतदान किया। यही कारण था कि कम्युनिस्टों ने ५९००००० वोट हासिल किये, जबकि १९३० में उन्हें १३००००० वोट मिले थे। यह एक शानदार उपलब्धि थी।


मजदूरों और किसानों की एकता


थेलमन्न ने अपने कार्यों को शहरों और कारखानों तक ही सीमित नहीं रखा बल्कि उन्होंने देहातों में जाकर किसानों के बीच काम करना भी आवश्यक समझा ।


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उनका पक्का विश्वास था कि मजदूर वर्ग की शक्ति में गुणात्मक और संख्यात्मक वृद्धि के लिए और फासिज्म विरोधी संयुक्त मोरचे के निर्माण के लिए मजदूरों और किसानों की एकता आवश्यक है।


दुर्भाग्यवश, कृषि-समस्याओं के समाधान और किसानों की उन्नति के लिए पिछले कुछ समय से किसी भी राजनीतिक दल द्वारा कोई ठोस अभियान नहीं चलाया गया था, जबकि जर्मनी के किसानों के संघर्ष की एक शानदार परम्परा रही है, जिन्होंने मध्ययुग में टामस मुएनसर के नेतृत्व में सामंतों और शासकों के छक्के छुड़ा दिये थे। थेलमन्न ने किसानों से सम्पर्क स्थापित किया। किसानों ने अपने हितों की रक्षा करने वाले रहनुमा के रूप में उनका हार्दिक स्वागत किया ।


थैलमन्न के प्रयास से पार्टी की ओर से " किसानों के लिए सहायता का कार्यक्रम" निर्धारित किया गया। थैलमन्न ने मई १९३१ में किसानों की एक विशाल सभा में स्वयं इस कार्यक्रम की घोषणा की। उन्होंने नारा बुलन्द किया : "मजदूरों और किसानों का गठबन्धन मजबूत हो।" किसानों के लिए सहायता का जो कार्यक्रम निर्धारित किया गया, उसका आम किसानों पर अच्छा प्रभाव पड़ा। किसानों में नई जागृति पैदा हुई। जगह जगह किसान अपने अधिकारों के पक्ष में लड़ने के लिए संगठित होने लगे। थैलमन्न ने मँझोले किसानों और खेतमजदूरों के भी संगठन खड़े किये ।


कुछ लोगों की दृष्टि में किसानों की समस्याओं के समाधान के लिए सिर खपाना बालू से तेल निकालने के समान था, लेकिन इसके विपरीत थेलमन्न ने जिस उत्साह से किसानों और खेतमजदूरों को अपने अधिकारों के पक्ष में लड़ने के लिए सगठित किया, उसका सुफल भी देखने को मिला । किसानों और खेतमजदूरों ने अपने प्रति थेलमन्न द्वारा की गयी सेवाओं का सही मूल्य चुकाया। जब थेलमन्न की १९३२ में राष्ट्रपति पद के चुनाव में उम्मीदवार घोषित किया गया, तब किसानों ने भी उनकी उम्मीदवारी का समर्थन किया। जुलाई १९३२ में कम्युनिस्ट पार्टी की ओर से पूरे देश के पैमाने पर फासिस्ट विरोधी सप्ताह मनाया गया, जिसमें किसानों ने बड़े उत्साह के साथ भाग लिया। किसानों के साथ फासिस्ट विरोधी शक्तियों के सुदृढ़ सम्पर्क का ही यह परिणाम था कि जब हिटलर के शासन-

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काल के सबसे भयावह दिनों में फासिज्म का विरोध करने वालों का सफाया किया जाने लगा, तब गाँवों में किसानों के यहां उन्हें शरण मिली।


थेलमन्न फासिज्म के विरुद्ध कठोर संघर्ष करने के लिए जनता के सभी व्यवसायों के लोगों को सौंगठित करना चाहते थे और इसके लिए सामूहिक विचार विमर्श के उपरांत उपयुक्त कार्यनीति तय करते थे। उन्होंने लोगों को आगाह किया कि फासिज्म के कारण जीवन के सभी उच्च मूल्यों और मानव जाति की महान उपलब्धियों पर घोर संकट पैदा हो गया है। उन्होंने जोर दिया कि फासिज्म से देश को बचाने के लिए जनबादी जर्मनी की स्थापना करना आवश्यक है । थेलमन्न के सुझाव के अनुसार १९३० में "जर्मन जनता की राष्ट्रीय और सामाजिक मुक्ति का कार्यक्रम" प्रकाशित हुआ, जिसने संयुक्त फासिस्ट-विरोधी मोरचे के पक्ष में आबादी के बहुत बड़े हिस्से को प्रभावित किया। कार्यक्रम बिल्कुल स्पष्ट था और यह देश के गहरे संकट के सभी पहलुओं की ओर लोगों का ध्यान खींचता था । इसने हिटलर की "राष्ट्रीय समाजवादी पार्टी" को बिल्कुल नंगा कर दिया और लोगों को सावधान किया कि यह एक "जन विरोधी, मजदूर विरोधी और समाज वाद-विरोधी पार्टी है अर्थात् यह घोर प्रतिक्रियावादी, मेहनतकश लोगों का शोषण करने वाली और उन्हें गुलाम बनाने वाली पार्टी है।" कार्यक्रम में फासिज्म की विशद व्याख्या प्रस्तुत की गयी थी और इसके साथ ही सभी देशभक्तों और जनवाद प्रेमियों का आह्वान किया गया था कि वे फासिज्म को सबक सिखाने और उसके स्थान पर जनवादी व्यवस्था लागू करने के लिए संयुक्त रूप से संघर्ष करें। थेलमन्न के परामर्श से प्रस्तुत इस कार्यक्रम का ऐतिहासिक महत्त्व है। इसका अध्ययन करने से पता चलता है कि यदि सोशल डेमोक्रेट इस कार्यक्रम को पूरी तरह अपना लेते तो फासिज्म को प्रारम्भिक दौर में ही परास्त किया जा सकता था।


