''यदि ये किसान यह गारंटी चाहते हैं कि उनका उद्यम जारी रहे, तो ऐसा आश्वासन देने की स्थिति में हम नहीं हैं। वे तब वे यहूदी विरोधियों, किसान संघ वालों और ऐसी ही अन्य पार्टियों में शामिल होंगे, जिन्हें सब कुछ वादा करने और एक भी वादा पूरा न करने में मजा आता है। हमें आर्थिक दृष्टि से यह पक्का यकीन है कि छोटे किसानों की तरह बड़े और मध्यम किसान भी अवश्य ही पूंजीवादी उत्पादन और सस्ते विदेशी गल्ले की होड़ के शिकार बन जाएंगे। यह इन किसानों की भी बढ़ती हुई ऋणग्रस्तता और सभी जगह दिखायी पड़ रही अवनति से सिद्ध हो जाता है। इस अवनति का इसके सिवा हमारे पास कोई इलाज नहीं है कि इन्हें भी सलाह दें कि वे अपने-अपने फार्मों को एक में मिलाकर सहकारी उद्यमों की स्थापना करें, जिनमें उजरती श्रम के शोषण का अधिकाधिक उन्मूलन होता जाएगा, और जो धीरे-धीरे उत्पादकों के एक महान् राष्ट्रीय सहकारी उद्यम की शाखाओं में परिवर्तित किए जा सकते हैं, जिनमें प्रत्येक शाखा के अधिकार और कर्तव्य समान होंगे। यदि ये किसान यह महसूस करें कि उनकी मौजूदा उत्पादन-पद्धति का विनाश अवश्यंभावी है और इससे आवश्यक सबक हासिल करें, तो वे हमारे पास आएंगे और यह हमारा कर्तव्य हो जाएगा कि परिवर्तित उत्पादन-पद्धति में उनके भी संक्रमण को अपनी शक्ति भर सुगम बनायें। अन्यथा हमें उन्हें अपने भाग्य के भरोसे छोड़ देना और उनके उजरती मजदूरों के पास जाना होगा, जिनके बीच हम सहानुभूति पाये बिना नहीं रह सकते। बहुत संभव है कि यहां भी हम बलात् संपत्तिहरण करने से बाज आ सकेंगे, और इस बात का भरोसा कर सकेंगे कि भविष्य का आर्थिक विकास इन कड़ी खोपड़ियों में भी बुद्धि का प्रादुर्भाव करेगा।''
Tuesday, 22 September 2020
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