यह सर्वविदित है कि कम्युनिस्टों ने सबसे पहले फासिज्म के खतरे को भांप लिया था और वे एक क्षण भी बर्बाद किये बिना फासिज्म के विरोध में अविराम गति से संघर्ष चलाते रहते थे। जैसे-जैसे स्थिति भयावह होती जाती थी, वैसे-वैसे उनका संघर्ष भी तेज होता जाता था। १९३२ में उनकी सरगमियाँ पहले से भी अधिक तेज हो गयीं। देश के सभी भागों में फासिज्म-विरोधी जुलूसों, सभाओं और हड़तालों का तांता लग गया। १९३२ के उत्तरार्द्ध में सिर्फ दो महीनों के


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अंतराल में ९०० हड़तालें, अनेकानेक फासिस्ट विरोधी सभाएँ और प्रदर्शन हुए जिनका नेतृत्व कम्युनिस्टों ने किया। मन के नेतृत्व में इन क्रांतिकारी गतिविधियों के माध्यम से कम्युनिस्टों और उनके बहादुर सहयोगियों ने वीरता, त्याग और बलिदान के अनेक रोमांचक उदाहरण प्रस्तुत किये ।


थेलमन्न ने यह देख लिया कि जर्मनी के सभी छोटे-बड़े कारखानों, विश्व विद्यालयों, स्कूलों, किंडरगार्टनों तथा सरकारी और गैरसरकारी दफ्तरों में फासिस्ट प्रवेश कर चुके हैं, इसलिए उन्हें यह समझते देर नहीं लगी कि संकट का पहाड़ टूटने ही वाला है। लेकिन क्या ऐसी हालत में कोई क्रांतिकारी व्यक्ति मूक दर्शक भर बना रह सकता है ? उन्होंने इस बात की चिन्ता नहीं की कि सोशल डेमोक्रेट और ईसाई मतावलंबियों का एक अच्छा खासा हिस्सा या तो फासिस्टों का समर्थन कर रहा है या उदासीन है। उन्होंने सब लोगों को हिटलर से सावधान रहने की मार्मिक अपील की और हिटलर द्वारा महायुद्ध शुरू किये जाने के कई साल पहल एक प्रखर प्रतिभाशाली कम्युनिस्ट नेता के रूप में नारा बुलन्द किया "हिटलर का मतलब है युद्ध" । यह नारा आमलोगों की जुबान पर चढ़ गया, लेकिन दूसरी और युद्ध के दानवों की, मानवजाति और विश्वशांति के दुश्मनों की भौहें तन गयीं । लेकिन इतने पर भी सोशल डेमोक्रेट और धर्माध लोगों ने "हिटलर युद्ध का दानव है" जैसे नारे का अर्थ नहीं समझा। वे कम्युनिस्टों की चेतावनी के बावजूद "विनाशकाले विपरीत बुद्धिः" की कहावत चरितार्थ करते रहे ।



विश्व कम्युनिस्ट आन्दोलन के प्रखर नेता


अन्र्स्ट थेलमन्न एक ईमानदार कम्युनिस्ट के नाते मार्क्स, एंगेल्स और लेनिन के सिद्धांतों के पक्के अनुयायी थे। उनकी वर्ग-निष्ठा एक ऐसी विश्व दृष्टि की और इंगित करती थी, जो संपूर्ण मानवजाति की खुशहाली और उज्ज्वल भविष्य के लिए संघर्ष करना आवश्यक समझती थी । यही कारण है कि उन्होंने अपने देशवासियों के हितों के लिए संघर्ष करते हुए धरती के सभी मनुष्यों यानी विश्व के सभी श्रमजीवियों के अधिकारों की रक्षा के लिए भी संघर्ष किया। विश्व कम्युनिस्ट आन्दोलन से उनका घनिष्ठ सम्बन्ध था और वे कॉमिण्टन के कार्यों में गहरी दिलचस्पी लेते थे । वे १९२४ से १९२८ तक कॉमिण्टन की कार्यकारिणी के एक उम्मीद


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कॉमिण्टर्न की कांग्रेस (१९२८) में थेलमन्न और अन्य प्रतिनिधि


चार सदस्य के रूप में और १९२८ से १९४३ तक उसके सदस्य के रूप में विशव  कम्युनिस्ट आन्दोलन के विकास में योगदान करते रहे। अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के अनेक महान कम्युनिस्ट नेता उनके मित्र और सहयोगी थे। वे संकट के समय अपने मित्रों से बातचीत करके उसका समाधान ढूढ़ने का प्रयास करते थे। उन्हें अपने मित्रों और सहयोगियों पर पूरा भरोसा था और वे उनके बहुमूल्य सुझाव का स्वागत करते थे । २० जुलाई, १९३२ को प्रशा की संयुक्त मोर्चा सरकार के भंग कर दिये जाने के बाद ज्यार्जी दिमित्रोव, अस्टं थेलमन्न और जैक दूक्लो ने एक बैठक की। जैक दुबलों ने थैलमन सम्बन्धी अपने संस्मरणों में लिखा है: "मैं अभी भी ज्यार्जी दिमित्रोव को थैलमन्न से यह पूछते हुए सुन सकता हूँ कि क्या यह संभव नहीं होगा कि हड़ताल का आह्वान किया जाये, मैं अभी भी थेलमन्न को यह समझाते हुए सुन सकता हूँ कि क्यों इसे हासिल कर सकना मुश्किल और यहाँ तक कि असम्भव होगा" 1 |

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१. ज्याज दिमित्रोव जीवन और कृतित्व, पृष्ठ ९२-९३, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस (प्रा०) लिमिटेड, नयी दिल्ली ।


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विश्व कम्युनिस्ट आंदोलन में तोड़-फोड़ करने वाले "दझिणपक्षी", "वामपक्षी और "उग्र वामपक्षी" अवसरवादियों तथा मार्क्स वाद को झुठलाने और उसे भोंड़ ढंग से प्रस्तुत करने वाले तत्वों के विरुद्ध उन्होंने निर्भीकता और कठोरता के साथ विचार धारात्मक संघर्ष किया। इस विचारधारात्मक संघर्ष में उनके पैने विचारों के सामने नहीं टिक पानेवाले अवसरवादी नेता या तो खिसियानी बिल्ली की तरह खंभे नोचने लगते थे या उनका चरित्र हनन करने पर तुल जाते थे । एकबार की घटना है-- थैलमन्न पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने अपने एक सम्बन्धी के गबन का मामला कुछ समय तक दवा दिया। यह मामला कम्युनिस्ट इंटरनेशनल में भी पेश कर दिया गया। कम्युनिस्ट इंटरनेशनल ने पूरी छानवीन के बाद कामरेड थेलमंन्न के प्रति पूरा विश्वास व्यक्त किया।"


थेलमन्न एक दुदृप्रतिज्ञ अन्तरराष्ट्रीयतावादी नेता थे । कम्युनिस्टों को अंतर्राष्ट्रीय मंत्री को वे बहुत ही मूल्यवान समझते थे। कम्युनिस्ट इंटरनेशनल और विश्व के किसी भी देश की कम्युनिस्ट पार्टी या मजदूर आन्दोलन में विभेद पैदा करनेवालों को अपने तकों से वे निरस्त कर देते थे। उन्होंने ऐसे लोगों की तीखी आलोचना की, जो बोल्शेविका पर और रूस की पार्टी तथा कम्युनिस्ट इण्टरनेशनल पर अनावश्यक छींटाकशी करते हुए अपनी धाक जमाना चाहते थे । बोल्शेविकों या रूस की कम्युनिस्ट पार्टी पर किये जानेवाले हमले के सम्बन्ध में अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा, "यह कम्युनिस्ट इण्टरनेशनल और पश्चिम यूरोप की क्रांति पर भी हमला है। इसके अतिरिक्त, मैं कहूँगा कि "उग्र वामपक्षियों" के हमलों से अखिल संघीय कम्युनिस्ट पार्टी (बोल्शेविक) के साथ जर्मनी की पार्टी या अन्य पार्टियों की एकजुटता पर प्रभाव नहीं पड़ेगा। इस दिशा में किये जानेवाले सभी प्रयास बिफल हो जायेंगे । "


थेलमन्न प्रत्येक कम्युनिस्ट का यह प्रधान कर्तव्य समझते थे कि वह प्रथम सोवियत समाजवादी व्यवस्था की हिफाजत करने के लिए सदैव तैयार रहे। उन्होंने जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी की १२वी कांग्रेस में कहा: "सोवियत संघ की सुरक्षा

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१. विस्तृत जानकारी के लिए देखें " कम्युनिस्ट इंटरनेशनल (१९१९ १९४३), खंड २, पृ० ५५०-५१-५२, संकलन और संपादन: जेने ग्रस के कास एण्ड कंपनी लिमिटेड), लन्दन, १९७१ ।

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का प्रश्न सभी देशों के मजदूरों की क्रांतिकारी नीति के केन्द्र में स्थित रहना चाहिए। वे स्वयं सोवियत संघ और जर्मनी के मजदूरों के बीच सेतु का काम करते थे। उन्होंने कहा: "हमने अपना कर्तव्य निर्धारित कर लिया है कि रूस में मजदूरों और किसानों का बिरादराना और जुझारू गठबंधन स्थापित किया जाये और इसे एक सुदृढ़ दुर्ग में परिणत कर दिया जाये।


सोवियत संघ के प्रति अगाध अनुराग और जर्मनी की शोषित पीड़ित जनता के लिए अपना सबकुछ न्योछावर करने के संकल्प के कारण सोवियत संघ के लोग थेलमन्न का बहुत सम्मान करते थे। मास्को और लेनिनग्राड के कई निवासियों लाल सेना के जवानों, फैक्टरियों के मजदूरों और ग्रामवासियों से उनका व्यक्तिगत स्तर पर स्नेहपूर्ण सम्बन्ध था। सोवियत संघ की यात्रा से उन्हें बड़ा बल और बड़ी प्रेरणा मिलती थी ।


अन्स्टं थैलमन्न विश्वशांति के समर्थक, सौन्यवाद के प्रबल विरोधी और युद्ध विरोधी आन्दोलन में संलग्न विश्व के सभी भागों के मजदूरों के क्रांतिकारी बिरादराना सम्बन्धों के कुशल सर्जक थे । विभिन्न देशों के मजदूरों की युद्ध-विरोधी और फासिज्म विरोधी भावनाओं को सघटित करने में उन्होंने प्रमुख भूमिका अदा की। १९३१ और १९३२ की अवधि में उन्हें फांस और नीदरलैण्ड की सीमाओं पर जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी की ओर से आयोजित जर्मनी, फ्रांस, डेन्मार्क, हालैण्ड और पोलैंड के मजदूरों की कई युद्ध-विरोधी सभाओं को सम्बोधित करने का सुयोग मिला। पेरिस में मजदूरों की एक सभा को उन्होंने और मॉरिस थोरेज ने मिलकर संबोधित किया था । थेलमन्न की पहल पर ही जनवरी १९३३ में ऐस्सेन में एक युद्ध-विरोधी सम्मेलन हुआ था, जिसमें यूरोप के कई देशों की कम्युनिस्ट पार्टियों और युवा संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया था ।


चेतावनी सही साबित हुई


थेलमन्न ने १९२० के दशक में जर्मनी में नाजीवाद के उदय और युद्ध के बढ़ते हुए खतरे की ओर लोगों का ध्यान बार-बार आकृष्ट किया और इस बात का अटल भाव से प्रयास किया कि नाजीवाद पनपने नहीं पाये। उन्होंने बार-बार


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ज़ोर देकर कहा: "कम्युनिस्टों और सोशल डेमोक्रेटो को मिल-जुलकर नाजीवाद का मुकाबला करना चाहिए।" लेकिन उनकी यह बात हमेशा अनसुनी कर दी गयी। १९३२ के राष्ट्रपति चुनाव में भाग लेते हुए उन्होंने चुनाव अभियान में नाजीवाद का पर्दाफाश किया । उनकी चेतावनी थी : "हिण्डेनबर्ग को मिलने वाला वोट हिटलर-पक्षी वोट होगा और हिटलर को मिलने वाला वोट युद्धपक्षी वोट होगा।" सैनिक साज-सामान तैयार करने वाले कारखानों के मालिक और बड़े घरानों के पूंजीपति बढ़े फील्ड मार्शल हिण्डेनबर्ग को राइश का राष्ट्रपति बनाना चाहते थे; क्योंकि इससे हिटलर द्वारा सत्ता हथियाने का रास्ता साफ हो जाता । चुनाव के कुछ ही महीनों के बाद अग्रदर्शी नेता थेलमन्न की चेतावनी सही साबित हो गयी, हिडेनबर्ग हिटलर का विकल्प नहीं था बल्कि उसने तो वास्तव में हिटलर द्वारा सत्ता हथियाने का रास्ता साफ कर दिया |


आखिर ३० जनवरी, १९३३ को वह मनहूस दिन आ गया, जबकि हिटलर डिक्टेटर हो गया । थेलमन ने ठीक उसी दिन एक बार फिर सोशल डेमोक्रेटों और सभी जनवाद-प्रेमियों से आग्रह किया कि वे कम्युनिस्ट पार्टी के साथ मिलकर फासिज्म के विरुद्ध हड़ताल की घोषणा करें। लेकिन नक्कारखाने में तूती की आवाज नहीं सुनी गयी ।


हिटलर के डिक्टेटर बनने के बाद जर्मनी के मजदूर वर्ग और सभी जनवादी ताकतों के विरुद्ध और खास तौर पर कम्युनिस्टों के विरुद्ध दमन का चक्र शुरू हो गया। सबसे पहला निशाना कम्युनिस्ट पार्टी को बनाया गया। पार्टी पर और पार्टी द्वारा प्रकाशित समाचारपत्रों पर पाबंदी लगा दी गयी | राइखस्टाग में निर्वाचित कम्युनिस्ट प्रतिनिधियों को अधिकार च्युत कर दिया गया। घर-पकड़ और गिरफ्तारियां शुरू हो गयीं । हजारों हजार कम्युनिस्ट जेलों में ठूस दिये गये। हिटलर ने वामपक्ष का समर्थन करनेवाले सोशल डेमोकटों और स्वतंत्र विचारशील नागरिकों को भी नहीं छोड़ा । उन्हें भी जेल की हवा खाने के लिए मजबूर कर दिया गया। समूचे देश पर विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ा।


हिटलर के चाकरों ने २७ फरवरी, १९३३ को राइखस्टाग में आग लगा दी। और कम्युनिस्टों को देश और दुनिया की नजरों से नीचा गिराने के लिए यह अफवाह




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फैला दी कि राइखस्टाग में कम्युनिस्टों ने आग लगायी है। इस अग्निकांड के लिए बुल्गारिया के महान सपूत और कम्युनिस्ट इण्टरनेशनल के प्रसिद्ध नेता ज्याज दिमित्रोव को, जो उन दिनों जर्मनी में थे, दोषी मानकर गिरफ्तार कर लिया गया और उनपर मुकदमा चलाया गया, जिसमें दिमित्रोव ने न्यायालय में अपनी सफाई पेश करते हुए फासिस्टों की धज्जियां उड़ा दी और अंत में सबूत के अभाव में दिमित्रोव को इलजाम से बरी कर दिया गया।


राइस्ट अग्निकांड के बाद भूमिगत कम्युनिस्टों को चुन-चुनकर गिरफ्तार किया जाने लगा। थेलमन्न के ठिकाने का भी पता लगा लिया गया। वे ३ मार्च, १९३३ को गिरफ्तार कर लिये गये ।


जीवन का दुःखद अध्याय


थेलमन्न के जीवन का अब एक बहुत ही दुःखद अध्याय शुरू हुआ। नाजियों ने उन्हें कम्युनिस्टों और अन्य फाटिस्ट विरोधियों के लिए विशेष रूप से निर्मित यातना शिविरों और भयानक कैदखानों में जीवन व्यतीत करने के लिए मजबूर कर दिया। नाजियों को अब भी भय था कि कहीं किसी गुप्त तरीके से कम्युनिस्ट अपने नेता को कैदखाने से बाहर निकालने का प्रयत्न न करें, इसलिए उनके गुप्त आवास को कुछ समय तक किसी को जानकारी नहीं दी गयी। उन्हें अकेले, बिल्कुल एकांत स्थान में रखा जाता था। उन्हें अपने मित्रों और रिश्तेदारों से भी नहीं मिलने दिया जाता था। बहुत दिनों के बाद उनकी प्यारी पत्नी और समर्पित भाव से उनके हर काम में हाथ बँटानेवाली जुझारू महिला रोज थेलमन्न को इजाजत दी गयी कि वे अपने पति से मिल सकती हैं। कैदखाने और यातना शिविर में भी थेलमन्न को कड़े पहरे में रखा जाता था ।


धुरंधर नाजी अधिकारी दो साल तक उनके विरुद्ध अभियोग पत्र तैयार करने के लिए माथापच्ची करते रहे। उनपर राजद्रोह का आरोप लगाया गया, लेकिन विडम्बना यह है कि मुकदमा नहीं चलाया गया । नाजी भयभीत थे कि कहीं दिमित्रोव पर चलाये गये मुकदमे की तरह थेलमन्न पर चलाया जानेवाला मुकदमा भी उल्टे नाजियों को ही कटघरे में खड़ा न कर दे, इसलिए वे हमेशा टाल-

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मटोल करते रहे। एक अधिकारी ने कहा, "थैलमन्न के मामले में हम लाइपजिंग मुकदमे की गलतियों को दोहराना नहीं चाहते हैं।"


लेकिन जनमत पर अपना प्रभाव डालने के लिए नाजी अधिकारी थेलमन्न के विरुद्ध मुकदमा चलाने की तैयारी भी करते रहे। अनेक मुखबिरों और जासूसों को यह साबित करने के लिए तैयार कर लिया गया कि थैलमन्न विस्फोटक आग्नेयास्त्र ओर सांघातिक हथियार जमा कर तथा हथियारबंद लोगों को संगठित कर चारों ओर आग लगाना, लूटमार करना और सशस्त्र विद्रोह करना चाहते थे। नाजियों के संचार माध्यम द्वारा थेलमन्न और कम्युनिस्टों को बदनाम करने के लिए मनगढ़ंत कहानियाँ प्रचारित की गयीं। नाजी दैत्यों ने मन को जनता की आंखों से गिराने का लगातार प्रयास किया लेकिन वे इतने से हो संतुष्ट नहीं थे। वे थेलमन्न के विरुद्ध अपने दूसरे घिनौने तरीकों का भी इस्तेमाल कर रहे थे। उन्होंने जनता के यशस्वी नेता को मारा-पीटा, अपमानित किया और प्रलोभन तथा झांसे दिये, ताकि वे अपने "अपराध" कबूल कर लें, अपने छिपे हुए साथियों के ठिकाने बता दें और कम्युनिस्टों की सभी गुप्त योजनाओं से नाजी अधिकारियों को अवगत करा दें।


नाजी अधिकारियों की क्रूरता का पता इसीसे चलता है कि जब थेलमन्न ने कोई भी "भेद" प्रकट करने से इनकार किया तो उन्हें लोहे के छड़ों से बुरी तरह पीटा गया और इतने पर भी वे अडिग रहे, तो उन्हें हथकड़ी और बेड़ी में जकड़कर काल कोठरी में फेंक दिया गया, लेकिन इतने पर भी नाजी अधिकारी फौलादी कलेजे वाले थेलमन्न का मनोबल नहीं तोड़ सके । हां, उनका स्वास्थ्य जरूर गिर गया। अपनी पत्नी को उन्होंने लिखा, "कई कारणों से अब सब कुछ झेल लेने का मैंने अभ्यास कर लिया है।"


थैलमन्न की पत्नी रोज थेलमन्न ने यंत्रणा शिविर में उनसे मिलने की घटना का मार्मिक वर्णन किया है। उन्होंने अपनी बेटी से कहा, "दरवाजा खुला और एस. एस. दरिन्दे तुम्हारे पिता को अन्दर ले आये। उन्हें चलने में बहुत कठिनाई हो रही थी। उनके मुँह में एक भी दांत नहीं था। चेहरा फूला हुआ था। ऊपर से नीचे तक उनका रंग काला पड़ गया था। वे बैठ नहीं सकते थे। मैं भय के मारे चीख उठी, उन्होंने तुम्हारा क्या हाल कर रखा है !"




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हिटलर द्वारा अपने को जर्मनी का डिक्टेटर घोषित कर दिये जाने के बाद जर्मन जनता के सारे अधिकार छीन लिये गये और जर्मनी में सर्वत्र भय और आतंक का वातावरण पैदा हो गया । नाजियों के विशेषाधिकार को सार्वजनिक रूप से चुनौती देनेवालों को एक-एक कर गिरफ्तार कर लिया गया या मार डाला गया । लेकिन थेलमन्न ने अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर मजदूर वर्ग की एकजुटता के लिए जो संघर्ष किया था और दुनिया के भिन्न-भिन्न देशों के मेहनतकश लोगों में जो नयी वर्ग चेतना पैदा हो गयी थी, उसके फलस्वरूप दुनिया के सभी देशों के स्वतन्त्र विचार शील बुद्धिजीवियों तथा विभिन्न व्यवसायों के प्रगतिशील लोगों में जर्मनी में फासिस्टों की आतंकपूर्ण कार्रवाइयों के कारण गहरी चिन्ता व्याप्त हो गयी ।


थैलमन्न  के मित्र और उनके विचारों के समर्थक सभी देशों में फैले हुए थे। जब विदेशों में यह मनहूस समाचार पहुंचा कि थेलमन्न को गिरफ्तार कर यातना शिविर में भेज दिया गया है और उन्हें शारीरिक तथा मानसिक यंत्रणाएँ दी जा रही है, तब उनके मित्र और प्रशंसक तथा मानवतावादी लोग उनकी जीवन रक्षा के लिए प्रयत्नशील हो गये। कई देशों के मेहनतकश लोगों में तो इस समाचार से गुस्से की लहर दौड़ गयी। मास्को, प्राग, पेरिस, लंदन, न्यूयार्क आदि अनेक शहरों में थैलमन की रिहाई के लिए बड़े-बड़े जुलूस निकाले गये । कई देशों में थेलमन्न रक्षा समितियाँ गठित की गयीं।थेलमन्न की रक्षा के लिए और जर्मनी के जांबाज देशभक्तों के संघर्ष के प्रति अपनी एकजुटता व्यक्त करने के लिए सार्वजनिक सभाएँ होने लगीं, जिन्हें प्रमुख राजनीतिक नेताओं और बुद्धिजीवियों ने संबोधित किया। थेलमन्न का नाम हिटलर की पाशविक तानाशाही के विरुद्ध संघर्ष का एक प्रतीक बन गया ।


सर्वाधिक संवेदनशील लेखकों ने थैलमन्न की प्राण रक्षा के लिए अपनी आवाज बुलंद की। बूढ़े मक्सिम गोर्की ने मर्माहित होकर कहा: "हम वह दिन अवश्य देखेंगे जबकि सभी व्यक्ति एक ही भावना से उद्वेलित होंगे और फासिज्म के नासूर को खत्म करेंगे। थेल्मन्न और उनके बहादुर साथी अटल भाव से फासिज्म की कब्र खोद रहे हैं, वे दीर्घजीवी हों !" रोमां रोला, हेनरी बारबूस, मार्टिन एण्डरसन, नेक्सो, हाइनरिख मन जैसे महान् मानवतावादी लेखकों ने थैलमन्न की रिहाई की मांग की।


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थेलमन्न के "बचाव" के लिए फासिस्टों ने स्वयं जिस सलाहकार को नियुक्त किया था, उसे ऐसा कोई सबूत नहीं मिला, जिसके आधार पर थैलमन को अपराधी माना जाता; इसलिए वह भयभीत होकर जर्मनी से भाग खड़ा हुआ। पेरिस में उसने जूरियों की एक बैठक में कहा, "थेलमन्न अपने मानवीय गुणों से अनुप्राणित एक सीधे-सादे और साहसी कार्यकर्ता के रूप में जीवन व्यतीत कर रहे हैं। उन्होंने गौरव और धर्म के साथ नियति के कठोर प्रहारों को झेल लिया है। उनका मनोबल तोड़ने में उन्हें (यानी उनके दुश्मनों को ले०) कामयाबी नहीं मिलेगी ।"


अंततः, थेलमन्न पर बिना मुकदमा चलाये ही नाजी दरिन्दों ने उन्हें मोबित से हैनोवर की काल कोठरी में भेज दिया। इसके पीछे उनकी मंशा थी कि फासिज्म के विरुद्ध संघर्ष करनेवाले कम्युनिस्ट और कम्युनिस्ट पार्टी को पंगु बना दिया जाये, लेकिन इससे जर्मन कम्युनिस्ट नेता भयभीत नहीं हुए और पीक, उल्विस्त, फ्लोरिन जैसे कमंट नेताओं ने भूमिगत रहकर संपूर्ण देश में फासिज्म विरोधी संघर्ष को जारी रखा।


नाजियों ने ३५००० कम्युनिस्टों को मौत के घाट उतार दिया। अनेक प्रगतिशील और वामपक्षी सोशल डेमोक्रेट मारे गये। जहाँ भी कोई यहूदी मिलता, उसे मृत्यु के गर्त में फेंक दिया जाता। जर्मनी की एकमात्र अल्पसंख्यक जाति - जोर्व - के कितने ही निरीह लोगों को मारा गया और देश से खदेड़ दिया गया।


जून, १९३५ में हेम्बर्ग के कम्युनिस्ट फिते शुल्ज का सिर काट डाला गया । सरकारी प्रोसिक्यूटर ने उनके विषय में कहा था कि "उसकी बात गोलियों से भी अधिक खतरनाक है।" हेम्बर्ग लाल मोरचे के सदस्य एडगर आन्दों को तड़पा-तड़पा कर मौत के कुएँ में फेंक दिया गया। मरते समय उन्होंने कहा: "फासिज्म मुर्दाबाद, कम्युनिज्म जिन्दाबाद !" हेम्बर्ग में पहले मजदूरी करनेवाले जोह रखेहर ने असीम धैर्य का परिचय दिया। वे जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी की केन्द्रीय समिति के सदस्य थे, इसलिए नाजी उन्हें अच्छी तरह सबक सिखाना चाहते थे। बदमाशों ने उनपर कोड़े बरसाये, उनकी चमड़ी उधेड़ डाली और उन्हें गर्म पानी से नहलाया। उनकी वाकूशक्ति अवरुद्ध हो गयी और उन्होंने नाजी आततायियों के सवालों का जवाब देने के बदले उनके चेहरों पर थूक फेंक दिये ।


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जर्मनी के कम्युनिस्टों के साहस, त्याग, बलिदान और सर्वोपरि उनकी वर्ग निष्ठा से प्रभावित होकर प्रमुख सोवियत कम्युनिस्ट नेता डी० जेड० मानुइल्स्किी ने सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी को १७वीं कांग्रेस में कहा, "जर्मन कम्युनिस्ट पार्टी, इसकी केन्द्रीय समिति और इसके नेता थैलमन्न को यह श्रेय और गौरव प्राप्त है कि उन्होंने ऐसे कार्यकर्ता तैयार किये । "


थैलमन्न को बहुत तंग किया गया कि वे पुराने विचारों को छोड़ने के लिए तैयार हो जायें। इस पर एक दिन थैलमान ने आवेश में आकर वार्डेन से कहा "तुम आपाद-मस्तक एक दुष्ट व्यक्ति हो । तुम्हें अब जान लेना चाहिए कि में मृत्यु पर्यन्त इस तरह का कोई वक्तव्य नहीं दे सकता।"


जर्मन फासिस्टों द्वारा २२ जून १९३१ को सोवियत संघ पर हमला बोल दिया गया। इस हमले का समाचार सुनाने के लिए गेस्टायो जेलर थेलमन्न के पास आया और उसने विदूषक की भांति कहा कि अब कुछ ही दिनों में फासिस्ट मास्को पहुँच जायेंगे। इस पर उन्होंने उस दृष्ट को जवाब दिया: "सोवियत संघ में सम्पूर्ण फासिस्ट सेना को कब्र में सुला दिया जाएगा।"


थैलमन्न को विश्वास था कि फासिस्टों की पराजय अवश्यंभावी है, लेकिन वे यह भी समझते थे कि फासिस्ट अपनी पराजय के पहले ही उन्हें मार डालेंगे। यही हुआ भी। अगस्त १९४४ को उन्हें बुखेन्वाल्ड के यातना शिविर में निर्दयतापूर्वक मार डाला गया। नाजियों ने इस घटना को कुछ समय तक गुप्त रखा। लेकिन १४ सितम्बर, १९४४ को एक मनगढ़ंत रिपोर्ट प्रकाशित कर दी गयी कि ब्रिटेन और अमेरिका के वायुयानों द्वारा बुखेन्वाल्ड पर बम गिराये जाने के कारण राइखस्टाग के भूतपूर्व सदस्य  ब्रेत्शिएल्ड  (सोशल डेमोक्रैट) और थेलमन्न  २८ अगस्त को मार डालें गये ।


तथ्यों से पता चलता है कि हिटलर ने नाजियों की पराजय को सुनिकट देखकर थेलमन्न की हत्या का आदेश व्यक्तिगत रूप से जारी किया था ।


आततायियों ने उनकी हत्या कर दी, लेकिन वे जर्मनी के करोड़ों लोगों की उस उत्तराधिकार से वंचित नहीं कर सके, जिसे थेलमन्न उन्हें सौप गये थे ।


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थेलमन्न ने जिस राजनीतिक व्यवस्था, जिस शोषण-विहीन समाज और मजदूर वर्ग की सरकार की स्थापना के लिए फासिस्टों के विरुद्ध संघर्ष किया और अपनी जान न्योछावर को, उसे उनके उत्तराधिकारियों ने साकार कर दिया। जिस जर्मनी की धरती से दो महायुद्ध शुरू हुए, उसी धरती के एक भाग में जर्मन जन वादी गणतंत्र का उदय हुआ और जर्मन जनवादी गणतंत्र के वर्तमान सीमाक्षेत्र में चालीस साल पहले अप्रैल, १९४६ में जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी और सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी के एकीकरण के बाद जर्मनी की समाजवादी एकता पार्टी का आविर्भाव हुआ। व्यावहारिक स्तर पर इसी राजनीतिक एकता की परिकल्पना अन्स्टं थेलमन्न ने की थी । जर्मन जनवादी गणतंत्र को फासिज्म जैसी महामारी से पूरी तरह छुटकारा मिल चुका है और वहाँ की जनता का संकल्प है: युद्ध और फासिज्म फिर कभी नहीं !


थेलमन्न और भारत


थेलमन्न एक सच्चे अन्तरराष्ट्रीयतावादी नेता की हैसियत से भारत को साम्राज्यवाद विरोधी गतिविधियों का भी सही ढंग से मूल्यांकन करते रहते थे । १९२९ में जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी की १२वीं कांग्रेस के अवसर पर अर्नस्ट थेलमन्न ने स्पष्ट और जोरदार शब्दों में कहा कि भारत में जो साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष चल रहा है, वह औपनिवेशिक उत्पीड़न से ग्रस्त दूसरे देशों के संघर्षरत जनगण को एक दृष्टांत के रूप में अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर प्रभावित कर रहा है। समाजवादी एकता पार्टी के एक नेता सीगफीड लोरेंज ने हाल में ही भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को १३वीं कांग्रेस में सपा के प्रतिनिधि मण्डल के नेता के रूप में कहा : "अर्न्स्ट थेलमन्न के नेतृत्व में जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी की केन्द्रीय समिति ने जो नीति अपनायी, उसका ही यह प्रभाव था कि अविस्मरणीय डाक्टर अधिकारी (सुप्रसिद्ध भारतीय कम्युनिस्ट नेता का० गंगाधर अधिकारी--- ले०) और दूसरे साथियों ने मार्क्सवाद-लेनिनवाद में आस्था व्यक्त की।"


भारतीय नेता और बुद्धिजीवी भी थेलमन्न के जीवन काल में ही उनके संघर्षोन्मुख और निस्पृह व्यक्तित्व से परिचित हो चुके थे। ३ फरवरी, १९३६ को लंदन की एक सभा में भारत के महान नेता जवाहरलाल नेहरू ने साम्राज्यवाद


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विरोधी संघर्ष में भाग लेने वाले समर्पित भारतीय योद्धाओं का जिक्र करते हुए उनकी तुलना अन्स्टं थेलमन्न से की थी ।


बुखेन्वाल्ड के फासिस्ट यातना शिविर में जिस स्थान पर अट लगन्न का बध किया गया था, वहाँ उनका स्मारक निर्मित है और उसके शिलापट्ट पर ये विचारोत्तेजक शब्द अंकित है 1:


१८ अगस्त, १९४४ को


फासिस्टों ने इस स्थल पर जर्मन जनता के महान सपूत


जर्मन मजदूर वर्ग के नेता


अर्नस्ट थेलमन्न


को मार डाला


उन्होंकी अजेय गौरव-स्मृति में


उनके सम्मुख सम्पूर्ण मानवजाति नतमस्तक है ।


उनकी स्मृति कभी धूमिल नहीं हो सकती है। 


थेलमन्न के शताब्दी समारोह के अवसर पर हम उनके प्रति हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं ।


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१. देखें "जवाहरलाल नेहरू बाङमय" (खंड ७), पृष्ठ ८७ जवाहरलाल नेहरू स्मारक निधि तथा सस्ता साहित्य मंडल का संयुक्त प्रकाशन |










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